खाप खापवाद और खाप भूमि


 

“ऐसे पुलिस कैसे आ जायेगी गाँव में, पहले गाँव के बड़े बूढों को खबर कर के पूछेगी| तब आएगी, हमारे गाँव में| …….. इल्जाम की क्या है; आजकल तो लोग अपने बाप पर लगा देते हैं|”

 

“हमारे गाँव में तो सारे वोट वहीँ गिरेंगे, जहां गाँव के बड़ों ने कह दिया; बिना उनकी बात माने तो गाँव में सूरज भी नहीं निकलता|”

 

ये वह कुछ बातें हैं, जो मुझे हरियाणा में रहते हुए सुनने के लिए मिले थीं| यहाँ “गाँव के बड़ों” का मतलब खाप नेताओं से है| जब मैं हरियाणा के सोनीपत जिले में रह रहा था| वैसे मुझे शहर में रहते हुए खाप का कोई विशेष असर नजर नहीं आता था, मगर जो भी किस्से सुनने को मिलते थे वो यही बताते थे कि ग्रामीण अंचल में खाप का असर बहुत गहरा है| जिस गाँव में एक जाति विशेष का बाहुल्य है, वहाँ पर अन्य जाति दूसरे दर्जे के नागरिक हैं| यह एक सच्चाई है जिसे शायद दिल्ली में लोग नहीं सुनना चाहते| उन दिनों, जब मैं सोनीपत में रह रहा था, मेरे पास कोई पत्रिका थी जिस में नक्सल समस्या के पहलुओं के बारे में चर्चा हुई थी और मैं स्वभावतः दोनों बातों में तुलना कर रहा था| मुझे पता है कि इस तुलना शब्द से बहुत लोंगो को दिक्कत होगी मगर…|

 

नक्सल इस देश के छः सात राज्यों में असर रखते है तो खाप भी दो तीन राज्यों में प्रभावी है| नक्सल और उनके लोग अपने इलाकों में सामानांतर सरकार चलाते हैं तो खाप पंचायतें और उनके लोग तो सीधे ही सरकार चला रहे है| नक्सल और खाप का क़ानून, दोनों ही सरकार और उसके टाट – पैबंद वाले चाक – चौबंद प्रशासन की जीती जागती मजाक उड़ा रहे है| दोनों के प्रभावित इलाकों में सरकारी अमला बेबस है| नक्सल के शासन को हमेशा उसके समर्थक आम जनता के दिलों से जोड़कर देखते है तो खाप देश की जाति व्यवस्था और पुरानी परम्परा का ध्वजारोहक है|

 

नक्सल प्रभावित राज्यों के प्राकृतिक संसाधनों के कारण उन पर औद्योगिक घरानों कि नजर है, इस लिए नक्सल सीधे विकास और अर्थव्यवस्था के दुश्मन के रूप में खड़े दिखाए जाते हैं| इस समय खाप इलाकों में गुडगाँव में ही व्यवसायिक घरानों की पहुँच है| जब उद्योगों की पकड़ खाप के अन्दुरूनी इलाकों में पहुंचेगी और खापवादियों को जमीन और शिक्षा के अभाव ने बेरोजगार मरती युवा पीढ़ी दिखाई देगी तो खाप इलाकों में जो दंगल होगा उसकी कल्पना करना भी मुश्किल होगा| नक्सलियों के पास हथियार खरीदने के लिए पैसे नहीं है और वो लूट के हथियारों से अपना शासन चलते है| मगर खाप इलाके दिल्ली के पास होने के कारण जमीन बिकने पर कुछ अच्छी कीमत पाते है और हथियार खरीदने में अधिक सक्षम हो सकते हैं| खाप मुख्यतः कृषि प्रधान व्यवस्था परचम लहरा रहे है और उनका कोई सीधा आर्थिक प्रतिद्वंदी अभी नहीं है| ध्यान देने की बात है कि खाप प्रभावित क्षेत्रों में कम पढ़े लिखों की भरमार है| जो लोग जमीनें बेच कर मोटी मोटी रकम ले कर बैठे हैं, उनके पास आज शराब, शबाब, जुआ, आदि के अलावा कोई काम नहीं बचा है| ऐसे में जब भी पैसे कम पड़ते है या खत्म होने लगते हैं तो अपराध एक सुगम रास्ता है| दुर्भाग्य से खाप, इन लोंगो से भरी पड़ी है और अपने अपराधी प्रवृत्ति के लोगों को प्रश्रय देतीं हैं| उनके पास अपने लोगों और उनके अपराधों को छिपाने के लिए अजब  – गजब बहाने है; ये “चाइनीज चाव्मिन” से लेकर “गर्म खून का जोर” तक कुछ भी हो सकते हैं|

 

देश के प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण क़ानून खाप पंचायतों को उसी स्थान पर ला कर रख सकते है जहां पर आज जंगल अधिकार सम्बन्धी क़ानून नक्सल समूहों को रखते हैं| रेखांकित करने की बात ये है कि न तो भूमि अधिग्रहण क़ानून भूस्वामियों और कृषि से जुड़े अन्य लोंगो को किसी प्रकार का वैकल्पिक रोजगार मुहैया कराते हैं, न ही जंगल अधिकार सम्बन्धी कानून वनवासी आदिवासी समुदाय को रोजगार और वैकल्पिक आवास देनें में सक्षम हैं| ऐसे में समय के साथ खाप का सरकार और देश के कानून के साथ बैर बढ़ता ही जाने वाला है|

मैं जो मुख्य अंतर दोनों व्यवस्थाओं में देख पाता हूँ वह अभी बुद्धिजीवी वर्ग के समर्थन को लेकर है| आज का बुद्धिजीवी वर्ग खाप के विरुद्ध खड़ा नजर आता है तो वह कई मुद्दों पर नक्सल के साथ सहानुभूति रखता है| इस के विपरीत, सरकार आज खाप के समर्थन पर चल रही है और नक्सल को अपना पहला दुश्मन समझती है| सरकार का खाप के प्रति नम्र रवैया इस बात का द्योतक है कि अभी खाप राजनीतिक दलों को वोट बैंक मुहैया करा रहा है|

मैं नक्सल और खाप दोनों समस्याओं की जड़ में कुछेक सामान्य कारक देखता हूँ:

१.      प्रभावित क्षेत्रों में शिक्षा का नितांत अभाव|

२.      मूल भूत आवश्यकताओं का नितांत अभाव|

३.      सरकारी व्यवस्था ने व्यापक भ्रष्टाचार|

४.      स्थानीय स्तर पर चरमराया हुई प्रशानिक व्यवस्था|

५.      प्राकृतिक संसधान का अर्थ व्यवस्था में गहरा स्थान (तथाकथित उन्नत कृषि भी प्राकृतिक संसाधन का दोहन है)|

 

हमारे देश और समाज में एक बेहद गलत परम्परा है; हम जिस भी असामाजिक तत्व या संगठन के साथ किसी भी प्रकार का भावनात्मक जुड़ाव रखते हैं, उसकी गलत बातों को न सिर्फ नजरअंदाज करते है वरन अपराध के क्षेत्र में उसके विरोधी तबकों की खराब बातें बढ़ चढ़ कर बताने लगते हैं; जैसे हिंदू आतंकवाद बनाम मुस्लिम आतंकवाद, दलित आरक्षण बनाम सवर्ण एकाधिकार, इस पार्टी के अपराधिक नेता बनाम उस पार्टी के अपराधिक नेता, सन उन्नीस सौ चौरासी बनाम सन दो हजार दो, आदि आदि| अगर हम खाप पंचायत पर ध्यान नहीं देते तो शायद कुछ लोग खाप बनाम नक्सल या खाप बनाम कुछ और लेकर आजायेंगे|

मेरे विचार से खाप अभी एक सर उठाती हुई समस्या है, जो और समस्याओं की ही तरह, दिल्ली की भारत सरकार का ध्यान नासूर बनने तक नहीं ही खीचेगी|

समस्याएं हो सरकार को चलतीं है||

 

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बलात्कार क्यों??


 

परिवार

* स्त्री ने अपनी पांच साल की बेटी को कहा; “अपने कपड़े ठीक कर कर बैठा कर, लड़कों की निगाह खराब हो जाती है|”

      बेटी कुछ नहीं समझी, डर गयी| बेटा समझा अगर मेरी निगाह खराब होने में लड़की का दोष होगा|

* स्त्री ने बेटे को बादाम दूध देकर बोला; “पी ले बेटा तुझे बड़े होकर मर्द बनना है|”

      बेटा मर्द बनने में लग गया|

* स्त्री ने स्कूल से बेटी से कहा; “बड़ी हो रही है कुछ शर्म लिहाज सीख ले| लड़कों का क्या? ये तो खुले सांड होते है|

एक इंसान को पता लगा कि उसकी असली जात खुले सांड है|

* पुरुष ने सड़क पर किसी नन्ही बच्ची को छेड़ते हुए बेटे को देख कर घर आकर स्त्री से कहा; “तुम्हारा बेटा अब बड़ा हो रहा है|” स्त्री हँस दी; “हाँ, अब उसकी शिकायतें आने लगीं है|

      बेटा बड़ा होनेलगा|

* पुरुष ने बेटी से कहा; तू उन लोगों की बातों पर ध्यान देगी तो वो ऐसा तो करेंगे ही|

* पुरुष में बेटी को बोला; “बेटा! तुम अपनी तरफ भी ध्यान दो, ताली एक हाथ से नहीं बजती|”

* स्त्री में पड़ोसन से कहा; “तुम्हारी बेटी कुछ कम है क्या? और ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती|”

* पुरुष में अपनी बेटी को घर में घुसते ही पीट दिया; “साली हरामजादी’ क्या कर कर आई थी कि पान की दूकान पर लड़के तुझ पर छींटे उछाल रहे थे|”

* स्त्री में लड़कियां छेडकर घर आए बेटे को बिना डांटे, खाने खाने को दे दिया|

* स्त्री ने बेटी से कहा; “सुन अगर किसी लड़के में तेरी तरफ देखा भी तो मैं तुझे दीवार में चिनवा दूंगी|”

      बेटी ने समझा नहीं समझा, “मर्द” बेटे ने जरूर समझ लिया|

 

देश और समाज

  • सभी लड़कियां तय की गयी वर्दी पहन कर आएँगी; लड़के ….. कोई बात नहीं|
  • लड़कियों को सभ्य कपड़े पहनने चाहिए, वर्ना लड़कों का ईमान खराब होता है|
  • जब उन गालियों को समाज में स्वीकृति होती है, जिनमें स्त्री, माँ बहन बेटी, के साथ बलात्कार की बात होती है|
  • जब स्त्री का अस्तित्व समाज में मात्र योनि और स्तन तक सिमटा दिया जाता है| अधिक दुर्भाग्य यह है कि कोई उन पवित्र अंगों को जन्मदाता और बचपन में दूध पिलाने वाले अंग के रूप में आदर नहीं देना चाहता|
  • जब अपने भाई या पुरुष-मित्र से साथ घुमती लड़की को कमेन्ट किया जाता है; “हमें भी देख लो हम में क्या कांटे लगे है” कोई भी इस कमेन्ट पर कुछ नहीं कहता|
  • जब पिता अपने बेटों को ये नहीं कहता कि मर्द होने का मतलब लड़की का दिल जीतना है, शरीर पर जोर दिखाना नहीं|
  • जब लड़कियों को पर्दा करना पड़ता है कि किसी की बुरी नजर न पड़े|
  • जब लड़कियां खुद को बाजार में बिकने वाली चीज बनाने लगती है|
  • जब देश में क़ानून नेता जी के घर की पहरेदारी करता है और आम जनता को रात में घर में छिप जाने के लिए कहा जाता है|
  • जब समाज बलात्कार को “लड़की कि इज्जत लूटना” कहता है| उन दरिंदों का “ईमान-इज्जत-इंसानियत” खोना नहीं|
  • जब अदालत में लड़की को अपने बलात्कार का गवाह बनना पड़ता है जबकि किसी मुर्दे को अपनी मौत की गवाही नहीं देती पड़ती|
  • जब देश में मुक़दमे दसियों साल तक अदालत में झूलते रहते है|
  • जब देश की आम जनता पुलिस को देश का सबसे बड़ा अपराधी संगठन मानती है और एक अदने से जेब कतरे से भी पंगा नहीं लेना चाहती क्योंकि वो पुलिस का सगा छोटा भाई है|
  • जब देश में कड़े क़ानून किताबों में शोभा बढ़ाते है और उनका पालन नहीं होता|
  • जब किसी के शक की बिना पर बलात्कारी को छोड़ा जाता है और उसी शक की बिना पर पीडिता को अपराधी मान लिया जाता है|
  • जब हम बलात्कार में पीड़ित और अपराधी का देश, धर्म, जाति, काम, देखते है|
  • जब हम अपनी सेना या अपने प्रिय जन द्वारा किये बलात्कार को देख सुन कर चुप रहते है या चुपचाप सहते हैं|
  • जब हम बलात्कारी और पीडिता की शादी करने के बारे में एक पल भी सोचते हैं|
  • जब हम बलात्कारी को देश के आम नागरिक जैसे सभी अधिकार देते है; जबकि किसी और दिवालिया या पागल को ऐसे अधिकार नहीं होते|


देश और देवता

 

  • जब “देवराज” इन्द्र तपस्वी गौतम की सती पत्नी अहिल्या का बलात्कार करते है; अहिल्या से दुश्मनी के लिए नहीं वरण गौतम से इर्ष्या के कारण; शायद कोई इन्द्र के इस कुकृत्य की निंदा नहीं करता|
  • जब अहिल्या के बलात्कार का शिकार हो जाने पर पति गौतम अहिल्या को श्राप देते है| जो श्राप अहिल्या को पत्थर बना सकता है वो इंद्र को नाली का कीड़ा क्यों नहीं बनाता|
  • जब राम अहिल्या को सम्मान देकर पत्थर से वापस स्त्री बनाते है और उन्ही राम का भक्त हम इस देश के वासी बलात्कार पीडिता को पत्थर बनाने में लगे रहते हैं|
  • देश में राम राज्य का सपना स्त्री को अहिल्या / शबरी जैसा आदर देने के लिए नहीं वरन स्त्री को सीता जैसा वनवास देने के लिए देखा जाता है|
  • जब हर साल रावण को जलाने वाला समाज/देश ये भूल जाता है की रावण ने राक्षस होकर भी अपहृत सीता के साथ कोई बलात्कार या छेड़खानी जैसी कोई घटिया हरकत नहीं की थी|

अंत में मैं कहना कहता हूँ; जब समाज में कोई भी गलत बात होती है तो मुझे भी देखना चाहिए क्या मैंने तो इस समाज में ये गलत बात होने में कोई योगदान नहीं दिया| कोई गलत बात कहकर, सहकर||

मैं आज खुद के होने पर शर्मिंदा हूँ||

 

 

 

दिल्ली मेट्रो में लिफ्ट का दुष्प्रयोग


 

 

अगर दिल्ली मेट्रो को आधुनिक दिल्ली की शान कहा जाये तो शायद किसी को भी कोई आपत्ति नहीं होगी| यह एक बेहद सुविधा जनक सेवा है| दिल्ली पिछले पांच छः वर्षों से दिल्ली मेट्रो के नियमित प्रयोग के दौरान मुझे कई प्रकार के खट्टे मीठे अनुभव हुए है| एक भारतीय होने के नाते आप कह सकते है कि दिल्ली मेट्रो में अगर कोई भी असुविधा होती है तो देश में उपलब्ध अन्य सुविधाओं के मुकाबले आप इसे कम पाएंगे और शिकायत शायद नहीं ही करेंगे| अगर मैं दिल्ली मेट्रो के अपने “दुखद” अनुभवों की सूची बनाऊ तो मुझे लगता है कि यह दिल्ली मेट्रो प्रबंधन से अधिक साथी यात्रीयों की शिकायत अधिक होगी|

मेरे ७४ वर्षीय पिता इस सेवा को बेहद पसंद करते हैं और बेहद सुविधा जनक मानते हैं| इस महीने उन्हें दिल्ली मेट्रो को लेकर जो अनुभव हुए उन्हें मैं यहाँ सबके साथ बाँटना चाहूँगा|

१५ अक्टूबर २०१२ की बेहद प्रातः जब मेरे अलीगढ से ट्रेन द्वारा दिल्ली आने के क्रम में भारतीय रेलवे के दिल्ली – आनंद विहार टर्मिनल पर उतरे और वहां से उन्हें मेरे घर आने के लिए मेट्रो लेनी थी| आनंद विहार रेलवे टर्मिनल से दिल्ली मेट्रो के आनंद विहार स्टेशन पहुँचने के दो रास्ते हैं, जिनमे से एक पैदल पार पथ है जिसका छोर ढूँढना, किसी मार्ग निर्देशक के अभाव में नए व्यक्ति के लिए थोडा मुश्किल है और दूसरा रास्ता बेहद लंबा और उबड़खाबड़ है| इसी क्रम में पिताजी कहीं गिर गए और उनकी आँख पर कहीं चोट लग गयी| जब वह किसी तरह से मेट्रो स्टेशन पहुँचे तो वहां मौजूद, सुरक्षाकर्मियों और मेट्रो स्टाफ में उन्हें प्राथिमिक चिकित्सा दी और बाद में एम्बुलेंस में पिताजी की सलाह पर गुरु तेगबहादुर अस्पताल भी पहुँचा दिया| वहां पर उनकी दाँयी आँख के निकट और पलक पर कई टांके आये| मैं इस दुर्घटना के एक घंटे के बाद जब अस्पताल में पिताजी से मिला तब भी उनके लगातार खून बह रहा था| यह हमारे लिए दिल्ली मेट्रो से जुड़ी एक अच्छी याद है, जिनके मानवीय व्यव्हार से मुझे प्रेरणा मिली है|

इसके बाद जब १९ अक्टूबर जो जब पिताजी को पुनः अस्पताल जाना था तब एक बार फिर से हमने दिल्ली मेट्रो का प्रयोग किया| उन्हें जो दुखद अनुभव हुए वो इस प्रकार रहे:

१.       कश्मीरी गेट मेट्रो स्टेशन पर यलो लाइन से रेड लाइन के लिए जाते समय मुझे प्लेटफार्म तक पहुँचने के लिए लिफ्ट का पता नहीं चल पाया, और पिताजी को स्वचालित सीढ़ियों का प्रयोग करना पड़ा|

२.       वापसी में झिलमिल से जब हम ट्रेन में पहुँचे तो वृद्धों के लिए सुरक्षित सीट पर दो अधेड़ महिलाये बैठी हुई थी और उन्होंने सीट देने से इनकार कर दिया जबकि निकट के महिला सीट पर बैठे पुरुष में उन्हें कहा कि वो दोनों महिला सीट पर आ जाएँ| खैर पिताजी महिला सीट पर बैठ कर कश्मीरी गेट तक पहुँचे|

३.       जब निचले प्लेटफार्म पर जाने के लिए लिफ्ट तक पहुँचे तब वहां बेहद लंबी कतार लगी थी| खेद की बात है, पहले से मौजूद उन्नीस लोगों में से दस नवयुवा (२०-२५ वर्ष), पांच अन्य युवा या अधेड़ (२५-५०) और कुल चार वृद्ध थे| कोई भी विकलांग उस भीड़ में नहीं था| दुर्भाग्य की बात है कि एक वृद्ध सज्जन के इस अनुरोध को कि वो लोग पहले वृद्धों को लिफ्ट में जाने दें, एक कर्कश टिपण्णी के साथ नकार दिया गया| हमें लिफ्ट के पुनः आने का इन्तजार करना पड़ा| लिफ्ट अपने लिए निर्धारित क्षमता को ले जाने में असमर्थ थी| जब मैंने पुनः सभी लोंगों से अनुरोध किया कि हमें पहले लिफ्ट का प्रयोग करने दे तब लिफ्ट से बाहर निकलने वाले सभी लोग अधेड़ थे, युवा नहीं|

४.       जब हम जोरबाग के लिए मेट्रो में सवार हुए तो इस बार एक नवयौवना वृद्धों वाली सीट पर सवार थीं और उन्होंने खतरे को भांपते हुए पिताजी को इस प्रकार देखा कि पिताजी कुछ नहीं कह पाए| परंतु, अधिक दुखद अभी बाकी था, जिन सज्जन ने पिताजी के लिए अपनी सीट छोड़ी और आशीर्वाद पाया; उन्होंने धीमे स्वर में उस नवयुवती पर बेहद शर्मनाक टिप्पणी की| मन कसैला हो गया|

आज २६ अक्टूबर को पुनः मेट्रो में पिताजी के साथ सुखद यात्रा की, परन्तु उन्होंने लोटते समय लिफ्ट का प्रयोग करने से मना कर दिया क्योकि दस ग्यारह वृद्ध लोगों से साथ गाँधी नगर से देर सारा सामान लेकर आये दो तीन लोग उनसे आगे पंक्ति में खड़े थे|

मुझे लगता है कि पूरी दिल्ली में दिल्ली मेट्रो उन कुछ स्थानों में से एक है जहाँ लोग सबसे अधिक अनुशासित नजर आते है| परन्तु लोगों के स्तर पर अभी काफी कुछ किया जाना शेष है|

मेरा दिल्ली मेट्रो से यह अनुरोध रहेगा कि अधिक भीड़ वाली जगह, विशेषकर कश्मीरी गेट स्टेशन पर लिफ्ट के बाहर सहायकों की नियुक्ति की जाये जो वृद्ध और विकलांग लोगों की सहायता करें और अवांछित लोगों को लिफ्ट के दुष्प्रयोग से रोकें| कश्मीरी गेट स्टेशन पर ऐसा करने की जरूरत इसलिए भी है क्योकि इस स्थान पर ही लोंगो, विशेषकर वृद्धों को लिफ्ट की सर्वाधिक आवश्यकता है|