हे राम!!

हे राम!

याद होगा तुम्हें

छू जाना उस पत्थर का, पथराई अहिल्या का,

मुझे भी याद है – तुम्हारा अधूरा काम||

कभी कभी मौका मिलने पर,

धिक्कारते तो होगे तुम, अपनी अंतरात्मा को||

सहज साहस न हुआ तुम्हें,

लतिया देते इंद्र को, गौतम को,

गरिया देते कुत्सित समाज को,

उदहारण न बन सके तुम||

हे राम!!

तीन अंगुलियाँ मेरी ओर उठीं हैं,

और इंगिता तुम्हारी ओर||

 

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पानी रखिये…

 

 

रहिमन पानी राखिये,

बिन पानी सब सून।

पानी गये न ऊबरे,

मोती, मानुष, चून॥

सोलहवीं सदी में महाकवि अब्दुल रहीम ख़ानख़ाना ने जब यह दोहा कहा था, शायद सोचा भी न होगा कि इसके मायने विशेष होने की जगह साधारण हो जायेंगे और वह साधारण मायने अतिविशेष माने जायेंगे| इस दोहे में पानी शब्द का कोई भी अर्थ शाब्दिक नहीं है|[i] परन्तु तब से लगभग पांच सौ वर्ष के बाद पानी (water) का शाब्दिक अर्थ बहुत महत्वपूर्ण हो चुका है|

पानी अर्थात जल के बिना मोती, मनुष्य और आटा (यानि खाद्य पदार्थ) अपना अस्तित्व नहीं बचाए रख सकते| पानी को बचाए रखिये| बिना पानी दुनिया बंजर उजाड़ हो जाएगी| लगता है रहीमदास इक्कीसवीं सदी की इस आशंका की चेतावनी दे रहे हैं|

पानी कैसे बचे? इसके कई उपाय सुझाये जा रहे हैं| उनमें से बहुत से सुझाव अपनाये भी जा रहे हैं| दशक – दो दशक पहले तक पानी की साफ़ बनाये रखने पर जोर था| आजकल पानी बचाने पर सारा ध्यान है| अब पानी की कमी पहली दुश्वारी है, पानी को साफ़ रखना बाद की बात है|

किस काम में और किस उत्पाद में पानी कितना बर्बाद हो रहा है, यह आँका जा रहा है| औद्योगिक जगत इस समस्या पर कितना गंभीर है कोई नहीं जानता| शायद विकास और रोजगार की मांग देश और दुनिया की हर सरकार पर हावी है| ऐसे में पानी बचाने के ज़िम्मा साधारण घर-गृहस्थी पर ही है| पानी का पहला संकट घर में झेलना ही होगा –- वह भी अचानक दिन के पहले पल में|

पुराने समय में जब कूएं से पानी निकालना होता था तो सोच समझ कर खर्च होता था| पांच लीटर पानी की जरूरत हो तब दस लीटर पानी खर्च करने का अर्थ था दुगनी मेहनत, दुगना समय| मशीनी युग में पानी बर्बाद करने से पहले हम कम ही सोचते हैं| बटन दबाकर पानी पा जाने वाले हम लोग नहीं जानते पानी का वो महत्व; जो घर से दूर किसी ताल-पोखर से पानी वाली बूढ़ी माँ जानती है|

क्या यह जरूरी है कि एक बाल्टी पानी से नहाने की जगह दस बाल्टी पानी बाथटब में बर्बाद की जाएँ? यह नहीं कहता में कि आप कभी भी बाथटब का प्रयोग न करें, मगर उसे सीमित किया जा सकता है| ऐसे बहुत से उदहारण हो सकते हैं| नहाना, कपड़ा धोना, हाथ-मूँह धोना, खाना बनाना और खाना-पीना सब काम में पानी की जरूरत है|

जब भी मेहमान आते हैं, तो चाय-पानी पूछना हमारी पहली सांस्कृतिक ज़िम्मेदारी होती है| शायद ही हम कभी आधे ग्लास पानी से उनका स्वागत करते हों| अगर मेहमान पानी को ग्रहण करने से मना कर दें, तो यह मेजबान के अपमान के तौर पर देखा जाता रहा है| इसीलिए आजकल मेहमान पानी की जरूरत न होने पर पहले ही बोल देते हैं| मगर शायद ही मेहमान के सामने लाये गए पानी का कुछ प्रयोग होता हो| यह पानी फैंक दिया जाता है|

आजकल दावतों, सभाओं, समाजों, जलसे, मजलिसों और शादी – ब्याह में पानी की बोतल देने का चलन बढ़ रहा है| अधिकतर मेहमान अपनी जरूरत जितना पानी पीकर बोतल या बचा पानी फैंक देते हैं| अगर यह झूठा पानी न भी फैंका जाए तब भी कोई और उसे नहीं पीयेगा| घरों में भी अक्सर हम पूरा ग्लास पानी लेते हैं| ग्लास में बचा हुआ पानी बर्बाद हो जाता है| पानी की यह सब बर्बादी भी रोकी जा सकती है – save water|

कटिंगपानी #CuttingPaani इसका उपाय हो सकता है| हम भारतीय लोग जरूरत न होने पर पूरी चाय नहीं लेते| कटिंगचाय से हमारा काम चल जाता है| यह उदहारण पानी के लिए भी अजमाया जा सकता है| जब जरूरत न हो तो ग्लास में पूरा पानी लिया ही क्यों जाए? अगर पूरा पानी लिया गया है, तो क्या जरूरत से ज्यादा होने पर उसे किसी और काम में प्रयोग नहीं कर सकते? बचे हुए पानी का प्रयोग बाद में पीने के अलावा भी पौधों को पानी देने, झाड़ू-पोंछा करने, और पालतू जानवरों को पिलाने के लिए किया जा सकता है| हमारे भारतीय परिवारों में झूठा पानी पौधों या पालतू जानवरों को नहीं दिया जाता| इसलिए कोशिश करें कि यह अतिरिक्त पानी झूठा होने से पहले ही अगल निकाल दिया जाए|

आइये पानी बचाने की शपथ लें| अगर आप अभी भी सोच रहे हैं तो यह तीन वीडियो भी देखते चलें|

[i] इस दोहे में पानी का पहला अर्थ सच्चे मोती की चमक, दूसरा मनुष्य की विनम्रता और तीसरा रोटी बनाने के लिए गूंथे गए आटे की लोच से है| उचित चमक, उचित विनम्रता और उचित लोच के बिना इमोटी, मनुष्य और आटे का कोई प्रयोग नहीं है|

अर्ध-रोजगार की चिंताएं

प्रधानमंत्री के पकौड़े वाला सम्बंधित बयान के साथ राजनीतिक और चापलूसिक बयानबाजी जारी है|
किसी की पकौड़े वाला अचानक सम्मानित रोजगार नजर आने लगा है तो किसी को बेरोजगार| पता नहीं मोचियों और रिक्शेवाले को कभी सम्मान न देने वाले लोग कब समझेंगे कि वह भी एक रोजगार है जिसे जाति और आर्थिक पिछड़ेपन से ऊपर उठकर रोजगार की तरह देखने  की जरूरत है|

इस सारी बहस का मूल मुद्दा है कि रोजगार क्या है?

सामान्य भाषा में सामान्यजन की समझ के अनुसार “किसी दुसरे व्यक्ति द्वारा किया जा रहा कोई भी काम जिससे वेतन या लाभ का एक तिनका भी उसके घर जा रहा है, रोजगार है|”

जब यह बात अपने पर आती है तो बात बदल जाती है, “ऐसा कोई कार्य या व्यवसाय, जिससे सामाजिक सम्मान के साथ समुचित जीवन यापन करने के लिए वेतन या लाभ कमाया जा सके, रोजगार है|”

अर्थशास्त्रियों और समाज विज्ञानियों की निगाह में “अपनी योग्यता के इच्छा अनुकूल समुचित उपयोग से किया जा रहा कोई कार्य जिससे सामाजिक सम्मान के साथ समुचित जीवन यापन करने के लिए वेतन या लाभ कमाया जा सके, रोजगार है|”

सारी बहस में दिक्कत यह है कि अपने निजी दृष्टिकोण बहस में शामिल है| अचानक इस बात पर जोर दिया जाने लगा है कि पकौड़े का खोखा लगाना रोजगार है या नहीं है| इसका उत्तर कभी भी हाँ या न में नहीं हो सकता| अगर एक आंठवी कक्षा उत्तीर्ण व्यक्ति पकौड़े बेचता है तो यह सम्मानित रोजगार हो सकता हैं, मगर किसी चार्टर्ड अकाउंटेंट द्वारा पकौड़े बेचना रोजगार नहीं हो सकता|मामला यहीं ख़त्म नहीं होता| अगर पकौड़े का खोखा न होकर भीखाजी कामा प्लेस पर पकौड़े की बड़ी दूकान हो तो किसी स्नातक के लिए यह न सिर्फ रोजगार हो सकता हैं वरन वह चार और लोगों को रोजगार दे सकता है|

इस सारी बहस में हस्यास्पद स्तिथि बड़ी बड़ी कंपनियों में रोज बारह घंटे काम करने वाले सफ़ेदपोश कर्मियों की है| यह जमात अपने को रोजगार में लगा हुआ अक्लमंद समझती है| मगर उचित रोगजार की परिभाषा में यह लोग नहीं आते| उचित रोजगार वह है जिसमें आप कार्य और निजी जीवन में संतुलन बना पायें| जब आप बारह घंटे काम करते हैं तो किसी दुसरे की रोजगार सम्भावना नष्ट कर देते हैं| आप अपने पक्ष में जो तर्क देते हैं वो जंगल के तर्क हैं – “अगर मैं नहीं करूंगा तो दूसरा करेगा”| प्रकृति इस सब मूर्खता का जबाब आपके मालिक को नहीं आपको देगी आपके बुढ़ापे में|आपका शरीर थक चूका होगा और बच्चे आपको ठीक पहचानेंगे नहीं|उचित रोजगार वह है जिसमें आप रोजगार को आठ, अपने को चार और परिवार को चार घंटे दे सकें|अब यह न कहें कि हम अपनी बारह घंटे की कार्यालय अवधि में चार घंटे की चोरी करते हैं अपने लिए|

 

शरणार्थी और भारत

भारत को बहु-सांस्कृतिक सभ्यता बनाने में अलग अलग समुदायों का योगदान निर्विवादित है| हमारी अतिउप-संस्कृतियाँ महीन ताने-बानों से बनीं हैं| भारतीय सजातीय विवाहों में भी आधा समय इस बात में हंसी-ख़ुशी नष्ट हो जाता है कि वर-वधु पक्ष के रीति-रिवाज़ों में साम्य किस प्रकार बैठाया जाए| उप-संस्कृतियों के विकासक्रम में बहुत से तत्व रहे हैं, जिन्हें ठीक से न समझने वाला व्यक्ति विदेशी आक्रमणों से जोड़ कर शीघ्र निष्कर्ष पर पहुँच सकता है| परन्तु निर्विवाद रूप से हमारे उन-सांस्कृतिक विकास में अन्तराष्ट्रीय व्यापार और शरणार्थियों के योगदान को नकारा नहीं जा सकता|

अन्तराष्ट्रीय व्यापार के प्रमाण सिन्धु घाटी सभ्यता के समय से मिलने प्रारंभ हो जाते हैं| आक्रमण वाले सिद्धांत के विपरीत अन्तराष्ट्रीय व्यापार ने इस्लाम को अरब आक्रमणों से काफी पहले भारत पहुंचा दिया था|

भारत के सर्वांगीण विकास में शरणार्थियों का योगदान इनता मुखर और सामान्य स्वीकृत है कि हम उसपर विवेचना की ज़हमत नहीं उठाते| जिन शरणार्थियों को “खीर के एक कटोरे” से वचन में बाँट दिया गया था, उनका बेचा नमक आज सारा भारत खाता है| ग़दर के बाद भारत में आजादी की नियोजित लड़ाई का प्रारंभ करने वाली इंडियन नेशनल एसोसिएशन और उसके बाद इन्डियन नेशनल कांग्रेस के एक सह-संस्थापक दादा भाई नौरोजी उन्हीं पारसी शरणार्थियों के वंशज थे| आज जिन प्राचीन ईरानी कथा कहानियों को हम फारस और मुस्लिमों से जोड़ते हैं वो कदाचित पारसियों के साथ भारत चुकीं थीं|

भारत में पारसी अकेला समुदाय नहीं है जो शरणार्थी बनकर भारत आया| आजादी के बाद आये शरणार्थी तिब्बती समुदाय के साथ भी स्थानीय समाज के सामान्य रिश्ते हैं| बंटवारे के समय पाकिस्तान से आने वाले लोग भी वास्तव में शरणार्थी ही हैं| अफगान संकट के समय आने वाले अफगानों का भी भारत में शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व है|

पिछले कुछ दशकों में अक्सर बाहर से आने वाले शरणार्थियों को उपद्रव का कारण माना जा रहा है| यह उत्तरपूर्व में होने वाले त्रिकोणीय सामुदायिक संघर्ष के कारण है| देश के किसी क्षेत्र में शरणार्थियों का कैसा स्वागत होगा, इसमें क्षेत्रीय विकास महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है| आप उत्तरपूर्व भारत में अवैध बंगलादेशी आप्रवासियों का मुद्दा रोज सर उठाते देखेंगे| जबकि दिल्ली मुंबई के चुनावों में यह मुद्दा हाशिये से आगे नहीं बढ़ पाता| जब शरणार्थी (और रोजगार की तलाश में आने वाले लोग) देश के कम विकसित क्षेत्र में आकर रहते है, तब इस प्रकार के संघर्ष स्वाभाविक हैं| जहाँ संसाधनों सभी के लिए पूरे नहीं पड़ते| दलगत राजनीति इन संघर्षों की आड़ में अपनी नीतिगत खामियां छिपाने और वोट की फ़सल काटने का काम करती है|

रोहिंग्या शरणार्थियों को अवैध बताकर वापिस भेजा जा रहा है| अपनी मर्जी से तो लोग रोजगार के लिए भी अपनी जन्मभूमि नहीं छोड़ते| मुझे नहीं पता कि वैध शरणार्थी कैसे होते हैं? क्या उन्हें देश से भागने वाली सरकारें वीज़ा पासपोर्ट बनाकर भेजतीं हैं? क्या अपने देश से जान बचाकर भागता भूखा नंगा आदमी आपको डरा देता है? क्या इस बात के प्रबंध नहीं हो सकते कि उनपर दया और निगाह एक साथ रखी जा सके|

 

पुनश्च – शरणार्थियों के अपने राजनीतक महत्व भी हैं, अगर पाकिस्तान के शरणार्थी भारत न आने दिए गए तो शायद दक्षिण भारत का इतिहास अलग होता| इस पर हो सका तो फिर कभी|

हमारी गोमती

अलीगढ़ शहर में जब आप थोड़ा बड़े होने लगते हो तो आगरा या दिल्ली में से एक आपको अपना दूसरा घर लगने लगता है| आजकल विकास की मार के कारण आगरा छूट गया है और दिल्ली – नॉएडा ही विकल्प बचे हैं| अलीगढ़ शहर से दिल्ली जाने के साधन कुछ भी हों, पर वो रेलवे ट्रैक पर ही चलते हैं| बस का विकल्प हमने एटा–मैनपुरी–कासगंज वालों के लिए छोड़ रखा है| पुराने समय में कभी एज़ीएन सुबह अलीगढ़ वालों को दिल्ली पहुंचा देती| बाद में ईएमयू ट्रेन नई दिल्ली और पुरानी दिल्ली तक जाने लगीं| बचे खुचे लोगों को हाथरस वालों को एचेडी और टूंडला वालों की टीएडी का आसरा रहता| मगर जलवा अगर रहा तो गोमती का, जिसे मगध के अलावा किसी ने चुनोती न दी|[1] भले ही दोनों ट्रेन आजकल भारत सरकार की गति की तरह ही ढुलमुल चलतीं हैं, मगर जलवा कायम है|

जिस ज़माने में बिहार की राजधानी से मगध सुबह सवा नौ तक आ जाती थी, अलीगढ़ वाले औकात से गिरना कम ही पसंद करते थे| मजबूरी को छोड़ दें तो, छोटे बनिए और उनके कुली ही मगध से जाते थे| उन दिनों और आजकल भी, लटककर ही सही मगर आन बान के साथ गोमती से जाना ही समझदारी है| गोमती में भले ही दो- चार अनारक्षित डिब्बे होते हैं मगर ये कहाँ होते हैं इसका पता लेखक को नहीं है| इसके चौदह पंद्रह आरक्षित कुर्सीयान डिब्बों में आरक्षण पागल, सनकी, बूढ़े, गर्भवती, बच्चेवालियाँ या नई-नवेलियाँ करातीं है| ये तो होली मिलन के दिनों में टीटी मिलने और अपने सालाना टारगेट का रोना सुनाने न आये तो पता भी न चले कि इसका आरक्षण किधर होता है| इन डिब्बों में बैठना, खड़े होना, लड़ना और लटकना मिलकर दोसौ से तीनसौ भलेमानस प्रति डिब्बा यात्रा करते हैं| इन डिब्बों में आप नैसर्गिक मनोरंजन करते, लड़ते – झगड़ते, कूदते-फाँदते, कोहनीबाजी और उंगलबाजी करते हुए आराम से सफ़र कर सकते हैं, वर्ना गप्प मारने और ताश पीटने के काम तो निठल्ले भी कर ही लेते हैं|

नए पैसे वाले लौड़े–लौंडियाँ आजकल एसी वैसी में चलने लगे हैं| इनकों दादरी और गाज़ियाबाद तक ही टिकना होता हैं| ये मोबाइल पकड़ प्रजाति कंप्यूटर की गुलामी करने को देश का विकास समझती है और इन्टरनेट पर भगत सिंह की क्रांति करती रहती है| धीरे धीरे अधेड़, परिवारीजन भी इस एसी में जाने लगे हैं; मगर जाड़ों में इसमें इतना दम घुटता है कि लालू याद आते हैं और चारा चोटाला तेल लेने चला जाता है| बकौल रेलवे, वोट के अलावा कुल जमा इन दो डिब्बों के लिए ही हो तो पूरी गोमती चलाई जाती है|

एक नेताजी टाइप डिब्बा भी है, उसका न पूछे| एक बार हमने पूछा था तो पता चला उसमें अम्बानी का चाचा, अखिलेस का ताऊ, माया का भाया, टाइप कोई होता है – कभी कभी| डिब्बा इसलिए होता है कि कहीं चाइना पाकिस्तान को पता न चल जाये कि इत्ती बड़ी गाड़ी में एक पिद्दी एसी फर्स्ट क्लास नहीं है|

[1] कृपया भूलकर भी इन्हें मगध एक्सप्रेस और गोमती एक्सप्रेस के वाह्यात सरकारी नामों से न पुकारें, भावनाएं आहत हो सकतीं हैं|

संस्कृत समस्या

मेरे लिए संस्कृत बचपन में अंकतालिका में अच्छे अंक लाने और मातृभाषा हिंदी को बेहतर समझने का माध्यम रही थी| बाद में जब संस्कृत सहित अपनी पढ़ी चारों भाषाओँ को आगे पढ़ने की इच्छा हुई तब रोजगार की जरूरतों ने उसे पीछे धकेल दिया| यदा कदा संध्या-हवन के लायक संस्कृत आती ही थी और पुरोहित तो मुझे बनना नहीं था| फिर भी संस्कृत पढ़ने की इच्छा ने कभी दम नही तोड़ा| जिन दिनों अलीगढ़ के धर्मसमाज महाविद्यालय में अध्ययनरत था संस्कृत पढ़ने की पूनः इच्छा हुई| उसी प्रांगण में धर्मसमाज संस्कृत महाविद्यालय भी था, जो प्रवेश आदि की जानकारी लेने पहुँचा| जानकारी देने वाले को दुःख हुआ कि मैं मुख्यतः धर्मग्रन्थ पढ़ने के लिए नहीं बल्कि कालिदास, शूद्रक, पंचतंत्र आदि साहित्य को पढने के संस्कृत सीखना चाहता था| उनका तर्क था कि यह सब तो अनुवाद से पढ़े जा सकते हैं| संस्कृत में कामसूत्र पढ़ना तो कदाचित उनके लिए पातक ही था| उनके अनुसार धर्मग्रन्थ पढ़कर अगर अपना जीवन और संस्कृत पाठ सफल नहीं किया तो जीवन और जीवन में संस्कृत पढ़ना व्यर्थ है|

विकट दुराग्रह है संस्कृत पढ़ाने वालों का भी| वेद –पुराण तक समेट दी गई संस्कृत एक गतिहीन अजीवित भाषा प्रतीत होती है| संस्कृत के बहुआयामी व्यक्तित्व को दुराग्रहपूर्ण हानि पहुंचाई जा रही है| एक ऐसी भाषा जिसमें जीवन की बहुत सारे आयामों पर साहित्य उपलब्ध है| संस्कृत को केवल धर्म तक समेट देना, उन लोगों को संस्कृत से दूर कर देता है जिन्हें धर्म में थोड़ा कम रूचि है|

अभूतपूर्व समर्थन के चलते संस्कृत विलुप्त होने की आशंकाओं से जूझ रही भाषाओँ में अग्रगण्य है| आपको मेरा आरोप विचित्र लगेगा और है भी| संस्कृत को समर्थन देने वालों का संस्कृत के प्रति एक धार्मिक दुराग्रह है| वह संस्कृत का प्रचार चाहते हैं और शूद्रों, मलेच्छों, यवनों, नास्तिकों के संस्कृत पढने के प्रति आशंकाग्रस्त भी रहते हैं| यह दुराग्रह संस्कृत को धर्म विशेष की भाषा सीमित भाषा बनाने का | कार्यकर रहा है| अन्यथा संस्कृत को समूचे भारत की भाषा बनाया जा सकता था|

समाचार है कि दिल्ली विश्वविद्यालय को अपने संस्कृत पाठ्यक्रम के लिए छात्र नहीं मिल सके हैं| कैसे मिलें? शिक्षक ने नाम पर दुराग्रही अध्यापक हैं| रोजगार ने नाम पर केवल अध्यापन, अनुवाद और पुरोहिताई है| आप आत्मसुखायः किसी को पढ़ने नहीं देना चाहते| संस्कृत पाठ्यक्रम में साहित्यिक गतिविधियों पर जब तक अध्यापक और छात्र ध्यान नहीं देंगे, यह पाठ्यक्रम नीरस बना ही रहेगा| जिसको पुरोहिताई, धर्म-मर्म आदि में रूचि है उनके लिए अन्य कुछ विश्वविद्यालय बेहतर विकल्प हैं|

यद्यपि आजकल सामाजिक माध्यमों में संस्कृत का प्रचार प्रसार करने के लिए भी कुछ गुणीजन समय निकालकर काम कर रहे हैं| परन्तु जब तक संस्कृतपंडितों के संस्कृत मुक्त नहीं होती, अच्छे दिन अभी दूर हैं|

 

“दिन” “महीना”

हम अक्सर मौन रहते हैं| प्रकृति प्रदत्त  बहुत से उपहार और पीड़ाओं को कहते बोलते सुनते नहीं| मानो वह हो ही न| यह नकार दुर्भाग्य है| खासकर अगर यह बातें स्त्री से जुड़ी हों तो नकार एक स्वीकार की तरह मौजूद है| सबके अपने अनुभव है| पुरुषों के भी हैं|

उस समय में नवीं में था जब पड़ौस की किसी लड़की ने माँ से आकर कान में कुछ कहा| हर समय पढ़ने के लिए दबाब डालने वाली मेरी माँ ने मुझे जल्दी से बाजार से एक दवा लाने के लिए बोला| मेरे सामने दवा का नाम उन्होंने ही पर्चे पर लिखा था| क्योंकि मुझे बहुत सवाल पूछने की आदत थी, माँ ने बिना पूछे ही बता दिया कि यह लड़कियों और औरतों के पेट के निचले हिस्से में दर्द की दवा है| दवा का नाम बाद में मुझे याद हो गया था –बलार्गन|

मेरी माँ आसपास की लड़कियों और औरतों के सुख-दुःख की साझीदार थीं| इसलिए यदाकदा यह दवा मुझे लाने के लिए कहा जाता रहा| मैं बिना हिचक इसका नाम लेकर दवा मांग लाता था| परन्तु केमिस्ट की दुकान पर एक सिरफिरे नेतानुमा आदमी ने कुछ बकवास की| केमिस्ट ने मेरे पिता के पद और रुतबे की धमकी देकर उसे चुप करा दिया| मगर मेरे दिमाग में कई प्रश्न आये| माँ ने समझया, जिस प्रकार पृथ्वी या प्रकृति को साल में एक बार पतझड़ का दुःख झेलना होता है| उसी प्रकार हर लड़की को प्रकृति का प्रतिरूप होने के कारण हर महीने कुछ दर्द झेलना होता है|

मैं सालों तक इसे मात्र निचले पेट में तेज दर्द समझता था| ग्रेजुएशन के दौरान एक मित्र के साथ अस्पताल गया था| अचानक डॉक्टर ने अन्दर बुला कर मुझे वो सब बता दिया जो उनके हिसाब से एक अच्छे बॉयफ्रेंड, भाई, पति और पिता को जानना चाहिए| मैं उस दिन बहुत ज्यादा घबरा गया|

नौकरी में एक कंपनी की फैक्ट्री में कार्यरत था| मुख्यालय से मुझे मौखिक निर्देश थे कि अगर कोई लड़की अचानक आकर बिना कारण छुट्टी मांगे तो बिना कोई सवाल किये छुट्टी दे देनी है| कुछ लडकियां नियमित रूप से ऐसा करती थीं तो कुछ ने कभी छुट्टी नहीं मांगी| परन्तु गजब तब हुआ एक लड़की ने दो महीने चार बार ऐसा किया| मेरे गौर करने का प्रश्न नहीं था, मगर वेतन प्रक्रिया के दौरान टाइम कीपर के रजिस्टर की प्रति कई दिन फैक्ट्री और मुख्यालय घुमती रही| बाद में, कंपनी की मानव संसाधन प्रमुख ने आकर उसे चेतावनी दी|

जब पता चला लड़कियां इन दिनों पूजा नहीं कर सकती.. वगैरा वगैरा तो मुझे यह प्रकृति का और मातृत्व का अपमान लगा और आज भी लगता है| बाद में एक मित्र ने तर्क दिया कि अगर वो इन दिनों मंदिर जाएगी तो भगवान को सृष्टि रचने से पूर्व की वेदना याद आ जाएगी|