बिना नींव का सपना


कभी याद हैं तुम्हें अपना कोई सपना जिसमें घर की नींव देखी हो?

सपने कच्चे होते हैं| घरों के सपने बिना नींव खड़े होते हैं| घर के किसी सपने में नींव शामिल नहीं होती|
जड़ों और नींव के सपने उन्हें आते हैं, जिनकी जड़ें और नींव होती हैं|
सोचता हूँ बहुत, क्या बहुत ऊँची अट्टालिकाओं में अपनी सपनों की अटरियाओं का भविष्य खरीद लेने वाले वाले क्या कभी जड़ों और नींव ने कभी नींव के सपने देखे होंगे? क्या उन्होने सोचा है कि जिन दीवारों की सुरक्षा के भरोसे वो अपना आने वाला कल बिताना चाहते हैं कितनी भरोसेमंद होंगी?
क्या कभी तुमने खरीदा है कोई वाहन या कोई अन्य उत्पाद जिसके समस्त मापदंड, मानदंड और वर्णन विशेष तुम्हें नहीं मालूम हों? 

सोचों, जिस वाहन की मजबूती के बारे में कहा जाए कि बनने के बाद ही पक्का पता लगेगा क्या तुम खरीदोगे उस वाहन को? क्या खरीदोगे उस वाहन को जिसमें सुरक्षा पेटी लगना न लगना या उसका स्तर सिर्फ भरोसे पर निर्भर है, वास्तविकता का तुम्हें कोई ठोस पता नहीं?

विवाह और घर दो ऐसे सपने हैं जिन्हें जीवन में एक बार पूरा करना एक बड़ा सपना और समझदारी माना जाता है|

सपनों की ऊँची अट्टालिकाओं को बनने से सालों पहले खरीदा बेचा जाता है| कब क्या कहाँ कैसे क्यों कितना किसलिए जैसे सभी प्रश्न यहाँ मात्र भविष्य की बातें हैं| आप बीसवीं मंजिल का एक फ्लैट खरीद लेते हैं, जिसका अस्तित्व मात्र हवा में मौजूद है| इसके अभी बनने में कितना मिट्टी, गारा, सीमेंट वास्तव में लगना है आपको नहीं पता| नक्शे बादल जाएँ तो क्या करोगे| इसी तरह कोई भी सरकारी अनुमति, या वास्तविक आवश्यकता पूरी न हो पाये तो क्या करेंगे आप| 

आप घर खरीदने के लिए किसी भी भवन निर्माता के साथ किसी समझौते पर हस्ताक्षर करते हैं तो आप अपने उस सपने पर हस्ताक्षर करते हैं जो आप बचपन से देखते हैं – सपनों सा सुंदर घर होगा| फिर आप वर्षों इंतजार करते हैं, सपने को साकार होते देखने का| कभी आपको बताए गए मापदंड, मानदंड और वर्णन विशेष पूरे नहीं होते तो कहीं वर्षों काम ही नहीं शुरू हो पाता| आप एक ऐसे उत्पाद को खरीद चुके होते हैं जो भविष्य में खरीदा जाना चाहिए था| 

वास्तव में आप इस भविष्यत उत्पाद को सस्ता ऋण लेकर बिना ब्याज भवन निर्माता को दे रहे होते हैं| अगर कोई निर्माता खुद से ऋण ले तो उसे वह ऋण अगर पंद्रह टका में मिलेगा उसे आप आठ टके में लेते हैं और मुफ़्त में दे देते हैं| कभी कभी वह भवन निर्माता आपको यह अहसान देते है कि आपको उसी ऋण पर कुछ ब्याज देता है| यह ब्याज कुछ वर्ष बाद से मिलना होता है, अगर आपका घर उस समय सीमा तक न मिल पाये| क्या खूबसूरत मामला है? आप ऋण लेकर मुफ़्त में निर्माता को देते हैं जो वादा करता है कि भैया मैं इतने वर्ष बाद भी आपको घर नहीं दूँगा पर एक मोटा ब्याज उतने वर्ष बाद से आपको दूँगा| आप गणना नहीं कर पाते कि उसे वास्तव में कितना सस्ता ब्याज मिल रहा है| वह कुछ बढ़िया क़ानूनों का झुनझुना भी आपको पकड़ा देता है| आप खुश हैं, बहुत खुश हैं|

वाह, वाह| फिर अगर आपको घर की अधिक जरूरत है तो आप रेरा नामक कानूनी झुनझुना बजाते हैं| यह भी एक शानदार कानूनी आश्वासन है| यह इतना सरला और सुलझा हुआ है कि ज्ञानियों की समझ से यह परे है| यह आपके एक सपने को दूसरे सपने में, एक समझौते को दूसरे समझौते में, एक वादे तो दूसरे वादे में बदलते हैं| अगर अचानक आपका स्वप्नविधाता भवन निर्माता दिवालिया कानून का सामना करने पर विवश हो जाये तो उसका जो हो, होता रहेगा| आपका क्या होगा? आपके पास बहुत से झुनझुने होंगे जिन्हें आप बजाते रहेंगे और सत्ता से न्याय तक सहानुभूति पाते रहेंगे| आप सहानुभूति का क्या करेंगे?

यह सहानुभूति भी आनददायक है – आपका सपनों का घर जिस नींव पर खड़ा था उस नींव पर ही यह सहानुभूति है| जैसे जैसे यह प्रश्न सामने आएगा कि ऐसा माल जिसका कोई अस्तित्व धरातल पर नहीं है वह आपने खरीदा और उसके लिए खुद कर्जदार होकर निर्माता को कर्ज दिया तो आप किस गंभीर सहानभूति की आशा करते हैं?
आपके तर्कों का स्वागत हैं, आपको सहानुभूति, सकारात्मकता और मुस्कुराहट मिलेगी| परिणाम की प्रतीक्षा है| 

बिना नींव के सपने तब तक नहीं टिकते जब तक उनके लिए एक मजबूत नींव न तैयार की जाए|

‘पुष्पा’ और ‘जय भीम’


पिछले महीनों में दक्षिण भारतीय फ़िल्मों “जय भीम” और “पुष्पा” की बड़ी धूम रही| यह तक कहा गया कि यह बॉलीवुड नामक हिन्दी फ़िल्म फॉर्मूला का अंत है| सोचा, अगर इतनी बड़ी क्रांति होने जा रही तो साक्षी बन लेना ही बेहतर है|
समय निकाल कर मैंने भी दोनों फिल्में देख ही लीं| जब से ओटीटी सेवाएँ शुरू हुई है, यह सुविधा तो हो ही गई है कि फ़िल्म के गंभीर पक्ष को समझने के लिए आप मनचाहे अल्पविराम ले सकते हैं| फ़िल्में बहुत गतिशील माध्यम है उनकी गति से सभी बातें समझ पाना मेरे लिए कठिन ही रहा है|
दोनों फिल्मों में सर्वप्रथम जो बात आकर्षित करती है वह है जमीन| दोनों फ़िल्में उस जमीन और जंगल के धरातल पर बनीं हैं, जहाँ वर्तमान समय का वास्तविक आम आदमी खड़ा है| यह वह वर्ग है जो पिछले बीस वर्षों से अचानक समाज और फिल्मों से काट कर रखा गया था| बड़ी चमक दमक वाले बहु-पटल सिनेमाघर इन की आर्थिक और सामाजिक हिम्मत से बाहर होने लगे थे| जिन बड़े परिसरों में यह सिनेमाघर खड़े हैं वहाँ जमीन से जुड़े किसी भी व्यक्ति हो जाने से संकोच होता है, कहीं दरबान महोदय लताड़ न दें|
यह बहु-पटल सिनेमाघर उच्च-मध्यवर्ग की पहुँच में ही रहे हैं|
पिछले बीस पच्चीस वर्षों में बॉलीवुड फ़िल्में भी उसी उच्चमध्य वर्ग को आम आदमी और दर्शक मानकर बनती रहीं| बॉलीवुड की बेहतरीन फ़िल्म संसाधन नव-धनाढ्य उच्च-मध्यवर्ग के जीवन और सपनों पर टिक गई| अनिवासीय भारतीय के भारत प्रेम, भारतियों के विदेश संबंधी सपने और जीवन, भारत के वैश्विक कारनामे, मुख्यधारा में प्रमुखता पा गए| कौन सा समाज सपने नहीं देखता| यह सपने मध्य और निम्नमध्य वर्ग ने भी बखूबी अपनाए| पिछले बीस वर्षों में भारतियों की यह विश्व विजय इतना आम हो चुकी है कि विश्व की हर बड़ी कंपनी का सबसे बड़ा नौकर एक भारतीय है| 

Business Standard Hindi
7 February 2022

इसके साथ आता है एक सामाजिक और आर्थिक किन्तु-परंतु| भारत सन 2008 की वैश्विक आर्थिक मंदी से भले ही बचा हो पर आर्थिक विकास उच्चमध्य वर्ग से नीचे नहीं उतर रहा है| सनद रहे, कायदे से भारत का उच्च और उच्च-मध्यवर्ग जनसंख्या का ऊपरी दस प्रतिशत ही है| बढ़ती हुई आर्थिक खाई और बढ़ता हुआ निम्न मध्यवर्ग (और हाल में अचानक पुनः बढ़ा निम्न वर्ग) भारत का सामाजिक और आर्थिक ताना बना समाज के निचले तबके के पाले में झुका रहा है|
साथ ही प्रचार माध्यमों की बढ़ती पहुँच, उपभोक्तावाद, बदलते सरकारी सरोकार इस बढ़ते हुए निम्न मध्यवर्ग को हाशिये पर रख देते हैं| यह माहौल भी बन गया है कि गरीबी, नकारात्मक पहलू, काले पक्ष आदि न दिखाएँ जाएँ| यह भी कहा गया कि सिनेमा मनोरंजन के लिए है, क्रांति के लिए नहीं| सामाजिक माध्यमों में प्रतिदिन होने वाली सूचना क्रांति, जनभावनाओं को पहुँचती ठेसें और बात बात की पुलिस कार्यवाहियाँ भी सिनेमा जैसे महंगे माध्यम के लिए बहुत छोटा मैदान शेष रहने देतीं हैं|

इसी सूचनाक्रांति का शानदार कलात्मक पहलू है – ओटीटी| आप कम खर्च, मनचाहे समय, मनचाहे एकांत और मनचाहे अल्पविरामों के साथ मनचाही फ़िल्म देख पाते हैं| यह माध्यम सीमित संसाधनों वाले निम्नवर्ग तक को बिना हीनभावना फ़िल्म देखने दे पा रहा है| फ़िल्मकारों के लिए सिनेमाघरों के बड़े नाज नखरों के बिना फिल्में जनता तक पहुँचा पाना भी संभव हुआ है| 

साथ ही यह कहना भी सतही होगा कि मात्र इसी वर्ग ने ही यह फ़िल्में देखी हैं| सात रोमांचक वर्षों में जाने अनजाने धरातल के विषय हमारे अचेतन को प्रभावित करते रहे हैं| आधार, मनरेगा, नोटबंदी, अप्रत्यक्ष कर, नागरिकता, कृषि कानून, शिक्षा शुल्क, रोजगार आदि छोटे बड़े घटनाक्रम सभी वर्गों को सपनों से इतर का धरातल देखने समझने की इच्छा प्रदान करते हैं| साहित्य का सत्य सदा ही पत्रकारिता के सत्य से बड़ा, प्रिय और आकर्षक होता है|
यह दोनों फिल्में हमारा सत्य के इसी साहित्यिक पहलू से सामना करातीं हैं| “जय भीम” के लक्ष्य और उद्देश्य स्पष्टतः सामने रहे हैं| यह उसके शीर्षक से स्पष्ट है| फ़िल्म की कथा समुचित गति से आगे बढ़ती है और रुचि पैदा करती है| अगर आजकल की भाषा में कहें तो फ़िल्म किसी भी आंदोलनजीविता में बहे अपने उद्देश्य तक पहुँचती है| किसी भावनात्मक अतिरेक और सामाजिक क्रांति की उद्घोषणा से इतना बची है कि अगर फ़िल्म का नाम “जय भीम’ न रखा होता तो फ़िल्म को किसी वाद से जोड़ना आम जनता के लिए कठिन होता|
कथानक का सामाजिक माध्यमों में हुआ सीमित विरोध और उसके समक्ष सत्य घटनाक्रम का अस्त्र फ़िल्म के पक्ष में खड़े होते हैं| यहाँ तक कि “कभी जातिगत भेदभाव नहीं रहा”, “पुरखों का दण्ड हमें क्यों”, “हम दलित के घर भोजन करते हैं” वाले सभी धड़े चुपचाप इस फ़िल्म के समक्ष आत्मसमर्पित हुए हैं| फ़िल्म बेहतरीन कथानक, सीमित नाटकीयता, सरल अभिनय के साथ अपने उद्देश्य तक पहुँच जाती है| यह न तो समानान्तर सिनेमा का उबाई परिदृश्य खड़ा करती है न व्यवसायिक सिनेमा की अतिनाटकीय नोस्टाल्ज़िया| 

दूसरी ओर ” पुष्पा” मूलतः व्यावसायिक फ़िल्म है जिसका कथानक जमीन और जंगल से जुड़ता है| कथानक गरीबी, रोज़गार संबंधी पलायन, महाजनी, माफ़िया, तस्करी, और भ्रष्टाचार संबंधी विषय मूल भारतीय परिवेश और में दिखती है| इसमें नाटकीयता की भरमार है, परंतु मुद्दा नहीं छूटता| अपराधिक परिवेश में रह रहे नायक के प्रति सहानुभूति आम जनता में अक्सर पाई जाती है| फ़िल्म इस ओर सीधा संकेत भी करती है, जब हम देखते हैं कि यह अपराधी बड़े मगरमच्छों के मुक़ाबले आमजन के साथ खड़ा है| यह फ़िल्म पुनः विशुद्ध व्यवसायिक अपराधियों के सामने जनता का अपराधी खड़ा करती है| यह घटना हिन्दी सिनेमा जगत के सामने वर्षों बाद गंभीर और विश्वनीय रूप से हो रही है| जनता इस बात से चमत्कृत होती है कि किस तरह जननायक की अपनी कमियाँ भी सामने आती हैं| फ़िल्म की छोटी छोटी उपकथाएँ मुझे बहुत आकर्षित करती हैं| फ़िलहाल इसकी दूसरी कड़ी का इंतज़ार रहेगा|

दोनों फ़िल्में आम जनता को अपने निकट मालूम होती है| यही इन फ़िल्मों की मूल सफलता है|
चलते चलते यह भी याद दिला दें कि हाल में बॉलीवुड हिन्दी फ़िल्म “शेरनी” को भी सफलता मिली थी और यह भी जंगल और जमीन से जुड़ी हुई फ़िल्म थी| 

हाशिए पर वह 


आजकल के लिहाज से वह थोड़ा सा पुराना समय था – लगभग तीस-चालीस साल पुराना| सूरज का सिर पर चढ़ आना और उनका आना रोजाना का नियम सा था| उनकी किसी भी नागा का अर्थ था हमारे लिए दिन भर कठिनाई और नरक तुल्य सजा| यह मध्यवर्गीय मजबूरी थी|
उनके लिए किसी भी नागा का अर्थ था अगले दिन उलहाने, झिड़कियां और कभी कभी गालियां| जिसने जितनी गाली दीं, उसे उतनी ही आवश्यकता है, भले ही ऊपर से जातीय और वर्गीय श्रेष्ठता का दम्भ हो| यह बात अपने मन में सब जानते थे| कभी यह गालियाँ हँस कर सह लीं जातीं तो कभी उलट आकर गालियॉं और धमकियाँ मिलतीं| यह गाली देने वाले व्यक्ति के सामाजिक व्यवहार और उनके साथ निजी व्यवहार पर निर्भर करता था| 

अधिकतर घरों से उनका अच्छा सम्बन्ध था| मेरी माँ से खास लगाव| मेरे लिए उनकी उपस्तिथि एक अलग मायने रखती थीं| वह पहले कुछ लोगों में से थी जिन्होंने मुझे गोद में खिलाया था| रोज का उनका आना| घरों के चूल्हा और अंगीठी जलते तो राख जिन कामों के लिए राख बचा का रखी जाती, उनमें से एक हिस्सा उनके नाम का रखा जाता| वह आतीं राख माँगती और एक ऐसे कमरे में चली जाती जिसमें कोई कभी न जाता| यह कमरा घरों के बाहर खुलता, अधिकतर पिछवाड़े या ठीक सामने| इस कमरे में कोई ताला न लगता, यहाँ तक कि घर क्या मोहल्ले में भी कोई न हो तो भी इस दरवाजे कोई ताला नहीं होता| कोई अगर उस कमरे में घुसता तो चोर, नशेड़ी और असामाजिक मान लिया जाता| 

इस कमरे से हमारा अजीब सा एक रिश्ता था| यह दैनिक जीवन का आवश्यक परन्तु हाशिए पर रख दिया जाने वाला विषय है| जब तक शारीरिक, सामजिक, नीतिगत, या व्यवस्थागत आवश्यकता न आ जाए; समाज में कौन इस विषय पर खुल कर बात करता है?

अगर इस कमरे में आप कभी झाँककर देखते तो पाते कि एक बेहद निचली सी दोछत्ती है और उसमें आठ दस इंच बड़े कुछ छेद हैं| ऊपर यह छेद अलग अलग कोठरियों में खुलते थे| यह घर का आवश्यक पर पूर्णतः नकार दिया गया हिस्सा था| 

उनका काम था, हमारे द्वारा त्यागे गए मल को साफ करना| वह राख में मल को लपेट कर ले जातीं और कहीं दूर उसे हिल्ले लगा देतीं| कहाँ, मुझे नहीं ज्ञात, शायद आपको भी नहीं ज्ञात| सरकारी तौर पर इस व्यवस्था को बाद में सिर पर मैला ढ़ोने की सामाजिक कुप्रथा का नाम दिया गया| वैसे इस प्रकार का मैला डलिया में कमर से टिका कर ले जाया जाता| पर वह बतातीं थीं छोटे क़िस्म के कुछ बड़े लोग यह मैला सिर पर ढोने के लिए मजबूर करते हैं या फिर दूर तक ले जाने के लिए मजबूरी में कई पर सिर पर रखना सरल रहता है| बहुत बाद में नगर पालिका ने/ उनके अपने समाज ने कूड़ा ढोने की छोटी ढ़केलों की व्यवस्था की थी पर वह बहुत देर बाद की गई थी| जिसने कोई सामाजिक परिवर्तन नहीं किया| 

इसे किसी भी प्रकार उचित व्यवस्था तो नहीं ही कहा जा सकता, खासकर तब जब कि उचित उपाय उपलब्ध थे| 

राख न होने पर ही पानी के सहारे नाली में मल बहाने का काम होता, ऐसा होने पर पूरा मोहल्ला उन्हें और जिस घर का मल इस प्रकार बहाया जाता, दोनों को जी भर कर और पानी पी पी कर कोसता और गालियाँ देता| 

शहरों में यह खुड्डी शौचालय अब नहीं होते, यह बेहद बढ़िया बात है| सरकार से लेकर जनता तक सभी को इसकी बधाई मिलनी चाहिए | खुड्डी अभी भी होती हैं पर उनका रूप बदला गया है कि किसी को मल उठा कर न ले जाना पड़े| मुझे नहीं मालूम कि देश से इस प्रथा का पूरी तरह अंत हुआ है या नहीं| सरकारी घोषणा का मुझे कोई भरोसा नहीं, न ही समाज के इतना जल्दी बदल जाने का| 

इस सफाई के समय जो बदबू उठती थी, उसे सहन करना अपने आप में बुरा अनुभव होता है| उनके लिए रोज का काम था| कैसे सहन करती होंगी? 

तीज त्यौहार पर तो उनका शाम और अगले दिन आना तय था और वह नहा धोकर बढ़िया धुले कपड़ों में आतीं| यह उनका त्यौहारी लेने का समय रहता| जहाँ अन्य आम कामगार त्यौहार का इनाम कहते वह त्यौहारी ही कहतीं| मल मूत्र हिल्ले लगाने का नेग इनाम तो जचगी में ही मिलता है| 

त्यौहारी के समय उन्होंने जो साड़ी पहनी रहती, वह साड़ी जिस गृहणी ने दी हुई होती, उसके सामने चुपचाप अहसानमंद होने का भाव दर्शाती रहतीं| शेष सब स्त्रियों और परिवारों को यह जरूर बताती कि किसने दी थी यह शानदार साड़ी| मंशा यह कि आप अपनी तारीफ करवानी है, तो इस का मुकाबला करों| कई बार खुद खरीदी साड़ी भी होती, पर तब यह उलहाना रहता कि मोहल्ले में कंगाली क्या आई कि जाट-कुजात को अब तन ढकने के लिए बाजार का मुँह ताकना पड़ रहा है| मोहल्ला कंगाली का उलहना सुनना पसंद न करता| शिकवा शिकायत और ताना उलहाना अधिक हो जाने पर दो चार गृहणियाँ मिलकर नई बढ़िया साड़ी के लिए पैसे दे देतीं| कुछ-एक गालियाँ देकर काम चलातीं और शेष जीवन भर उल्टा-सुल्ता सुनने का हिसाब बनवा बैठतीं| 

उन्हें मुझ से विशेष प्रेम था| मैं मोहल्ले का पहला बच्चा था जो उनकी गोद में खेला था| मुझ से पहले के बच्चों के लिए यह काम उनकी सास ने किया था| उनकी सास ने बच्चे रीति रिवाज के हिसाब से ही गोद में लिए, नहलाये धुलाये थे और नेग ईनाम पाया था|
पर यह साफ सुथरा रहने के कारण मोहल्ले में अपना अलग सम्बन्ध और स्थान रखती थीं| उनका नियम था कि सुबह का अपना काम निबटा कर ठीक से नहा धो लेना| इसके लिए जिस साबुन का इस्तेमाल करने का वह दवा करतीं थी, उस साबुन के विज्ञापन का दावा रहता था, यह साबुन यही जहाँ, तंदरुस्ती है जहाँ| उन्हें खूबसूरती वाले फ़िल्मी साबुन का कोई लगाव न था| कहतीं दिल और मन साफ तो तो चेहरे पर खुद रूप रंगत आ जाती है| वर्ना तो ये फ़िल्म वाली ससुरियाँ उनकी सुअरिया से ज्यादा थोड़े ही खूबसूरत हैं| 

नहा धोने के बाद उनका नियम था, दोपहर में मोहल्ले का एक चक्कर लगा लेना सुख दुःख, खाना पीना बाँट लेना| जहाँ मन हो खा लेना| लगभग हर ठीक ठाक घर में उनकी थाली कटोरी होती थी| जिसे वह राख से बढ़िया चमका चमका कर साफ करतीं रहतीं थीं| उन दिनों मोहल्ले के लगभर हर घर में रख से ही बर्तन साफ़ होते| राख का सम्बन्ध अग्नि और पवित्रता से था| वह कभी कभार बर्तन साफ करने के लिए नीबू नमक भी प्रयोग करतीं| 

वह जूठन कभी नहीं स्वीकार करतीं| कभी शक हो कि देने वाले ने जूठन दी है तो उसे देने वाले के सामने ही किसी कुत्ते आदि को डाल देतीं| 

कभी कभार अपनी छोटी छोटी दो बेटियों को भी ले आतीं| उन दिनों जब दिल्ली बम्बई बस के बाहर की बात थी, उनका सपना था लड़कियाँ शादी होकर उन बड़े शहर जाएँ| उनको किसी ने बताया था, उन बड़े शहरों में मैला ढोने का काम अब नहीं रह गया| जो काम हैं, उन सब में मैला ढोने के काम से अधिक इज्जत है, और कुछ नहीं तो मानवीय सम्मान हो है ही| कभी कभी माँ उन लड़कियों के साथ मुझे खेलने के लिए बोलतीं, पर यह कोई बहुत देर न चलता – हमारा सामाजिक, मानसिक, शैक्षिक स्तर बहुत अलग था| हम एक दूसरे की बात ही नहीं समझ पाते थे| हम अलग अलग ध्रुव पर ही रहते| लगता था कि हमारा खेल एक बनावटी नाटक है| इस नाटक का सम्बन्ध बस सामाजिक सुधार के घिसे-पिटे प्रतीक से अधिक नहीं थी पर इसने मेरे मन में कुछ न कुछ उचित असर तो छोड़ा ही था| उम्र के साथ यह दूरी बढ़ी| 

भले ही वह दोनों लड़कियां स्कूल जातीं थीं, पर न उन्हें स्कूल में पढ़ाया जाता था, न घर पर पढ़ाई की कोई सुविधा थी| वह जैसे तैसे जोड़ जाड़ कर नाम पढ़ लेतीं थीं, लिखतीं तो अपना लिखा खुद भी न पढ़ पातीं| अगर हम दो चार बच्चे खेल रहे होते तो वह दोनों लड़कियां खुद ब खुद गेंद लाने या ऐसी ही कोई अन्य सहायक भूमिका अपना लेतीं|
कोई बात नहीं, इनकी अगली पीढ़ी, साथ खेलने तक की हिम्मत जुटा लेगी – उनका यह विश्वास रहता| उन्हें किसी आसमानी सुधार की कोई उम्मीद नहीं थी, किसी प्रकार की कोई न-उम्मीदी उनेक आस-पास न थी| 

घर में शौचालय की व्यवस्था बदल जाने के बाद हमारे संबंध में काफी बदलाव आया| घर आँगन की झाड़ू बुहारी का काम वह करतीं रहीं, पर वह परम-आवश्यक नहीं रह गईं थीं| साल दो साल के बाद उन्हों ने अपना यह पुश्तेनी इलाका सस्ते में बेच दिया| यह मेरे लिए अजीब खबर थी| यह सम्बन्धों का बिक जाना था या उनकी संपत्ति का, मैं न समझ सका| कई बार हँसी आती कि समाज के हाशिए पर खड़े एक व्यक्ति ने समाज की मुख्यधारा का एक इलाका बेच दिया| यह एक ऐसी सच्चाई थी कि तथाकथित मुख्यधारा इस घटना के अस्तित्व से इंकार ही कर दे| 

बाद में, एक दिन वह अपनी बेटियों के साथ आईं| यह उनकी बेटियों के विवाह का बुलावा था| मैं उन दोनों से उम्र में बड़ा था पर दावत-दान- दहेज के अलावा विवाह का कोई मतलब नहीं मुझे न मालूम था| माँ ने विवाह खर्च का कुछ रुपया-पैसा-सामान और कन्यादान के लिए अपनी दक्षिणा की रकम उन्हें दी| 

उस शाम मैंने माँ से पूछा, क्या हम उस शादी में नहीं जा सकते| माँ ने कहा, जा सकते हैं पर यह मेज़बान पर बोझ होगा और सामाजिक तौर पर न उनका समाज स्वीकार करने की स्तिथि में हैं न हमारा| यह अजीब बात थी, वह और माँ दोनों ही तो इस हमारे तुम्हारे समाज के बंटबारे को मूर्खतापूर्ण पिछड़ापन कहती मानतीं आईं थीं| माँ में कहा, बहुत धीरे धीरे बदलता है| तुम्हें बदलते समाज के एक कदम आगे रहकर पर सही दिशा में बदलना हैं| अगर दिशा निर्देशक भी बन पाओ तो दौड़ना मत| 

उस के बाद वह एक दो बार ही आईं| दो एक साल बाद माँ ने मुझे उनके घर का पता देकर बुलाने भेजा था| पर वहाँ से वो लोग घर बेच कर कहीं जा चुके थे| माँ कई दिन दुःखी रहीं| बहुत बाद में एक दिन माँ ने मुझे कुछ पैसे देकर वाल्मीकि मंदिर में दान करने के लिए भेजा| 

“उस के पैसे जमा थे मेरे पास, जब दो साल वह मांगने नहीं आई तो मनीऑर्डर किये थे पर मनीऑर्डर लौट आया| उस दिन तुझे उसके घर भेजा था| कई साल तक मुझे उसके लौटने की उम्मीद रही| अब वो कर्ज़ जैसा है मेरे ऊपर| अभी दान कर दे, अगर कभी वो पैसे वापिस मांगने आई तो यह दान हमारे मेरे खाते में, वर्ना उसके खाते में|”

माँ ने बताया था कि लड़कियों के विवाह के अवसर पर दिए गए पैसे में अधिकांश उनका अपना पैसा था| थोड़ा पैसा उसने अपनी हारी-बीमारी के लिए बचा रखा था| जितना उन्होंने उस दिन माँगा था – उतना ही बाकि  माँ ने रस्म और दान-दक्षिणा के रूप में दिया था| 

समाज के हाशिए पर वह कितना विश्वास और संघर्ष करती रही होंगी?