टहलने वाली शामें

शाम जब बसंती होने लगें और यह शाम दिल्ली को शाम नहीं हो तो टहलना बनता है|

गुजरा ज़माना था एक, जब हर शाम टहलने निकल जाते थे| उस शामों में धुंध नहीं थी, न धूआँ था| हलवाई की भट्टी के बराबर से गुजरने पर भी इतना धूआँ आँखों में नहीं चुभता था, जितना इन दिनों दिल्ली की किसी वीरान सड़क पर राह गुजरते आँखों में चुभ जाता है| न वाहनों की चिल्ल-पों थी न गाड़ियों से निकलने वाला कहने को प्रदुषण मुक्त धूआँ| गलियों में आती हवा सीधे खेतों जंगलों की ताजगी लाती थी|

उन दिनों घर घर टेलिविज़न नहीं होते थे और लोग मोहल्ले पड़ोस में और मोहल्ले पड़ोस के साथ घूमना पसंद करते थे| भले ही उन दिनों कान, सिर और गले में लटका लिए जाने वाले हैडफ़ोन आम नहीं थे मगर गली कूचों से कोई दीवाना ट्रांजिस्टर पर विविध भारती बजाते हुए गुज़र जाता| अगर वो नामुराद वाकई गली की किसी लड़की का पुराना आशिक होता तो लड़की को मुहब्बत और पास पड़ोस को जूतम-पैजार की टीस सी उठा करती|

घर से निकलते ही पान की तलब होती और दो नुक्कड़ बाद पनवाड़ी की दूकान से दो पत्ती तम्बाकू पान का छोटा बीड़ा मूँह में दबा लिया जाता| अगर घरवाली थोड़ा प्यार उमड़ता तो चुपचाप घर खानदान के लिए एक आध पान के हिसाब से पान बंधवा लिए जाते| शाम थोड़ा और सुरमई हो जाती| लाली होठों से होकर दिल और फिर जिन्दगी तक फल फूल फ़ैल जाती|

पान की दुकानें टहलने वालों का एकलौता ठिकाना नहीं थीं| मिठास भरे लोग अक्सर मिठाई की दुकान पर दौना दो दौना रबड़ी बंधवाने के शौक भी रखा करते| मगर रबड़ी का असली मजा मिट्टी के सकोरों में था|

चौक पर मिलने वाले कढ़ाई वाले मलाईदार दूध का लुफ्त उठाते लौटते| अब वो ढूध कहाँ? चौड़ी कढ़ाई में मेवा मखाने केसर बादाम के साथ घंटा दो घंटा उबलने के बाद ये दूध आजकल की मेवाखीर को टक्कर देता| ढूध पचाना कोई आसान काम तो नहीं था| सुबह उठकर पचास दण्ड पेलने और सौ बैठक लगाने के बाद मांसपेशियां क्या रोम भी राम राम करने लगते|

अक्सर लोग अपने साथ नक्काशीदार मूठ के बैंत ले जाते| गली के कुत्ते उन बैंतों को देखकर भौंकते थे या आवारा घूमते आदमी को, इसका पता शायद किसी को नहीं था| मगर बैंत शान दिखाने का तरीका था और रुतबे की पहचान थी|

मगर टहलने जाना भी कोई किसी ऐरे गैरे का काम नहीं था| अगर टहलने वाले के पीछे एक अर्दली भी टहल करता हो तो मजा कुछ था शान कुछ और|

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उम्मीद भरा घर

मानवता का इतिहास केवल युद्धों और राजाओं का इतिहास नहीं है| बीमारियों का अपना अलग इतिहास और ऐतिहासिक प्रभाव रहा है| एक ही बीमारी का असर हर किसी व्यक्ति पर अलग अलग होता है| समय के साथ बीमारी भी रूप बदलती है तो बीमारी के नए इलाज भी इजाद होते हैं| परन्तु बीमारियाँ पूरे परिवार को हिलाकर रख देतीं है| कई बार घर बीमारियों की वजह आर्थिक रूप से बर्बाद हो जाते हैं, तो कभी उन्हें मानसिक रूप से बीमारी लम्बे समय तक परेशान करती है| ऐसा तब भी होता है जब बीमार व्यक्ति पूरी तरह ठीक हो जाए| अगर बीमारी बनी रह जाए तब समस्या है ही|

मैंने इस कथा पुस्तक में एक बीमारी से प्रभावित घर के बारे में बात की है| यह लगभग हर घर की कथा है जिसने बीमारियों का सामना किया है|

घर बीमारियों के कुछ गम्भीर अनुभवों से गुजरता है और अपनी भावनात्मक कथा कहता जाता है| घर द्वारा भोगी हुई इस पीड़ा के साथ हम परिवार और समाज के संघर्षों से गुजरते हैं| कोशिश रही है कि गंभीर परिस्तिथियों में भी कथा बोझिल नहीं हो जाए| पूरी कथा में घर अपनी उम्मीद नहीं खोता है|
अलग ही शैली में लिखी गई यह कथा स्वाभाविक रूप से सरल सहज भाषा में आगे बढ़ती है और पाठक को बाँध कर रखने का प्रयास करती है|

यह पुस्तक पाठकों के लिए प्रकाशित की गई है| इस समय यह इ-बुक फॉर्मेट में अमेज़न किन्डल पर उपलब्ध है| इसे मोबाइल, टैबलेट, लैपटॉप, कंप्यूटर, आदि विभिन्न उपकरणों के किन्डल एप पर पढ़ा जा सकता है| खरीदें पढ़े और अपना विचार अवश्य साँझा करें| विशेष आग्रह है कि पुस्तक पढ़ने के बाद अमेज़न पर इसका रिव्यु अवश्य दें|

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उम्मीद भरा घर

उम्मीद भरा घर

पुस्तक – उम्मीद भरा घर
लेखक – ऐश्वर्य मोहन गहराना
भाषा – हिंदी
पुस्तक रूप – किन्डल ई पुस्तक
वितरक – अमेज़न एशिया पेसेफिक होल्डिंग्स प्राइवेट लिमिटेड
प्रकाशन वर्ष – 2019
विधा – कहानी
पृष्ठ संख्या – १०६ (अनुमानित)
मूल्य – मात्र ४९ रुपये

आरक्षण बेचारा!!

मानसून और चुनाव हमारे राष्ट्रीय मौसम हैं| इन मौसम में मेढ़क और नेता अपने बिल और बंगलों से बाहर निकल आते हैं| मॉनसून और चुनावों के बाद दिवाली शुरू हो जाती है, इसलिए पुराने साज-सामान और वादों को धो पौंछ कर चमकाया जाता है|

इस बार प्रधानमंत्री जी ने पुराने वादे को वादों के कब्रिस्तान से खोदखाद कर खड़ा कर किया है| गरीबों को दस फ़ीसदी आरक्षण मिलने जा रहा है| बधाईयाँ… , … …. … थोड़ी देर बाद|

सवाल यह नहीं रहा कि पिछले पच्चीस साल में कितने लोगों की आरक्षण का लाभ मिला और आरक्षित श्रेणी के कितने पद खाली छूट गए? सवाल खास ये है कि नौकरियां कहाँ हैं? आज बेरोजगारी का आंकड़ा ९ फीसदी के पास पहुँच चुका है| सरकारी नौकरियां लगातार घटी हैं, तो आरक्षण के वास्तविक अवसर कम होते रहे हैं| सरकारी खर्च में कटौती के नाम पर अधिकतर सरकारी काम ठेके पर हैं या व्यवसायिक करार दिए जाकर निजी क्षेत्र को बिक चुके हैं|

आरक्षण की इस घोषणा का सबसे खूबसूरत पहलू है – गरीबी का पैमाना|

सालाना आठ लाख की पारवारिक आय आरक्षण वाली गरीबी का पहला मापदंड है| गरीबी रेखा तो बेचारी आरक्षण वाली गरीबी आगे पानी मांगती है| यह आंकड़ा देश की प्रति व्यक्ति आय से बहुत अधिक है| देश की लगभग नब्बे प्रतिशत से अधिक आबादी इस आय निर्धारण के हिसाब से गरीब घोषित हो गई है| सरकार ढ़ाई लाख से उपर सालाना आय पर आयकर वसूलती है| बहुत से शहरी मित्र कहते हैं कि आयकर सीमा प्रतिव्यक्ति है और आरक्षण सीमा प्रतिपरिवार| मगर पति पति दोनों चार चार लाख से कम कमायें तो दोनों आयकर अमीर और आरक्षण गरीब होंगे|

मैं इस बात से सहमत होना चाहता हूँ कि गरीबी रेखा से नीचे वाले व्यक्ति को आरक्षण देने का कोई फायदा नहीं होगा| कारण वास्तविक गरीबी रेखा से नीचे वाले गरीब का बच्चा इतना पढ़ लिख नहीं पाता कि किसी सरकारी पद के लिए वास्तव में योग्य घोषित हो पाए| चपरासी के लिए भी कम से कम आठवीं पास उम्मीदवार चाहिए होता है| अगर किसी की वास्तव में लाभ देना है तो इस आरक्षण के लिए गरीबी की सीमा रेखा वास्तविक गरीबी रेखा से निश्चित ही ऊपर होनी चाहिए| मगर यह आठ लाख इस रेखा से बहुत ऊपर है|

जमीन या घर के पैमाइश भी बड़ी अजीब है| सौ एकड़ का सिचाई विहीन ऊसर किसी परिवार को अमीर नहीं बना सकता तो मरीन ड्राइव पर दस फुट का घर या दफ्तर लेना बहुत से अमीरों के बस की बात नहीं| कुल मिलाकर संपत्ति के आधार पर गरीबी का कोई वैज्ञानिक निर्धारण नहीं हो सकता|

ध्यान देने की बात है कि आर्थिक आधार पर आरक्षण देने का न मुद्दा नया है न प्रयास| यह मुद्दा संविधान सभा के सामने भी आया था और प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव ने बाकायदा नियम भी बनाया था| पहले संविधान सभा और बाद में उच्चतम न्यायालय ने इसे संविधान सम्मत नहीं पाया| संसद में विधेयक पास हुआ है, विधानसभाओं में भी हो जाएगा| मगर… … नौकरी हो तो मिलेगी|

शेष कुशल हैं| चुनाव की चुनावी बधाई|

चतुर सहायक, सकुशल जीवन

जिन्दगी की रफ़्तार पर दौड़ने के लिए वक़्त से आगे दौड़ना होता है| ज़िन्दगी रोज रफ़्तार बढ़ा देती है| इसी रफ़्तार को पाटने और बढ़ाते जाने की कोशिश का नाम विज्ञान और तकनीक है| इस तकनीक का कुशल प्रयोग करना चतुर होना है, चतुर  होना है|

इंसान के लाखों सालों के इतिहास में कुछ हजार ही हुए हैं पहिया ढूंढे हुए| पिछले हजार साल में इंसान में बैलगाड़ी से लेकर चतुर कार तक का सफ़र तय किया है|

इंसान को अपनी जिन्दगी के थपेड़ों का सामना करने के लिए जिस सच्चे साथी की जरूरत हैं, वह वैज्ञानिक तकनीक ही है| जब गहरी नींद के बाद आँख नहीं खुलती, कलाई में पड़ा हुआ कड़ा हौले हौले आपकी कलाई सहला कर ही जगा आपको देता है| आपकी रात भर की नींद का पूरा खाका आपके सामने है| अपने दिन की योजना करने से पहले आपको अपनी आज की क्षमता और स्वास्थ्य का पता चल चुका है| आपका चतुर  कड़ा आपसे कहता है, आज थोड़ा सा और पैदल चलो मेरे आका|

चतुर पहनावा (Smart Wearable)

आप तैयार होकर ताकत और ऊर्जा से भरा कलेवा करते हैं| अपनी लखटकिया बाइक पर बैठते ही आपका हेलमेट गंतव्य का ट्रेफ़िक मुक्त रास्ता बताने लगता है| आप निश्चित ही सुरक्षित और मित्रवत हेलमेट के साथ है| लम्बे और शांत मार्गों पर अपने इस मित्र से कुछ गाने या कहानी सुनाने की फ़रमाइश भी कर सकते हैं|

दिन भर आप अपने लिए रोजी रोटी, ऐश-ओ-आराम, शान-ओ-शौकत और ढेर सारा अहम कमाने के लिए परिश्रम करते हैं| शाम तक आपका थकना स्वाभाविक है|

शाम को कार्यालय से आप अपना चतुर ऐनक लगा कर निकल लेते हैं| आपका ऐनक आपको राग भैरव में “मोहे भूल गए साँवरिया” सुना कर आपका मन हल्का कर रहा है और आप अपने साहब को “ऐ मालिक तेरे बन्दे हम” गाते गाते कार्यालय से निकल लेते हैं|

चतुर घर  (Smart Home)

घर में घुसते हुए आपको पता लगता है की बच्चों ने धमाचौकड़ी मचा रखी है| आपके बैठक में जलती हई तेज नर्तक रोशनियाँ, आपकी आँखें बहुत दूर से ही चौंधा देती हैं| मगर घर के अन्दर आपका पहला कदम एकदम शानदार हैं| आप पाते हैं कमरे में शांत संगीत हैं, मध्यम रौशनी हैं और आपके कुछ प्यारे प्यारे से दो बच्चे मुस्कुरा रहे हैं| आप खुश होते हैं कि यह कमाल बच्चों का नहीं, आपका है – आपके चतुर  घर का है| आपका कॉफ़ी पीने का मन है और कमरे की रोशनियाँ अपना रंग बदल कर उस रंग में रंग जाती है|

सामने दीवार पर लगा मोनिटर बता रहा है, आपके घर के दरवाजे पर आपका बचपन का वो यार आया है, जिसके साथ बचपन में आपने मंदिर के पिछवाड़े बैठकर पहली बार दारू पी थी| ये पठ्ठा खुद तो दारू पीता नहीं, मगर आपको पीना सिखा गया| आप खुश है, थकान उतर गई है| आप सोफे पर बैठे बैठे ही दरवाजे को खुल जाने का हुक्म दे देते हो| वो अन्दर आकर अपने मोबाइल रिमोट से आपके टेलिविज़न पर सहगल के “ग़म दिए मुस्तकिल” की जगह “देशी दारू इंग्लिश बार” लगा देता है|

बात से बात निकलती है, बातों में वक़्त बदलता है| आप याद करते हैं, जब आप जब भी दिल्ली या कलकत्ता जाते थे तो रास्ता भूल जाते थे| कभी समझ नहीं आता था कितनी रेड लाइट के बाद वो तीसरी रेड लाइट आएगी जिससे तीसरा लेफ्ट कट लेना है| अब हाल ये है कि न रास्ता पूछने की जरूरत, न याद रखने की| आपको हर कदम पर रास्ता बताने वाला मौजूद है| अनजान शहरों में भी आप सिर्फ एक ऐनक के सहारे अपने रस्ते चले जाते हैं| यह रास्ते शायद ही गलत होते हैं| कोई गलती हो तो आप उसे सुधारने में मदद कर सकते हैं|

चतुर रोशनियाँ (smart lights)

अब तो हाल यह की घर के बाहर तो क्या घर में भी तकनीक आपको राह दिखाती है| आपका ख्याल रखती है| अब आपकी जरूरत के हिसाब से घर अपने आप की ढाल लेता है| रंग, रोशनियाँ, गीत, संगीत, फिल्म सब आपके मूड के हिसाब से बदल जाते है| जब आप यह महसूस करते हैं कि आपके मन के हिसाब से आपका घर अपने को ढाल लेता है तो अधिक सकारात्मक महसूस करते हैं| आप के घर में आज टेलिविज़न ही नहीं, और भी उपकरण चतुर  होते जा रहे हैं| इस सब से दैनान्दिक जीवन पहले की अपेक्षा और अधिक सरल होता जा रहा है| यह अलग बात है कि यह तकनीक आज भी बहुत से लोगों की पहुँच से बाहर है|

आपको अपने कैमरे को बार बार निर्देश नहीं देने पड़ते, आपके घरेलू उपकरण अपने काम पहले की अपेक्षा अधिक सरलता से और स्वयं ही कर लेते हैं|

तकनीक से शिकायतें भी हैं| बचपन की बहुत सी शरारतें अब मुश्किल हो गई हैं| आजकल के बच्चों को तो वो मजे भी नहीं कि दोपहर में किसी का दरवाज़ा खटखटा कर छुप जाए और पकड़े न जाएँ| अब तो दरवाजे दरवाजे कैमरा लगा है| अब बच्चे और चोर दोनों ही किसी बुजुर्ग को परेशान नहीं कर सकते|

बातों के साथ आपका मूड बदल जाता है और एक बार फिर आप कमरे की रौशनी का रंग और चमक बदल देते हैं| नाचने का मन भी होना ही चाहिए| आपके दुनिया भर के गानों का संग्रह है| आप अपने पालतू जिन्न को हुक्म देते हैं, पुराने गाने और हल्का पंखा चलाने के लिए| तकनीक की अदृश्य शक्ति आपके हुक्म की तामीर करने के लिए मौजूद है|

आप आज दुनिया के किसी भी कौने से अपने माता पिता के संपर्क में रह सकते हैं| उनकी यादों को अपने पास संजो सकते हैं| बूढ़े माँ-बाप को बार बार न रौशनी जलाने के लिए उठना, न दरवाजा खोलने के लिए| इस तरह की बहुत सी सुविधाएँ हैं| बस इतना है कि वो थोड़ा बहुत हाथ पैर चलाते रहे, आरामतलबी में बिस्तर न पकड़ लें| तो इस सब के लिए भी उनके पास नया कड़ा है तो कलाई में पड़ा पड़ा उनको चेताता रहता है|

आज सबसे जरूरी है किसान का चतुर होना| किसान को कब कहाँ क्या बोना है, कब कितना बोना है. अन्य किसानों की बीज बुआई के हिसाब से दाम की संभावित घट बढ़ का कुछ अंदाजा रहे, कब कहाँ भण्डारण करना है, कब उसे बेचने का फायदा है, क्या लागत क्या दाम, यह सब बताने के लिए चतुर  उपकरण हों| ट्रेक्टर या अन्य उपकरण खेत में स्वचालित तरीके से काम कर पायें| न अधिक खाद पानी लग जाये न अधिक जहर की खेत में फ़ैल पाए, इसका इंतजाम होना चाहिए| चतुर घर से ज्यादा जरूरी है चतुर खेत| खेतों को चतुर बनाने के काम में कोई चालाकी नहीं होनी चाहिए| भोजन ऐसी जरूरत है, जिसका विकप्ल हाल फ़िलहाल नहीं है, इसका ख्याल किया जाना चाहिए|

यह नई तकनीक आराम भी है तो संभावित आलस्य भी| इस बीच चाय आ गई| बात लम्बी चलती रही| और तभी ख़त्म हुई जब टेलिविज़न ने आपका पसंदीदा सॉप ओपेरा चला दिया| टीवी पर जब भी #GetFitWithFlipkart अथवा #SmartHomeRevolution का विज्ञापन आता है आप प्रसन्नता से मुस्करा उठते हैं|

पान का बीड़ा

“जिन्हें पान खाने खिलाने की तमीज़ नहीं वो क्या जिन्दगी जियेंगे?” अक्सर कहते|

तब पान का जलवा था| मान का एक पान काफी था| रसास्वादन का शब्द पान का मान रखता है| मजाल क्या कोई दांत पान की कुतर भी जाए| जिन्हें पान चबाने की आदत होती है वो अक्सर ज़ाहिल होते हैं| इंसान की तहजीब, रुतबा, खानदान और तासीर का पता उसके पान खाने के तौर तरीके से लगता है|

पनवाड़ी उन्हें दूर से देखता तो उनका पान लगाना शुरू कर देता| बीच बीच में दो चार दस पान और लग जाते, मगर उनका पान ख़ूब वक़्त लेता| जब तक कत्था चूना अपना रंग एकसार न कर लेते, घोटा चलता रहता| वक़्त होता, जान पहचान, काम बेकाम, चेले – चंटारे उन्हें सलाम ठोंकने आते| एक दूसरे के नाम दुआ पढ़ते| नेहरू से लेकर मर्लिन मुनरो तक बहार होती| पनवाड़ी न  रुकता, घोटा चलता रहता| घड़ी आध घड़ी के बाद पनवाड़ी कहता, रंग मस्त आ रहा है, जजमान| एक उड़ती नज़र पान को चूमती हुई निकल जाती| कहते – पान को भावज बनाना है क्या, बस करो| इधर पान का नुस्खा आगे बढ़ता, उधर देश की ग़रीबी हटती और टाटा बिड़ला भीख मांगने ठंडी सड़क निकल जाते| दूसरी घड़ी बीतते बीतते उमराव जान की याद आती कि छप्पन छुरी  चलती| पूछा तो कभी नहीं मगर कहते है कत्था चूना घोटते हुए पनवाड़ी पान पर सरस्वती यंत्र बनाता|

पान का बीड़ा भक्तिभाव से ग्रहण करते| मन्त्रजाप भी करते होंगे| इसके साथ नगर परिक्रमा का काम शुरू होता| आप भले ही उसे क़स्बा कहें, मगर मील भर पदयात्रा उनका नियम था| कारवां में लोग आते जाते, अलग होते जाते| मंथर गति से कदमताल मिलते जाते| हूँ हाँ करते सबकी बात सुनते जाते| सरकारी ओहदेदार भी इसी क्रम में मेलजोल करते| शायद ही कभी कुछ बोलते| जिनके काम होने होते, चुपचाप हो जाते| कभी कभार कुछ बोलते तो अगले दिन सुबह शहर भर में चर्चा रहता| सोने से पहले मूँह से निचुड़ा हुआ पान कलई के पीकदान में संभाल कर रख देते| दांत का निशान न रहता मगर रस भी तो न रहता|

सुबह समय पूजा पाठ भोजन भजन करते बीतता, शेष विद्यालय में पढ़ाने लिखाने और पीटने चिल्लाने में| गला दर्द करता और थक कर बुरी तरह बैठ जाता| दोपहर घर पहुँच कर चाय चबैना के बाद अपने कुतुबखाने में बैठकर पानदान उठाते| पंडिताइन दोपहर में पुरानी फ़िल्मों के इश्किया गाने सुनती हुई यह पान लगाया करतीं| जिस दिन विविध भारती पर सुरैया के गाने बजते पान में सुर आ जाते| नूरजहाँ का नूर उन्हें बहुत भाता था| जब कभी सही गाना गुनगुनाने लगते, पंडिताइन फूले न समातीं|

पान खाना कला है| जितना देर मूँह में रहे, रस देता रहे| जब तक पत्ता ख़ुद न घुल जाए, उसे न छेड़ते| जिस पान पर कत्था चूना घोटने में घड़ी दो घड़ी लगती हो उसे भोगने में क्या छः घड़ी न लगें? पान मूँह में घुलता रहता| किताबें दिल में उतरती रहतीं| कभी कभी रात बेरात कविता कहानी बन कर पान कागज़ पर उतर जाता| कभी कभी रात होती, सुबह न होती|

पान का दौर चलता रहा, चलते चलते चला गया| इंस्टेंट कॉफ़ी का दौर आया| दो मिनट मैगी आई| तुरंत तैयार खाना आया| चालीसा पढ़ने वाले चार चक्कर अगरबत्ती घुमाकर भगवान को बहलाने लगे|  जिन्दगी जीने की फुर्सत किसे, सलीका किसे? हिंदुस्तान की तहजीब और तासीर किसे? किसे फुर्सत इश्क़ करे, बातें बनाये, घोटा करे, घूँट घूँट जिन्दगी के मज़े करे? किसे फुर्सत जिया करे??

ये कैसा किसान है

किसान!! उसने पूछा?

ये कैसा किसान है, इसने तो सूट पहन रखा है?

यह कोई साधारण प्रश्न नहीं था| मंत्रालय के अधिकारी का आधिकारिक प्रश्न था| बनाई जा रही उत्पादक कंपनी के कागजात पर आधिकारिक लिखत थी|

क्या हमें नया फ़ोटो लगाना है? क्या किसान का मतलब खेत मजदूर होता है या कि हर साल फसल बर्बाद होती रहे|

नेता मोटी खद्दर का कुर्ता पायजामा छोड़ कर लखकरोड़ी परिधान पहनने लगे| मगर दो चीज़ नहीं बदलीं:

  • छोटे बच्चों की सीनरी – झोंपड़ी, नदी, पहाड़ और पहाड़ के पार उगता सूरज; और
  • किसान – फटे धोती कुर्ता, कंधे पर बैलों वाला हल और कभी कभी साथ में बैल|

हम रटरट कर बड़े हुए हैं| हमारे बूढ़े अध्यापक जी भी और हमारे बच्चों की मैडम जी भी| किताबों में फ़ोटो पुराने हैं, शरीरों में पुराने दिमाग|

देश में यदि थोडा बहुत विकास हुआ तो फ़ोटोशॉप में और रहा सहा दिल्ली मुंबई की सड़कों पर|  इसके अलावा तो विकास बस लड़कों का नाम ठहरा और लड़के बेरोजगार ठहरे| हिन्दुस्तानी दिमाग से ज्यादा विकास तो बीमारू बिहार के जिला जमुई के गाँव गमरुआ का हो गया| इस नाते किसान की हालत हिंदुस्तान में बदतर और हिन्दुस्तानी दिमाग में बदतम रही| इधर विकास की सरकार दिल्ली में बैठकर किसान को कंपनी का डायरेक्टर बनाने में लगी| उधर विकास की इल्ली दफ्तर में बैठ कर किसान को फटा पायजामा पहनाने लगी|

हुआ तो यूँ कि शहर दिल्ली और भोपाल में किसान जब ट्रेक्टर लेकर घूमने निकले तो विकास की इल्लियाँ सकते में आ गईं, अरे! ये कैसे किसान हैं कि थीम पार्क वाली गाड़ी में घूम रहे हैं? तुर्रा ये कि कुछ किसान तो आगरा शहर के मंगल बाज़ार से खरीदी हुई पिकनिक ड्रेस भी पहने हुए थे –  क्या कहें बे उन्हें जींस टॉप| पुलिस वालों के बड़े आका तो इतना घबराये कि कहीं मंगलग्रह वालों ने हमला तो नहीं कर दिया| और क्या क्या कहें|

इधर सुना है किसानी में उपज आमदनी भी बहुत बढ़ गई| कुछ किसान साहब तो ऐसे कि दो बीघा ज़मीन में चार करोड़ का देशी घास फूंस उगा कर बैठ गए| अब इन किसान साहब से को कौन पंगा ले| मगर मुद्दा बाज़ार यह गरम हुआ कि करचोरी का महकमा आत्महत्या करते किसान के गले पड़ गया कि अन्नदाता मरते मरते करदाता भी बनते जाइये| सुना कि आत्महत्या के लिए जो जहर पीया था उस पर पूरा बीस टका जी-यस-टी लगा था| सो मामला निपटा|

खैर छोडिये, इस जानेमानेशहर में हमारी कौन सुनता है| कागज पर किसान का फ़ोटो बदलवा दिए| किसान डायरेक्टर हुए और हम उनके छोटे दीवान मुनीम| किसान जी ढूढ़ रहे हैं कि नीरव्वा मिले तो पूछे कि उधार कहाँ कहाँ से उड़ायें भैया| हमारे ग्रामीण बैंक में तो ठेठ देहाती किसान को ही खैराती उधार मिलेगा, वो भी बेनामी की जमीन रहन रखकर|

बाकि जो गप्प वो है, सच तो हम न बताये कभी|

Farmers in the theme park vehicle

Farmers in the theme park vehicle

दिवाली अब भी मनती है

वर्षा उपरांत स्वच्छ गगन में झिलमिलाते असंख्य तारक तारिकाएँ रात्रि को गगन विहार को निकलतीं| लगता सप्तपाताल से लेकर सप्तस्वर्ग तक असंख्य आकाश-गंगाएं कलकल बह रहीं हों| दूर अन्तरिक्ष तक बहती इन आकाशगंगाओं में हजारों देव, देवेश्वर, देवादिराज, सहायक देव, उपदेव, वनदेव, ग्रामदेव आदि विचरण करते| देवियों देवेश्वरियों, सहायक देवियों, वनदेवियों, उपदेवियों, ग्रामदेवियों की मनोहर छटा होती| आकाश मानों ईश्वर का जगमगाता प्रतिबिम्ब हो| प्रतिबिम्बों अधिष्ठाता देव रात्रिपति चन्द्र को ईर्ष्या होती| कांतिहीन चंन्द्र अमावस की उस रात अपनी माँ की शरण चला जाता है| धरती पर कहीं छिप जाता है| उस रचे अनन्त षड्यंत्र इन आकाशगंगाओं की निर्झर बहने से रोकना चाहते हैं|

अहो! वर्षा उपरांत की यह अमावस रात!! देखी है क्या किसी दूर जंगल पहाड़ी के माथे बैठ कर| लहराता हुआ महासागर उससे ईर्ष्या करता है| उस के झिलमिल निर्झर प्रकाश में वनकुल की बूढ़ी स्त्रियाँ सुई में धागा पिरोती हैं| प्रकाश की किरणें नहीं प्रकाश का झरना है| प्रकृति की लहलहाता हुआ आँचल है| वर्षा उपरांत अमावस की रात यह रात अपने नेत्रों से देखी है!!

अकेला चन्द्र ही तो नहीं जो अनंत आकाशगंगाओं से ईर्ष्या करता है| सृष्टि विजय का स्वप्न है, मानव|

प्रकृति का दासत्व उसका उत्सव है| कोई आम उत्सव नहीं यह| स्वर्ग के देवों को भी प्रतीक्षा रहती है| मानव अनन्त आकाश गंगाओं से टकरा जाता है| धरती पर असंख्य दीप झिलमिला उठते हैं| आकाशगंगाओं में विचरण करते असंख्य देव, देवियाँ, देवेश्वर, देवेश्वारियां, देवादिराज, देवाधिदेवी, सहायक देव-देवियाँ, उपदेव-देवियाँ, वनदेव – देवियाँ, ग्रामदेव-देवियाँ घुटनों के बल बैठ जाते हैं| आकाशगंगा के किनारों से यह असंख्य देव देवियाँ पृथ्वी पर ताका करते हैं| अहा! यह दीपोत्सव है, यह दिवाली है| हर वर्ष हर वर्षा दीप बढ़ते जाते हैं| घी – तेल के दिया-बाती अपना संसार सृजते हैं| असंख्य देव भौचक रहते हैं| असंख्य देवियाँ किलकारियां भरती हैं| कौन किसको सराहे| कौन किसकी प्रशश्ति गाये| कौन किस का गुणगान करे| कौन किस की संगीत साधे|

अब देवता विचरण नहीं करते| अब देवियों की छटा नहीं दिखती| अब देव खांसते हैं| अब देवियाँ चकित नहीं होतीं| अब आकाश ईश्वर का प्रतिबिम्ब नहीं होता| चन्द्र अमावस में मलिन नहीं होता| चन्द्र पूर्णिमा को मैला रहता है| चन्द्र चांदनी नहीं बिखेरता| इस चांदनी का चकोर मोल नहीं लगता| इस चांदनी में मिलावट है| इस चांदनी में शीतलता नहीं है|

मिठाइयाँ अब भी बनती है| पूड़ियाँ अब भी छनती हैं| बच्चे अब भी चहकते हैं| कपड़े अब भी महकते हैं| दीवारें अब भी चमकतीं हैं| प्रेमी अब भी बहकते हैं| दीपोत्सव अब भी होता है| दिवाली अब भी मनती है| आकाश में कालिख छाई है| हवाओं में जहर पलता है| दिग्दिगंत कोलाहल है| काल का शंख अब बजता है| ये मानव का अट्टाहास है| यह बारूद धमाका है| यह बारूद पटाखा है| यह बारूद का गुलशन है| यह बारूद की खेती है| यह बारूद का मन दीवाना है|

यह बारूद का उत्सव है| यहाँ दीपक किसने जाना है? यहाँ गंगा किसने देखी हैं? चाँद किसे अब पाना है? यहाँ खुद को किसने जाना?

यहाँ दमा का दम भी घुटता है| हर नाक पर यहाँ अब कपड़ा है|