३७१ और नगालैंड

पिछले सप्ताह अपने आलेख ३७० से आगे में मैंने लिखा था, जन भावना से इतर नगालैंड सबसे गंभीर मुद्दा है| मोदी जी ने सरकार बनाते ही इस मुद्दे पर ध्यान दिया था जिसपर जनता (खासकर भक्त प्रजाति) ने कोई विशेष ध्यान नहीं दिया था|

पूर्वोत्तर भारत के बारे में शेष भारत की जानकारी अत्यल्प रही है| पूर्वोतर को समझने का सरल तरीका अनिल यादव की यात्रा पुस्तक वह भी कोई देस है महाराज हो सकता है| परन्तु यह पुस्तक आज का मेरा विषय नहीं है|

जिस समय भारत एक देश, एक संविधान, एक विधान, एक निशान, एक पतान जैसी बातों में उलझा रहता है, नगालैण्ड से अलगाववादियों द्वारा अपना अनधिकृत झंडा फहराए जाने की ख़बरें भारतीय मुख्यधारा मीडिया में हाशिए पर भी अपनी जगह नहीं बना पातीं| नगालैंड से आने वाली ख़बरों का हाशिए पर रहना शायद कई कारणों से है| शेष भारत को इस्लामिक कश्मीर में अधिक दिलचस्पी है, इसाई नगालैंड से उन्हें अधिक फर्क नहीं पड़ता| जिस समय हम कश्मीर पर उलझे रहते हैं, हम भूल जाते हैं नगालैंड का नाम Unrepresented Nations and Peoples Organization (UNPO) जैसे खतरनाक संगठन में सन १९९३ से मौजूद है| कश्मीर इस संस्था का सदस्य नहीं रहा| यह संस्था UNPO उन भौगोलिक इकाइयों का संगठन हैं जिनके भविष्य में स्वतंत्र राष्ट्र होने के बारे में अन्तराष्ट्रीय प्रयास जारी हैं| आर्मीनिया, पूर्वी तिमूर, एस्टोनिया, लात्विया, जॉर्जिया, पलाऊ, इस संस्था से निकलकर आज सयुंक्त राष्ट्र संघ के सदस्य बन चुके हैं|

३ अगस्त २०१५ में भारत सरकार ने UNPO में नगालैंड का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठन नेशनलिस्ट सोशलिस्ट कौंसिल ऑफ़ नागालैंड के साथ नई दिल्ली में शांति समझौता किया था| इस समझौते के विवरण किसी भी पक्ष ने जनता के समक्ष नहीं रखे हैं| २०१७ से माना जाता है कि दोनों पक्ष निर्णय के निकट हैं|

वर्तमान मुख्यमंत्री २००३ से २०१३ तक कांग्रेस और २०१८ से अब तक भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़कर मुख्यमंत्री हैं| मुख्यंत्री द्वारा  केंद्र (मोदी) सरकार के नागरिकता (संशोधन) विधेयक का विरोध किया जाना पिछले साल ख़बरों में रहा था| मुख्यमंत्री का विचार था यह कानून संविधान के अनुच्छेद ३७१ के अनुरूप नहीं हैं| कोई भी मुख्यंत्री अपने राज्य को मिले विशेषाधिकारों को बनाये रखने की बात करेगा| परन्तु भारत की जनता के लिए समझने की बात यह है कि अनुच्छेद ३७० के आगे भी राष्ट्रहित, एकता और अनेकता मौजूद है| अनुच्छेद ३७१ के अनुसार नगालैंड को निम्नलिखित विशेषधिकार प्राप्त हैं –

  • धार्मिक और सामाजिक गतिविधियां;
  • नगा संप्रदाय के कानून;
  • नगा कानूनों के आधार पर नागरिक और आपराधिक मामलों में न्याय; और
  • जमीन का स्वामित्व और खरीद-फरोख्त

मेरा आग्रह यही है कि जन-उन्माद के हटकर सोच समझ कर बातें की जाएँ| भारत्त की अनेकता इसकी शक्ति है| जनमत और जनप्रिय नेतृत्व को उन्माद के आधार पर निर्णय लेने के लिए न उकसाया जाए| राष्ट्र के हितों की समझपूर्वक रक्षा की जानी चाहिए|

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३७० से आगे

राजनीतिक, कूटनीतिक और रणनीतिक निर्णयों में सही गलत के फ़ैसले संविधान तय नहीं करता| सही गलत का निर्णय इतिहास तय करता हैं और इतिहास इतिहासकरों से अधिक समर्थकों और जनकवियों पर आश्रित होता है| आप जो निर्णय आज सही माना जाए वह पांच हजार वर्ष बाद गलत माना जा सकता है|

भावनात्मक समर्थन या विरोध से हटकर कोई तय नहीं कर सकता कि कौरव और पांडवों में नीतिगत रूप से सही उत्तराधिकारी कौन था| कुरुवंश अगली तीन पीढ़ियों में समाप्त हो गया| रावण द्वारा अपनी बहन के अपमान का बदला लेने के निर्णय पर कोई प्रश्नचिन्ह नहीं हैं परन्तु प्रश्न यह है कि क्या उसने कठिन शत्रु से शत्रुता करनी चाहिए थी और क्या उसने सही तरीका अपनाया| आज इन प्रश्नों पर विचार का कोई लाभ नहीं|

कश्मीर पर अनुच्छेद ३७० का बना रहना या चले जाना इसी प्रकार का प्रश्न है जिसका उत्तर इतिहास देगा| अनुच्छेद ३७० का पक्ष विपक्ष उसके होने न होने के लाभ हानि पर आज केवल भावनात्मक उत्तर देता हैं| संविधान में इस प्रकार के अन्य अनुच्छेद सरलता से मौजूद हैं| जन भावना से इतर नगालैंड सबसे गंभीर मुद्दा है| मोदी जी ने सरकार बनाते ही इस मुद्दे पर ध्यान दिया था जिसपर जनता (खासकर भक्त प्रजाति) ने कोई विशेष ध्यान नहीं दिया था|

कश्मीर मात्र छद्म मुद्दा रहा है| एक रजवाड़े की महत्वाकांक्षा और जनभावनाओं पर उसका अनिर्णय कश्मीर की कुल कहानी हैं जिसमें दो बड़े देश स्थानीय जनता की भावनाओं के बारे में आज तक असमंजस और भय में रहे हैं| वर्ना हैदराबाद, गोवा सेन्य कार्यवाही और जूनागढ़ जनमत के साथ भारत में विलयित हुए हैं और उनकी जनता आज मानती हैं कि उनका भारत विलय उचित रहा है|

इस समय पक्ष विपक्ष के प्रश्न इस बात पर आधारित हैं कि क्या भारत की केन्द्रीय सरकार और शेष भारत की जनता कश्मीर की जनता के साथ भावनात्मक एकता बना पायेगी? खासकर तब जब अनुच्छेद ३७० को निष्प्रभावी बनाते समय केंद्र सरकार ने अतिशय तिकड़म का प्रयोग करते हुए कश्मीर की सशंकित जनता के मन में अधिक अविश्वास पैदा कर दिया हैं| अब इस कदम को सफल बनाने का सारा दारोमदार अब भारत की जनता पर है|

दुर्भाग्य से भारत की जनता का राष्ट्रीय एकता के प्रश्न पर अच्छा प्रदर्शन नहीं रहा है| सामाजिक माध्यमों में जिस प्रकार के असभ्य और अनुपयुक्त सन्देश एक हफ्ते में डाले गए उनसे भारतीय एकता पर मोदी सरकार के प्रयासों को उनके भक्तों की ओर से ही धक्का लगा है| यदि मोदी सरकार और भाजपा कार्यकर्त्ता “भक्त प्रजाति” के समर्थकों पर जल्द काबू नहीं करते तो यह वर्ग सरकार के लिए दूरगामी कठिनाई पैदा कर सकता है|

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बेरोजगारी – निजी समस्या

“आजकल क्या कर रहे हो?” जब भी रिश्तेदार यह सवाल पूछते हैं तो भारत का हर जवान जानता है कि वांछित उत्तर है – “बेरोजगार हूँ” और देय उत्तर है – “तैयारी कर रहा हूँ”| वास्तव में देश में कोई बेरोजगार नहीं है – नालायक, अच्छा  निकल गया, प्रतियोगी, प्रतिभागी, हतोत्साहित, कुछ तो करना ही है, कुछ तो कर ही रहे हैं, और आत्महत्यारे|

हमारी मानसिकता ही ऐसे बनी हुई है – कोई शिक्षक नहीं पढ़ता, खुद पढ़ना होता है|कोई नौकरी नहीं देता – खुद ढूंढनी पड़ती है| कोई रोजगार नहीं देगा, खुद अपने लिए रोजगार पैदा करो|

रोजगार की अर्थशास्त्रीय परिभाषा से भी हमें कुछ नहीं करना| हमारे यहाँ गड्ढा खोदता लंगड़ा लूला और नाला साफ करता हुआ स्नातक अभियंता रोजगार में ही माने जाते हैं| जबकि यह साफ़ है कि पहला उदहारण सामाजिक शोषण है और दूसरा बेरोजगारी या छद्म रोजगार| बेरोजगारी की सामाजिक स्वीकृति पढ़ना शुरू करते ही शुरू हो जाती है|

शिक्षा का बुरा हाल, शिक्षक और विद्यालयों से अधिक हमारे अभिभावकों के कारण है| दस अभिभावक विद्यालय या शिक्षक से जाकर नहीं भिड़ते की पढ़ाते क्यों नहीं|स्कूल से तो हमें हमें केवल पढ़े होने का ठप्पा चाहिए| विद्यलय में हम बच्चे के लिए वातानुकूलन, आदि सुविधाएँ देखते हैं| पढाई के स्तर जानने के लिए उत्तीर्ण होने वाले छात्रों की संख्या /प्रतिशत और स्नातक होने पर पहली नौकरी देखते हैं| हम निजी विद्यालय जाना पसंद करते हैं मगर यह नहीं देखते कि उनके पास कैसा पुस्तकालय है, कैसी प्रयोगशाला है| यह निजी विद्यालय भी विद्यार्थियों को वाणिज्य और कला आदि विषय लेने ले लिए प्रेरित करते हैं| उदहारण के लिए निजी विद्यालयों में विज्ञान विषयों का घटता स्तर देख सकते हैं| यही बात निजी महाविद्यालयों और निजी विश्वविद्यालयों के बारे में है| उसके बाद भी हम निजी कोचिंग में रटने का अभ्यास और महत्वपूर्ण प्रश्नों का तोतारटंत करते हैं| मगर जिन समाचारतन्त्र  में बिहार के प्रथम आये छात्रों का ज्ञान टटोला जाता है, वह निजी क्षेत्र के विद्यालयों पर तफ्सीश करने की हिम्मत भी नहीं करते| निजी विद्यालयों में शिक्षक अभिभावक बैठकों में अभिभावक मात्र उपदेश सुनने जाता है या अधिक हिम्मत करने पर उसे मात्र आश्वासन मिलता है| मगर सरकारी शिक्षकों पर लानत भेजने वाले हम निजी विद्यालय के अधपढ़ शिक्षक से प्रश्न करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते|

यहाँ से ही बेरोजगारी की स्वीकृति शुरू हो जाती है| हमारा बच्चा नालायक है, क्या पढ़ना है यह तय नहीं कर पाता और हमें इसे पैसा फैंक और दो लट्ठ मार कर किसी भी लायक बनाना है|

यहाँ से प्रतियोगिता और साक्षात्कार की तैयारी का अंतहीन सिलसिला शुरू होता है| सरकारी नौकरियां अस्वीकार्य तर्कों के साथ कम की जा रहीं है, मगर हम राजकोषीय घाटे के घटिया बहाने से बहला दिए गए हैं| क्या सरकार बिना संसाधन – मानव संसाधन के काम कर पायेगी| लगभग हर सरकारी विभाग कर्मचारियों की कमी का शिकार है| अधिकतर विभाग अनुबंध यानि गुलामीपत्र यानि संविदा पर अप्रशिक्षित कर्मचारी भर्ती कर रहे हैं| सरकार को अपने सचिव तक बाहर से अनुबंध पर लाने पड़ रहे हैं| मगर अगर सरकारी नौकरियां कम नहीं होंगी तो निजी क्षेत्र के सस्ती सेवा में कौन जाएगा| ध्यान दें कि जब सरकारी नौकरियां थीं तब लोग दोगुने वेतन में भी निजी क्षेत्र में नौकरी करने से कतराते थे| जब सरकारी नौकरियां नहीं है तो आरक्षण तो खैर बेमानी नाटकबाजी ही है|आरक्षण के समर्थन में मूर्ख और विरोध में महामूर्ख ही बात कर सकते हैं|

इस सब के बाद हमारे पास तर्क होता है कि क्या नौकरियां पेड़ पर उग रहीं हैं?  हमारे छात्र पढाई पूरी करने के बाद या तो घर पर बैठ कर तैयारी का प्रपंच करते हैं या फिर अपनी लिखित योग्यता से कमतर कोई भी रोजगार पकड़ लेते हैं| किसी शिकायत का न होना यह स्पष्ट करता है कि उन्हें पता है कि उनके कागज़ की असली कीमत क्या है|

कुछ समय पहले मैं एक कंपनी के लिए साक्षात्कार ले रहा था| मानव संसाधन विभाग की तरफ से सीधा संकेत था कि सरकारी डिप्लोमा होल्डर को निजी विद्यालय के स्नातक अभियंता से अधिक तरजीह देनी है| उनके तर्क साधारण थे| लाटसाहब ने पैसा फैंक कर कागज खरीदा है| यह बात हर अभिभावक और प्रतिभागी जानता है| किसी स्नातक ने अपने से कम पढ़े व्यक्ति के आधीन काम करने से मना नहीं किया|वह अनुभव और वास्तविक ज्ञान को समझते थे|

पिछले तीस वर्ष में सरकारें जनता को यह समझा पाने में कामयाब रहीं है कि शिक्षा और रोजगार सरकारी “खैरात” नहीं हैं, यह आपका निजी प्रश्न है|हमारे सरकारों के पास कोई नक्शा नहीं कि यह बता सकें कि अगले तीन पांच साल में कौन से और कितने रोजगार मिलने की सम्भावना हो सकती है| क्या पढाई की जाये, क्या नहीं? दूसरा इस जनसंख्या बहुल देश में भी हमने अपने कर्मचारियों को बारह घंटे काम करने की प्रेरणा दी है, जबकि अगर सब लोग केवल आठ घंटे काम करें तो डेढ़ गुना लोगों को रोजगार मिल जाये| संविदा आदि के चलते कर्मचारियों की गुणवत्ता घटी है| यह सब छद्म रोजगार और आधुनिक गुलामी या बंधुआ मजदूरी है|

देश में कश्मीरी पंडितों के पलायन से भी अधिक भयाभय तरीके से रोजगार सम्बन्धी पलायन हो रहा है| किसी भी योग्य युवा को अपने घर के आसपास उचित रोजगार अवसर नहीं मिल रहे| दिल्ली, मुंबई और अन्य महानगर पलायन से भरे पड़े हैं| सब जानते हैं कि असंतुलित विकास इस रोजगारी पलायन का कारण है| मगर न हम विकास पर प्रश्न उठा रहे हैं, न बेरोजगारी पर| विकास के नाम पर दो चार चिकनी सड़के हमारा दिल खुश कर देतीं हैं| हम पलायन कर रहे हैं, विस्थापित हो रहे हैं, हम पढ़ लिख कर अग्रीमेंट मजदूर बन रहे हैं जैसे कभी अनपढ़ गिरमिटिया मजदूर बनते थे|(अग्रीमेंट और गिरमिट एक ही अंग्रेजी शब्द के रूप हैं)

कोई प्रश्न नहीं है| प्रश्न तब ही नहीं था जब सत्तर साल पहले आरक्षण घोषित करते हुए सरकार ने ऐलान किया था कि सबको रोजगार नहीं हो पायेगा| प्रश्न तब भी नहीं है जब बेरोजगारी की सबसे भयाभय स्तिथि की सरकारी सूचना आती है| प्रश्न तब भी नहीं जब बेरोजगारी की बढ़ती संख्या देखकर सरकार पकौड़े तलने की सलाह देने लगती है

आखिर हतोत्साहित, शिकायतहीन और सस्ता मजदूर किस मालिक को अच्छा नहीं लगता – मालिक सरकार हो या बनिया|

कृपया, इस पोस्ट पर सकारात्मक आलोचना करें – नकारात्मक आलोचना हमें सुधरने पर विवश कर सकती है|

 

 

मतदान

कल मतदान का दिन है|

सालों ने एक छुट्टी बर्बाद कर दी| कोई इतवार को भी चुनाव रखता है क्या? इन कमीशन वालों को तो बस पाँच साल में एक बार काम करना होता है| मगर हम से इतवार को वोट दलवायेंगे| इन के सरकारी लोग भी सब थोड़े से पैसे और ओवरटाइम के लिए इतवार को दौड़ पड़ते हैं चलो वोट डालो|गर्मी भी तो कितनी है – हे भगवान ४२ पार|

चुनाव भी क्या है| लोग पैसा लेकर वोट डालने जाते हैं| दारू ठर्रे के लिए वोट हो जाता है| देखा है न सब मैले कुचले लोग कतार में खड़े रहते हैं जैसे कोई भंडारा हो| कोई मुफ्त में वोट डालने| कौन खड़ा हो इन कीड़ों के साथ| मैं तो नहीं जाता| गर्मी में मनाली जाएँ कि मतदान केंद्र?

कुछ नहीं होना इस देश का वैसे भी| सब एक थाली के चट्टे बट्टे हैं| कोई देश नहीं बदलता| देश अपने आप बदलता है|हर कोई चला आता है मैंने ये किया, उसने ये नहीं किया| अरे भाई, हमने अगर १२ घंटा कंपनी के ऑफिस में कुर्सी नहीं तोड़ी होती तो क्या कुछ कर लेते ये नेता लोग|

इन नेता लोग को तो वैसे भी कुछ नहीं करना होता| अफसर करते हैं अफसर| अब देखों अफसर ने कॉपी पेस्ट ड्राफ्ट कर के कोई टेढ़ा मेढ़ा कानून सा बना दिया| न बहस, न चर्चा, न बात न चीत, बस ये ये ये ये… …. हो गया पास|उखड़ गया घंटा|

कुछ भी कर लो, मंदिर नहीं बनेगा| न १९८४ वालों को सजा मिलेगी न २००२ वालों को| विकास की दर दुनिया ब्याज की दर की तरह ही थोड़ा थोड़ा बढ़ेगी| सरकार कोई भी हो| आरक्षण हटेगा नहीं, और हमें बिना काम वाली सरकारी नौकरी मिलेगी नहीं|

चुनाव क्या है, बड़े सेठ लोग का हँसी ठठ्ठा है| नेता नाचते हैं, मुजरे में भाषण करते हैं और वाह वाह सुनकर चल देते हैं| दस मिनिट में भाषण कूड़ा| कौन याद रखता है भाषण, अख़बार वाले| उनको तो बस रद्दी छापनी होती है| कोई काम की बात आती है अखबार में| वैसे आये भी तो क्या? कौन सा हमको पढ़ना है| हमें तो बस हीरोइन का फ़ोटो देखना है|

चल कहीं फ़िल्म देखने चलते हैं|

(अब यह बकबास कर ली हो या पढ़ ली हो तो चलें वोट डालने| हमारी दिल्ली में तो भैया कल है कल|)

जलियांवाला वाला बाग़

कौन याद करेगा तुम्हे, ऐ मरने वालो| कोई दस पांच बरस तुम्हारा नाम जिएगा| कुछ बीस चालीस बरस तुम्हारी याद आएगी| क्या कोई मंजर होगा कि तुम याद आओगे? याद आओगे किसी तारीख़ की तरह और उस दिन के ढलते सूरज के साथ बीत जाओगे| कोई, शायद कोई, तुम्हारी क़ब्र पर चिराग़ रोशन करेगा, मगर तुम्हे याद कौन करेगा? चिराग़ रोशन करने वाले दुआ से वास्ता रखते हैं, उन्हें तुम्हारे सलाम का क्या काम? तुम्हें भी क्या पता था कि उस शाम तुम ढल जाओगे? वो गुनगुनी शाम तुम्हारी आखिरी शाम होगी|

सौ बरस बीत गए| तुम्हारा कौन नाम लेवा है? तुम लाशों का वो ढेर हो जिस पर राजनीति के अघोरी अपनी साधना करते है| राजनीति की देवी जो बलि मांगती है, उस बलि का पवित्र बकरा तुम हो| तुम्हारा नाम बलि के प्रसाद की तरह टुकड़े टुकड़े बाँट दिया जायगा| ये मुल्क तुम्हारे नाम की बोटियाँ चबाकर तुम्हे याद करेगा|

तुम्हें याद करना एक रस्मी कवायद है| नेता तुम्हारी इन यादों को हर चुनाव में वोट के बदले बेच देगा| खरीदेगा कुछ जज़्बात, कुछ वोट, कुछ कुर्सियाँ और कुछ दिनों की सत्ता|

तुम्हारे नाम पर रोज नई तख्तियां लगेंगी| कुछ इमारतों में तुम्हारे नाम की कुछ इबारतें धूल खाया करेंगी| तुम्हारे नाम की कुछ सड़कों को सरकार अपने जूतों से और सरकारी गाड़ियाँ अपने पहियों से रौंदा करेंगी| तुम्हारे नाम पर नाम वाले पुल अपनी सरकारी रेत के साथ ढह जाया करेंगे, मानों नश्वर संसार का सार उन्हीं में निहित है|

नहीं, मैं रोता नहीं हूँ ओ मरने वाले| मैं हँसता भीं नहीं हूँ ओ जाने वाले| तुम्हारे नाम पर में अपने आंसुओं के कुछ जाम पीता हूँ| मैं तुम्हारी कब्र पर सोना चाहता हूँ| आओ, मुझे अपनी बाहों में ले लो|

मैं सो जाऊं, जब वो तुम्हें पुकारे, तुम्हारे नाम पर शोक गीत गायें, तुम्हारे नाम पर सदका करें| मैं सो जाऊं जब तुम उठो और बेचैनी से अपनी कब्र के ऊपर बैठ कर रोने लगो| मैं सो जाऊं जब तुम्हारा नाम झूठी जुबान पर आये| मैं सो जाऊं जब मैं तुम्हारी कब्र पर झूठा चिराग़ रोशन करूँ|

मैं सो जाऊं जब बैसाखी आये|

अनुच्छेद ३७० और आतंकवाद

कानून का कोई भी विद्यार्थी यह मानेगा कि भारतीय संविधान के बारे में आपको कुछ पता हो या न पता को मूल अधिकारों के बारे में पता होना चाहिए| परन्तु मूल अधिकारों के बारे में जानने वाले भारतीय अनुच्छेद ३७० को जानने वाले भारतियों से कम होंगे| मामला वाही है कि अपने सुख दुःख से अधिक इंसान दूसरे के संभावित सुखों से परेशान रहता है|

इन दिनों जब भी अनुच्छेद ३७० की बात आती है, इसे किसी न किसी रूप में आतंकवाद से जोड़ दिया जाता है| अज्ञान या अतार्किकता यह है कि ऐसा प्रचारित होता रहा है कि इसका लाभ मात्र राज्य के एक प्रखंड में रहने वाले एक धार्मिक समुदाय को मिला है| मैं नहीं जानता की आखिर उस प्रखंड के अन्य वर्ग और अन्य प्रखंड के निवासी इसका लाभ क्यों नहीं ले सकते| इस से

मजे की बात यह है कि जिस जम्मू कश्मीर राज्य से यह अनुच्छेद जुड़ा हुआ है, वह इस प्रकार के विशेष प्रावधान वाला अकेला राज्य नहीं है| कई अन्य राज्यों को भी अन्य अनुच्छेदों के अंतर्गत विशेष अधिकार मिले हुए हैं|

अब अगर हम आतंकवाद के मुद्दे पर बात करें तो भारत में बहुत से राज्य किसी न किसी प्रकार के आतंकवाद से जूझ रहे हैं| मध्य और पूर्वी भारत में नक्सलवाद है| उत्तरपूर्व में भी अलग अलग प्रकार से आतंकवाद मौजूद है| परन्तु कश्मीर और पंजाब के आतंकवाद की गूँज दिल्ली में सबसे सुनाई देती है| जी हाँ पंजाब में आज आतकवाद नहीं है| इस राज्य को कोई संवैधानिक विशेष अधिकार नहीं था| राज्य भले ही तकनीकि रूप से अल्पसंख्यक धार्मिक समूह से सम्बन्ध रखता हो परन्तु उन्हें बहुसंख्यक भारतीय आज अपनेपन से देखते हैं|

कश्मीर और पंजाब के आतंकवाद की समानता देखते हैं –

  • भारत पाकिस्तान सीमा
  • सीमावर्ती राज्य
  • धार्मिक अल्पसंख्यक
  • विदेशी धन
  • पाकिस्तानी समर्थन
  • मूल रूप से प्राकृतिक संसाधन में धनी क्षेत्र
  • प्रारंभिक दिनों में केंद्र में कांग्रेस का शासन
  • सरकार की राजनीतिक और कूटनीतिक गलतियाँ
  • हिन्दूवादी/ राष्ट्रवादी राजनीतिक दलों के अलगाववादियों से बनते बिगड़ते लुकाछिपी सम्बन्ध
  • स्थानीय असंतोष
  • आतंकवाद को प्रारंभिक तौर पर स्थानीय समर्थन
  • स्वतंत्र देश की मांग
  • अनियंत्रित पुलिस/सेन्य कार्यवाहियां
  • हर किसी अपराधी को आतंकवादी घोषित करने की पुलिसिया प्रवृत्ति
  • निर्दोष और आम नागरिकों पर दोनों और से निशाना
  • मानव अधिकार उलंघन

दोनों आतंकवाद का एक जैसा गठन साफ़ दिखाई देता है| जबकि पंजाब कोई विशेष दर्जा प्राप्त नहीं था जबकि जम्मू कश्मीर को खास संविधानिक दर्जा प्राप्त है| इसलिए अनुच्छेद ३७० को जम्मू कश्मीर आतंकवाद के लिए दोषी नहीं माना जाना चाहिए| अनुच्छेद ३७० को हटाना केवल आतंकवादियों के हित में काम करेगा कि भारत अपने संविधानिक वचन का पालन करने से पीछे हट रहा है|

हमें समस्या के राजनीतिक हल के लिए प्रयास किये जाने चाहिए| ऐरे गैरे अपराधियों को आतंकवादी कहने के स्थान पर उन्हें कानूनी तौर पर सजाएं दी जाएँ| स्थानीय नागरिकों के साथ सकारात्मक सम्बन्ध बनाये जाएँ| इन सुझावों में कुछ नया नहीं है| इन्हें भारत पंजाब, मिजोरम आदि राज्यों में आतंकवाद के विरुद्ध अजमाया जा चुका है|

चुनावी खच्चर

चुनावी खच्चर वह निरुद्देश्य निष्क्रिय प्राणी है जिसके होने न होने से चुनाव पर कोई असर नहीं पड़ता और वह चुनाव से बहुत कुछ प्राप्त करने की आशा करने से निराश रहता है| यह प्रायः मध्यवर्गीय मानसिकता से त्रस्त आयकरदाता होता है जिसके अनुसार देश का सारा सरकारी काम खासकर कर्ज माफ़ी और घोटाला उस के आयकर पैसे से चलता है| इसे प्रायः बिना बिल का सामान खरीदने की जुगाड़ करते, अनावश्यक रूप से रिश्वत देते, जुगाड़ भिड़ा कर मंहगे विद्यालयों में बच्चों का दाखिला कराने के बाद उन्हें लठ्ठ मार मार कर कोचिंग क्लास जाने के लिए विवश करते देखा जा सकता है| यह सड़क किनारे मूतते हुए नारा लगाता है – इस देश का कुछ नहीं हो सकता| अपनी बहन बेटी की सहेलियों के संग अश्लील हरकतें करने या करने के हसीन सपने देखते हुए यह अपनी माँ बहन की इज्जत बचाने की आशा में उन्हें ताले में बंद करने कोशिश करता है|

चुनावी खच्चर दुनिया भर की बड़ी बड़ी बातें बनाने के बाद, चाय और पान तम्बाकू की दुकान और अपने दफ़्तर की कोफी मशीन के किनारे पर खड़ा होकर घंटो बेमतलब बहस करने के बाद बड़े लीचड़ तरीके से घोषणा करता है – सब एक जैसे हैं, मैं तो इसलिए वोट डालने नहीं जाता|

चुनावी खच्चरों की तादाद देश की आबादी में लगभग तीस से चालीस फ़ीसदी मानी जाती है| हर चुनाव में मतदान केंद्र से अनुपस्तिथ रहे लोगों ने इनकी संख्या ९५ प्रतिशत तक होती है| चुनाव के दिन आसपास के इलाकों में तफ़रीह पर चले जाना पक्के चुनावी खच्चरों का विशिष्ठ लक्षण माना जाता है| हाँ, यह सामाजिक माध्यमों पर करें मतदान – देश महान जैसे नारे जरूर प्रेषित कर देता है| इन्हें चुनावी क़ानून के नाम पर सिंगापुर की याद आती रहती है कि वहां मतदान न करने पर सजा मिल सकती हैं|

चुनावी खच्चर को देशप्रेम से प्रेम होता है| चुनावी खच्चरों की औलादें अक्सर आस्ट्रेलिया कनाडा आदि देशों की वीज़ा कतारों में खड़े होकर और बाद में उन देशों में भारतीय सांस्कृतिक कार्यक्रम में जाकर देशप्रेम का अनूठा परिचय देते हैं| यहूदियों का देश इस्रायल इनका स्वर्ग और यहूदियों का दुश्मन हिटलर इन के बहुमत का इष्टदेव माना जाता हैं|

चुनावी खच्चर को कभी पता नहीं होता कि वह और उसके जैसे दूसरे चुनावी खच्चर अगर किसी ईमानदार निर्दलीय उम्मीदवार को अपना मत दे दें तो वह ईमानदार कर्मठ आदमी देश के काम आ सके|

चुनावी खच्चर खुद भी चुनाव नहीं लड़ता – उसे पता है उसके साथ के दूसरे चुनावी खच्चर उसे अपना मत नहीं देंगे|

चुनावी खच्चर को विशवास रहता है कि उसका मालिक, अधिकारी, शिक्षक, और बाप गधा है और अक्सर किसी असली गधे यानि बाहुबली, धर्मगुरु, फिल्म अभिनेता को यह अपना असली घोड़ा मान लेता है|