टहलने वाली शामें

शाम जब बसंती होने लगें और यह शाम दिल्ली को शाम नहीं हो तो टहलना बनता है|

गुजरा ज़माना था एक, जब हर शाम टहलने निकल जाते थे| उस शामों में धुंध नहीं थी, न धूआँ था| हलवाई की भट्टी के बराबर से गुजरने पर भी इतना धूआँ आँखों में नहीं चुभता था, जितना इन दिनों दिल्ली की किसी वीरान सड़क पर राह गुजरते आँखों में चुभ जाता है| न वाहनों की चिल्ल-पों थी न गाड़ियों से निकलने वाला कहने को प्रदुषण मुक्त धूआँ| गलियों में आती हवा सीधे खेतों जंगलों की ताजगी लाती थी|

उन दिनों घर घर टेलिविज़न नहीं होते थे और लोग मोहल्ले पड़ोस में और मोहल्ले पड़ोस के साथ घूमना पसंद करते थे| भले ही उन दिनों कान, सिर और गले में लटका लिए जाने वाले हैडफ़ोन आम नहीं थे मगर गली कूचों से कोई दीवाना ट्रांजिस्टर पर विविध भारती बजाते हुए गुज़र जाता| अगर वो नामुराद वाकई गली की किसी लड़की का पुराना आशिक होता तो लड़की को मुहब्बत और पास पड़ोस को जूतम-पैजार की टीस सी उठा करती|

घर से निकलते ही पान की तलब होती और दो नुक्कड़ बाद पनवाड़ी की दूकान से दो पत्ती तम्बाकू पान का छोटा बीड़ा मूँह में दबा लिया जाता| अगर घरवाली थोड़ा प्यार उमड़ता तो चुपचाप घर खानदान के लिए एक आध पान के हिसाब से पान बंधवा लिए जाते| शाम थोड़ा और सुरमई हो जाती| लाली होठों से होकर दिल और फिर जिन्दगी तक फल फूल फ़ैल जाती|

पान की दुकानें टहलने वालों का एकलौता ठिकाना नहीं थीं| मिठास भरे लोग अक्सर मिठाई की दुकान पर दौना दो दौना रबड़ी बंधवाने के शौक भी रखा करते| मगर रबड़ी का असली मजा मिट्टी के सकोरों में था|

चौक पर मिलने वाले कढ़ाई वाले मलाईदार दूध का लुफ्त उठाते लौटते| अब वो ढूध कहाँ? चौड़ी कढ़ाई में मेवा मखाने केसर बादाम के साथ घंटा दो घंटा उबलने के बाद ये दूध आजकल की मेवाखीर को टक्कर देता| ढूध पचाना कोई आसान काम तो नहीं था| सुबह उठकर पचास दण्ड पेलने और सौ बैठक लगाने के बाद मांसपेशियां क्या रोम भी राम राम करने लगते|

अक्सर लोग अपने साथ नक्काशीदार मूठ के बैंत ले जाते| गली के कुत्ते उन बैंतों को देखकर भौंकते थे या आवारा घूमते आदमी को, इसका पता शायद किसी को नहीं था| मगर बैंत शान दिखाने का तरीका था और रुतबे की पहचान थी|

मगर टहलने जाना भी कोई किसी ऐरे गैरे का काम नहीं था| अगर टहलने वाले के पीछे एक अर्दली भी टहल करता हो तो मजा कुछ था शान कुछ और|

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उम्मीद भरा घर

मानवता का इतिहास केवल युद्धों और राजाओं का इतिहास नहीं है| बीमारियों का अपना अलग इतिहास और ऐतिहासिक प्रभाव रहा है| एक ही बीमारी का असर हर किसी व्यक्ति पर अलग अलग होता है| समय के साथ बीमारी भी रूप बदलती है तो बीमारी के नए इलाज भी इजाद होते हैं| परन्तु बीमारियाँ पूरे परिवार को हिलाकर रख देतीं है| कई बार घर बीमारियों की वजह आर्थिक रूप से बर्बाद हो जाते हैं, तो कभी उन्हें मानसिक रूप से बीमारी लम्बे समय तक परेशान करती है| ऐसा तब भी होता है जब बीमार व्यक्ति पूरी तरह ठीक हो जाए| अगर बीमारी बनी रह जाए तब समस्या है ही|

मैंने इस कथा पुस्तक में एक बीमारी से प्रभावित घर के बारे में बात की है| यह लगभग हर घर की कथा है जिसने बीमारियों का सामना किया है|

घर बीमारियों के कुछ गम्भीर अनुभवों से गुजरता है और अपनी भावनात्मक कथा कहता जाता है| घर द्वारा भोगी हुई इस पीड़ा के साथ हम परिवार और समाज के संघर्षों से गुजरते हैं| कोशिश रही है कि गंभीर परिस्तिथियों में भी कथा बोझिल नहीं हो जाए| पूरी कथा में घर अपनी उम्मीद नहीं खोता है|
अलग ही शैली में लिखी गई यह कथा स्वाभाविक रूप से सरल सहज भाषा में आगे बढ़ती है और पाठक को बाँध कर रखने का प्रयास करती है|

यह पुस्तक पाठकों के लिए प्रकाशित की गई है| इस समय यह इ-बुक फॉर्मेट में अमेज़न किन्डल पर उपलब्ध है| इसे मोबाइल, टैबलेट, लैपटॉप, कंप्यूटर, आदि विभिन्न उपकरणों के किन्डल एप पर पढ़ा जा सकता है| खरीदें पढ़े और अपना विचार अवश्य साँझा करें| विशेष आग्रह है कि पुस्तक पढ़ने के बाद अमेज़न पर इसका रिव्यु अवश्य दें|

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उम्मीद भरा घर

उम्मीद भरा घर

पुस्तक – उम्मीद भरा घर
लेखक – ऐश्वर्य मोहन गहराना
भाषा – हिंदी
पुस्तक रूप – किन्डल ई पुस्तक
वितरक – अमेज़न एशिया पेसेफिक होल्डिंग्स प्राइवेट लिमिटेड
प्रकाशन वर्ष – 2019
विधा – कहानी
पृष्ठ संख्या – १०६ (अनुमानित)
मूल्य – मात्र ४९ रुपये

चिकित्सा सेवा सुधार

यह लेख पिछले लेख स्वास्थ्य बीमा बनाम स्वास्थ्य सेवा की आगे की कड़ी है|

दुनिया भर में स्वास्थ्य सेवाएँ देना एक बेहद महंगा कार्य है| उस से भी अधिक महंगा है किसी भी बड़ी बीमारी के लिए मूलभूत ढांचा खड़ा करना| एक समय था कि सरकारें ही इस प्रकार के बड़े खर्चे वहां करने की स्तिथि में थीं| आज दुनिया भर में गरीबी कम हुई है और व्यवसायिक स्वास्थ्य दे पाना संभव हुआ है| मगर, आज भी बेहद बड़ी बीमारिओं के लिए व्यावसायिक तौर पर स्वास्थय सेवाएं दे पाना कठिन है| यह बड़े और महंगे खर्च वाले चिकित्सालय बेहद बड़े शहरों में ही उपलब्ध हो पा रहे हैं| दूसरी तरफ अच्छे अस्पतालों में इलाज कराने की चाह के चलते छोटे शहरों और गाँवों के अस्पतालों में मरीजों की कमी है| मरीजों की इस कमी के चलते अच्छे इन अस्पतालों के लिए अच्छे चिकित्सक ला पाना कठिन होता जा रहा है| इस समस्या से निपटने के लिए सरकारों को छोटे और बेहद बड़े अस्पातालों और इलाजों में निवेश करने की आवश्यकता है|

बीमा मरीज को इलाज सस्ता या मुफ्त दे सकता था, मगर इलाज नहीं दे सकता| इलाज उपलब्ध करने का काम सरकार का है, चाहे यह पूंजीवादी सरकार हो या साम्यवादी| निजी क्षेत्र को साथ लेकर चलना उचित है, परन्तु स्वास्थय सेवाओं की निजी क्षेत्र ही पर छोड़ देना उचित नहीं जान पड़ता| बीमा सम्बन्धी कोई भी सरकारी योजना आज केवल निजी चिकित्सालयों के दम पर सफल नहीं हो सकती|  उदाहरण के लिए आज तक निजी क्षेत्र एम्स जैसे एक भी संस्थान को खड़ा नहीं कर पाया है| टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल, मुंबई जैसे एक दो उदहारण को छोड़ दें तो निजी क्षेत्र का पूरा लक्ष्य स्वास्थ्य सेवाओं का व्यवसायिक दोहन तक ही सिमटा हुआ है|

मेरा सुझाव यह है कि

  • राज्य सरकारें (स्वास्थ्य राज्य का संवैधानिक विषय है) स्वास्थ्य सेवा की उपसेवा के रूप में बीमा पूल तैयार करें और उस से इक्कठा होने वाले धन से स्वास्थय सेवाए प्रदान करे|
  • हर नागरिक को इस सरकारी बीमा पूल से सरकारी और निजी चिकित्सालयों में चिकित्सा सुविधा मिले|
  • सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं का पूरा मूल्य लिया जाये और चिकत्सकों को भी सरकारी बीमा पूल से व्यवसायिक सेवामूल्य दिया जाए|
  • निजी क्षेत्र को चिकित्सा अनुसन्धान जैसे क्षेत्रों में आने के लिए प्रेरित किया जाए और उसका व्यवसायिक उपयोग करने की अनुमति हो|
  • दवाओं और अन्य उत्पादों पर मूल्य नियंत्रण हो परन्तु इतना नहीं कि यह क्षेत्र लाभ का सौदा नहीं रहे|
  • चिकित्सा उत्पाद क्षेत्र में आपसी प्रतिस्पर्था को बढ़ावा दिया जाये|

स्वास्थ्य बीमा बनाम स्वास्थ्य सेवा

बीमा, पूँजीवाद का सर्वाधिक साम्यवादी उत्पाद है| इसमें पूँजीवाद की लम्पटता और साम्यवाद की अनुत्पादकता का दुर्भाग्यपूर्ण सम्मिश्रण है|

बीमा का सीमित प्रयोग सफलता की कुंजी है| उदारहण के लिए केवल शुरूआती जीवन में लिया गया सावधि जीवन बीमा आपके परिवार को आर्थिक सुरक्षा देता है| अन्य जीवन बीमा उत्पाद बीमा कंपनी को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करते हैं|

मैं जिन बीमा उत्पादों का समर्थक हूँ उनमे स्वास्थ्य बीमा शामिल है| परन्तु कबीर दास जी बीमा के बारे में ही कह गए हैं: अति का भला न चुपड़ना| यहाँ हम केवल स्वास्थ्य बीमा की बात करेंगे|

पहली बात यह है कि इस बात का ख्याल रखा जाए कि बीमार न पड़ा जाए| उस तरह न सोचा जाये जिस तरह हम दिल्लीवाले वायु प्रदूषण सम्बन्धी बीमारियों के बारे में कभी कभी सोच लेते हैं – बीमा के खर्चे पर इलाज कराएँगे| ध्यान रखें चिकित्सा, शल्य चिकित्सा और दवाओं के दुष्प्रभाव आपको ही झेलने होंगे – बीमा कंपनी को नहीं| अच्छे पर्यावरण के लिए सरकार, साम्यवाद और पूँजीवाद से लड़िये– यह बहुत बड़ा बीमा है|

दूसरी बात, स्वास्थ्य बीमा केवल इस बात का आश्वासन है कि अगर आप कोई स्वास्थ्य सेवा लेंगे तो उसका खर्च बीमा कंपनी उठाएगी| यह बात तो हम सभी जानते हैं कि अधिकतर बीमा कंपनी बड़ी और खर्चीली बीमारियों को सामान्य स्वास्थ्य बीमा से बाहर रखतीं हैं| इस बीमारियों के लिए आपको अलग से बीमा लेना होत्ता है या फिर रामभरोसे बैठना होता है| अगर फिर भी बीमारी हो जाती है तब आपकी बचत खर्च होने लगती है| बीमा चाहे निजी हो या सरकारी, इस बात का ध्यान रखें|

तीसरी बात, अगर आप दुनिया की सारी बीमारियाँ अपने बीमा में शामिल करवा भी लेते हैं तो बीमा कंपनी इस बात की कोई गारंटी नहीं दे सकती कि किसी बीमारी का इलाज आपके देश में या फिर इस दुनिया में कहीं भी है| इस बारे में सोचने की गंभीर आवश्यकता है|

क्या हमारे पास स्वास्थ्य सेवा का मूलभूत ढाँचा है?

आरक्षण बेचारा!!

मानसून और चुनाव हमारे राष्ट्रीय मौसम हैं| इन मौसम में मेढ़क और नेता अपने बिल और बंगलों से बाहर निकल आते हैं| मॉनसून और चुनावों के बाद दिवाली शुरू हो जाती है, इसलिए पुराने साज-सामान और वादों को धो पौंछ कर चमकाया जाता है|

इस बार प्रधानमंत्री जी ने पुराने वादे को वादों के कब्रिस्तान से खोदखाद कर खड़ा कर किया है| गरीबों को दस फ़ीसदी आरक्षण मिलने जा रहा है| बधाईयाँ… , … …. … थोड़ी देर बाद|

सवाल यह नहीं रहा कि पिछले पच्चीस साल में कितने लोगों की आरक्षण का लाभ मिला और आरक्षित श्रेणी के कितने पद खाली छूट गए? सवाल खास ये है कि नौकरियां कहाँ हैं? आज बेरोजगारी का आंकड़ा ९ फीसदी के पास पहुँच चुका है| सरकारी नौकरियां लगातार घटी हैं, तो आरक्षण के वास्तविक अवसर कम होते रहे हैं| सरकारी खर्च में कटौती के नाम पर अधिकतर सरकारी काम ठेके पर हैं या व्यवसायिक करार दिए जाकर निजी क्षेत्र को बिक चुके हैं|

आरक्षण की इस घोषणा का सबसे खूबसूरत पहलू है – गरीबी का पैमाना|

सालाना आठ लाख की पारवारिक आय आरक्षण वाली गरीबी का पहला मापदंड है| गरीबी रेखा तो बेचारी आरक्षण वाली गरीबी आगे पानी मांगती है| यह आंकड़ा देश की प्रति व्यक्ति आय से बहुत अधिक है| देश की लगभग नब्बे प्रतिशत से अधिक आबादी इस आय निर्धारण के हिसाब से गरीब घोषित हो गई है| सरकार ढ़ाई लाख से उपर सालाना आय पर आयकर वसूलती है| बहुत से शहरी मित्र कहते हैं कि आयकर सीमा प्रतिव्यक्ति है और आरक्षण सीमा प्रतिपरिवार| मगर पति पति दोनों चार चार लाख से कम कमायें तो दोनों आयकर अमीर और आरक्षण गरीब होंगे|

मैं इस बात से सहमत होना चाहता हूँ कि गरीबी रेखा से नीचे वाले व्यक्ति को आरक्षण देने का कोई फायदा नहीं होगा| कारण वास्तविक गरीबी रेखा से नीचे वाले गरीब का बच्चा इतना पढ़ लिख नहीं पाता कि किसी सरकारी पद के लिए वास्तव में योग्य घोषित हो पाए| चपरासी के लिए भी कम से कम आठवीं पास उम्मीदवार चाहिए होता है| अगर किसी की वास्तव में लाभ देना है तो इस आरक्षण के लिए गरीबी की सीमा रेखा वास्तविक गरीबी रेखा से निश्चित ही ऊपर होनी चाहिए| मगर यह आठ लाख इस रेखा से बहुत ऊपर है|

जमीन या घर के पैमाइश भी बड़ी अजीब है| सौ एकड़ का सिचाई विहीन ऊसर किसी परिवार को अमीर नहीं बना सकता तो मरीन ड्राइव पर दस फुट का घर या दफ्तर लेना बहुत से अमीरों के बस की बात नहीं| कुल मिलाकर संपत्ति के आधार पर गरीबी का कोई वैज्ञानिक निर्धारण नहीं हो सकता|

ध्यान देने की बात है कि आर्थिक आधार पर आरक्षण देने का न मुद्दा नया है न प्रयास| यह मुद्दा संविधान सभा के सामने भी आया था और प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव ने बाकायदा नियम भी बनाया था| पहले संविधान सभा और बाद में उच्चतम न्यायालय ने इसे संविधान सम्मत नहीं पाया| संसद में विधेयक पास हुआ है, विधानसभाओं में भी हो जाएगा| मगर… … नौकरी हो तो मिलेगी|

शेष कुशल हैं| चुनाव की चुनावी बधाई|

चतुर सहायक, सकुशल जीवन

जिन्दगी की रफ़्तार पर दौड़ने के लिए वक़्त से आगे दौड़ना होता है| ज़िन्दगी रोज रफ़्तार बढ़ा देती है| इसी रफ़्तार को पाटने और बढ़ाते जाने की कोशिश का नाम विज्ञान और तकनीक है| इस तकनीक का कुशल प्रयोग करना चतुर होना है, चतुर  होना है|

इंसान के लाखों सालों के इतिहास में कुछ हजार ही हुए हैं पहिया ढूंढे हुए| पिछले हजार साल में इंसान में बैलगाड़ी से लेकर चतुर कार तक का सफ़र तय किया है|

इंसान को अपनी जिन्दगी के थपेड़ों का सामना करने के लिए जिस सच्चे साथी की जरूरत हैं, वह वैज्ञानिक तकनीक ही है| जब गहरी नींद के बाद आँख नहीं खुलती, कलाई में पड़ा हुआ कड़ा हौले हौले आपकी कलाई सहला कर ही जगा आपको देता है| आपकी रात भर की नींद का पूरा खाका आपके सामने है| अपने दिन की योजना करने से पहले आपको अपनी आज की क्षमता और स्वास्थ्य का पता चल चुका है| आपका चतुर  कड़ा आपसे कहता है, आज थोड़ा सा और पैदल चलो मेरे आका|

चतुर पहनावा (Smart Wearable)

आप तैयार होकर ताकत और ऊर्जा से भरा कलेवा करते हैं| अपनी लखटकिया बाइक पर बैठते ही आपका हेलमेट गंतव्य का ट्रेफ़िक मुक्त रास्ता बताने लगता है| आप निश्चित ही सुरक्षित और मित्रवत हेलमेट के साथ है| लम्बे और शांत मार्गों पर अपने इस मित्र से कुछ गाने या कहानी सुनाने की फ़रमाइश भी कर सकते हैं|

दिन भर आप अपने लिए रोजी रोटी, ऐश-ओ-आराम, शान-ओ-शौकत और ढेर सारा अहम कमाने के लिए परिश्रम करते हैं| शाम तक आपका थकना स्वाभाविक है|

शाम को कार्यालय से आप अपना चतुर ऐनक लगा कर निकल लेते हैं| आपका ऐनक आपको राग भैरव में “मोहे भूल गए साँवरिया” सुना कर आपका मन हल्का कर रहा है और आप अपने साहब को “ऐ मालिक तेरे बन्दे हम” गाते गाते कार्यालय से निकल लेते हैं|

चतुर घर  (Smart Home)

घर में घुसते हुए आपको पता लगता है की बच्चों ने धमाचौकड़ी मचा रखी है| आपके बैठक में जलती हई तेज नर्तक रोशनियाँ, आपकी आँखें बहुत दूर से ही चौंधा देती हैं| मगर घर के अन्दर आपका पहला कदम एकदम शानदार हैं| आप पाते हैं कमरे में शांत संगीत हैं, मध्यम रौशनी हैं और आपके कुछ प्यारे प्यारे से दो बच्चे मुस्कुरा रहे हैं| आप खुश होते हैं कि यह कमाल बच्चों का नहीं, आपका है – आपके चतुर  घर का है| आपका कॉफ़ी पीने का मन है और कमरे की रोशनियाँ अपना रंग बदल कर उस रंग में रंग जाती है|

सामने दीवार पर लगा मोनिटर बता रहा है, आपके घर के दरवाजे पर आपका बचपन का वो यार आया है, जिसके साथ बचपन में आपने मंदिर के पिछवाड़े बैठकर पहली बार दारू पी थी| ये पठ्ठा खुद तो दारू पीता नहीं, मगर आपको पीना सिखा गया| आप खुश है, थकान उतर गई है| आप सोफे पर बैठे बैठे ही दरवाजे को खुल जाने का हुक्म दे देते हो| वो अन्दर आकर अपने मोबाइल रिमोट से आपके टेलिविज़न पर सहगल के “ग़म दिए मुस्तकिल” की जगह “देशी दारू इंग्लिश बार” लगा देता है|

बात से बात निकलती है, बातों में वक़्त बदलता है| आप याद करते हैं, जब आप जब भी दिल्ली या कलकत्ता जाते थे तो रास्ता भूल जाते थे| कभी समझ नहीं आता था कितनी रेड लाइट के बाद वो तीसरी रेड लाइट आएगी जिससे तीसरा लेफ्ट कट लेना है| अब हाल ये है कि न रास्ता पूछने की जरूरत, न याद रखने की| आपको हर कदम पर रास्ता बताने वाला मौजूद है| अनजान शहरों में भी आप सिर्फ एक ऐनक के सहारे अपने रस्ते चले जाते हैं| यह रास्ते शायद ही गलत होते हैं| कोई गलती हो तो आप उसे सुधारने में मदद कर सकते हैं|

चतुर रोशनियाँ (smart lights)

अब तो हाल यह की घर के बाहर तो क्या घर में भी तकनीक आपको राह दिखाती है| आपका ख्याल रखती है| अब आपकी जरूरत के हिसाब से घर अपने आप की ढाल लेता है| रंग, रोशनियाँ, गीत, संगीत, फिल्म सब आपके मूड के हिसाब से बदल जाते है| जब आप यह महसूस करते हैं कि आपके मन के हिसाब से आपका घर अपने को ढाल लेता है तो अधिक सकारात्मक महसूस करते हैं| आप के घर में आज टेलिविज़न ही नहीं, और भी उपकरण चतुर  होते जा रहे हैं| इस सब से दैनान्दिक जीवन पहले की अपेक्षा और अधिक सरल होता जा रहा है| यह अलग बात है कि यह तकनीक आज भी बहुत से लोगों की पहुँच से बाहर है|

आपको अपने कैमरे को बार बार निर्देश नहीं देने पड़ते, आपके घरेलू उपकरण अपने काम पहले की अपेक्षा अधिक सरलता से और स्वयं ही कर लेते हैं|

तकनीक से शिकायतें भी हैं| बचपन की बहुत सी शरारतें अब मुश्किल हो गई हैं| आजकल के बच्चों को तो वो मजे भी नहीं कि दोपहर में किसी का दरवाज़ा खटखटा कर छुप जाए और पकड़े न जाएँ| अब तो दरवाजे दरवाजे कैमरा लगा है| अब बच्चे और चोर दोनों ही किसी बुजुर्ग को परेशान नहीं कर सकते|

बातों के साथ आपका मूड बदल जाता है और एक बार फिर आप कमरे की रौशनी का रंग और चमक बदल देते हैं| नाचने का मन भी होना ही चाहिए| आपके दुनिया भर के गानों का संग्रह है| आप अपने पालतू जिन्न को हुक्म देते हैं, पुराने गाने और हल्का पंखा चलाने के लिए| तकनीक की अदृश्य शक्ति आपके हुक्म की तामीर करने के लिए मौजूद है|

आप आज दुनिया के किसी भी कौने से अपने माता पिता के संपर्क में रह सकते हैं| उनकी यादों को अपने पास संजो सकते हैं| बूढ़े माँ-बाप को बार बार न रौशनी जलाने के लिए उठना, न दरवाजा खोलने के लिए| इस तरह की बहुत सी सुविधाएँ हैं| बस इतना है कि वो थोड़ा बहुत हाथ पैर चलाते रहे, आरामतलबी में बिस्तर न पकड़ लें| तो इस सब के लिए भी उनके पास नया कड़ा है तो कलाई में पड़ा पड़ा उनको चेताता रहता है|

आज सबसे जरूरी है किसान का चतुर होना| किसान को कब कहाँ क्या बोना है, कब कितना बोना है. अन्य किसानों की बीज बुआई के हिसाब से दाम की संभावित घट बढ़ का कुछ अंदाजा रहे, कब कहाँ भण्डारण करना है, कब उसे बेचने का फायदा है, क्या लागत क्या दाम, यह सब बताने के लिए चतुर  उपकरण हों| ट्रेक्टर या अन्य उपकरण खेत में स्वचालित तरीके से काम कर पायें| न अधिक खाद पानी लग जाये न अधिक जहर की खेत में फ़ैल पाए, इसका इंतजाम होना चाहिए| चतुर घर से ज्यादा जरूरी है चतुर खेत| खेतों को चतुर बनाने के काम में कोई चालाकी नहीं होनी चाहिए| भोजन ऐसी जरूरत है, जिसका विकप्ल हाल फ़िलहाल नहीं है, इसका ख्याल किया जाना चाहिए|

यह नई तकनीक आराम भी है तो संभावित आलस्य भी| इस बीच चाय आ गई| बात लम्बी चलती रही| और तभी ख़त्म हुई जब टेलिविज़न ने आपका पसंदीदा सॉप ओपेरा चला दिया| टीवी पर जब भी #GetFitWithFlipkart अथवा #SmartHomeRevolution का विज्ञापन आता है आप प्रसन्नता से मुस्करा उठते हैं|

हिंदी भाषी मजदूर: विकास और वापसी

विकास किसे पसंद नहीं? विकास हिंदी क्षेत्र का सबसे लोकप्रिय नारा है – बिहार और उत्तर प्रदेश में तो विकास के नारे और विकास की सरकार को पहला स्थान मिला हुआ है| देश का समग्र विकास हिंदी क्षेत्र का सबसे बड़ा सपना है| पान से लेकर चाय की दुकान तक पर हमारे क्षेत्र में विकास वार्ता होती रहती है|

कठिनाई है विकास करने की| ऐसा नहीं कि बिहार को विकास पसंद नहीं| जहाँ विकास की झलक भी दिखाई दे, हम पहुँच जाते हैं| देश का कोई नगर, कोई उद्योग, कोई सड़क, कोई भी विकास मंदिर ऐसा नहीं जहाँ हमारा श्रम न लगा हो|

हमारा विकास प्रेम भी ऐसा है कि जहाँ विकास की सम्भावना भी हो, वहाँ पहुँच जाते हैं| देश का विकास अगर हुआ है तो शायद हमारे मजदूरों के बाजुओं के बल पर ही हुआ है| मुंबई हो या चेन्नई उनकी सड़कों पर श्रम करता श्रमिक बिहार का नहीं तो हिंदी क्षेत्र का तो अवश्य ही है|

देश भर में हम हर स्थान पर हैं| विकास में हिंदी क्षेत्र के आप्रवासियों का योगदान मानने की जगह स्थानीय लोगों को लगता है कि हम उनके रोजगार छीनते हैं| अक्सर हम हम पर अपराध और गंदगी से हमें जोड़कर देखा जाने लगा है| किसी भी प्रदेश में स्थानीय अप्रशिक्षित मजदूरों की बेरोजगारी का कारण भी हमें ही माना जाने लगा है| पहले मुंबई और अब मध्यप्रदेश में हमारे विरुद्ध बातें उठने लगीं हैं| आज अनामंत्रित अतिथि का व्यवहार झेलना हमारी विडंवना है|

क्या हम जबरन वापसी के लिए विवश होंगे? क्या हमें उन गाँवों और शहरों में लौटना होगा जहाँ हम केवल यादें छोड़ आये हैं?

मगर ऐसा क्यों?

पहला यह कि अनामंत्रित अतिथि किसी को कोई पसंद नहीं करता| हम पहले पहुँचते हैं और फिर नौकरी ढूंढते हैं| अक्सर उन लोगों को टेड़ी निगाह से नहीं देखा जाता जिन्हें नौकरियाँ देकर आमंत्रित किया गया हो जैसे इंजिनियर या डॉक्टर|

दूसरा अप्रशिक्षित मजदूर आसानी से दिखाई दे जाने वाला समुदाय है| यह दिन भर सड़क या सार्वजानिक स्थानों पर दिखाई देने के कारण निगाह में जल्दी आता है| जब स्थानीय लोगों के मुकाबले आप्रवासी मजदूर अधिक दिखाई दें तो लोग सरलता से संज्ञान लेते हैं| हिंदी क्षेत्र में जनता और सरकारों के पास धन की कमी भी एक बड़ा कारण है| जब तक समृधि नहीं होती, लोग आदर नहीं करते| पंजाबी शरणार्थी हो या तिब्बती, सभी अपने साठ सत्तर के दशक की ऐसी कहानियां रखते हैं जब स्थानीय लोग हेयता का भाव रखने लगे थे| बाद में समृधि आने और हिंदी सिनेमा में पंजाबी दबदबे के चलते पंजाबी आज देश का प्रभावशाली सांस्कृतिक समुदाय है| इसी प्रकार, समृद्धि के साथ गुजरात का डांडिया और बिहार का छट भी प्रसिद्ध होने लगा है|

तीसरी और इन सब से बड़ी बात हैं – मतदाता के रूप में इस वर्ग की उदासी| यह तबका अपने स्थानीय चुनावों में ऐसा नेतृत्त्व नहीं चुन सका जो हिंदी प्रदेश विकास के सतत पथ पर ले जा सके| स्थानीय रोगजार, उद्योग और व्यवसाय नष्ट होते रहे| पलायन शुरू हो गया| हिंदी क्षेत्र सबसे बड़ा मानव संसाधन में सर्वाधिक धनी होने का कोई लाभ नहीं ले सका| दुर्भाग्य से देश की सरकारों का भी विकास सम्बन्धी नीति निर्माण गाँवों और छोटे कस्बे शहरों के हित में नहीं रहा| आज स्थानीय रोजगार की कमी के कारण हमें पलायन करना पड़ता है|

मुझे लगता है कि यह उचित है कि महाराष्ट्र, गुजरात और मध्यप्रदेश ही नहीं, देश के सभी राज्यों की सरकारें और कंपनियाँ स्थानीय लोगों को रोजगार में प्राथिमिकता दें| पलायन को सस्ते मजदूर के लालच में बढ़ावा न दिया जाये| हिंदी प्रदेशों में विकास पर स्थानीय राज्य सरकारें समुचित ध्यान दें|