शिब्बो की कचौड़ी, अलीगढ़

शिब्बो ने आठ साल की उम्र में सन 1951 में कचौड़ी बेचना शुरू किया – आज से छियासठ साल पहले| उनके बेटे ने रणजी खेला, उनका पौत्र ऑफलाइन-ऑनलाइन कचौड़ी बेचता है| दुकान का नाम जय शिव कचौड़ी भण्डार और वेबसाइट का नाम शिब्बोजी है| होते रहिये| हम अलीगढ़ वालों के लिए वो शिब्बो और उनकी दुकान की गद्दी पर बैठने वाला हर व्यक्ति शिब्बो|

शिब्बो – अलीगढ़ी कचौड़ी की पहचान है| अलीगढ़ी कचौड़ी आम कचौड़ी की तरह मुलायम और फूली हुई नहीं होती, वरन कड़क, भुरभुरी और चपटी होती हैं| अधिकतर इनके गोलाकार में भी कमी निकाली जा सकती है| अलीगढ़ वाले इतने सख्त आटे से कचौड़ी बनाते हैं कि इसका गोल होना मुश्किल और कटा-फटा होना आसान है| कचौड़ी के अन्दर कचौड़ी का मसाला इतना कम कि कई बार मालूम भी नहीं पड़ता| अलीगढ़ में अधिकतर कचौड़ी वाले आटे में ही मसाला मिला देते हैं| लेकिन शिब्बो का अपना अलग मानक है| आम अलीगढ़ी कचौड़ी से यह थोड़ा अलग और बेहतरीन है|

शिब्बो की कचौड़ी की महत्वपूर्ण बात है – देशी घी, कड़क कचौड़ी की भुरभुरी पपड़ी और चपटापन|

आम अलीगढ़ी कचौड़ी की तरह शिब्बो की कचौड़ी भी आलू की मसालेदार सब्जी के साथ मिलती है| लोहे की कढ़ाही में हींग और तेज गरम मसाले में बनी सब्जी अपनी श्यामल रंगत और तीखे स्वाद से अलग पहचान रखती है| इसे हम कचौड़ी वाली सब्जी कहते हैं| यह सब्जी आम आलू सब्जी की तरह पतली या रसेदार नहीं होती| यह काफी गाढ़ी होती है| कई बार लोग इसमें रस बनाने के लिए सन्नाटा (अलीगढ़ी रायता) मिलाते हैं| सब्जी और सन्नाटे के मिश्रण स्वाद को और अलग ऊँचाई पर पहुंचा देता है| सभी बड़ी कचौड़ी वालों की तरह शिब्बो के यहाँ भी हल्के और तेज मसाले की सब्जी मौजूद है| हल्के मसाले का अर्थ यह नहीं की सब्जी पूरी तरह हल्की हो जाए| भाई अपनी मसालेदार इज्जत का ध्यान पूरा रखा जाता है|

कचौड़ी- सब्जी के साथ में है – सन्नाटा| सन्नाटा – यानि बहुत खट्टे दही का पतला रायता| इसकी शोभा है पीला मिर्च| यदाकदा बूंदी भी मिलाई जाती है| जितना ज्यादा खट्टा दही और जितना ज्यादा पतला सन्नाटा हो, उतना ही स्वाद आता है| बेहतरीन रायते को पीकर आपके कान भले ही लाल पीले हों, मगर हम इसे सुपाच्य मानते हैं| और मिर्च को छोड़ दें तो यह है भी सुपाच्य, मगर मिर्च न होने पर दही के बर्तन की इस धोवन को कौन पीना चाहेगा?

अलीगढ़ी कचौड़ी अलीगढ़ में हर मोड़ पर मिल जाती है| मगर शिब्बो की बात अलग है| शिब्बो की दुकान अब पहले से ज्यादा बड़ी हो गई है| बैठकर खाने का प्रबंध हुआ है| पूड़ी सब्जी, लड्डू, हलवा और जलेबी भी बेहद स्वादिष्ट मिलती है|

स्थान: शिब्बो की कचौड़ी, जय शिव कचौड़ी भण्डार, बड़ा बाजार, अलीगढ़

भोजन: शाकाहारी

खास: अलीगढ़ी कचौड़ी, आलू सब्जी, सन्नाटा, जलेबी,

पांच: साढ़े चार

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मणिराम हरिराम का चीला

जब भी अलीगढ़ जाना होता है तो ट्रेन से उतरने के बाद चीला खाना मेरा पसंदीदा शगल है| बचपन में चीला मेरे लिए अचरज था, क्योंकि मेरे सभी साथी अंडे वाला चीला पसंद करते थे, बल्कि कहें तो उसके दीवाने थे| घर पर माँ बेसन के चीले बनती थी जो इतने शानदार नहीं लगते थे कि उनके लिए दीवाना हुआ जाये| बाद में जब “स्ट्रीट फ़ूड” के लिए स्वाद विकसित हुआ तो उसे समझने के दौरान बेसन, मूंग दाल और अंडे का चीला और उनका अंतर समझ में आया|

बहुत से लोग चीले को उत्तर भारत का डोसा मानते हैं| मगर चीला चटनी के साथ खाने की चीज है| बेसन (साथ में कभी कभी रवा/सूजी भी) का चीला खाने में पतला मगर पेट में थोड़ा भारी होता है| अंडे का चीला मूल रूप से मूंग दाल का ही चीला है, मगर उसमें अंडा फैंट कर डाला जाता है|

अलीगढ़ में बेसन और अंडे के चीले में कटा हुआ उबला आलू, प्याज आदि भरकर थोड़ा सेका जाता है और बाद में इस तरह ग्यारह बारह टुकड़े कर दिए जाते हैं, जैसे भुर्जी बनाना चाह रहे हों| यह चीला सिकते समय देखने वाले को मसाला डोसा लगता है तो परोसे जाते समय आलू चाट जैसा| इसके उप्पर चटनी डालकर चम्मच से खाते हैं| (वैसे कुछ अलीगढ़ी लोग आमलेट चीले की भी मांग करते हैं)

मूंग की दाल का चीला, चीलों की दुनिया का बादशाह है| मूंग की दाल के चीलों में भी मुझे पहले अलीगढ़ में राजू का चीला पसंद था तो आज मनीराम – हरीराम का चीला|

सुदामापुरी क्रासिंग (अब सुदामापुरी पुल के नीचे) दो भाई अपनी अपनी ठेलों के एक साथ मिलकर खड़ी करते हैं, जिससे भाइयों का प्यार दीखता है| पहली ठेल पर मूंग दाल और दूसरी ठेल पर अंडे का चीला|

मेरी पसंद मूंग दाल का चीला|

आज अंडे का चीला बनाने वाला भाई बीमार है, मेरी दो मूंग दाल चीले की इच्छा रखी है| खुराक से हिसाब से दो चीले पांच रोटी के बराबर का मामला है| पांच चीले पहले हैं – मुझे बताया जाता है| मुझे छटवां और नवां चीला दिया जायेगा| अब हम गप्पे मारेंगे या बीस मिनिट टहल सकते हैं|

पीसी हुई मूंग की दाल को कटोरी भरकर लिया जाता है| और तवे पर फुर्ती से फैलाया जाता है, डोसे की तरह पतला नहीं करते, थोड़ा मोटा रहता है| बात चलती है, चीले को फ़ैलाने का समय और चक्कर दोनों एकदम पक्के हैं, कम या ज्यादा में वो मजा नहीं रहता| जो लोग फ़ैलाने को आसान बनाने के लिए दाल में पानी डालते हैं, वो अपने चीले और यश दोनों में पानी डाल लेते हैं|

जिस समय यह सिक रहा होता है, उसी समय इस पर अदरक, प्याज, मिर्च लगा कर हाथ से थपथपा और दुलार देते हैं| इसके बाद सीधे इसके ऊपर ही पनीर को कद्दूकस कर कर उसकी परत बनाते हैं| पहले से पनीर को घिसकर नहीं रखा जाता| इससे एक समान पर्त बनती है| वह इस को फिर से हाथ से थपथाकर दुलार देता है| यही दुलार तो चीले में जान डालता है| इसके बाद ५० ग्राम मक्कन की टिकिया सिकते हुए चीले के नीचे सरकी जाती है|

दो मिनिट के बाद चीला थोड़ी देर के लिए पलट दिया जाता है| यह भूख को जगा लेने का समय है| चीले के ठीक आठ बराबर हिस्से होते हैं, जी हैं पूरे सात कट| चीला आपकी थाली में परोसा जाता है| आपके सामने खट्टी (हरी) और मीठी (सौंठ) चटनी हैं|

मगर मैं पुराना ग्राहक हूँ| मैं शिकायत करता हूँ| अगर चटनी ग्राहक को अपने हाथ से लेनी पड़े तो वो प्यार मोहब्बत वाला स्वाद नहीं आता|

खाने की हर चीज कला और विज्ञान से भले ही बनती हो, जबतक दुलार न हो वो खाना बन सकती है, स्वाद नहीं| बेसन और अंडे के चीले अगर चम्मच से चाट की तरह खाए जाते हैं तो मूंग दाल चीला हाथ से खाने में स्वाद देता हैं| अगर मूंग दाल चीले के आठ की जगह बारह हिस्से हो तो बेहतर हो, मगर कहीं स्वाद न बदल जाए|

और इस प्यार और दुलार भरे एक चीले का मूल्य 60 रुपये| समय शाम दिन छिपने के बाद| अलीगढ़ की सुदामापुरी रेलवे फाटक (अब पुल)|

पुनः – किसी ज़माने में सुदामापुरी फाटक को खूनी फाटक कहते थे, मगर अब कुछ साल से पुल बन गया है|

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सभी छायाचित्र: ऐश्वर्य मोहन गहराना

मोबाइल की वापसी

परसों मेरे पिताजी का मोबाइल कहीं खो गया| वो अलीगढ़ नुमायश से लौटते हुए खुश थे और वह खुश हम लोगों को फ़ोन पर बाँटना चाहते थे| जब पड़ोसियों ने फ़ोन कर कर मुझे बताया तो मैंने मोबाइल कंपनी को फ़ोन कर कर उनके नंबर से आउटगोइंग बंद करा दी| पिताजी ने किसी भी असुविधा से बचने के लिए घर के पास के थाने में भी सूचना दे दी| मगर पुलिस को सुचना तो दर्ज नहीं करनी थी तो नहीं की, अलबत्ता एक प्रति पर मोहर लगा कर वापिस जरूर दे दी|

बच्चों से दूर घर में अकेले रहने वाले बूढ़े व्यक्ति के लिए मोबाइल खो जाना अपंग होने जैसा ही है| अब दिल्ली से ही उनके लिए दूसरे सिम का भी इंतजाम करना था और फ़ोन का भी| अलीगढ़ में कूरियर कंपनी के ख़राब रिकॉर्ड के कारण में ऑनलाइन खरीद भी नहीं करना चाहता था|

जब मैं शाम को मोबाइल हैंडसेट पर विशेषज्ञता रखने वाली एक पत्रिका के पन्ने पलट रहा था तो अचानक मेरे मोबाइल पर एक सन्देश आया| यह किसी अनजान मोबाइल से आया था मगर उसके नीचे एक आईएम्आईई नंबर दिया हुआ था| पहले तो मुझे सन्देश समझ नहीं आया, मगर थोड़ी देर बाद मैंने सन्देश भेजने वाले नंबर पर फ़ोन किया| यह सन्देश “सिम चेंज अलर्ट” था, जिसे कई साल पहले मैंने इस मोबाइल में चालू किया था|

साधारण शिष्टाचार के बाद मैंने पूछा, भाई फ़ोन कहाँ से चुरा कर लाये हो? वो हकलाने लगा और फ़ोन काट दिया| मैंने दोबारा फ़ोन किया तो उसने बोला, सड़क पर पड़ा मिला है, मैं वापिस कर दूंगा| मैंने उसे अपने घर के पास की एक जगह पहुँचने के लिए बोला|

एक घंटे बाद भी जब कोई नहीं पहुंचा, तो मैंने दोबारा फ़ोन किया| इस बार उसने कहा वो सड़क पर जिस जगह फ़ोन मिला था वहां रख देगा, आप उठवा लो| मैंने उसे समझाया कि वो फंस गया है और अगर फ़ोन वापिस कर देता है तो पुलिस नहीं भेजी जाएगी| उसने फ़ोन काट दिया| उधर अलीगढ़ में पूरा मोहल्ला इकठ्ठा होकर मोबाइल वापिसी का चमत्कार देखने के लिए बैठा था और मुझे दिल्ली से लाइव कमेन्ट्री देनी पड़ रही थी| मैंने सबको अपने अपने घर जाने के लिए कहा क्योंकि मोबाइल की वापसी का कोई पक्का समय मुझे नहीं मालूम था|

देर रात, अचानक मेरा मोबाइल फिर बजा| यह उसी नंबर से फ़ोन था| “मैं आपके बताये स्थान पर खड़ा हूँ, मुझे किधर पहुंचना है?” मैं उसे पड़ोस के एक घर का पता बताया| क्योंकि पापा के पास फ़ोन नहीं था, मैंने पड़ोस में एक दुसरे घर में फ़ोन किया| मैं किसे अकेले को मोबाइल चोर गिरोह से सामना करने नहीं छोड़ सकता था|

पांच मिनिट में मोबाइल पड़ोसियों के पास था| उसने बताया, आपका सिम मैंने पहले फैंक दिया था मगर अब ढूंड कर वापिस लगा दिया है|

अगले दिन पुलिस को मोबाइल मिलने की सूचना दी गई मगर उन्हें इसकी भी कोई ख़ुशी नहीं हुई| मगर पिताजी में कह कर एक प्रति पर मोहर लगवा ली| मैंने भी उसमें आउटगोइंग वापिस चालू करवा दी|

एक छोटी से सुविधा आपको खुश कर सकती है|

ढांचा पढ़िए!!

 

अलीगढ़ शहर का विष्णुपुरी और सुरेन्द्र नगर इलाका; जून १९८२ या जून १९८३; शाम के चार या पांच बजे हैं|

बिजली अगर आती भी तो रेडियो और पंखे चलते हैं; कूलर, एयर कंडीशनर, फ्रिज, टेलीविजन, नहीं| बिजली का पंखा ज्यादातर चलता नहीं और हाथ का पंखा जब तक है जान कि तर्ज पर झला जाता है, वरना गर्मी झेल ही ली जाती है| ज्यादा गर्मी होने पर सरकार को नहीं कोसा जाता, बल्कि भगवान् से दया मांगी जाती है; खुद को कोसा जाता है, पाप शांत कराये जाते हैं| सुबह सत्यनारायण की कथा, उसके बाद मोहल्ले का स्त्री –  सम्मलेन, और बाद में मोहल्ले का एक ही समय पर सामूहिक शयन| जागने के लिए किसी घड़ी की जरूरत नहीं है, न ही किसी अलार्म की| प्राग ऑइल मिल का सायरन समय बताता है| भले ही इस इलाके में कोई मिल में काम नहीं करता मगर इस इलाके पर प्राग ऑइल मिल का नहीं तो उसके सायरन की हुकूमत चलती है| गर्मी के इस हुकूमत की ताकत बहुत बढ़ जाती है| क्योंकि इस मिल में एक बर्फखाना भी तो है, जहाँ बर्फ की बड़ी बड़ी सिल्लियाँ बनती है और पैसे वाले लोग खरीदने के लिए इंतजार करते हैं|

दोपहर के साढ़े तीन बजे सायरन बजता है, आलस दम तोड़ता है, गर्मी में सुस्ताये घर जगने लगते हैं| लगता है दिन दोबारा निकल आया है| बच्चे बहुत जल्दी में हैं, माएं उनको काबू में रखने की मशक्कत में परेशान हैं| उसके बाद स्वर्ग का आनंद; सत्तू, फालसे, खरबूज, तरबूज, कुल्फी या सॉफ्टी, जलजीरा, लस्सी, मट्ठा, छाछ, और कई तरह के शर्बत| शर्बत; बेल, बादाम, सौफ, फालसे, और बाजार का रसना| विविध भारती पर गाने सुनते हुए, मजा दोगुना हो जाता है| स्वाद ले लेकर पिया जा रहा है, जन्नत को जिया जा रहा है| वक़्त की कमी नहीं है; मगर जीभ बहुत छोटी है, जितना देर इस पर स्वाद बना रहे, यह खुश रहेगी; वर्ना आने वाले कल तक लपलपाती रहेगी|

और सड़क पर आवाज गूंजती है:

मतलब अब धूप अपने उतार पर है| खेलने का समय है| बच्चे बाहर सड़क पर दौड़ पड़ते हैं| कुछ बड़ी उम्र के बच्चे अखबार वाले की तरफ हाथ बढ़ा देते है और उन्हें एक अखबार मिल जाता है| न पैसा माँगा गया, न दिया गया| एक मुस्कराहट से कीमत वसूल हो गयी है| दिल खुश हो गए हैं| रास्ते में जो भी बच्चा, बूढ़ा, जवान, स्त्री, पुरुष, नपुंसक, हाथ बढ़ा देता है, उसे अखबार मिल जाता है| आखें टकरातीं हैं, मुस्कराहट फ़ैल जाती है| मांगने वाला अपनी हैसियत के हिसाब से मांगता है, देने वाला उम्मीद से देता है| अगर कोई भी लगातार तीसरे दिन अखबार मांगता है तो अखबार वाला साईकिल से उतर जाता है, और घर का पता पूछता है| बिना और कुछ कहे सौदा तय, कल से सुबह घर पर अखबार आएगा| हाँ, वही, अमर उजाला|

एक शाम मैं हाथ बढ़ा देता हूँ, छोटा बच्चा अख़बार मांग रहा है| अखबार वाला साइकिल से उतर जाता है|

अखबार पढ़ोगे| पढ़ना आता है|

हाँ|

पढ़ कर दिखाओ|

मैं धीरे धीरे पढ़ता हूँ| सिर पर हाथ फेरा जाता है| अखबार मिल जाता है| बहुत सारे आशीर्वाद भी|

मैं अगले दिन फिर खड़ा हूँ| अखबार वाला साइकिल से उतर जाता है| कल का अखबार पूरा पढ़ा|

नहीं|

क्या किया|

फोटो देखे और रख दिया|

मेरे हाथ में अखबार का मुखपृष्ठ और सम्पादकीय है| केवल दो कागज| पूरा अखबार क्यूँ नहीं| मैं सोचता हूँ| मगर जितना मिला है, वो भी हाथ से न चला जाये|

कल ये पूरा पढ़ लेना तभी और अखबार मिलेगा| मैं अगले दिन, पूरा पढ़कर फिर खड़ा हूँ| अखबार सुनना पड़ रहा है|

अखबार वाला खुश है| अब हर हफ्ते अखबार मिलेगा| रोज नहीं| किसी भी एक व्यक्ति को लगातार तीन दिन मुफ्त में अखबार दिया जाता|

मुझे पढ़ने की लत लग रही है| गर्मी ख़त्म हो गयीं हैं| मुझे हर हफ्ते अखबार मिलता है| नियम बंध गया है| हफ्ते भर एक अखबार पढ़ो| सुनाओ और नया अखबार पाओ| मगर क्रम ज्यादा दिन नहीं चलता|

पंजाब में किसी को मार दिया गया है| पापा उसका अखबार रोज खरीदना चाहते हैं| वही अखबार वाला| वाही समय| पापा ने अखबार वाले को रोका| रोज का अख़बार तय हो गया| और मेरा हर हफ्ते अखबार मांगना भी|

मगर मुझे हर रोज आवाज सुनाई देती है| एक उम्मीद आवाज दे रही है| शायद कोई नया ग्राहक मिलेगा| कोई नया बंदा चाय पानी पिलाएगा| या नया बच्चा अख़बार मांगेगा| कई साल मैं उस आवाज को सुनता रहा| वो गुमनाम आवाज| आज भी याद है| उस आवाज का चेहरा नहीं है|  कई साल गुजर गए| पता नहीं चला, कब वो आवाज आना बंद हो गया| मगर मेरे कान आज भी पहचान सकते हैं, सुन सकते हैं|

अमर उजाला… ढांचा पढ़िए….||

 

ऐश्वर्य के घर शिशु जन्म

यह दुनिया बहुत बड़ी है| इसमें एक छोटी सी दुनिया है, जिसमें हम रहते हैं| यह दुनिया एक दम अनोखी है: यहाँ बड़े बड़े दर्द और छोटी छोटी खुशियां है, अपनी लहरें, अपना पानी है; वक्त की अपनी रवानी है| हमारी यह छोटी सी दुनिया बड़ी सी दुनिया में जगह जगह फैली हुई है: अलीगढ़, दिल्ली, देहरादून, इलाहाबाद और मुंबई| यह दुनिया रेडियों, टेलिविज़न, मोबाइल फोन, इन्टरनेट, ट्विट्टर, फेसबुक, तक फ़ैल जाती है| यह दुनियां हाथ फैला कर बहुत कुछ अपने में समां लेती है| इस दुनिया में हम रहते है, यह दुनिया हमने बनाई है, इस दुनिया ने हमें बनाया है| यह सूरज, चाँद, सितारों वाली दुनिया है|

इस दुनिया में एक अन्तरंग गहमागहमी है जिस पर किसी भी अखबार की दखल नहीं है; न ही इसकी दरकार है| इस दुनिया में पत्रकार भी हम है और चित्रकार भी| रिपोर्ट भी हमारी है और सटायर भी| हमारी सुरक्षा की जिम्मेदारी भी हमारी ही है|

इस छोटी सी दुनिया में एक नए प्राणी का आगमन है| काफी समय पहले जब मेरी पत्नी ने इस बारे में कुछ महसूस किया तब हम किसे अन्य कार्य में व्यस्त थे और महीने भर तक चिकित्सक से सलाह मशविरा लेने के लिए समय नहीं निकाल पाए| समय बीत रहा था पर जीवन सांस लेने की अनुमति नहीं दे रहा था| तभी अचानक हमें एक शनिवार की शाम बाहर जाना था और दिन में हमारे पास समय था और हमने इस समय का सदुपयोग करने का निर्णय किया| उस दिन दोपहर को चिकित्सक में हमें बधाई दी और कुछ जाँच आदि करने के लिए कहा| इस के बाद सभी व्यस्तता और समस्याओं के बाद भी हम अपने अंदर एक बदलाव महसूस करने लगे| यह एक सुखद अनुभव रहा|

कुछ समय बाद जब हमारी अन्य व्यस्तताएं कम हुई हमने नए प्राणी के बारे में और अधिक सोचने शुरू कर दिया| पत्नी ने गर्भावस्था के बारे में एक पुस्तक पढ़नी प्रारम्भ कर दी तो मैंने इंटेरनेट पर काफी जानकारी इक्कठा की| कई बार ऐसा लगता था कि हमारे अलावा तो कोई और कभी माँ-बाप नहीं बना है| समय के साथ हमारी उन्त्सुक्ता बढ़ रही थी तो पत्नी को कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था, जो कि मानसिक तनाव और शारीरिक समस्याओं को लेकर थी| चिकित्सक इस सब में पैसा बना रहे थे और हम खुश थे| मैंने अपने जीवन का काफी समय चिकित्सालयों के चक्कर काट कर बिताया है पर इस बार हमें इस बात पर कोई दुःख नहीं हो रहा था| हमारी दुनिया में तमाम के बाद भी कुछ था जो नया था और जोश भर रहा था| पत्नी अपने कार्यालय, घर और गर्भवती माँ के रूप में अपनी जिम्मेदारी के बीच संतुलन बैठने में लगभग नाकाम हो रही थी और यही परीक्षा थी| पत्नी को सास का अभाव खाल रहा था|

हमने तय किया कि हमारे शिशु का जन्म उसकी माँ के जन्म स्थान देहरादून में होगा| इसके कई कारण रहे| अब नई समस्याएं थी; कार्यालय से अवकाश, दिवाली और अन्य त्यौहारों का मौसम, देहरादून कि ठण्ड, दिल्ली से देहरादून कि यात्रा, सही चिकित्सक का चुनाव| धीरे धीरे इन सभी को सुलझाया गया| चिकित्सकों ने बताया कि शिशु ने गर्भ में तिर्यक स्थिति अपना ली है और यह स्थिति यदि बनी रहती है तो समस्या हो सकती है|

इस समय हमने एक और निर्णय लिया; बच्चे के स्टेम सेल को परिरक्षित करवाने का| यह निर्णय हमारे पुराने अनुभवों और चिकित्सकीय अनुसंधानों के नए कारनामों का नतीजा था| इस क्षेत्र में कार्यरत कई सेवा प्रदाताओ से बात की और एक का चुनाव कर लिया| इस निर्णय से हमें लगभग एक लाख रुपये का अतिरिक्त खर्च करना था पर भविष्य का डर सदा ही वर्तमान के गणित पर भारी पड़ता है|

पत्नी जी ने 23 अक्टूबर 2011 के लिए देहरादून शताब्दी के एक्स्क्युतिव श्रेणी डिब्बे में अपना आरक्षण करवाने का निर्णय सुनाया| यह एक यादगार यात्रा थी| उस दिन कि विशेष बात थी कि चाय न पीने का दवा रखने वाली पत्नीजी ने कम से कम तीन बड़ा कप चाय पी| दूसरा पहली बार ऐसा हुआ कि गाड़ी किसी स्थान पर पांच मिनिट से अधिक रुकी और मैंने प्लेटफोर्म का दौरा नहीं किया| (देहरादून शताब्दी सहारनपुर पर आधा घंटा रूकती है) इस प्रकार पत्नी जी अपने मायके जा पहुंची|

नए स्थान पर नए चिकित्सकों ने पुनः जांचें की और नए निर्णय दिए| शिशु में अपनी तिर्यक स्थिति को सुधार लिया था पर नै समस्या थी कि अब नाल उसके गले पर लिपटी हुई थी| चिकित्सकों को अब अपने अनुभव और ज्ञान पर कम भरोसा था और वो किसी भी प्रकार का दांव नहीं खेलना चाहते थे| इसमें उनका पैसा भी बनता है और इज्जत जाने का डर भी नहीं होता| उनका कहना था कि शल्य क्रिया होनी चाहिए और हमें उसके लिए समय का निर्णय करना था| इस समय सभी प्रकार की शंका और समाधान सामने थे| पत्नीजी का रक्तचाप इस दौरान महंगाई से तेज बढ़ने लगा| मैंने कई बार अनुभव किया है कि पत्नीजी कठिन समस्याओं का समाधान जल्दी कर लेती है और सरल निर्णय लेने में रक्तचाप बढ़ा लेती है|

अनुभव ने मुझे सिखाया है कि भले आप कोई अंधविश्वास न माने मगर इस भारतीय समाज में उसको अवश्य पूरा करें, वरना समाज आपको जरूर परेशां कर लेगा| इस कारण, गुरुवार नकार दिया गया क्योकि मान्यता के मुताबिक, गुरुवार को किया गया काम दुहराया जाता है और कोई भी बार बार शल्यक्रिया नहीं चाहता है| उसके बाद मूल नक्षत्रों का समय है जो कि शनिवार संध्या काल में समाप्त होता है| इस समय में पैदा हुआ शिशु परिवार के लिए कठनाई का सन्देश लाता है| परन्तु वास्तव में यह हिंदू ब्राह्मणों की आय का एक और स्रोत है| यह मूल दोष, कुछ पूजा पाठ करने के बाद भगवान के इन दूतों (ब्राह्मणों) को खिलाने, पिलाने और दान दक्षिणा देने से दूर हो जाता है| परन्तु यह पूजा – पाठ शिशु की माँ के लिए कष्टकारी समय होता है| अतः अब रविवार का समय तय हुआ है|

रविवार को प्रातः 7 बजे हम चिकित्सालय पहुँच गए और शल्य क्रिया की तैयारी शुरू हो गई| ठीक 8 बजे पत्नी को शल्यकक्ष में ले जाया गया और फिर 9 बजे उपचारिका (नर्स) नन्हे शिशु को लेकर उपस्तिथ हुई; “बेटा आया है|” यह खुशी के क्षण थे| लिखित संदेशों और फोन के जरिये सभी को सूचित किया गया| मैंने लिखा; “हमारे घर बेटा आया है|” लोगों के बधाई सन्देश और फोन आने लगे| एक अजब माहौल था: नन्हा शिशु, बेहोश माँ, उनका बढ़ता रक्तचाप, खुश परिवार, भागते दौड़ते नाना, उछलती कूदती नानी, हँसते-फूलते बुआ, मौसी, मामा, और चिंतित बाबा के बजते फोन, शिशु रुदन, बधाई सन्देश, लंबी फोन वार्ताएँ, दवाएं, मिठाइयां, अजब – गजब होता मैं| नयी मांगें हो रही थी : मित्र-सम्बन्धी लोग फोटो की, शिशु भोजन की, माँ शांति की, परिवार उत्सव की| मेरी छोटी बहन ने शिशु के लिए पुकारू नाम तय कर लिया गया था; “आदि; जो मेरे और पत्नी ले नामों ले प्रथमाक्षर ऐ-दि का परवर्तित हिंदी रूप है|

शाम को पत्नी ने पूरी तरह होश आने पर अपने मित्रों को भी सन्देश दिए| मैंने मित्रों को भेजने के लिए सांयकाल एक फोटो लिया, जिसे अगली प्रातः 5.45 भारतीय मानक समय पर http://twitter.com/AishMGhrana और उसके तुरंत बाद http://www.facebook.com/#!/aishwaryamgahrana?sk=info पर यह चित्र सम्बन्धियों और मित्रों को भेज दिया| अब बधाइयों का नया सिलसिला था|

अगले पांच दिन शिशु चिकित्सालय में इस विश्व को समझने में लगा रहा और हम उसको| नए शिशु को स्वस्थ्य सम्बन्धी छोटी मोटी समस्यायें भी परेशां कर रही थी, इसलिए शिशु चिकित्सा विशेषज्ञ भी बुलाये गए| उसकी पहला रोना, पहली जम्हाई, पहली डकार, सब इंगित किये गए| क्योंकि उसकी माँ दूध नहीं पिला सकती थी तो उसको शिशु आहार दिया गया| उसकी माँ ने उसे मंगलवार को पहली बार दूध पिलाने का प्रयास किया|

शुक्रवार को सभी लोग उसकी नानी के घर पहुँच गए| हिंदू रीति के हिसाब से छठी का कार्यक्रम किया गया| बुआ के द्वारा खरीद्वाए गए कपडे पहनाए गए| शाम को महिला संगीत हुआ|

अब मुझे नन्हे शिशु आदि के साथ एक रात बिता कर दिल्ली वापस लौटना था|

लड़की का घर

अभी हाल में पत्नी जी के साथ उनकी माँ के घर जाने
का मौका मिला| उनका वहाँ पर बेसब्री से इन्तजार हो रहा था| वैसे भी भारतीय
मानसिकता में विवाहित पुत्री बेहद लाडली, प्यारी, स्वागतयोग्य और इष्ट देवी सदृश्य
होती है| जैसे ही हमने घर में प्रवेश किया, पड़ोस से कोई चाची-ताई-बुआ-मामी-मौसी आ
पहुँची; पूछने लगी “ससुराल से आ गईं बिटिया?” पत्नी जी ने हाँ में जबाब दिया पर
मैंने विरोध किया;”ससुराल तो अलीगढ में है ये तो दिल्ली से आयीं है”| इसपर वह
चाची-ताई-बुआ-मामी-मौसी कहने लगीं, “ चलो ठीक है, पति के घर से सही, बेटा अब आराम
कर लो, मायका मायका होता है, मायके जैसा सुख कहीं नहीं”| मैं सोचने लगा, मेरी
बेचारी पत्नी जी का घर कहाँ है? उनके पास, माँ, पति और सास का घर है, अपना नहीं|

क्या भारतीय स्त्री को घर का कोई सुख है या सब
जगह से वह बाहर है|

एक बात और; माँ और सास के पास घर है, नव-विवाहिता
बेचारी… बच्चों की शादी तक.. बेघर हैं|

क्यों?

क्यों??

क्यो???

तब क्या जब एक नौकरी पेशा नव-विवाहिता महानगर में
पति के साथ रहती है और किराए में उसकी आधी भागीदारी है?

क्या इसके लिए क़ानून लाना होगा? क्या इसके लिए
सरकार दोषी है? क्या इसके लिए लड़की दोषी है? क्या पडोसी दोषी है? क्या सास ससुर
दोषी है? क्या माँ-बाप दोषी है? क्या समाज दोषी है?

माँ बाप अपने घर को लड़की का मायका बता कर अपने घर
को बेटे के लिए बचा लेते है|

सास-ससुर अपने घर को इस बाहरी औरत से तब तक के
लिए बचा लेते है, जब तक वो इस घर में पुरानी, विश्वस्त, अपनी और अभिन्न न हो जाए|

मायके और ससुराल से दूर रोजी रोटी की जिद-ओ-जहद वाले
रैन-बसेरे को कोई भी स्वीकारने नहीं देता|

क्या करे?

कोई तो जबाब दे??

कोई तो जिम्मा ले???

दंगानामा

भैया रे, अब तो सुना है कि विलायत के लन्दन शहर में भी दंगा हो गया| चलो जी अब हमारा अलीगढ और लन्दन भाई भाई हो गए इस नाते| चलो पहले अपने दर्द दिखा कर मन हल्का कर ले फिर लन्दन देखेंगे|

बचपन में अगर कोई पूछता कि तुम्हारे अलीगढ में दंगा क्यों होता है, तो मन करता कि पूंछू कि तुम्हारे पेट में मरोड़ क्यों होता है| अगर हम किसी नाते रिश्तेदारी में जाते और बच्चों का हुडदंग होता तो नाक चढ़ा कर कोई न कोई जनानी बोलती, अलीगढ वाले आये है; सबको पता चल रहा है| एटा वाली मौसी के पडोसी बोलते भाई, हमारे यहाँ भी तो मुसलमां उतने ही है जितने अलीगढ़ में; मगर हमारे यहाँ तो दंगा नहीं होता| अब भाई दंगा करने के लिए भी ज़िगर चाहिए होता है, कारण ढूँढना पड़ता है, तमाम बातें होती है| फिर चुनाव वगैरह के समीकरण भी देखने होते है| ऐसा थोड़े है कि मन आया और; अइयो रे और दइयो रे; शुरू धूम-धडाका, फटे पटाखा|

बारह तेरह साल पहले के दंगे को लें, क्या बात थी क्या नजारा था| मैं धर्मसमाज कालिज में पढ़ता था, सकूं भर बसंत बहारी दिन थे| सुबह पढ़ने निकले और अचलताल होकर क्लास रूम पहुँच गए| अभी दस मिनट हुए थे कि बूढ़ा चपरासी भागता आया, प्रिंसिपल साब ने बोला है दंगा हो गया है, पढ़ाई बंद करो, बच्चन को घर भेज दो| अब हमारा सनकी प्रोफेसर, बोला कब हुआ दंगा, अभी दस मिनिट पहले तो घर से आ रहा हूँ, कहीं कोई चर्चा तक नहीं थी| ये साला बूढ़ा सनक गया है| चपरासी अपना सा मुहँ और फटा कलेजा लेकर चला गया| पीछे पीछे लिखित फरमान आ पहुँचा| पता लगा कि आधा घंटा पहले बाहर अचल पर दंगा हुआ है, सराय सुल्तानी पर आगजनी भी हो गयी है| अब मैं सोचूँ, भाई आधा घंटा पहले दंगा हुआ, पन्द्रह मिनिट पहले मैं ठीक अचल पर था, दस मिनिट पहले आगजनी भी हो गयी| चलो खैर, कुछ सोचते विचारते घर को निकल गया| रस्ते में हर किसी को घर लोटने की जल्दी थी, एक दुसरे कि चिंता थी| हिन्दू इलाके के लोग मुसलमान को देख कर जल्दी घर जाने कि सलाह दे रहे थे तो एक नातेरिश्ते ले दुश्मनों से बचकर चलने की सलाह भी मुफ्त दे रहे थे| इन मौको पर रंजिश निकालने का खूब मौक़ा रहता है| घर मेरा लाइन पार दस मिनिट दूर था| बे मौक़ा घर पर देखकर माँ को गुस्सा आया जब बताया कि दंगा है तो उनकी चिंता बढ़ गयी| बोली दौड़ कर बहन को देख ला वो तो कलिज से नहीं लोटी, तब तक मैं सामान कि लिस्ट बना देती हूँ, बाजार से ले आना| मैं उलटे पाँव लौट लिया वापस कॉलिज पहुँचा| वहाँ पर चपरासी ने बोला सब लड़कियों को पिछले दरवाजे से लाइन पार करा दिया है अब तक तो लली घर पहुँच गयी होगीं| लौटे तो रास्ते में फ्लैग मार्च शुरू हो चुका था| आगे आगे एक जीप में कर्फू का एलान हो रहा था और जनता से जल्द घर पहुँच जाने की अपील थी| जनता सुन नहीं रही थी, सबको गल्ला राशन जो खरीदना था| पीछे पुलिस की खाली गाड़ियां थीं और उनके पीछे डरे सिमटे पैदल सिपाही| अलीगढ  पुलिस के इस साहसिक शक्ति प्रदर्शन पर मुझे अंदर ही अंदर हँसी आ रही थी| आखिर ये पुलिस वाले भी तो इंसान ही तो  है| जब घर पंहुचा तब तक बहन घर पर पहुँच गया| तभी माँ ने आकार सामान की लिस्ट पकड़ा दी| अनुभव बताता है कि अगर घर में सामान नहीं रहा तो दंगे बहुत भारी पड़ सकते है| अगर आपके घर में पूरी रसद है तो आप सुरक्षित है|

मुझे विश्वास नहीं हो रहा था कि अलीगढ़ में दंगा हुआ है, मुझे लगता था कि कोई सरकारी मजाक है| मगर शाम को आकाशवाणी, दूरदर्शन और बीबीसी ने भी दंगो की पुष्टी कर दी थी| विदेश के किसी अखबार में लिखा गया कि भारत की राजधानी की नाक के ठीक नीचे गृहयुद्ध की स्थिति बन रही है| खैर, अब यह टीवी पर सिनेमा देखने, सड़क पर क्रिकेट खेलने और मन करने पर पढाई करने का दिन था| इस समय दुनिया की कोई भी ताकत अलीगढ़ में बिजली काटने का आदेश नहीं दे सकती थी| पानी नल से खत्म नहीं होता था| जिन इलाको में पूरा कर्फू था वहाँ पर जरूर बच्चे चोर सिपाही या आई स्पाई का खेल रहे थे जिसमे गलियों में उंघते पुलिसिये वास्तविक सिपाही थे|

 

एक और दंगे की याद है| मैं एक चार्टर्ड अकाउन्टेंट फर्म के साथ काम कर रहा था| हम अपने जिस क्लाइंट के दफ्तर में थे वो मुस्लिम थे और एक को छोड़ कर उनके सारे मुलाजिम भी| दंगे की खबर आते ही उनका हुक्म आया की पास की दूकान से समौसे मांगा कर हम लोग खा पी लें| जैसे पुलिस की गाड़ी आती है वह हमें खुद हमारे मुहल्लों तक छोड़ देंगे| हमारा एक ट्रेनी अलीगढ़ के बाहर का था, बोला कहीं मुसल्ला मार तो नहीं देगा| मैंने कहा, घर बुलाएं मेहमान को कौन मारता है| खैर, जब पुलिस की गाड़ी आयी हम क्लाइंट की गाडी में थे और पुलिस की गाड़ी हमारे आगे आगे| आखिर वो हमें पुलिस के भरोसे नहीं छोड़ सकते थे, क्या पता नेताओं के क्या आदेश हों|

इस तरह अलीगढ़ के दंगे कुछेक मौतों के अलावा आराम से बीत जाते है| मगर देश भर नफरत का गंदा जलील खेल और बढ़ जाता है| लोग अपनी आपसी रंजिश निपटा लेते है, और मरने वाले के घरवाले मुआवजे के लालच में चुप भी रहते है और अगले दंगे का इन्तजार करते है|

अलीगढ़ का आखिरी बुरा दंगा १९९२ वाला था|

(सभी विचार मेरी निजी समझ पर आधारित है, राजनितिक, सरकारी और अन्य निजी विचारों से कतई मेल नहीं खाते|)