पानी की पहली लड़ाई

धौलाधार के ऊँचे पहाड़ों पर दूर एक प्राचीन मंदिर मिलता है| कहानियाँ बताती हैं कि कोई प्राचीन जनजातियों के राजाओं की लड़ाई हुई थी यहाँ| दोनों राजा मरने लगे| दोनों के एक दूसरे का दर्द समझ आया| एक दूसरे की प्रजा का दर्द समझ आया| मरते मरते समझौता हुआ| एक युद्ध स्मारक बना| यह युद्ध स्मारक अगर आज उसी रूप में होता तो शायद दुनिया का सबसे प्राचीन जल-युद्ध का स्मारक होता| जैसा होता है – स्मारक समय के साथ पूजास्थल बन गया और धीरे धीरे चार हजार साल बाद और अब से पांच हजार साल पहले मंदिर| यहाँ आज पंचमुखी शिवलिंग मंदिर है| अब यह गोरखा रेजिमेंट का अधिष्ठाता मंदिर है|

आज यह शिव मंदिर – एक कहानी और भी कहता है – भूकम्प की| धरती काँप उठी थी| मंदिर नष्ट हो गया| दूर एक चर्च बचा रहा| हिमालय के धौलाधार पहाड़ों के वीराने में लगभग बीस हजार लोग मारे गए| मंदिर दोबारा बनाया गया| उस भूकंप की चर्चा फिर कभी|

तब थार रेगिस्तान रेगिस्तान न था, नखलिस्तान भी न था, हरा भरा था| रेगिस्तान में अजयमेरु का पर्वत था| वही अजयमेरू जहाँ पुष्कर की झील है| अरावली की इन पहाड़ियों पर मौर्य काल से पहले एक बड़े राज्य के संकेत मिलते हैं जिसका स्थापत्य सिन्धु सभ्यता से मेल खाता है| यही एक भाग्सू राक्षस का राज्य था| सुनी सुनाई कहानियों के विपरीत यह राक्षस जनता का बहुत ध्यान रखता था| पर ग्लोबल वार्मिंग तब भी थी| हरा भरा अजयमेरू राज्य सूखे का सामना कर रहा था| राजा भाग्सू राक्षस ने पानी की ख़ोज की और हिमालय पर धौलाधार के पहाड़ों पर के झरने से पानी लाने का इंतजाम किया|

कथा के हिसाब से राजा भाग्सू राक्षस कमंडल में सारा पानी भरा और अपने राज्य चल दिया| स्थानीय राजा नाग डल को चिंता हुई| अगर पानी इस तरह चोरी होने लगा तो उसके राज्य में पानी का अकाल पड़ जायेगा| उसके राज्य में बर्फ़ तो बहुत थी मगर पानी?? ठण्डे हिमालय पर आप बर्फ नहीं पी सकते|

युद्ध शुरू हुआ| स्थानीय भूगोल ने स्थानीय राजा नाग डल की मदद की| राक्षस हारने लगा| उसने समझौते की गुहार लगाई| दोनों राजाओं ने पानी का मर्म, पानी की जरूरत और आपसी चिंताएं समझीं और संधिपत्र हस्ताक्षरित हुआ| यह सब आज से ९१३० साल पहले द्वापरयुग के मध्यकाल में हुआ|

इस युद्ध का स्थल आज दोनों महान राजाओं भाग्सू राक्षस और नाग दल के नाम पर भागसूनाग कहलाता है| हिमाचल में धर्मशाला के पास जो नाग डल झील है, वह इसी युद्ध या समझौते से अस्तित्व में आई| अजयमेरू तक भी पानी पहुंचा| कोई पुष्टि नहीं, मगर पुष्कर झील की याद हो आई| हो सकता है, नाग डल और पुष्कर प्राचीन बांध रहे हों, जिनके स्रोत नष्ट होते रहे और ताल रह गए|

अपनी प्रजा को प्रेम करने वाले दोनों महान राजाओं के राज्य, उनके वंश, उनकी जाति, उनके धर्म आज नहीं हैं| उस महान जल संधि का नाम भी विस्मृत ही है| इस वर्ष उस युद्ध का कारक भाग्सू नाग झरना मुझे सूखता मिला|

उनका युद्ध स्मारक आज गोरखा रायफल के अधिष्ठाता देवता के रूप में विद्यमान है| ५१२६ साल पहले राजा धर्मचंद के राज्य में यहाँ शिव मंदिर की स्थापना हुई| भागसूनाग मंदिर का नाम बिगाड़कर भागसुनाथ लिखा बोला जा रहा है| कल संभव है भाग्यसुधारनाथ भी हो जाए|

जब भी जाएँ कांगड़ा, धर्मशाला, मैक्लोडगंज, भाग्सूनाग जाएँ, मंदिर के बाहर लगे पत्थर पर लिखे इतिहास को बार बार पढ़े| उसके बाद भाग्सुनाग झरने में घटते हुए पानी को देखें| बचे खुचे ठन्डे पानी में हाथपैर डालते समय सोचें; आज इस स्थान से थोड़ा दूर शिमला में सरकार पानी नाप तौल कर दे रही है|

मेरी जानकारी में भाग्सूनाग का युद्ध जल के लिए पहला युद्ध है| आज यह मिथक है, कल इतिहास था|

कहते हैं अगला विश्वयुद्ध पानी के लिए होगा| भारत पाकिस्तान और भारत चीन पहले ही पानी की बात पर अधिक कहासुनी कर ने लगे हैं|

यदि आपको लगता है, बच्चों का भविष्य बचाना है, इस मिथिकीय कहानी को इष्ट मित्रों से साँझा करें शेयर करें|

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मनभेद की नीति

कई बार सोचता हूँ, क्या राजनीति तुच्छ बात है? कम से कम इस मुद्दे पर राजनीति नहीं होनी चाहिए| राजनीति का यह नकार हमारे लोकतंत्र की खूबी है| कोई राजनीति पसंद नहीं करता – राजनीतिज्ञ तो बिलकुल ही नहीं| संसद में हल्ला मचा रहता है – राजनीति न करो| राजनीति यानि विचार-विमर्श, शब्द संघर्ष – शास्त्रार्थ|

कैसे तय हो क्या सही है| बिना विचार –विमर्श के| मतदान मुद्दे नहीं तय करता| बिना विमर्श के होने वाला मतदान सिर्फ भाई-भतीजावाद है| विमर्श से भागना भीड़तन्त्र को मजबूत करना है – लोकतंत्र को नहीं| लेकिन बात विमर्श की नहीं ही रही| सड़क का संघर्ष आज विचार को जन-जन तक पहुँचाने का संघर्ष नहीं है, सब जोर-जबरदस्ती का मामला है| हिंसक संघर्ष स्वीकार्य होने लगे हैं और अनशन और प्रदर्शन को कोई नहीं पूछता|

लोकतंत्र के लिए आवश्यक है कि पहले मुद्दा हो, उसपर विचार हो, विमर्श हो उसको जनजन तक पहुँचाने की बात हो और फिर जिसका विचार पसंद आये उसे मत दे दिया जाए| आज पहले नेता चुन जाता है बाद में उसका विचार खोजा जाता है| विचार का भी क्या है, सत्ता के बाहर रहकर जिसका विरोध हो, वही सत्ता में आते ही प्रिय विचार हो जाता है| जब विचार के यह हाल हैं तो विमर्श के लिए अवसर ही कहाँ है?

विचार अगर लोकतंत्र का मूल न हो तब लोकतंत्र का नष्ट होना तय ही है| पहले यह भीड़तंत्र बनेगा और बाद में तंत्रहीनता|

आज भले ही सूचना तकनीकि अपने चरम पर हो मगर हम सूचनाएं हमारे हाथ में नहीं हैं|उनका नियंत्रण कोई और कर रहा है| सूचना बिक रही हैं| असुविधाजनक सूचना उपलब्ध नहीं होती| आप जिस पक्ष को एक बार हल्का सा भी समर्थन देते हैं, आपका सूचना तंत्र आपके पास विरोधी या विपक्षी सूचना नहीं आने देता| भ्रम का मायाजाल बन रहा है| जब तक सूचना के दुसरे पक्ष तक पहुँच नहीं होगी, लोकतंत्र समृद्ध नहीं होगा|

राजनीति में मतभेद होने अच्छी बात है, मनभेद नहीं होने चाहिए| मतभेद के लिए मत होना चाहिए| मनभेद के लिए मन| मन का क्या है, किसी पर भी आ जाता है और बाकि सब शत्रु लगने लगते हैं| बस यही नहीं होना चाहिए|

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हे राम!!

हे राम!

याद होगा तुम्हें

छू जाना उस पत्थर का, पथराई अहिल्या का,

मुझे भी याद है – तुम्हारा अधूरा काम||

कभी कभी मौका मिलने पर,

धिक्कारते तो होगे तुम, अपनी अंतरात्मा को||

सहज साहस न हुआ तुम्हें,

लतिया देते इंद्र को, गौतम को,

गरिया देते कुत्सित समाज को,

उदहारण न बन सके तुम||

हे राम!!

तीन अंगुलियाँ मेरी ओर उठीं हैं,

और इंगिता तुम्हारी ओर||

 

आरक्षण पर पारस्परिक कुतर्क

आरक्षण के समर्थन या विरोध में वाद –विवाद करते रहना धर्म, राजनीति, क्रिकेट और खाने-पीने के बाद भारतियों का प्रिय शगल है| मुझे आरक्षण की मांग मूर्खता और उसका विरोध महा-मूर्खता लगती है| सीधे शब्दों में कहूँ तो आरक्षण के पक्ष-विपक्ष में खड़े राजनीतिक दल या राजनेता भारत और किसी भी भारतवासी के हितेषी नहीं हो सकते| अगर आप चाहें, यह आगे न पढ़ें|

मेरे इस आलेख पर इस बात का कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि आरक्षण का प्रस्ताव अपने आप में उचित था या नहीं| हालाँकि मुझे पारदर्शिता के हित में अपनी निजी राय रख देनी चाहिए| मुझे लगता है, जब तक समाज में असमानता है –आरक्षण की आवश्यकता है|

प्रख्यात कुतर्क है कि आरक्षण का देश के विकास पर कुप्रभाव पड़ता है| परन्तु सभी जानते हैं कि अपेक्षागत तौर पर कम आरक्षण वाले हिंदीभाषी राज्य अधिक आरक्षण वाले दक्षिणी राज्यों से बेहद कम विकास कर पाए हैं| एक कारण यह है कि दक्षिणी राज्यों में आरक्षण और उसका सही अनुपालन अधिक बड़े जन समुदाय को आगे बढ़ने की प्रेरणा देने में सफल रहा है| दक्षिणी राज्यों में विश्विद्यालयों और सरकारी नौकरियों में आरक्षित और अनारक्षित प्रतिभागियों के योग्यता सूची में अंतिम आने वाले प्रतिभागीयों के योग्यतांक का अंतर लगातार घट रहा है| दक्षिणी राज्यों में अधिकतर प्रतिभागियों को आरक्षण अथवा बिना आरक्षण लगभग बराबर का संघर्ष करना पड़ रहा है| जबकि उत्तरी और पश्चिमी राज्यों में योग्यता प्रदर्शन की खाई बरक़रार है|

आरक्षण के समर्थन (और नई मांग) या विरोध में खड़े होने वाली भीड़ को देखें| भीड़ के अधिकतर सदस्य वो निरीह प्राणी होते हैं जो शायद किसी प्रतियोगी परीक्षा में दस प्रतिशत अंक भी न ला पायें| जब इस प्रकार के उग्र प्रदर्शन होते हैं उस समय उनके सभी योग्य जातिभाई सरकारी या निजी क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों का लाभ उठाने का उचित प्रयास कर रहे होते हैं|

जातिगत भेदभाव के विपरीत, सभी वर्गों से नए नए उद्यमी आगे आ रहे हैं| व्यापार के साथ साथ बड़े उद्योगों में भले ही सवर्णों और अन्य धनपतियों ने आधिपत्य कायम किया है, छोटे और मझोले उद्योगों में हमेशा की तरह शूद्र कही गई जातियों का आधिपत्य है| ध्यान देने की बात है कि प्रायः सभी उत्पादक और सेवा प्रदाता जातियाँ प्राचीन काल से शूद्र के रूप में वर्गीकृत होती रहीं हैं| दुःखद यह है कि इनमें अपने पारंपरिक कार्यों के प्रति वही घृणा भर दी गई है, जो सवर्ण सदा से उन कार्यों से करते रहे थे|

अब, आइये मुख्य मुद्दे पर आते हैं|

रोजगार सुधार

आरक्षण समर्थक और विरोधी दोनों ही वर्ग सरकारी नौकरी के लालच में एक दूसरे से लड़ रहे हैं| कोई नहीं देखता कि सभी उत्पादक रोजगारों के मुकाबले सरकारी क्षेत्र में बहुत कम अवसर हैं| साथ में, बड़े और विदेशी उद्योगों और संस्थानों के दबाव में आवश्यक सरकारी पद भी नहीं भरे जा रहे| लागत कम करने के नाम पर सरकारी क्षेत्र को मानव संसाधन विहीन करने की परंपरा चल रही है|  इस नाते प्रथम दृष्टया आरक्षण अप्रभावी हो रहा है| वास्तव में मांग होनी चाहिए कि सरकारी गैर सरकारी क्षेत्रों में सभी खाली पद समय पर भरे जाएँ| अनावश्यक निजीकरण न हो| कोई भी व्यक्ति अपने कार्यालय में विवश होकर या लालच में भी आठ घंटे से अधिक समय न बिताये| ओवरटाइम की व्यवस्था समाप्त हो| पूरे साल में कोई भी व्यक्ति अगर दो हजार घंटे पूरे कर ले उसे साल भर के सभी लाभ एक घंटे भी बिना कार्यालय जाए बाकि बचे हुए समय में मिलें| आप देखेंगे कि देश में न सिर्फ रोजगार बढ़ जायेगा बल्कि कार्यालय में जीवन काटते लोग, वास्तविक जिन्दगी जी पाएंगे|

विकास

यदि देश में समुचित विकास हो तो कोई कारण नहीं कि सभी रोजगार योग्य युवाओं को रोजगार न मिले| सोचिये अगर किसी समय एक लाख पदों के लिए भर्ती होनी हो और रोजगार योग्य कुल युवा भी एक लाख के आसपास हों| ऐसे में किसे आरक्षण की जरूरत होगी? जब भी कोई राजनेतिक दल आरक्षण के समर्थन या विरोध में कोई बात कहता है, वास्तव में वह विकास के प्रति अपनी द्रष्टिहीनता की घोषणा करता है| यही कारण है कि विकास का नारा लगाने वाले बड़े बड़े तुम्मन खां नेता आरक्षण का तुरुप  नारा अपनी वाणी में बनाये रखते हैं| ध्यान रहे की विकास किसी सरकारी फीताकाट योजना से नहीं आएगा, वरन उच्च शिक्षित युवाओं द्वारा प्रतियोगी माहौल में आगे बढ़कर काम करने से आएगा|

आपको को आश्चर्य होगा, मगर मुझे बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर और पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के अलावा कोई भी राजनेता सच में आरक्षण विरोधी नहीं लगा|

दिल्ली मेट्रो के दरवाजे इस स्टेशन पर नहीं खुलेंगे

दिल्ली मेट्रो के इस स्टेशन पर मेट्रो के दरवाजे नहीं खुलते| इस स्टेशन हर गेट पर ताला है| यह स्टेशन आज देश में बढ़ती बेरोजगारी और उसके सामने सरकारों की बेचारगी का प्रतीक है|

पिछले कई दिनों से ऐसा हो रहा है| जो लोग मेट्रो स्टेशन पहुँचते हैं उन्हें पता लगता है कि दरवाजे बंद हैं| जो लोग मेट्रो में सफ़र करते हैं उन्हें इस स्टेशन पर ही पता चलता है कि दरवाजे नहीं खुलेंगे| अक्सर लोग इस उद्घोषणा को सुन नहीं पाते| कानों में मोबाइल की ऊँगली डाले लोग अपने दुर्भाग्य के आगे बेबस हैं| यहाँ तक कि नौकरी ढूंढने जाते लोग, बेटे की नौकरी की दुआ करते लोग, आरक्षण का विरोध और समर्थन करते लोग सब बेबस हैं| लाला की नौकरी को गाली देते लोग, कपड़े की दुकान पर मैनेजमेंट का जलवा दिखाते लोग, तकनीकि महारत से गैर-तकनीकि काम करते लोग नहीं जानते कि दरवाजे क्यों बंद हैं| किसी को नहीं पता, कि सरकार उनसे डरी हुई है| किसी को नहीं पता कि सरकार उनसे क्यों डरी हुई है| किसी को नहीं पता कि एक “क्या, क्यों, कैसे” उनकी जिन्दगी में बहार ला सकता है| वो सरकार के सामने देश के करोड़ो बेरोगारों के नुमाइंदे बन सकते हैं|

अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारना इस देश का आदि धर्म है, राष्ट्रीय खेल है, राष्ट्रीय कर्तव्य है|

रेलवे को दो लाख श्रमशक्ति से वंचित कर घाटे में डाला जा रहा है| देश को पुलिस को दस लाख की श्रमशक्ति की कमी झेलने के लिए मजबूर किया गया है| देश के प्रधान न्यायालयों ने ही लगभग हज़ार श्रमशक्ति की कमी है| यहाँ तक कि देश की सेना में श्रमशक्ति की कमी की ख़बरें आती रहती है| देश के मात्र सरकारी संस्थान जिस श्रमशक्ति की कमी झेलने के लिए मजबूर हैं, लगभग उतने ही लोग देश में बेरोजगार हैं| क्या श्रमशक्ति के बिना देश तरक्की कर सकता है? शायद सरकारों को उम्मीद है किसी दिन देश के ये तमाम बेरोजगार हिमालय पर जाकर ताप करेंगे, ब्रह्मज्ञान अर्जित करेंगे और देश को तपशक्ति से विश्वशक्ति बना देंगे|

इस मेट्रो में यात्रा करते लोगों को पिछले पंद्रह दिन में नहीं पता कि दरवाजे क्यों नहीं खुलते| दरवाजे इसलिए नहीं खुलते क्योंकि सरकार को डर हैं कि आप नौकरी मांगने के लिए प्रदर्शन करते मुट्ठीभर देशद्रोहियों के साथ जाकर न खड़े हो जाएँ| वो मुट्ठीभर देशद्रोही जिनके साथ देश की संसद और विधानसभा में बैठा कोई शख्स नहीं हैं|

शौक बहराईची साहब का शेर है:

बर्बाद गुलिस्ताँ करने को बस एक ही उल्लू काफ़ी था
हर शाख़ पे उल्लू बैठा है अंजाम-ए-गुलिस्ताँ क्या होगा

अक्सर हम इसका मतलब नेता और अफसर से लगाते है, मगर इसका मतलब मतदाता से है| आप जो हैं, नेता इतने साल से आपको आपकी पहचान कराने में लगे हैं|

सम्बंधित ख़बरें:

http://www.business-standard.com/article/pti-stories/jln-metro-station-closed-due-to-student-protest-118030300372_1.html

http://www.newindianexpress.com/thesundaystandard/2018/mar/11/ssc-scam-protest-a-much-bigger-struggle-for-aspirants-1785135.html

सिलसिला जारी है…

राष्ट्रवाद बनाम मानवता

किसी देश का नागरिक होना मानव होने के बड़ा है, तो मानव जीवन पर धिक्कार है| दुनिया भर में तमाम कीट-पतंगे है तो अपने जन्म-स्थान के हाथ दो हाथ की दूरी अपने जीवन भर में यह नहीं करते, तमाम जानवर है जाने अनजाने अपने आपको निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में बांधे रहते हैं| मगर उन्हें खुद अपनी नस्ल और किसी दूसरी नस्ल की कोई परवाह नहीं होती| अगर आप मानव हैं तो आप अपनी, अपनी नस्ल की और तमाम प्रकृति की परवाह कर सकते हैं| मगर आप मानव हैं तो आपके पास वो सारे दुर्गुण भी हैं जो किसी और नस्ल के पास नहीं हैं| मानव झूठ, लालच फ़रेब और कमीनेपन की तमाम हरकतें कर सकता है| मानव जीवन के सबसे बड़े फरेबों में से धर्म और राष्ट्र हैं|

रहती दुनिया में अनेकों देश और धर्म बने, बनेगें, बिगड़ेंगे और दुनिया चलती रहगी| दुनिया का प्रकृति प्रदत्त नक्शा और मानव का प्रकृति प्रदत्त स्वभाव नहीं बदल सकता| मानव होना मानव की पहचान है|

राष्ट्र एक समूह के रूप में अपने हित रखता है| मगर राष्ट्रवाद हास्यास्पद परिकल्पना है| दुनिया के किसी भी राष्ट्र के नक्शे को आप एक हजार साल भी बिना बदले हुए नहीं देख सकते| आज भारत में राष्ट्रवाद का उबाल है| हर बात में राष्ट्रवाद को खड़ा किया जा रहा है| मगर हकीकत है की एक राष्ट्र के रूप में हमारे पास आज भी एक पक्का नक्शा नहीं है| भारत, पाकिस्तान और चीन जैसे बड़े बड़े देशों के अपनी सीमा को लेकर दावे और हकीकत में बहुत फर्क है| यहाँ तक की हमारी सेनाओं में राष्ट्रीय शुध्दता नहीं है| अगर राष्ट्र ही सब कुछ है तो भारतीय सेना में नेपाल की राष्ट्रीयता रखने वाले लोग कैसे हैं, कैसे अपने ओहदे से जुड़ी तमाम जिम्मेदारी वो लोग पूरी तरह निभा लेते हैं? कभी सोचा है?

राष्ट्रवाद किसी भी सत्ता के द्वारा फैलाये जाने वाला फ़रेब है, जो सत्ता की तमाम असफलताओं पर पर्दा डालने के लिए जनता में पैदा किया जाता रहा है| आजकल बड़े व्यापारी अपना माल बेचने और अपने ऊपर लगे आरोपों को नकारने के लिए भी राष्ट्रवाद का प्रयोग करते हैं| जो लोग थोड़ा टैक्स बचाने के लिए भारत की नागरिकता छोड़ देते हैं वो भी आम भारतियों के लिए राष्ट्रीयता के गाने गाते हैं| देश के तमाम बड़े व्यापारी, अभिनेता और करदाता भारत के नागरिक नहीं हैं| कर बचाने के लिए तमाम बड़े भारतीय लोग साल में छः महीने अलग अलग देशों में रहते हैं कि उन्हें आयकर विभाग भारत का आम निवासी न मान ले| भारत के पास बर्फीले पहाड़ों से लेकर गहरे समंदर तक तमाम नियामतें प्रकृति ने दी हैं, मगर भारत का राष्ट्रवादी समुदाय अक्सर छुट्टियों में देश से बाहर जाने के सपने देखता है| मुझे किसी से आपत्ति नहीं है| मगर जरूरत है, करनी में राष्ट्र का ध्यान रखने की| अगर आप अच्छे इंसान हैं तो धर्म और राष्ट्र मानव निर्मित हास्य हैं, उनपर विचार करने की आपको कोई जरूरत नहीं|

शाहजी पकौड़े वाले

कल बहुत दिनों बाद, फिर वो पकौड़ेवाला दिखाई दिया| मैंने उसे काफी इज्ज़त से अपने पास बुलाकर हालचाल पूछा और हालत – ए – हाजिरा पर उसका ख्याल जानना चाहा| कहने लगा, धंधे में पैसा तो कभी भी ज्यादा न था, रुपया कभी इस धंधे में देखा नहीं; मगर कुछ दिन से धंधे में इज्ज़त आ गई है| मैंने कहा, क्या पहले इज्ज़त नहीं थी| बोला, पहले केवल इज्जतदार लोग ही इज्ज़त दिया करते थे या फिर छोटे छोटे बच्चे| आजकल तो गली-कूचे में घूमते आवारा गुंडे मावली भी इज्ज़त देने लगे हैं| कहने लगा कि छठी गली का छुट्टा सांड बजरंगी भैया तो कभी कभी प्यार से बात करते करते पकौड़े बनाने के गुर सीखने लगा है| ख़ुशी से चहककर बोला भैया इस बार स्वतंत्र दिवस पर हम आपको गरम गरम जलेबी खिलाएंगे| मैंने पुछा, क्यों भाई? क्या अगस्त में बिटिया की शादी कर रहे हो| बोला नहीं भैया जी, सुना हैं मोदी सरकार उस दिन पकौड़े बेचने को भारत का राष्ट्रीय रोजगार घोषित कर देंगे| उस दिन से सब डाक्टर इंजीनियर डॉक्टर साइंटिस्ट सब लोग अपनी बेरोजगारी के दिनों में पकौड़े बेचा करेंगे| आप तो भैया, दिल्ली है कोर्ट के बाहर ही पकौड़े बेचना – वकील साहब पकौड़े वाले| और चिंता न करना, आपको गर्म गर्म पकौड़े हम बनवा कर भिजबा देंगे| आखिर इसने सारे लोग जब पकौड़े बेचेंगे तो कोई तो उन्हें पकौड़े बना बना कर सप्लाई करेगा|

अचानक, पुराने दिन याद करने लगा| बोला, जब अपने शहर के सरस्वती शिशु मंदिर में जब पढ़ते थे तो वहां के गुरूजी जलेबी बंटवाते थे गणतंत्र दिवस पर| इसबार गणतंत्र दिवस पर अपने शहर में था तो गुरूजी ढूंढते हुए आ पहुंचे| कहने लगे शाह जी, चलो.. बच्चों के लिए बीस किलो पकौड़े बना दो और पच्चीस किलो का बिल दे दो| मैंने कहा, गुरूजी पकौड़े चाहे पचास किलो बनवा लो मगर बिल की न कहो, एक तो हमको सात साल शिशु मंदिर रहकर नाम लिखना न आया तो बिल बनाने में तो ससुर हमको हाथरस जाकर ग्रेजुएशन करना पड़ेगा| गुरूजी बड़े प्यार से बोले, नालायक कितना कहा कि बात समझा करो| ये लो, बिल तो हम कम्पूटर से बना कर लाये हैं तुम इसपर अपनी चिड़िया मारो|

मैंने कहा, कि इस किस्से से एक फायदा हुआ कि तुम्हारा नाम हमें पता चल गया – शाह जी| कहने लगा… नाम तो अपना घासीलाल फौलादी है सरकार| वो तो आजकल हम सबको कहने लगे हैं कि जब मोदी जी अपने पापा की बनाई चाय लेकर स्टेशन पर चाय गरम चाय गरम चिल्लाते थे तो उनके पीछे पीछे हमारे बड़े भाई ताजा गरम पकौड़े का जोर लगाते घुमा करते थे| इसलिए आजलक लोग हमें अध्यक्ष जी का छोटा भाई समझने लगे हैं|