लोरियां

बचपन में हम सबने सुनीं हैं लोरियां| माएं, दादियाँ, नानियाँ सुनातीं थी लोरियां| जब पिता के मन में ममता जागती है, तब भी लोरी सुनाई देती है|

लोरियां माँ के दूध के बाद ममता का सबसे मीठा भाव है| संगीत और शब्द का नैसर्गिक सरल और सुलझा हुआ रूप लोरियां| अधिकतर लोरियां स्वतःस्फूर्त होतीं है| शांत रात्रि में जब बच्चा गोद में आता है तब हृदय में पैदा होने वाले स्पंदन से निकलती हैं लोरियां| कभी धुन नहीं होती तो कभी शब्द नहीं होते… ध्वनि होती है, भावनाएं होती हैं| लोरियां बनती बिगड़ती रहती हैं| अक्सर याद नहीं रहती, याद नहीं रखीं जातीं|

फिर भी कई बार होता है, लोरियां कवि और गीतकार गाते हैं, शब्दों और धुनों में पिरोते हैं| कभी कभी माओं का हृदय शब्दों को यादगार लोरियों में बदल देता है| ऐसी लोरियां लोकगीत की तरह समाज में विचरतीं है, फिल्मों में गाई जातीं है| उनके संकलन भी आते हैं|

हाल में मैंने यह पुस्तक खरीदी है – लोरियां| एक छोटी सी बच्ची के पिता को खरीदना भी और क्या चाहिए? इसमें कुछ लोकलोरियां हैं तो महाकवियों की प्रसिद्ध लोरियां भीं हैं| हालाँकि कुछ गीतों को शायद गलती से लोरी कह दिया गया है| जैसे – जसोदा हरि पालने झुलावै|

कवियों और गीतकारों की लिखी लोरियों में ममता का भाव कम रह जाता है, काव्य और गीत का तकनीकी पक्ष मजबूत होने लगता है| इसमें कुछ अच्छे प्रयास भी हुए है| कई बार प्रसिद्ध गीतकार और कवि बेहतर शब्दों के जाल में उलझकर साधारण सी लोरी लिख पाते है| दूसरी ओर एक स्वतःस्फूर्त लोरी लिखे जाने पर उतनी सुन्दर नहीं जान पड़ती जितना वो ममतामयी गले से गाये जागते समय होती है|

आज जब लोरियां गाने का समय टेलीविजन के सामने निकल जाता है| लोरियों का अपना महत्व बरकारार है| यह हमारे शिशुओं का प्राकृतिक अधिकार है कि वो ममतामयी धुनें, शब्द और गीत सुने – लोरियां सुनें| यह पुस्तक इस दिशा में उचित कदम है|

शकुंतला सिरोठिया, कन्हैयालाल मत्त, प्रकाश मनु की लोरियां, लोरियों के नैसर्गिक सौंदर्य के निकट है| अन्य लोरियां गेय कम पठनीय अधिक हैं| कुल मिलकर पचास लोरियों की यह पुस्तक संग्रहणीय है|

 पुस्तक – लोरियां

लेखक – संकलन

प्रकाशक – राष्ट्रिय पुस्तक न्यास

प्रकाशन वर्ष – 2011

विधा – लोरी

इस्ब्न – 9788123761817)

पृष्ठ संख्या – 54

मूल्य –  45 रुपये

नीम का पेड़

नीम का पेड़ पढ़ते हुए आपको हिन्दुस्तान की उस राजनीति दांव –पेंच देखने को मिलते हैं, जो आजादी के बाद पैदा हुई| हमारी हिन्दुस्तानी सियासत कोई शतरंज की बिसात नहीं है कि आप मोहरों की अपनी कोई बंधी बंधी औकात हो| यहाँ तो प्यादे का व़जीर होना लाजमी है| व़जीर की तो कहते हैं औकात ही नहीं होती, केवल कीमत होती है| यूँ नीम का पेड़ सियासत और वजारत की कहानी नहीं होनी चाहिए थी, मगर हिन्दुस्तानी, खासकर गंगा- जमुनी दो-आब के पानी रंग ही कुछ ऐसा है सियासत की तो सुबह लोग दातून करते हैं| ऐसे में नीम के पेड़ की क्या बिसात, ये तो उस लोगों का कसूर है जो आते जाते उसे नीचे बतकही करते रहे होंगे| वर्ना तो जिस आँगन में उसने अपनी तमाम उम्र गुज़ारी वहां गुजरा तो गुजरा कुछ होगा|

नीम का पेड़ इस उपन्यास में शायद अकेला ऐसा शख्स है, जो आज के ज़माने में नहीं पहचाना जा सकता| रही मासूम रज़ा की यहीं मासूमियत रही कि उन्होंने एक पेड़ को सूत्रधार होने का मौका दिया| यहीं काम अगर उस कलई के उस पुराने लोटे बुधई के आंगन में पड़ा रहा करता होगा, तो आप पहचान जाते कि ये कौन है| उस लोटे और उसकी घिसी हुई पैंदी का जिक्र न करकर रज़ा साहब ने इस देश की सियासत के पालतू टट्टुओं के साथ न इंसाफी कर दी है| आदर्शवादी लोगों से अक्सर ऐसी गलतियाँ हो जातीं हैं|

ये कहानी उन दो पुराने रिश्तेदारों की है, जिनको जमींदारी के बैठे ठाले दिनों में सियासत खेलने का चस्का लगा होगा| जमींदारी जाती रही| जमींदारों और नबाबों को लगा कि बदल कर ओहदों का नाम बदलकर विधायकी और सांसदी में तब्दील हो गया है| हुआ दरअसल यूँ उलट कि विधायकी और सांसदी जमींदारी और नबाबी बन गई| बदलते वक़्त के साथ, नए प्यादे आते गए, वजारत बदलती रहीं और व़जीर बिकते रहे|

नीम के पेड़ की कहानी इतनी सरल है कि आप गौर भी नहीं करते कि सियासत में दांव खेल कौन रहा है| कहानी बदलते हिंदुस्तान की जमीन से उठती है| यह कहानी इन वादों का इशारा करती है जिनके बूते वोट खींच लिए जाते है| यह कहानी उस आदर्शवाद जिसके जीतने की हम उम्मीद करते हैं|

पुस्तक – नीम का पेड़

लेखक – राही मासूम रज़ा

प्रकाशक – राजकमल प्रकाशन

प्रकाशन वर्ष – 2003

विधा – उपन्यास

इस्ब्न – 978-81-267-0861-1

पृष्ठ संख्या – 350

मूल्य – 350 रुपये

खौलते हुए बुलबुले

कचनार से कच्चे और कमसिन

नाजुक से कच्चे कोयले की

धीमे धीमे दहकती हुई

भुनी सुर्ख पंच्तात्त्विय अग्नि पर

होलिका सी डरी सहमी सिमटी

सिकुड़ी से बैठी हुई उस शर्मीली

सिल्बर[1] की सुन्दर सुडौल भगौनी

में नरक के कडुए काले कड़ाहों

में तपते हुए बसंत के भरमाये

घमंडी कडुए तेल[2] की मानिंद

खौलते हुए उस शुद्ध पंच्तात्त्विय

उपचारित निर्मल निर्लज्ज जल[3]

में जबरन जबरदस्त उबलते हुए

उस मासूम हल्के मुलायम निमिषवय

वायु के बुलबुले को देखा है कभी|

 

वो उबला हुआ बुलबुला

एक पल में हवा हुआ जाता है

और छोड़ जाता है अपने पीछे

हजारों मासूम कुलबुलाती सी

किल्लेदार ख्वाहिशे के

निमिषवय बुलबुले और

उन निमिषवय बुलबुलों की

हजारो कुबुलाती ख्वाहिशें

उबलते बुलबुलों की मानिंद

जिनमें मैंने डालें हैं रंगत के

दाने आसाम के चायबागानों

चुनवाकर से मंगवाए हुए|

 

मैं उन उबलती हुई हजारों करोड़ों

मासूम कुलबुलाती सी किल्लेदार

ख्वाहिशों का ख़ुदा हूँ खराब जो

इक ख़ूबसूरत रात के बाद की

अलसाई सुरमई सुबह से पहले

ब्रह्ममुहूर्त में खौलते पानी में

उबलते ख्वाहिशमंद बुलबुलों पर

धीर वीर क्षीर समंदर के बनाये

निहायत नमकीन नमक के

सोंधे स्वाद को छिड़कता हूँ|

 

मैं खौलते पानी में उबलते हुए

उन निमिषवय बुलबुलों की

उस तड़पती हुई कराह पर

आह कर उठता हूँ अक्सर

और बुरक देता हूँ चुटकीभर

मीठी शिरीन शक्कर के

घनाकार वजनी दमदार दाने|

 

वो खौलते हुए बुलबुले

हिन्दुस्तान के आमजनता

की मानिंद चुप हो जाते हैं

मीठी शीरीन शक्कर के

धोखे में उन्हें अहसास नहीं होता

वो अब भी खौलते पानी में

गर्मागर्म उबाले जा रहे हैं|

 

और उनके उबलते हुए कंटीले

नाजुक घावों से रिसते हुए दर्द

पर करहाते हुए नीबू के रस की

दो चार अम्लीय बूंदे छोड़ देता हूँ|

 

वो मासूम सावन की बरसात की

हरियल यादों में सहम जाते हैं

वो जानते हैं अब कुछ न होगा

मगर मिनमिनाने लगते हैं

मिन्नतें मजाकिया मजेदार|

 

मैं मजाहिया मुस्कान के साथ

उतार लेता हूँ उस नामुराद

होलिका सी डरी सहमी सिमटी

सिकुड़ी से बैठी हुई उस शर्मीली

सिल्बर की सुन्दर सुडौल भगौनी

जो पलभर में तपती आग में

भुनकर सुरमई हुई जाती है|

 

खुर्जा से खरीद हुई उस

संगमरमरी चीनी मिट्टी के

रंगदार सजावटी सुन्दर शाही

चाय की प्याली में उड़ेली हुई

उस खौलती चाय को सुड़ककर

पीते हुए सोचता हूँ क्यों न

नामुराद भाई ऐश अलीगढ़ी

दिल्ली के पीर ख्वाजा की

दरगाह के बाहर चौराहे पर

नीली छतरी वाले गुम्बद के

छोटे चारबाग़ में बैठकर

मकबरा हुंमायूं को देखते हुए

खुद अपनी मल्लिका मोहब्बत

की उस रोहानी याद में एक

रोमानी सी गजल की जाए|

 

[1] हंडोलियम को देहात सिल्बर कहते हैं इसमें सिल्वर से धोखा न खाएं|

[2] सरसों का तेल

[3] आपका प्यारा आरओ वाटर

मैं और मिच्छामि दुक्कडम्

सभी के जीवन में कष्ट, कठिनाई, दुःख, क्रोध, घृणा, अवसाद आते हैं| उनके आवृत्ति और अन्तराल भिन्न हो सकते हैं| मेरे और आपके जीवन में भी आये हैं| सबको अपने दुःख प्यारे होते हैं| मैं और आप – हम सब उनके साथ जीते हैं| मैं क्या जानूं, दुःख क्यों आये| जब सोचता हूँ, तो हर दुःख के पीछे कोई न कोई मिल जाता है – पड़ौसी, मित्र-शत्रु, नाते-रिश्तेदार, सगे-सम्बन्धी, देश-विदेश, नेता-अभिनेता, अपराधी-आतंकवादी| कई बार किसी संत-महात्मा, धर्म-गुरु या प्रेरक वक्ता को पढ़ता-सुनता हूँ, लगता हैं – दुःख का कारण तो मैं ही हूँ| ध्यान के प्रारंभ में लगता हैं – मैं स्वयं दुःख हूँ| मैं दुःखी नहीं हूँ – स्वयं दुःख हूँ| मैं दुःख हूँ – अपने पर भी क्रोध आता हैं|

उन दुःखों को कितना याद करूं, जो भुलाये नहीं जाते| मैं दुःख नहीं भूलता| दुःख हमारी वास्तविकता होते हैं – भोगा हुआ यथार्थ|

प्रकृति और परिस्तिथि तो कठिन बनीं हीं रहतीं हैं| जीवन में कोई न कोई हमें कष्ट देता रहता है| कुछ मित्र-नातेदार तो बड़े ही प्रेम से कष्ट दे देते हैं| घृणा आती हैं उनसे और उनकी कष्टकारी प्रकृति से| ईश्वर भी कष्ट देता है| ईश्वर के पास तो कष्ट देने के अनोखे कारण है – भक्ति करवाना और परीक्षा लेना| मैं ईश्वर पर भी क्रोधित होता रहा हूँ| मैं किसी को अब मुझे दुःख देने का मौका नहीं देता| मैं अब क्रोध नहीं करता| पड़ौसी, मित्र-शत्रु, नाते-रिश्तेदार, सगे-सम्बन्धी, और ईश्वर को मेरे क्रोध से कोई फर्क नहीं पड़ता| तनाव और अवसाद तो मुझे होता है, मुझे हुआ था|

एक सज्जन मिले थे, उन्हें नहीं जानता| उन्होंने कहा था, क्रोध दान कर दे| मैंने कहा, क्रोध वस्तु है क्या? उन्होंने कहा, हाँ| किसे दूं दान? उन्होंने पास पड़े पत्थर की ओर इशारा किया| वो पत्थर अब कभी कभी तीव्र क्रोध करता होगा|

मगर फिर भी, अवसाद भी हुआ| अवसाद, समाज इसे पागलपन की तरह देखता है| मगर मुझे पता था, क्या करना है| मेडिकल कॉलेज में प्रोफ़ेसर ने कहा, यहाँ आये तो तो पागल कैसे हो सकते हो? दवा दे सकता हूँ| मगर दवा नहीं दूंगा, इलाज करूँगा| छोटी मोटी मगर गंभीर बातें हैं, यहाँ नहीं बताऊंगा| लोग गंभीर चीजों को घरेलू नुस्खा बना लेते हैं| बहरहाल मुझे लाभ हुआ|

अब मैं क्रोध नहीं करता| क्रोध दान कर दिया तो उसे कैसे प्रयोग करूं| कभी कभी खीज आती है और क्षोभ भी होता है| दो एक साल में क्रोध आता है, तो मैं उसे पल दो पल में वापिस कर देता हूँ| कई बार गलत लोगों को, गलत बात तो तीव्रता और गंभीरता से गलत कहता हूँ, तो क्रोध पास आ जाता हैं| मैं क्रोध का निरादर नहीं करता, क्षमा मांग लेता हूँ – मिच्छामि दुक्कडम्|

खामेमी सव्व जीवे, (khāmemi savva jīve)
सव्वे जीवा खमंतु मे, (savve jīvā khamaṃtu me)
मित्ती मे सव्व भुएसु, (mittī me savva-bhūesu)
वेंर मज्झं न केणई, (veraṃ majjha na keṇa:i)

मिच्छामी दुक्कडम (micchāmi dukkaḍaṃ)

सब जीवों को मै क्षमा करता हूं, सब जीव मुझे क्षमा करे सब जीवो से मेरा मैत्री भाव रहे, किसी से वैर-भाव नही रहे| मैं जीवों से ही नहीं निर्जीव, मृत, साकार, निराकार, सापेक्ष, निरपेक्ष, भावना और विकार सबसे क्षमा मांगता हूँ|

मैं दिन नहीं देखता, जब मन आता है, स्वयं से क्षमा मांग लेता हूँ, क्षमा कर देता हूँ, | अपने कष्ट, कठिनाई, दुःख, क्रोध, घृणा, अवसाद के लिए मैं स्वयं को क्षमा कर देता हूँ| अगर मैं इन्हें ग्रहण नहीं करता तो यह मुझ तक नहीं आते|

मैं पड़ौसी, मित्र-शत्रु, नाते-रिश्तेदार, सगे-सम्बन्धी, और ईश्वर को, दिन नहीं देखता, क्षमा कर देता हूँ सबसे मन ही मन क्षमा मांग लेता हूँ| जैन नहीं हूँ, धार्मिक, आस्तिक, आसक्त और शायद निरासक्त भी नहीं हूँ| मगर संवत्सरी अवश्य मना लेता हूँ| भाद्प्रद माह की शुक्ल पक्ष चतुर्थी से प्रारंभ पर्युषण पर्व का अंतिम दिन – संवत्सरी| दसलाक्षाना का अंतिम दिन संवत्सरी| यह ही है क्षमावाणी का दिन| क्षमावाणी का यह दिन भारतीयता का जीवंत प्रमाण है|

पर्युषण पर्व के दौरान शाकाहार और जबरन शाकाहार का आजकल अधिक जोर हैं| मैं जीव-हत्या करने वाले मांसाहारी और कड़की खीरा कच्चा चबा जाने वाले शाकाहारी सबसे क्षमा मांग लेता हूँ|

मुझे संवत्सरी/क्षमावाणी आकर्षित करता है| भारतीय जैन ग्रंथों में, दिवाली और महावीर जयंती से अधिक महत्वपूर्ण जैन त्यौहार| अधिकतर भारतियों की तरह मुझे भी खान-पान से ही त्यौहार समझ आते हैं| परन्तु, मुझे यह त्यौहार भोजन से नहीं वचन से शक्ति देता है| मुझे दुःख, क्रोध, घृणा, तनाव और अवसाद से मुक्ति देता है| इस वर्ष २६ अगस्त २०१७ को क्षमावाणी है| [i]

अक्रोध और क्षमा ही तो भारतीय संस्कृति का मूल है| जुगाड़ और चलता है जैसी भारतीय भावनाओं के पीछे भी कहीं न कहीं यह ही है| ऐसा नहीं, हम भारतीय गलत को गलत नहीं मानते समझते और कहते| मगर अक्रोध और क्षमा को अधिकतर अपने साथ रखते हैं| अक्रोध और क्षमा हमारी जड़ों में इतना गहरा है कि हम इसे कई बार स्वप्रद्दत (for granted) मान लेते हैं| गुण दोष होते रहते हैं| फिर भी, समग्र रूप में, मैं आज जितना भी सफल हूँ, उसमें अक्रोध और क्षमा का बड़ा योगदान है|

ऐसा नहीं है कि अक्रोध और क्षमा पर केवल भारतियों का अधिकार हैं| बहुत से अन्य लोग भारतियों सोच से अधिक भारतीय हो सकते हैं| हो सकता है, मानवता हमारी सोच से परे जाकर भारतीयता को अपना ले| भारतीय आदर-सत्कार, भोजन, योग, मनोरंजन, बोलीवुड, अक्रोध और क्षमा विश्व अपना रहा है|

मिच्छामी दुक्कडम|

[i] एक गैर भारतीय विदेशी संस्था इसी तर्ज पर सन १९९४ से अंतर्राष्ट्रीय क्षमा दिवस मनाती है| http://www.ceca.cc/global_forgiveness_day/

अवैध चाय

अवैध चाय – हंसने का मन करता है न? अवैध चाय!!

सच्चाई यह है कि भारत में हर कार्यालय, विद्यालय, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय, गली, कूचे, मार्ग, महामार्ग, हाट, बाजार, सिनेमाघर और माल में अवैध चाय मिलती है| अवैध चाय का अवैध धंधा पिछले पांच-छः साल से धड़ल्ले से चल रहा है| पिछले पांच-छः साल क्यों?

क्यों पिछले पाँच-छः साल से सरकार ने हर खाने पीने की चीज़ बेचने के लिए एक पंजीकरण जरूरी कर दिया है| कुछ मामलों में पंजीकरण नहीं, बल्कि अनुमति-पत्र (लाइसेंस) जरूरी है| बिना पंजीकरण या अनुमति-पत्र के बनाये गए पेय और खाने को अवैध कहा जायेगा| वैसे दवाइयों के मामलें में इस तरह की दवाओं को सामान्यतः नकली कहा जाता है| आपके खाने को फिलहाल नकली नहीं कहा जा रहा|

मामला इतना संगीन हैं कि आपके ऑफिस में लगी चाय-कॉफ़ी की मशीन भी “शायद” अवैध है| अगर आप पुरानी दिल्ली/लखनऊ/हैदराबाद/कोई भी और शहर के किसी पुराने प्रसिद्ध भोजनालय में खाना खाते हैं तो हो सकता हैं, आप अवैध खाना खा रहे हैं|

मामला यहाँ तक नहीं रुकता| क्योंकि हिन्दुस्तानी होने के नाते आप दावत तो हर साल करते ही हैं| नहीं जनाब, मैं दारू पार्टी की बात नहीं कर रहा, जिसके अवैध होने का हर पार्टी-बाज दारूबाज को पता है| मैं बात कर रहा हूँ, शुद्ध सात्विक भोज/दावतों की, जिन्हें आप विवाह-भोज और ब्रह्म-भोज कहते हैं| आप जो पुरानी जान पहचान वाला खानदानी हलवाई पकड़ लाते हैं खाना बनाने के लिए, वो अवैध है|

यह वो कानून नहीं है, जिसके चलते देश के ७४ बड़े बूचडखाने गाय का मांस विदेश में बेचकर देश के लिए जरूरी विदेशी मुद्रा लाते हैं|

तो, अब ये कौन सा कानून है? यह वही क़ानून हैं जिसमें भारी-भरकम कंपनी की विलायती सिवईयां यानि नूडल बंद होने पर देश के हर चाय-पान वाले ने तालियाँ बजायीं थीं| यह वह क़ानून हैं जिसकी असली नकली मुहर (संख्या) खाना-पीना बनाने के सब सामान के पैकेट से लेकर डिब्बाबंद चाय-कॉफ़ी-टॉफ़ी-बिस्कुट-पिज़्ज़ा-बर्गर पर लगी होती है| यह वही कानून हैं, जिसकी मुहर (संख्या) बड़े बड़े होटल और भोजनालय के बिल पर पाई जाती है| यह वही क़ानून हैं, जिस में पंजीकरण न होने के कारण छोटे मोटे बूचडखाने जो देश की जनता के लिये मांस पैदा करते हैं, वो बंद किये जा रहे हैं|

आज बूचड़खाने बंद होंगे, कल सलाद की दूकान| और जब चाय-पान की दुकान बंद होगी तो आप सोचेंगें.. रहने दीजिये, कुछ नहीं सोचेंगें|

गौमांस के विरोध के चलते, देश का सारा मांस बंद हो रहा हैं, कल रबड़ी-फलूदा बंद हो जाए तो क्या दिक्कत है|

इस पोस्ट का मकसद हंगामा खड़ा करना नहीं है| देश के हर छोटे बड़े व्यवसायी के पास मौका है कि अपनी दूकान, होटल, रेस्टोरंट, ढाबा, ठेल, तख़्त, या चूल्हे का स्थाई पता और अपना पहचान पत्र देकर अपना पंजीकरण कराये| इस से आगे मैं क्या सलाह दे सकता हूँ? आप समझदार हैं|

टिपण्णी – इस आलेख में कही गई बातें कानूनी सलाह या निष्कर्ष नहीं हैं वरन हल्के फुल्के ढ़ंग से बेहद जटिल क़ानून समझाने का प्रयास है| कृपया, उचित कानूनी सलाह अवश्य लें|

#Tea #ChaBar #OxfordBookStore #_soidelhi

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खिचड़ी-भोग

खिचड़ी भोग भी अपने आप में एक मुहावरा है| हर किसी को पकी पकाई खीर खिचड़ी चाहिए| कोई पकाना नहीं चाहता| यह मुहावरा शायद उस जमाने में बना होगा जब खिचड़ी देग दम करके बनती होगी| आजकल तो प्रेशर कुकर का जमाना है मगर वक्त है कि आज भी कम पड़ता है| हमारे कुछ मित्र तो उस दिन का इंतजार कर रहे है जिस दिन कोई पकी पकी खिचड़ी फेसबुक या व्हाट्सएप पर भेज दे और वो उसका लुफ्त उठा लें|

हमारे बहुत से गीताप्रेमी मित्र बनिए की दुकान पर टंगा गीतासार पढ़कर बड़े हुए| आजकल उसकी फ़ोटो मोबाइल में देखकर वेद-वेदांग के ज्ञाता हुए जाते हैं| हमारे एक मित्र मोदी-मार्ग पर चलने का उपदेश रोज भेज देते थे| आजकल शांत हैं, उन्होंने मोदी-मार्ग घर के दामाद जी को भी भेजा था और उन्होंने इसे ग्रहण कर लिया| एक अन्य मित्र माताजी के स्नेह-दोष के कारण भारतीय सेना की सेवा न कर पाए आजकल रोज दो चार पाकिस्तानी चटका देते हैं|

उधर, कामरेड रोज इतनी क्रांति करते हैं कि सड़क पर उतरने और अपने कैडर से बात करने का वक़्त नहीं निकलता| उनकी अभिव्यक्ति की आजादी भी आजकल ट्विटर-फेसबुक वाले भैया के हाथ गिरवी पड़ी है, गाहे – बगाहे लुपलुपाती रहती है|

एक मित्र ने सावरकर के नाम पर गौहत्या रोकने की मांग कर रहे थे| मैंने बोला कि सावरकर गाय को पशु मानते थे, माता नहीं| दो चार छंद सुना कर बोले; गौहत्या विरोध का आन्दोलन किसने शुरू किया| अठारवीं शताब्दी के स्वामी दयानंद सरस्वती का नाम लेने पर बोले आज से उनकी भक्ति| उनके हाथ सत्यार्थ प्रकाश थमा कर मुड़ा ही था कि उनकी जिव्हा पर पुनः सरस्वती विराजमान हो गई| एक दिन दोबारा मिलने अपर पूछने लगे, आप भगतसिंह को क्या मानते हैं| जानता था, कहाँ लपेटेंगे; जबाब दिया नास्तिक| उनका दिमाग भन्ना गया| “मैं नास्तिक क्यों हूँ” पकड़ाकर विदा किया| आजकल कन्नी काटने लगे हैं|

आजकल मित्र लोग मुझसे कानूनी बातों पर ही बात करते हैं| मगर नुक्ता निकल ही आता है| खैर, उसकी बातें फिर कभी| मुझे आज खाने में खिचड़ी बनानी है|

 

अकबर

अकबर का दौर अजीब हालत का दौर था| एक बदहवास सा मुल्क सकूं की तरफ बढ़ता है| अपनी लम्बी पारी से भी और बहुत लम्बी पारी खेलने की चाह में अबुल मुज़फ्फर जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर बादशाह ने अपनी हालत कुछ अजीब ही कर ली थी| यह उपन्यास उस “हालत –ए – अजीब” से शुरू होता है, जिसमें बादशाह सलामत कह उठे थे – “गाइ है सु हिंदू खावो और मुसलमान सूअर खावो|” यह वो शब्द है जिनको मूँह से निकलने पर तब और आज सिर्फ जुबां नहीं, सिर कट सकते हैं, और तख़्त बदल उठते हैं| यह वो बादशाह अकबर है, जिन्हें न सिर्फ पूर्व जन्म में शंकराचार्य के श्रेष्ठ ब्राह्मण कुल में जन्मे मुकुंद ब्राह्मण का अवतार बताया गया बल्कि जो खुद “अल्लाहो अकबर” को नए अर्थ देने की कोशिश में पाया गया| यह वो अकबर बादशाह है जो बाद में “दीन – ए- इलाही” की शुरुआत करता है और छोड़ सा देता है| वह बादशाह अकबर जो, “जैसे जिए वैसे मरे| ना किसी को पता किस दीन में जिए, ना किसी को पता किस दीन में मरे|”

यूँ; पुस्तक को पढ़ने और पसंद करने के बाद भी इसकी विधा के बारे में सोचना पड़ता है | हालांकि लेखक प्रकाशक इसे उपन्यास कहते हैं| मैं इसे ऐतिहासिक विवरण कहूँगा| हम सबको पढ़ना चाहिए| हिंदी में ऐतिहासिक उपन्यास बहुत है| शाज़ी ज़मां का “अकबर” इतिहास का पुनर्लेख है जिसे औपन्यासिकता प्रदान करने का कठिन प्रयास लेखक ने किया है| वो कुछ हद तक सफल होते होते असफल हो जाते हैं| असफल इसलिए कि आप पाठक इस से ऊब जाता है| तमाम प्रसंगों में सन्दर्भों की भरमार है| बकौल शाज़ी ज़मां, “इस उपन्यास की एक-एक घटना, एक-एक किरदार, एक-एक संवाद इतिहास पर आधारित है|”

समय, सनक और समझ से जूझते अकबर बादशाह की टक्कर पर हिंदुस्तान में डेढ़ हजार साल पहले सम्राट अशोक का जिक्र आता है| इन दो से बेहतर नाम महाकाव्यों में ही मिल सकते हैं| अकबर की जिन्दगी के ऊँचे नीचे पहलू इस विवरण में आए है जिनमें से एक को, इस पुस्तक को बाजार में बेचने के लिए भी उछाला गया था – अकबर के मूंह से निकली एक गाली जिसे तमाम हिंदुस्तान आज भी देता है| पुस्तक अकबर को उसके समकालीन लेखकों और इतिहासकारों के नज़रिए से हमारे सामने रखती है| अकबर के समकालीन इतिहास की जानने समझने के लिए यह महत्वपूर्ण विवरण प्रदान करती है| साथ है, हिंदुस्तान का अपना माहौल आज भी कुछ ज्यादा नहीं बदला है इसे समझा जा सकता है|

यह विवरण उपन्यास तो नहीं बन पाया है साथ ही उन महत्वपूर्ण बातों से नज़र चुराता सा निकल गया है जिन्हें इसके पत्रकार – इतिहासकार लेखक छु सकते थे| मसलन अकबर के हिंदुस्तान का फ़ारस, तुर्की, पुर्तगाल और पोप के साथ रिश्ता तो चर्चा में आता है; मगर उन हालत के बारे में टीस छोड़ जाता है जो तुर्की और इस्लाम के यूरोप और ईसाइयत से रिश्ते की वजह से पैदा हुए थे और नतीजतन हिंदुस्तान और दुनिया की तारीफ में बहुत उठापटक हुई| अकबर के जाने के बाद का दौर, धर्मतंत्र और राजतन्त्र के कमजोर होने का दौर भी था जिसने बाद में संविधानों और राष्ट्रों के लिए रास्ता खोल दिया था|

कुल मिला कर किस्सा यह शेख़ अबुल फ़ज़ल के अकबरनामा और मुल्ला अब्दुल क़ादिर बदायूंनी के ख़ुफ़िया मुन्तखबुत्तावारीख के इर्द गिर्द बुना गया है और इसमें तमाम लेखकों और इतिहासकारों की लिखत को रंगतभरे खुशबूदार मसालों के साथ परोसा गया है|

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पुस्तक – अकबर

लेखक – शाज़ी ज़मां

प्रकाशक – राजकमल प्रकाशन

प्रकाशन वर्ष – 2016

विधा – उपन्यास

इस्ब्न – 978-81-267-2953-1

पृष्ठ संख्या – 350

मूल्य – 350 रुपये