मतदान

कल मतदान का दिन है|

सालों ने एक छुट्टी बर्बाद कर दी| कोई इतवार को भी चुनाव रखता है क्या? इन कमीशन वालों को तो बस पाँच साल में एक बार काम करना होता है| मगर हम से इतवार को वोट दलवायेंगे| इन के सरकारी लोग भी सब थोड़े से पैसे और ओवरटाइम के लिए इतवार को दौड़ पड़ते हैं चलो वोट डालो|गर्मी भी तो कितनी है – हे भगवान ४२ पार|

चुनाव भी क्या है| लोग पैसा लेकर वोट डालने जाते हैं| दारू ठर्रे के लिए वोट हो जाता है| देखा है न सब मैले कुचले लोग कतार में खड़े रहते हैं जैसे कोई भंडारा हो| कोई मुफ्त में वोट डालने| कौन खड़ा हो इन कीड़ों के साथ| मैं तो नहीं जाता| गर्मी में मनाली जाएँ कि मतदान केंद्र?

कुछ नहीं होना इस देश का वैसे भी| सब एक थाली के चट्टे बट्टे हैं| कोई देश नहीं बदलता| देश अपने आप बदलता है|हर कोई चला आता है मैंने ये किया, उसने ये नहीं किया| अरे भाई, हमने अगर १२ घंटा कंपनी के ऑफिस में कुर्सी नहीं तोड़ी होती तो क्या कुछ कर लेते ये नेता लोग|

इन नेता लोग को तो वैसे भी कुछ नहीं करना होता| अफसर करते हैं अफसर| अब देखों अफसर ने कॉपी पेस्ट ड्राफ्ट कर के कोई टेढ़ा मेढ़ा कानून सा बना दिया| न बहस, न चर्चा, न बात न चीत, बस ये ये ये ये… …. हो गया पास|उखड़ गया घंटा|

कुछ भी कर लो, मंदिर नहीं बनेगा| न १९८४ वालों को सजा मिलेगी न २००२ वालों को| विकास की दर दुनिया ब्याज की दर की तरह ही थोड़ा थोड़ा बढ़ेगी| सरकार कोई भी हो| आरक्षण हटेगा नहीं, और हमें बिना काम वाली सरकारी नौकरी मिलेगी नहीं|

चुनाव क्या है, बड़े सेठ लोग का हँसी ठठ्ठा है| नेता नाचते हैं, मुजरे में भाषण करते हैं और वाह वाह सुनकर चल देते हैं| दस मिनिट में भाषण कूड़ा| कौन याद रखता है भाषण, अख़बार वाले| उनको तो बस रद्दी छापनी होती है| कोई काम की बात आती है अखबार में| वैसे आये भी तो क्या? कौन सा हमको पढ़ना है| हमें तो बस हीरोइन का फ़ोटो देखना है|

चल कहीं फ़िल्म देखने चलते हैं|

(अब यह बकबास कर ली हो या पढ़ ली हो तो चलें वोट डालने| हमारी दिल्ली में तो भैया कल है कल|)

आरक्षण बेचारा!!

मानसून और चुनाव हमारे राष्ट्रीय मौसम हैं| इन मौसम में मेढ़क और नेता अपने बिल और बंगलों से बाहर निकल आते हैं| मॉनसून और चुनावों के बाद दिवाली शुरू हो जाती है, इसलिए पुराने साज-सामान और वादों को धो पौंछ कर चमकाया जाता है|

इस बार प्रधानमंत्री जी ने पुराने वादे को वादों के कब्रिस्तान से खोदखाद कर खड़ा कर किया है| गरीबों को दस फ़ीसदी आरक्षण मिलने जा रहा है| बधाईयाँ… , … …. … थोड़ी देर बाद|

सवाल यह नहीं रहा कि पिछले पच्चीस साल में कितने लोगों की आरक्षण का लाभ मिला और आरक्षित श्रेणी के कितने पद खाली छूट गए? सवाल खास ये है कि नौकरियां कहाँ हैं? आज बेरोजगारी का आंकड़ा ९ फीसदी के पास पहुँच चुका है| सरकारी नौकरियां लगातार घटी हैं, तो आरक्षण के वास्तविक अवसर कम होते रहे हैं| सरकारी खर्च में कटौती के नाम पर अधिकतर सरकारी काम ठेके पर हैं या व्यवसायिक करार दिए जाकर निजी क्षेत्र को बिक चुके हैं|

आरक्षण की इस घोषणा का सबसे खूबसूरत पहलू है – गरीबी का पैमाना|

सालाना आठ लाख की पारवारिक आय आरक्षण वाली गरीबी का पहला मापदंड है| गरीबी रेखा तो बेचारी आरक्षण वाली गरीबी आगे पानी मांगती है| यह आंकड़ा देश की प्रति व्यक्ति आय से बहुत अधिक है| देश की लगभग नब्बे प्रतिशत से अधिक आबादी इस आय निर्धारण के हिसाब से गरीब घोषित हो गई है| सरकार ढ़ाई लाख से उपर सालाना आय पर आयकर वसूलती है| बहुत से शहरी मित्र कहते हैं कि आयकर सीमा प्रतिव्यक्ति है और आरक्षण सीमा प्रतिपरिवार| मगर पति पति दोनों चार चार लाख से कम कमायें तो दोनों आयकर अमीर और आरक्षण गरीब होंगे|

मैं इस बात से सहमत होना चाहता हूँ कि गरीबी रेखा से नीचे वाले व्यक्ति को आरक्षण देने का कोई फायदा नहीं होगा| कारण वास्तविक गरीबी रेखा से नीचे वाले गरीब का बच्चा इतना पढ़ लिख नहीं पाता कि किसी सरकारी पद के लिए वास्तव में योग्य घोषित हो पाए| चपरासी के लिए भी कम से कम आठवीं पास उम्मीदवार चाहिए होता है| अगर किसी की वास्तव में लाभ देना है तो इस आरक्षण के लिए गरीबी की सीमा रेखा वास्तविक गरीबी रेखा से निश्चित ही ऊपर होनी चाहिए| मगर यह आठ लाख इस रेखा से बहुत ऊपर है|

जमीन या घर के पैमाइश भी बड़ी अजीब है| सौ एकड़ का सिचाई विहीन ऊसर किसी परिवार को अमीर नहीं बना सकता तो मरीन ड्राइव पर दस फुट का घर या दफ्तर लेना बहुत से अमीरों के बस की बात नहीं| कुल मिलाकर संपत्ति के आधार पर गरीबी का कोई वैज्ञानिक निर्धारण नहीं हो सकता|

ध्यान देने की बात है कि आर्थिक आधार पर आरक्षण देने का न मुद्दा नया है न प्रयास| यह मुद्दा संविधान सभा के सामने भी आया था और प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव ने बाकायदा नियम भी बनाया था| पहले संविधान सभा और बाद में उच्चतम न्यायालय ने इसे संविधान सम्मत नहीं पाया| संसद में विधेयक पास हुआ है, विधानसभाओं में भी हो जाएगा| मगर… … नौकरी हो तो मिलेगी|

शेष कुशल हैं| चुनाव की चुनावी बधाई|

आम आदमी पार्टी के चुनावी वादे

अब जब आम आदमी पार्टी दिल्ली राज्य की सत्ता संभाल रही है जो जनता को यह देखना चाहिए कि अगले पांच साल में कौन कौन से वादे पूरे किये जाने वाले हैं| अगर ये वादे पूरे नहीं होते तो उनका जबाब सरकार को देना होगा|

कुल ७० वादे हैं, मगर सबसे पहले खास ११ वादे जिन्हें में हर हाल में होता देखना चाहूँगा| मैं अपने खुद के आकलन से उन वादों के लिए संभावित समय लिख रहा हूँ, जो सही या गलत हो सकता है|

  • जन लोक पाल विधेयक, नागरिक चार्टर, ह्विसल्ब्लोअर्स को सुरक्षा: (क्रमशः ३ महिना, ९ महिना, २ साल)
  • स्वराज विधेयक: (९ माह)
  • बिजली के बिल आधे: (२ महीने) केवल बिजली की न्यूनतम आवश्यकता के लिए ही बिल आधे किया जाने चाहिए या अधिकतम मूल्य होना चाहिए| उस से ऊपर प्रयोग की बिजली के लिए पूरे बिल होने चाहिए|
  • डिस्कॉम का स्वतंत्र ऑडिट: (३ महीने)
  • सौर ऊर्जा शहर: (१० साल, २ साल में आवश्यक निर्णय)
  • २०,००० लीटर मुफ्त पेयजल केवल दिल्ली जल बोर्ड के मीटर वाले घरों में (१ साल) यह वादा गरीब जनता को अभी लाभ नहीं देगा, मगर अच्छी शुरुआत है| राजनीतिक रूप से घातक वादा|
  • पानी माफिया नियंत्रण: (१ वर्ष)
  • सस्ती दवाएं (१ वर्ष)
  • वाई – फाई दिल्ली: (२ वर्ष) ध्यान दें| मुफ्त नहीं है|
  • वैट सरलीकरण: (१ वर्ष)
  • शिक्षा स्वास्थ्य प्राथमिकता (१ वर्ष)

 

सभी ७० वादे संक्षेप में इस प्रकार हैं:

 

  • जन लोक पाल विधेयक, नागरिक चार्टर, ह्विसल्ब्लोअर्स को सुरक्षा
  • स्वराज विधेयक
  • दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा
  • बिजली के दाम आधे
  • डिस्कॉम का स्वतंत्र ऑडिट
  • पॉवर स्टेशन
  • बिजली वितरण प्रतिस्पर्धा
  • सौर ऊर्जा शहर
  • पानी का अधिकार
  • २०,००० लीटर मुफ्त पेयजल
  • पानी मूल्य निर्धारण
  • मुनक नहर से पानी
  • जल संसाधन विकास
  • पानी माफिया नियंत्रण
  • यमुना पुनर्जीवन
  • वर्षा जल संचयन
  • २,००,००० सार्वजानिक शौचालय
  • अपशिष्ट प्रबंधन
  • ५०० नए स्कूल
  • उच्च शिक्षा गारंटी योजना
  • २० डिग्री नए कॉलेज
  • फीस निगरानी
  • प्रवेश पारदर्शिता
  • सरकारी स्कूल गुणवत्ता
  • शिक्षा स्वास्थ्य प्राथमिकता
  • ९०० प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ३०,००० बिस्तर
  • सस्ती दवाएं
  • सड़कों पर रौशनी
  • लास्ट माइल कनेक्टिविटी
  • सीसीटीवी कैमरे: मुझे यह ठीक नहीं लगते हैं| निजता के अधिकार का उलंघन होगा| अपराध विरोधी माहौल की जरूरत है|
  • त्वरित न्याय(फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट)
  • न्यायपालिका सशक्तिकरण
  • महिला सुरक्षा बल
  • सुरक्षा बटन
  • मोबाइल गवर्नेंस
  • ग्राम विकास
  • भूमि सुधार
  • वाई – फाई दिल्ली
  • व्यापार – खुदरा हब
  • खुदरा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश नहीं: मैं सहमत नहीं हूँ|
  • कम वैट: GST आने वाला है तो आप क्या करेंगे?
  • इंस्पेक्टर राज्य का अंत
  • वैट सरलीकरण
  • दिल्ली कौशल मिशन
  • ८ लाख रोजगार
  • स्टार्ट – अप हब
  • नियमितीकरण
  • सामाजिक सुरक्षा
  • पर्यावरण
  • एकीकृत परिवहन प्राधिकरण
  • ५,००० बसें
  • ई – रिक्शा नीति
  • मेट्रो रेल विस्तार: मैं मेट्रो में रियायत के विरुद्ध हूँ| बहुत ही किफायती दाम पहले ही हैं|
  • ऑटो व्यवस्था
  • पुनर्वास कॉलोनी में फ्रीहोल्ड
  • अनधिकृत कॉलोनी नियमितीकरण
  • किफायती आवास
  • मलिन बस्ती विकास
  • गैर अंशदायी वृद्धावस्था पेंशन
  • मूल्य वृद्धि
  • नियंत्रणनशा मुक्त दिल्ली
  • विकलांग सशक्तिकरण
  • १९८४ दंगा न्याय
  • पूर्व सैनिक सम्मान
  • अल्पसंख्यक समानता
  • सफाई कर्मचारी गरिमा
  • सामाजिक न्याय
  • ३००० खेल मैदान
  • पंजाबी, संस्कृत, उर्दू
  • साहित्य संरक्षण

आम आदमी पार्टी की वापिसी

दिल्ली में आम आदमी की सरकार वापिस आ गई है|

दिल्ली विधानसभा में हुए दुर्भाग्यपूर्ण घटनाक्रम के बाद दिल्ली की जनता में यह भाव तो था कि केजरीवाल को अंतिम समय तक जनलोकपाल के लिए संघर्ष करना चाहिए था, मगर केजरीवाल के प्रति कोई दुर्भावना नहीं थी| इस बात का सीधा प्रमाण यह है कि लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के मत प्रतिशत में कोई कमी नहीं आई थी|

लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के कई बड़े नेताओं का दिल्ली से बाहर जाकर चुनाव लड़ना, दिल्ली की जनता को अखरा जरूर और भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें भगौड़ा कह कर इस बात का राजनीतिक प्रयोग भी किया| मगर, “भगौड़ा” अलंकार का प्रयोग लम्बे समय तक कर कर भाजपा ने न सिर्फ उसे चालू राजनीतिक शब्द बना दिया बल्कि अपने शीर्ष नेता के भगौड़ेपन को भी प्रश्न के रूप में प्रस्तुत कर दिया|

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दिल्ली चुनाव में मोदी लहर पर भरोसा कर कर भाजपा ने सबसे बड़ा नुक्सान यह किया कि अनजाने में  ही दिल्ली की जनता को मोदी सरकार का आकलन करने को विवश कर दिया| दिल्ली में मोदी की स्तिथि अनजाने में ही एक ऐसे प्रधानमंत्री की हो गयी जो पिछले दरवाजे से दिल्ली का मुख्यमंत्री भी था| जिस समय मोदी सरकार अपने लोकसभा जीत के जश्न में मशगूल थी, दिल्ली के हर दरवाजे पर आम आदमी पार्टी के नेता और कार्यकर्ता क्षमायाचना कर रहे थे| यह पहली बार था कि कोई भूतपूर्व मुख्यमंत्री बिना किसी दवाब और राजनितिक लफ्फाजी के माफ़ी मांग रहा था| सबसे महत्वपूर्ण बात, इस समय दिल्ली की जनता के दिल में जनलोकपाल बिल का संघर्ष और विधानसभा में हुआ हंगामा बुरे वक़्त की तरह बसा हुआ था| इस संघर्ष का एकमात्र नेता केजरीवाल ही हो सकता था|

भाजपा समर्थक केजरीवाल पर निजी हमलों में लगे थे| आप समर्थकों की विनम्रता का अर्थ भाजपाई उनके आत्मसमर्पण के तौर पर ले रहे थे| मगर इस तरह भाजपा दिल्ली के मुद्दों से भटक रही थी| उधर दिल्ली राज्य की मोदी सरकार लगातार गलतियाँ कर रही थी| दुर्भाग्य से केंद्र सरकार के दावे भी अपना इम्तहान दे रहे थे|

मोदी सरकार १०० दिन के भीतर काले धन की वापिसी के वादे से पीछे हट गयी| मोदी सरकार ने जिस स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम के गठन का दावा किया, उसकी सच्चाई दिल्ली में सबको पता थी और लोग उच्चतम न्यायलय के निर्देशों से भली भांति परिचित थे| भले ही सरकार काला धन न ला पाती, मगर यह झूठा दावा उसकी विश्वसनीयता पर प्रश्न बन गया|

भाजपा नेतृत्व ने इसी समय दिल्ली प्रदेश सरकार की तुलना नगर निगम से कर दी| दिल्ली राज्य में कई नगर निगम मौजूद होने के कारण यह तुलना मतदाता को गले नहीं उतरी और इसे अपमान की तरह लिया गया| इस तुलना ने यह अंदेशा भी जगा दिया कि दिल्ली को मोदी सरकार के रहते पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं मिलने वाला| यह बात खुद दिल्ली भाजपा में डर पैदा कर गई|

इसके बाद दिल्ली में भाजपा मोदी के अलावा कोई नेता नहीं दे पाई| एक दिन अचानक उसे बाहर से मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार लेकर आना पड़ा| इसने प्रदेश भाजपा की नेतृत्व क्षमता पर प्रश्न लगा दिए|

उधर केजरीवाल कछुआ चाल से दिल्ली के गली कूचों में आगे बढ़ रहा था, मोदी सरकार अपने भाषण में व्यस्त थी| भारत और दिल्ली के जो बजट केन्द्रीय वित्तमंत्री ने भारतीय संसद में रखे उनका भले ही अंतरिम बजट कहकर भाजपा ने प्रचार किया हो, मगर यह मोदी सरकार के उस चमत्कारिक व्यक्तित्व के विपरीत था जिसका दावा लोकसभा चुनाव में किया गया था|

मोदी सरकार का अगला कदम एक बार फिर गलत पड़ा, दिल्ली की आधी से अधिक आबादी उन गांवों के उन परिवारों से आती है जिनमें महात्मागाँधी राष्ट्रिय ग्रामीण रोजगार योजना में काम मिल रहा था| उस योजना का रुकना, दिल्ली में हाड़ मांस लगा कर काम कर रहे लोगों पर बोझ बढ़ा गया| हालत यह थी कि मोदी सरकार अपने पहले ६ महीनों की एक मात्र सफलता जन – धन को चर्चा में नहीं ला पाई| इसका कारण शायद यह था कि इस योजना में सरकार को जनता का धन प्राप्त हुआ था और अभी तक सरकार ने कोई भी सब्सिडी इन खातों में जमा नहीं कराई थी|

उधर खाने पीने की चीजों के दाम कम नहीं हुए. मगर मोदी सरकार मौसमी सब्जियों के दाम बता बता कर महंगाई कम होने का दावा कर रही थी| लोग उसे अनदेखा नहीं कर रहे थे, बारीकी से परख रहे थे| जब शाहजी सस्ते पेट्रोल और डीजल का रायता फैला रहे थे, जनता अन्तराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की गिरती कीमत पर आह भर रही थी| सबके सामने हर रोज पेट्रोल पर कगाये जा रहे टैक्स मुँह चिड़ा रहे थे|

रेडियो पर मन की बात, स्वागत योग्य बात थी मगर इसने कम से कम मोदी जी की छवि “अपने मुँह मियां मिट्ठू” की बना दी| भले ही मोदी जी गाँव में जनता से सीधे जुड़े हों, मगर मन से नहीं जुड़ पाए| उनकी छवि काम कम, बातें ज्यादा की बन रही थी| रेडियो, टीवी और अखबार में हो रहा व्यापक कवरेज

अनजाने में ही उन्हें “बनता हुआ तानाशाह” बना रहा था|

अभी दुनियां में कहीं भी गुजरात के दंगे भुलाये नहीं गए उधर दिल्ली के दंगे, टूटते लुटते चर्च ख़बरों में आ रहे थे| उधर केन्द्रीय गृह मंत्रालय के आधीन रहने वाली पुलिस ने दावा कर दिया कि सन २०१४ में दिल्ली में सैकड़ों मंदिर भी लुटे या जलाये गए| यह सरकार द्वारा अपनी असफलता का लज्जास्पद ऐलान था| लोग अब यह नहीं पूछ रहे थे कि लुटे या जलाये गए मंदिर कौन कौन से थे? लोग इन मंदिरों के खजानों ने गड़बड़ी की आशंका जता रहे थे|

प्रधानमंत्री ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में सार्क देशों के नेताओं को बुला कर शानदार विदेश नीति का जो प्रस्तुतीकरण किया, उस पर प्रश्न तब उठे जब वो अपनी दूसरी नेपाल यात्रा में नेपाल को हिन्दू राष्ट्र बनाने की सलाह दे आये| यह भारत में उनके कान खड़ा कर देने वाली बात थी| जब तक लोग इस बात पर कुछ शोर मचाते, अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा की भारत यात्रा की घोषणा हो गई| सब कुछ शानदार चल रहा था कि प्रधानमंत्री जी १० लाख का नामपट्टी सूट पहन कर अपनी सादगी का मजाक उड़ा बैठे| साथ ही दिल्ली का मूड देखकर ओबामा ने भारत में साम्प्रदायिक स्तिथि पर टिपण्णी कर डाली| यह न सिर्फ देश के अंदरूनी मामलों में अमरीकी हस्तक्षेप है, बल्कि देश की विदेश नीति की असफलता भी है| मजे की बात यह रही कि सरकार ने ओबामा को रवाना करते ही विदेश सचिव सुजाता सिंह को सिर्फ इसलिए त्यागपत्र देने के लिए विवश कर दिया था| सरकार उन्हें जिन गलत सलाहों को देने का आरोप लगा रही थी, वह सही हफ्ते भर में ही सही साबित हो चुकी थी|

सरकारी अधिकारियों की बर्खास्तिगी मोदी सरकार का शगल बन चुका है| देश के सबसे बड़े रक्षा अनुसन्धान संस्थान के प्रमुख को अज्ञात कारणों से बर्खास्त कर दिया गया| अग्निमैन नाम से विख्यात अविनाश चंदर देश के सबसे बड़े रक्षा वैद्यानिक है और पूर्व राष्ट्रपति कलाम की पंक्ति से माने जाते है| कई बार कहा जाता रहा है कि अमरीका को भारत के अग्नि कार्यक्रम से हमेशा दिक्कत रही है| अभी इन दोनों बर्खास्तगी का मामला ठंडा भी नहीं हुआ था कि चुनाव के ठीक पहले गृहसचिव भी त्यागपत्र दे गए| इन सभी त्यागपत्रों के पीछे मामला जो भी रहा हो, मगर सरकार कठघरे में थी|

मोदी सरकार ने चुनावों से ठीक पहले दिल्ली में अनियमित बस्तियों के नियमितीकरण की घोषणा कर दी| मगर किसी भी प्रकार का क़ानून नहीं बनाया गया| न ही किसी प्रकार की प्रक्रिया का पालन किया गया| दिल्ली भर में हुई चुनावी रैलियों में भाजपाई किसी भी प्रकार की कानूनी प्रक्रिया की आवश्यकता से ही इंकार करते नजर आये| उधर सुरक्षा एजेंसीज की आपत्ति के बाद भी दिल्ली के सारे फुटपाथ केसरिया और हरे रंग में रंग दिए गए|

भाजपा दिल्ली में केजरीवाल के अपमान और उसकी खांसी के मजाक में लगी रह गयी और केजरीवाल जीत गया| जब भाजपा के लोग आप पर शराब बांटने का आरोप लगा रहे थे उनके एक उम्मीदवार चुनाव के पहले वाली रात शराब बांटते पकड़े गए

केजरीवाल के ४९ दिनों के काम के आगे मोदी सरकार के २४९ दिन के भाषण काम नहीं आये|

दिल्ली अभियान

दिल्ली में चुनाव आ गए है| हाल में ही चुनाव आयोग ने दिन दिनांक मुहूर्त घोषित कर दिए|

और उसके तुरंत पहले, मफलर में गला लपेट कर खों खों करते केजरीवाल को हराने के लिए लोकतंत्र के चक्रवर्ती चमत्कार मोदी रामलीला मैदान में अभिनन्दन रैली कर चुके हैं| अब दिल्ली के झींगुर पहलवान को हराने के लिए बड़ोदा बनारस के गामा पहलवान को उतरना पड़े तो जनता में सन्देश तो साफ़ साफ़ चला ही जाता है|

भाजपा को दिल्ली में मुख्यमंत्री उम्मीदवार का नाम बताने के लिए भी इतनी मेहनत करनी पड़ रही है कि राहुल गाँधी भी हँस हँस के लोटपोट हो चुके होंगे| यह वही भाजपा है जहाँ नेता और दावेदार लाइन लगा कर शाहजी के दरवाजे खड़े हैं| मगर दिल्ली, दिल्ली है| लगता है देश की राजधानी नई दिल्ली की सत्ता संभालना आसान है अर्ध – राज्य दिल्ली को जीतना मुश्किल| यह वही दिल्ली है जहाँ देश के प्रधानमंत्री को रोज झाड़ू लगनी पड़ रही हैं| लोदी गार्डन से रोज साफ सुथरा कूड़ा मँगाया जाता है, भाई सफाई करना कोई सरल काम नहीं है|

अब देश के सबसे बड़े संघठन शास्त्री और देश की सबसे बड़ी पार्टी को अपने लिए मुख्यमंत्री पद प्रत्याशी के संभावित प्रत्याशी आयातित करने पड़ रहे हैं| शाजिया इल्मी और किरण बेदी, जिनका एक समय भाजपा और और बाद में आपस में ३६ का आंकड़ा रहा, भाजपा में ससम्मान विराजमान हैं| किरण बेदी भाजपा के लिए महारथी साबित होतीं हैं या चुनावों के बाद… बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले… गातीं है यह तो १० फरवरी को ही पता चलेगा| मगर इतना तो सामने है ही की भाजपा को दिल्ली में पुराने भाजपाइयों पर भरोसा नहीं है|

आज जब सोशल मीडिया के पुराने रिकॉर्ड सबके सामने उपलब्ध हैं, पुराने भाजपाइयों और नए भाजपाइयों के पुराने गीत अब चुनावों में खुलकर बजेंगे|

अब देखना यह है कि सफाई अभियान की झाड़ू चलती है या चुनाव चिन्ह की|

दिल्ली दंगल

साहेबान… मेहरबान… कदरदान…..
अब दिल्ली गाँव के झींगुर पहलवान के मुकाबले आ रहे हैं…….
बरोदा और बनारस के मशहूर गामा पहलवान…..
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और इसके साथ दिल्ली के चुनावी दंगल २०१५ का आगाज होता हैं….

आम अति उत्साह आदमी पार्टी

सफलता उत्साह दिलाती है और अति उत्साह आपकी अच्छी भली योजना को सफलता से कई योजन दूर भेज देता है|

आम आदमी पार्टी की दिल्ली विजय ऐसी ही थी कि लगा दिल्ली अब दूर नहीं| अचानक जोश खरोश में चर्चा हुई, अब देश की हर सीट पर लड़ाई लड़ी जायेगी| न संगठन, न कार्यकर्ता, न धन, न धान्य; सभी जोश से लड़ने चल पड़े|

उस समय देश भर में लोकसभा सदस्यता प्रत्याशी के फॉर्म इस तरह भरे गए जैसे आईआईटी या आईएएस के फॉर्म भरे जाते हैं| संसद सदस्य बने या न बनें, तीसरे स्थान पर रहने का पक्का ही था| मगर एक पार्टी के सबसे ज्यादा जमानत जब्त करने का रिकॉर्ड बना लिया गया|

कारण क्या रहे होंगे?

परन्तु मेरे मन में कई प्रश्न उठ रहे हैं|

१.       क्या पार्टी देश में हर जगह मौजूद थी? क्या भ्रष्ट्राचार जो आज मध्यवर्गीय मुद्दा है, क्या वो राष्ट्रव्यापी मुद्दा भी है? देश में आज भी मानसिकता है जिसमें आज भी सामंतवाद का उपनिवेश है, जहाँ सत्ता को चढ़ावा चढ़ाना धर्म है|

२.       क्या पार्टी ने दिल्ली में यह नहीं सुना कि राज्य में केजरीवाल और देश में मोदी? कारण सीधा था केजरीवाल को जनता कुछ दिन प्रशिक्षु रखना चाहती थी|

३.       क्या पार्टी कुछ महत्वपूर्ण चुनिन्दा सीटों पर चुनाव नहीं लड़ सकती थी? शायद धन और संसाधन को पचास सीटों पर केन्द्रित किया जा सकता था| उस स्तिथि में पार्टी संसद में महत्वपूर्ण स्वर बन सकती थी और शायद तीसरा सबसे बड़ा दल बन सकती थी|

४.       क्या आगे की रणनीति को ध्यान में रख कर मनीष सिसोदिया या किसी अन्य को मुख्यमंत्री नहीं बनाया जा सकता था? क्या पार्टी में एक व्यक्ति एक पद का सिद्धांत नहीं होना चाहिए?

५.       क्यों पार्टी बार बार जनता के पास जाने की बात करती है और भाजपा या कांग्रेस कार्यकर्ताओं से सलाह वोट लेती हैं? क्या पार्टी के पास जो विचारशील, विवेकशील, प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं हैं, उनकी सुनवाई या मत प्रक्रिया नहीं होनी चाहिए?

६.       क्या दिल्ली पुलिस के मामले में धरना देने के समय पार्टी यह नहीं कह रही थी कि देश के हर मुद्दे पर हमारे मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री धरना देंगे और वही भ्रष्ट बाबु राज करेंगे जिनसे हम लड़ रहे हैं?

७.       दिल्ली में हम अगर तीन दिन विधानसभा में बैठे रहते और सदन को दस दिन बिठा कर रखते तो जनता खुद देखती कि दोषी कौन हैं? सरकार बनाते समय पार्टी दस दिन जनता से पूछती रही, त्यागपत्र देते समय जनता कहाँ गयी, कार्यकर्ता कहाँ गए? दिल्ली को और दिल्ली में पार्टी कार्यकर्ताओं को क्यों नेतृत्व विहीन छोड़ दिया गया?

८.       क्या सोनी सूरी, मेधा पाटकर, और अन्य महत्वपूर्ण सामाजिक सेनानियों को चुनावों में हरवा कर पार्टी ने उनके दीर्घकालिक संघर्ष कमजोर नहीं कर दिए?

९.       आज अगर दिल्ली विधानसभा भंग होती है तो चुनाव शायद जल्दी होंगे? क्या पार्टी हर घर में जाकर हर हफ्ते बता सकती है कि उसने कब क्या क्यों कैसे किया? पार्टी के पास एक एक बात के जबाब में सोशल मीडिया पर, कार्यकर्ताओं के मोबाइल पर और मोबाइल मैसेजिंग सर्विसेस पर इन सब बातों के जबाब हैं?

आज आम आदमी पार्टी को आवश्यकता है कि उन मतदाताओं को चिन्हित करे जिन्होंने उसे दिल्ली विधान सभा या संसदीय चुनावों में मत दिया है| सभी मतदाताओं के प्रश्नों के उत्तर दिए जाने चाहिए| एक साथ, विधानसभा क्षेत्र और दिल्ली राज्य के बारे में बात होनी चाहिए| बात होनी चाहिए वर्तमान संसद सदस्यों पर पार्टी के नियंत्रण और उनके अपने क्षेत्रीय और राष्ट्रीय कार्यक्रमों की| बात होनी चाहिए, उन सभी महत्वपूर्ण प्रत्याशियों की जिनका चुनाव में खड़ा होना, अपने आप में एक कार्यक्रम था, एक मुद्दे की बात थी, एक सिंद्धांत की उपस्तिथि थी|