जनसंख्या नियंत्रण – प्राकृतिक चुनौती


भले ही रोटी कपड़ा मकान को मूल भूत आवश्यकता कहा जाता हो, परन्तु जीवन की प्राकृतिक आवश्यकता और कर्त्तव्य भोजन और संतति है| इन दोनों के बिना सृष्टिचक्र संभव नहीं| संतति होना जितना प्राकृतिक है, उसे बचाए रखना बेहद कठिन| जीवन चक्र के निम्नतम पायदान से लेकर उच्चतम पायदान तक सभी जीव अरबों खरबों वर्ष से यह जानते हैं कि संतति संरक्षण कठिन संघर्ष है| हजारों प्रजातियाँ संतति बचा पाने में असफल रहीं हैं और अब जीवाश्म के रूप में ही प्राप्य हैं| यह जैविक अनुभव कहता हैं कि प्राकृतिक इतिहास में किसी संतान के जवान हो पाने का सार्वभौम औसत शून्य का निकट है| ऐसी स्तिथि में जैविक जीवन संघर्ष जन्य अनुवांशिक ज्ञान यह समझाता है कि प्रजाति और संतति बचाए रखने के लिए अधिकतम प्राकृतिक सम्भाव्य संख्या में संतान उत्पन्न की जाए| 

यह जैविक जीवन संघर्ष अनुवांशिक ज्ञान ही है जो संतानहीन दम्पतियों को संतान की चाहत में दर दर भटकता है| क्या संतानहीन दम्पति या नहीं जानते कि जनसंख्या बहुत है और उनकी संतान होने पर भी मानव प्रजाति अभी चलती रहेगी? परन्तु  जैविक जीवन संघर्ष जन्य अनुवांशिक ज्ञान हमारे निजी बौद्धिक ज्ञान पर सदा भारी पड़ता रहा है| 

ऐसे में जनसंख्या नियंत्रण के सभी विचार मानव की  प्राकृतिक विचारधारा के विपरीत हैं| जनसंख्या नियंत्रण प्राकृतिक मानवीय विचार न होकर एक आर्थिक विचार है| यह संसाधन के अतिशय बंटबारे को रोकने का विचार है| आर्थिक, सामाजिक और चिकित्सकीय उन्नति के साथ मानव संतति के सुरक्षित रहने की सम्भावना बढ़ी जिससे अधिक संतति की जीवन सम्भावना बढ़ी है| परन्तु क्या मानव जैविक जीवन संघर्ष जन्य अनुवांशिक ज्ञान से ऊपर उठ सकता है? वर्तमान जीवन में अर्जित बौद्धिक ज्ञान को न केवल जैविक जीवन संघर्ष जन्य अनुवांशिक ज्ञान चुनौती देता है, साथ ही नैतिक, धार्मिक, सामाजिक, मानवीय इसे चुनौती देते हैं| जनसंख्या नियंत्रण अल्पकालिक आर्थिक हित तो साधता है परन्तु यह दीर्घकालिक रूप से अर्थव्यवस्था को हानि पहुँचाता है| यही कारण है कि सर्वाधिक जनसंख्या वाला चीन और सर्वाधिक जनसंख्या वाला जापान, जनसंख्या नियंत्रण के विचार को त्याग रहा है| 

अगर भारतीय जनसंख्या परिवेश को देखा जाए तो शिक्षित समुदाय में संतति नियंत्रण में है और दम्पति एक से तीन संतानों के बेहतर भविष्य के लक्ष्य पर निग़ाह जमाकर रखते हैं| दूसरी और अल्पशिक्षित समुदाय में जनसंख्या नियंत्रण कठिन हो रहा है| कारण बहुत सामान्य है| अल्पशिक्षित होना जीवन पर्यन्त आर्थिक संघर्ष का कारक बनता है| शिक्षा, धन और सामाजिक स्तर की कमी संतति के दीर्घ जीवन की सम्भावना के प्रति संशय पैदा करती है| स्वभाविक तौर पर जैविक जीवन संघर्ष जन्य अनुवांशिक ज्ञान आपको अधिक संतति के प्रति धकेलता है| जब तक अल्पशिक्षित और अशिक्षित परिवार को यह सामाजिक सुरक्षा नहीं होगी कि उसकी संतति सुरक्षित है, कोई भी तर्क, नारा, प्रलोभन, पुरस्कार या दंड अधिक संतति के स्वतः स्फूर्त जैविक आग्रह का सामना नहीं कर पाएंगे| यही कारण है, जनसंख्या पर बलात नियंत्रण नहीं रखा जा सकता| 

इसी विषय पर मेरा एक पत्र बिज़नेस स्टैण्डर्ड हिंदी के दिल्ली संस्करण में दिनांक २६ जुलाई २०२१ को प्रकाशित हुआ है: