संस्कृत समस्या

मेरे लिए संस्कृत बचपन में अंकतालिका में अच्छे अंक लाने और मातृभाषा हिंदी को बेहतर समझने का माध्यम रही थी| बाद में जब संस्कृत सहित अपनी पढ़ी चारों भाषाओँ को आगे पढ़ने की इच्छा हुई तब रोजगार की जरूरतों ने उसे पीछे धकेल दिया| यदा कदा संध्या-हवन के लायक संस्कृत आती ही थी और पुरोहित तो मुझे बनना नहीं था| फिर भी संस्कृत पढ़ने की इच्छा ने कभी दम नही तोड़ा| जिन दिनों अलीगढ़ के धर्मसमाज महाविद्यालय में अध्ययनरत था संस्कृत पढ़ने की पूनः इच्छा हुई| उसी प्रांगण में धर्मसमाज संस्कृत महाविद्यालय भी था, जो प्रवेश आदि की जानकारी लेने पहुँचा| जानकारी देने वाले को दुःख हुआ कि मैं मुख्यतः धर्मग्रन्थ पढ़ने के लिए नहीं बल्कि कालिदास, शूद्रक, पंचतंत्र आदि साहित्य को पढने के संस्कृत सीखना चाहता था| उनका तर्क था कि यह सब तो अनुवाद से पढ़े जा सकते हैं| संस्कृत में कामसूत्र पढ़ना तो कदाचित उनके लिए पातक ही था| उनके अनुसार धर्मग्रन्थ पढ़कर अगर अपना जीवन और संस्कृत पाठ सफल नहीं किया तो जीवन और जीवन में संस्कृत पढ़ना व्यर्थ है|

विकट दुराग्रह है संस्कृत पढ़ाने वालों का भी| वेद –पुराण तक समेट दी गई संस्कृत एक गतिहीन अजीवित भाषा प्रतीत होती है| संस्कृत के बहुआयामी व्यक्तित्व को दुराग्रहपूर्ण हानि पहुंचाई जा रही है| एक ऐसी भाषा जिसमें जीवन की बहुत सारे आयामों पर साहित्य उपलब्ध है| संस्कृत को केवल धर्म तक समेट देना, उन लोगों को संस्कृत से दूर कर देता है जिन्हें धर्म में थोड़ा कम रूचि है|

अभूतपूर्व समर्थन के चलते संस्कृत विलुप्त होने की आशंकाओं से जूझ रही भाषाओँ में अग्रगण्य है| आपको मेरा आरोप विचित्र लगेगा और है भी| संस्कृत को समर्थन देने वालों का संस्कृत के प्रति एक धार्मिक दुराग्रह है| वह संस्कृत का प्रचार चाहते हैं और शूद्रों, मलेच्छों, यवनों, नास्तिकों के संस्कृत पढने के प्रति आशंकाग्रस्त भी रहते हैं| यह दुराग्रह संस्कृत को धर्म विशेष की भाषा सीमित भाषा बनाने का | कार्यकर रहा है| अन्यथा संस्कृत को समूचे भारत की भाषा बनाया जा सकता था|

समाचार है कि दिल्ली विश्वविद्यालय को अपने संस्कृत पाठ्यक्रम के लिए छात्र नहीं मिल सके हैं| कैसे मिलें? शिक्षक ने नाम पर दुराग्रही अध्यापक हैं| रोजगार ने नाम पर केवल अध्यापन, अनुवाद और पुरोहिताई है| आप आत्मसुखायः किसी को पढ़ने नहीं देना चाहते| संस्कृत पाठ्यक्रम में साहित्यिक गतिविधियों पर जब तक अध्यापक और छात्र ध्यान नहीं देंगे, यह पाठ्यक्रम नीरस बना ही रहेगा| जिसको पुरोहिताई, धर्म-मर्म आदि में रूचि है उनके लिए अन्य कुछ विश्वविद्यालय बेहतर विकल्प हैं|

यद्यपि आजकल सामाजिक माध्यमों में संस्कृत का प्रचार प्रसार करने के लिए भी कुछ गुणीजन समय निकालकर काम कर रहे हैं| परन्तु जब तक संस्कृतपंडितों के संस्कृत मुक्त नहीं होती, अच्छे दिन अभी दूर हैं|

 

“दिन” “महीना”

हम अक्सर मौन रहते हैं| प्रकृति प्रदत्त  बहुत से उपहार और पीड़ाओं को कहते बोलते सुनते नहीं| मानो वह हो ही न| यह नकार दुर्भाग्य है| खासकर अगर यह बातें स्त्री से जुड़ी हों तो नकार एक स्वीकार की तरह मौजूद है| सबके अपने अनुभव है| पुरुषों के भी हैं|

उस समय में नवीं में था जब पड़ौस की किसी लड़की ने माँ से आकर कान में कुछ कहा| हर समय पढ़ने के लिए दबाब डालने वाली मेरी माँ ने मुझे जल्दी से बाजार से एक दवा लाने के लिए बोला| मेरे सामने दवा का नाम उन्होंने ही पर्चे पर लिखा था| क्योंकि मुझे बहुत सवाल पूछने की आदत थी, माँ ने बिना पूछे ही बता दिया कि यह लड़कियों और औरतों के पेट के निचले हिस्से में दर्द की दवा है| दवा का नाम बाद में मुझे याद हो गया था –बलार्गन|

मेरी माँ आसपास की लड़कियों और औरतों के सुख-दुःख की साझीदार थीं| इसलिए यदाकदा यह दवा मुझे लाने के लिए कहा जाता रहा| मैं बिना हिचक इसका नाम लेकर दवा मांग लाता था| परन्तु केमिस्ट की दुकान पर एक सिरफिरे नेतानुमा आदमी ने कुछ बकवास की| केमिस्ट ने मेरे पिता के पद और रुतबे की धमकी देकर उसे चुप करा दिया| मगर मेरे दिमाग में कई प्रश्न आये| माँ ने समझया, जिस प्रकार पृथ्वी या प्रकृति को साल में एक बार पतझड़ का दुःख झेलना होता है| उसी प्रकार हर लड़की को प्रकृति का प्रतिरूप होने के कारण हर महीने कुछ दर्द झेलना होता है|

मैं सालों तक इसे मात्र निचले पेट में तेज दर्द समझता था| ग्रेजुएशन के दौरान एक मित्र के साथ अस्पताल गया था| अचानक डॉक्टर ने अन्दर बुला कर मुझे वो सब बता दिया जो उनके हिसाब से एक अच्छे बॉयफ्रेंड, भाई, पति और पिता को जानना चाहिए| मैं उस दिन बहुत ज्यादा घबरा गया|

नौकरी में एक कंपनी की फैक्ट्री में कार्यरत था| मुख्यालय से मुझे मौखिक निर्देश थे कि अगर कोई लड़की अचानक आकर बिना कारण छुट्टी मांगे तो बिना कोई सवाल किये छुट्टी दे देनी है| कुछ लडकियां नियमित रूप से ऐसा करती थीं तो कुछ ने कभी छुट्टी नहीं मांगी| परन्तु गजब तब हुआ एक लड़की ने दो महीने चार बार ऐसा किया| मेरे गौर करने का प्रश्न नहीं था, मगर वेतन प्रक्रिया के दौरान टाइम कीपर के रजिस्टर की प्रति कई दिन फैक्ट्री और मुख्यालय घुमती रही| बाद में, कंपनी की मानव संसाधन प्रमुख ने आकर उसे चेतावनी दी|

जब पता चला लड़कियां इन दिनों पूजा नहीं कर सकती.. वगैरा वगैरा तो मुझे यह प्रकृति का और मातृत्व का अपमान लगा और आज भी लगता है| बाद में एक मित्र ने तर्क दिया कि अगर वो इन दिनों मंदिर जाएगी तो भगवान को सृष्टि रचने से पूर्व की वेदना याद आ जाएगी|

लोरियां

बचपन में हम सबने सुनीं हैं लोरियां| माएं, दादियाँ, नानियाँ सुनातीं थी लोरियां| जब पिता के मन में ममता जागती है, तब भी लोरी सुनाई देती है|

लोरियां माँ के दूध के बाद ममता का सबसे मीठा भाव है| संगीत और शब्द का नैसर्गिक सरल और सुलझा हुआ रूप लोरियां| अधिकतर लोरियां स्वतःस्फूर्त होतीं है| शांत रात्रि में जब बच्चा गोद में आता है तब हृदय में पैदा होने वाले स्पंदन से निकलती हैं लोरियां| कभी धुन नहीं होती तो कभी शब्द नहीं होते… ध्वनि होती है, भावनाएं होती हैं| लोरियां बनती बिगड़ती रहती हैं| अक्सर याद नहीं रहती, याद नहीं रखीं जातीं|

फिर भी कई बार होता है, लोरियां कवि और गीतकार गाते हैं, शब्दों और धुनों में पिरोते हैं| कभी कभी माओं का हृदय शब्दों को यादगार लोरियों में बदल देता है| ऐसी लोरियां लोकगीत की तरह समाज में विचरतीं है, फिल्मों में गाई जातीं है| उनके संकलन भी आते हैं|

हाल में मैंने यह पुस्तक खरीदी है – लोरियां| एक छोटी सी बच्ची के पिता को खरीदना भी और क्या चाहिए? इसमें कुछ लोकलोरियां हैं तो महाकवियों की प्रसिद्ध लोरियां भीं हैं| हालाँकि कुछ गीतों को शायद गलती से लोरी कह दिया गया है| जैसे – जसोदा हरि पालने झुलावै|

कवियों और गीतकारों की लिखी लोरियों में ममता का भाव कम रह जाता है, काव्य और गीत का तकनीकी पक्ष मजबूत होने लगता है| इसमें कुछ अच्छे प्रयास भी हुए है| कई बार प्रसिद्ध गीतकार और कवि बेहतर शब्दों के जाल में उलझकर साधारण सी लोरी लिख पाते है| दूसरी ओर एक स्वतःस्फूर्त लोरी लिखे जाने पर उतनी सुन्दर नहीं जान पड़ती जितना वो ममतामयी गले से गाये जागते समय होती है|

आज जब लोरियां गाने का समय टेलीविजन के सामने निकल जाता है| लोरियों का अपना महत्व बरकारार है| यह हमारे शिशुओं का प्राकृतिक अधिकार है कि वो ममतामयी धुनें, शब्द और गीत सुने – लोरियां सुनें| यह पुस्तक इस दिशा में उचित कदम है|

शकुंतला सिरोठिया, कन्हैयालाल मत्त, प्रकाश मनु की लोरियां, लोरियों के नैसर्गिक सौंदर्य के निकट है| अन्य लोरियां गेय कम पठनीय अधिक हैं| कुल मिलकर पचास लोरियों की यह पुस्तक संग्रहणीय है|

 पुस्तक – लोरियां

लेखक – संकलन

प्रकाशक – राष्ट्रिय पुस्तक न्यास

प्रकाशन वर्ष – 2011

विधा – लोरी

इस्ब्न – 9788123761817)

पृष्ठ संख्या – 54

मूल्य –  45 रुपये

खौलते हुए बुलबुले

कचनार से कच्चे और कमसिन

नाजुक से कच्चे कोयले की

धीमे धीमे दहकती हुई

भुनी सुर्ख पंच्तात्त्विय अग्नि पर

होलिका सी डरी सहमी सिमटी

सिकुड़ी से बैठी हुई उस शर्मीली

सिल्बर[1] की सुन्दर सुडौल भगौनी

में नरक के कडुए काले कड़ाहों

में तपते हुए बसंत के भरमाये

घमंडी कडुए तेल[2] की मानिंद

खौलते हुए उस शुद्ध पंच्तात्त्विय

उपचारित निर्मल निर्लज्ज जल[3]

में जबरन जबरदस्त उबलते हुए

उस मासूम हल्के मुलायम निमिषवय

वायु के बुलबुले को देखा है कभी|

 

वो उबला हुआ बुलबुला

एक पल में हवा हुआ जाता है

और छोड़ जाता है अपने पीछे

हजारों मासूम कुलबुलाती सी

किल्लेदार ख्वाहिशे के

निमिषवय बुलबुले और

उन निमिषवय बुलबुलों की

हजारो कुबुलाती ख्वाहिशें

उबलते बुलबुलों की मानिंद

जिनमें मैंने डालें हैं रंगत के

दाने आसाम के चायबागानों

चुनवाकर से मंगवाए हुए|

 

मैं उन उबलती हुई हजारों करोड़ों

मासूम कुलबुलाती सी किल्लेदार

ख्वाहिशों का ख़ुदा हूँ खराब जो

इक ख़ूबसूरत रात के बाद की

अलसाई सुरमई सुबह से पहले

ब्रह्ममुहूर्त में खौलते पानी में

उबलते ख्वाहिशमंद बुलबुलों पर

धीर वीर क्षीर समंदर के बनाये

निहायत नमकीन नमक के

सोंधे स्वाद को छिड़कता हूँ|

 

मैं खौलते पानी में उबलते हुए

उन निमिषवय बुलबुलों की

उस तड़पती हुई कराह पर

आह कर उठता हूँ अक्सर

और बुरक देता हूँ चुटकीभर

मीठी शिरीन शक्कर के

घनाकार वजनी दमदार दाने|

 

वो खौलते हुए बुलबुले

हिन्दुस्तान के आमजनता

की मानिंद चुप हो जाते हैं

मीठी शीरीन शक्कर के

धोखे में उन्हें अहसास नहीं होता

वो अब भी खौलते पानी में

गर्मागर्म उबाले जा रहे हैं|

 

और उनके उबलते हुए कंटीले

नाजुक घावों से रिसते हुए दर्द

पर करहाते हुए नीबू के रस की

दो चार अम्लीय बूंदे छोड़ देता हूँ|

 

वो मासूम सावन की बरसात की

हरियल यादों में सहम जाते हैं

वो जानते हैं अब कुछ न होगा

मगर मिनमिनाने लगते हैं

मिन्नतें मजाकिया मजेदार|

 

मैं मजाहिया मुस्कान के साथ

उतार लेता हूँ उस नामुराद

होलिका सी डरी सहमी सिमटी

सिकुड़ी से बैठी हुई उस शर्मीली

सिल्बर की सुन्दर सुडौल भगौनी

जो पलभर में तपती आग में

भुनकर सुरमई हुई जाती है|

 

खुर्जा से खरीद हुई उस

संगमरमरी चीनी मिट्टी के

रंगदार सजावटी सुन्दर शाही

चाय की प्याली में उड़ेली हुई

उस खौलती चाय को सुड़ककर

पीते हुए सोचता हूँ क्यों न

नामुराद भाई ऐश अलीगढ़ी

दिल्ली के पीर ख्वाजा की

दरगाह के बाहर चौराहे पर

नीली छतरी वाले गुम्बद के

छोटे चारबाग़ में बैठकर

मकबरा हुंमायूं को देखते हुए

खुद अपनी मल्लिका मोहब्बत

की उस रोहानी याद में एक

रोमानी सी गजल की जाए|

 

[1] हंडोलियम को देहात सिल्बर कहते हैं इसमें सिल्वर से धोखा न खाएं|

[2] सरसों का तेल

[3] आपका प्यारा आरओ वाटर

पाठशाला पढाई के लिए नहीं है

“शिक्षे, तुम्हारा नाश हो, तुम नौकरी के हित बनी|”

अगर होते, मैथली शरण गुप्त अवश्य सोचते| क्या उन्होंने उनका श्राप सत्य हुआ? आज भारत के शिक्षित लोग रोजगारपरक नहीं माने जा रहे – अनियोज्य हैं, अप्रयोज्य हैं|

किन्हीं माता-पिता से पूछिए| पाठशाला का चयन कैसे करते हैं – निकटता, बेहतरीन भवन, वातानुकूलन, गैर-पाठ्य-गतिविधि, सुरक्षा, नगर-भ्रमण, परीक्षा-परिणाम, आवागमन, यातायात, सब कुछ गिना देंगे| शिक्षा और शिक्षक के अलावा|

हालत है कि निजी क्षेत्र के विद्यालयों में कम वेतन वाले निरुत्साही शिक्षक भरे पढ़े हैं और योग्य छात्र-छात्राएं भरे पड़े हैं| सरकारी विद्यालय अयोग्य छात्र-छात्राओं, निरुत्साही माता-पिता, और लोभी शिक्षकों की भेंट चढ़े हुए हैं| मैं बहुत से सरकारी शिक्षकों को जानता हूँ, जो पढ़ाने जाते हैं मगर जानते हैं उनके पढ़ाने-न-पढ़ाने से छात्र के माता-पिता को फर्क नहीं पढ़ता| उनका पैसा गैर-पाठशाला शिक्षक के पास जाने को व्याकुल है| यह अलग बात कि दोष सरकारी शिक्षक को जाता है|

इसके ऊपर से सरकार है, निरी-निकम्मी| अगर बच्चों को मतदान का अधिकार होता तो आदतन अनुपस्तिथ रहने वाले छात्रों के दबाब में ये शिक्षा को राष्ट्रद्रोही कृत्य घोषित कर देते|

अब तो पाठशाला पढाई के लिए नहीं है| पाठशाला में, मध्याह्न भोजन के अलावा सब कुछ पढाई से बच्चों को दूर रखने का पवित्र प्रयास है|

हर दिन हल्ला रहता है, बच्चों को पर्यावरण सिखाओ, देशप्रेम सिखाओ, भाईचारा सिखाओ, ईश-भक्ति सिखाओ, धर्म-कर्म, माता-पिता का सम्मान सिखाओ, संस्कार दो, ये सिखाओ वो सिखाओ| कुल मिलकर पढाई के अलावा सब कुछ सिखाओ| कुल मिलाकर बच्चों को संस्कार- संस्कृति देने सिखाने का काम परिवार से निकल कर पाठशाला के गले पड़ गया है| परिवार, मात-पित क्या करें – वेतन की गुलामी और टेलिविज़न का आराम?

अभी समाचार है, आंध्रप्रदेश में पाठशाला में “अम्माकू वन्दनं” होगा| भाई, बच्चों को पढ़ा-लिखा लो| उनमें अच्छा पढ़ने –लिखने की रूचि जगा लो| बाकि काम घर में होने दो| अगर कोई शंका है तो उनके माँ-बाप को साल में दो हफ्ते पढ़ा लो| इस प्रकार की संस्कृति – संस्कार बच्चे देखकर सीखते हैं, सीख भी लेंगे|

 

खिचड़ी-भोग

खिचड़ी भोग भी अपने आप में एक मुहावरा है| हर किसी को पकी पकाई खीर खिचड़ी चाहिए| कोई पकाना नहीं चाहता| यह मुहावरा शायद उस जमाने में बना होगा जब खिचड़ी देग दम करके बनती होगी| आजकल तो प्रेशर कुकर का जमाना है मगर वक्त है कि आज भी कम पड़ता है| हमारे कुछ मित्र तो उस दिन का इंतजार कर रहे है जिस दिन कोई पकी पकी खिचड़ी फेसबुक या व्हाट्सएप पर भेज दे और वो उसका लुफ्त उठा लें|

हमारे बहुत से गीताप्रेमी मित्र बनिए की दुकान पर टंगा गीतासार पढ़कर बड़े हुए| आजकल उसकी फ़ोटो मोबाइल में देखकर वेद-वेदांग के ज्ञाता हुए जाते हैं| हमारे एक मित्र मोदी-मार्ग पर चलने का उपदेश रोज भेज देते थे| आजकल शांत हैं, उन्होंने मोदी-मार्ग घर के दामाद जी को भी भेजा था और उन्होंने इसे ग्रहण कर लिया| एक अन्य मित्र माताजी के स्नेह-दोष के कारण भारतीय सेना की सेवा न कर पाए आजकल रोज दो चार पाकिस्तानी चटका देते हैं|

उधर, कामरेड रोज इतनी क्रांति करते हैं कि सड़क पर उतरने और अपने कैडर से बात करने का वक़्त नहीं निकलता| उनकी अभिव्यक्ति की आजादी भी आजकल ट्विटर-फेसबुक वाले भैया के हाथ गिरवी पड़ी है, गाहे – बगाहे लुपलुपाती रहती है|

एक मित्र ने सावरकर के नाम पर गौहत्या रोकने की मांग कर रहे थे| मैंने बोला कि सावरकर गाय को पशु मानते थे, माता नहीं| दो चार छंद सुना कर बोले; गौहत्या विरोध का आन्दोलन किसने शुरू किया| अठारवीं शताब्दी के स्वामी दयानंद सरस्वती का नाम लेने पर बोले आज से उनकी भक्ति| उनके हाथ सत्यार्थ प्रकाश थमा कर मुड़ा ही था कि उनकी जिव्हा पर पुनः सरस्वती विराजमान हो गई| एक दिन दोबारा मिलने अपर पूछने लगे, आप भगतसिंह को क्या मानते हैं| जानता था, कहाँ लपेटेंगे; जबाब दिया नास्तिक| उनका दिमाग भन्ना गया| “मैं नास्तिक क्यों हूँ” पकड़ाकर विदा किया| आजकल कन्नी काटने लगे हैं|

आजकल मित्र लोग मुझसे कानूनी बातों पर ही बात करते हैं| मगर नुक्ता निकल ही आता है| खैर, उसकी बातें फिर कभी| मुझे आज खाने में खिचड़ी बनानी है|

 

अकबर

अकबर का दौर अजीब हालत का दौर था| एक बदहवास सा मुल्क सकूं की तरफ बढ़ता है| अपनी लम्बी पारी से भी और बहुत लम्बी पारी खेलने की चाह में अबुल मुज़फ्फर जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर बादशाह ने अपनी हालत कुछ अजीब ही कर ली थी| यह उपन्यास उस “हालत –ए – अजीब” से शुरू होता है, जिसमें बादशाह सलामत कह उठे थे – “गाइ है सु हिंदू खावो और मुसलमान सूअर खावो|” यह वो शब्द है जिनको मूँह से निकलने पर तब और आज सिर्फ जुबां नहीं, सिर कट सकते हैं, और तख़्त बदल उठते हैं| यह वो बादशाह अकबर है, जिन्हें न सिर्फ पूर्व जन्म में शंकराचार्य के श्रेष्ठ ब्राह्मण कुल में जन्मे मुकुंद ब्राह्मण का अवतार बताया गया बल्कि जो खुद “अल्लाहो अकबर” को नए अर्थ देने की कोशिश में पाया गया| यह वो अकबर बादशाह है जो बाद में “दीन – ए- इलाही” की शुरुआत करता है और छोड़ सा देता है| वह बादशाह अकबर जो, “जैसे जिए वैसे मरे| ना किसी को पता किस दीन में जिए, ना किसी को पता किस दीन में मरे|”

यूँ; पुस्तक को पढ़ने और पसंद करने के बाद भी इसकी विधा के बारे में सोचना पड़ता है | हालांकि लेखक प्रकाशक इसे उपन्यास कहते हैं| मैं इसे ऐतिहासिक विवरण कहूँगा| हम सबको पढ़ना चाहिए| हिंदी में ऐतिहासिक उपन्यास बहुत है| शाज़ी ज़मां का “अकबर” इतिहास का पुनर्लेख है जिसे औपन्यासिकता प्रदान करने का कठिन प्रयास लेखक ने किया है| वो कुछ हद तक सफल होते होते असफल हो जाते हैं| असफल इसलिए कि आप पाठक इस से ऊब जाता है| तमाम प्रसंगों में सन्दर्भों की भरमार है| बकौल शाज़ी ज़मां, “इस उपन्यास की एक-एक घटना, एक-एक किरदार, एक-एक संवाद इतिहास पर आधारित है|”

समय, सनक और समझ से जूझते अकबर बादशाह की टक्कर पर हिंदुस्तान में डेढ़ हजार साल पहले सम्राट अशोक का जिक्र आता है| इन दो से बेहतर नाम महाकाव्यों में ही मिल सकते हैं| अकबर की जिन्दगी के ऊँचे नीचे पहलू इस विवरण में आए है जिनमें से एक को, इस पुस्तक को बाजार में बेचने के लिए भी उछाला गया था – अकबर के मूंह से निकली एक गाली जिसे तमाम हिंदुस्तान आज भी देता है| पुस्तक अकबर को उसके समकालीन लेखकों और इतिहासकारों के नज़रिए से हमारे सामने रखती है| अकबर के समकालीन इतिहास की जानने समझने के लिए यह महत्वपूर्ण विवरण प्रदान करती है| साथ है, हिंदुस्तान का अपना माहौल आज भी कुछ ज्यादा नहीं बदला है इसे समझा जा सकता है|

यह विवरण उपन्यास तो नहीं बन पाया है साथ ही उन महत्वपूर्ण बातों से नज़र चुराता सा निकल गया है जिन्हें इसके पत्रकार – इतिहासकार लेखक छु सकते थे| मसलन अकबर के हिंदुस्तान का फ़ारस, तुर्की, पुर्तगाल और पोप के साथ रिश्ता तो चर्चा में आता है; मगर उन हालत के बारे में टीस छोड़ जाता है जो तुर्की और इस्लाम के यूरोप और ईसाइयत से रिश्ते की वजह से पैदा हुए थे और नतीजतन हिंदुस्तान और दुनिया की तारीफ में बहुत उठापटक हुई| अकबर के जाने के बाद का दौर, धर्मतंत्र और राजतन्त्र के कमजोर होने का दौर भी था जिसने बाद में संविधानों और राष्ट्रों के लिए रास्ता खोल दिया था|

कुल मिला कर किस्सा यह शेख़ अबुल फ़ज़ल के अकबरनामा और मुल्ला अब्दुल क़ादिर बदायूंनी के ख़ुफ़िया मुन्तखबुत्तावारीख के इर्द गिर्द बुना गया है और इसमें तमाम लेखकों और इतिहासकारों की लिखत को रंगतभरे खुशबूदार मसालों के साथ परोसा गया है|

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पुस्तक – अकबर

लेखक – शाज़ी ज़मां

प्रकाशक – राजकमल प्रकाशन

प्रकाशन वर्ष – 2016

विधा – उपन्यास

इस्ब्न – 978-81-267-2953-1

पृष्ठ संख्या – 350

मूल्य – 350 रुपये