मामू सरकार


महिला अधिकारों में उनके सियासी मामूओं के योगदान पर चर्चा 

शहर अलीगढ़ के मोहल्ले मामू-भाँजा की मिली-जुली आबादी, जिसे तथाकथित तरक्की पसंद तबके की जबान में गंगा-जमुनी कहा जाता है, में दोनों फिरके प्यार, मुहब्बत, इज्जत, बेइज्जती, शादी-ब्याह, झगड़े-फसाद, दंगों, हंगामों और जलसों में आदतन दूसरे को अपना मामू दरयाफ्त करते हैं| मुआमला कोई हो, ईमान यह है कि दोनों अपनी बहनों का पूरा ख्याल भी रखते हैं| मजाल क्या दूसरे फिरके कि किसी औरत से छेड़खानी क्या, हँसी-मज़ाक भी हो जाये|

यह मुआमला यहाँ से और ऐसे ही तमाम मोहल्ले मामू-भाँजों से होता हुआ हिंदुस्तानी की सियासत की रवायत में शामिल होता है| कहते हैं, गुजरे जमाने में, गाँधी-नेहरू के दिल में अपनी इन अन-मुँह-बोली बहनों के लिए खास जगह थी| आजकल यह भ्रात-स्नेह मोदी-शाह के दिल में खास मुकाम रखता| सुनते हैं यह रवायत इतनी पुरानी है कि इसे निभाने के लिए शिवाजी की आज तक जय है|

नेहरू-अंबेडकर पर छिपे मुसलमान होने के इल्जाम यहाँ तक जाते हैं कि उन्होंने हिन्दू संहिता के जरिए हिन्दू औरतों को बराबरी, विधवा विवाह, विधवा-अधिकार, स्त्री-धन, संपत्ति-अधिकार, तलाक, एकल-विवाह, दहेज-उन्मूलन, घरेलू-हिंसा-नियंत्रण, स्त्री-शिक्षा और ऐसे ही तमाम फरमाए या उनके बीज बोए| कहा सुना जाता है कि तब से आज तक हिन्दू औरतें अपने मर्दों के सिर पर तांडव कर रही हैं| यह अलग बात है, हर हिन्दू अपनी जानता है कि मात्र उसकी माँ, बहन और बेटी ऐसा कुछ भी नहीं कर रहीं और सिर्फ बहुओं और उनके मायके वालों की शरारतें हम सब झेल रहे हैं| 

स्रोत – आजतक
https://www.aajtak.in/india/uttar-pradesh/story/muslim-women-tied-rakhi-to-pm-modi-for-teen-talak-thanks-varanasi-1106470-2020-07-31

हाल के सालों में मुसलमान औरतों के मामू लोग सरकार में आए हैं| देखते ही देखते तीन-तलाक ने हिंदुस्तान से तौबा बोल ली| औरतों को बिना मेहरम हज पर जाने की इजाजत दिलाई गई|

उनके मामू समाज में हलाला को खत्म करने की भी चर्चा है और औरतों के खतने की दबी छुपी कुप्रथा का भी पर्दा किया जा रहा है| उम्मीद है उन्हें जल्द सफलता मिलेगी| कुछ मुसलमान अपनी औरतें छोड़ हिन्दू औरतों के पीछे भाग रहे थे, उनको ऐसा लपेटा कि अब वह बहनों की तरफ देखने से पहले हजार सोचें| हाल के चुनावों में मुखर होकर यह बात उठाई गई कि मुस्लिम बहन-बेटियों (पढ़ें भाँजियों, बेटियों शब्द का कुपाठ न करें) का हक और आकांक्षाओं को रोकने के लिए नए नए तरीके खोजे जा रहे हैं| (उनके मामूओं की) सरकार इन गलत इरादों को कामयाब नहीं होने देगी|

साल दो हजार सोलह की यह बीबीसी रिपोर्ट भी बताती है कि मामू सरकार में मुस्लिम महिलाओं की शिक्षा और आर्थिक उन्नति के लिए ठोस काम किए हैं| 

हाल में कर्नाटक में हिजाब पर रोक लगा दी गई| कुछ मौकापरस्त लोग हिजाब को इस्लाम का जरूरी हिस्सा बनाने का मंसूबा लेकर अदालत गए| अदालत ने उचित ही माना कि इस्लाम के नाम पर आप हिजाब नहीं पहना सकते| इस बात पर कोई बहस नहीं हो सकी कि कोई औरत फ़ैशन के नाम पर इसे पहन सकती है या नहीं| कुछ मामू लोग यह भी सोच रहे हैं कि अगर हिजाब इस्लाम का अभिन्न अंग नहीं है तो फिर हमने बेकार इतना हंगामा क्यों किया, मगर यह भी जरूरी था| देखना यह है कि हिन्दू औरतों के मामू कब जगेंगे और उन्हें सार्वजनिक जगहों पर अपने शादीशुदा होने के विज्ञापन लगाए बिना घूमने की सुविधा दिलाएँगे| बिंदी, बिछिया, सिंदूर, मांग, मंगलसूत्र, घूँघट भी तो किसी धर्म का अभिन्न अंग नहीं है| 

पुनः – अंत में तेरे मेरे अपने पराए सभी मामू को होली मुबारक||

Advertisement

हाशिए पर वह 


आजकल के लिहाज से वह थोड़ा सा पुराना समय था – लगभग तीस-चालीस साल पुराना| सूरज का सिर पर चढ़ आना और उनका आना रोजाना का नियम सा था| उनकी किसी भी नागा का अर्थ था हमारे लिए दिन भर कठिनाई और नरक तुल्य सजा| यह मध्यवर्गीय मजबूरी थी|
उनके लिए किसी भी नागा का अर्थ था अगले दिन उलहाने, झिड़कियां और कभी कभी गालियां| जिसने जितनी गाली दीं, उसे उतनी ही आवश्यकता है, भले ही ऊपर से जातीय और वर्गीय श्रेष्ठता का दम्भ हो| यह बात अपने मन में सब जानते थे| कभी यह गालियाँ हँस कर सह लीं जातीं तो कभी उलट आकर गालियॉं और धमकियाँ मिलतीं| यह गाली देने वाले व्यक्ति के सामाजिक व्यवहार और उनके साथ निजी व्यवहार पर निर्भर करता था| 

अधिकतर घरों से उनका अच्छा सम्बन्ध था| मेरी माँ से खास लगाव| मेरे लिए उनकी उपस्तिथि एक अलग मायने रखती थीं| वह पहले कुछ लोगों में से थी जिन्होंने मुझे गोद में खिलाया था| रोज का उनका आना| घरों के चूल्हा और अंगीठी जलते तो राख जिन कामों के लिए राख बचा का रखी जाती, उनमें से एक हिस्सा उनके नाम का रखा जाता| वह आतीं राख माँगती और एक ऐसे कमरे में चली जाती जिसमें कोई कभी न जाता| यह कमरा घरों के बाहर खुलता, अधिकतर पिछवाड़े या ठीक सामने| इस कमरे में कोई ताला न लगता, यहाँ तक कि घर क्या मोहल्ले में भी कोई न हो तो भी इस दरवाजे कोई ताला नहीं होता| कोई अगर उस कमरे में घुसता तो चोर, नशेड़ी और असामाजिक मान लिया जाता| 

इस कमरे से हमारा अजीब सा एक रिश्ता था| यह दैनिक जीवन का आवश्यक परन्तु हाशिए पर रख दिया जाने वाला विषय है| जब तक शारीरिक, सामजिक, नीतिगत, या व्यवस्थागत आवश्यकता न आ जाए; समाज में कौन इस विषय पर खुल कर बात करता है?

अगर इस कमरे में आप कभी झाँककर देखते तो पाते कि एक बेहद निचली सी दोछत्ती है और उसमें आठ दस इंच बड़े कुछ छेद हैं| ऊपर यह छेद अलग अलग कोठरियों में खुलते थे| यह घर का आवश्यक पर पूर्णतः नकार दिया गया हिस्सा था| 

उनका काम था, हमारे द्वारा त्यागे गए मल को साफ करना| वह राख में मल को लपेट कर ले जातीं और कहीं दूर उसे हिल्ले लगा देतीं| कहाँ, मुझे नहीं ज्ञात, शायद आपको भी नहीं ज्ञात| सरकारी तौर पर इस व्यवस्था को बाद में सिर पर मैला ढ़ोने की सामाजिक कुप्रथा का नाम दिया गया| वैसे इस प्रकार का मैला डलिया में कमर से टिका कर ले जाया जाता| पर वह बतातीं थीं छोटे क़िस्म के कुछ बड़े लोग यह मैला सिर पर ढोने के लिए मजबूर करते हैं या फिर दूर तक ले जाने के लिए मजबूरी में कई पर सिर पर रखना सरल रहता है| बहुत बाद में नगर पालिका ने/ उनके अपने समाज ने कूड़ा ढोने की छोटी ढ़केलों की व्यवस्था की थी पर वह बहुत देर बाद की गई थी| जिसने कोई सामाजिक परिवर्तन नहीं किया| 

इसे किसी भी प्रकार उचित व्यवस्था तो नहीं ही कहा जा सकता, खासकर तब जब कि उचित उपाय उपलब्ध थे| 

राख न होने पर ही पानी के सहारे नाली में मल बहाने का काम होता, ऐसा होने पर पूरा मोहल्ला उन्हें और जिस घर का मल इस प्रकार बहाया जाता, दोनों को जी भर कर और पानी पी पी कर कोसता और गालियाँ देता| 

शहरों में यह खुड्डी शौचालय अब नहीं होते, यह बेहद बढ़िया बात है| सरकार से लेकर जनता तक सभी को इसकी बधाई मिलनी चाहिए | खुड्डी अभी भी होती हैं पर उनका रूप बदला गया है कि किसी को मल उठा कर न ले जाना पड़े| मुझे नहीं मालूम कि देश से इस प्रथा का पूरी तरह अंत हुआ है या नहीं| सरकारी घोषणा का मुझे कोई भरोसा नहीं, न ही समाज के इतना जल्दी बदल जाने का| 

इस सफाई के समय जो बदबू उठती थी, उसे सहन करना अपने आप में बुरा अनुभव होता है| उनके लिए रोज का काम था| कैसे सहन करती होंगी? 

तीज त्यौहार पर तो उनका शाम और अगले दिन आना तय था और वह नहा धोकर बढ़िया धुले कपड़ों में आतीं| यह उनका त्यौहारी लेने का समय रहता| जहाँ अन्य आम कामगार त्यौहार का इनाम कहते वह त्यौहारी ही कहतीं| मल मूत्र हिल्ले लगाने का नेग इनाम तो जचगी में ही मिलता है| 

त्यौहारी के समय उन्होंने जो साड़ी पहनी रहती, वह साड़ी जिस गृहणी ने दी हुई होती, उसके सामने चुपचाप अहसानमंद होने का भाव दर्शाती रहतीं| शेष सब स्त्रियों और परिवारों को यह जरूर बताती कि किसने दी थी यह शानदार साड़ी| मंशा यह कि आप अपनी तारीफ करवानी है, तो इस का मुकाबला करों| कई बार खुद खरीदी साड़ी भी होती, पर तब यह उलहाना रहता कि मोहल्ले में कंगाली क्या आई कि जाट-कुजात को अब तन ढकने के लिए बाजार का मुँह ताकना पड़ रहा है| मोहल्ला कंगाली का उलहना सुनना पसंद न करता| शिकवा शिकायत और ताना उलहाना अधिक हो जाने पर दो चार गृहणियाँ मिलकर नई बढ़िया साड़ी के लिए पैसे दे देतीं| कुछ-एक गालियाँ देकर काम चलातीं और शेष जीवन भर उल्टा-सुल्ता सुनने का हिसाब बनवा बैठतीं| 

उन्हें मुझ से विशेष प्रेम था| मैं मोहल्ले का पहला बच्चा था जो उनकी गोद में खेला था| मुझ से पहले के बच्चों के लिए यह काम उनकी सास ने किया था| उनकी सास ने बच्चे रीति रिवाज के हिसाब से ही गोद में लिए, नहलाये धुलाये थे और नेग ईनाम पाया था|
पर यह साफ सुथरा रहने के कारण मोहल्ले में अपना अलग सम्बन्ध और स्थान रखती थीं| उनका नियम था कि सुबह का अपना काम निबटा कर ठीक से नहा धो लेना| इसके लिए जिस साबुन का इस्तेमाल करने का वह दवा करतीं थी, उस साबुन के विज्ञापन का दावा रहता था, यह साबुन यही जहाँ, तंदरुस्ती है जहाँ| उन्हें खूबसूरती वाले फ़िल्मी साबुन का कोई लगाव न था| कहतीं दिल और मन साफ तो तो चेहरे पर खुद रूप रंगत आ जाती है| वर्ना तो ये फ़िल्म वाली ससुरियाँ उनकी सुअरिया से ज्यादा थोड़े ही खूबसूरत हैं| 

नहा धोने के बाद उनका नियम था, दोपहर में मोहल्ले का एक चक्कर लगा लेना सुख दुःख, खाना पीना बाँट लेना| जहाँ मन हो खा लेना| लगभग हर ठीक ठाक घर में उनकी थाली कटोरी होती थी| जिसे वह राख से बढ़िया चमका चमका कर साफ करतीं रहतीं थीं| उन दिनों मोहल्ले के लगभर हर घर में रख से ही बर्तन साफ़ होते| राख का सम्बन्ध अग्नि और पवित्रता से था| वह कभी कभार बर्तन साफ करने के लिए नीबू नमक भी प्रयोग करतीं| 

वह जूठन कभी नहीं स्वीकार करतीं| कभी शक हो कि देने वाले ने जूठन दी है तो उसे देने वाले के सामने ही किसी कुत्ते आदि को डाल देतीं| 

कभी कभार अपनी छोटी छोटी दो बेटियों को भी ले आतीं| उन दिनों जब दिल्ली बम्बई बस के बाहर की बात थी, उनका सपना था लड़कियाँ शादी होकर उन बड़े शहर जाएँ| उनको किसी ने बताया था, उन बड़े शहरों में मैला ढोने का काम अब नहीं रह गया| जो काम हैं, उन सब में मैला ढोने के काम से अधिक इज्जत है, और कुछ नहीं तो मानवीय सम्मान हो है ही| कभी कभी माँ उन लड़कियों के साथ मुझे खेलने के लिए बोलतीं, पर यह कोई बहुत देर न चलता – हमारा सामाजिक, मानसिक, शैक्षिक स्तर बहुत अलग था| हम एक दूसरे की बात ही नहीं समझ पाते थे| हम अलग अलग ध्रुव पर ही रहते| लगता था कि हमारा खेल एक बनावटी नाटक है| इस नाटक का सम्बन्ध बस सामाजिक सुधार के घिसे-पिटे प्रतीक से अधिक नहीं थी पर इसने मेरे मन में कुछ न कुछ उचित असर तो छोड़ा ही था| उम्र के साथ यह दूरी बढ़ी| 

भले ही वह दोनों लड़कियां स्कूल जातीं थीं, पर न उन्हें स्कूल में पढ़ाया जाता था, न घर पर पढ़ाई की कोई सुविधा थी| वह जैसे तैसे जोड़ जाड़ कर नाम पढ़ लेतीं थीं, लिखतीं तो अपना लिखा खुद भी न पढ़ पातीं| अगर हम दो चार बच्चे खेल रहे होते तो वह दोनों लड़कियां खुद ब खुद गेंद लाने या ऐसी ही कोई अन्य सहायक भूमिका अपना लेतीं|
कोई बात नहीं, इनकी अगली पीढ़ी, साथ खेलने तक की हिम्मत जुटा लेगी – उनका यह विश्वास रहता| उन्हें किसी आसमानी सुधार की कोई उम्मीद नहीं थी, किसी प्रकार की कोई न-उम्मीदी उनेक आस-पास न थी| 

घर में शौचालय की व्यवस्था बदल जाने के बाद हमारे संबंध में काफी बदलाव आया| घर आँगन की झाड़ू बुहारी का काम वह करतीं रहीं, पर वह परम-आवश्यक नहीं रह गईं थीं| साल दो साल के बाद उन्हों ने अपना यह पुश्तेनी इलाका सस्ते में बेच दिया| यह मेरे लिए अजीब खबर थी| यह सम्बन्धों का बिक जाना था या उनकी संपत्ति का, मैं न समझ सका| कई बार हँसी आती कि समाज के हाशिए पर खड़े एक व्यक्ति ने समाज की मुख्यधारा का एक इलाका बेच दिया| यह एक ऐसी सच्चाई थी कि तथाकथित मुख्यधारा इस घटना के अस्तित्व से इंकार ही कर दे| 

बाद में, एक दिन वह अपनी बेटियों के साथ आईं| यह उनकी बेटियों के विवाह का बुलावा था| मैं उन दोनों से उम्र में बड़ा था पर दावत-दान- दहेज के अलावा विवाह का कोई मतलब नहीं मुझे न मालूम था| माँ ने विवाह खर्च का कुछ रुपया-पैसा-सामान और कन्यादान के लिए अपनी दक्षिणा की रकम उन्हें दी| 

उस शाम मैंने माँ से पूछा, क्या हम उस शादी में नहीं जा सकते| माँ ने कहा, जा सकते हैं पर यह मेज़बान पर बोझ होगा और सामाजिक तौर पर न उनका समाज स्वीकार करने की स्तिथि में हैं न हमारा| यह अजीब बात थी, वह और माँ दोनों ही तो इस हमारे तुम्हारे समाज के बंटबारे को मूर्खतापूर्ण पिछड़ापन कहती मानतीं आईं थीं| माँ में कहा, बहुत धीरे धीरे बदलता है| तुम्हें बदलते समाज के एक कदम आगे रहकर पर सही दिशा में बदलना हैं| अगर दिशा निर्देशक भी बन पाओ तो दौड़ना मत| 

उस के बाद वह एक दो बार ही आईं| दो एक साल बाद माँ ने मुझे उनके घर का पता देकर बुलाने भेजा था| पर वहाँ से वो लोग घर बेच कर कहीं जा चुके थे| माँ कई दिन दुःखी रहीं| बहुत बाद में एक दिन माँ ने मुझे कुछ पैसे देकर वाल्मीकि मंदिर में दान करने के लिए भेजा| 

“उस के पैसे जमा थे मेरे पास, जब दो साल वह मांगने नहीं आई तो मनीऑर्डर किये थे पर मनीऑर्डर लौट आया| उस दिन तुझे उसके घर भेजा था| कई साल तक मुझे उसके लौटने की उम्मीद रही| अब वो कर्ज़ जैसा है मेरे ऊपर| अभी दान कर दे, अगर कभी वो पैसे वापिस मांगने आई तो यह दान हमारे मेरे खाते में, वर्ना उसके खाते में|”

माँ ने बताया था कि लड़कियों के विवाह के अवसर पर दिए गए पैसे में अधिकांश उनका अपना पैसा था| थोड़ा पैसा उसने अपनी हारी-बीमारी के लिए बचा रखा था| जितना उन्होंने उस दिन माँगा था – उतना ही बाकि  माँ ने रस्म और दान-दक्षिणा के रूप में दिया था| 

समाज के हाशिए पर वह कितना विश्वास और संघर्ष करती रही होंगी?

मन का लगना


ज़िंदगी को हर कोई हँस खेल कर बिता लेना चाहता है| सब चाहते हैं दूरियाँ मिट जाएँ मन की| मगर यह दुनिया की सबसे कठिन प्रार्थना है| 

जो दूरियाँ देश-काल स्थापित करता है, उनका अधिक महत्व नहीं रहता| मीरा का मन कृष्ण से जुड़ता है और सुदामा का भी – न काल आड़े आता न देश-परदेश| 

समय की दूरी का क्या है जब मन हो वाल्मीकि के राम से मिला जाए या मीरा के कृष्ण से; जब मन हो दोनों में साम्य पाया जाए या उन के अंतर को समझा जाए| एक ही गीता हर मन मंथन में अलग सुर-संगीत रचती है और हर तत्त्व विन्यास में अनेक होकर एक रहती है| यह मन की माया है, ज्ञान-विज्ञान को क्यों, कैसा, कब कितना निचोड़े| 

भौगोलिक दूरियाँ मिटाना भी अब सहज है| मन की दूरियाँ कोस और फ़र्लांग में नहीं होतीं| आज तो संचार के साधन है – जब चाहा बात हो गई, एक दूसरे को देख लिया| कुछ अनुरागियों का नियम होता है मन मिलें या न मिलें दिन में दो बार ध्वनि-संबंध और दृश्य संबंध अवश्य स्थापित हो जाए| दूसरे को हर रोज अच्छा खाते पीते पहनते देखा जाए और उलहना दिया जाए – कितना पैसा बर्बाद करते हो; या कि उबली लौकी क्यों खाते हो रोज?

विज्ञान और ज्ञान क्रमशः देश और काल कि दूरियाँ मिटा सकते हैं| मन की दूरियाँ पाटने के लिए तो मन चाहिए – मन की लगन चाहिए| एक समय, एक कक्ष, एक विचार, एक हित, एक तन और एक मन होकर भी मन न मिले| ओह, क्या हो तब दोनों का मन एक ही राजदंड पर आ जाए| कौन भोगे और कौन भुगते? 

मन तो मिल जाए पर लगे कैसे? दो मन न लगें तो उनका मिलना क्या और न मिलना क्या| मन लगने के लिए मन मिलना सहायक है, परंतु आवश्यकता नहीं| दो मित्रों में एक का मन राजसिंहासन में और दूसरे का राजकाज में हो तो मन आपस में सकता है| मन लगने के लिए आवश्यक है एक दूसरे के मन को समझना, एक दूसरे के मन को सहेजना, एक दूसरे के साथ का तारतम्य| यह ही तो कठिन है| दोनों के सुर ताल मिलने चाहिए, जैसे शास्त्रीय संगीत में मिलते हैं गायक से सुर से हर वाद्य के सुर मिलते हैं, ताल मिलती है, थाप मिलती है तब स्वार्गिक सुर उत्पन्न होता है| उस सुर में सरसता और सरस्वती आती है|

यह मन लगाना एक दूसरे के साथ दो मन का रियाज़ मांगता है, इसमें दो मन का रियाज़ कितना भारी होता है? हम यह नहीं कह सकते कि हमारे मन का सुर यही रहेगा, आप अपने मन का सुर ताल हमसे मिलाएं| ऐसा हो भी जाये तो कितना चलेगा? आप किसी दबाब में डालकर सुर भले ही मिलवा लें पर पर मन कैसे मिलेगा? सुर मिल सकते हैं, समझौते हो सकते हैं, जीवन जिए जा सकते हैं पर बलात मन नहीं हिलमिल सकता| इसके लिए न क़ानून काम करेगा न लठ्ठ| हाथ लगेगा तो ग़ुलामी या समझौता – मन नहीं मिलेगा| 

आपसी संबंधों में शक्ति प्रदर्शन के चलते एक पक्ष झुकता तो है और धीरे धीरे उसका मन में खटास आती ही है|