कोविड की अफ़वाह


दिन प्रतिदिन मुझे इस बात का विश्वास होता जा रहा है कि कोविड की बीमारी एक अफवाह से अधिक कुछ नहीं| हमारे थाली थाली ढोल नगाड़ों के चलते यह बहरा होकर बहुत पहले ही पाताललोक जाकर छिप गया है अथवा जनता कर्फ्यू के समय ही यह बेमौत मारा जा चुका है|

हम अर्थ-व्यवस्था के नाम पर सड़कों पर दौड़ रहे हैं| निजी और सरकारी कार्यालय से लेकर दुकान मकान तक सब अपने अपने कर्मचारियों को काम पर आने के लिए विवश कर रहे हैं| इन में से मैं भी एक हूँ| आखिर आप अर्थतंत्र में सबसे नीचे पायदान पर मौजूद घरेलू नौकरानी को तो बिना काम के लम्बे समय तक पैसा नहीं दे सकते| खासकर अगर आप घर से काम करते हैं, उसका होना जरूरी है| आप कारखाने दुकान मकान भी बंद नहीं कर सकते| परन्तु लिपिक को कार्यालय बुलाने की जरूरत नहीं है|

मैं तालाबंदी का कोई प्रसंशक नहीं रहा, परन्तु उसका सीमित समर्थन किया था| मुझे लगता था कि हमारी केंद्र और राज्य सरकारें बेहतर योजना बनाने के लिए समय लेना चाहती हैं| छः महीने के बाद आजतक हमारे पास न चिकित्सालय का तंत्र बना, न कोई दवा है, न कोई वैकल्पिक अर्थतंत्र| परन्तु सरकार के साथ साथ मुझे पढ़े लिखे तबके ने भी मुझे बहुत निराश किया है| हम अपनी जड़े काटने वाले समाज के रूप में सदा ही जाने जाते रहे हैं| 

हम कार्यालयों में अवांछनीय उपस्तिथि को कम करने के स्थान पर सभी को कार्यालय आने ले किये विवश कर रहे हैं| बहुत से लोग जो घर से काम करने की स्थिति में हैं, उन्हें भी कार्यालय आने को कहा जा रहा है| कार्यालयों में लिपिकों और बहुत से अधिकारीयों को उपस्तिथि आवश्यक नहीं होती – वो अपनी जरूरी कागजात घर ले जाकर काम कर सकते हैं| गैर जरूरी व्यवसायों को खोला गया है जबकि इनमें से बहुतों को खोलने का खर्च आय से बहुत कम हैं| बड़े भोजनालय, केशसज्जा केंद्र, आदि कई धंधे अभी तक लाभ-बिंदु तक नहीं पहुँच पाए परन्तु सामूहिक घाटे के साथ काम करने के लिए विवश है|

दुःख है कि शपथ जैसे नाटकों को हम पूरी निष्ठा से निभा रहे हैं, परन्तु अपने सुरक्षापर्दे (मास्क) को अपनी नाक पर नहीं बिठा पा रहे| सामाजिक या व्यक्तिगत दूरी को तो मैं दिल्ली में अवांछनीय मानता हूँ – बड़े शहरों का जनसँख्या घनत्व इस प्रकार की दूरी को अव्यवहारिक बनाता है| राजधानी दिल्ली तक में बैंको, डाकघरों से लेकर हाट बाजारों तक लोग अपने सुरक्षा परदे का प्रयोग ठीक से नहीं कर पा रहे|

मैं कई बार सोचता हूँ यदि प्रधानमंत्री जी ताली बजाने, दिए जलाने और फूल बरसाने जैसे प्रतीकों से आगे बढ़ पाते तो आज उनकी बात मानकर हर नाक पर सुरक्षापर्दा होता| पर भारत का मध्यवर्ग शायद ऐसा न होने देता – उसे तो भक्ति आती हैं, समझ नहीं|

ऐश्वर्य मोहन गहराना

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विश्व-बंदी ३१ मार्च


उपशीर्षक – वित्तवर्ष का अंत 

कुछ घंटों में यह वित्त वर्ष बुरी यादों के साथ समाप्त होने जा रहा है| मैं आशान्वित हूँ कि नया वर्ष फिर से बहारें लाएगा| इस साल पहले दस महीने शानदार बीते| बहुत कुछ नया सीखा, किया और कमाया| मगर बही खाते कर चटख लाल रंग उड़ा उड़ा उदास सा हो गया है|

लेनदारियां बहुत बढ़ चुकी हैं और इस माहौल में उनकी वसूली सरल तो नहीं दिखती| पिछले एक महीने से कोई खास बिल नहीं कटे| अप्रैल से जून से वैसे भी थोड़ा तंग रहता है| इस बार हालत शायद और तंग रहेंगे| उधर, मुवक्किल पैसा समय पर नहीं देते मगर सरकार को अपना वस्तु-सेवाकर तुरंत चाहिए होता है| सरकारी कर गांठ से देना बहुत भारी पड़ता है| जब सरकार खुद आपकी मुवक्किल हो तो स्तिथि नाजुक ही रहती है| केवल रकम वसूल हो जाने रेशमी भरोसा रहता है| हम सेवा प्रदाता तो सिर्फ कागज पर ही सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम हैं| जमीनी लाभ शायद कुछ नहीं|

इस समय बचत से लिए गए निवेश के हालात भी अच्छे नहीं| यह साँप छछुंदर की स्तिथि है| निवेश करें तो जवानी ख़राब, न करें तो बुढ़ापा| उसपर यह मंदी का समय किसी कंगाली से कम नहीं पड़ता| शेयर बाजार में मंदी के चलते निवेश बकत कुछ नहीं तो आज सरकार ने बचत वगैरा पर ब्याज घटा दी| कंगाली में आटा गीला हो चुका है| आटे से याद आया – पिछला गल्ला भी ख़त्म हो रहा हैं और इस महीने का गल्ला भरने के लिए आधे देश के पास पैसे नहीं बाकि बचे लोग के पास दूकान जाने की समस्या|

जिन लोगों के पास नौकरियां हैं उनकी भी समस्या है| लगभग सबको साल के आखिर और कार्यालय के बंद होने के कारण औना – पौना वेतन मिला है| मुनीम भी घर पर और याददाश्त से कितना हिसाब किताब लगायें|

ब्याज घटने से भविष्य निधि पर ७.१ फ़ीसदी, बचत पत्र पर ६.८ फ़ीसदी, किसान विकास पात्र पर ६.९ फ़ीसदी का ब्याज मिलेगा| बचत खाते पर सरकार ने ४ फीसदी पर ही ब्याज रखा हुआ है| इस सब से बुढ़ापे का गणित बिगड़ जाता है| मगर कुल मिलकर ब्याज की दर जीवनयापन की महंगाई की दर से कम होने का अंदेशा हो सकता है| यह बाद अलग है कि बाजार खुद मंदा हो रहे|

सरकार ने दिवालिया कानून को थोड़ा कमजोर थोड़ा सुस्त बनाया है तो काम धंधे में कमी रहेगी| इधर कुछ नया जानने सीखने की जरूरत रहेगी कि कुछ नया काम धंधा मिलता रहे|

प्रार्थना रहेगी बाज़ार में मंदी और देश में अकाल के हालात न बनें| यह नामुराद बीमारी और दुर्भिक्ष जल्दी दूर हो|

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