गदर्भ न्याय


भारतीय पुलिस को के बार आतंकवाद के आरोपी गीदड़  पकड़ने के आदेश मिले| पुलिस वाले बस इतना ही जानती थी कि गीदड़  कोई जानवर होता है| साल भर कुर्सी तोड़ने के बाद भी उन्हें गीदड़  नहीं मिला| एक दिन थाने के सामने घास चरता हुआ गधा मिल गया| तो उसे गीदड़  बना कर पकड़ लिया|

लात घूसे और लाठियां खाते खाते गधे को पता चला कि इन पुलिसियों को गीदड़  चाहिए| तो मार से बचने के लिए उसने खुद का गीदड़  होना कबूल कर लिया| अपराध में अपने शामिल होने के बारे में एक कहानी सुना दी|

सरकारी वकील ने अदालत को बताया हुजूर जानवरों के बारे में लिखी सबसे बड़ी किताब में लिखा है गीदड़  के सींग नहीं होते और पूँछ होती है| जो कि आरोपी के है| तो अदालत ने गधे को गीदड़  करार दे दिया|

इस बीच मंत्रीजी ने लालदीवार से गीदड़  पकड़ने वाले पुलिसियों को पुरुस्कार घोषित कर दिया| उधर अगले दिन वकील सफाई ने दलील दी कि आरोपी के खुर है, जो गीदड़  के नहीं होते| तो मंत्रीसेवकों ने उनको देशद्रोहियों का साथी बताना शुरू कर दिया| देश भर में अपराध पीड़ितों के लिए न्याय की मांग जोर पकड़ गई|

अदालत ने देश की भावना का सम्मान किया और गधे को गधा मानते हुए खुर न होने  की असमानता परन्तु अन्य समानता के आधार पर गीदड़  का भाई और उस के अपराध स्वीकार करने के आधार पर उसको अपराधी घोषित कर दिया|

मोमबत्तीवालों ने बड़ेदरवाजे जाकर मोमबत्ती जलाईं| मंत्रीजी ने पुलिसियों का मोरल डाउन करने के आरोप में मोमबत्ती वालो ने पीछे कुत्ते छोड़ दिए| और पटाखे वालों ने पटाखे फोड़े|

कहानी चलती रही| कहानी चलती रही| कहानी चलती रही| … कहानी यूँ ही चलती रही|

मंत्री जी की कुर्सी सालों साल बैठे रहने से चरमराने लगी| बढई ने बताया कुर्सी ठीक करने के लिए गीदड़  का खून लगेगा| पुलिस ने बताया, हमारे कब्जे में तो गीदड़  का भाई गधा है|

आनन फानन में मंत्री जी, अदालत, पुलिस, मोमबत्ती और पटाखे हरकत में आये|

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अख़बार ने लिखा “नरक में जा गधे|” गीदड़  ख़ुश हुआ| मोमबत्ती और पटाखे बिके| मंत्री जी ने बिरयानी खाई| पुलिस का मोरल आसमां से चिपक गया| कुछ गधों को कुछ यकीन आया|

बाद में एक किताब आई….

क़ानून पर आम भारतीय नजरिया


क़ानून के हाथ लम्बे होते हों या न हों उसका डंडा बहुत लम्बा, मजबूत, कंटीला और कठोर होना चाहिए, जिस से कि पडौसी का सिर एक बार में फूट जाये| आज डंडे का जमाना नहीं है तो आप रिवाल्वर या रायफल कर लीजिये| मगर यह एक आम भारतीय नजरिया है|

दूसरा फ़लसफा खास भारतीय यह है कि क़ानून एक भैंस है जिसे कोई भी अपनी लाठी से हांक सकता है बशर्ते उसकी लाठी उस चौकी, थाने, जिले या सूबे में सब पर भारी होनी चाहिए| इस फ़लसफ़े का दूसरा तर्जुमा है, क़ानून एक ऐसी रांड है जिसे कोई भी अपनी रखैल बना कर उसका मजा मार सकता है|[i]

तीसरा और सबसे खास भारतीय क़ानूनी फ़लसफा ये है कि अगर क़ानून की बात हो तो उसमें अपना सिर नहीं अड़ाना चाहिए| इसलिए हम भारतीय ऊपर लिखे सभी फ़लसफ़ों को दिल से लगाकर रखते है और तब तक ज़ुबान पर नहीं लाते| इसीलिए भारतीय पडौसी का सिर और अपना पिछवाड़ा फूटने तक चुप रहते है और हाकिमों के तलवों ने सिर छिपाए रखते हैं|

अब साहब अगर इन सादा सरल फ़लसफ़ों को समझने में कोई दिक्क़त तो तो कुछ वाकये सुनते हैं, जो कुछ दूर पास का ताल्लुक इन फ़लसफ़ों से रखते हैं| क़ानूनन आपको को बता दे कि सभी वाकयात एकदम बेहूदा और वाहियात हैं और उनका किसी सच से कोई ताल्लुक नहीं है| अगर आपको सच लगें तो ऊपर लिखा तीसरा फ़लसफ़ा दोबारा पढ़ें|

जब क़ानून किसी किसी कुर्ता- पायजामा को जूते पहना रहा हो या कुर्ता – पायजामा क़ानून के जूते बजा रहा हो तो आपके पास दूसरा फ़लसफ़ा पढने का वक़्त नहीं है| आप अगर शरीफ़ हैं तो चुपचाप घर जाकर बच्चों को कबीरदास का “सांच बराबर तप नहीं” वाला दोहा सुनाएँ| अगर आप झाड़ पौंछ शरीफ़ हैं तो कुर्ता – पायजामे का रंग देखें| अगर आपका और उसका रंग एक है तो भारत माता की जय बोलें और अगर रंग अलग है तो उसका फ़ोटो और फोटोशॉप सामाजिक क्रांति के लिए प्रयोग कर दें|

अगर क़ानून किसी अदालत में गोल गोल घूम रहा है तो दूसरा फ़लसफ़ा जेहन में आता है| अदालतें लाठी वालों का पिकनिक स्पॉट हैं जहाँ क़ानून की भैंस हर कोई दुहता है|

सूट बूट हिंदुस्तान में सबसे ताकतवर होता है| सूट बूट का दिमाग उतना ही वातानुकूलित रहता है जितना उसके फार्महाउस का अय्याशखाना| यह हमेशा तफ़रीह के सीरियस मूड में रहता है और क़ानून खुद-ब-खुद इसकी बाँहों में| क़ानून इसके भाव – भंगिमा को खूब पहचानता हैं और हमेशा एक खास तरह में मूड में रहता है| अब, दूसरा फ़लसफ़ा का दोबारा न पढ़े|

अब बात आती है इस पूरी बकवास से मतलब क्या निकल रहा है| हमारे मुल्क में जो बात सबको पता हो, उसे बताना बकवास ही तो है| रे भाई, बताया था न, अगर क़ानून की बात हो तो उसमें अपना सिर नहीं अड़ाना चाहिए|

बाकि जो मतलब जो बकबास है वो अगली बार बताई जाएगी| तब तक क़ानून से बचकर रहें| सलामत रहें और हमेशा की तरह ऑफिस में सूट – बूट और सोशल मीडिया पर कुर्ता – पायजामा के सामने नतमस्तक रहे| अपने ईश्वर और ईमान को औक़ात में बनाये रखें|

[i] सुसंस्कृत अनुवाद:- “भारत की सर्वमान्य नगरवधु विधि, समस्त योग्यजन के लिए प्रसन्नताकारक होती है|”

तिरंगा, पतंगे, और आजादी का जिन्न|


 

इस समय जब मैं यह आलेख लिख रहा हूँ, हम सभी स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं|

कल शाम नई दिल्ली के खन्ना मार्किट में टहलते हुए और उसके बाद मुझे कई बार सोचना पड़ा कि हम अपना स्वतंत्रता दिवस किस तरह से मानते हैं?

पहले थोडा परिचय दे दिया जाये| ७० – ८० दुकानों वाले खन्ना मार्किट; लोदी कॉलोनी, जोरबाग और बटुकेश्वर दत्त कॉलोनी का मोहल्ला बाजार ही है| यहाँ पर किसी भी समय आपको चार पांच सौ से अधिक लोग कभी नहीं दिखाई देते हैं| शाम होने से पहले घर गृहस्थी का सामान अधिक बिकता है और शाम होने के बाद अधिकतर भीड़, खाने पीने के लिए ही होती है| मेरे विचार से दसेक तो रेस्तरां और हलवाई ही होंगे और ठेले तो सभी खाने पीने के है ही| अधिकतर रिवाज फोन पर आर्डर लिखवा कर घर पर ही खाना मंगवाने का है|

कल नजारा अलग ही था| जब भी हम कोई त्यौहार मानते है, बाजार में वो हमेशा ही एक दिन पहले हंसी ख़ुशी और पसीने के साथ मनाया जाता है| कल दोपहर से ही स्वतंत्रता दिवस शुरू हो गया| तिरंगे, पतंगों और खाने पीने की धूम थी| छोटे बच्चे तिरंगे के हर रूप पर फ़िदा थे.. झंडे, पर्चे, कागज, विज्ञापन, केक, फीते, कुछ भी| शायद कल उन्हें देश के अलावा कुछ नहीं सूझ रहा था| तिरंगी पतंगे तो गजब ढाती हैं, हमेशा| हर रंग रूप की पतंगें थी| पतंग की हर दुकान पर हर रंग की पतंगें और हर रंग – रंगत के लोग थे| पतंग खरीदते, मांझा खरीदते, चरखी सँभालते, कन्ने बांधते; सब तरह के लोग| पतंग न उड़ा पाने के कारण मुझे हमेशा शर्मिंदगी महसूस होती है| कल तो लगा कि शायद जो लोग पतंग नहीं उड़ा पाते होंगे उनके भारतीय होने पर प्रश्नचिन्ह लग जाता है| “वो काटा” तो हमारा राष्ट्रीय मूल मंत्र है| “वो काटा गाँधी को.. वो काटा नेहरू को..; है न मजेदार|

फिर खाने पीने की बारी आ गयी| ठेले पर चाट पकोड़ी जल्दी ख़त्म हो गयी| गोलगप्पे जरूर देर तक टिके, मगर उनकी आपूर्ति आसान थी और बार बार हो रही थी| मगर, असल जश्न तो दो खास दुकानों पर चल रहा था| केवल दो खास दुकानें.. दोनों पर पचास पचास लोग.. दो पुलिस बाइक.. चार पुलिस वाले..| थके मारे लोग, जश्न से खुश होते लोग, यार-बास लोग, मस्त लोग, मस्ती से पस्त लोग| विद्यार्थी भी है… और कब्र का इन्तजार करने वाले बुढ्ढे भी| न भीड़ ख़त्म होती है न जोश| एक जाता चार आते| चखना भी लेना था, और बर्फ के टुकड़े भी| कोई अनुशासन नहीं.. कोई धक्कम धक्का भी नहीं.. सब्र ऐसा जो शायद कभी रेलवे स्टेशन पर देखने को न मिले| पैसा बह रहा है, उड़ रहा है, कूद रहा है.. गरीबी की ऐसी तैसी..| क्या रखा है ३२ रुपल्ली की गरीबी में| बोतल और कैन.., यस, वी कैन…|

रात ढलते ढलते जब बाकि का सारा बाजार बंद होने लगा, मगर यहाँ तो जश्न की रात थी| लोग आजादी के नशे में चूर थे, उनकी हर बोतल में आजादी बंद थी, उनकी हर कैन में आजादी के बुलबुले उठ रहे थे|

मैं थक गया था; घर चला आया| घडी ने साढ़े दस बजा दिए थे|

सुबह आसमां में बादल थे, चीलें थी और हमारी रंग बिरंगी पतंगें थीं| सड़क पर तिरंगे लहराते बच्चे थे| जन सुविधाएँ के बोर्ड के ठीक नीचे, आजाद देश का आजाद सपूत नशे में चूर चित्त पड़ा था| एक साथी ने कहा, आज ड्राई-डे है न, कल डबल पीना पड़ा होगा न||

कामवाली बाई ने कहा, आज ड्राई डे है तो क्या कल फ्लड डे था न भैया|

तिरंगा, पतंगे, और बोतल से निकला आजादी का जिन्न| 

क्रिकेट: मनोरंजन में फिक्सिंग


 

 

इस देश में धर्म, भ्रष्टाचार और शराब की तरह ही लोंगो को क्रिकेट की लत हैं| बल्कि शायद क्रिकेट कहीं ज्यादा खतरनाक है| मुझे याद है कि बचपन में अगर कोई सहपाठी घर से पढाई पूरी करके नहीं जाता था और कहता था कि उसने कल फलां फलां क्रिकेट मैच की रिकॉर्डिंग देखी थी तो कई बार शिक्षक उस पर सख्ती नहीं दिखाते थे|

मैंने भी रेडिओ पर क्रिकेट कमेन्ट्री शायद अपने अक्षरज्ञान शुरू होने से पहले ही शुरू कर दी थी| जिस दिन क्रिकेट का मैच होता था तो मेरे पिता अपना ट्रांजिस्टर उस दिन अपने साथ चिपकाये रखते थे और वो उनके साथ कार्यालय भी जाता था| जब मैं थोडा बड़ा हुआ, तब मैंने मोहल्ले के लोगों से किस्से सुने कि किसी ज़माने में मोहल्ले का अकेला ट्रांजिस्टर मेरे पिता के पास ही था और बिजली गुल होने की दशा में हमारे घर में बैठक जमा करती थी| बाद में, जिन घरों में टीवी था वहां भी यही हाल था|

मुझे भी क्रिकेट की बीमारी बुरी तरह से थी और बाद में मुझे यह महसूस हुआ कि यह अफीम मेरे भविष्य को खराब कर देने के लिए काफी है| मेरे कई सहपाठी कहा करते थे बोर्ड परीक्षा तो हर साल आतीं है और क्रिकेट का विश्व कप  चार साल में एक बार| मेरा क्रिकेट से मोह भंग होने में सट्टेबाजी का कोई हाथ नहीं है वरन मेरे एक सहपाठी का हाथ है जो गणित और सांख्यकी की मदद और “सामान्य अनुभूति” से न सिर्फ मैच का सही भविष्य बताता था बल्कि एक मुख्य भारतीय बल्लेबाज का स्कोर में दहाई का अंक बिल्कुल सही बताता था| उसके साथ छः महीने रहकर मैंने क्रिकेट का नशा छोड़ दिया| दुर्भाग्य से मेरा वह मित्र क्रिकेट, गणित और अनुभूति की भेट चढ़ गया| पिछले पंद्रह वर्षों से मेरा उसके साथ संपर्क नहीं बल्कि मुझे उसका नाम भी नहीं याद|

जब क्रिकेट में सट्टेबाजी और फिक्सिंग के आरोप सामने आने लगे तब मुझे लगा की “क्रिकेट की सह्सेवाओं” ने मेरे मित्र के रूप में हीरा खो दिया|

मुझे या शायद किसी भी दर्शक को इस देश में क्रिकेट मैच की फिक्सिंग से कोई परेशानी नहीं है| जब तक आपको खुद मैच का परिणाम पहले से न पता हो तो क्रिकेट का हर मैच एक बढ़िया उपन्यास और फिल्म की तरह अंत तक मनोरंजन करता है| अगर फिल्म मनोरंजक हो तो किसे फर्क पड़ता है कि उसका प्लाट किसने कब कहाँ और क्यों लिखा था| हर गेंद का रोमांच बना रहना चाहिए| हर गेंद पर बल्ला वास्तविक तरीके से घूमना चाहिए|

अन्य खेलों के मुकाबले, क्रिकेट में हर खिलाडी के निजी विचारों और तकनीकि का अधिक स्थान है| क्रिकेट की एक टीम में कम से कम ११ सब – टीम खेल रही होतीं है| उनके अपने निजी लक्ष्य आसानी से निर्धारित किये जा सकते हैं| अगर मैच फिक्स न भी हो तो कोई  भी बढ़िया खिलाडी अपने दम पर अपनी निजी सब – टीम के लक्ष्य तक पहुँच सकता है| टीम में बने रहना और जनता की निगाह में चढ़े रहने से अधिक कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं है| आपने देखा होगा कि अधिकतर बल्लेबाज एक मैच में अपने कार्य – प्रदर्शन पर निर्भर रहने की जगह अपना औसत बनाये रखने में अधिक ध्यान देते हैं|

भारत पाकिस्तान के मैच तो हमेशा ही फिक्सिंग के लिए अपना एक स्थान बनाये रहे हैं| दक्षिण भारत की सामरिक समझ रखने का दावा करने वाला हर व्यक्ति मैच शुरू होने के हफ्ते भर पहले से ही उसका परिणाम घोषित कर ने  लगता है| इस तरह के व्यक्ति मैच इसलिए नहीं देखते कि खेल में क्या हो रहा है बल्कि इसलिए देखते हैं कि उनकी सामरिक समझ कितनी सही थी और दोनों टीम उन्हें दी गयी स्क्रिप्ट पर किस प्रकार खरी उतरीं|

हाँ! सट्टेबाजी पर नियंत्रण रखने की आवश्यकता है और यह उस पर प्रतिबन्ध लगाने से नहीं बल्कि अवैध सट्टेबाजी का उचित वैध विकल्प देने पर ही किया जा सकता है| किसी भी कार्य को खुले रूप में अवैध बनाये रखने का अर्थ है कि हम उसे कानूनी नियंत्रण से बाहर रखकर खुली छुट दे रहे हैं| अवैध अवैध सट्टेबाजी से कई बार लोग जरूरत से अधिक निवेश कर देते है और घर बार लुटा बैठते हैं| सबसे बड़ी बात यह है कि सरकार को राजस्व की बड़ी हनी होती है| जो पैसा कर के रूप में सरकारी खजाने में जाना चाहिए था वो नेता, पुलिस और माफिया के हाथ में बाँट जाता है|

मेरी इस साधारण सी बात को इस तरह से समझा जा सकता है कि जिन स्थानों पर शराब कानूनी  रूप से सहज उपलब्ध है वहां पर अवैध और/या नकली शराब का धंधा बेहद कम है, नशे की बुरे पहलू पर खुल कर बात होती है, नशा मुक्ति की तमाम व्यवस्था मौजूद है, सरकारी आय भी होती है|

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रेलवे की साजिशाना लूट


 

 

जी हाँ| मैं यही कह रहा हूँ कि हमारी प्यारी “भारतीय रेल” हमें साजिश कर कर लूटती है| और मेरे पास ये कहने की पर्याप्त आंकड़े है, जो मैंने खुद रेलवे से सूचना के अधिकार का प्रयोग कर कर प्राप्त किये है| मैंने अपनी आँखों से इस लूट को देखा जिसका विस्तृत ब्यौरा आप यहाँ पढ़ सकते है|

आइये देखें, ये लूट किस प्रकार हो रही है| अपने अध्ययन के लिए मैंने अपने गृहनगर अलीगढ़ और दिल्ली के बीच की रेल सेवा को चुना|

मैंने रेलवे से दो अलग अलग प्रार्थना पत्र भेज कर पूछा:

१.       अलीगढ़ पर दिल्ली और नई दिल्ली जाने के लिए रुकने वाली सभी ट्रेनों में कुल मिला कर सामान्य अनारक्षित श्रेणी की कितनी यात्री क्षमता है? कृपया ई.ऍम.यु.,एक्सप्रेस, सुपरफास्ट, शताब्दी, सभी श्रेणियों का अलग अलग ब्यौरा दें|

२.       अलीगढ़ जंक्शन से दिल्ली जंक्शन और नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के लिए टिकटों की बिक्री का ब्योरा दें|

रेलवे ने अपने जबाबों में कहा:

१.       अलीगढ़ से दिल्ली और नई दिल्ली के लिए तीन ई.ऍम.यु. ट्रेन चलती हैं| जिनमे से एडी १ और एदी ३ दिल्ली और एअनडी – १ नई दिल्ली के लिए जाती हैं| इन में से पहली ट्रेन में १३ और अन्य दो में १५ डिब्बे रहते हैं| हर डिब्बे में ८० यात्रियों के बैठने की सुविधा है|

२.       टिकटों के बारे में उन्होंने मुझे एक चार्ट संलग्न कर कर भेजा| इन आंकड़ों का मैंने अध्ययन किया\

अनारक्षित डिब्बा
अनारक्षित डिब्बा

एक वर्ष में भारतीय रेल के पास अलीगढ़ से दिल्ली के बीच कुल ४३८,००० सीटें हैं| इन सीटों ४३८००० सीटों के बदले में रेलवे में २००९ – १० में ५२०५२२, २०१० – ११ में ५२७,५८९ और २०११ – १२ में ५५१०६२ टिकटों की बिक्री की| और इन सभी यात्रियों को या तो खड़े हो कर यात्रा करनी पड़ी या फिर उन्हें मजबूरी में आरक्षित डिब्बों में जाकर दूसरों की सीट पर बैठना पड़ा|

जब ये यात्री उन डिब्बों में पहुंचे तो रेलवे में अर्थ – दंड के नाम पर कमाई की या उसके कर्मचारियों में इन यात्रियों से अवैध वसूली की|

क्या रेलवे को उपलब्ध सीटों से अधिक सीटें बेचने का अधिकार है?

क्या रेलवे को सीट उपलब्ध न होने पर टिकट बेचते समय यात्री को इस बाबत सूचना नहीं देनी चाहिए थी?

क्या सीट न उपलब्ध होने की स्तिथि में यात्री के उपर अर्थ – दंड लगाया जाना चाहिए?

अगर इस तरह का अर्थ – दंड लगता है तो इसका पैसा रेलवे को मिलना चाहिए? क्या वह सहयात्री जो इस पीड़ित यात्री को अपनी सीट पर यात्रा करने देता है उसे इस रकम से कुछ हिस्सा नहीं मिलना चाहिए?

क्या कहते है आप? कृपया अपनी टिप्पणियों में लिखे!!

(हिंदी में अपने विचार लिखने में आपकी सहायता के लिए इस पृष्ट पर एक लिंक दिया गया है जहाँ से आप सम्बंधित सॉफ्टवेयर प्राप्त कर और अपने यन्त्र पर उतार सकते हैं|)

मिटी न मन की खार – (कुण्डलिया)


 

एक शहीद पैदा किये,

एक दुश्मन दिए मार|

दंगम दंगम बहुत हुई,

मिटी न मन की खार|| दोहा १||

 

मिटी न मन की खार,

दर्पण भी दुश्मन भावे|

दर्प दंभ की पीर,

अहिंसा किसे सुहावे|| रोला||

 

दुनिया दीन सब राखे,

सब झगड़ा व्यापार|

मार काट बहुत बिताई,

अमन के दिन चार|| दोहा २||

 

उपरोक्त कुण्डलिया छंद की रचना के कुछ छिपे हुए उद्देश्य हैं| उन्हें जानने के लिए इसके छंद नियमावली पर एक निगाह डालनी होगी|

दोहा + रोला + दोहा = कुण्डलिया|

ये रचना प्रक्रिया रसोई घर में सेंडविच बनाने की प्रक्रिया से बिलकुल मिलती जुलती है|

यह रचना समर्पित है कश्मीर के लिए| कश्मीर जो आज कुण्डलिया बन गया है; भारत पाकिस्तान के बीच, भारत की सत्ता और विपक्ष के बीच, पकिस्तान के सत्ता विपक्ष के बीच, हिन्दू और मुसलमान के बीच, हमारी खून की प्यास के बीच| कुण्डलिया की एक और खासियत है, पहले दोहे का अंतिम चरण, रोले का पहला चरण होता है| यहाँ पर मैं इसे आज के सन्दर्भ में घिसे पिटे तर्क – कुतर्क के बार बार दोहराव के रूम में देखता हूँ| अगली विशेष बात जो ध्यान देने योग्य है, वह है कुण्डलिया का पहला और अंतिम शब्द एक ही होता है| जैसे जीवन में बातचीत में ही झगडे शुरू होते है और घूम फिर कर बात चीत से ही समाप्त करने पड़ते हैं|

एक दूसरा कारण इस कुण्डलिया को लिखने का और भी रहा है| अफजल गुरु की फांसी| कई खबरें आतीं हैं, जिनसे लगता है कि उसे पूरी तरह न्याय नहीं मिला और देश की जनता के आक्रोश को शांत करने और असली दोषियों तक न पहुँच पाने के सत्ताधारियों की निराशा ने उसे येन केन प्रकारेण दोषी ठहरा दिया| साथ ही मैं किसी भी दशा में फांसी की सजा को न्याय के विरुद्ध मानता हूँ| फांसी दोषी को मार तो देती है पर न तो उसे पूरी सजा देती है, न पीड़ित को पूरा न्याय| युद्ध, छद्म युद्ध, गृह युद्ध, महा युद्ध आदि के मामलों में तो यह दुसरे पक्ष के लिए शहादत का उदाहरण तक बना देती है| यह कुण्डलिया इसी प्रसंग में लिखा गया है|

विश्व-गाँव में स्थानीय कानूनों का विश्वव्यापी प्रभाव


 

जब भी हम किसी भी दूर देश के क़ानून की बात करते हैं तो हमारी निर्लिप्तता का स्तर काफी नासमझी भरा होता है| यह बात में खुद अपने अनुभव से कह रहा हूँ| मैंने कभी नहीं सोचा था कि सात समंदर पार किसी भारतीय के साथ ऐसा कुछ होगा जो उस देश को ही नहीं इस देश को भी झकझोर कर रख देगा| मगर यह भू-मण्डलीकरण का समय है| कानून व्यवस्था को अधिक समय तक राष्ट्रों निजता के साथ नहीं जोड़ा जा सकता| आज के विश्व-गाँव में सुदूर देश के कानून अगर मुझे नहीं तो मेरी आने वाली पीढ़ी को अवश्य प्रभावित कर सकते हैं| अभी इस विषय पर मैं कोई गंभीर विचार विमर्श करने की आवश्कता नहीं समझ पा रहा हूँ परन्तु इसे नज़रअंदाज़ भी नहीं किया जा सकता है|

सविता हलाप्पनावर की आयरलैंड में हुई मृत्यु इसी प्रकार के कुछेक उदाहरणों में से एक है| सविता की मृत्यु आयरलैंड के एक चिकित्सालय में चिकित्सकों द्वारा क़ानून के डर के कारण उचित चिकित्सीय सहायता न दिए जाने के कारण हो गयी थी| कहा जा रहा है कि सविता के गर्भ में स्थित भ्रूण किसी कारणवश नष्ट होने कि कगार पर था और खुद सविता कि जान को खतरा हो गया था, परन्तु चिकित्सकों के द्वारा उन्हें आयरलैंड के भ्रूण हत्या विरोधी कानून के चलते गर्भपात कराने की अनुमति नहीं दी गई| आयरलैंड में इस घटना की जांच जरी है|

इस घटना ने कई सारे प्रश्न खड़े किये जो धर्म का शासन – प्रशासन में अनुचित हस्तक्षेप, विश्व भर में धर्म – निरपेक्ष कानूनों की आवश्यकता, और स्थानीय क़ानून के विश्व्यापी प्रभाव आदि को दर्शाती है|

विश्व भर में जिस प्रकार से आयरिश कानूनों के बारे में चर्चा की गयी है उस से यह साफ़ है कि आज विश्व – गाँव अपने नए वृहद रूप में हमारे सामने है|

१.      एक देश का क़ानून विश्व के किसी भी नागरिक को प्रभावित कर सकता है, अतः स्थानीय क़ानून केवल स्थानीय मामला नहीं है|

२.      स्थानीय कानून बाहरी व्यक्तियों, पर्यटकों, निवेशकों, कामगारों और आमंत्रित प्रतिभाओं को प्रभावित करता है|

३.      स्थानीय कानूनों के गैर-स्थानीय प्रभाव विश्व – व्यापी प्रतिक्रिया को जन्म देते है और राष्ट्र कि छवि पर असर कर सकते हैं|

४.      विश्व- जनमत, स्थानीय जन – मानस को और स्थानीय जन मत, वैश्विक जन – मानस को प्रभावित कर सकता है|

५.      कानूनों को किसी भी प्रकार के धार्मिक प्रभाव से दूर रखा जाना चाहिए|

६.      किसी भी क़ानून को उसके उचित समय पर बना कर प्रभाव में ले आया जाना चाहिए|

७.      सभी कानून समय समय पर पुन्र्विचारित किये जाने चाहिए|

सविता का मामला इस समय का अकेला मामला नहीं है जहाँ पर हमें इस प्रकार के दूर देशीय प्रभाव दिखाई दे रहे हैं| एक अन्य मामले में हाल में ही पश्चिमी देश नार्वे में एक भारतीय दंपत्ति को गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें संतान से दूर रहना होगा क्योकि वो लोग बच्चे का जिस प्रकार से लालन-पालन कर रहे थे वह नार्वे के शिशु पालन स्तरों से काफी भिन्न था| इन मामलों में उन देशों के स्थानीय कानून तभी हम बहरी लोंगो को प्रभावित करते है जब हम उनके देश में जाते है| परन्तु हमेशा ऐसा नहीं होता| जब हम अपने देश में बैठे होते हैं, तब भी यह क़ानून हमें प्रभावित करते हैं| स्वित्ज़रलैंड का बैंक सम्बन्धी क़ानून सारे विश्व को प्रभावित करता है|

माना जाता रहा है कि स्विट्जरलेंड में बैंकों को दी गयी विशेष छूटें, विश्व  भर में भ्रष्टाचार फैलाने में मदद करती रही है| अमेरिकी संस्था सीआईए इसे काले धन को वैध बनाने सम्बन्धी गतिविधियों का केन्द्र बताती रही है| साथ ही आरोप है की, विश्व भर के आतंकी संगठन इस व्यवस्था को अपने हित साधने में प्रयोग करते रहे हैं| दरअसल, स्विस बैंक अपने ग्राहकों की सभी जानकारियां गोपनीय रखती हैं, और इस गोपनीयता का उलंघन करने की उन्हें कोई अनुमति नहीं है केवल नयायालय के आदेश पर ही इस प्रकार की जानकारी मुहैया कराइ जा सकती है| स्विस कानून विश्व भर में कर चोरी के मामले में भी सहयोग न करने के लिए बदनाम रहा है|

साथ है इस समय अमेरिका और ब्रिटेन के भ्रष्ट्राचार विरोधी कानूनों को इस प्रकार से बनाया गया है कि वो किसी में अमेरीकी और ब्रिटिश नागरिक या कंपनी या उनसे सम्बन्ध रखने वाले किसी भी व्यक्ति को विश्व में कहीं भी भ्रष्ट गतिविधियों में शामिल होने पर अपने देश में कानूनी कार्यवाही कर सकते हैं|

कुल मिला कर विश्व में आज किसी भी क़ानून को केवल अपने नागरिकों के लिए बनाये गए क़ानून के रूप में नहीं लिया जा सकता है| सभी देशों के क़ानून सारी मानवता को प्रभावित कर सकते हैं|

एक देश के रूप में हमें भी इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि हमारे क़ानून भी दूरगामी प्रभाव रख सकते है और उन्हें इस प्रकार का होना चाहिए कि नागरिक और गैर-नागरिक सभी उन्हें आसानी से समझ सकें और उनका दुरूपयोग न हो सके|

 

 

भारत में इस्लामिक बैंकिंग की संभावनाएँ


 

अब से लगभग चार वर्ष पूर्व वैटिकन ने पश्चिमी देशों के बैंकों से कहा था कि उन्हें इस्लामिक बैंकिंग के सिद्धांतों से आधार पर व्यवसाय करने के बारे में सोचना चाहिए| अभी कुछ दिन पूर्व भारतीय रिजर्व बैंक ने भारत सरकार से कहा है कि देश में इस्लामिक बैंकिग की अनुमति दी जानी चाहिए| ध्यान देने की बात है कि इस्लामिक बैंकिंग मुस्लिम कहे जाने वाले शासनों और देशों में भी बीसवीं शताब्दी में जाकर प्रचलित हुई है| रिजर्व बैंक के मुताबिक इस समय मौजूद भारतीय क़ानून देश में औपचारिक रूप से इस्लामिक बैंकिंग की इजाजत नहीं देते, परन्तु नॉन – बैंकिंग सेक्टर में इस प्रकार के कुछ संस्थान है जो इस्लामिक बैंकिंग के आधार पर सीमित रूप से कार्य कर रहे हैं|

इस बात में कोई शक नहीं है कि मानवता शताब्दियों से सूदखोरी के विरुद्ध रही है| कुरान पाक सूदखोरी सात बड़े पापों में गिनता है| सूद को आप मेहनत की कमाई की परिभाषा में नहीं ला सकते हैं| आप यदि जाति आधारित भारतीय समाज पर भी निगाह डालें तो पाएंगे की सूदखोरी का धंधा करने वाले समुदायों को समाज में अधिक सम्मान नहीं दिया जाता| अब प्रश्न उठता है कि बिना सूद बैंकिंग कैसी?

अगर आप बैंक के पास जाकर कहे कि आपको जर्मनी से एक करोड रुपये की कुछ मशीन खरीदनी है, और बैंक आपको मशीन खरीद कर दे दे और कहे कि आप कुल जमा सवा करोड रुपया अपनी पसंद की किस्तों में दे देना| जमानत के तौर पर दो करोड की जमीन रखने होगी|

अगर आप को एक करोड की जमीन अपना उपक्रम लगाने के लिए चाहिए और बैंक वो जमीन आप को खरीद कर प्रयोग करने के लिए दे दे.| आपको किस्तों में इतना पैसा बैंक को देना है जो आखिरी किस्त के दिन जमीन की पहले से अनुमानित कीमत के बराबर हो जाये|

अब अगर आप बैंक के पास जाए घर खरीदने का कर्जा लेने और बैंक कहे कि आपके द्वारा पसंद किया गया घर बैंक आपको खरीद कर किराये पर दे देगा और दस साल कुछ रकम माहवार किराये पर देने के बाद मकान आपका|

आपको कुछ धंधा करना है और बैंक आपकी कुल पूँजी लागत का ५० फीसदी आपको कर्जा दे और कहे कि आप जब तक जब तक मूल धन नहीं चूका देते, तब तक मुनाफे में २० फीसदी का हिस्सा देते रहे|

आप एक करोड के सोने के बदले बैंक से सवा करोड का उधार दे और कहे की आप दो साल के भीतर इस सोने को दो करोड में वापस खरीद सकते है|

बैंक आपके बचत खाते में जमा रकम के बदले हर साल ब्याज न देकर कुछ उपहार दे| बैंक आपके सावधि जमा के आधार पर आपको अपने कुल लाभ में से कुछ हिस्सेदारी दे|

बैंक आपको वेंचर कैपिटल मुहैया करा दे| आपके धंधे में प्रेफेरेंस शेयर खरीद ले| अगर दिमाग में विचारों का मंथन चले तो ऐसे कई और तरीके ओ सकते है जो इस्लामिक बैंकिंग के मूलभूत तरीकों से मेल खायेंगे|

मैं मानता हूँ कि पूरी तरह से आप इस्लामिक बैंकिंग के सिद्दांत पर सभी कार्य नहीं कर सकते परन्तु आप आज के सूदखोर बैंक के सिद्दांत पर भी पूँजीवाद नहीं चला पाए हैं| समाजवादी सिद्दांतों से ख़ारिज किये जाने के बीस वर्ष के भीतर ही पूंजीवाद के महारथी कई बैंक दिवालिया हो चुके है| आपको समय से साथ न सिर्फ नए वरन पुराने विचारों को भी बार बार अजमाना होगा|

इस्लामिक बैंकिंग एक ऐसा विचार है जो मुझे सदा ही आकर्षित करता रहा है और इसे मुझ सहित बहुत से लोग पूंजीवादी सिद्धांत के कमियों को दूर करने के प्रमुख प्रयास के रूप में देखते हैं| दुर्भाग्य से भारिबैं इस्लामिक बैंकिंग को मात्र वर्ग विशेष को बैंकिंग तंत्र से जोड़ने के एक साधन मात्र के रूप में देखती है| मैं विश्व भर के मुस्लिम – विरोधिओं और मुस्लिमों की भावनाओं का आदर करते हुए यह कहना चाहता हूँ कि जिस प्रकार योग, विज्ञान, वैदिक गणित, यूनानी चिकित्सा और आयुर्वैद किसी धर्म विशेष के विचार नहीं है बल्कि मानवीय धरोहर है उसी प्रकार इस्लामिक बैंकिंग किसी की बापौती न होकर मूलतः एक मानवीय विचार है और इसे सभी के द्वारा अपनाया जाना चाहिय|

पौरुष का वीर्यपात


 

किसी समय इस भारत देश के किसी क्षेत्र में रावण नाम का एक राजा रहता था| उसके तप और प्रताप से देवता भी डर कर थर थर कांपते थे| कहते हैं, दुर्भाग्य से उसे अपने आप पर घमंड हो गया था| अपनी बहन के प्रणय निवेदन को ठुकरा दिए जाने से नाराज होकर रावण ने राम की पत्नी का अपहरण कर लिया था| इस अपराध की सजा के तौर पर रावण को अपनी और अपने सभी प्रियजनों की जान गवाँनी पड़ी| परन्तु आज के सन्दर्भ में विशेष बात यह है कि रावण ने सीता को अशोक वाटिका में सुरक्षित रखा और कई प्रणय निवेदन किये| अति विशेष बात ये है कि उसने असहाय सीता से किसी भी प्रकार से अनुचित सम्बन्ध जबरन बनाने की कोई कोशिश नहीं की| मैं रावण के इस आत्म नियंत्रण, ब्रह्मचर्य और असहाय स्त्री के प्रति आदर की भावना और शक्ति को ह्रदय से नमन करता हूँ|

इस समय देश भर विशेषकर हरियाणा राज्य में लगातार जारी बलात्कारों के बारे में देश भर में एक दबी दबी सी चर्चा है| कोई स्त्री के कपड़ो को दोष देता है तो कोई उसके भाग्य को| कोई भी राम और रावण के आदर्श को नहीं देखता| एकनिष्ट राम पत्नी के प्रेम से बंधे है और दूसरे सम्बन्ध के बारे में नहीं सोचते| रावण असहाय स्त्री को भी सम्मान देता है] न कपड़ो का प्रश्न, न आयु, न जाति, न धर्म, न कर्म, न वर्ग, न मूल, न निवास, कैसा भी निम्न कोटि का तर्क कुतर्क नहीं| राम बलात्कार पीड़ित अहिल्या का आदर करते है| राम मर्यादा के नाम पर अपनी पत्नी को वन भेज देते है पर क्या राम बलात्कारी देवराज इन्द्र का आदर करते है या बलात्कार पीड़ित पत्नी का परित्याग करने वाले गौतम को गले लगाते है?

दुर्भाग्य है, इस देश में राम राज्य नहीं है| ये तो देवलोक की निर्लज्ज इन्द्रसभा है, जहां स्त्री को देवदासी और अप्सरा बनकर नाचना पड़ता है| स्त्री भोग्या है, अधम है|  राम का आदर्श कहाँ है? राम का मंदिर क्या केवल अयोध्या में ही बनेगा; जन मानस से मन मंदिर में नहीं?

एक और बात|

ब्रह्मचर्य के व्रत के बारे में बात होती है| ब्रहमचर्य कोई स्त्री का सतीत्व नहीं कि कोई इन्द्र गौतम का भेष रख कर आये और नष्ट कर दे| क्या इस पुरुष बहुल समाज में ब्रह्मचर्य की बात नहीं होनी चाहिए? क्या पुरुष को अपने पौरुष की कटिबद्ध होकर रक्षा नहीं करनी चाहिए? स्त्री को परदे में रखने की बात करने वालो, क्या तुम अपनी आँखों पर पलकों का पर्दा नहीं गिरा सकते| सोच लो, वीर्यपात तुम्हारा ही होना है; सोच लो, पौरुष तुम्हारा खंडित होता है; सोच लो, ब्रह्मचर्य तुम्हारा ही नष्ट होता है| पहले अपना इहलोक और परलोक सम्हालो|

हतभाग्य!! वो निर्लज्ज पंचायत बैठ कर स्त्री की योनि पर पहरा दे रही है|

खुदरा बाजार का खुला खेल


 

 

 

 

२१ सितम्बर २०१२ जारी किये गए प्रेस नोट के साथ अब भारत भर खुदरा बाजार के रास्ते सरकार ने अब विदेशी पूंजीपतियों के लिए खोल दिए गए है| विदेशी पूँजीपति १०० मिलियन अमेरिकी डालर भारत में भेज कर भारत में अपना खुदरा व्यापार प्रतिष्ठान खोल सकता है| इस प्रतिष्ठान में उसका हिस्सा ५१ फीसद का होगा| इसका मतलब होगा कि किसी न किसी भारतीय पूंजीपति व्यापारी को ९६ मिलियन अमरीकी डालर उसके साथ लगाने होंगे| इस तरह ये १९६ मिलियन का भरी भरकम हाथी होगा| इस पूरी पूँजी में से ५० मिलियन डालर सम्बंधित मूलभूत ढांचे पर लगाये जायेंगे| ये दूकाने केवल १० लाख से ज्यादा आबादी वाले शहरों में खोली जाएँगी| सरकार का कहना है कि सरकार कृषि उपज को खरीदने का पहला हक रखेगी| इसका मतलब ये है कि सरकारी खरीद का कोटा पूरा होने के बाद ये विदेशी खुदरा प्रतिष्ठान कृषि उपज खरीद सकते है| कूल खरीद का ३० फीसदी उन्हें छोटे और मझोले प्रतिष्ठान से खरीदना होगा| सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि इस खुदरा व्यापार में इंटरनेट पर की जाने वाली खुदरा बिक्री की अनुमति नहीं है| उसके लिए अलग नियम है|

अब देखते है क्या है इसके कानूनी और सामाजिक मायने:

खुदरा व्यापार को लेकर जो मूल आशंकायें छोटे खुदरा व्यापरियो से जुड़ी हुई है| लोगो को डर है कि इस से छोटे व्यापारी बेरोजगार हो जायंगे| खरीद से लेकर बिक्री तक कि नई तकनीकी और तौर तरीके कुछ न कुछ रोजगार तो शायद खत्म करें मगर साथ ही नयी तकनीकी नए तरह के रोजगार लाएगी जैसे कि कंप्यूटर और मोबाइल के आने से कुछ रोजगार खत्म हुए और कई नए शुरू हुए|

पहली बात हो यह है कि इनकी बिक्री कि दूकाने केवल बड़े शहर में खुलेंगी मगर इनको ये अनुमति दी गयी है कि ये अपनी खरीद कि दुकाने कहीं भी खोल सकते है| पहले खरीद की दूकान पर चलते है| यहाँ पर जो खरीद किसान से होनी है, वहाँ पर किसान और साधारण ग्राहक के बीच साधारणतः ३-४ बिचौलिए होते है, जो कि इन कॉर्पोरेट खुदरा व्यापारियों के यहाँ नहीं होते| ये लोग सीधे किसान और उत्पादक से माल खरीदते है| इस समय में रिलाइंस, मोर, बिग बाजार वगैरा कई कॉर्पोरेट खुदरा व्यापारी है| ये सभी अपना लाभ उठाने के लिए उत्पादक से सीधे ही बड़ी मात्र में माल खरीदते है और इस बड़ी मात्र उठाने के लिए ये लोग उन उत्पादकों में से भी बड़े उत्पादक और किसान के पास आते है| बिचौलियों (लोकप्रिय भाषा में थोक व्यापारी)के हिस्से जो लाभ बंट जाता था, वो अभी इन कॉर्पोरेट खुदरा व्यापारियों को पहुच जाता है| मेरी निजी मान्यता है कि इसका बड़ा हिस्सा इनके अपने लाभ खाते में जाता है न कि मूल उपभोक्ता को जाता है|  इस क्षेत्र में विदेशी निवेश आने से लाभ यह होगा कि कॉर्पोरेट खुदरा व्यापारियों में आपसी प्रतिस्पर्धा बाद जायेगी| वैसे अभी लगता यह है कि नए आने वाले विदेशी खुदरा व्यापारी या तो इन्ही पुराने देशी कॉर्पोरेट खुदरा व्यापार को खरीदेंगें अथवा इस समय चल रहे इनके थोक व्यापार खुदरा व्यापार में बदल दिए जायंगे| ये लोग अपने ब्रांड को बढ़ाने के लिए क्वालिटी पर ध्यान देंगे और इस तरह उत्पादकों को भी क्वालिटी पर ध्यान देना होगा| इस खेल में बड़े और मझोले उत्पादकों को अधिक लाभ होगा|

छोटे और सीमान्त किसान और अन्य उत्पादक विकास की इस दौड में एक बार फिर से बाहर ही छोड़ दिए गए है| छोटे किसान उत्पादक बिचोलियो (लोकप्रिय भाषा में थोक व्यापारी) के माध्यम से केवल ‘फुटकर” खुदरा व्यापरियो को ही माल बेच पाएंगे| जब कॉर्पोरेट खुदरा व्यापारी खरीद के समय मोल भाव कर सस्ते में माल खरीदेंगे तब सम्भावना है कि ये बिचौलिए अपने खरीद मूल्य और गिरा देंगे| मेरे विचार से उन लोंगो का ध्यान रखने के लिए अमूल जैसा एक नया सहकारी आन्दोलन खड़ा हो और सरकार तुरंत मंडी क़ानून और ऐसे ही अन्य कानूनों में भी सुधार करे| इस समय आवश्कता है कि देश भर में कोल्ड स्टोर खोलें जाएँ, जिनका अधिकतर प्रतिशत उत्तर प्रदेश के आगरा में ही स्तिथ है| सरकारी गल्ले (सरकारी वितरण प्रणाली) की पूरी व्यवस्था में सुधार किया जाये| देश भर में सामान की आवाजाही पर लगी रोकें हटाई जाएँ| एक बड़ी बात यह भी है कि देश भर में ट्रकों का आवागमन शहरी क्षेत्रों में दिन के समय लगभग प्रतिबंधित है, इस कारण परिवहन लागत बढ़ जाने से माल महँगा हो जाता है| देश भर में सरकार ने चुंगी तो काफी समय पहले समाप्त कर दी है, मगर कई तरह के टोल टैक्स, पुलिस की हफ्ता वसूली, गुण्डा टैक्स और नेतागर्दी मूल्यों को उपभोक्ता के लिए महँगा कर देती है और उत्पादक को माल दूर तक भेजने से रोकती है|

अब बिक्री की राह पर देखते है| कल्पना में एक तस्वीर उभर कर सामने आती है| एक बेहद बड़ी दूकान, तरह तरह का माल, बढ़िया मलट (पेकिंग), खुद चुनाव करने की आजादी, सुई से लेकर लंबी कार तक उसमें सजी हुई, आपको सहायता करने के लिए सजा धजा सहायक पलक पावडे बिछाकर तैयार| आप माल लीजिए, क्रेडिट कार्ड दिखाइए, माल आपकी गाड़ी में या फिर घर तक भी| मगर साहब, कहानी अभी शुरू हुई है| अभी तो पिछले दस पन्द्रह साल में हमारे भारतीय कॉर्पोरेट खुदरा व्यापारी बाजार पर पकड़ नहीं बना पाए| इनकी दुकाने विदेशी स्टाइल में सजी हुई है और आज तक बाजार पर पकड़ नहीं बनी है| सबसे बड़ी बात, हमारे यहाँ पानी हर कोस पर, बाणी दस कोस पर बदल जाती है| स्वाद तो क्या कहिये हर घर में अलग है| और ये स्वाद खाने, कपडे, रंग, ढंग सब में बदल जाता है| पूरे भारत को एक ढंग से माल नहीं बेचा जा सकता| अब या तो ये बड़े खुदरा वाले हमारा रंग ढंग बदल दें या हम इन्हें बदल ही देंगे| मगर यहाँ पर ध्यान रखने की बात है वो विज्ञापन और प्रचार दुष्प्रचार के हथियारों के साथ आयेंगे| हमारे आलू टिक्की को खराब बता कर आलू टिक्की बर्गर बेचने जैसा कुछ अभी होगा|

इस सबसे निबटने के लिए हमारे खुदरा व्यापारी से लेकर गली गली घूमने वाले फेरीवालों तक सबको धीरे धीरे बदलना होगा| बदलाब आ रहा है, पहले खुदरा व्यापारी कभी कभी आपसदारी में ही सामान आपके घर पहुचाते थे, आज लगभग हर खुदरा व्यापारी आपके घर सामन पहुँचाने की व्यवस्था रखता है| दिल्ली में तो कम से कम ठेले पर भी ज्यादा सफाई लगने लगी है| बोलचाल से ढंग बदल गए है| आज जब बिल मांगते है तो  ये बनिया भाई, भाषण नहीं सुनाते| बहुत से खुदरा व्यापारी आज टैक्स पैड माल बेचने का दावा करते है और बिल भी देते है| इस समय ये एक बेहद जरूरी बात है कि छोटे भारतीय उत्पादक/खुदरा व्यापारी अंपने ब्रांड विकसित करें और उन्हें देश व्यापी बनाने से पहले अपने मूल क्षेत्र में बेहद लगन के साथ प्रचारित करें| मैं अलीगढ शहर के अपने अनुभव से बता सकता हू कि लोग एकल ब्रांड की दुकानों को अधिक पसंद करते है; अलीगढ के अपने ब्रांड जलालीवाले, कुंजीलाल, ए-वन, बावा, आदि आज भी हल्दीराम का मुकाबला कर पा रहे है| मल्टी ब्रांड में आप अलीगढ में सहपऊ वालों का मुकाबला आसानी से नहीं कर सकते| आज इस तरह के स्थानीय ब्रांडों को अपना स्तर बनाये रखने पर और अधिक ध्यान देना होगा|

अगर हम ध्यान दें तो सर्वाधिक घाटे में हमारे आढ़ती और थोक व्यापारी रहेंगे| पूरी योजना उन्हें समाप्त कर देगी| भले ही राजनितिक लोग देशी खुदरा व्यापार के खात्मे की बात कर रहे है, मगर सच्चाई यह है कि राजनीति में बढ़ चढ कर हिस्सा लेने वाला यह तबका समाप्ति कि ओर है| इस समय नए आने वाले कॉर्पोरेट और विदेशी खुदरा व्यापारी इसी थोक व्यापार के हिस्से को खत्म कर कर अपना लाभ बनाने का प्रयास कर रहे है| मगर अभी देखना यह है कि कहीं हमारे गांव देहात के देशी खरीद बाजार की समझ न होने के कारण ये नए खुदरा व्यापारी भी कहीं इसी थोक व्यापारी तबके पर निर्भर न हो जाएँ|

यह सही समय है कि भारत का खुदरा अपने तरीके सुधार ले और बिचोलिये को खत्म करने के उपाय कर ले| चाहे यह सहकारी खरीद हो या लागत में कमी के उपाय| सरकार उनका साथ तभी दे पाएंगे जब कि वो सरकार के लिए आय का स्रोत हो और उनकी कर अदायगी कार्पोरेट खुदरा क्षेत्र से अधिक हो|

इस नए विचार से सबसे अधिक हानि बिचौलियों से भी अधिक उन गुमनाम लोगों को है जिनका काम अब एक बड़े स्तर पर मशीन करेंगी| पल्लेदार, रेहडी वाले और साधारण मजदूरों का एक बड़ा तबका अब और प्रकार के कार्यों के लिए रूख करेगा| मगर जो कुछ भी एक रात तो क्या एक साल में भी कुछ नहीं बदलेगा|

 

 

 

दूरसंचार उपभोक्ताओं के संरक्षण विनियम, 2012


हमारे देश के शौचालय से अधिक मोबाइल फोन है.

ब्लैकबेरी की हानि अपने कौमार्य की हानि से भी बड़ा मुद्दा है.

यह और अन्य मोबाइल संबंधित चुटकुले हमारे तेजी से बदलते जीवन शैली में मोबाइल के बढ़ते महत्व की बड़ी कहानी बताते है|

मोबाइल के बढ़ते प्रयोग

आधुनिक मोबाइल पोस्ट कार्ड (लघु संदेश), कलाई घड़ियों, मेज घड़ी (सुबह अलार्म), रेडियो, व्यक्तिगत कंप्यूटर, गणक (calculators), ई-किताब पाठक, कैलेंडर, निजी डायरी, नक्शे, स्कैनर, रिकार्डर, संगीत उपकरणों, कैमरा, वीडियो गेम और  कई अन्य उपकरणों और साधनों की जगह ले रहा है| ऑस्ट्रेलिया में एक ही विज्ञापन में उपयोगकर्ता अपनी प्रेमिका के मोबाइल में डालकर जेब में लेकर घूमते दिखाया गया है (मैंने इस विज्ञापन यौनाचार और नैतिकता की दृष्टि से गलत पाया)| परन्तु यह सभी, हमारे जीवन में इस मोबाइल के बढते महत्व को दर्शाता है|

हमारे मोबाइल पर अधिसंख्य सेवाएं मुफ्त है; परन्तु हम सभी को मोबाइल का मूल उपयोग कभी नहीं भूलना चाहिए| यह निसंदेह दूरसंचार है| दूरसंचार ऑपरेटर द्वारा प्रदान की गई सेवायें यह हमारी जेब के लिए सबसे अधिक लागत लेकर आती है| जाहिर है, जहाँ सेवाएं है वहाँ नियमित रूप से उपभोक्ता द्वारा इन सेवाओं से संबंधित शिकायतों भी हैं| भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण ने इन सेवाओं से संबंधित उपभोक्ताओं के हितों की सुरक्षा के लिए दूरसंचार उपभोक्ताओं के संरक्षण विनियम, 2012 को जारी किया हैं. यह विनियम सामान्य उपभोक्ता संरक्षण कानून के अलावा हैं|

यह विनियम मोबाइल कनेक्शन के  प्रारंभिक – किट और योजना वाउचर को स्पष्ट रूप से अलग करते हैं| प्रारंभिक अप किट केवल एक नया मोबाइल कनेक्शन सिम, एक मोबाइल संख्या और कुछ विवरण प्रदान करेंगे| प्रारंभिक किट के अतिरिक्त तीन प्रकार के वाउचर, अर्थात् – (क) योजना वाउचर, (ख) टॉप अप वाउचर और (ग) विशेष टैरिफ वाउचर होंगे| इन तीन वाउचर क्रमशः लाल, हरे और पीले रंग बैंड में होगा|

योजना वाउचर कोई भी मौद्रिक मूल्य उपलब्ध कराये बिना किसी एक विशेष टैरिफ योजना में एक उपभोक्ता सेवा में सम्लित करते है| टॉप – अप वाउचर भारतीय रुपए में व्यक्त एक मौद्रिक मूल्य को प्रदान करते है और इनकी कोई वैधता अवधि या अन्य उपयोग नहीं होगा| इनके अतिरिक्त एक विशेष टैरिफ वाउचर होगा, जो स्पष्ट रूप से योजना विशेष जिसपर यह लागू है तथा विशेष दर और इन दरों की वैधता अवधि आदि को इंगित करेगा|

किसी भी योजना के चालू होने और टॉप – अप वाउचर से प्रयोग होने पर प्रदाता द्वारा उपभोक्ता को एक एसएमएस भेजना होगा| योजना वाउचर को सक्रिय करते समय एसएमएस से इस वाउचर के योजना का शीर्षक बताया जायेगा| दूसरी ओर, टॉप – अप वाउचर के सक्रियण के पर भुगतान में ली गयी राशि, प्रकिया राशि, कर तथा उपलब्ध मौद्रिक राशि आदि की जानकारी देगा|

प्रत्येक कॉल के बाद एसएमएस के द्वारा कॉल अवधि, भुगतान राशि, बकाया राशि तथा विशिष्ट टेरिफ वाउचर के मामले में, प्रयुक्त मिनिट और बकाया मिनिट बताएगा| डाटा प्रयोग के मामले में, प्रत्येक सत्र के बाद एक एसएमएस प्रयोग किये गए डाटा, भुगतान राशि और बकाया राशि के बारे में बताएगा| किसी अन्य मूल्य वर्धक सेवा की स्तिथि में एसएम्एस भुगतान राशि, उसके काटे जाने का कारण, बकाया राशि और बकाया समय के बारे में जानकारी देगा|

उपभोक्ता अब रुपये 50/-  एक नाममात्र कीमत पर के अपने पिछले उपयोग के सभी विवरण की मांग कर सकते हैं| इसमें सभी कॉल का मद बार विवरण, एसएमएस की संख्या, भुगतान राशि, मूल्य वर्धक सेवाएं, प्रीमियम सेवाएँ, और रो़मिंग आदि का विवरण दिया जायेगा| ध्यान देने की बात यह है कि उपभोक्ता पिछले छः महीने का ही विवरण विवरण मांग सकते है|

टोल फ्री शॉर्ट कोड के प्रावधान करने से उपभोक्ता, एसएमएस के माध्यम से टैरिफ की योजना के बारे में जानकारी, उपलब्ध संतुलन और मूल्य वर्धित सेवाएं सक्रिय करने के आदि के लिए सक्षम होगा|

उपभोक्ता संरक्षण के लिए बढ़ते प्रयास
उपभोक्ता संरक्षण के लिए बढ़ते प्रयास

किसी प्रीमियम दर सेवाओं की सक्रियता से पहले, अंग्रेजी या क्षेत्रीय भाषा में बोलकर एक चेतावनी दी जायेगी|

इसके अलावा, उपभोक्ताओं की शिकायत निवारण के लिए, ट्राई ने दूरसंचार उपभोक्ताओं के शिकायत निवारण विनियम, 2012 भी जारी किए हैं| इसके अनुसार, हर सेवा प्रदाता को शिकायत के निवारण के लिए और सेवा अनुरोध के समाधान के लिए एक शिकायत केंद्र स्थापित करने की आवश्यकता है| सेवा प्रदाता के द्वारा ग्राहक सेवा के लिए एक मुफ्त नंबर दिया जाएगा| इसके अतिरिक्त अन्य जाकारी करने के लिए एक सामान्य जानकारी नंबर होगा जिसे शॉर्ट कोड से भी प्रयोग किया जा सकेगा| हर सेवा प्रदाता भी एक वेब आधारित शिकायत निगरानी प्रणाली की स्थापना करेगा|

हर शिकायत केंद्र में, डॉकेट संख्या हर शिकायत के लिए आवंटित किया जाएगा और यह एसएमएस के माध्यम से शिकायतकर्ता को भेजा जाएगा| कार्रवाई के पूरा होने पर भी शिकायतकर्ता को एसएमएस मिल जाएगा| शिकायतकर्ता को शिकायत केंद्र के खिलाफ एक अपीलीय प्राधिकारी को अपील करने का अधिकार दिया गया है|
हर सेवा प्रदाता एक नागरिक अधिकार पत्र तैयार करेगा|

विधायिका को विधेयक न दे कोई ! जनता रोई !!


गुरुवार प्रातः इकोनोमिक्स टाइम्स में खबर दी थी कि सरकार में भारतीय जनता पार्टी के दबाब में आकर कंपनी विधेयक २०११ को एक बार फिर से स्थायी समिति को भेज दिया गया है| कंपनी विधेयक सदन और समिति के बीच कई वर्षों से धक्के खा रहा है| आर्थिक सुधारों का जो बीड़ा पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव जी ने उठाया था वह इस समय खोखली राजनितिक अवसरवादिता के कारण दम तोड़ रहा है|  पिछले कई वर्षों से हम देख रहे है कि हमारी सरकार नए कंपनी क़ानून की बातें करतीं रहतीं है परन्तु उन्हें मूर्त रूप देने में असमर्थ रहती है| जब हम सरकार की बात करते है तब हम किसी दलगत सरकार की बात नहीं कर रहे वरन पिछले बीस वर्षों में सत्ताधारी सभी दलों की बात करते है; भले ही वह कांग्रेस, जनता दल, भाजपा, वामपंथी कोई भी हों| अफ़सोस की बात है कि संसद में बैठे लोग संसद के प्रमुख कार्य, विधि-निर्माण और कार्यपालिका नियंत्रण के स्थान पर शोरगुल, हल्लाबोल, कूदफांद आदि कार्यों में व्यस्त हैं| दुखद बात है कि हमारे राजनीतिज्ञ संसद को राजनितिक उठा पटक का अखाड़ा समझ रहे हैं और संसद के पवित्र गलियारा  सड़क की गन्दी राजनीति की चौपाल भर बन कर रहा गया है|

 

 

पिछले एक वर्ष से हम देख रहे है कि देश की जनता देश हित के एक क़ानून को बनबाने के लिए सड़क पर उतर आई है| आखिर क्यों?? पहले हमें कार्यपालिका के गलत आचरण, दु-शासन, क़ानून सम्मत अधिकारों के लिए ही सड़क पर आती थी और अधिकतर आंदोलन सत्ता की लड़ाई ही थे| परन्तु, हमारा दुर्भाग्य है कि जनतांत्रिक देश की जनता आज अपने को जनतंत्र और उसके मुख्य स्तंभ संसद और विधान सभाओं से कटा हुआ पाती है| कार्यपालिका का भ्रष्टाचार आज विधायिका का अभिन्न अंग बन गया है और खुले आम जनता कह रही है कि अब भ्रष्टाचार की लूट में भागीदार होने के लिए सत्ता का गलियारा जरूरी नहीं| सांसदों के संसद में व्यवहार को आज लूट में हिस्सेदारी की रस्साकशी के रूप ले देखा जा रहा है| यदि यह सब सत्य है तो देश और जनता दोनों का दुर्भाग्य है| परन्तु लगता है कि यह दुर्भाग्यपूर्ण परन्तु सत्य है; देश में विधायिकाएं विधि-कार्य के अतिरिक्त सभी कुछ कर रही हैं| कई महत्वपूर्ण विधेयक संसद में भूखी गरीब बाल विधवा की तरह मुँह लटकाए खड़े है और सरकार से लेकर उप-सरकार (विपक्ष बोलना गलत होगा) तक कोई उनकी सुध-बुध नहीं ले रहा है|

लोकनायक जय प्रकाश नारायण, नवनिर्माण आंदोलन, गुजरात, १९७४
क्या कारण हैं कि देश की विधायिका आज देश की कानूनी आवश्यकता को समझ में नाकाम सिद्ध हों रही है? संस्थान दर संस्थान, भ्रष्टाचार की मार से नष्ट हों रहे है, तकनीकि परिवर्तन जीवन में नए विकास लाकर नए संवर्धित कानूनों की मांग खड़ी कर रहे हैं, समय नयी चुनौती पैदा कर रहा है| परन्तु; हाँ, परन्तु; विधायिका खोखली राजनीति के घिनोने नग्न नृत्य का प्रतिपादन, निर्देशन और संपादन में अतिव्यस्त है| अब यह दूरदर्शिता की कमी मात्र रह गयी है या इच्छा-शक्ति का नितांत आभाव है| इस समय जनतांत्रिक विचारधारा के बड़े बड़े स्तंभ यह विचार करने पर मजबूर है कि क्या वह संसद और संसदीय प्रणाली में आस्था रखते है? हमारी आस्था संसद में भले ही बनी रही हों परन्तु निश्चित रूप से हमारे सांसदों में तो नहीं बची रह गयी है|

कंपनी विधेयक पिछले कई वर्षों से उठ गिर रहा है| पेंशन विधेयक अभी सोच विचार में डूबा है| भ्रष्टाचार उन्मूल्यन पर कोई उचित विचार नहीं है| गलत आचारण को उजागर करने वाले लोगो को सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं हों रही है| आम नागरिक रिश्वत देने पर मजबूर है और शिकायत करने पर शोषित और दण्डित हों रहा है| न्यायपालिका पर अत्याधिक दबाब है और आवश्यक कानूनी व्यवस्था नहीं बन पा रही है| दूसरी ओर यही सांसद दमनकारी क़ानून बिना किसे हील-हुज्जत बहस आदि के पारित कर देते हैं|

सड़क पर जनता, मुंबई, २१ अगस्त २०११ (The Hindu)

क्या हमारा देश सदन में की गयी नारेबाजी, कुछ-एक स्थगन प्रस्ताव, विधायिक कार्यों में रोजमर्रा की बाधा आदि के सहारे ही चलेगा?? क्या हम चुनाव के दौरान दिए गए कुछ गलत वोट के कारण चुने गए ऐसे सांसद पांच वर्ष तक झेलने के लिए अभिशप्त है?? क्या हम अपने निर्वाचित प्रतिनिधि को यह नहीं कह सकते कि वह फालतू के हल्ले-गुल्ले में न पड़े और कुछ काम-धाम कर ले? क्या हम अपने प्रतिनिधि से नहीं कह सकते कि वह आवश्यक क़ानून बनाएँ?

क्या संसदीय व्यवस्था निर्वाचित तानाशाही है? क्या संसदीय जनतंत्र दम तोड़ रहा है?? क्या प्रतिनिधिक जन तंत्र को भागीदारी जनतंत्र से बदलने पर यह संसद हमें मजबूर करने जा रही है???

 

 

चेक और बैंक ड्राफ्ट की वैधता समय सीमा


भारत में सामान्यतः सभी चेक और बैंक ड्राफ्ट की वैधता समय सीमा ६ महीने रही है| इसका तात्पर्य यह था कि कोई भी व्यक्ति विशेष किसी भी चेक और बैंक ड्राफ्ट का भुगतान उस पर डाली गयी दिनांक के छः माह के भीतर ही ले सकता था| इस अवधि के बाद, उसका भुगतान बैंक नहीं करता और हमें चेक लिखने वाले व्यक्ति से नया चेक लिखने का अनुरोध करना पड़ता है| इसी प्रकार प्रकार बैंक ड्राफ्ट को पुनः बनबाना या वैध करना पड़ता है|

इस सुविधा के कुछ लाभ थे:

१. आप ६ महीने में एक बार बैंक जाकर पिछले ६ महीने में प्राप्त सभी चेक का भुगतान प्राप्त कर सकते थे|

२. आप किसी व्यकि को एक चेक जमानत के तौर पर दे कर छः माह के लिए उधार ले सकते थे|

अब भारतीय रिज़र्व बैंक का कहना है कि उसकी सुचना के मुताबिक कुछ लोग इन चेक आदि को मुद्रा के रूप में प्रयोग कर रहे थे|

पहले चेक आदि की वैधता की अवधि शायद इसलिए अधिक रखी गई होगी क्योंकि अंतरराज्यीय व्यापार में इन मौद्रिक कागजातों को डाक द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजा जाता था और यह एक बेहद समय खर्च सेवा थी| मुझे लगता है कि पन्द्रह बीस वर्ष पहले तक, गोवाहाटी से गोवा तक डाक पहुँचने में पन्द्रह दिन का समय लगना तो सामान्य बात थी| इस कारण, चेक और बेंक ड्राफ्ट की वह वैधता समय सीमा उचित थी| उसके बाद धारक अपने बैंक में चेक जमा करता था और पुनः यह चेक अपने मूल स्थान थक की यात्रा करता था| जब चेक काटने वाले व्यक्ति का बैंक, उस व्यक्ति का खाता देखकर अनुमति देता था, तभी चेक धारक के खाता में धन राशि का हस्तांतरण होता था| इस कार्यवाही में उन दिनों दो तीन महीने लगने साधारण बात थी|

आज के समय में चेक का लेनदेन कोरियर सेवा या डाकघर की स्पीड पोस्ट सेवा के मार्फ़त होता है| सभी चेकों पर MICR (चुम्बकीय स्याही अंकन पहचान) अंकन होता है| जिसके कारण चेक को मशीन द्वारा ही निबटा लिया जाता है| साथ ही चेक छंटनी व्यवस्था [Cheque Truncation System (CTS) ] के आने से चेक के रूपचित्र के माद्यम से बैंक आपस में संवाद करने के उपरान्त चेक सम्बन्धी निपटान कर सकेंगे| इन सभी कारणों से चेक की वैधता समय सीमा घटा देना एक उचित निर्णय जान पड़ता है|

सूचना का अधिकार


सूचना का अधिकार क़ानून जनता जनता को कोई नया अधिकार नहीं देता, अपितु सूचना पाने के अधिकार को प्रयोग करने का सही तरीका बताता है और जनसेवक (जिन्हें आम जनता सरकारी अधिकारी कहती है) के ऊपर यह जिम्मेदारी डालता है कि वह मांगी गयी जानकारी समुचित रूप से प्रदान करे|

सूचना का अधिकार 2005 प्रत्येक नागरिक को शक्ति प्रदान करता है कि वो:

  • सरकार से कुछ भी पूछे या कोई भी सूचना मांगे,
  • किसी भी सरकारी निर्णय की प्रति ले,
  • किसी भी सरकारी दस्तावेज का निरीक्षण करे,
  • किसी भी सरकारी कार्य का निरीक्षण करे,
  • किसी भी सरकारी कार्य के पदार्थों के नमूने ले|

सभी इकाइयां जो संविधान, या अन्य कानून या किसी सरकारी अधिसूचना के अधीन बनी हैं या सभी इकाइयां जिनमें गैर सरकारी संगठन शामिल हैं जो सरकार के हों, सरकार द्वारा नियंत्रित या वित्त- पोषित किये जाते हों| एक जन सूचना अधिकारी, सूचना देने से मना उन 11 विषयों के लिए कर सकता है जो सूचना का अधिकार अधिनियम के अनुच्छेद 8 में दिए गए हैं. इनमें विदेशी सरकारों से प्राप्त गोपनीय सूचना, देश की सुरक्षा, रणनीतिक, वैज्ञानिक या आर्थिक हितों की दृष्टि से हानिकारक सूचना, विधायिका के विशेषाधिकारों का उल्लंघन करने वाली सूचनाएं आदि. सूचना का अधिकार अधिनियम की दूसरी अनुसूची में उन 18 अभिकरणों की सूची दी गयी है जिन पर ये लागू नहीं होता| हालांकि उन्हें भी वो सूचनाएं देनी होंगी जो भ्रष्टाचार के आरोपों व मानवाधिकारों के उल्लंघन से सम्बंधित हो|

सूचना प्राप्ति के लिए हर विभाग एवं संस्था में जन सूचना अधिकारी का पद सृजित किया गया है| केंद्र सरकार के विभागों के मामलों में, 629 डाकघरों को उप जन सूचना अधिकारी बनाया गया है, अर्थात् आप इन डाकघरों में से किसी एक में जाकर सू. अ. पटल पर अपनी अर्जी व फीस जमा करा सकते हैं| वे आपको एक रसीद व आभार जारी करेंगे और यह उस डाकघर का उत्तरदायित्व है कि वो उसे उचित ज. सू. अ. के पास भेजे|

केंद्र सरकार के विभागों के लिए, सूचना प्राप्ति कि अर्जी का कोई प्रारूप नहीं है| आपको एक सादा कागज़ पर एक सामान्य अर्ज़ी की तरह ही अर्ज़ी देनी चाहिए| हालांकि कुछ राज्यों और कुछ मंत्रालयों व विभागों ने प्रारूप निर्धारित किये हैं| मैं सामान्यतः इस प्रारूप का प्रयोग करता हूँ:

१.      मेरा नाम:

२.      मेरा पता, संपर्क सूचनाएं

३.      मांगी गयी सूचना का विवरण:

  • विषय वस्तु
  • समयावधि जिससे सूचना सम्बंधित है
  • मेरे प्रश्न
  • सूचना प्राप्ति का तरीका, डाक/ इ-मेल/व्यक्तिगत

४.      क्या में गरीबी रेखा से नीचे हूँ?

५.      देय शुल्क का विवरण

 मैं सामन्यतः पोस्टल आर्डर या डिमांड ड्राफ्ट से शुल्क देता हूँ|