विश्व- बंदी ३ अप्रैल


उपशीर्षक – मोमबत्ती 

मुग़ल काल में एक प्रथा थी जो सल्तनत में ज्यादा उत्पात मचाता था उसे जबरन हज पर भेज देते थे| अगर औरंगज़ेब भी जिन्दा होता तो तब्लिग़ वालों को किसी जहाज में चढ़ा कर हज के लिए भेज देता और कहता कि जब मक्का और हज खुलें तब पूरा करकर ही लौटना|

जिन्हें इलाज़ नहीं कराना उनके लिए आम समाज से दूर अलग मरकज़ खोल देने चाहिए| वहीं रहें, अपना बनायें खाएं, मरें या ठीक हो जाएँ| सरकार, चिकित्सकों, समाज सेवियों, मिडिया और गैर मुस्लिमों को उनकी चिंता से अपने आप को अलग कर लेना चाहिए| ईश्वर का दिया कष्ट भोगने से शायद उनके इस जन्म के अलाल्ही कर्त्तव्य और अगर गलती से पिछला जन्म रहा हो तो पिछले जन्म के पाप का प्रायश्चित हो जाएगा| अन्य धर्मों में भी जिन्हें अपने इस या उस जन्म के पाप का प्रायश्चित करना हो उन्हें भी यह सुविधा मिलनी चाहिए| धर्मनिरपेक्षता का अर्थ यही है कि हर किसी को दूसरों को परेशां किए बिना अपनी समझ के अनुसार अपने धर्म का पालन करने की छूट होनी चाहिए|

इधर प्रधानमंत्री जी ने फिर नीरो साम्राज्य के दिनों को याद लिया| अब इटली की तर्ज पर मोमबत्ती जलेगी रविवार को| भारतीय कारण करने के लिए दीपक और लॉक डाउन में कहाँ खरीदने जाओगे इसके लिए मोबाइल की लाइट का विकल्प दिया गया है| मोदी जी का यह घटना प्रबंधन प्रायः चिंतित करता है कि असली समस्या से ध्यान हटाया तो नहीं जा रहा| परन्तु जनता का हौसला बनाये रखना जरूरी है|

 वैसे प्रधानमंत्री ने दूरी बनाए रखने की बात कहकर भक्तों को मूर्खता न करने का सन्देश भी दिया है|

घर को बच्चों को लग रहा है कि दुनिया भर की छुट्टी चल रहीं हैं| वैसे यह भी ठीक है कि अगर घर में दो एक लोग साफ सफाई, रसोई और बच्चे संभाल लें तो बाकि दस लोग घर से आराम से काम कर सकते हैं| दफ्तर, आवागमन, और ऐसे ही तमाम खर्च बच सकते हैं| अर्थव्यवस्था के आंकड़े में जरूर कमी आएगी परन्तु पर्यावरण, सड़कों की भीड़ भाड़ कम हो जाएगी|

शायद प्रकृति हमारे धर्मों और अर्थव्यवस्थाओं को सुधरने का मार्ग स्पष्ट कर रही है|

धर्म की दूकान


हम भारतीय, विशेषकर हमारा हिन्दू समुदाय अंध भक्ति को जिस तरह से नतमस्तक होकर पसंद करता है; मैं हमेशा से उसका कायल रहा हूँ|

हर मंदिर, मठ, आश्रम, गुरूद्वारे, मकबरे, दरगाह, साधू, सन्यासी, पीर फ़क़ीर हर जगह हमारी भीड़ पहुँच जाती है| घर में चाहे दो जून रोटी न जुटती हो, बेटी के लिये दो मुठ्ठी अनाज न हो; मगर दान दक्षिणा के लिए सवा मन चावल तुरंत जुटा लिया जाता है| बहुत से लोग साल भर इसलिए परिश्रम करते हैं कि साल में एक बार गुरूजी के भण्डार भरने जा सकें|

इस देश में हर चोर उचक्का आज धर्म के नाम पर दूकान खोल कर बैठ जाता है और अगर पकड़ा जाता है तो उसके पालतू एजेंट केसरिया झंडा लहरा लहरा कर धर्मनिरपेक्षता और मुस्लिम तुष्टिकरण को कोसने देने लगते हैं| इन दुकानों के बड़े बड़े विज्ञापन अखबार, टेलीविजन और इन्टरनेट पर रोज दिखाई देते हैं| अगर आप इन विज्ञापनों को इन्टरनेट, आगे वितरित नहीं करते हैं तो निश्चित ही आपका बुरा होने की खुली धमकी होती है|

मुझे भी कई बार इस प्रकार की दूकान खोलने ला मौका मिला है, मगर मेरे ईमान ने मुझे ऐसा नहीं करने दिया| एक तो बड़ा ही मजेदार किस्सा है| सुनिए:

बात उन दिनों की है जब मैं सोनीपत रहता था| मैं ट्रेन से अलीगढ़ तक जा रहा था| द्वितीय श्रेणी का डिब्बा था| पास में एक लम्पट गेरुआ वस्त्रधारी माला जाप करते हुए धर्म को बदनाम कर रहा था| दरअसल वह साथ में सामने बैठी एक किशोरी और अन्य महिलाओं को अनावश्यक रूप से “देख” रहा था और सभी लोग उस की हरकत से असहज महसूस कर रहे थे| हद तब हुई जब उसने कोई गीत गाना शुरू किया मगर उसके गा गाकर झूमना गलत लग रहा था| जब उसे मना किया गया तो उसने बढ़ते अधर्म की दुहाई देकर और जोर से गाना शुरू कर दिया और इसबार उसने कुछ इशारे भी करना शुरू कर दिया|

मैं अपनी जगह से उठा और मैंने कहा, बाबा! अगले पंद्रह मिनिट और गा ले| बहुत जरूरत पड़ेगी तुझे| भगवान तेरा दिनरात का भजन सुन कर पाक गए हैं और अब अलीगढ़ पर तेरे पिटाई की व्यवस्था की गयी है| इस पर उन महिलाओं में से एक ने बोला, हम भी साथ में इसकी पिटाई करंगे| बाबा का तुरंत ही भगवान् से विश्वास उठ गया और वो दरवाजे पर अपनी गठरी जमा कर चुपचाप बैठ गया|

मगर अभी तो कुछ और मजेदार होना बाकि था| एक सहयात्री जो किसी प्रतियोगी परीक्षा को देकर लौट रहा था, उठकर मेरे पास चला आया बोला भाई साहब, क्या ज्यादा पूजा करने से भगवान वाकई नाराज हो जाते हैं| मैंने कहा, कौन अक्लमंद बेबात की चापलूसी पसंद करता है? फिर भगवान् क्यों करेंगे?

पता चला कि किसी बाबा ने दो साल पहले एक माला और मन्त्र दिया था उसका १००८ बार जाप करना होता है| उसके सभी साथी अपने काम धंधे पर लग चुके थे और ये भाई अभी बेरोजगार थे|

मैंने कहा कि भाई ऐसा करो कि वही मंत्र पढो दिन में केवल दो वक़्त ११ – ११ बार| उसने मुझसे मेरा नाम पता पूछा तो उसे अपना कार्ड दे दिया| यात्रा के बाद मैं यह बात भूल गया| लगभग तीन महीने बाद उस भाई का फ़ोन आया, मुझे गुरूजी कहकर संबोधित कर रहा था| उसकी किसी सरकारी महकमे में नौकरी लग गयी थी| अब तो हर १० दिन में उसके फ़ोन आने लगे| हद तब हुई जब उसकी माँ और पिताजी भी “गुरूजी” यानि मेरे “दर्शन” के लिए आना चाहते थे|

परन्तु मेरा तबादला सोनीपत से दिल्ली के लिए हो गया और मेरा कंपनी का फ़ोन नंबर भी बदल गया| मेरे पुराने नंबर पर कुछ दिन उसके फ़ोन आये| मैंने उस नंबर के नए मालिक को बोल दिया था कि उसे मेरा नया नंबर न दे|

बहरहाल इस घटना का मुझ पर भी काफी फर्क पड़ा| अब मुझे किसी भी गेरुवे कपड़े पहने धूर्त को देख कर उस से वितृष्णा नहीं होती; मैं सोचता हूँ कि कौन कौन इसकी दूकान पर आने को बेताब होगा|