प्रधानमंत्री!!

 

भारतीय हिंदी समाचार चेनल पर प्रसारित किया जा रहीं नायब वृत्तचित्र श्रंखला| विश्व के श्रेष्ठ निर्देशक श्री शेखर कपूर इसके प्रस्तुतकर्ता हैं|

२३ किस्तों में प्रसारित होने वाली इस श्रृंखला की छह क़िस्त हम देख चुके हैं|

किस तरह आजादी के समय देश में ५६५ स्वशासित रजवाड़ों को भारत या पकिस्तान में मिला कर ५६६ राजनैतिक इकाइयों को जोड़ कर दो इकाइयों में तब्दील किया गया| किस तरह धर्म नहीं वरन राजनीति देश का बंटवारा करा रही थी या कहें कि धर्म द्वारा बांटे जा रहे देश को राजनीति मिला रही थी| अलग ही कथा है| सयुंक्त भारत उस दिन से पहले एक विचार था जिसको अब तक का सबसे बड़ा अमली जमा पहनाया गया था| हमने इस कथानक में देखा| हिन्दू जोधपुर पाकिस्तान में जा सकता था, क्या विचित्र राजनीति थी| बहुत सी सच्चाइयाँ आज कोई दुहराना नहीं चाहता| जोधपुर, जूनागढ़, हैदराबाद, कश्मीर केवल कथा नहीं है देश का वो बंटा हुआ चरित्र है, जो आज भी भारत को अपने मानसिक पटल पर, बिहारी, मराठी या फिर हिन्दू मुस्लिम या ब्राह्मण- वैश्य के बाद रखता है|

एक ओर देश को जोड़ा जा रहा था| दूसरी तरफ अलग अलग राज्यों की मांग उठ रही थी| निश्चित ही भारतीय संस्कृति, बहुत सारी संस्कृतियों का संगम है और हर संस्कृति को अपनी अलग पहचान मिलनी चाहिए| मगर यह भी सच है कि हर घर परिवार की अपनी अलग संस्कृति, सांस्कृतिक पहचान होती है| कितने राज्य, किस पैमाने पर|

प्रश्न अनेक थे और हैं| हिन्दू कोड बिल!! उस समय उसका हिन्दू समाज में बड़ा विरोध हुआ, आज देश में हिन्दू समाज उन बातों पर गर्व करता है जिनका उस समय विरोध हुआ था| उदहारण के लिए, एकल विवाह.. आज हिन्दू मुस्लिम कानून में चार विवाहों की मान्यता मात्र का विरोध करते है और मजाक उड़ाते हैं| मेरे मन में कई बार प्रश्न उठता है, क्या सब के लिए समान संहिता न लाकर देश में मुस्लिम और अन्य तबकों को विकास के क्रम में पीछे नहीं छोड़ दिया गया है?

भारत चीन युद्ध भी ऐसी ही एक कथा है| भारतीय राजनीति, कूटनीति और युद्ध नीति की पहली बड़ी परीक्षा| नवविकसित देश गलती से ही सीखता है; हमने सीखा जरूर मगर क्या आज हम अपने बड़े हो जाने के गरूर में कुछ भुला तो नहीं रहे है|

कस कर बुनी हुई कहानी, संजीदगी से किया गया प्रस्तुतीकरण, आवश्वकता के अनुरूप नाट्य रूपांतरण प्रधानमंत्री की सबसे बड़ी सफलता है| शेखर कपूर अपने हर शब्द से न्याय करते दिखाई देते हैं|

 

यह केवल भारत के सामाजिक इतिहास की गाथा नहीं है, देश के आगे बढ़ने की उधेड़बुन है|

मिटी न मन की खार – (कुण्डलिया)

 

एक शहीद पैदा किये,

एक दुश्मन दिए मार|

दंगम दंगम बहुत हुई,

मिटी न मन की खार|| दोहा १||

 

मिटी न मन की खार,

दर्पण भी दुश्मन भावे|

दर्प दंभ की पीर,

अहिंसा किसे सुहावे|| रोला||

 

दुनिया दीन सब राखे,

सब झगड़ा व्यापार|

मार काट बहुत बिताई,

अमन के दिन चार|| दोहा २||

 

उपरोक्त कुण्डलिया छंद की रचना के कुछ छिपे हुए उद्देश्य हैं| उन्हें जानने के लिए इसके छंद नियमावली पर एक निगाह डालनी होगी|

दोहा + रोला + दोहा = कुण्डलिया|

ये रचना प्रक्रिया रसोई घर में सेंडविच बनाने की प्रक्रिया से बिलकुल मिलती जुलती है|

यह रचना समर्पित है कश्मीर के लिए| कश्मीर जो आज कुण्डलिया बन गया है; भारत पाकिस्तान के बीच, भारत की सत्ता और विपक्ष के बीच, पकिस्तान के सत्ता विपक्ष के बीच, हिन्दू और मुसलमान के बीच, हमारी खून की प्यास के बीच| कुण्डलिया की एक और खासियत है, पहले दोहे का अंतिम चरण, रोले का पहला चरण होता है| यहाँ पर मैं इसे आज के सन्दर्भ में घिसे पिटे तर्क – कुतर्क के बार बार दोहराव के रूम में देखता हूँ| अगली विशेष बात जो ध्यान देने योग्य है, वह है कुण्डलिया का पहला और अंतिम शब्द एक ही होता है| जैसे जीवन में बातचीत में ही झगडे शुरू होते है और घूम फिर कर बात चीत से ही समाप्त करने पड़ते हैं|

एक दूसरा कारण इस कुण्डलिया को लिखने का और भी रहा है| अफजल गुरु की फांसी| कई खबरें आतीं हैं, जिनसे लगता है कि उसे पूरी तरह न्याय नहीं मिला और देश की जनता के आक्रोश को शांत करने और असली दोषियों तक न पहुँच पाने के सत्ताधारियों की निराशा ने उसे येन केन प्रकारेण दोषी ठहरा दिया| साथ ही मैं किसी भी दशा में फांसी की सजा को न्याय के विरुद्ध मानता हूँ| फांसी दोषी को मार तो देती है पर न तो उसे पूरी सजा देती है, न पीड़ित को पूरा न्याय| युद्ध, छद्म युद्ध, गृह युद्ध, महा युद्ध आदि के मामलों में तो यह दुसरे पक्ष के लिए शहादत का उदाहरण तक बना देती है| यह कुण्डलिया इसी प्रसंग में लिखा गया है|