अनुच्छेद ३७० और आतंकवाद

कानून का कोई भी विद्यार्थी यह मानेगा कि भारतीय संविधान के बारे में आपको कुछ पता हो या न पता को मूल अधिकारों के बारे में पता होना चाहिए| परन्तु मूल अधिकारों के बारे में जानने वाले भारतीय अनुच्छेद ३७० को जानने वाले भारतियों से कम होंगे| मामला वाही है कि अपने सुख दुःख से अधिक इंसान दूसरे के संभावित सुखों से परेशान रहता है|

इन दिनों जब भी अनुच्छेद ३७० की बात आती है, इसे किसी न किसी रूप में आतंकवाद से जोड़ दिया जाता है| अज्ञान या अतार्किकता यह है कि ऐसा प्रचारित होता रहा है कि इसका लाभ मात्र राज्य के एक प्रखंड में रहने वाले एक धार्मिक समुदाय को मिला है| मैं नहीं जानता की आखिर उस प्रखंड के अन्य वर्ग और अन्य प्रखंड के निवासी इसका लाभ क्यों नहीं ले सकते| इस से

मजे की बात यह है कि जिस जम्मू कश्मीर राज्य से यह अनुच्छेद जुड़ा हुआ है, वह इस प्रकार के विशेष प्रावधान वाला अकेला राज्य नहीं है| कई अन्य राज्यों को भी अन्य अनुच्छेदों के अंतर्गत विशेष अधिकार मिले हुए हैं|

अब अगर हम आतंकवाद के मुद्दे पर बात करें तो भारत में बहुत से राज्य किसी न किसी प्रकार के आतंकवाद से जूझ रहे हैं| मध्य और पूर्वी भारत में नक्सलवाद है| उत्तरपूर्व में भी अलग अलग प्रकार से आतंकवाद मौजूद है| परन्तु कश्मीर और पंजाब के आतंकवाद की गूँज दिल्ली में सबसे सुनाई देती है| जी हाँ पंजाब में आज आतकवाद नहीं है| इस राज्य को कोई संवैधानिक विशेष अधिकार नहीं था| राज्य भले ही तकनीकि रूप से अल्पसंख्यक धार्मिक समूह से सम्बन्ध रखता हो परन्तु उन्हें बहुसंख्यक भारतीय आज अपनेपन से देखते हैं|

कश्मीर और पंजाब के आतंकवाद की समानता देखते हैं –

  • भारत पाकिस्तान सीमा
  • सीमावर्ती राज्य
  • धार्मिक अल्पसंख्यक
  • विदेशी धन
  • पाकिस्तानी समर्थन
  • मूल रूप से प्राकृतिक संसाधन में धनी क्षेत्र
  • प्रारंभिक दिनों में केंद्र में कांग्रेस का शासन
  • सरकार की राजनीतिक और कूटनीतिक गलतियाँ
  • हिन्दूवादी/ राष्ट्रवादी राजनीतिक दलों के अलगाववादियों से बनते बिगड़ते लुकाछिपी सम्बन्ध
  • स्थानीय असंतोष
  • आतंकवाद को प्रारंभिक तौर पर स्थानीय समर्थन
  • स्वतंत्र देश की मांग
  • अनियंत्रित पुलिस/सेन्य कार्यवाहियां
  • हर किसी अपराधी को आतंकवादी घोषित करने की पुलिसिया प्रवृत्ति
  • निर्दोष और आम नागरिकों पर दोनों और से निशाना
  • मानव अधिकार उलंघन

दोनों आतंकवाद का एक जैसा गठन साफ़ दिखाई देता है| जबकि पंजाब कोई विशेष दर्जा प्राप्त नहीं था जबकि जम्मू कश्मीर को खास संविधानिक दर्जा प्राप्त है| इसलिए अनुच्छेद ३७० को जम्मू कश्मीर आतंकवाद के लिए दोषी नहीं माना जाना चाहिए| अनुच्छेद ३७० को हटाना केवल आतंकवादियों के हित में काम करेगा कि भारत अपने संविधानिक वचन का पालन करने से पीछे हट रहा है|

हमें समस्या के राजनीतिक हल के लिए प्रयास किये जाने चाहिए| ऐरे गैरे अपराधियों को आतंकवादी कहने के स्थान पर उन्हें कानूनी तौर पर सजाएं दी जाएँ| स्थानीय नागरिकों के साथ सकारात्मक सम्बन्ध बनाये जाएँ| इन सुझावों में कुछ नया नहीं है| इन्हें भारत पंजाब, मिजोरम आदि राज्यों में आतंकवाद के विरुद्ध अजमाया जा चुका है|

आतंकित सरकारें

किसी भी देश में आतंकवाद को बढ़ावा तभी मिल सकता है जब उस देश की सरकारें और उन सरकारों को चुनने वाली जनता डरपोक हो| जब भी हम किसी व्यक्ति या संगठन को आतंकवादी कहते हैं वो उसका सीधा अर्थ है कि हम डरे हुए हैं|

डरना उस कायरता का परिचायक है| कोई भी बहादुर देश किसी व्यक्ति या संगठन को अपराधी या अपराधिक संगठन कहे, तो समझ आता हैं| नियम क़ानून तोड़ने वाला व्यक्ति अपराधी है|कोई भी व्यक्ति एक देश काल में अपराध हो सकता है किसी अन्य देश काल में नहीं| उदाहरण के लिए मानहानि पहले बहुत से देशों में अपराध माना जाता था, परन्तु अब अधिकांश देश इस अपराध नहीं मानते|

जब हम किसी व्यक्ति या संगठन के उचित या अनुचित किसी भी कार्य से डरते हैं और उस डर को स्वीकार करते हैं तो उसे आतंकवादी कहते हैं|हम आतंकवाद का अपनी आतंरिक शक्ति में सामना नहीं कर पाते| यही कारण हैं कि सुदूर यूरोप में हुए बम धमाके हमारे “बहादुर” भारतियों को सोशल मीडिया में सक्रिय कर देते हैं| दूसरी ओर हम अपने देश में होने वाले बलात्कार, हत्याओं, रोज रोज की सड़क दुर्घटनाओं और चिकित्सीय लापरवाही से नहीं डरते| हम किसी सड़क दुर्घटना या दंगों में मारे गए 10 लोग नहीं डराते वरन हम सुदूर देश में किसी बम धमाके से डर जाते हैं|हमें गुजरात, राजस्थान या मुंबई में पत्थर फैंकते और बस जलाते उपद्रवी लड़के आतंकवादी नहीं लगते बल्कि कश्मीर में बम फैंकते लड़के हमारी नींद उड़ा देते हैं|हमारा अपना चुना हुआ डर ही हमें अधिक डराता है|

आतंकवाद दरअसल आतंकवादियों से अधिक उन लोगों का हथियार है जो इससे पैदा होने वाले डर से लाभान्वित होते हैं या डरने में जिन्हें प्रसन्नता मिलती हैं| दुनिया के दर्जन भर देश तबाह करने के बाद भी अमेरिका दुनिया का सबसे आतंकित मुल्क हैं – उसकी डरी हुई बहादुरी आतंकवाद के मुकाबले कहीं इंसानों की हर साल जान ले लेती है| कश्मीर में जितने लोग हर साल कुल मिला कर अपराधी और आतंकवादी घटनाओं में मारे जाते हैं कम से कम उतने लोग राजधानी दिल्ली या मुंबई में अपराधी घटनाओं में मारे जाते हैं| मगर हम नहीं डरते|अपराध और अपराधी हमें नहीं डराते| अपराधों से लड़ने वाले पुलिसवालों को उतना बड़ा मैडल नहीं मिलता जितना किसी कथित आतंकवादी से लड़ने वाले पुलिसवाले को मिलता है|

आतंकवाद की एक खास बात है, दुनिया की कोई भी सरकार आतंकवाद के आगे घुटने नहीं टेकती| आतंकवाद से लड़ने की कसमें खाना दुनिया भर की राजनीति में रोजमर्रा का शगल है| मगर छोटे छोटे अपराधियों और गुंडों के समूह के आगे सरकारें जब तब घुटने टेकती रहती हैं| भारत देश में पिछले सौ सालों में बहुत सी किताबें, नाटक और फ़िल्में सिर्फ इसलिए प्रतिबंधित हो गई कि सरकारों को कानून व्यवस्था के लिए ख़तरा लगा| हम सब जानते हैं यह ख़तरा उन किताबों, नाटकों और फिल्मों से नहीं बल्कि उनका कथित तौर पर विरोध करने वालों से था| सरकारें उनसे लड़ने में असमर्थ थीं और इतनी डरी हुयीं थी कि उन्हें आतंकवादी या अपराधी कहने का भी साहस न जुटा सकीं| उनसे लड़ने की बात तो दूर की बात है, पिछले सौ सालों में बहुत से हलफनामे सरकारों ने अदालत में दिए हैं कि किताबें, नाटक या फ़िल्में क़ानून व्यवस्था बिगाड़ देंगी – मतलब इतना बिगाड़ देंगी कि सरकार संभाल न पायेगी|

उफ़!! पिछले सौ साल में कोई सरकार हलफनामों में यह न कहने की हिम्मत भी न जुटा सकी कि वो जिनसे डरी हुई है वो किताब, नाटक या फिल्म नहीं गुण्डा तत्व हैं|

 

 

 

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अल्प–सफल पठानकोट बचाव

किसी भी हमले या आतंकवादी हमले की स्तिथि में सुरक्षा बलों को, गुप्तचरों और उनके मार्फ़त सरकार बहादुरों को ही यह पता होता है कि इस हमले की आक्रमकता को देखते हुए सफलता का मापदंड क्या होना चाहिए|

पठानकोट बचाव में सबसे बड़ी असफलता यह है कि न सिर्फ “सफल लक्ष्य” को पहले से ही जान –पहचान लिया गया बल्कि उसके पूरा होते ही “पीठ ठोंको – शाबासी दो” अभियान भी शुरू हो गया| लेकिन यही पठानकोट बचाव की असफलता है क्योंकि सरकार बहादुरों के बधाई संदेशों के बाद हमला जारी था और दुनिया में सरकार बहादुरों और भारत का मखौल बन रहा था|

कारण बहुत सीधा सरल है; हमने सरकार बहादुर ने अपने सामने पूर्ण आत्म- विश्वास के साथ बेहद सुस्पष्ट लक्ष्य निर्धारित किया और उसमें किसी प्रकार के परिस्तिथि जन्य बदलाव की कल्पना या आशंका भी नहीं की| सरकार बहादुर ने यह माना कि सबकुछ किसी लोकप्रिय विडियो गेम की तरह से चलेगा और काम ख़त्म| सरकार बहादुरों ने इस पूर्वनिर्धारित लक्ष्य को प्राप्त करने के बाद यह समय लगाने की भी जरूरत नहीं समझी कि जमीनी हकीकत को एक बार जाँच लिया जाये| यदि यह किया गया होता तो कम से कम अति-उत्साह से बचा जाता और आलोचना से भी|

सबसे पहले यह बात सुस्पष्ट होनी चाहिए कि गुप्तचर सूचना का बहुत पुख्ता होना, जैसा कुछ नहीं होता और आप वास्तविक घटनाक्रम की कोई पटकथा पूर्णतः पूर्व निर्धारित नहीं कर सकते| दूसरा आपको पटकथा के अनुसार सब कुछ या बहुत कुछ चलने पर भी, दो – तीन बार जमीनी हकीकत मालूम करनी चाहिए|

जनसामान्य और सामान्य सैनिक को हमेशा सरल गणित आता है, हमलावरों के मुकाबले बचावदल में जान की हानि कम होनी चाहिए| यह सरल गणित सैन्य और जन मनोविज्ञान का मूल है| कम से कम नुकसान के साथ लक्ष्य प्राप्त करने का और उसके लिए योजना बनाने काम सैन्य – असैन्य नेतृत्व का है, सैनिक का नहीं| अगर इसमें सफलता नहीं मिलती तो यह एक असफलता है|

इस बात को सफलता के तौर पर प्रस्तुत करने क प्रयास हो रहा है कि वहां पठानकोट एयरबेस में मौजूद परिवारों या जहाजों को नुक्सान नहीं हुआ| इस पैमाने पर सफलता और असफलता नहीं आकीं जा सकती| यदि इस प्रकार का नुकसान किसी पूर्व चेतावनी या सूचना के बिना होता है तो उसे असफलता नहीं कहा जा सकता और साथ ही यदि यह नुकसान पूर्व सूचना के बाद भी होता है तो यह असफलता नहीं होती, शर्मनाक होता| क्योंकि पठानकोट हमले की पूर्व सूचना थी, तो इस बात को सफलता के और पर नहीं, संतोष के तौर पर देखा जा सकता है|

यह बात भी ध्यान रखनी चाहिए कि किसी भी आत्मघाती आतंकवादी हमले में आतंकवादियों की असफलता नगण्य नहीं होती| उनका लक्ष्य मात्र अपने शिकार को अपने में उलझाना, उसका जितना हो सके नुक्सान करना और मर जाना होता है| अगर हम, आतकवादियों, उनके सहयोगियों और परिवारों के विचारों को समझे तो आत्मघाती आतंकवादी हमलावर की असफलता मात्र उसका जिन्दा पकड़ा जाना और अंतिम असफलता उसका हृदय परिवर्तन होना ही है|

आयें, भविष्य के लिए कुछ सीखें और कुछ पुख्ता योजनायें बनायें|

अनगढ़ दाढ़ी और भेदभावी पूर्वधारणाएँ

1इतनी बुरी तरह से जन मानस में घर कर चुकीं हैं कि जब तक खुद उसका शिकार नहीं होते, हमें इस भेदभाव का बोध नहीं होता|

अभी हाल में मैंने अपने शौक के लिए दाढ़ी बढ़ाने का निर्णय लिया| अब मेरी नई नवेली अनगढ़ दाढ़ी को भी बन ने संवरने की जरूरत होती है| इस से पहले कि कैंची अपना काम करती, मैंने सोशल मीडिया 2पर एक फोटो डाल दिया| उस पर आई टिप्पणियाँ हमारे समाज के पूर्वधारणाएं खुलकर सामने रखतीं हैं|

इन टिप्पणियों की मानें तो अनगढ़ दाढ़ी में आप खतरनाक अपराधी, गैंगस्टर, आतंकवादी, जिहादी, मुस्लिम, सिख, या फिर घने – बुद्धिजीवी ही हो सकते हैं|

मुझे यह मानने में दिक्कत नहीं हैं की अनगढ़ दाढ़ी बदसूरत लग सकती है| परन्तु क्या अनगढ़ दाढ़ी को अपराध या धर्म से जोड़ा जाना उचित है?