हत्यारे तीमारदार!!

क्या कोई तीमारदार वाकई बीमार के मरने पर गुस्सा हो सकता है? ऐसा करने वाला पागल होना चाहिए या बेहद डरपोक| बीमारों के मरने पर डॉक्टर को पीटने वाले समाज की पतली गलियों में रहने वाले आवारा कुत्ते जैसे है| जिस प्रकार उन आवारा कुत्तों को पिटने का डर लगा रहता है, तीमारदारों को सामाजिक बुराई का डर लगा रहता है| डॉक्टर को पीटने में इनका मरीज से प्रेम नहीं हो सकता क्योंकि मरीज तो कष्ट से मुक्त हो गया| उसके जीवन चक्र का एक चक्र समाप्त| शायद मोक्ष भी मिला हो|

हमारे तीमारदार को लगा रहता है – समाज क्या कहेगा, ठीक से इलाज नहीं कराया? सही जगह नहीं ले गए| पैसा नहीं खर्च किया होगा| अधिकतर तीमारदार का हल्ला यही होता है कि साले डॉक्टर जब पैसा फैंक रहे थे तो मरीज कैसे मर गया?

हमें इलाज कब चाहिए? हमें तो खर्च की फेहरिश्त चाहिए तो समाज के मुंह पर मार सकें| डॉक्टर पर हमला करने वाले तीमारदार अपनी रकम का जादू असफल होने का गुस्सा डॉक्टर पर उतार रहे होते हैं|

कोई कर्तव्यनिष्ठ डॉक्टर मरीज को क्यों मारेगा? कर्त्तव्यविमुख डॉक्टर के लिए तो खैर मरीज सोने का अंडा देने वाली मुर्गी है| डॉक्टर तो इस जिद्दोजहद में लगे रहते हैं कि मरीज ठीक हो न हो मगर जिन्दा रहे| अगर मरीज जिन्दा रहे, आता जाता रहे, तो डॉक्टर का महीने का खर्च भी निकलता रहे| डॉक्टर को पता है इंसान चाहता क्या है – जिन्दगी| भले ही वो जिन्दगी कद्दू हो जाए| देश भर में लाइलाज बीमारियों के सालों महीनों से मराऊ पड़े मरीजों का लेखा जोखा करा लीजिये| बिना किसी सफलता की आशा के बाद भी उन्हें जिन्दगी की पगडण्डी पर घसीटा जा रहा है| आखिर क्यों? समाज का डर, क़ानून का कमीनापन, तीमारदारों का भोलापन और सबसे अंत में डॉक्टर का लालच|

वास्तव में डॉक्टर पर ऊँगली उठानी भी है तो पूछिए कि दस साल एक मरीज को वेंटिलेटर पर क्यों लटका रखा है? एक गोली के जगह अठारह गोली एंटीबायोटिक क्यों लिख दी? बिना मतलब के महीने महीने अलाना फलाना टेस्ट क्यों हो रहा है? बेचारा डॉक्टर दवा कंपनी का दबाव तो फिर भी सह ले मगर मरीज के मामा की गालियाँ कैसे सहे?

घसीट घसीट कर जिन्दगी जीता मरीज विज्ञान या चिकित्सक से अधिक समाज की असफलता है| इस पर कोई नहीं बोलना चाहता| अपने चिकित्सकों पर अविश्वास कीजिये – लम्बे इलाज पर अविश्वास कीजिये| कभी कभी यह भी सोचिये कि कहीं आपका डॉक्टर मरीज को जबरन जिन्दा रखने के सहारे आपका परिवार तो नष्ट नहीं कर रहा| मगर उसपर अपने मरीज की मौत का इल्जाम नहीं लगाइए|

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मरती हुई नदी अम्मा

क्या आप एक पात्र में गंद या गन्दा पानी लेकर अपनी माँ के सिर पर डाल सकते हैं?

अगर आपका उत्तर नकार में है तो आप घटिया किस्म के झूठे हैं| अगर आप एक भारतीय हिन्दू हैं तो आप झूठे ही नहीं महापापी भी हैं| ईश्वर अनजाने में किये गए पाप को तो माफ़ कर भी दे मगर जानते बूझते अनजान बनने से तो काम नहीं चलेगा| ईश्वर के माफ़ करने से क्या माँ दिल से माफ़ करेगी|

नदियाँ, जिन्हें सारा भारत माँ कहता है और जिनका देवी कहकर मंदिरों में पूजन हो रहा है, उनके माथे ऊपर कूड़ा करकट कौन डाल रहा है?

माँ के दुर्भाग्य से यह सब उसकी अपनी धर्म संताने कर रही हैं| हभी हाल में माँ यमुना के किनारे पर उनके पूजन के नाम पर प्रदूषण करने वाले एक स्वनामधन्य हिन्दू धर्मगुरु ने तो अपनी गलती मानने और अदालत द्वारा लगाये गए जुर्माने को देने से इंकार कर दिया| सुबह सुबह नदियों में आचमन करने जाते पूंजीपति अपने कारखानों में प्रदुषण पैदा करते हैं और उसे बिना साफ़ सफाई के नदियों की गोद में डाल देते हैं| बहुत से तो इनता अच्छा करते हैं कि कारखाने में या उसके पास धरती की कोख में अपनी पैदा की गई गंद डाल देते हैं|

अगर किसी माँ का इतना अपमान होगा तो उनका मन मलिन न होगा| क्या वो माँ ये न कहने लगेगी कि ईश्वर उसे ऐसे संतान से मुक्ति दे? क्या वो अपने लिए मृत्यु की कामना न करने लगेगी?

शायद अब नदियाँ ईश्वर से प्रार्थना कर रहीं हैं, हमें पानी मत देना मौला|

तेरी प्यास मेरी प्यास

तेरी प्यास तू जाने, जब मैं प्यास से मरूँगा अपना पानी ढूँढ लूँगा| जाने अनजाने हम सभ्य शहरी यही कहते आए हैं अपने जंगली जाहिल और गंवारों से| अब…

अब पानी जा रहा है| बहुत लूट लिया हमने जंगली जाहिल और गंवारों का पानी| खेती किसानी और सिचाई के नाम पर बने बांध शहरों को पानी देते रहे| कुछ पैसे का बूता था तो कुछ प्रचार तंत्र पर मजबूत पकड़| आज भी हम उन्हें पानी के लिए दोष दे देते हैं| मगर कब तक…

जिन लोगों के लालच ने गाँवों और जंगलों के ताल तालाब तलैया लूट लिए थे वो कब से शहरों में आ बसे| उनके साथ उनका पाप भी| हमेशा पानी का घड़ा नहीं भरा करता पाप का घड़ा भी भरता है|

जंगली जाहिल और गंवारों के पास पानी दस बीस किलोमीटर में पानी तो था जो उनकी औरतें ढो ढो कर ले आतीं थीं| हम और हमारी औरतें… बाजार से खरीदोगे… हा हा हा… कितनी कीमत दे पाओगे?

जो साफ पानी कभी प्रकृति मुफ़्त देती थी आज बीस रुपये बोतल में खरीदते हो… कल… परसों… आज भी एक साल का हमारा पीने का पानी बाजार में पंद्रह हजार साल का पड़ता है| अब परिवार का सोचो…

दिल्ली शहर… इस किनारे से उस किनारे तक कंक्रीट से मड़ा हुआ… यहाँ सड़क किनारे की हरियाली को खोदो तो  नीचे पुरानी सड़क निकल आती है… कुछ तो प्रकृति प्रदत्त भी छोड़ देते| मगर अब वर्षा जल संचयन की भी मशीन लगाओ…|

वर्षा… सुनकर तुम्हें कीचड़ और सड़क पर भरा पानी याद आता है| पुराण में एक कथा आती है.. अमृत जब दैत्यों के गले में उतरा तो तामसिक हो गया… हम वही दैत्य हैं… हमारे नगर महानगर दैत्य का वह गला हैं| जहाँ वर्षा का जल बिना बाढ़ के भी प्रलय बनता है, बीमारी लाता है|

जब एक करोड़ पढ़े लिखे सभ्य लोग पानी के लिए दुकानों पर चीख रहे होंगे… गुहार लगा रहे होंगे… और पानी की कंपनी पानी लाने की कीमत बढ़ा रही होगी… तब एक दिन पैसे ख़त्म होंगे और हमें मरना होगा|

हमें मरना होगा एक साथ प्यासा, तड़पता हुआ, बिना अर्पण के, बिना तर्पण के| मरते हुए सोचना होगा… उन जंगली जाहिल गंवारों को तर्पण तो मिला था… हमारे पास तो मरने वक़्त आंसू भी नहीं होंगे तर्पण के लिए|

पानी रखिये

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अनुपालन के खिलाफ दुष्प्रचार

राजनीति को भारत में दुष्प्रचार का एक गंदा खेल माना जाता है और जनता ने इसे जीवन की वास्तविकता के रूप में स्वीकार कर लिया है। दुर्भाग्य से, कुछ भारतीय पेशेवरों ने अनुपालन और अनुपालन पेशेवरों के खिलाफ दुष्प्रचार करना प्रारंभ किया है| मीडिया की भूमिका भी प्रश्नचिन्हों में घिरने लगी है। यह स्पष्ट है कि भारतीय मीडिया प्रकाशन करने से पहले कोई शोध नहीं करता है और तथ्यों को सत्यापित भी नहीं करता है। 12 जून 2019 को डेक्कन क्रॉनिकल द्वारा प्रकाशित और कुछ अन्य पत्रों द्वारा नक़ल कर छापे गए गए दुष्प्रचार का “वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण से फर्मों के लिए ई-फॉर्म 22 ए को माफ करने का आग्रह” शीर्षक से प्रकाशित किया गया था।

ऐसा लगता है कि एक चार्टर्ड अकाउंटेंट ने फॉर्म आईएनसी – 22 ए, जिसे लोकप्रिय रूप से प्रपत्र सक्रिय (फॉर्म एक्टिव) कहा जाता है, में दिये गए एक जाँच बिंदु के विरुद्ध पांच पृष्ठ का एक लम्बा ज्ञापन प्रस्तुत किया है। कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय द्वारा अच्छी तरह से तैयार किए गए इस प्रपत्र सक्रिय (फॉर्म एक्टिव) का उद्देश्य किसी कंपनी की अनुपालन स्थिति की जांच करना है। पूर्णतः अनुपालित कंपनी के मामले में कंपनी के पंजीकृत कार्यालय के अक्षांश देशान्तर (जियो टैगिंग) को छोड़कर यह प्रपत्र सक्रिय (फॉर्म एक्टिव) लगभग स्वतः भर जाता है। हमने प्रपत्र सक्रिय के बारे में पहले भी विस्तार से चर्चा की है| उसके बाद फॉर्म भरने का समय बढ़ाये जाने के समय; हमने किसी भी पेशे या अनुपालन शासन का को विरोध किये बिना एक व्यावहारिक समस्या के समाधान के लिए एक उचित तरीके पर भी चर्चा की थी। हालांकि, इस फॉर्म को भरने की तारीख को कुछ कठिनाई के आधार पर एक बार फिर से बढ़ाये जाने (आज 15 जून 2019 से आगे) की आवश्यकता हो सकती है, लेकिन उपरोक्त दुष्प्रचार प्रचार में उल्लेखित कुछ भी निश्चित जमीन आधार पर नहीं है।

कुछ महीनों पहले, कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय ने लगभग 5 लाख कंपनियों का नाम कम्पनी पंजी से हटा दिया था| इन कंपनियों ने अपने वार्षिक खातों और वार्षिक रिटर्न तीन या अधिक वित्तीय वर्षों से पंजीकरण कार्यालय में नहीं किये थे। दिलचस्प बात यह है कि कंपनी प्रवर्तकों, शेयरधारकों, निदेशकों, लेखा परीक्षकों, देनदारों और लेनदारों सहित इन कंपनियों के 0.01% हितधारकों ने भी इसपर कभी कोई आपत्ति भी नहीं जताई| केवल मुट्ठी भर हितधारकों ने ही अपनी कंपनियों के पुनर्जीवन के लिए राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण का दरवाजा खटखटाया। यह समझा जाता है कि पंजी से हटाई गईं आधे से अधिक कंपनियों के हितधारकों ने कुछ विशेष उद्देश्यों के लिए इन कंपनियों का उपयोग किया या यूँ कहें कि दुरुपयोग किया| वास्तव में इन कंपनियों को दुरुपयोग के बाद यूं ही छोड़ दिया गया था। इन कंपनियों में, जहां कॉर्पोरेट संरचना का दुरुपयोग किया गया था, उन्हें सही मायनों में शेल कंपनियां कहा जा सकता है। बाकी बंद की गई कंपनियां या तो उचित व्यवसाय योजना के बिना काम शुरू करने वाले निर्दोष प्रमोटरों से संबंधित हैं या उनके प्रमोटर अब जीवित नहीं हैं या कारोबार करने के बाद सेवानिवृत्त हो चुके हैं जिन्होंने अपनी कंपनियों को बंद किए बिना कारोबार को बंद कर दिया है।

हालाँकि, भारत में वर्तमान में संदिग्ध अनुपालन वाली भारतीय कंपनियों के बीच प्रपत्र सक्रिय (फॉर्म एक्टिव) का शुरू से ही दबा छिपा विरोध रहा है। यह भारत में एक कठोर वास्तविकता है कि कुछ हितधारक और कंपनियां व्यापार करने की कठिनाई के बहाने बुनियादी कानूनों का पालन नहीं करना चाहती हैं। सभी आलोचनाओं के बावजूद, भारत ने कंपनी अधिनियम, 2013 आने से बाद से कॉर्पोरेट अनुपालन पर ध्यान केंद्रित करते हुए भी सरल व्यापार इंगिता में श्रेष्ठता की और कदम बढ़ाये हैं| वर्तमान में, प्रपत्र सक्रिय (फॉर्म एक्टिव) के खिलाफ चल रही आलोचना उन कुछ हितधारकों की निराशा का प्रतिबिम्ब है जो कॉर्पोरेट संरचना का दुरुपयोग कर रहे हैं। सरकार के पास इस तरह के दुरूपयोग के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने और “नई शेल कंपनियों के बनने” पर यथासमय निगाह रखने का यह सही समय है। प्रपत्र सक्रिय (फॉर्म एक्टिव) ऐसी प्रभावी और यथासमय जाँचों में से एक है।

पूर्ण कालिक कंपनी सचिव की नियुक्ति

पूर्ण कालिक कंपनी सचिव की नियुक्ति दो दशक से अधिक समय से एक महत्त्वपूर्ण अनुपालन आवश्यकता है। कंपनी में नियुक्त कंपनी सचिव कंपनी के अनुपालन की स्थिति पर यथासमय निगाह रखते हैं और प्रबंधन को कानून का पालन करने के लिए यथासमय सलाह देते हैं। पूर्ण कालिक कंपनी सचिव गैर-अनुपालन से कंपनियों, उनके प्रमोटर और प्रबंधन को आगाह करते हैं। हालाँकि, एक कर्मचारी के रूप में वह गैर-अनुपालन को रोकने में असमर्थ हो सकते है, लेकिन वह निश्चित रूप से किसी भी नियोजित गैर-अनुपालन पर लाल झंडी जरूर दिखाते हैं| हालाँकि, लाल झंडी उठाने की उनकी भूमिका का इस्तेमाल कुछ विशेष हितधारकों द्वारा एक नकारात्मक पेशे के रूप में किया जाता है, जो उनके दुष्प्रचार के हिसाब से व्यवसाय और “व्यावसायिक लाभ” में बाधा डालते हैं। क्या फुटबॉल मैच में रेड कार्ड दिखाने वाले रैफरी को नकारात्मक व्यक्ति कहा जा सकता है? या कि वह खिलाड़ियों को सुचारू रूप से सुरक्षित और प्रसन्नता पूर्वक खेलने में मदद करने वाला सकारात्मक व्यक्ति को है?

पूर्ण कालिक कंपनी सचिव की नियुक्ति पूरी तरह से कानून की भावना का अनुपालन है और इससे अधिक ईमानदार व्यवसाय के लिए यथासमय कानूनी मदद और अनजाने में होने वाले उल्लंघन से खुद को बचाएं रखने का जरिया है। विवेकपूर्ण प्रबंधन वाली कई कंपनियां कानूनी आवश्यकता न होने पर भी या तो स्वेच्छा से कंपनी सचिव को नियुक्त करती हैं या यथासमय मदद पाने के लिए अभ्यासरत कंपनी सचिव की सेवाएं लेती हैं।

संख्या की कमी

आमतौर पर यह दावा किया जाता है कि सक्रिय कंपनियों की कुल संख्या लगभग 10 लाख है लेकिन उपलब्ध कंपनी सचिव संख्या मात्र 50 हजार ही हैं। हालांकि, सभी कंपनियों को एक पूर्णकालिक कंपनी सचिव को नियुक्त करने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन केवल पाँच करोड़ या उस से अधिक भुगतान पूंजी वाली कंपनियों को ही पूर्ण कालिक कंपनी सचिव रखने की कानूनी आवश्यकता होती है। यह दावा किया जाता है कि 90 हजार कंपनियों के लिए मात्र 45 हजार कंपनी सचिवों की उपलब्धता है| परन्तु आजकल दुर्भाग्य से आधे से अधिक कंपनी सचिव बेरोजगार या अर्धबेरोजगार हैं| यह लोग अपने वृद्ध माता-पिता और परेशान परिवारीजनों के सामने अपना चेहरा बचाने के लिए अभ्यास प्रमाण पत्र ले लेते हैं और व्यवसायिक संघर्ष में जुट जाते हैं। वर्तमान में किये जा रहे दुष्प्रचार के अनुसार उपलब्ध ४५ हजार कंपनी सचिवों में से 20 हजार पहले से ही कार्यरत हैं। हमारे पास लगभग 2 हज़ार के ऐसे कंपनी सचिव हो सकते हैं जो सफलतापूर्ण व्यावसायिक अभ्यास कर रहे हैं। शेष 23 हजार कंपनी सचिवों के बारे में क्या सूचना है? वह किसी लाभकारी कार्य के न होने कसे कारण जीवनयापन के लिए संघर्षरत हैं| जब तक ये सभी कंपनी सचिव उचित रूप से कार्यरत नहीं हो जाते, तब तक यह दावा नहीं किया जा सकता है कि कंपनी सचिवों की मांग और उपलब्धता में बहुत बड़ा अंतर है। पहले उपलब्धता को तो उचित उपयोग में आने दें।

प्रवासन का मुद्दा

यह दावा किया जाता है कि कंपनी सचिव विभिन्न कारणों से छोटे शहरों में जाने को तैयार नहीं हैं। यह कोई बढ़िया तर्क नहीं है। क्या छोटे शहरों में कॉरपोरेट कार्यालय या पंजीकृत कार्यालय वाली कंपनियों के साथ अन्य पेशेवर काम नहीं कर रहे हैं? मुद्दा हितधारकों की कंपनी सचिव की नियुक्ति के लिए अनिच्छा का है और इसलिए वे कंपनी सचिव को उचित पारिश्रमिक की पेशकश नहीं कर रहे हैं।

बजट की कमी

वर्तमान दुष्प्रचार में दावा किया कि कंपनी सचिव की नियुक्ति छोटी कंपनियों के बजट में नहीं समाती।यदि संस्थापकों ने अपने व्यवसाय के लिए एक निश्चित संगठनात्मक रूप का विकल्प चुना है तो उन्हें उस संगठनात्मक संरचना से जुड़े कानून का पालन करने की आवश्यकता होती है। क्या संस्थापकों को पिछले तीन दशकों से कंपनी सचिवों की नियुक्ति के आवश्यकता के बारे में पता नहीं है? क्या पांच करोड़ रुपये की चुकता पूंजी वाली कंपनी एक कम बजट की कंपनी है? ऐसा तभी होना चाहिए जब कि कंपनी ने अनुचित वित्तीय सलाह और योजना के आधार पर उच्च भुगतान पूंजी का चयन किया हो। ऐसी कंपनियां कानूनी रूप से अनुमत मार्ग का उपयोग करके अपनी भुगतान पूंजी को कम करने के लिए स्वतंत्र हैं। लेकिन वित्त सलाहकार इस तरह से सलाह क्यों देगा क्यों कि भुगतान पूंजी बढ़ाने के लिए पहली वाली सलाह बिना उचित कसौटी के दी थी।

सरकार को उच्चतर भुगतान पूंजी कंपनियों पर निगाह रखनी चाहिए क्योंकि गैर अनुपातिक उच्च भुगतान पूंजी का उपयोग अधिकतम बैंक ऋण प्राप्त करने के लिए किया जाता है| ऐसे ऋण बाद में समस्यापूर्ण परिसंपत्तियों में बदल जाते हैं।

अन्य नियुक्तियाँ

कंपनी सचिव का अनुपालन अधिकारी रूप में विरोध प्रपत्र सक्रिय (फॉर्म एक्टिव) को ठीक से देखे बिना लक्षित प्रचार के तहत किया जा रहा है| मुख्य वित्तीय अधिकारी, मुख्य कार्यकारी अधिकारी, प्रबंध निदेशक जैसे अन्य प्रमुख प्रबंधकीय कर्मियों की नियुक्ति न होने की स्थिति में भी फॉर्म अनुपालन सम्बन्धी त्रुटियां इंगित करता है| इन अन्य पदों पर नियुक्त किए जाने वाले व्यक्तियों की बहुत अधिक आपूर्ति हो सकती है क्योंकि इन पदों के लिए कोई विशिष्ट योग्यता निर्धारित नहीं है। यह एक विशेष कारण से है – कंपनी सचिव को यथासमय बेहतर अनुपालन में मदद करनी होती है और उसे अतियोग्य होने की आवश्यकता होती है।

निष्कर्ष

इस समय सरकार को हस्तक्षेप बनाये रखना चाहिए ताकि कंपनियों को अपने रोजगार में भले ही जबरन पर बेहतर प्रशिक्षित और जानकार पेशेवर बनाने में मदद मिल सके। सभी उपलब्ध योग्य कंपनी सचिवों की नियुक्ति हो जाने के बाद भी, सरकार को कंपनी सचिव नियुक्त करने की आवश्यकता को कम नहीं करना चाहिए, बल्कि छोटी कंपनियों के लिए योग्यता मानदंड में ढील देने की यह अनुमति दी जा सकती है कि, जो प्रशिक्षित कंपनी सचिव की निगरानी के अधीन एक अर्ध योग्य कंपनी सचिव की नियुक्ति की जा सके। यह निगरानीकर्ता प्रशिक्षित कंपनी सचिव होल्डिंग या सहायक या संबंधित कंपनी में सेवातर हो सकता है। कुछ मामलों में ऐसी निगरानी अभ्यासरत कंपनी सचिव को दी जा सकती है, लेकिन प्रत्येक अभ्यासरत कंपनी सचिव को 20 से अधिक कंपनियों के लिए नहीं यह जिम्मेदारी नहीं दी जाये।

जब सरकार शैशवावस्था में होती है तो कंपनियों के मस्तिष्क में कंप्लायंस डालने के लिए सरकार से आग्रह किया जाता है अन्यथा हम शेल कंपनियों को जारी रखेंगे।

व्यवहार में एक कंपनी सचिव होने के नाते, मैं कह सकता हूं कि रोजगार में कंपनी सचिव वास्तविक समय अनुपालन सलाहकार के साथ मदद करते हैं। निवारण हमेशा इलाज से बेहतर है। सरकार अनुपालन के अभाव में अन्य पाँच लाख शेल कंपनियों को बनना वहन नहीं कर सकती है।

बेरोजगारी – निजी समस्या

“आजकल क्या कर रहे हो?” जब भी रिश्तेदार यह सवाल पूछते हैं तो भारत का हर जवान जानता है कि वांछित उत्तर है – “बेरोजगार हूँ” और देय उत्तर है – “तैयारी कर रहा हूँ”| वास्तव में देश में कोई बेरोजगार नहीं है – नालायक, अच्छा  निकल गया, प्रतियोगी, प्रतिभागी, हतोत्साहित, कुछ तो करना ही है, कुछ तो कर ही रहे हैं, और आत्महत्यारे|

हमारी मानसिकता ही ऐसे बनी हुई है – कोई शिक्षक नहीं पढ़ता, खुद पढ़ना होता है|कोई नौकरी नहीं देता – खुद ढूंढनी पड़ती है| कोई रोजगार नहीं देगा, खुद अपने लिए रोजगार पैदा करो|

रोजगार की अर्थशास्त्रीय परिभाषा से भी हमें कुछ नहीं करना| हमारे यहाँ गड्ढा खोदता लंगड़ा लूला और नाला साफ करता हुआ स्नातक अभियंता रोजगार में ही माने जाते हैं| जबकि यह साफ़ है कि पहला उदहारण सामाजिक शोषण है और दूसरा बेरोजगारी या छद्म रोजगार| बेरोजगारी की सामाजिक स्वीकृति पढ़ना शुरू करते ही शुरू हो जाती है|

शिक्षा का बुरा हाल, शिक्षक और विद्यालयों से अधिक हमारे अभिभावकों के कारण है| दस अभिभावक विद्यालय या शिक्षक से जाकर नहीं भिड़ते की पढ़ाते क्यों नहीं|स्कूल से तो हमें हमें केवल पढ़े होने का ठप्पा चाहिए| विद्यलय में हम बच्चे के लिए वातानुकूलन, आदि सुविधाएँ देखते हैं| पढाई के स्तर जानने के लिए उत्तीर्ण होने वाले छात्रों की संख्या /प्रतिशत और स्नातक होने पर पहली नौकरी देखते हैं| हम निजी विद्यालय जाना पसंद करते हैं मगर यह नहीं देखते कि उनके पास कैसा पुस्तकालय है, कैसी प्रयोगशाला है| यह निजी विद्यालय भी विद्यार्थियों को वाणिज्य और कला आदि विषय लेने ले लिए प्रेरित करते हैं| उदहारण के लिए निजी विद्यालयों में विज्ञान विषयों का घटता स्तर देख सकते हैं| यही बात निजी महाविद्यालयों और निजी विश्वविद्यालयों के बारे में है| उसके बाद भी हम निजी कोचिंग में रटने का अभ्यास और महत्वपूर्ण प्रश्नों का तोतारटंत करते हैं| मगर जिन समाचारतन्त्र  में बिहार के प्रथम आये छात्रों का ज्ञान टटोला जाता है, वह निजी क्षेत्र के विद्यालयों पर तफ्सीश करने की हिम्मत भी नहीं करते| निजी विद्यालयों में शिक्षक अभिभावक बैठकों में अभिभावक मात्र उपदेश सुनने जाता है या अधिक हिम्मत करने पर उसे मात्र आश्वासन मिलता है| मगर सरकारी शिक्षकों पर लानत भेजने वाले हम निजी विद्यालय के अधपढ़ शिक्षक से प्रश्न करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते|

यहाँ से ही बेरोजगारी की स्वीकृति शुरू हो जाती है| हमारा बच्चा नालायक है, क्या पढ़ना है यह तय नहीं कर पाता और हमें इसे पैसा फैंक और दो लट्ठ मार कर किसी भी लायक बनाना है|

यहाँ से प्रतियोगिता और साक्षात्कार की तैयारी का अंतहीन सिलसिला शुरू होता है| सरकारी नौकरियां अस्वीकार्य तर्कों के साथ कम की जा रहीं है, मगर हम राजकोषीय घाटे के घटिया बहाने से बहला दिए गए हैं| क्या सरकार बिना संसाधन – मानव संसाधन के काम कर पायेगी| लगभग हर सरकारी विभाग कर्मचारियों की कमी का शिकार है| अधिकतर विभाग अनुबंध यानि गुलामीपत्र यानि संविदा पर अप्रशिक्षित कर्मचारी भर्ती कर रहे हैं| सरकार को अपने सचिव तक बाहर से अनुबंध पर लाने पड़ रहे हैं| मगर अगर सरकारी नौकरियां कम नहीं होंगी तो निजी क्षेत्र के सस्ती सेवा में कौन जाएगा| ध्यान दें कि जब सरकारी नौकरियां थीं तब लोग दोगुने वेतन में भी निजी क्षेत्र में नौकरी करने से कतराते थे| जब सरकारी नौकरियां नहीं है तो आरक्षण तो खैर बेमानी नाटकबाजी ही है|आरक्षण के समर्थन में मूर्ख और विरोध में महामूर्ख ही बात कर सकते हैं|

इस सब के बाद हमारे पास तर्क होता है कि क्या नौकरियां पेड़ पर उग रहीं हैं?  हमारे छात्र पढाई पूरी करने के बाद या तो घर पर बैठ कर तैयारी का प्रपंच करते हैं या फिर अपनी लिखित योग्यता से कमतर कोई भी रोजगार पकड़ लेते हैं| किसी शिकायत का न होना यह स्पष्ट करता है कि उन्हें पता है कि उनके कागज़ की असली कीमत क्या है|

कुछ समय पहले मैं एक कंपनी के लिए साक्षात्कार ले रहा था| मानव संसाधन विभाग की तरफ से सीधा संकेत था कि सरकारी डिप्लोमा होल्डर को निजी विद्यालय के स्नातक अभियंता से अधिक तरजीह देनी है| उनके तर्क साधारण थे| लाटसाहब ने पैसा फैंक कर कागज खरीदा है| यह बात हर अभिभावक और प्रतिभागी जानता है| किसी स्नातक ने अपने से कम पढ़े व्यक्ति के आधीन काम करने से मना नहीं किया|वह अनुभव और वास्तविक ज्ञान को समझते थे|

पिछले तीस वर्ष में सरकारें जनता को यह समझा पाने में कामयाब रहीं है कि शिक्षा और रोजगार सरकारी “खैरात” नहीं हैं, यह आपका निजी प्रश्न है|हमारे सरकारों के पास कोई नक्शा नहीं कि यह बता सकें कि अगले तीन पांच साल में कौन से और कितने रोजगार मिलने की सम्भावना हो सकती है| क्या पढाई की जाये, क्या नहीं? दूसरा इस जनसंख्या बहुल देश में भी हमने अपने कर्मचारियों को बारह घंटे काम करने की प्रेरणा दी है, जबकि अगर सब लोग केवल आठ घंटे काम करें तो डेढ़ गुना लोगों को रोजगार मिल जाये| संविदा आदि के चलते कर्मचारियों की गुणवत्ता घटी है| यह सब छद्म रोजगार और आधुनिक गुलामी या बंधुआ मजदूरी है|

देश में कश्मीरी पंडितों के पलायन से भी अधिक भयाभय तरीके से रोजगार सम्बन्धी पलायन हो रहा है| किसी भी योग्य युवा को अपने घर के आसपास उचित रोजगार अवसर नहीं मिल रहे| दिल्ली, मुंबई और अन्य महानगर पलायन से भरे पड़े हैं| सब जानते हैं कि असंतुलित विकास इस रोजगारी पलायन का कारण है| मगर न हम विकास पर प्रश्न उठा रहे हैं, न बेरोजगारी पर| विकास के नाम पर दो चार चिकनी सड़के हमारा दिल खुश कर देतीं हैं| हम पलायन कर रहे हैं, विस्थापित हो रहे हैं, हम पढ़ लिख कर अग्रीमेंट मजदूर बन रहे हैं जैसे कभी अनपढ़ गिरमिटिया मजदूर बनते थे|(अग्रीमेंट और गिरमिट एक ही अंग्रेजी शब्द के रूप हैं)

कोई प्रश्न नहीं है| प्रश्न तब ही नहीं था जब सत्तर साल पहले आरक्षण घोषित करते हुए सरकार ने ऐलान किया था कि सबको रोजगार नहीं हो पायेगा| प्रश्न तब भी नहीं है जब बेरोजगारी की सबसे भयाभय स्तिथि की सरकारी सूचना आती है| प्रश्न तब भी नहीं जब बेरोजगारी की बढ़ती संख्या देखकर सरकार पकौड़े तलने की सलाह देने लगती है

आखिर हतोत्साहित, शिकायतहीन और सस्ता मजदूर किस मालिक को अच्छा नहीं लगता – मालिक सरकार हो या बनिया|

कृपया, इस पोस्ट पर सकारात्मक आलोचना करें – नकारात्मक आलोचना हमें सुधरने पर विवश कर सकती है|

 

 

नाक कटना

उन दिनों कहाँ पता था की नाक काटना कोई मुहावरा है| वो बात बात पर ताव देते थे – आजतक किसी ने मेरी नाक नहीं काटी| जब ही अपनी प्रशंषा और अनुशंषा के आवेग में होते अपनी शुद्ध साबित नाक का जरूर दावा करते| उनका सीना उस समय दो गुना फूला रहता| माथा आसमान की तरफ थोड़ा ऊपर उठा| सीधे हाथ को हवा में स्वछन्द उछालते और मुक्त गुरुत्वाकर्षण के साथ जांघ पर पटकते| उस समय जो ताल निकलती वह किसी भी ढोल की आवाज को मात देती| उनके स्वर का गर्व हर किसी श्रोता के हृदय को प्रभावित किये बिना न रहता| उनकी इस बात का मोहल्ले की सामाजिक अवचेतना में गहरा असर था| लोग उनका सम्मान करते| अपने घर से किसी भी दिशा में निकलते चाय नाश्ते के बिना वापिस नहीं लौट पाते| पुराने लोगों को आज तक बात याद है कि सन बासठ की लड़ाई से वह गाजे बाजे के साथ सही सलामत लौटे थे| आजकल के बच्चे शायद न जानें मगर सन बासठ की बहादुरी का वजन पैसठ और इक्कत्तर वालों पर भारी पड़ता था और उनका अलग ही सम्मान था|

उनका प्रेम था मुझ पर| उस समय पूरे मोहल्ले में अकेला बच्चा था जो कभी भी उनकी पीठ पर लटक जाता| कान या नाक पकड़ कर उनमें चाबी भर देता| सुबह की चाय के साथ अगर वो अखबार पढ़ने के आदी थे तो शाम की चाय के साथ बच्चों का साथ उन्हें चाहिए था| और हम बच्चों का प्रिय विषय रहता उनकी बिना कटी नाक| हम सब बच्चे कभी न कभी इस बात की पुष्टि कर चुके थे कि नाक पूरी तरह साबित थी और उसके कटने का कोई चिन्ह नहीं था|

हल्की गर्मियों की उस शाम मैं उनकी गोद में था| हमेशा की तरह कुछ परिचित अपरिचित चहरे उनसे मिलने आये हुए थे| अधिकतर भूतपूर्व सेनिक, मोहल्लेवाले, जातिबंधु और आस पास के बच्चे उनके पास जमे ही रहते| अचानक वह समय आया जब उन्हें अपनी साबित नाक का हवाला देना था| इस बात की पूरी सम्भावना थी कि मेरा चेहरा उनके मजबूत फौजी हाथों और तावदार जंघा के बीच आ सकता था| परन्तु अपनी नाक एक बार लगभग तुड़ा लेने के बाद मुझे अभ्यास था कि अपने को उनके प्रहार से कैसे बचा लेना था|

“मुझे आप भूलकर भी ऐसा वैसा न समझ लीजिये, आज तक कोई गलत काम नहीं किया मैंने| कितने अफसर आये… … गए कोई मेरी नाक तक नहीं छु सका|” उनका हाथ स्वचालित स्वछन्द रूप से हवा में ऊपर उठा, “किसी आज कर किसी ने…” हाथ नीचे गिरने वाला है| मुझे उनके जांघ से हटना है, मेरा हल्का फुल्का सिर ऊपर की और उठा| उनका हाथ जंघा पर ताल देता है, “मेरी नाक नहीं काट पाई”| दूध के कच्चे दाँत मैंने उनकी नाक पर गढ़ा दिए हैं| “आआअ…. उल्लू के…” मैंने तेजी से करवट बदली और गोद से बाहर निकला| उन्होंने अपने सारे दांत जीभ में गढ़ा लिए| “अरी लली सुन…” उन्होंने एक दर्द भरी आवाज में मेरी माँ को आवाज दी| “हाँ चाचा…” मेरी माँ ही क्या पल भर में पूरा घर पूरा मोहल्ला उनके सामने खड़ा था| भरी शाम पूरा सन्नाटा| पिंजड़े में बंद तोता भी सहम कर बैठ गया| मेहमान घबराये हुए थे| और मैं… … विजय के उल्लास और पिटाई के डर के मारे चार छत कूदकर गायब|

जिनके घर जाकर छिपा था, उन्होंने शरणागत का पूरा लिहाज किया| उन्होंने मेरे दो हल्के थप्पड़ मारे मगर तुरंत मेरे वकील बनकर दौड़े गए| वाकया उन्हें मालूम न था, मगर घर में घुसते ही बोले, “देखो बालक ने नादानी में कर दिया, डर कर भाग गया है कहीं, कहीं दूर न चला जाए|” वहाँ नज़ारा अलग था – मेरा लाडला, मेरा बहादुर, आएगा तो जलेबी खिलाऊंगा, कचौड़ी खिलाऊंगा| हिम्मती है लड़का| मेरी पैरोकारी सुनते ही बोले, अगर लड़के ने आपके यहाँ लस्सी पी ली हो तो बुलवा लीजिये, सबके लिए जलेबी मंगवाईं हैं|

चरण स्पर्श

चरण स्पर्श या पैर छूना छुलाना भी हमारे भारतीय समाज में बड़ा मुद्दा हो जाता है| मगर मेरे माता-पिता की बात मानें तो मैंने मात्र चार वर्ष की आयु में इसपर विद्रोह कर दिया था| हुआ यूँ कि मेरे नानाजी के कई भाई एक साथ खड़े थे और उनके पीछे उनमें से एक का अर्दली| मैंने नानाओं के साथ अर्दली के पैर छूए और इसका मजाक बन गया| फिर बाद में मेरे बाबा ने निर्णय दिया जब जिसके प्रति इसके मन में सम्मान जागेगा, यह अपने आप पैर छू लेगा| मुझपर पैर छूने का कभी दबाब नहीं रहा| हाँ, कुछ वर्षों के बाद मैंने उस अर्दली के पैर अपने मन से दोबारा छुए|

हमारे ब्रज में पैर छूने छुलाने में बड़े झंझट भी हैं| बड़ों के पैर छूओ, मगर मामा मामी के पैर नहीं छूने| लडकियाँ पैर नहीं छूतीं बड़ों को उनके पैर छूने होते हैं| दामाद तो खैर पूज्य है ही| मेरे ननसाल में बहुएं घर के बड़े पुरुषों को पैर छूना कहलवा देतीं हैं, पैर छूने की क्रिया मात्र शाब्दिक है| हर परिवार में ऐसे ही अलग अलग विचार हैं| यह सब संस्कृति का सम्मानित हिस्सा है|

मैंने किशोर अवस्था में आकर पैर छूना पुनः शुरू किया मगर मेरी अपनी पसंद रही| मन में सम्मान या प्रेम जगा तो स्वतःस्फूर्त पैर छू लिए| हुआ यूँ भी है कि किसी के प्रति इतना सम्मान जग गया कि मुझे पैर छूना भी पर्याप्त नहीं लगा और कर्तव्यविमूढ़ खड़ा रहा| मेरे जितने भी शिक्षक बढ़िया पढ़ाते रहे मैंने उनके पैर छूए जिनमें दो मुस्लिम शिक्षक भी रहे, जिनके विचार से उनका किसी इंसान से पैर छुलवाना ठीक नहीं था| साथ ही एक शिक्षक को गुरु पूर्णिमा पर पैर से उठाकर भी पटका| ब्रज के नियमों के विरूद्ध अपनी एक मामी के पैर नियमबद्ध सम्मानपूर्वक छूए| ऐसे कई रिश्ते हैं जहाँ मैंने नियम विरुद्ध जाकर पैर छूए हैं और बहुत से रिश्तों में नियमपरक होने पर भी मैंने उस व्यक्ति को सम्मान योग्य नहीं पाया| एक व्यक्ति ऐसे भी हैं जिन्होंने मुझे धमकी दी थी कि टेसू अगर ठीक से पढ़े नहीं तो हम तुमसे पैर नहीं छुलवायेंगे| उनकी धमकी के असर से ही आज मैं कुछ बना हूँ|

मुझे सबसे अधिक दिक्कत उन लोगों से होती रही जो पैर आगे बढ़ा कर पैर छूने का दबाब बनाते हैं| उन्हें मैं नमस्ते करने की काबिल भी नहीं समझ पाता| कई बार मैंने खुल कर मना करने जैसी असामाजिक हरकत भी की तो टालमटोल करने की तो गिनती नहीं रही|

पैर छुलवाने में तो मेरी अजीब हालात हो जाती है| मुझे स्त्रियों से पैर छुलवाना समझ नहीं आता खासकर तब जब उनके पति सिर्फ खानापूर्ति के लिए पैर छूकर गए हों| ऐसे ढीठ पुरुषों की पत्नियों से पैर छुलवा लेना मुझे उस बेचारी स्त्री का अपमान लगता है| घुटना छूने वालों से भी मुझे हमेशा परहेज रहा और खुद भी मैंने किसी का घुटना नहीं छूआ|

मेरे बेटे ने एक बार पूछा कि हमें किसको नमस्ते करनी चाहिए और किसके पैर छूने है| मैंने कहा, दुआ सलाम (आज की भाषा में हाय-हेलो) सबको करो| जिसके लिए मन में सम्मान का भाव आये तो मन की भावना के हिसाब से नमस्ते और पैर छूना अपने आप हो जाएगा| मेरी तरफ से उसपर किसी के भी पैर छूने का दबाब नहीं है| संस्कार और संस्कृति थोपी नहीं जाती|

पुनःच – अयोग्य को दान नहीं देना चाहिए, सम्मान तो बड़ी बात है|