तीसरी जात

भारत में आप जातिवादी (या कहें, भेद्भावी) न होकर भी जाति के होने से इंकार नहीं कर सकते| जाति व्यवस्था को कर्म आधारित व्यवस्था से जन्म आधारित में परिवर्तित हुआ माना जाता है, और आज यह भेदभाव के आधार के अलावा आदतों, परम्पराओं, भोजन, रिहायश और वंशानुगत बीमारियों का प्रतीक है| इनमें जाति विशेषों से सम्बंधित कई बातें दुर्भावना से भी प्रेरित मानी जाती हैं|

परन्तु, किसी भी व्यवस्था के प्रारंभ होने के समय उसके कुछ न कुछ कारण रहे होते हैं, भले ही बाद में वह सही साबित हो या गलत| मेरे मन में एक प्रश्न हमेशा रहा कि कर्म आधारित जाति व्यवस्था में जातियों के श्रेणीक्रम का क्या मापदंड था और क्यों था|

किसी भी सामाजिक व्यवस्था में ज्ञान को सुरक्षा और अर्थ से पहले रखा गया है| ब्राहमण यानि ज्ञान का पहले स्थान पर रखने पर कोई प्रश्न नहीं हैं| आज हम सुरक्षा को हमेशा धन के बाद रखते हैं और मानते हैं की धन ही धर्म और सुरक्षा का संवाहक है| मानवता और देश का विकास धन और धनपतियों की धरोहर मन जाता है| मजे की बात यह है कि अधिकांश भारत में ब्राहमण और वैश्य खान – पान की शाकाहारी आदतों की बहुलता के चलते स्वाभाविक रूप से निकट जाति समूह लगते हैं| साथ ही दानजीवी ब्राह्मणों के लिए भी यह सरल था कि वो राजाओं का मूँह देखने की जगह धन स्रोत वैश्यों को सम्मान देकर जातिक्रम में दूसरे स्थान पर आसन्न करते|

आज जब पूँजीवाद का समय है और पूंजीपति के आते ही धर्म के तमाम देवता, पंडित, फ़कीर, सन्यासी आदि विशिष्ट क्रम (VIP Line) में लग कर उन्हें दर्शन देते हैं| सत्ता ज्ञानवान के स्थान पर धनवान से पूछकर नीति – निर्धारण करती हैं| कहा जाता है कि विश्व का एक बड़ा देश अपने हथियार निर्माता धनपतियों को ख़ुश करने के लिए अपनी सेना को नरक में भी भेजने के लिए तैयार रहता है| ऐसे समय में मुझे लगता है कि जातिक्रम निर्धारित करते समय वैश्यों को अगर पहले नहीं तो दुसरे स्थान पर अवश्य होना चाहिए था|

परन्तु ऐसा नहीं हुआ| क्यों?

पिछले सप्ताह जब भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन की संभावित विदाई और इस सप्ताह उनके पद पर न रहने के निर्णय के सन्दर्भ में क्रोनी – कैपिटलिज्म के सहारे भारतीय जाति व्यवस्था में वैश्यों यानि पूँजी को तीसरे सामाजिक पायदान पर रखने का निहित कारण समझ आया|

पूँजीपति पूँजीवाद के छद्म रूप बाजार और अर्थव्यवस्था के नाम पर अपने लोभ – लालच की व्यवस्था चलता हैं| इस लोभवाद में पूँजीवाद कहीं नहीं रहता केवल पूंजीपति रहता है जो अपने लोभ के लिए पूंजीवादी सिद्धांतों का दुरूपयोग करता है| उसके लोभ के लाभ पर आश्रित लोग उसके लिए विकास और खुशहाली के गीत लिखते है और कुतर्क रचते हैं| जिस प्रकार मदमस्त हाथी अपने सामने आने वाली हर अच्छी बुरी चीज को कुचल देता है, उसी प्रकार यह लोभवाद धर्म, कर्म, सुरक्षा आदि को अपने कुहित में कुचलता चलता है| रघुराम राजन इसके पहले शिकार नहीं हैं| इस्रायल में बैंक ऑफ़ इस्रायल के गवर्नर प्रोफ़ेसर स्टैनले फिशर लगभग सात साल पहले इसके और कहीं अधिक सीधे शिकार बने थे|[i]

हमारे प्राचीन विद्वानों को उस समय में लगा होगा कि पूँजी, पूंजीपति और पूँजीवाद का साथ आसानी से लोभवाद को जन्म देता है| अगर अगर पूँजीसत्ता को धर्मसत्ता और राजसत्ता से पहले या किसी एक के साथ दे दिया जाता जाता तो यह लोभवाद भारत को बहुत पहले विकास के नाम पर बर्बाद कर चुका होता|

 

[i] https://promarket.org/raghuram-rajan-stanley-fischer/

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जातिवादी शिक्षा व्यवस्था

बचपन में हम सवर्णों का वास्ता जाति और इसके अभिशाप से नहीं पड़ता| जब हम घर से निकलकर विद्यालय जाते हैं तो पहली बार इसका पता लगता है|

क्या घरों – मुहल्लों में जाति नहीं होती? दिल्ली मुम्बई महानगरों में जाति का प्रकोप मुहल्लों और कॉलोनियों में शायद कम ही दीखता हैं मगर अधिकांश नगरों – महानगरों में मोहल्ले ही जाति के आधार पर बने होते हैं| सवर्ण इलाकों में दलित और अन्य धर्म का रहना मुश्किल है| इसलिए बच्चों को जाति का सीधा भान नहीं होता| भारतीय शहरों में इलाकों के जाति और धर्म के नाम पर होते रहें हैं| हमारे शहरों में ब्राह्मणपुरी, बनियापाड़ा, तमोलीपाड़ा आदि जाति आरक्षित इलाक़े हैं| आज भी नए इलाकों में जाति का प्रकोप बना हुआ है और सवर्ण – पिछड़ा – दलित – उच्चमुस्लिम – निम्नमुस्लिम का प्रकोप बना हुआ है और थोड़ा अंतर यह है कि उसमें सवर्णों में आपसी जाति भेदभाव का स्थान आर्थिक भेदभाव ने ले लिया है|

जिनका बचपन या जीवन बचपन जीवन सवर्ण इलाकों में ही बीता हैं, उन्हें दलित लोगों से कोई विशेष वास्ता नहीं पड़ता| पारस्परिक संवाद का कोई साधन या पारस्परिक व्यवसायिक सम्बन्ध विकास और सवर्णों के गौर सवर्ण व्यवसायों में आने के साथ लगभग समाप्त हो चुके हैं| बहुत से कामों में आज लोग, सभ्यता या मजबूरी के कारण जाति नहीं देखते जैसे ढ़ाबे पर खाना खाना|

विद्यालय और व्यवसाय, जीवन में परिवार और नाते रिश्तों के बाहर पारस्परिक सामाजिक संवाद का अवसर प्रदान करते हैं| सरकारी नौकरियों में सकारात्मक आरक्षण के कारण पारस्परिक संवाद बना है, परन्तु निजी क्षेत्र में नकारात्मक आरक्षण (भेदभाव भी पढ़ सकते हैं) के कारण सवर्ण संस्थाओं में सवर्ण और दलित संस्था में दलित बहुसंख्या[1] काम करती है| निजी क्षेत्र में मजदूरों की नियुक्ति में जरूर जाति भेद कम हैं, मगर मध्यवर्गीय दृष्टि क्षेत्र के बाहर मजदूरों में आपसी जातिवाद और जातिगत गुटबाजी होती है|

विद्यालयों में पारस्परिक सामाजिक संवाद उस कच्ची उम्र में होता है, जहाँ यह जाने अनजाने में हमारे अंतर्मन पर दुष्प्रभाव छोड़ता है| सवर्ण क्षेत्रों में रहने पलने के बाद मेरे लिए भी इस भेदभाव का पाठ कक्षा 6 में मिला था| जहाँ अधिकतर हिन्दू – मुस्लिम सवर्ण और पिछड़े पहले सेक्शन में थे और हिन्दू मुस्लिम दलित तीसरे में| दूसरा सेक्शन सामाजिक आर्थिक और शैक्षिक पिछड़ों के लिए था| अधिकतर शिक्षक सवर्ण थे और पहले सेक्शन के अलावा कहीं और पढ़ाना उनके लिए महापाप था| अंतरजातीय वार्तालाप गुरुजन के क्रोध को भड़का सकता था| मुझे कई बार यह बताया गया कि जाटवों या कुरैशियों से बात करने से जुबां ख़राब हो जाती है, आप संस्कृतनिष्ठ हिंदी या गाढ़ी उर्दू की जगह अबे – तबे बोलना शुरू कर सकते हैं| मजे की बात है की अबे तबे की भाषा में हमारे गुरुजन जाटवों या कुरैशियों से कहीं अधिक माहिर थे| भेदभाव का पहला पाठ यही था| आज भी स्तिथि नहीं बदली है, केवल बहाने बदल गए हैं| आज अछूत के स्थान पर साफ़ – सफाई, भाषा, गाली – गलौज, या कोई और बहाना लगाया जाता है|

पापा के स्थानांतरण के बाद जब नए स्कूल पहुँचे तो वहाँ हर सेक्शन में लगभग बराबर अनुपात में सभी सामाजिक वर्ग थे मगर…| उसका एक राजनीतिक कारण था, स्थानीय पूर्व सांसद दलित वर्ग से थे और केंद्र में मंत्री रहे थे| मगर सवर्ण और दलित प्रायः आपस में बात नहीं करते थे| कक्षा में सबसे आगे शहरी सवर्ण, उसके बाद ग्रामीण सवर्ण, फिर पिछड़े, फिर शहरी और ग्रामीण दलित थे| इसमें कुछेक अपवाद थे जैसे पूर्व सांसद महोदय का भतीजा अपने एक दो मित्रों से साथ अपनी पसंद की जगह पर बैठता था, वह प्रायः शहरी सवर्णों से पंगा नहीं लेता था और बाकी लोग उससे| मेरे और उसके जैसे दो – तीन लोग ही कक्षा में उन छात्रों में से थे जो जाति सीमा के बाहर हर किसी से बात करते थे| अन्य लोगों से संवाद प्रायः फब्तियों, गालियों, नारेबाजी और “जातिसूचक शब्दों” में होते थे|

जब मंडल आयोग की सिफारिशें लागू हुईं; सवर्णों को दलित वर्ग तो निशाना बनाने का एक और हथियार मिल गया| जिसकी तात्कालिक प्रतिक्रिया तीव्र थी मगर जल्दी ही आर्थिक सुधारों में उसे थाम लिया| अब आर्थिक विकास के कारण होशियार छात्र प्रायः जातिगत आरक्षण को लेकर चिंता नहीं करते| आजकल कम पढ़ने वाले सवर्ण छात्र ही प्रायः दलितों और अन्य आरक्षित वर्गों से कटुता रखते हैं| भले ही अभी यह अपेक्षा से कम है, परन्तु दलित छात्रों में भी प्रतिस्पर्धा बढ़ी है और पढाई – लिखाई का स्टार भी| परन्तु, विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में सबसे अधिक भेदभाव आज भी शिक्षक वर्ग की तरफ से आता है|

हैदराबाद विश्वविद्यालय में शोधार्थी रोहित वेमुला की आत्महत्या के कारण उठे सवालों के तात्कालिक कारणों से हटकर अगर हम भारतीय शिक्षा व्यवस्था में झांके तो हमारे विश्वविद्यालय सामंती परंपरा के संवाहक हैं| हमारे गुरुजन (और दुर्भाग्य से नवगुरुजन भी) यथा – योग्य चरणवंदना के आधार पर अपने गुरूर की सत्ता को गर्वानुभूति से संचालित कर रहे हैं| शोधार्थी तो वैसे ही बंधुआ हो जाता है, जिसके आगे गुरु घंटाल अपनी गौण – गुरुता सिद्ध करने में लगे रहते हैं| अगर छात्र सामाजिक या आर्थिक तौर पर नीचे पायदान है तो यह बंधुआ – शोधार्थी उनके लिए जन्म- जन्मान्तर का दास हो जाता है| एक शोधार्थी का सामाजिक आन्दोलन में सक्रिय होना विरोधी संगठन के लिए मात्र विरोध होता है परन्तु गुरु – सत्ता के लिए अपने इन्द्रासन पर आघात के समान होता हैं| डोलता हुआ इन्द्रासन शील, शालीनता, साधना और समाधि के नष्ट होने से ही ठिकता है|

[1] भारत के सकल उत्पाद का अधिकांश छोटे और मझौले उद्यमियों से आता हैं जिनका सञ्चालन अधिकतर पिछड़े और दलितों के हाथ में है|

कुलनाम

अभी हाल में “ओऍमजी – ओह माय गॉड” फिल्म देखते हुए अचानक एक संवाद पर ध्यान रुक गया| ईश्वर का किरदार अपना नाम बताता है “कृष्णा वासुदेव यादव”| इस संवाद में तो तथ्यात्मक गलतियाँ है;

 

१.      उत्तर भारत में जहाँ कृष्ण का जन्म हुआ था वहां पर मध्य नाम में पिता का नाम नहीं लगता| वास्तव में मध्य नाम की परंपरा ही नहीं है, मध्य नाम के रूप में प्रयोग होने वाला शब्द वास्तव में प्रथम नाम का ही दूसरा भाग हैं, जैसे मेरे नाम में मोहन|

 

२.      उस काल में कुलनाम लगाने का प्रचलन नहीं था|

 

'Vamana Avatar' (incarnation as 'Vamana') of V...

‘Vamana Avatar’ (incarnation as ‘Vamana’) of Vishnu and King ‘Bali’. (Photo credit: Wikipedia)

 

 

 

जाति सूचक शब्द में नाम का प्रयोग शायद असुर नामों में मिलता है, जैसे महिषासुर, भौमासुर| यह भी बहुत बाद के समय में| प्रारंभिक असुर नामों में भी इस तरह का प्रयोग नहीं है, जैसे – हिरन्यकश्यप, प्रह्लाद, बालि, आदि|

 

ऐतिहासिक नामों में मुझे चन्द्रगुप्त मौर्य के नाम में ही कुल नाम का प्रयोग मिलता है, स्वयं मौर्य वंश में भी किसी और शासक ने कुलनाम का प्रयोग नहीं किया है| विश्वास किया जाता है कि वर्धनकाल तक भारत में जाति जन्म आधारित न होकर कर्म आधारित थी| यदि उस समय जाति या कर्म सूचक कुलनाम लगाये होते तो हो सकता कि शर्मा जी का बेटा वर्मा जी हो| सामान्यतः, मध्ययुग तक कुलनाम का प्रयोग नहीं मिलता| हमें पृथ्वीराज चौहान का नाम पहली बार कुलनाम के साथ मिलता है|

 

 

स्त्रियों में कुलनाम लगाने की परंपरा बीसवीं सदी तक नहीं थी| स्त्रिओं में कुमारी, देवी, रानी आदि लगा कर ही नाम समाप्त हो जाता था| बाद में जब स्त्रिओं में कुलनाम लगाने की परंपरा आयत हुई तो बुरा हाल हो गया है| प्रायः सभी स्त्रिओं को विवाह के बाद अपना कुलनाम बदलकर अपनी पहचान बदलनी पड़ती है अथवा अपनी पुरानी पहचान में पति की पहचान का पुछल्ला जोड़ना पड़ता है|

 

पाठकों के विचारों और टिप्पणियों का स्वागत है|

 

इक्कीसवीं सदी में मध्ययुगीन भारत के सतयुगी सपने – ३

पर्दा, जौहर, सती, जन्म आधारित जाति, दास प्रथा, मूर्ति पूजा,

हमारे मध्य – युगीन विद्वानों ने केवल अच्छी बातें छोड़ने में ही यकीं नहीं किया है वरन बहुत सी गलत बातें इस तरह अपना लीं हैं कि आज उन्हें प्राचीन भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग बता कर पेश किया जा रहा है| मेरे पास लम्बी सूची है जिस पर मैं बात कर सकता हूँ, मगर मैं कुछ बातें उदहारण के रूप में उठाऊंगा|

पर्दा और स्त्री अशिक्षा:

पर्दा प्रथा का हमारे प्राचीन समाज में कहीं नहीं मिलता| हमारे प्राचीन समाज में उच्च – शिक्षित नारियों की लम्बी सूची है| अगर पर्दा प्रथा का उस समय कोई अस्तित्व रहा होता तो क्या समझदार, उच्च – शिक्षित नारियों की कोई सम्भावना रहती| जिस देश में ब्रह्मचर्य का उच्च आदर्श रहा हो , वहाँ पर्दा क्यों कर आवश्यक हो सकता है? प्राचीन काल में मत्रेयी और गार्गी जैसी विदुषियों की उपस्तिथि इस बात का प्रमाण है कि उच्च शिक्षा पर नारियों का सामान अधिकार था| स्वयंवर जैसी परंपरा इस बात का प्रमाण है कि माता – पिता साथी चुनने में मात्र मार्गदर्शक थे मगर साथी चुनने का अधिकार नारी का था| यदि स्त्री अशिक्षित होती तो वह उचित निर्णय शायद नहीं कर सकती थी|

आज देश में जब महिलाओं के विरुद्ध अपराध बढ़ रहे है तो कई मध्य –युगीन मानसिकताएं प्रबल होकर उनकी शिक्षा और राष्ट्र निर्माण में उनके बढ़ते योगदान को दोष दे रहे है| जो की गलत और प्राचीन परंपरा के विरुद्ध बात है|

 

जौहर और सती:

माना जाता है कि महाभारत में महाराज पांडू की मृत्यु के बाद माद्री सती हुई थीं| मगर शायद यह दुःख और आत्मग्लानि में लिया गया प्राण त्याग का निर्णय था| इसके अतिरिक्त किसी भी प्राचीन ग्रन्थ में सती परंपरा का जिक्र नहीं आता है और इतिहास में गुप्त काल से पहले किसी भी स्त्री के सती होने का कोई प्रमाण नहीं मिलता है| कहा जाता है की दिल्ली सल्तनत और मुग़ल शासन में सती होने के लिए सरकारी अनुमति लेनी होती थी|[1] इसका अर्थ यह हुआ सती परम्परा का जन्म उस समय हुआ जब पश्चिमी सीमा पर अरब आक्रमण हो रहे थे और कायर भारतियों उन आक्रमणों का मुकाबला करने से ज्यादा पत्नियों के विजेताओं के हाथ में पड़ने की चिंता अधिक थी| अथवा शेष रह जाने वाले हमारे वीर परिवारों को शहीदों की विधवाएं बोझ लग रहीं थीं| इसी गन्दी परम्परा को आगे बढ़ाते हुए उसे जौहर व्रत का और अधिक घिनौना रूप दे दिया गया| क्या आश्चर्य है कि जिन स्थानों पर सती और जौहर जैसी घिनोनी परम्पराओं ने जन्म लिया, उन्ही स्थानों पर करवाचौथ का व्रत भी अधिक प्रचलित है| कौन इंसान ज़िंदा जल कर मरना चाहता है और अगर केवल पति की मृत्यु के कारण जिन्दा जलने का डर  जीवन भर सताए तो पति की मृत्यु रोकने के लिए व्रत उपवास ही क्या, कुछ भी सही गलत किया जा सकता है| दुःख की बात है कि सती और जौहर की घिनौनी परम्परा के इस जिन्दा अवशेष का देश में हर संभव माध्यम से प्रचार हो रहा है| आज उस स्त्री के चरित्र पर शक किया जाता है जो करवा चौथ का व्रत नहीं रखती| दुःख होता है कि कुछ नारीवादी मात्र यह देख कर खुश हो लेते है कि उन दिन पुरुष पत्नी का दिल नहीं दुखाते|

 

जन्म आधारित जाति प्रथा और अन्य भेदभाव:

सभी भारतीय जानते हैं कि राम चन्द्र जी के गुरु ब्रह्मर्षि विश्वामित्र पहले क्षत्रिय थे जिन्होंने बाद में ब्राह्मणत्व प्राप्त किया| अग्रवाल वैश्यों के पूर्वज महाराजा अग्रसेन सूर्यवंशी क्षत्रिय थे जिन्होंने वैश्य कर्म को अपना लिया था| इस प्रकार के अनेकों उदाहरण देखने को मिलते हैं और समय के साथ इन सभी के वंशज अपने मूल जाति को अब तक भूल चुके हैं| हम देख सकते हैं कि किसी भी समाज में कार्य और आर्थिक क्षमता के अनुसार अपने वर्ग होते हैं| आज निम्न, निम्न मध्यम, मध्यम, और उच्च वर्ग मौजूद हैं| समान रूप से देश में धर्मगुरु, राजनीतिज्ञ, सरकारी अधिकारी, पेशेवर, व्यवसायी, कार्मिक, कृषक आदि वृहत्तर वर्ग मौजूद है| उसी प्रकार से प्राचीन काल में जाति थी जिसको धीरे धीरे कबीलाई तर्ज पर जन्म आधारित कट्टर रूप में स्वीकार कर लिया गया| यह उसी तरह से है जिस तरह से आज भी सऊदी अरब में एक कबीला विशेष अपने को बाकि कबीलों से ऊँचा मानता आ रहा है| मुझे जन्म आधारित जाति प्रथा से कोई बैर नहीं हैं मगर इसके आधार पर होने वाले भेदभाव से है| देश में हर जाति ने अपने से नीचे की एक जाति ढूंड ली है और उसका अपना सर उठा रखा है| जब आप अपनी जाति को ऊँचा या नीचा देखते हो तो आप जातिवादी हैं| क्या हम कबीला संस्कृति के उत्तराधिकारी हैं?

आज किसी भी विवाह विज्ञापन को देखिये; जाति, वर्ग और व्यवसाय का मिला जुला भेदभाव आपको बिना परिश्रम देखने को मिल जाएगा|

आज हमारा देश हर मामले में अधिक भेदभाव वाला है और सभ्यता से कोसों दूर जा रहा है| आज किसी भी विवाह विज्ञापन को देखिये; जाति, वर्ग और व्यवसाय का मिला जुला भेदभाव आपको बिना परिश्रम देखने को मिल जाएगा| अगर संतान किसी भी एक क्षेत्र में एक कदम आगे बढ़ा ले तो माँ – बाप का नखरा नाक पर आकर बैठ जाता है|

आज देश में रंग भेद भी परवान चढ़ रहा है| पहले तो बात गोरी लड़कियों की थी अब तो लड़कों के लिए भी कहा जाने लगा है कि रंग बदलो वर्ना जीवन समाप्त| मैं यह बात केवल विज्ञापन देख कर नहीं कह रहा आप गैर सरकारी क्षेत्र में किसी भी साक्षात्कार में देख लीजिये, विज्ञापनों से फैलाया जाने वाला भेदभाव असर दिखा रहा है; लम्बे, छकहरे गौरे अंग्रेजी वाले लोगों को आँख बंद कर बढ़ावा दिया जा रहा है| क्या यह रंगभेद हमने अंग्रेजों की गुलामी से नहीं सीखा?

 

मूर्ति पूजा:

भारतीय सभ्यता के मूल ग्रंथों में मूर्ति पूजा का कोई चिह्न नहीं मिलता| वेद, उपवेद, उपनिषद, आदि में ईश्वर को निराकार माना गया है| जहाँ कहीं भी ईश्वर के किसी भी अंश, देवताओं आदि का वर्णन आया है वहां भी उनकी मूर्ति पूजा का प्रावधान नहीं मिलता| हर प्राचीन ग्रन्थ में यज्ञ, तपस्या और साधना का ही वर्णन मिलता है| हिन्दू धर्म कभी भी मूर्ति पूजक नहीं था| अगर हम आज भी किसी सामान्य हिन्दू से भी बात करें तो पायेंगे ही वह भी निर्विवाद रूप से ईश्वर को निराकार मानता है| तो फिर ये मूर्ति पूजा कहाँ से आई? इस बात की चर्चा हमेशा होती रही है कि अनार्य भारतीय समाज में मूर्तियों का चलन रहा होगा| यदि हम ठीक से अवलोकन करें तो पायेंगे की आर्यों में राम चन्द्र जी द्वारा रामेश्वरम में शिवलिंग की स्थापना और पूजा, मूर्ति पूजा का पहला वर्णन है|[2] राम चन्द्र जी ने दो मूल कारणों से उस समय मूर्ति पूजा की हो सकती है; पहला, उनके साथ आदिवासियों और अनार्य समुदाय की काफी बड़ी सेना थी और वह उस सेना के मूल धार्मिक विचार से अपने को जोड़ना चाहते थे अथवा दूसरा, वह शिव भक्त रावण की सेना का मनोबल तोड़ने के लिए शिव लिंग की पूजा कर रहे हों| देश में रामायण काल के बाद के बने बहुत से प्राचीन मंदिर हैं मगर उनका मूल रूप मात्र ईश्वरीय शक्ति के स्मारक के रूप में था या मूर्ति पूजा होती थी कहना मुश्किल है| मूर्ति पूजा का चलन गुप्त काल के बाद से मिलता है| शिवलिंग और शालिग्राम के रूप में ईश्वरीय चिह्नों की पूजा का वर्णन अधिक मिलता है और उसके बाद अन्य मानवाकार रूप में ईश्वर के तीन रूपों (ब्रह्मा विष्णू, महेश), देवी और अवतारों की मूर्तियों का का चलन प्रारंभ होता है| आज इस सूची में नए नए देवता और गुरु भी जुड़ते जा रहे हैं|

कहा जाता है की मूर्ति से प्रारंभिक अवस्था में ध्यान लगाने में मदद मिलती है| यह तर्क भी इस बात का प्रमाण है कि प्राचीन उच्च स्तरीयता के पतन के बाद भारतीय समाज को मूर्ति पूजा की अवश्य ही आवश्यकता पड़ी होगी|

मेरा मूल प्रश्न वही है; क्या हम अपने आज के मध्ययुगीन विचारों के साथ सतयुगी ऊँचाइयों के सपने देख सच कर सकते हैं? क्या हमें अपनी मध्ययुगीन अव्यवस्था को छोड़ कर प्राचीन उच्च आदर्श नहीं अपनाने चाहिए?