करोना डायरी


पिछले बरस जब तालाबंदी हुई, तब आम जनता खासकर मध्यवर्ग में डर था, परन्तु निराशा नहीं थी| देश विभाजन के बाद का सबसे बड़ा पलायन और मानवता एक बड़ा प्रति-पलायन देख रही थी| सरकारें आलोचना का सामना कर रहीं थीं, पर उन्हें सिरे से नकारा नहीं जा रहा था| बीमारी के समाचार आते तो कुछ एक मामलों को छोड़कर ठीक होने के समाचार भी आते| बीमारी को सांप्रदायिक रंग देने के निंदनीय प्रयास भी हुए और आपराधिक मामले दायर किए गए| परन्तु हम सबकी रसोई गुलज़ार रही| नए नए पकवान बनते रहे| विद्वानों ने सामाजिक माध्यमों से पाककला को नए आयाम दिए| व्यायाम की कमी के चलते खाते पीते लोग अलग पहचाने जाने लगे|

देश की आधी आबादी गरीबी के चलते या गरीबी में फंसने के चलते कठिनाई झेल रही थी| भरी भरकम तालाबंदी के चलते करोना मुक्त इलाके भी अकाल जैसे कुचक्र में फँसने लगे| कई छोटे व्यवसाय बर्बाद हुए| जब तक सरकार को कर-संग्रह में कठिनाई का सामना न करना पड़ा, सरकार को कोई खास अहसास नहीं हुआ| सरकार को घोषित वायदों पर भरोसा था| जल्दी ही अर्थव्यवस्था की आवश्यकता ने जोर मारा|

सकारात्मक भावना के साथ करोना के साथ जीने की आदत डालने की बातें हुई| यह सकारात्मकता कुछ हद तक करोना को नकारने तक चली गई| बड़े शहरों के बाहर तो मास्क बिल्कुल नजर नहीं आ रहा था|

जब हम बीमार होने को बीमार की गलती मान लेते हैं तो हम बीमारी के साथ खड़े होते हैं|

आज हम बीमारी के बड़े खतरे में फँस चुके हैं| बीमारी अपना रंग भी तेजी से दिखा रही है| बहुत से लोग जो साल भर से बाहर नहीं निकले बीमार हुए हैं| भारत में महिलाओं का घर से निकलना बहुत कम होता है, उनके बीमार होने के समाचार अधिक हैं| यानि छोटी छोटी गलतियों से बीमारी घर तक आ रही है| ऐसा नहीं है कि यह गलतियाँ केवल बाहर से घर में आने वाले कर रहे हैं| यह गलती पूरी व्यवस्था की है| आखिर कैसे?

सोचिये, साल भर पहले मन्त्र थे:

  • जब तक बहुत जरूरी न हो तो कार्यालय न जाएँ|
  • बिना काम घर से न निकलें|
  • घर पहुंचते ही, नहाना धोना करें फिर कोई और काम|
  • घर तक पहुँचने वाली किसी भी वस्तु हो सके तो हवा भी साफ़ करें|

फिर अर्थव्यवस्था को सँभालने के प्रयास में होश खो दिए गए| एक बार ढील मिली थी तो “घर से काम की संस्कृति” की बात करने वाले, “आखिर कब तक” के आलेख लिखने लगे| ५०-५० का नियम कार्यालय से हवा हो गया| कार्यालय में “दो गज की दूरी” की मजबूरी “मिलजुल कर काम की भावना” में बदल गई| कार्यालयों में मिलजुल कर भोजन होने लगे| किसी ने सोचा ही नहीं कि बीमारी दबी है टली नहीं| शीशों के बंद कार्यालयों में बिना वातानुकूलन बैठना फिर से भारी लगने लगा| इस सब के ऊपर सरकार अपने कर्मियों को पूरी संख्याबल में कार्यालय आने के लिए बाध्य करने लगी|

कुम्भ, चुनाव, शादी-ब्याह, लंगर, भण्डारे, सकारात्मकता, सामूहिक सकारात्मकता, सब पुरानी राह पर चल पड़े थे| जिस समय बड़े देश तालाबंदी के पुनरायोजन में लगे थे, विश्व-गुरु होने का गुरूर हमारे सर पर नाच रहा था| हमारा अहंकार इतना बड़ा था कि हमने दवाएं दान देने का नाटक शुरू किया| जिन चिकित्सा सुविधाओं के वादे हुए उनका पता नहीं चलता कि घोटाले में बदल गईं या सरकारी गति से चल विकसित हो रही हैं|

पिछला एक पखवाड़ा बुरी ख़बरों की झड़ी लगा चुका है| ओह, इतने नासमझ तो … … …

शिशुओं की ऑनलाइन पढ़ाई


इस सप्ताह चार साल की बेटी को पहली बार ऑनलाइन पढ़ाई करनी थी तो मुझे लगा, यह कैसे होगा? बच्ची बैठेगी कैसे? अपनी शिक्षिका को टेलिविज़न अभिनेत्री की तरह तो नहीं समझेगी? क्या आपसी समझ बन पाएगी? क्या अनुशासन बन पायेगा?

वह पिछले जनवरी तक छः महीने पढ़ने गई थी| उसके बाद हमने घर बदला और जब तक कहीं उसका दाखिला होता राष्ट्रीय तालाबंदी हो चुकी थी| lockdown| दाखिले की बकाया कार्यवाही इस साल पूरी की गई| इस पूरे साल उसने घर पर पढ़ने और अपने भाई को ऑनलाइन पढ़ते देखने में समय बिताया| इस पूरे साल उसने स्कूल जाने के साथ ऑनलाइन पढ़ाई करने के भी सपने देखे| उसने खेल खेल में करोना को रोज मारा और हम सबकी हिम्मत बनाये रखी|Online Education|

पहले दिन वह उतना ही उत्साहित थी, जितना आजकल के बच्चे बाहर घूमने जाने के लिए और पहले के बच्चे दावत में जाने के लिए होते थे|

बच्ची ने पहली रात सुबह छः बजे का अलार्म लगवाया था परन्तु हमने इसे चुपचाप सात बजे कर दिया था| बच्ची साढ़े छः बजे उठ बैठी थी|  उत्साह देखते ही बनता था| एक ऐसा समय जब बच्चों को किसी नए व्यक्ति या बच्चे से मिलने का अवसर नहीं मिल रहा, यह एक शानदार अवसर था| बहुत जल्दी नहाकर तैयार थी| आज के दिन के लिए उसने नए कपड़े खरीदे थे| नई कलम, नई पुस्तक – पुस्तिकाएं, नया अनुभव|

बिना किसी  सहायता के उसने लैपटॉप चालू कर लिया था और लिंक खोलने के लिए हल्ला मचा रही थी| अचानक उठी और घर के मंदिर में सरस्वती को प्रणाम करने पहुंची| शायद उसकी माँ ने कहा था| आकर उसने लैपटॉप और पुस्तकों की समझ अनुसार पूजा की| मैं कलम के लिए याद दिला दिया| कर्मकांडों से दूर संस्कृति के यह चिन्ह संतोष देते हैं|

अभी तो नौ बजे थे| विद्यालय की ओर से सुबह दस बजे के लिए समय तय किया गया था| घड़ी धीरे धीरे चल रही थी कि बच्ची को कोई कठिनाई न हो| अगला एक पल उतना लम्बा था कि “-इन्तहा हो गई इन्तजार की” जैसा कोई फ़िल्मी गाना गाया जा सकता था| ऐसे ऐसे साठ मिनिट अभी बीतने थे|

उसके बाद लैपटॉप का चक्का घूमा| तब पढ़ाई शुरू हुई|

लगता नहीं था कि यह उसका पहला दिन है| विडिओ कॉल के सभी अनुभव उसके काम आ रहे थे| जिस उम्र में मैंने टेलिविज़न नहीं देखा था, रेडियो छूने के अनुमति नहीं थी, ट्रांजिस्टर पर भी केवल आवाज कम ज्यादा करने का काम मिलता था, वह लैपटॉप पर ऑनलाइन पढ़ने लगी थी| पर यह ऐसा वक्त था कि इसे उपलब्धि नहीं कहा जा सकता था|

अगले चालीस मिनिट उसे अपने अनदेखे सहपाठियों के साथ सह-अस्तित्व, सहयोग, सहभागिता का परिचय देना था| उनके साथ प्रतिस्पर्धा करनी थी और बहुत कुछ सीखना था|

अचानक उसने मुझसे पूछा, हाथ कैसे उठाते हैं? यह मेरे लिए नया था| पता होने के बाद भी मैंने अभी तक हाथ उठाने के बटन का प्रयोग नहीं किया था| मुझे लगा था कि वह भी साधारण तरीके से हाथ ऊपर कर देगी| मगर उसे तकनीक की अच्छी समझ थी|

हर पीढ़ी अपने कठिन समय से इसी तरह मुकाबला करती होगी|

बिचौलिया – 2


समाज बिचौलियों के विरुद्ध क्यों है| इसके ऐतिहासिक कारण है| पहले समय में बिचौलिए का काम गाँव या शहर में एक दो लोग करते थे और उनके बीच कोई प्रतियोगिता न थी| एकछत्र व्यापार का  ऊँचा लाभ था| कुछ हद तक इस तरह देखिए- हस्तशिल्पी अपना शिल्प एक हजार में बिचौलिए को देता है जो बड़े ब्रांड दो हजार में लेकर दस हजार में उपभोक्ता को देते हैं| सब इस “लूट” को जानते हैं परन्तु क्योंकि इन मामलों में उपभोक्ता बड़ा व्यक्ति है तो वह समय और वितरण तंत्र के खर्च और आवश्यकता समझते हुए मांगी गई कीमत दे देता है| इन मामलों में बिचौलिया अपने ब्रांड और दुकान की चमक भी जोड़ देता है तो उपभोक्ता थोड़ा खुश भी रहता है|

परन्तु यदि यह मामला नमक का हो तो उत्पादक से दस पैसे का नमक लेकर गाँव तक पहुँचते पहुँचते जब दस बीस रूपये का हो जाता है| यह खलता है| खासकर तब, जब बिचौलिए ने कोई अतिरिक्त सुविधा न जोड़ी हो जैसे – नमक पीसना, उसमें न जमने देने वाले रसायन मिलाना, पैकिंग करना, या अपनी ब्रांड वैल्यू जोड़ना| बल्कि बोरीबंद दानेदार नमक तो घर लाकर धोना भी पड़ता था| अगर गाँव के विक्रेता के पास अवसर हो और प्रतियोगिता न हो तो वह इसके चालीस रुपए भी वसूल सकता है|

भारत बिचौलियों का इतिहास पहले भी खराब रहा है| वितरण तंत्र वैश्य समुदाय के रूप में आदर पाता रहा, परन्तु उत्पादक और सेवा प्रदाता शूद्र कहलाते रह गए| अरब और अंग्रेज भी वितरण तंत्र को परिष्कृत करते करते शासक बन बैठे| व्यापार यानि वितरण यानि बिचौलिया आज भी स्थानीय से लेकर वैश्विक व्यापार का केंद्र है|

बिचौलिया विरोधी यह अनुभव भावना के रूप में आज भी कायम है| उदहारण के लिए दवाओं के मामले में सब जानते हैं कि दस पैसे मूल लागत की दवा उपभोक्ता को दस रूपये से लेकर सौ रूपये तक मिलती है| गाँव से एक रुपये किलो में चलने वाली सब्ज़ी शहर में उपभोक्ता को चालीस रुपए से अस्सी रुपये में पड़ती है| हम यह भी नहीं समझते कि बिचौलिया वितरण तंत्र का आवश्यक अंग है| हम वितरण तंत्र के खर्च नहीं देख पाते पर मुनाफ़े को देखते और चिड़ते हैं| जैसा मैंने पिछली पोस्ट में लिखा था, बड़ी कंपनियां अपने लाभ के लिए इस वितरण तंत्र को आत्मसात कर रही हैं और बिचौलिया विरोधी हमारी भावना का अस्त्र के रूप में प्रयोग कर रही हैं|

साथ में मानसिकता की भी बात है| जिन उत्पादों पर मूल्य लिखा हो हम उन्हें ऊँचे दाम पर सरलता से खरीद लेते हैं ख़ासकर ऐसे उत्पादकों का उत्पाद जिसका अच्छा प्रचार किया गया हो| क्योंकि हमें लगता है कि हम सीधे उत्पादक से खरीद रहे हैं| जब भी वितरण तंत्र हमें उत्पादक के साथ जुड़ा हुआ दिखता है तो हम सरलता से उत्पाद महंगे दाम पर खरीद लेते हैं|