राष्ट्रवाद बनाम मानवता

किसी देश का नागरिक होना मानव होने के बड़ा है, तो मानव जीवन पर धिक्कार है| दुनिया भर में तमाम कीट-पतंगे है तो अपने जन्म-स्थान के हाथ दो हाथ की दूरी अपने जीवन भर में यह नहीं करते, तमाम जानवर है जाने अनजाने अपने आपको निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में बांधे रहते हैं| मगर उन्हें खुद अपनी नस्ल और किसी दूसरी नस्ल की कोई परवाह नहीं होती| अगर आप मानव हैं तो आप अपनी, अपनी नस्ल की और तमाम प्रकृति की परवाह कर सकते हैं| मगर आप मानव हैं तो आपके पास वो सारे दुर्गुण भी हैं जो किसी और नस्ल के पास नहीं हैं| मानव झूठ, लालच फ़रेब और कमीनेपन की तमाम हरकतें कर सकता है| मानव जीवन के सबसे बड़े फरेबों में से धर्म और राष्ट्र हैं|

रहती दुनिया में अनेकों देश और धर्म बने, बनेगें, बिगड़ेंगे और दुनिया चलती रहगी| दुनिया का प्रकृति प्रदत्त नक्शा और मानव का प्रकृति प्रदत्त स्वभाव नहीं बदल सकता| मानव होना मानव की पहचान है|

राष्ट्र एक समूह के रूप में अपने हित रखता है| मगर राष्ट्रवाद हास्यास्पद परिकल्पना है| दुनिया के किसी भी राष्ट्र के नक्शे को आप एक हजार साल भी बिना बदले हुए नहीं देख सकते| आज भारत में राष्ट्रवाद का उबाल है| हर बात में राष्ट्रवाद को खड़ा किया जा रहा है| मगर हकीकत है की एक राष्ट्र के रूप में हमारे पास आज भी एक पक्का नक्शा नहीं है| भारत, पाकिस्तान और चीन जैसे बड़े बड़े देशों के अपनी सीमा को लेकर दावे और हकीकत में बहुत फर्क है| यहाँ तक की हमारी सेनाओं में राष्ट्रीय शुध्दता नहीं है| अगर राष्ट्र ही सब कुछ है तो भारतीय सेना में नेपाल की राष्ट्रीयता रखने वाले लोग कैसे हैं, कैसे अपने ओहदे से जुड़ी तमाम जिम्मेदारी वो लोग पूरी तरह निभा लेते हैं? कभी सोचा है?

राष्ट्रवाद किसी भी सत्ता के द्वारा फैलाये जाने वाला फ़रेब है, जो सत्ता की तमाम असफलताओं पर पर्दा डालने के लिए जनता में पैदा किया जाता रहा है| आजकल बड़े व्यापारी अपना माल बेचने और अपने ऊपर लगे आरोपों को नकारने के लिए भी राष्ट्रवाद का प्रयोग करते हैं| जो लोग थोड़ा टैक्स बचाने के लिए भारत की नागरिकता छोड़ देते हैं वो भी आम भारतियों के लिए राष्ट्रीयता के गाने गाते हैं| देश के तमाम बड़े व्यापारी, अभिनेता और करदाता भारत के नागरिक नहीं हैं| कर बचाने के लिए तमाम बड़े भारतीय लोग साल में छः महीने अलग अलग देशों में रहते हैं कि उन्हें आयकर विभाग भारत का आम निवासी न मान ले| भारत के पास बर्फीले पहाड़ों से लेकर गहरे समंदर तक तमाम नियामतें प्रकृति ने दी हैं, मगर भारत का राष्ट्रवादी समुदाय अक्सर छुट्टियों में देश से बाहर जाने के सपने देखता है| मुझे किसी से आपत्ति नहीं है| मगर जरूरत है, करनी में राष्ट्र का ध्यान रखने की| अगर आप अच्छे इंसान हैं तो धर्म और राष्ट्र मानव निर्मित हास्य हैं, उनपर विचार करने की आपको कोई जरूरत नहीं|

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शाहजी पकौड़े वाले

कल बहुत दिनों बाद, फिर वो पकौड़ेवाला दिखाई दिया| मैंने उसे काफी इज्ज़त से अपने पास बुलाकर हालचाल पूछा और हालत – ए – हाजिरा पर उसका ख्याल जानना चाहा| कहने लगा, धंधे में पैसा तो कभी भी ज्यादा न था, रुपया कभी इस धंधे में देखा नहीं; मगर कुछ दिन से धंधे में इज्ज़त आ गई है| मैंने कहा, क्या पहले इज्ज़त नहीं थी| बोला, पहले केवल इज्जतदार लोग ही इज्ज़त दिया करते थे या फिर छोटे छोटे बच्चे| आजकल तो गली-कूचे में घूमते आवारा गुंडे मावली भी इज्ज़त देने लगे हैं| कहने लगा कि छठी गली का छुट्टा सांड बजरंगी भैया तो कभी कभी प्यार से बात करते करते पकौड़े बनाने के गुर सीखने लगा है| ख़ुशी से चहककर बोला भैया इस बार स्वतंत्र दिवस पर हम आपको गरम गरम जलेबी खिलाएंगे| मैंने पुछा, क्यों भाई? क्या अगस्त में बिटिया की शादी कर रहे हो| बोला नहीं भैया जी, सुना हैं मोदी सरकार उस दिन पकौड़े बेचने को भारत का राष्ट्रीय रोजगार घोषित कर देंगे| उस दिन से सब डाक्टर इंजीनियर डॉक्टर साइंटिस्ट सब लोग अपनी बेरोजगारी के दिनों में पकौड़े बेचा करेंगे| आप तो भैया, दिल्ली है कोर्ट के बाहर ही पकौड़े बेचना – वकील साहब पकौड़े वाले| और चिंता न करना, आपको गर्म गर्म पकौड़े हम बनवा कर भिजबा देंगे| आखिर इसने सारे लोग जब पकौड़े बेचेंगे तो कोई तो उन्हें पकौड़े बना बना कर सप्लाई करेगा|

अचानक, पुराने दिन याद करने लगा| बोला, जब अपने शहर के सरस्वती शिशु मंदिर में जब पढ़ते थे तो वहां के गुरूजी जलेबी बंटवाते थे गणतंत्र दिवस पर| इसबार गणतंत्र दिवस पर अपने शहर में था तो गुरूजी ढूंढते हुए आ पहुंचे| कहने लगे शाह जी, चलो.. बच्चों के लिए बीस किलो पकौड़े बना दो और पच्चीस किलो का बिल दे दो| मैंने कहा, गुरूजी पकौड़े चाहे पचास किलो बनवा लो मगर बिल की न कहो, एक तो हमको सात साल शिशु मंदिर रहकर नाम लिखना न आया तो बिल बनाने में तो ससुर हमको हाथरस जाकर ग्रेजुएशन करना पड़ेगा| गुरूजी बड़े प्यार से बोले, नालायक कितना कहा कि बात समझा करो| ये लो, बिल तो हम कम्पूटर से बना कर लाये हैं तुम इसपर अपनी चिड़िया मारो|

मैंने कहा, कि इस किस्से से एक फायदा हुआ कि तुम्हारा नाम हमें पता चल गया – शाह जी| कहने लगा… नाम तो अपना घासीलाल फौलादी है सरकार| वो तो आजकल हम सबको कहने लगे हैं कि जब मोदी जी अपने पापा की बनाई चाय लेकर स्टेशन पर चाय गरम चाय गरम चिल्लाते थे तो उनके पीछे पीछे हमारे बड़े भाई ताजा गरम पकौड़े का जोर लगाते घुमा करते थे| इसलिए आजलक लोग हमें अध्यक्ष जी का छोटा भाई समझने लगे हैं|

अर्ध-रोजगार की चिंताएं

प्रधानमंत्री के पकौड़े वाला सम्बंधित बयान के साथ राजनीतिक और चापलूसिक बयानबाजी जारी है|
किसी की पकौड़े वाला अचानक सम्मानित रोजगार नजर आने लगा है तो किसी को बेरोजगार| पता नहीं मोचियों और रिक्शेवाले को कभी सम्मान न देने वाले लोग कब समझेंगे कि वह भी एक रोजगार है जिसे जाति और आर्थिक पिछड़ेपन से ऊपर उठकर रोजगार की तरह देखने  की जरूरत है|

इस सारी बहस का मूल मुद्दा है कि रोजगार क्या है?

सामान्य भाषा में सामान्यजन की समझ के अनुसार “किसी दुसरे व्यक्ति द्वारा किया जा रहा कोई भी काम जिससे वेतन या लाभ का एक तिनका भी उसके घर जा रहा है, रोजगार है|”

जब यह बात अपने पर आती है तो बात बदल जाती है, “ऐसा कोई कार्य या व्यवसाय, जिससे सामाजिक सम्मान के साथ समुचित जीवन यापन करने के लिए वेतन या लाभ कमाया जा सके, रोजगार है|”

अर्थशास्त्रियों और समाज विज्ञानियों की निगाह में “अपनी योग्यता के इच्छा अनुकूल समुचित उपयोग से किया जा रहा कोई कार्य जिससे सामाजिक सम्मान के साथ समुचित जीवन यापन करने के लिए वेतन या लाभ कमाया जा सके, रोजगार है|”

सारी बहस में दिक्कत यह है कि अपने निजी दृष्टिकोण बहस में शामिल है| अचानक इस बात पर जोर दिया जाने लगा है कि पकौड़े का खोखा लगाना रोजगार है या नहीं है| इसका उत्तर कभी भी हाँ या न में नहीं हो सकता| अगर एक आंठवी कक्षा उत्तीर्ण व्यक्ति पकौड़े बेचता है तो यह सम्मानित रोजगार हो सकता हैं, मगर किसी चार्टर्ड अकाउंटेंट द्वारा पकौड़े बेचना रोजगार नहीं हो सकता|मामला यहीं ख़त्म नहीं होता| अगर पकौड़े का खोखा न होकर भीखाजी कामा प्लेस पर पकौड़े की बड़ी दूकान हो तो किसी स्नातक के लिए यह न सिर्फ रोजगार हो सकता हैं वरन वह चार और लोगों को रोजगार दे सकता है|

इस सारी बहस में हस्यास्पद स्तिथि बड़ी बड़ी कंपनियों में रोज बारह घंटे काम करने वाले सफ़ेदपोश कर्मियों की है| यह जमात अपने को रोजगार में लगा हुआ अक्लमंद समझती है| मगर उचित रोगजार की परिभाषा में यह लोग नहीं आते| उचित रोजगार वह है जिसमें आप कार्य और निजी जीवन में संतुलन बना पायें| जब आप बारह घंटे काम करते हैं तो किसी दुसरे की रोजगार सम्भावना नष्ट कर देते हैं| आप अपने पक्ष में जो तर्क देते हैं वो जंगल के तर्क हैं – “अगर मैं नहीं करूंगा तो दूसरा करेगा”| प्रकृति इस सब मूर्खता का जबाब आपके मालिक को नहीं आपको देगी आपके बुढ़ापे में|आपका शरीर थक चूका होगा और बच्चे आपको ठीक पहचानेंगे नहीं|उचित रोजगार वह है जिसमें आप रोजगार को आठ, अपने को चार और परिवार को चार घंटे दे सकें|अब यह न कहें कि हम अपनी बारह घंटे की कार्यालय अवधि में चार घंटे की चोरी करते हैं अपने लिए|

 

आतंकित सरकारें

किसी भी देश में आतंकवाद को बढ़ावा तभी मिल सकता है जब उस देश की सरकारें और उन सरकारों को चुनने वाली जनता डरपोक हो| जब भी हम किसी व्यक्ति या संगठन को आतंकवादी कहते हैं वो उसका सीधा अर्थ है कि हम डरे हुए हैं|

डरना उस कायरता का परिचायक है| कोई भी बहादुर देश किसी व्यक्ति या संगठन को अपराधी या अपराधिक संगठन कहे, तो समझ आता हैं| नियम क़ानून तोड़ने वाला व्यक्ति अपराधी है|कोई भी व्यक्ति एक देश काल में अपराध हो सकता है किसी अन्य देश काल में नहीं| उदाहरण के लिए मानहानि पहले बहुत से देशों में अपराध माना जाता था, परन्तु अब अधिकांश देश इस अपराध नहीं मानते|

जब हम किसी व्यक्ति या संगठन के उचित या अनुचित किसी भी कार्य से डरते हैं और उस डर को स्वीकार करते हैं तो उसे आतंकवादी कहते हैं|हम आतंकवाद का अपनी आतंरिक शक्ति में सामना नहीं कर पाते| यही कारण हैं कि सुदूर यूरोप में हुए बम धमाके हमारे “बहादुर” भारतियों को सोशल मीडिया में सक्रिय कर देते हैं| दूसरी ओर हम अपने देश में होने वाले बलात्कार, हत्याओं, रोज रोज की सड़क दुर्घटनाओं और चिकित्सीय लापरवाही से नहीं डरते| हम किसी सड़क दुर्घटना या दंगों में मारे गए 10 लोग नहीं डराते वरन हम सुदूर देश में किसी बम धमाके से डर जाते हैं|हमें गुजरात, राजस्थान या मुंबई में पत्थर फैंकते और बस जलाते उपद्रवी लड़के आतंकवादी नहीं लगते बल्कि कश्मीर में बम फैंकते लड़के हमारी नींद उड़ा देते हैं|हमारा अपना चुना हुआ डर ही हमें अधिक डराता है|

आतंकवाद दरअसल आतंकवादियों से अधिक उन लोगों का हथियार है जो इससे पैदा होने वाले डर से लाभान्वित होते हैं या डरने में जिन्हें प्रसन्नता मिलती हैं| दुनिया के दर्जन भर देश तबाह करने के बाद भी अमेरिका दुनिया का सबसे आतंकित मुल्क हैं – उसकी डरी हुई बहादुरी आतंकवाद के मुकाबले कहीं इंसानों की हर साल जान ले लेती है| कश्मीर में जितने लोग हर साल कुल मिला कर अपराधी और आतंकवादी घटनाओं में मारे जाते हैं कम से कम उतने लोग राजधानी दिल्ली या मुंबई में अपराधी घटनाओं में मारे जाते हैं| मगर हम नहीं डरते|अपराध और अपराधी हमें नहीं डराते| अपराधों से लड़ने वाले पुलिसवालों को उतना बड़ा मैडल नहीं मिलता जितना किसी कथित आतंकवादी से लड़ने वाले पुलिसवाले को मिलता है|

आतंकवाद की एक खास बात है, दुनिया की कोई भी सरकार आतंकवाद के आगे घुटने नहीं टेकती| आतंकवाद से लड़ने की कसमें खाना दुनिया भर की राजनीति में रोजमर्रा का शगल है| मगर छोटे छोटे अपराधियों और गुंडों के समूह के आगे सरकारें जब तब घुटने टेकती रहती हैं| भारत देश में पिछले सौ सालों में बहुत सी किताबें, नाटक और फ़िल्में सिर्फ इसलिए प्रतिबंधित हो गई कि सरकारों को कानून व्यवस्था के लिए ख़तरा लगा| हम सब जानते हैं यह ख़तरा उन किताबों, नाटकों और फिल्मों से नहीं बल्कि उनका कथित तौर पर विरोध करने वालों से था| सरकारें उनसे लड़ने में असमर्थ थीं और इतनी डरी हुयीं थी कि उन्हें आतंकवादी या अपराधी कहने का भी साहस न जुटा सकीं| उनसे लड़ने की बात तो दूर की बात है, पिछले सौ सालों में बहुत से हलफनामे सरकारों ने अदालत में दिए हैं कि किताबें, नाटक या फ़िल्में क़ानून व्यवस्था बिगाड़ देंगी – मतलब इतना बिगाड़ देंगी कि सरकार संभाल न पायेगी|

उफ़!! पिछले सौ साल में कोई सरकार हलफनामों में यह न कहने की हिम्मत भी न जुटा सकी कि वो जिनसे डरी हुई है वो किताब, नाटक या फिल्म नहीं गुण्डा तत्व हैं|

 

 

 

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इसकी हिंदी क्या है?

समाचार के अनुसार, एक व्यक्ति ने वित्तमंत्री अरुण जेटली से “बुलेट ट्रेन” की हिंदी पूछ ली| हिंदी वालों में हिंदी पूछ लेना उनता ही सामान्य हो चला है, जितना अंग्रेजी वालों का हर भाषा के शब्द उठाकर अंगीकार और आत्मसात कर लेना| हर बात की हिंदी करवाना गुलाम मानसिकता की पराकाष्ठा का प्रतीक है| हिंदीवादी लोग भाषा के स्वतंत्र व्यकित्त्व की चाह में हिंदी को मात्र संस्कृतनिष्ठ शब्दों समेट देना चाहते हैं| इस प्रकार हिंदी को संस्कृत की उपभाषा बन जाने का ख़तरा बढ़ रहा है| संस्कृत निष्ठता के पीछे फ़ारसी शब्दों को नकारने की भावना से प्रारंभ होकर अब अंग्रेजी शब्दों को नकारने तक जा पहुंची गई है| विरोध की यह भावना इस तथ्य को भी नकारती है कि फारसी और संस्कृत एक ही स्रोत को भाषाएँ हैं|

अंग्रेजी से पहले फ़ारसी विश्वभाषा के दर्जा रख चुकी है| फ़ारसी के प्रसार में उन पारसियों और ईरानियों  का हाथ कम रहा, जिनकी मूल रूप से यह भाषा है| भारत में आये अरब, तुर्क, अफगान, मंगोल, मुग़ल आदि सबने फ़ारसी को सामान्य और राजनितिक जीवन में अधिक महत्व दिया| कारण शायद यही है कि फ़ारसी में अंगीकार, आत्मसात और समाहित करने की भावना और क्षमता अधिक रही| यही स्वीकार वृत्ति एक समय में छोटे से समूह की भाषा मानी जाने वाली अंग्रेजी को विश्वभाषा बनाने में सफल रही| आज अंग्रेजी उन देशों में भी स्वीकार है जहाँ उनके लोगों का राज नहीं रहा था|

आज भारतीय समाज इस बात की चर्चा करता है कि अंग्रेजी में कितने भारतीय मूल के शब्द हैं| क्या अंग्रेजी उन भारतीय शब्दों को अपना पाती, अगर वह अपने रोमन या ग्रीक मूलों से अपने लिए शब्द गढ़ने में समय नष्ट करती| अपने भाषा मूलों से शब्द गढ़ना गलत नहीं है| परन्तु इसे हास्यास्पद नहीं हो जाना चाहिए| शब्द सरल और सर्वस्वीकार होने चाहिए| लोहपथगामिनी जैसे शब्द स्वीकार नहीं हो पाए| परन्तु इस प्रकार के शब्दों के कारण सरकारी हिंदी और साहित्यिक विश्व की सबसे दुरूह भाषाओँ में से एक बन चुकी हैं|

अगली बार अगर आपको किसी शब्द की हिंदी न आये तो शेम्पू के स्थान पर मूल भारतीय चम्पू का प्रयोग करने का प्रयास करें| बुलेट ट्रेन की हिंदी उसके बाद ढूंढेंगे| जैसा जेटली बुलेट ट्रेन की हिंदी पूछे जाने पर कहते हैं, “थोड़ा गंभीर होने का भी प्रयास कीजिये”|

 

शरणार्थी और भारत

भारत को बहु-सांस्कृतिक सभ्यता बनाने में अलग अलग समुदायों का योगदान निर्विवादित है| हमारी अतिउप-संस्कृतियाँ महीन ताने-बानों से बनीं हैं| भारतीय सजातीय विवाहों में भी आधा समय इस बात में हंसी-ख़ुशी नष्ट हो जाता है कि वर-वधु पक्ष के रीति-रिवाज़ों में साम्य किस प्रकार बैठाया जाए| उप-संस्कृतियों के विकासक्रम में बहुत से तत्व रहे हैं, जिन्हें ठीक से न समझने वाला व्यक्ति विदेशी आक्रमणों से जोड़ कर शीघ्र निष्कर्ष पर पहुँच सकता है| परन्तु निर्विवाद रूप से हमारे उन-सांस्कृतिक विकास में अन्तराष्ट्रीय व्यापार और शरणार्थियों के योगदान को नकारा नहीं जा सकता|

अन्तराष्ट्रीय व्यापार के प्रमाण सिन्धु घाटी सभ्यता के समय से मिलने प्रारंभ हो जाते हैं| आक्रमण वाले सिद्धांत के विपरीत अन्तराष्ट्रीय व्यापार ने इस्लाम को अरब आक्रमणों से काफी पहले भारत पहुंचा दिया था|

भारत के सर्वांगीण विकास में शरणार्थियों का योगदान इनता मुखर और सामान्य स्वीकृत है कि हम उसपर विवेचना की ज़हमत नहीं उठाते| जिन शरणार्थियों को “खीर के एक कटोरे” से वचन में बाँट दिया गया था, उनका बेचा नमक आज सारा भारत खाता है| ग़दर के बाद भारत में आजादी की नियोजित लड़ाई का प्रारंभ करने वाली इंडियन नेशनल एसोसिएशन और उसके बाद इन्डियन नेशनल कांग्रेस के एक सह-संस्थापक दादा भाई नौरोजी उन्हीं पारसी शरणार्थियों के वंशज थे| आज जिन प्राचीन ईरानी कथा कहानियों को हम फारस और मुस्लिमों से जोड़ते हैं वो कदाचित पारसियों के साथ भारत चुकीं थीं|

भारत में पारसी अकेला समुदाय नहीं है जो शरणार्थी बनकर भारत आया| आजादी के बाद आये शरणार्थी तिब्बती समुदाय के साथ भी स्थानीय समाज के सामान्य रिश्ते हैं| बंटवारे के समय पाकिस्तान से आने वाले लोग भी वास्तव में शरणार्थी ही हैं| अफगान संकट के समय आने वाले अफगानों का भी भारत में शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व है|

पिछले कुछ दशकों में अक्सर बाहर से आने वाले शरणार्थियों को उपद्रव का कारण माना जा रहा है| यह उत्तरपूर्व में होने वाले त्रिकोणीय सामुदायिक संघर्ष के कारण है| देश के किसी क्षेत्र में शरणार्थियों का कैसा स्वागत होगा, इसमें क्षेत्रीय विकास महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है| आप उत्तरपूर्व भारत में अवैध बंगलादेशी आप्रवासियों का मुद्दा रोज सर उठाते देखेंगे| जबकि दिल्ली मुंबई के चुनावों में यह मुद्दा हाशिये से आगे नहीं बढ़ पाता| जब शरणार्थी (और रोजगार की तलाश में आने वाले लोग) देश के कम विकसित क्षेत्र में आकर रहते है, तब इस प्रकार के संघर्ष स्वाभाविक हैं| जहाँ संसाधनों सभी के लिए पूरे नहीं पड़ते| दलगत राजनीति इन संघर्षों की आड़ में अपनी नीतिगत खामियां छिपाने और वोट की फ़सल काटने का काम करती है|

रोहिंग्या शरणार्थियों को अवैध बताकर वापिस भेजा जा रहा है| अपनी मर्जी से तो लोग रोजगार के लिए भी अपनी जन्मभूमि नहीं छोड़ते| मुझे नहीं पता कि वैध शरणार्थी कैसे होते हैं? क्या उन्हें देश से भागने वाली सरकारें वीज़ा पासपोर्ट बनाकर भेजतीं हैं? क्या अपने देश से जान बचाकर भागता भूखा नंगा आदमी आपको डरा देता है? क्या इस बात के प्रबंध नहीं हो सकते कि उनपर दया और निगाह एक साथ रखी जा सके|

 

पुनश्च – शरणार्थियों के अपने राजनीतक महत्व भी हैं, अगर पाकिस्तान के शरणार्थी भारत न आने दिए गए तो शायद दक्षिण भारत का इतिहास अलग होता| इस पर हो सका तो फिर कभी|

हिंदी में विनम्रता

Please, remove your shoes outside.

इस अंग्रेजी वाक्य का सही हिंदी अनुवाद क्या है?

  1. कृपया, अपने जूते बाहर उतार|
  2. अपने जूते बाहर उतारें|
  3. अपने जूते बाहर उतारिये|
  4. अपने जूते बाहर उतारियेगा|
  5. अपने जूते बाहर उतारने की कृपा करें|
  6. भगवान् के लिए अपने जूते बाहर उतार लीजिये|
  7. जूते बाहर उतार ले|
  8. जूते बाहर उतार ले, प्लीज|

हम हिन्दुस्तानियों पर अक्सर रूखा होने का इल्जाम लगता है| कहते हैं, हमारे यहाँ Please या Sorry जैसे निहायत ही जरूरी शब्द नहीं होते|

अक्सर हम तमाम बातों की तरह बिना सोचे मान भी लेते हैं| अब ऊपर लिखे वाक्यों को देखें|

हमारे क्रिया शब्दों में सभ्यता और विनम्रता का समावेश आसानी से हो जाता है तो रूखेपन का भी| हम प्लीज जैसे शब्दों के साथ भी रूखे हो सकते हैं और बिना प्लीज के भी विनम्र| आइये ऊपर दिए अनुवादों को दोबारा देखें|

  1. कृपया, अपने जूते बाहर उतार| यह एक शाब्दिक अनुवाद है और किसी भी लहजे से गलत नहीं हैं| मगर हिन्दुस्तानी सभ्यता के दायरे में यह गलत हैं क्योकि “उतार” में अपना रूखापन है जो प्लीज क्या प्लीज के चाचा भी दूर नहीं कर सकते|
  2. अपने जूते बाहर उतारें| यहाँ प्लीज के बगैर ही आदर हैं, विनम्रता है| क्या यहाँ प्लीज के छोंके के जरूरत है? इसके अंग्रेजी अनुवाद में आपको प्लीज लगाना पड़ेगा|
  3. अपने जूते बाहर उतारिये| क्या कहिये? ये तो आप जानते हैं कि इसमें पहले वाले विकल्प से अधिक विनम्रता है| अब इनती विनम्रता का अंगेजी में अनुवाद तो करें| आपको शारीरिक भाषा (gesture) का सहारा लेना पड़ेगा, शब्द शायद न मिलें|
  4. अपने जूते बाहर उतारियेगा| हम तो लखनऊ का मजाक उड़ाते रहेंगे| यहाँ आपको अंग्रेजी और शारीरिक भाषा कम पड़ जायेंगे| उचित अनुवाद करते समय कमरदर्द का ध्यान रखियेगा|
  5. अपने जूते बाहर उतारने की कृपा करें| क्या लगता है यह उचित वाक्य है| इसमें अपना हल्का रूखापन है| आपका संबोधित व्यक्ति को अभिमानग्रस्त या उचित ध्यान न देने वाला समझ रहे हैं और कृपा का आग्रह कर रहे हैं| यदि यह व्यक्ति आपके दर्जे से काफी बड़ा नहीं है तो यह वाक्य अनुचित होगा|
  6. कृपया, अपने जूते बाहर उतार लीजिये| लगता है न, कोई पत्नी अपने पति के हल्का डांट रही है|
  7. जूते बाहर उतार ले| यह तो आप अक्सर अपने बच्चों, छोटों और मित्रों को बोलते ही है| सामान तो है ही नहीं|
  8. जूते बाहर उतार ले/लें, प्लीज| यह विनम्रता है या खिसियानी प्रार्थना| हिंदी लहजे के हिसाब से तो खीज ही है|

वैसे आप कितनी बार विकल्प दो तीन और चार में कृपया का तड़का लगाते हैं?