बेरोजगारी – निजी समस्या

“आजकल क्या कर रहे हो?” जब भी रिश्तेदार यह सवाल पूछते हैं तो भारत का हर जवान जानता है कि वांछित उत्तर है – “बेरोजगार हूँ” और देय उत्तर है – “तैयारी कर रहा हूँ”| वास्तव में देश में कोई बेरोजगार नहीं है – नालायक, अच्छा  निकल गया, प्रतियोगी, प्रतिभागी, हतोत्साहित, कुछ तो करना ही है, कुछ तो कर ही रहे हैं, और आत्महत्यारे|

हमारी मानसिकता ही ऐसे बनी हुई है – कोई शिक्षक नहीं पढ़ता, खुद पढ़ना होता है|कोई नौकरी नहीं देता – खुद ढूंढनी पड़ती है| कोई रोजगार नहीं देगा, खुद अपने लिए रोजगार पैदा करो|

रोजगार की अर्थशास्त्रीय परिभाषा से भी हमें कुछ नहीं करना| हमारे यहाँ गड्ढा खोदता लंगड़ा लूला और नाला साफ करता हुआ स्नातक अभियंता रोजगार में ही माने जाते हैं| जबकि यह साफ़ है कि पहला उदहारण सामाजिक शोषण है और दूसरा बेरोजगारी या छद्म रोजगार| बेरोजगारी की सामाजिक स्वीकृति पढ़ना शुरू करते ही शुरू हो जाती है|

शिक्षा का बुरा हाल, शिक्षक और विद्यालयों से अधिक हमारे अभिभावकों के कारण है| दस अभिभावक विद्यालय या शिक्षक से जाकर नहीं भिड़ते की पढ़ाते क्यों नहीं|स्कूल से तो हमें हमें केवल पढ़े होने का ठप्पा चाहिए| विद्यलय में हम बच्चे के लिए वातानुकूलन, आदि सुविधाएँ देखते हैं| पढाई के स्तर जानने के लिए उत्तीर्ण होने वाले छात्रों की संख्या /प्रतिशत और स्नातक होने पर पहली नौकरी देखते हैं| हम निजी विद्यालय जाना पसंद करते हैं मगर यह नहीं देखते कि उनके पास कैसा पुस्तकालय है, कैसी प्रयोगशाला है| यह निजी विद्यालय भी विद्यार्थियों को वाणिज्य और कला आदि विषय लेने ले लिए प्रेरित करते हैं| उदहारण के लिए निजी विद्यालयों में विज्ञान विषयों का घटता स्तर देख सकते हैं| यही बात निजी महाविद्यालयों और निजी विश्वविद्यालयों के बारे में है| उसके बाद भी हम निजी कोचिंग में रटने का अभ्यास और महत्वपूर्ण प्रश्नों का तोतारटंत करते हैं| मगर जिन समाचारतन्त्र  में बिहार के प्रथम आये छात्रों का ज्ञान टटोला जाता है, वह निजी क्षेत्र के विद्यालयों पर तफ्सीश करने की हिम्मत भी नहीं करते| निजी विद्यालयों में शिक्षक अभिभावक बैठकों में अभिभावक मात्र उपदेश सुनने जाता है या अधिक हिम्मत करने पर उसे मात्र आश्वासन मिलता है| मगर सरकारी शिक्षकों पर लानत भेजने वाले हम निजी विद्यालय के अधपढ़ शिक्षक से प्रश्न करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते|

यहाँ से ही बेरोजगारी की स्वीकृति शुरू हो जाती है| हमारा बच्चा नालायक है, क्या पढ़ना है यह तय नहीं कर पाता और हमें इसे पैसा फैंक और दो लट्ठ मार कर किसी भी लायक बनाना है|

यहाँ से प्रतियोगिता और साक्षात्कार की तैयारी का अंतहीन सिलसिला शुरू होता है| सरकारी नौकरियां अस्वीकार्य तर्कों के साथ कम की जा रहीं है, मगर हम राजकोषीय घाटे के घटिया बहाने से बहला दिए गए हैं| क्या सरकार बिना संसाधन – मानव संसाधन के काम कर पायेगी| लगभग हर सरकारी विभाग कर्मचारियों की कमी का शिकार है| अधिकतर विभाग अनुबंध यानि गुलामीपत्र यानि संविदा पर अप्रशिक्षित कर्मचारी भर्ती कर रहे हैं| सरकार को अपने सचिव तक बाहर से अनुबंध पर लाने पड़ रहे हैं| मगर अगर सरकारी नौकरियां कम नहीं होंगी तो निजी क्षेत्र के सस्ती सेवा में कौन जाएगा| ध्यान दें कि जब सरकारी नौकरियां थीं तब लोग दोगुने वेतन में भी निजी क्षेत्र में नौकरी करने से कतराते थे| जब सरकारी नौकरियां नहीं है तो आरक्षण तो खैर बेमानी नाटकबाजी ही है|आरक्षण के समर्थन में मूर्ख और विरोध में महामूर्ख ही बात कर सकते हैं|

इस सब के बाद हमारे पास तर्क होता है कि क्या नौकरियां पेड़ पर उग रहीं हैं?  हमारे छात्र पढाई पूरी करने के बाद या तो घर पर बैठ कर तैयारी का प्रपंच करते हैं या फिर अपनी लिखित योग्यता से कमतर कोई भी रोजगार पकड़ लेते हैं| किसी शिकायत का न होना यह स्पष्ट करता है कि उन्हें पता है कि उनके कागज़ की असली कीमत क्या है|

कुछ समय पहले मैं एक कंपनी के लिए साक्षात्कार ले रहा था| मानव संसाधन विभाग की तरफ से सीधा संकेत था कि सरकारी डिप्लोमा होल्डर को निजी विद्यालय के स्नातक अभियंता से अधिक तरजीह देनी है| उनके तर्क साधारण थे| लाटसाहब ने पैसा फैंक कर कागज खरीदा है| यह बात हर अभिभावक और प्रतिभागी जानता है| किसी स्नातक ने अपने से कम पढ़े व्यक्ति के आधीन काम करने से मना नहीं किया|वह अनुभव और वास्तविक ज्ञान को समझते थे|

पिछले तीस वर्ष में सरकारें जनता को यह समझा पाने में कामयाब रहीं है कि शिक्षा और रोजगार सरकारी “खैरात” नहीं हैं, यह आपका निजी प्रश्न है|हमारे सरकारों के पास कोई नक्शा नहीं कि यह बता सकें कि अगले तीन पांच साल में कौन से और कितने रोजगार मिलने की सम्भावना हो सकती है| क्या पढाई की जाये, क्या नहीं? दूसरा इस जनसंख्या बहुल देश में भी हमने अपने कर्मचारियों को बारह घंटे काम करने की प्रेरणा दी है, जबकि अगर सब लोग केवल आठ घंटे काम करें तो डेढ़ गुना लोगों को रोजगार मिल जाये| संविदा आदि के चलते कर्मचारियों की गुणवत्ता घटी है| यह सब छद्म रोजगार और आधुनिक गुलामी या बंधुआ मजदूरी है|

देश में कश्मीरी पंडितों के पलायन से भी अधिक भयाभय तरीके से रोजगार सम्बन्धी पलायन हो रहा है| किसी भी योग्य युवा को अपने घर के आसपास उचित रोजगार अवसर नहीं मिल रहे| दिल्ली, मुंबई और अन्य महानगर पलायन से भरे पड़े हैं| सब जानते हैं कि असंतुलित विकास इस रोजगारी पलायन का कारण है| मगर न हम विकास पर प्रश्न उठा रहे हैं, न बेरोजगारी पर| विकास के नाम पर दो चार चिकनी सड़के हमारा दिल खुश कर देतीं हैं| हम पलायन कर रहे हैं, विस्थापित हो रहे हैं, हम पढ़ लिख कर अग्रीमेंट मजदूर बन रहे हैं जैसे कभी अनपढ़ गिरमिटिया मजदूर बनते थे|(अग्रीमेंट और गिरमिट एक ही अंग्रेजी शब्द के रूप हैं)

कोई प्रश्न नहीं है| प्रश्न तब ही नहीं था जब सत्तर साल पहले आरक्षण घोषित करते हुए सरकार ने ऐलान किया था कि सबको रोजगार नहीं हो पायेगा| प्रश्न तब भी नहीं है जब बेरोजगारी की सबसे भयाभय स्तिथि की सरकारी सूचना आती है| प्रश्न तब भी नहीं जब बेरोजगारी की बढ़ती संख्या देखकर सरकार पकौड़े तलने की सलाह देने लगती है

आखिर हतोत्साहित, शिकायतहीन और सस्ता मजदूर किस मालिक को अच्छा नहीं लगता – मालिक सरकार हो या बनिया|

कृपया, इस पोस्ट पर सकारात्मक आलोचना करें – नकारात्मक आलोचना हमें सुधरने पर विवश कर सकती है|

 

 

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नाक कटना

उन दिनों कहाँ पता था की नाक काटना कोई मुहावरा है| वो बात बात पर ताव देते थे – आजतक किसी ने मेरी नाक नहीं काटी| जब ही अपनी प्रशंषा और अनुशंषा के आवेग में होते अपनी शुद्ध साबित नाक का जरूर दावा करते| उनका सीना उस समय दो गुना फूला रहता| माथा आसमान की तरफ थोड़ा ऊपर उठा| सीधे हाथ को हवा में स्वछन्द उछालते और मुक्त गुरुत्वाकर्षण के साथ जांघ पर पटकते| उस समय जो ताल निकलती वह किसी भी ढोल की आवाज को मात देती| उनके स्वर का गर्व हर किसी श्रोता के हृदय को प्रभावित किये बिना न रहता| उनकी इस बात का मोहल्ले की सामाजिक अवचेतना में गहरा असर था| लोग उनका सम्मान करते| अपने घर से किसी भी दिशा में निकलते चाय नाश्ते के बिना वापिस नहीं लौट पाते| पुराने लोगों को आज तक बात याद है कि सन बासठ की लड़ाई से वह गाजे बाजे के साथ सही सलामत लौटे थे| आजकल के बच्चे शायद न जानें मगर सन बासठ की बहादुरी का वजन पैसठ और इक्कत्तर वालों पर भारी पड़ता था और उनका अलग ही सम्मान था|

उनका प्रेम था मुझ पर| उस समय पूरे मोहल्ले में अकेला बच्चा था जो कभी भी उनकी पीठ पर लटक जाता| कान या नाक पकड़ कर उनमें चाबी भर देता| सुबह की चाय के साथ अगर वो अखबार पढ़ने के आदी थे तो शाम की चाय के साथ बच्चों का साथ उन्हें चाहिए था| और हम बच्चों का प्रिय विषय रहता उनकी बिना कटी नाक| हम सब बच्चे कभी न कभी इस बात की पुष्टि कर चुके थे कि नाक पूरी तरह साबित थी और उसके कटने का कोई चिन्ह नहीं था|

हल्की गर्मियों की उस शाम मैं उनकी गोद में था| हमेशा की तरह कुछ परिचित अपरिचित चहरे उनसे मिलने आये हुए थे| अधिकतर भूतपूर्व सेनिक, मोहल्लेवाले, जातिबंधु और आस पास के बच्चे उनके पास जमे ही रहते| अचानक वह समय आया जब उन्हें अपनी साबित नाक का हवाला देना था| इस बात की पूरी सम्भावना थी कि मेरा चेहरा उनके मजबूत फौजी हाथों और तावदार जंघा के बीच आ सकता था| परन्तु अपनी नाक एक बार लगभग तुड़ा लेने के बाद मुझे अभ्यास था कि अपने को उनके प्रहार से कैसे बचा लेना था|

“मुझे आप भूलकर भी ऐसा वैसा न समझ लीजिये, आज तक कोई गलत काम नहीं किया मैंने| कितने अफसर आये… … गए कोई मेरी नाक तक नहीं छु सका|” उनका हाथ स्वचालित स्वछन्द रूप से हवा में ऊपर उठा, “किसी आज कर किसी ने…” हाथ नीचे गिरने वाला है| मुझे उनके जांघ से हटना है, मेरा हल्का फुल्का सिर ऊपर की और उठा| उनका हाथ जंघा पर ताल देता है, “मेरी नाक नहीं काट पाई”| दूध के कच्चे दाँत मैंने उनकी नाक पर गढ़ा दिए हैं| “आआअ…. उल्लू के…” मैंने तेजी से करवट बदली और गोद से बाहर निकला| उन्होंने अपने सारे दांत जीभ में गढ़ा लिए| “अरी लली सुन…” उन्होंने एक दर्द भरी आवाज में मेरी माँ को आवाज दी| “हाँ चाचा…” मेरी माँ ही क्या पल भर में पूरा घर पूरा मोहल्ला उनके सामने खड़ा था| भरी शाम पूरा सन्नाटा| पिंजड़े में बंद तोता भी सहम कर बैठ गया| मेहमान घबराये हुए थे| और मैं… … विजय के उल्लास और पिटाई के डर के मारे चार छत कूदकर गायब|

जिनके घर जाकर छिपा था, उन्होंने शरणागत का पूरा लिहाज किया| उन्होंने मेरे दो हल्के थप्पड़ मारे मगर तुरंत मेरे वकील बनकर दौड़े गए| वाकया उन्हें मालूम न था, मगर घर में घुसते ही बोले, “देखो बालक ने नादानी में कर दिया, डर कर भाग गया है कहीं, कहीं दूर न चला जाए|” वहाँ नज़ारा अलग था – मेरा लाडला, मेरा बहादुर, आएगा तो जलेबी खिलाऊंगा, कचौड़ी खिलाऊंगा| हिम्मती है लड़का| मेरी पैरोकारी सुनते ही बोले, अगर लड़के ने आपके यहाँ लस्सी पी ली हो तो बुलवा लीजिये, सबके लिए जलेबी मंगवाईं हैं|

चरण स्पर्श

चरण स्पर्श या पैर छूना छुलाना भी हमारे भारतीय समाज में बड़ा मुद्दा हो जाता है| मगर मेरे माता-पिता की बात मानें तो मैंने मात्र चार वर्ष की आयु में इसपर विद्रोह कर दिया था| हुआ यूँ कि मेरे नानाजी के कई भाई एक साथ खड़े थे और उनके पीछे उनमें से एक का अर्दली| मैंने नानाओं के साथ अर्दली के पैर छूए और इसका मजाक बन गया| फिर बाद में मेरे बाबा ने निर्णय दिया जब जिसके प्रति इसके मन में सम्मान जागेगा, यह अपने आप पैर छू लेगा| मुझपर पैर छूने का कभी दबाब नहीं रहा| हाँ, कुछ वर्षों के बाद मैंने उस अर्दली के पैर अपने मन से दोबारा छुए|

हमारे ब्रज में पैर छूने छुलाने में बड़े झंझट भी हैं| बड़ों के पैर छूओ, मगर मामा मामी के पैर नहीं छूने| लडकियाँ पैर नहीं छूतीं बड़ों को उनके पैर छूने होते हैं| दामाद तो खैर पूज्य है ही| मेरे ननसाल में बहुएं घर के बड़े पुरुषों को पैर छूना कहलवा देतीं हैं, पैर छूने की क्रिया मात्र शाब्दिक है| हर परिवार में ऐसे ही अलग अलग विचार हैं| यह सब संस्कृति का सम्मानित हिस्सा है|

मैंने किशोर अवस्था में आकर पैर छूना पुनः शुरू किया मगर मेरी अपनी पसंद रही| मन में सम्मान या प्रेम जगा तो स्वतःस्फूर्त पैर छू लिए| हुआ यूँ भी है कि किसी के प्रति इतना सम्मान जग गया कि मुझे पैर छूना भी पर्याप्त नहीं लगा और कर्तव्यविमूढ़ खड़ा रहा| मेरे जितने भी शिक्षक बढ़िया पढ़ाते रहे मैंने उनके पैर छूए जिनमें दो मुस्लिम शिक्षक भी रहे, जिनके विचार से उनका किसी इंसान से पैर छुलवाना ठीक नहीं था| साथ ही एक शिक्षक को गुरु पूर्णिमा पर पैर से उठाकर भी पटका| ब्रज के नियमों के विरूद्ध अपनी एक मामी के पैर नियमबद्ध सम्मानपूर्वक छूए| ऐसे कई रिश्ते हैं जहाँ मैंने नियम विरुद्ध जाकर पैर छूए हैं और बहुत से रिश्तों में नियमपरक होने पर भी मैंने उस व्यक्ति को सम्मान योग्य नहीं पाया| एक व्यक्ति ऐसे भी हैं जिन्होंने मुझे धमकी दी थी कि टेसू अगर ठीक से पढ़े नहीं तो हम तुमसे पैर नहीं छुलवायेंगे| उनकी धमकी के असर से ही आज मैं कुछ बना हूँ|

मुझे सबसे अधिक दिक्कत उन लोगों से होती रही जो पैर आगे बढ़ा कर पैर छूने का दबाब बनाते हैं| उन्हें मैं नमस्ते करने की काबिल भी नहीं समझ पाता| कई बार मैंने खुल कर मना करने जैसी असामाजिक हरकत भी की तो टालमटोल करने की तो गिनती नहीं रही|

पैर छुलवाने में तो मेरी अजीब हालात हो जाती है| मुझे स्त्रियों से पैर छुलवाना समझ नहीं आता खासकर तब जब उनके पति सिर्फ खानापूर्ति के लिए पैर छूकर गए हों| ऐसे ढीठ पुरुषों की पत्नियों से पैर छुलवा लेना मुझे उस बेचारी स्त्री का अपमान लगता है| घुटना छूने वालों से भी मुझे हमेशा परहेज रहा और खुद भी मैंने किसी का घुटना नहीं छूआ|

मेरे बेटे ने एक बार पूछा कि हमें किसको नमस्ते करनी चाहिए और किसके पैर छूने है| मैंने कहा, दुआ सलाम (आज की भाषा में हाय-हेलो) सबको करो| जिसके लिए मन में सम्मान का भाव आये तो मन की भावना के हिसाब से नमस्ते और पैर छूना अपने आप हो जाएगा| मेरी तरफ से उसपर किसी के भी पैर छूने का दबाब नहीं है| संस्कार और संस्कृति थोपी नहीं जाती|

पुनःच – अयोग्य को दान नहीं देना चाहिए, सम्मान तो बड़ी बात है|

जेल घर

कभी सोचा है आपने – जेल में कौन रहता है? आतंकवादी, नक्सलवादी, घोटालेबाज, अपराधी??

अक्सर नहीं| जेल में आम तौर पर परिवारी लोग रहते हैं| मेरे और आपके जैसे|

जेल हम सब का घर हो सकता है – कभी भी कहीं भी| यह कुछ हद तक हमारे प्रिय परिवार पर निर्भर करता है तो कुछ पुलिस और समाज पर| हम में से कोई भी कभी भी अपराधी करार हो सकता है| अक्सर विश्वास किया जाता है, एक बार पकड़े जायेंगे तो पुलिस कूट कूट कर किसी का भी अपराधी तत्त्व बाहर निकाल ही लाएगी| पुलिस यह करे न करे, समाज जेल जाने पर अपराधी होने का हो पक्का वाला ठप्पा लगाएगा| उसके लिए किसी का आतंकवादी होना जरूरी नहीं| भले ही हम किसी भी अपराधी को देखते ही या पकड़ते ही गोली मार देने की बात करें, मगर अगला जेल में अगला निवास किसी का भी हो सकता है|

कभी सोचा है – जेल बाकि के जीवन का आपका घर|

“ऐसे बहुत से प्रकरण देखे जहाँ भाई खेत के छोटे से टुकड़े के लिए खून के प्यासे हो गए, कितनी बीवियों ने अपने प्रेमियों के लिए अपने पति का खून कर दिया , कितने पतियों ने अपनी बीवी को शंका के आधार पर जिन्दा जला दिया, कितनी बहुओं ने केवल अपने अहंकार की तुष्टि और पैसों के लिए वृद्ध सास ससुर, दूर दूर की ननद, देवरानी, जेठानियों को झूठे दहेज़ के केस में जेल भेजकर आनंद मनाया|”

– जेल अधीक्षक, मध्य प्रदेश

लालच में आप देश नहीं, वह सपना बेचते और तोड़ते हैं, जिसे हम और आप घर कहते हैं| या तो खुद जेल पहुँच जाते हैं या अपने किसी सगे को जेल भेज देते हैं| दोनों में से कुछ भी बात हो, सबको मिलता है – थाना कचहरी अदालत और मकान की सूनी दीवारें| फिर ज्यादा जोर चला तो पारिवारिक रंजिश शुरू हो पीढ़ी दर पीढ़ी चलती है, तब भी जब गाँव, शहर, मजहब सब बदल जाते हैं|

आपका घर और आपका पास पड़ौस दुनिया की सबसे खौफ़नाक जगह हैं| यहाँ से सीधा रास्ता उस घर जाता है जिसे आम हिन्दुस्तानी मजाक में ससुराल कहता है| यह तभी तक स्वर्ग हैं, जब तक यहाँ सब कुछ ठीक ठाक चल रहा है|

ध्यान रहे पारिवारिक झगड़ों में विजय नहीं होती – कौरव या पाण्डव – किसी का वंश नहीं बचता|

कम लिखा ज्यादा समझना|

बेवफ़ा

मेरी बेवफ़ा ने मुझे छोड़ा न था, दिल तोड़ा न था|

मेरी जिन्दगी से रूह निकाली न थी|

मेरी जिन्दगी में न जलजले आये, न सूखी आँखों में सैलाब, न बिवाई फटे पाँवों तले धरती फटी|

जिन्दगी यूँ ही सी घिसटती सी थी, नीरस, बंजर, लम्बी ख़ुश्क सड़क बिना मंज़िल चलती चली जाती हो|

उस के बिना कल दो हजार एक सौ सतासीवीं यूं ही सी उदास शाम थी|

कहवाखाने के उस दूर धुंधले कोने में उसका शौहर कड़वे घूँट पीता था|

काँगड़ा की उस कड़क चाय की चुस्की के आख़िरी घूँट पर ख़याल आया|

इश्क़ मेरे दिल से रिस रिस के तेरे हुज़ूर में सज़दे करता है, मिरे महबूब!

मेरे माशूक किस कहर से बचाया था तूने मुझे|

अनुच्छेद ३७० और आतंकवाद

कानून का कोई भी विद्यार्थी यह मानेगा कि भारतीय संविधान के बारे में आपको कुछ पता हो या न पता को मूल अधिकारों के बारे में पता होना चाहिए| परन्तु मूल अधिकारों के बारे में जानने वाले भारतीय अनुच्छेद ३७० को जानने वाले भारतियों से कम होंगे| मामला वाही है कि अपने सुख दुःख से अधिक इंसान दूसरे के संभावित सुखों से परेशान रहता है|

इन दिनों जब भी अनुच्छेद ३७० की बात आती है, इसे किसी न किसी रूप में आतंकवाद से जोड़ दिया जाता है| अज्ञान या अतार्किकता यह है कि ऐसा प्रचारित होता रहा है कि इसका लाभ मात्र राज्य के एक प्रखंड में रहने वाले एक धार्मिक समुदाय को मिला है| मैं नहीं जानता की आखिर उस प्रखंड के अन्य वर्ग और अन्य प्रखंड के निवासी इसका लाभ क्यों नहीं ले सकते| इस से

मजे की बात यह है कि जिस जम्मू कश्मीर राज्य से यह अनुच्छेद जुड़ा हुआ है, वह इस प्रकार के विशेष प्रावधान वाला अकेला राज्य नहीं है| कई अन्य राज्यों को भी अन्य अनुच्छेदों के अंतर्गत विशेष अधिकार मिले हुए हैं|

अब अगर हम आतंकवाद के मुद्दे पर बात करें तो भारत में बहुत से राज्य किसी न किसी प्रकार के आतंकवाद से जूझ रहे हैं| मध्य और पूर्वी भारत में नक्सलवाद है| उत्तरपूर्व में भी अलग अलग प्रकार से आतंकवाद मौजूद है| परन्तु कश्मीर और पंजाब के आतंकवाद की गूँज दिल्ली में सबसे सुनाई देती है| जी हाँ पंजाब में आज आतकवाद नहीं है| इस राज्य को कोई संवैधानिक विशेष अधिकार नहीं था| राज्य भले ही तकनीकि रूप से अल्पसंख्यक धार्मिक समूह से सम्बन्ध रखता हो परन्तु उन्हें बहुसंख्यक भारतीय आज अपनेपन से देखते हैं|

कश्मीर और पंजाब के आतंकवाद की समानता देखते हैं –

  • भारत पाकिस्तान सीमा
  • सीमावर्ती राज्य
  • धार्मिक अल्पसंख्यक
  • विदेशी धन
  • पाकिस्तानी समर्थन
  • मूल रूप से प्राकृतिक संसाधन में धनी क्षेत्र
  • प्रारंभिक दिनों में केंद्र में कांग्रेस का शासन
  • सरकार की राजनीतिक और कूटनीतिक गलतियाँ
  • हिन्दूवादी/ राष्ट्रवादी राजनीतिक दलों के अलगाववादियों से बनते बिगड़ते लुकाछिपी सम्बन्ध
  • स्थानीय असंतोष
  • आतंकवाद को प्रारंभिक तौर पर स्थानीय समर्थन
  • स्वतंत्र देश की मांग
  • अनियंत्रित पुलिस/सेन्य कार्यवाहियां
  • हर किसी अपराधी को आतंकवादी घोषित करने की पुलिसिया प्रवृत्ति
  • निर्दोष और आम नागरिकों पर दोनों और से निशाना
  • मानव अधिकार उलंघन

दोनों आतंकवाद का एक जैसा गठन साफ़ दिखाई देता है| जबकि पंजाब कोई विशेष दर्जा प्राप्त नहीं था जबकि जम्मू कश्मीर को खास संविधानिक दर्जा प्राप्त है| इसलिए अनुच्छेद ३७० को जम्मू कश्मीर आतंकवाद के लिए दोषी नहीं माना जाना चाहिए| अनुच्छेद ३७० को हटाना केवल आतंकवादियों के हित में काम करेगा कि भारत अपने संविधानिक वचन का पालन करने से पीछे हट रहा है|

हमें समस्या के राजनीतिक हल के लिए प्रयास किये जाने चाहिए| ऐरे गैरे अपराधियों को आतंकवादी कहने के स्थान पर उन्हें कानूनी तौर पर सजाएं दी जाएँ| स्थानीय नागरिकों के साथ सकारात्मक सम्बन्ध बनाये जाएँ| इन सुझावों में कुछ नया नहीं है| इन्हें भारत पंजाब, मिजोरम आदि राज्यों में आतंकवाद के विरुद्ध अजमाया जा चुका है|

बुलावा गुजिया का

अगर मैं आप को गुजिया खाने का बुलावा दे रहा हूँ तो शायद आप भारतीय संस्कृति से पूरी तरह परिचित नहीं हैं| अगर आप को त्यौहार पर पकवान खाने का बुलावा देना पड़े तो आप या तो बाहरी व्यक्ति हैं या गाय, कुत्ते, कौवे, चींटी, पितर, भूत, प्रेत जिन्न| अगर आप भारतीय या भारत प्रेमी हैं तो चले आइये गले मिलने और गुजिया क्या घर में जो कुछ रूखा सूखा होगा पाइयेगा|

यह बुलावा गुजिया बनवाने के लिए मेरे घर आने का है| अपना चकला बेलन साथ लाइए| होली के दो चार गीत भी याद कर कर आइये| होली सिर्फ रंग नहीं है| होली बाजार से गुजिया खरीदकर ले आने की औचारिकता का नाम भी नहीं है| समय के साथ हम सब यह करने लगे हैं, मगर यह अपने आप से और अपनी सामाजिक संस्कृति से खिलवाड़ है|

उन एक मंजिला मकानों की छतें कंधे से कन्धा मिलाकर खड़ी होतीं| पड़ोसी की रसोई से केवल खुशबू आपके आँगन तक नहीं आती थी, आपके लिए दिल खोल बुलावा लाती थी| खुशियाँ सिर्फ परिवार के साथ चुपचाप ढ़ाबे पर खाना खाने का नाम नहीं थीं| वरक, पापड़ और न जाने क्या क्या मिलकर बना करता था| माँ गरीब पड़ोसियों के घर रवा सूजी की गुजियाँ उतने चाव से बनवा आतीं जितने चाव से वो हमारे घर मेवा मखाने की गुजियाँ बनवाने आतीं| दोनों के अपने स्वाद थे| हम बच्चे सूजी की गुजियाँ मांग कर लाते और दूध में गला कर उसकी खीर बना कर खाते| हर घर पकवान का स्वाद अलग होता, अलग मजा होता और अलग अलग वाह वाह होती| आज कितना नीरस है हर दूकान एक सा पकवान|

सुबह से नहीं, हफ्ते भर पहले से बुलावा लगता| दिन तय रहता| दूध वाले से अतिरिक्त दूध का दिन भी सब तय रखते| बाजार में मावा कम हो जाए मगर घरों में दूध बराबर आता –  दो पैसे से दूधिये अमीर नहीं बना करते| बड़े कमरे या बरामदे में जमीन पर गद्दे और चादर बिछतीं| मोहल्ले भर के चकले बेलन सजते| औरतें होली गातीं आतीं और उनके बीच रसिया छिड़ता| कभी कभी हंसी मजाक हदें छूने लगता और दिल उछालें भरता| बच्चे बारी बारी से गुजियाँ सुलाते| बाद में गुजियाँ सिंकना शुरू होती तो पूरे मोहल्ले बंटा करतीं|

नोट – यह आलेख बाजार से लाई गुजिया खाते हुए अपराध बोध में लिखा गया हो सकता है, आप भी इन भावनाओं को साँझा कर सकते हैं|

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