पुराने घर


घर का दरवाज़ा बमुश्किल बीस साल का ही हुआ था| घर की उम्र से कम उम्र थी उसकी| उस दरवाजे के चेहरे पर भी बुढ़ापा उतना ही तारी था, जितना उस घर की दीवारों पर| अपनों का मूँह मोड़ लेना दिल तोड़ देने के लिए काफी होता है| घर से रिश्ता इतना ही बाकि था कि साल छः महीने में हाल चाल ले लिया जाए| वक्त का कमी का बहाना कभी पुराना नहीं होता| कभी कभी ये घर भी हँसता होगा, ठलुओं को फुर्सत कहाँ?

लगता था, घर का दरवाज़ा खोलते ही सीलन की बू आती है| याद है, बूढ़ी नानी के पुरानी रजाई से आने वाली गुनगुनाहट भरी सीलन से घर महकता था| दोनों गंध में फर्क कुछ न था, फर्क कहीं और रहा होगा| घर के पुराने सामान ने मुस्कुरा कर देखा; अनदेखा कर दिया| अजनबियों के आने जाने से पुरानी तिपाही को क्या वास्ता| उसे भी अकेलेपन की आदत सी हो गई थी| कोई पुराना शिकवा रहा होगा, वर्ना कौन मूँह मोड़ता है?

घर के फ़र्श पर याद़ों जिनती धूल जमा हैं| यादों को सहेजना कितना मुश्किल होता है| हकीम कहता था, धूल झाडोगे तो भूल करोगे, खारिश होती है| खारिश की पुरानी बीमारी है| दमा बैठ जाता है, दिमाग़ भी| सहेज कर पाँव रखने से भी यादों की सतहों पर धूल मिटने के निशान छूट जाते हैं| मकड़ियों के पुराने जालों में कोई घर कब तक अपनी पुरानी यादें फांस कर रख सकता है| यादें तो रेशम की डोरी से भी नहीं बंधतीं, मकड़ी के पुराने जाले क्या करते?

सालों कहीं दूर से आने वाली आल्हा की आवाज अब नहीं आती, दूर पड़ोस में अश्लील फ़िल्मी गाने की धुन पर भजन बज रहा है| घर में पसरे पुराने सन्नाटे के बीच झींगुरों की आवाज़ मधुर मालूम होती है| राग झींगुर में ख़याल सुनते सुनते दीवारों के कान खुश और खुले रहे होंगे| कान के पास कुछेक मच्छर अपना जीवन संगीत सुनाते हैं| दीवार पर बैठी छोटी डायनासोर कार्टून फिल्म का अहसास कराती है| कोई फुसफुसाहट सुनता हूँ, दिल धड़कने लगता है| कौन है यहाँ स्यापा करने वाला?

शायद कोई पुराना भूत होगा| पड़ोसी अक्सर कहते हैं, उन्होंने भूत देखा है| भूतों के डर से पुराने बाशिंदे भी कतराते हैं| कोई पड़ोसी इधर नहीं देखता| चोरों को भी मालूम हैं, कौवों और कुत्तों की भी| यादों के भूत पुराने घर में रहते हैं| गाँजे चरस से परलोक का आनंद उठाते अवधूत और नशे में डूबे आवारा लोंडे घर के आगे बगिया में अड्डा जमाते हैं| पुराने घर सन्यास नहीं लेते हैं| किस का मोह बांधे उन्हें, किस मोह से मुक्ति पायें?

दरों दीवारों से यादों की पपड़ियाँ उतर चलीं हैं| वक्त से पहले उमर उतर आई है और लौन बन कर झडती रहती है| ख्यालों में सीलन की सौंध बस गई हैं| आँगन की मिट्टी में सौंध नहीं आती| पुराने घर दिवाली नहीं मनाते| पुराने घर चूना सफेदी की मशहूरियां नहीं करते| पुराने घर ज़माने में नहीं जमते| कौन अपना वक़्त और कब तक बदले?

बूढ़े घर


बूढ़े घर चुपचाप खड़े रहते हैं, बूढ़े सन्यासी की तरह ध्यान मग्न| बूढ़े घर क्रोध नहीं करते| पुराने बरगद की तरह पनाह देते हैं किसी को भी| जिन घरों पर कभी जमींदार, साहबी और दौलत का नशा तारी था, आज अपनी झुकी और टूटी कमर पर हाथ रखे चुपचाप देखते रहते हैं, बूढ़ी दीवार के किनारे सहारा लेने वाले अजनबी को बच्चे की तरह| क्या पता इनमें से कोई अपना ही बच्चा हो, बुढ़ापे में ठीक से पहचान नहीं आता| बूढ़े घर को हर बच्चे से उम्मीद है, उसे अपने पराये का फ़र्क नहीं| जो आ जाये वह ही उसका अपना बशिंदा हैं| कौन गैर, कौन पराये, कौन अजनबी, और अनजान जब अपने ही छोड़ गए तो क्या कौन, क्या क्यों?

पुराने शहर के हरे भरे हाट बाजार के सहारे कोई भूलाबिसरा आज भी उन्हें याद करता है| सोचता है, उस बूढ़े हर के पुराने बाशिंदे आज कैसे होंगे? कोई नहीं सोचता वो पुराना घर आज कैसा होगा| होगा, होगा या नहीं होगा, किसे बूढ़े घरों की परवाह है|

पुराने घर दालान की दीवार पर लगी वो बंद पड़ी हुई पुरानी चाबी वाली घड़ी कोई चोर नहीं चुराता| कोई उसमें चाबी नहीं भरता| कोई उनके नीचे बैठ कर हुक्का नहीं गुड़गुड़ाता| मगर वो घड़ी आज भी चलती हैं, घड़ी दर घड़ी, पहर दर पहर| ये बूढ़ा घर आज भी उसमें अपना वक़्त देखा करता है|

वक़्त बूढ़े घर की छाती पर चुपचाप मूँग दलता है| वक़्त की चक्की में दो पाट नहीं होते, ये बूढ़ा घर निचला पाट है| बूढ़े घर की छाती से वक्त का चूना झड़ा करता है| यादों की सीलन पपड़ी छोड़ जाती हैं| पुरानी मुहब्बत लौन बनकर बुरकती रहती है|

बूढ़े घर बूढ़ी माँ की तरह होते हैं| कोई आये तो आँचल में पनाह देते हैं| कोई न आये तो दुआ देते हैं| बूढ़े घर के पुराने आँगन में आज भी गिलहरी दाना ढूढ़ती| तोते आज भी आकर कोई पुराना किस्सा सुनाते हैं| बिल्लियाँ अक्सर चहलकदमी करतीं हैं| छिपकलियाँ आज भी उन्हें मलेरिया और डेंगू के खतरनाक मच्छरों से महफ़ूज रखतीं हैं| बूढ़े घर के पुराने आंगन में पुराने जीने के सहारे आज भी रात में चोर उतरा करते हैं| ये चोर चुपचाप आज भी कोई पुरानी याद ढूँढते हैं, शायद मिल जाए छोटी चाची के नाक की वो पुरानी नथ को चाचा की हाथापाई में आँगन में ही कहीं गुम हो गई थी| शायद मिल जाए कोई पुराना खजाना को बाबा ने दीवार में चिनाई करा कर छिपा दिया था| पुराने घर के सहारे कभी कभी नए पियक्कड़ उतर आते हैं पीते हैं देशी ठर्रा| जिस घर में ठंडाई की बहार थी, कांजी की मौजें थीं, जहाँ घड़ों में शर्बत घुला करते थे, आज वहाँ बैठ आकर भडुए की महफ़िल में कडुआ पिया जाता है|

जिन लोगों की ये बूढ़ा घर विरासत में मिला था आज अपने सपनों के घर में सपने देखते हैं इस बूढ़े घर के| उन्हें अक्सर याद आता है इसके आँगन में लड़कियों का गुट्टे खेलना, लड़कों का छत पर पतंग उड़ाना, बूढों का बरामदे में बढ़िया गप्पा और लम्बी  डींग मारते हुए हुक्के गुड़गुड़ाना, दादियों का छत पर आचार के आम की फांकें सुखाना, चाचियों का आँगन में बैठकर दाल बीनना, माँ का रसोई में कचोड़ी बनाना| वातानुकूलित सपने आज भी याद करते हैं भरी सर्दियों में रजाई में बैठकर गरमागरम मूंगफलियाँ चबाना|

वक़्त अक्सर देखता है, नई पीढ़ी का जाते जाते एक पुराना घर छोड़ जाना| ये पुराने घर अक्सर मायूस मिलते हैं| ये अक्सर मायूस मिलते है, गिरा दिए जाने तक या फिर एक हेरिटेज हवेली बना दिए जाने तक|

मकान का घर होना


अभी पिछले दिनों ही मैंने “ज़मीन का मकान होना” लिखा था और उसकी इन पंक्तियों को काफी सरहा गया:

मकान कोई पत्थर नहीं होते, कविता होते है जो कहानी कहते हैं| हमारा और आपका मकान बनाया नहीं गया, मूर्ति की तरह गढ़ा गया है| भूमि पूजन से लेकर गृहप्रवेश तक मकान का बनना एक चुनौतीपूर्ण प्रक्रिया है|

प्यार और देखभाल से मकान कब घर बन जाता है आपको पता भी नहीं चलता| आप कब जमीं को मकान और मकान को घर कहना शुरू करते हैं, इसका कोई तरीका नहीं है|

मकान को घर दीवारें, छत, खिड़कियाँ और दरवाजें नहीं बनाते| और कई बार तो केवल हमारा मकान ही हमारा घर नहीं होता| वो गली कूचे भी घर लगते है जिनमें हमारा मकान होता है घर होता है| जो चीज हमारे मकान को घर बनाती है वो संग – सहारा है जो उस मकान में रहने वाले लोगों में आपस में और मकान में रहने वालों में उन दर – ओ – दीवार से होता है, उस मकान से होता है|

मकान का घर होना यही संग- संगत होती है, मकान का घर होना हमें पास लाते हुए हमें #together करता है, जोड़ता है|

जैसा कि मैंने अपनी पिछली पोस्ट में लिखा था, मकान बनने के बाद गृहप्रवेश की एक प्रक्रिया है जो हर कोई परिवार अपने मन, रीति – रिवाज और चलन के हिसाब से पूरी करता है| यह भारतियों के लिए यह भी एक समारोह है, जिसमें परिवार के साथ समाज को भी यथा संभव शामिल किया जाता है| लेकिन सबसे बड़ी भारतीय बात जो किसी भी पारवारिक समारोह या कहिये खानदानी जश्न में है, वो है पूरे घर – परिवार को बुलाया जाना| घर – परिवार यानि खानदान, और भारतीय खानदान आपके पितामह के सभी बच्चों के परिवार से लेकर आपके प्रप्रप्रपितामह के सभी बच्चों के परिवार तक हो सकता है|

वही गृहप्रवेश का दिन था| सभी लोग थे, सारे चचेरे–तयेरे-ममेरे-फुफेरे-मौसेरे भाई–बहन| पूजा-पाठ नाश्ता-दावत मस्तियाँ हँसी-मजाक का दौर था| मकान जो अब घर बन रहा था; अगर धूप, इत्र – परफ्यूम, रूम – फ्रेशनर, और इन सबके साथ खुशियों से महक रहा था| बंगलौर से बोस्टन, ज़मीन से आसमान, दर से दीवार, खिडकियों से दरवाजे, कुत्तों से बिल्लियों, स्कूल से यूनिवर्सिटी, ठोकरी से नौकरी, दुनियां जहाँ की सारी बातें थी, और सारी ही बातें थीं, बातें ही बातें थी| सबसे छोटा अभी ढूध पिता बच्चा था और सबसे बड़ी एक दूध पीते बच्चे की दादी थी| सबसे मजेदार बात थी जब सबसे ‘बड़की’ बाकी सब गोलू मोलू छोटू मोंटू पिंटू बबली छुटकी, डोली, जोली और न जाने किस किसके दूध पीते दिनों की अपनी बातें सुना रहीं थी, तो बाकी सब तो अपने अनुभव चीख चीख कर सुना रहे थे| मगर सबसे ज्यादा तो वो छुटकू था जिसके उस दिन उतने ही नाम थे, जितने घर ले लोग थे| उसका असली नाम किसी को याद नहीं था और बाद तक चलने वाला पुकारू नाम उस दिन दिए गए बहुत से नामों में गुम था| उस दिन घर के हर कौने और कौने कौने से उछलते कूदते परिचय हो गया| इस खिड़की से उस खिड़की तक और इस दरवाजे से उस दरवाजे तक कुछ किस्से कहानियां जुड़ गए|

यह अलग बात है की हम उस दिन और समारोह को गृहप्रवेश कहते जरूर है, मगर गृहप्रवेश के लिए कम मगर उन मस्तियों के लिए याद करते है जो शादी- ब्याह के लम्बे चौड़े रीति – रिवाजों में कम ही हो पातीं है|

उस दिन सुबह हम जिसे अपना नया मकान बोल रहे थे, वही इसी सब पूजा-पाठ नाश्ता-दावत मस्तियाँ हँसी-मजाक के बीच शाम तक एक तरोताजा ख़ूबसूरत अपना सा अपना घर हो गया| मकान से रिश्ता बनना मकान का घर होना है|