कर्बला दर कर्बला


मैं इतना कायर हूँ कि दंगे के बीच से गुजर जाऊँ, चाकू छुरे के सामने खड़ा हो जाऊँ, मगर दंगे के बारे में सुनने,  देखने, लिखने और पढ़ने में दिल बैठ जाता है| शहर अलीगढ़ में रहकर दंगा जीना पड़ता है, मगर हर दिन उन्हें जीना मेरे बस के बाहर है|
उस दिन रतौल के स्वादिष्ट आम खाते हुये, सोचा न था कि गौरीनाथ अनर्थ कर रहे हैं| बोले “कर्बला दर कर्बला” भेज रहा हूँ| दिमाग़ कुंद हुआ तो बोल दिया, जी भेज दीजिए पढ़कर बताता हूँ| 

एक दंगा होता तो झेल जाता, यहाँ तो दंगे ही दंगे थे| मगर जब किताब उठाई तो फिर छोड़ी न गई सिवा इसके कि बीच बीच में दिल को दिलासा दिया जाए, कि आगे कोई दंगा न होगा, न किताब में न देश में| वैसे अब दंगे कहाँ होते हैं, नरसंहार को दंगा कह देना सरकारी प्रपंच है, तथ्य नहीं| किताब पर अपनी बात कहने से पहले एक प्रशासनिक कहावत याद आई, जब बरामद चाकू और छुरे का अनुपात तीन-एक या एक-तीन से अधिक होने लगे तो उसे दंगा कहते हुए थोड़ा आँख चुरा लेनी चाहिए| 

वह दिन मुझे आज भी दहला देता है तब तक मैंने सिख सिर्फ चित्रों में देखे थे और मेरे हाथ में एक चाबुक था, उम्र आठ साल, स्कूल या मोहल्ले में किसी को तंग करने की कोई शिकायत मेरे विरुद्ध नहीं थी| उस दिन माँ ने गाल पर चांटा रसीद किया था| दिन, तारीख़, वक़्त और मौका बताने की कोई जरूरत नहीं है| यह उन दंगों से अलग था जो शहर अलीगढ़ में देखते हुए हम बड़े हुए|

हर उपन्यास की पृष्ठभूमि में देशकाल होना आवश्यक है, यह देशकाल इतिहास बनाता है| हर उपन्यास अपने समाज और समय का प्रछन्न इतिहास होता है| ऐतिहासिक तथ्यों को कथा वस्तु में पिरोते चले जाना गज़ब संतुलन मांगता है| गौरीनाथ इस संतुलन को साधने में असुंतलन की सीमा तक जाते हैं| साहित्यिक संतुलन और कथावस्तु पृष्ठ 238 पर साथ छोड़ देते हैं, पठनीयता, पत्रकारिता, पाठकीय रुचि शेष रहती हैं। अंत में बचता है, शेषनाग की तरह कुंडली मार कर बैठा एक रक्तरंजित प्रश्नचिन्ह|

मैं पहला वाक्य पढ़ रहा हूँ: “पानी, दूब और धान लेकर खड़े होने की हैसियत सब के पास थी|” यह “थी” मुझे हिला देता है| इस उपन्यास इस वाक्य पर दोबारा बात नहीं हुई मगर यह पानी, दूब और धान के हमारे मन-आँगन में न बचने के क्रम की कथा है| अस्सी का दशक वह दशक है जो विमर्श, विचार, आचार आदि से पानी, दूब और धान को निकाल देने का प्रारम्भ करता है| विभाजन के समय जो कुछ हुआ, उसने पानी को हमारे मन से मिटाया और हम दूब और धान बने रहे|

यद्यपि पानी, दूब और धान लेकर खड़े हो सकने की हमारी क्षमता नष्ट होने का प्रारम्भ सत्तर के दशक में प्रारम्भ हो जाता है, पर अस्सी की राजनीति पानी, दूब और धान को नष्ट कर गई| सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, आतंकित, रोजगारित कारणों से अस्सी का दशक, जड़ से कटने की कथा है| अस्सी की इस राजनीति को समझने का एक बड़ा दरवाजा इस उपन्यास से खुलता है|

हिन्दू मुस्लिम दंगों को प्रायः तथाकथित विदेशी आक्रमणों की पृष्ठभूमि में देखा जाता है| जिन विदेशी आक्रमणों की हम बात करते हैं प्रायः वह या तो आर्यवृत्त के अपने इलाकों से हुए हैं या एकदम पड़ौस से| जब इन आक्रमणकारियों के धर्म हमारे वर्तमान धर्म से मिलते जुलते हैं, हम गर्व से उन्हें पढ़ते पढ़ाते हैं जैसे कुषाण वंश| यहाँ तक कि सिकंदर के साथ आए यूनानियों, बाद में मध्य एशिया से आए शक हूणों और लूटपाट, शोषण आदि कर कर चले गए पश्चिमी यूरोपियों से हमें कोई कष्ट नहीं होता| 

हमारी कहानी बिगड़ती है मुस्लिमों के साथ| पुरानी कहावत है जो बर्तन पास रहेंगे वहीं आपस में बजेंगे| यहाँ तो बनते बिगड़ते रिश्तों का लंबा सामाजिक आर्थिक राजनैतिक, कूटनैतिक इतिहास है, वह इतिहास जिसमें अंग्रेजों ने अतिरिक्त खादपानी लगाया है| उस फसल ने अस्सी में कुल्ले देना शुरू किया और अब फसल पकने लगी है|

बदलते आर्थिक राजनैतिक, कूटनैतिक और तकनीकि समीकरणों ने निश्चित ही मुस्लिमों की आर्थिक और सामाजिक आदान-प्रदान क्षमता में उनका पक्ष कमजोर किया है| उदाहरण के लिए यदि हथकरघों को विद्युतकरघों ने निवृत्त न किया होता तो क्या इस उपन्यास के लिए विषयवस्तु पैदा होती? क्या पसमांदा और पिछड़े वर्ग के मुस्लिमों के मुक़ाबले हिन्दू दलितों और पिछड़ों की स्थिति में सामाजिक और आर्थिक सुधार न आया होता तो क्या उनमें सिर उठाने और दंगा करने की हिम्मत जुट पाती? आगरा मथुरा जिले के जाट-जाटव दंगे अपनी लंबी अवधियों के बाद भी वास्तव में दंगे बने रहे रहे| यह दोनों पक्षों के आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक संतुलन के कारण हुआ और किसी एक पक्ष में खड़ा हो पाना किसी भी राजनीति के लिए लाभकारी न रहा| 

स्थानापन्न कर पाने की क्षमता और उस क्षमता को प्रयोग कर पाने की इच्छाशक्ति का पैदा होना किसी भी दंगे के लिए पैदल सेना तैयार करता है| दंगों को नरसंहार में बदलने के लिए रणनीति और राजनीति उसके बाद पैदा होती है|

यह उपन्यास दंगों के आर्थिक पहलू को भली भांति छूता और यथोचित विवेचना करता है| इन विवेचनाओं को बहुत खूबसूरती से कथावस्तु में पिरोया गया है| कई बार लगता है समस्त विवेचना बहुत ही “सांप्रदायिकनिरपेक्षतावादी” और दोनों पक्षों के सांप्रदायिकतावाद को हाशिये पर रख देती है| वैसे भी घृणा, आरोप-प्रत्यारोप और पुरानी रंजिशों के आलवा सांप्रदायिकतावाद के पास होता क्या है?

जहाँ इस उपन्यास में बिगड़ता हुआ सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक ढाँचा मानवीय त्रासदी के रूप में हमारे सामने खड़ा होता है वहीं इसी कथा के हाशिए पर बनते बिगड़ते पारवारिक व सामाजिक संबंध एक नए समाज की नींव रख रहे हैं| यह सब इस समाज और इस उपन्यास की उपधारा में हो रहा है| उम्मीद की जा सकती है यह उपधारा धीरे धीरे ही सही मगर समाज की मुख्यधारा बनेगी और उससे भी अधिक अपने को मुख्यधारा कहने का साहस जुटाएगी| 

यदाकदा तथ्यपूर्ण बोझिल हो जाने के कारण गंभीर पाठक के लिए इस उपन्यास की पठनीयता बढ़ी है| फुटनोट भी बिना पढ़े समझे नहीं रहा जाता| 

पुस्तक: कर्बला दर कर्बला
विधा: उपन्यास,
लेखक: गौरीनाथ
संस्कारण: दूसरा पेपरबैक, फरवरी 2022 
प्रकाशक: अंतिका प्रकाशन, गाजियाबाद
पृष्ठ संख्या: 256 मूल्य: 295.00
आईएसबीएन: 978-93-91925-65-9
http://www.antikaprakashan.com/index.php

माँ!!


क्या चित्र आता है आपके मन में? माँ, जिसके मुखमंडल पर ममता गंगाजल की तरह बह रही हो? क्या मुखमंडल पर प्रगट होती ममता ही मातृत्व का प्रतीक है? आपका प्रश्न यही होगा कि बिना ममत्व के कैसी माँ? मैं पूर्णतः सहमत हूँ| परन्तु माँ ममता होने की प्रथम आवश्यकता नहीं है, यह एक लक्षण है माँ हो जाने का| यह कहना भी उचित नहीं है कि जन्म देने के उपरांत ममता का प्रादुर्भाव होता है, लक्षण के रूप में ममता अत्यल्प बालिकाओं में भी प्रत्यक्ष होती है| 

प्रकृति ममता की अवधारणा के आधार पर मातृत्व की पुष्टि करने से सर्वदा इंकार करती हैं| स्वभावतः कोई भी स्त्री यशोदा होने को देवकी हो जाने के मुक़ाबले कम पसंद करती हैं| यही कारण है कि हजारों अनाथ बच्चों के इस संसार में उर्वरता चिकित्सा बहुत बड़ा व्यवसाय है|
प्रकृति में माँ होने की प्रथम और प्राकृतिक अवधारणा गर्भधारण ही है| प्रकृति में प्रसव का होना न होना, सामाजिक और चिकित्सकीय आधार पर चुनौती पा रहा है| संभव है कि गर्भधारण के लिए अपने गर्भाशय के प्रयोग को भी पूर्ण चुनौती दे दी जाये| परन्तु यह भी स्पष्ट है माँ होने के लिए गर्भधारण और प्रसव के विकल्प तो संभव हैं परन्तु विकल्प उन्हें अप्रासंगिक नहीं बनाते| 

माँ होने के लिए गर्भधारण और प्रसव को सर्व-स्वीकृति अवश्य है, परंतु है गर्भधारण की प्रक्रिया को मातृत्व के समान आदर से नहीं देखा जाता| उसे कोई गर्भधारण संस्कार नहीं कहता – इसे यौन क्रिया ही कहा जाता है| परंतु यह सिक्के के दो पहलू की तरह है| आपके किस ओर खड़े होकर सिक्के को देखना चाहते हैं| आप के मतिभ्रम से जननांग और यौनांग की वास्तविकता पर अंतर नहीं पड़ता है, लेकिन यह शब्द प्रयोग मात्र यह दिखा सकते हैं कि आप सिक्के के किस तरफ होना पसंद करते हैं|

मेरे हिन्दी शिक्षक ने एक किस्सा सुनाया कि एक नवधनाड्य ने प्याऊ पर बैठी स्त्री से ज़ोर से कहा अरी औरत पानी पिला दे| उस स्त्री ने अनसुना कर दिया और किसी विचार में मग्न रही| थोड़ी ही देर में कोई प्राध्यापक उधर और बोले माताजी यदि समय हो तो क्या आप थोड़ा पानी पिला देंगी| स्त्री ने तुरंत मटके से पानी निकाल कर पानी पिलाना शुरू कर दिया| माँ होना स्त्री होने से अलग नहीं हो सकता, परंतु आप का आचरण आपकी दृष्टि का द्योतक होता है| यह आचरण बड़े बड़े प्रतीकों से अधिक महत्वपूर्ण है| (उस समय पूंजीवाद का ज़ोर न था और पुराने पैसे वाले नए गुर्गों को खास इज्जत नहीं देते थे)

माँ के व्यापक रूप से आराध्य एक चित्र को देख रहा था जिसमें स्तन व चूषक दिखाई देते थे| तो प्रकार की टिप्पणियाँ दर्ज थीं, पहली जय माँ,  जय माता जी वाली और दूसरी, हमें माँ को इस तरह नहीं देखना चाहिए कम से पुष्पमाल से तो स्तन ढक दिये जाने चाहिए थे| यदि आप पवित्र मन बालक हैं तो यही अनावृत स्तन और चूषक आपको दुग्ध प्रदान करेंगे, आपको मूल जीवनी शक्ति प्रदान करेंगे| मुख्य बात भावना ही है| यह दर्शक का दृष्टि दोष है, जिसे आप मूर्तिकार, चित्रकार और शृंगार पर मढ़ते हैं| क्या माँ के अनावृत्त दर्शन उन्हें माँ नहीं रहने देंगे| ऐसा नहीं है| कहा जाता है कि प्रस्तुत चित्र आपकी भावना को बनाएगा या बिगड़ेगा, परंतु यदि आपकी भावना इतनी कमजोर है तो आप ध्यान क्या लगाएंगे| मेरा मानना है कि यौन भाव और मातृ भाव से बने चित्रों को उनके मूल भाव के अनुसार ही देखा जा सकता है| यदि ऐसा नहीं होता तो यह दर्शक की प्राकृतिक भावना की विकृति है| दोनों भाव आवश्यक और प्राकृतिक हैं| प्रश्न किसी एक भाव के गलत होने का नहीं है अपितु उस भाव के उचित समय पर उत्पन्न होने का है| 
* चूषक शब्द से याद आया की संस्कृत के एक गुरु जी चषकः को चषकः कहने से कतराते थे| क्यों? उसे न पूछिए|

मोबाइल एप के उधार


अपने मोबाइल या लैपटाप में बहुत जरूरी से अधिक एप रखना मैं अगर पाप नहीं तो अनुचित अवश्य समझता हूँ| मेरे पास कोई बैंकिंग एप नहीं है, न ही कोई उधारखाता या सरकारी एप है| नियम सरल है – जो काम वेबसाइट से हो सकते हैं उनके लिए कोई एप नहीं| वेबसाइट भले ही मैं मोबाइल पर ही खोल लूँ, एप नहीं रखता| बिना मतलब अपने घर कोई जासूस या डाटा चोर बैठने का क्या मतलब| कुछ तथाकथित सामाजिक एप है जो बहुत डाटा खाते है और डाटा भी चुराते हैं| मैं सोच लेता हूँ डाटा बेचकर उनकी तकनीकि का प्रयोग कर रहा हूँ| 

स्पष्टतः कुछ मुफ्त नहीं हैं, कुछ सस्ता नहीं है; और सस्ता या मुफ्त नैतिक नहीं है| जब मैं किसी का काम मुफ्त करते समय उसे एक दिन अपना ग्राहक/यजमान बनाने की सोचता हूँ और भीख भी पुण्य/आशीर्वाद की कामना से देता हूँ, तो मुफ्त क्या हो सकता है? 

व्यवसाय, कॉर्पोरेट, तकनीक, मोबाइल, साइबर और मेटा की दुनिया का सबसे बड़ा भ्रम किसी सेवा, वस्तु, वाक्य, कथन, नृत्य, कला, विचार आदि आदि का मुफ्त या सस्ता होना ही है| 

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फिर क्या मोबाइल एप के उधार सस्ते हो सकते हैं? मेरे जान पहचान में कुछ लोग इस प्रकार के ऋणों का शिकार हो चुके हैं| 

पहली बात यह कि उधारी को मैं आपातकालीन प्रबंध मानता हूँ| मेरे लिए आपातकाल वह है जो जीवन-मृत्यु का प्रश्न है आराम, सहूलियत, बेहद सस्ता आदि कतई आपातकाल नहीं हैं| जी हाँ, मेरे पास क्रेडिट कार्ड है परंतु उसका उधार समय से पहले चुकाना मेरी परंपरा है| मैंने क्रेडिट कार्ड के केवल उसी उधार पर एक बार ब्याज दिया है जो वास्तव में आपातकालीन चिकत्सा संबंधी उधार था| 

दूसरे अगर आप गैर आपातकालीन उधार ले भी रहे हैं तो उसे चुकाने का धन या भविष्यत आय आपके पास हर हाल में होनी चाहिए| उस गैर आपातकालीन उधार के बदले में आपका बीमा भी हो कि आपका उधार संतान या संपत्ति को न चुकाना पड़े| यह समझने की बात है कि मैं व्यापार के लिए कार्यशील पूंजी के लिए उधार का समर्थक हूँ और इसकी सलाह देता हूँ| परंतु यह उधार हर चक्र में चुकाया जाना चाहिए या धंधा छोड़ देना चाहिए| ऐसा न होने पर धंधा ही नहीं, साख भी आपको छोड़ देगी| अन्य व्यापार संबंधी ऋण को मैं आवश्यकता के आधार पर ही देखता हूँ और अनावश्यक ऋण न लेने की सलाह देता हूँ|

तीसरे कार, फर्नीचर आदि ऋण नहीं लेने चाहिए| आजाद ख्याल और मस्त रहने के लिए गृह ऋण से बचना चाहिए| यह आपको बीस तीस साल के लिए बंधुआ मजदूर, बंधुआ किराएदार और बंधुआ मस्तिष्क बना सकता है| वैसे अगर मैं कभी व्यवसायी बनूँ तो उन लोगों को नौकर रखूँगा जिनके पास मोटे गृहऋण के साथ एक दो और ऋण हैं| जिन लोगों के पास भविष्य में बनने वाले घरों के लिए लिया गया गृहऋण हों, उन्हें दया का पात्र मानना चाहिए| कुछ शातिर धनलक्ष्मीभक्त गृहऋण का बहुत बढ़िया प्रयोग करते हैं और संपत्ति बनाने में सफल रहते, उनके प्रति मेरा पूरा आदर और शृद्धा है| आम जन उनकी अंधी नकल न करें, इसके लिए समय, शिक्षा और कौशल का निवेश करना होता है| 

चौथा ऋण लेकर न चुकाने वालों को में विशेष मानता हूँ| इनमें से जो व्यवसायिक सद्प्रयास के बाद भी ऋण नहीं चुका पाते, उनसे मुझे सहानुभूति है| शातिर ऋण चोरों को मैं चोर ही मानता हूँ, परंतु आदर भी प्रदर्शित करता हूँ ताकि मैं समाज में रह सकूँ| आशा है आप आदर करने और आदर प्रदर्शित करने का अंतर समझते हैं| 

यह सब तो मूल बात हुई,अब मुख्य बात पर आते हैं|

बहुत से एप तत्काल उधार की सुविधा देते हैं| यह सभी एक विशेष प्रकार से काम करते हैं| आपके मोबाइल के माध्यम से आपका ही नहीं, आपके सम्बन्धों और उनकी आदतों का भी पूरा पूर्ण चहुंमुखी चरित्रचित्रण बनाकर रखते हैं| इसके साथ चरित्र हनन का भी पूरा इंतजाम तकनीकि की मदद से यह कर सकते हैं| इस प्रकार के मोबाइल एप से आप तुरंत फुरन्त बड़ा उधार लेते हैं| वैसे यह उधार आम तौर पर एक लाख से कम का ही होता है| उनका चिन्हित ग्राहक समुदाय वह तबका है जिसे इतना भी उधार सरलता से न मिल सके| इसका अर्थ यह नहीं कि यह आर्थिक निम्न वर्ग को निशाना बनाते हैं| यह आम तौर पर मध्यवर्ग के उस तबके को निशाना बनाते हैं जिन्हें तत्काल ऋण प्राप्त करने की सुविधा न हो – जैसे कम या घटती आर्थिक साख (credit rating), पारिवारिक असहयोग, उधार से सकने वाले मित्रों संबंधियों की कमी, घटती आय, घटती या स्थिर आय के साथ स्थिर या बढ़ता खर्च, आपतकालिक  आदि| फिर कोई भी व्यक्ति दस से पचास हजार का कर्ज तब ही लेगा, जब मानसिक रूप से तात्कालिक आर्थिक या सामाजिक मुसीबत सामने हो| 

यह एप मुफ्त उधार नहीं देते, आपके मोबाइल के सभी आंकड़े, सूचना, संबंध, चित्र आदि उनके पास कहे अनकहे, अनुमति- बिना अनुमति जाते हैं| आप की महत्वपूर्ण सूचना पैन, आधार, जीएसटी, माता पिता का नाम, बैंक खाता, उम्र आदि यह आपसे पूछ ही लेते हैं| कुल मिला कर आप अपना पूरा व्यक्तित्व, चरित्र और जीवन उस छोटे से ऋण के लिए गिरवी रख देते हैं| 

एक पुरानी नसीहत है – गू खाओ तो हाथी का, चिरईया का नहीं, उधार लो तो लाख का, हजार का नहीं| मैं इस नसीहत को पूरी तरजीह देता हूँ|

वैसे पैर उनते फैलाए जिनती चादर हो, पैर बड़े हो तो चादर बड़ी करने पर ध्यान दें, छोटी चादर न फाड़ें|