राष्ट्रवाद बनाम मानवता

किसी देश का नागरिक होना मानव होने के बड़ा है, तो मानव जीवन पर धिक्कार है| दुनिया भर में तमाम कीट-पतंगे है तो अपने जन्म-स्थान के हाथ दो हाथ की दूरी अपने जीवन भर में यह नहीं करते, तमाम जानवर है जाने अनजाने अपने आपको निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में बांधे रहते हैं| मगर उन्हें खुद अपनी नस्ल और किसी दूसरी नस्ल की कोई परवाह नहीं होती| अगर आप मानव हैं तो आप अपनी, अपनी नस्ल की और तमाम प्रकृति की परवाह कर सकते हैं| मगर आप मानव हैं तो आपके पास वो सारे दुर्गुण भी हैं जो किसी और नस्ल के पास नहीं हैं| मानव झूठ, लालच फ़रेब और कमीनेपन की तमाम हरकतें कर सकता है| मानव जीवन के सबसे बड़े फरेबों में से धर्म और राष्ट्र हैं|

रहती दुनिया में अनेकों देश और धर्म बने, बनेगें, बिगड़ेंगे और दुनिया चलती रहगी| दुनिया का प्रकृति प्रदत्त नक्शा और मानव का प्रकृति प्रदत्त स्वभाव नहीं बदल सकता| मानव होना मानव की पहचान है|

राष्ट्र एक समूह के रूप में अपने हित रखता है| मगर राष्ट्रवाद हास्यास्पद परिकल्पना है| दुनिया के किसी भी राष्ट्र के नक्शे को आप एक हजार साल भी बिना बदले हुए नहीं देख सकते| आज भारत में राष्ट्रवाद का उबाल है| हर बात में राष्ट्रवाद को खड़ा किया जा रहा है| मगर हकीकत है की एक राष्ट्र के रूप में हमारे पास आज भी एक पक्का नक्शा नहीं है| भारत, पाकिस्तान और चीन जैसे बड़े बड़े देशों के अपनी सीमा को लेकर दावे और हकीकत में बहुत फर्क है| यहाँ तक की हमारी सेनाओं में राष्ट्रीय शुध्दता नहीं है| अगर राष्ट्र ही सब कुछ है तो भारतीय सेना में नेपाल की राष्ट्रीयता रखने वाले लोग कैसे हैं, कैसे अपने ओहदे से जुड़ी तमाम जिम्मेदारी वो लोग पूरी तरह निभा लेते हैं? कभी सोचा है?

राष्ट्रवाद किसी भी सत्ता के द्वारा फैलाये जाने वाला फ़रेब है, जो सत्ता की तमाम असफलताओं पर पर्दा डालने के लिए जनता में पैदा किया जाता रहा है| आजकल बड़े व्यापारी अपना माल बेचने और अपने ऊपर लगे आरोपों को नकारने के लिए भी राष्ट्रवाद का प्रयोग करते हैं| जो लोग थोड़ा टैक्स बचाने के लिए भारत की नागरिकता छोड़ देते हैं वो भी आम भारतियों के लिए राष्ट्रीयता के गाने गाते हैं| देश के तमाम बड़े व्यापारी, अभिनेता और करदाता भारत के नागरिक नहीं हैं| कर बचाने के लिए तमाम बड़े भारतीय लोग साल में छः महीने अलग अलग देशों में रहते हैं कि उन्हें आयकर विभाग भारत का आम निवासी न मान ले| भारत के पास बर्फीले पहाड़ों से लेकर गहरे समंदर तक तमाम नियामतें प्रकृति ने दी हैं, मगर भारत का राष्ट्रवादी समुदाय अक्सर छुट्टियों में देश से बाहर जाने के सपने देखता है| मुझे किसी से आपत्ति नहीं है| मगर जरूरत है, करनी में राष्ट्र का ध्यान रखने की| अगर आप अच्छे इंसान हैं तो धर्म और राष्ट्र मानव निर्मित हास्य हैं, उनपर विचार करने की आपको कोई जरूरत नहीं|

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शाहजी पकौड़े वाले

कल बहुत दिनों बाद, फिर वो पकौड़ेवाला दिखाई दिया| मैंने उसे काफी इज्ज़त से अपने पास बुलाकर हालचाल पूछा और हालत – ए – हाजिरा पर उसका ख्याल जानना चाहा| कहने लगा, धंधे में पैसा तो कभी भी ज्यादा न था, रुपया कभी इस धंधे में देखा नहीं; मगर कुछ दिन से धंधे में इज्ज़त आ गई है| मैंने कहा, क्या पहले इज्ज़त नहीं थी| बोला, पहले केवल इज्जतदार लोग ही इज्ज़त दिया करते थे या फिर छोटे छोटे बच्चे| आजकल तो गली-कूचे में घूमते आवारा गुंडे मावली भी इज्ज़त देने लगे हैं| कहने लगा कि छठी गली का छुट्टा सांड बजरंगी भैया तो कभी कभी प्यार से बात करते करते पकौड़े बनाने के गुर सीखने लगा है| ख़ुशी से चहककर बोला भैया इस बार स्वतंत्र दिवस पर हम आपको गरम गरम जलेबी खिलाएंगे| मैंने पुछा, क्यों भाई? क्या अगस्त में बिटिया की शादी कर रहे हो| बोला नहीं भैया जी, सुना हैं मोदी सरकार उस दिन पकौड़े बेचने को भारत का राष्ट्रीय रोजगार घोषित कर देंगे| उस दिन से सब डाक्टर इंजीनियर डॉक्टर साइंटिस्ट सब लोग अपनी बेरोजगारी के दिनों में पकौड़े बेचा करेंगे| आप तो भैया, दिल्ली है कोर्ट के बाहर ही पकौड़े बेचना – वकील साहब पकौड़े वाले| और चिंता न करना, आपको गर्म गर्म पकौड़े हम बनवा कर भिजबा देंगे| आखिर इसने सारे लोग जब पकौड़े बेचेंगे तो कोई तो उन्हें पकौड़े बना बना कर सप्लाई करेगा|

अचानक, पुराने दिन याद करने लगा| बोला, जब अपने शहर के सरस्वती शिशु मंदिर में जब पढ़ते थे तो वहां के गुरूजी जलेबी बंटवाते थे गणतंत्र दिवस पर| इसबार गणतंत्र दिवस पर अपने शहर में था तो गुरूजी ढूंढते हुए आ पहुंचे| कहने लगे शाह जी, चलो.. बच्चों के लिए बीस किलो पकौड़े बना दो और पच्चीस किलो का बिल दे दो| मैंने कहा, गुरूजी पकौड़े चाहे पचास किलो बनवा लो मगर बिल की न कहो, एक तो हमको सात साल शिशु मंदिर रहकर नाम लिखना न आया तो बिल बनाने में तो ससुर हमको हाथरस जाकर ग्रेजुएशन करना पड़ेगा| गुरूजी बड़े प्यार से बोले, नालायक कितना कहा कि बात समझा करो| ये लो, बिल तो हम कम्पूटर से बना कर लाये हैं तुम इसपर अपनी चिड़िया मारो|

मैंने कहा, कि इस किस्से से एक फायदा हुआ कि तुम्हारा नाम हमें पता चल गया – शाह जी| कहने लगा… नाम तो अपना घासीलाल फौलादी है सरकार| वो तो आजकल हम सबको कहने लगे हैं कि जब मोदी जी अपने पापा की बनाई चाय लेकर स्टेशन पर चाय गरम चाय गरम चिल्लाते थे तो उनके पीछे पीछे हमारे बड़े भाई ताजा गरम पकौड़े का जोर लगाते घुमा करते थे| इसलिए आजलक लोग हमें अध्यक्ष जी का छोटा भाई समझने लगे हैं|

प्रदूषण का साल

दिल्ली में साल २०१७ प्रदूषण का साल रहा| हर साल बढ़ते प्रदूषण के लिए दिल्ली वाले नई नई दलीलें पेश करते हैं| इस दलीलों का कुल जमा मतलब यह होता है कि प्रदूषण का कारण दूसरे हैं, वो नहीं| इन दलीलों में दिल्ली वाले यह भूल जाते हैं कि प्रदूषण से बीमार पड़ना और मरना उनको है; दूसरों को नहीं|

मुझे साल २००५ में पहली बार बोला गया कि दिल्ली छोड़ कर किसी प्राकृतिक जगह में चले जाओ| मगर बहुत से कारण रहे, यह नहीं हो पाया| उस समय मुझे लाइलाज खाँसी का मरीज बताया गया| खैर, खाँसी का होमियोपैथी में इलाज हुआ और जो थोड़ा बहुत बचा था उसे देशी नुस्खे ने दूर कर दिया| दिल्ली में रहना आजकल एक अग्नि परीक्षा है| आज सुबह रोज इस उम्मीद में मोबाइल पर प्रदूषण का स्तर देखता हूँ कि शायद कम हो, मगर होता नहीं|

दशहरा के साथ जो ठंडक, उत्सव, मौज-मस्ती के जो दिन शुरू होते हैं वो मेरे लिए पस्ती के दिन बनने लगते हैं| नाक ढंकने के लिए कपड़े से लेकर मास्क तक का इंतजाम शुरू होने लगता है| फिर भी कुछ न कुछ चूक होती है| फ़िजाओं में फैला जहर कहीं न कहीं फेफड़ों तक पहुँचता ही है|

पिछले तीन हफ्ते से खाँसी से हाल बुरा रहा| बिना मास्क के घर से निकलने पर गले में खारिश और सीने में जलन होने लगती है| खाँसी से कमर टूट जाती है कई बार| इस दिसंबर में कमर में दर्द रहा| आज भी है| आँखों में जलन तो अब कहने की बात नहीं| यह सब शायद अकेले मुझे होता है| अगर बाकी लोगों को होता तो वो भी आवाज उठाते| अगर वो लोग गूंगे हैं, तो अपने बुढ़ापे तक बहरे और अंधे होने से कोई नहीं रोक सकता|

आप किसी भी राजनीतिक पार्टी से हों, पूछें तो सही पार्टी से क्या कर रहे हो उस देश या राज्य में जहाँ सत्ता में हो| अगर भाजपाई हो तो पूछो कि अगर सारा दोष राज्य का है तो उनकी दिल्ली सरकार बर्खास्त क्यों नहीं हो रही| अगर आप-पार्टी से हैं तो पूछे कि क्या कदम उठे| अगर राजनीति में गधे हो तो पूछो सब सरकारों से कि क्या कर रहे हो? कांग्रेस और कम्युनिस्ट से भी पूछो की सत्ता और विपक्ष में रहकर पर्यावरण पर तुम्हारे सरोकार क्या थे और हैं?

मगर मरने तक हम अपनी अपनी पार्टी को बचायेंगे, अपने अपने त्योहारों की कुरीतियों को बचायेंगे, अपने अपने धंधे के गंद छिपाएंगे| और किसी दिन खांसते खांसते एक गूंगी बहरी मौत मर जायेंगे|

जी तो पा नहीं रहे, आइये मिलकर मरें|

शरणार्थी और भारत

भारत को बहु-सांस्कृतिक सभ्यता बनाने में अलग अलग समुदायों का योगदान निर्विवादित है| हमारी अतिउप-संस्कृतियाँ महीन ताने-बानों से बनीं हैं| भारतीय सजातीय विवाहों में भी आधा समय इस बात में हंसी-ख़ुशी नष्ट हो जाता है कि वर-वधु पक्ष के रीति-रिवाज़ों में साम्य किस प्रकार बैठाया जाए| उप-संस्कृतियों के विकासक्रम में बहुत से तत्व रहे हैं, जिन्हें ठीक से न समझने वाला व्यक्ति विदेशी आक्रमणों से जोड़ कर शीघ्र निष्कर्ष पर पहुँच सकता है| परन्तु निर्विवाद रूप से हमारे उन-सांस्कृतिक विकास में अन्तराष्ट्रीय व्यापार और शरणार्थियों के योगदान को नकारा नहीं जा सकता|

अन्तराष्ट्रीय व्यापार के प्रमाण सिन्धु घाटी सभ्यता के समय से मिलने प्रारंभ हो जाते हैं| आक्रमण वाले सिद्धांत के विपरीत अन्तराष्ट्रीय व्यापार ने इस्लाम को अरब आक्रमणों से काफी पहले भारत पहुंचा दिया था|

भारत के सर्वांगीण विकास में शरणार्थियों का योगदान इनता मुखर और सामान्य स्वीकृत है कि हम उसपर विवेचना की ज़हमत नहीं उठाते| जिन शरणार्थियों को “खीर के एक कटोरे” से वचन में बाँट दिया गया था, उनका बेचा नमक आज सारा भारत खाता है| ग़दर के बाद भारत में आजादी की नियोजित लड़ाई का प्रारंभ करने वाली इंडियन नेशनल एसोसिएशन और उसके बाद इन्डियन नेशनल कांग्रेस के एक सह-संस्थापक दादा भाई नौरोजी उन्हीं पारसी शरणार्थियों के वंशज थे| आज जिन प्राचीन ईरानी कथा कहानियों को हम फारस और मुस्लिमों से जोड़ते हैं वो कदाचित पारसियों के साथ भारत चुकीं थीं|

भारत में पारसी अकेला समुदाय नहीं है जो शरणार्थी बनकर भारत आया| आजादी के बाद आये शरणार्थी तिब्बती समुदाय के साथ भी स्थानीय समाज के सामान्य रिश्ते हैं| बंटवारे के समय पाकिस्तान से आने वाले लोग भी वास्तव में शरणार्थी ही हैं| अफगान संकट के समय आने वाले अफगानों का भी भारत में शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व है|

पिछले कुछ दशकों में अक्सर बाहर से आने वाले शरणार्थियों को उपद्रव का कारण माना जा रहा है| यह उत्तरपूर्व में होने वाले त्रिकोणीय सामुदायिक संघर्ष के कारण है| देश के किसी क्षेत्र में शरणार्थियों का कैसा स्वागत होगा, इसमें क्षेत्रीय विकास महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है| आप उत्तरपूर्व भारत में अवैध बंगलादेशी आप्रवासियों का मुद्दा रोज सर उठाते देखेंगे| जबकि दिल्ली मुंबई के चुनावों में यह मुद्दा हाशिये से आगे नहीं बढ़ पाता| जब शरणार्थी (और रोजगार की तलाश में आने वाले लोग) देश के कम विकसित क्षेत्र में आकर रहते है, तब इस प्रकार के संघर्ष स्वाभाविक हैं| जहाँ संसाधनों सभी के लिए पूरे नहीं पड़ते| दलगत राजनीति इन संघर्षों की आड़ में अपनी नीतिगत खामियां छिपाने और वोट की फ़सल काटने का काम करती है|

रोहिंग्या शरणार्थियों को अवैध बताकर वापिस भेजा जा रहा है| अपनी मर्जी से तो लोग रोजगार के लिए भी अपनी जन्मभूमि नहीं छोड़ते| मुझे नहीं पता कि वैध शरणार्थी कैसे होते हैं? क्या उन्हें देश से भागने वाली सरकारें वीज़ा पासपोर्ट बनाकर भेजतीं हैं? क्या अपने देश से जान बचाकर भागता भूखा नंगा आदमी आपको डरा देता है? क्या इस बात के प्रबंध नहीं हो सकते कि उनपर दया और निगाह एक साथ रखी जा सके|

 

पुनश्च – शरणार्थियों के अपने राजनीतक महत्व भी हैं, अगर पाकिस्तान के शरणार्थी भारत न आने दिए गए तो शायद दक्षिण भारत का इतिहास अलग होता| इस पर हो सका तो फिर कभी|

मेरा वाला संत

मामला यह है ही नहीं कि कोई व्यक्ति संत है या नहीं है| सोशल मीडिया पर सारा मामला “मेरा वाला संत” का है| गलतियाँ, पाप, सजाएं और प्रायश्चित सामान्य से लेकर संत व्यक्ति को लगे ही रहते है| मानव है तो उसके पास मन भी है, गुण अवगुण भी| पहले भी संत, महंत, सन्यासियों, साधुओं ने अपराध किये हैं और सजाएँ भी होती रही है| सांसारिक प्रलोभन से तो महर्षि विश्वामित्र भी नहीं बच पाए थे, आजकल वाले तो अभी अध्यात्म के शुरुवाती पायदान पर हैं|

आजकल धर्मगुरु धर्मसत्ता, राजसत्ता, अर्थसत्ता के उच्चासन पर विराजमान हैं| समय और देश की सीमा के परे मानवमात्र की सोचने वाले धर्मगुरु देशप्रेम और युद्धशांति जैसे विषय में भाषण-विज्ञापन देते हैं| ब्रह्मचर्य से लेकर कंडोम तक बेच सकने वाले यह धर्मगुरु अपने समर्थकों का तन-मन-धन समर्थन रखते हैं| सत्ता की यह उच्चता ही उन्हें निरंकुश बनाती है| उन्हें पता है सत्ता दुरूपयोग के विरूद्ध खड़ा होने वाला कोई नहीं है| कारण – श्रृद्धा| जिसे हम अंध-श्रृद्धा कहते हैं वह आपके धर्मगुरु के शब्द में श्रृद्धा है| जिस समय कोई धर्मगुरु या उसका अनुयायी आपको प्रश्न करने से रोक दे तो यह अंध-श्रृद्धा है| जब आप आदर या श्रृद्धा के कारण अपने आप प्रश्न करने से रुक जाएँ तो भी यह अंध-श्रृद्धा है| अब आप किसी प्रश्न का उत्तर बिना किसी ख़ोजबीन के खुद ही देने लगें तो अंध-श्रृद्धा है| जब आपका गुरु समझ ले की आप श्रृद्धालू हैं तो समझ लें आप अंध-श्रृद्धालू हैं| अन्य लोगों की धर्मगुरु जिज्ञासू कह सकते हैं, श्रृद्धालू नहीं|

समर्थक और विरोधी प्रायः धर्मगुरुओं के अपराधों और घोटालों पर प्रश्न नहीं करते| बलात्कार और हत्या यदा-कदा अपवाद हैं| बलात्कार और हत्या दो आरोप हैं जिनपर श्रृद्धालू नकार भाव रखते हैं| देश के भारीभरकम धर्मगुरुओं द्वारा अपने गुरुओं या धर्मभाईयों को मरवाने के चटक चर्चे आश्रमों में घूमते रहते हैं और किस्सों की तरह मीडिया में भी| जो स्त्री-पुरुष तन का समर्पण रखते हैं, उन्हें कृपा मिलती रहती हैं| अन्य पाप के भागी, बलात्कार का शिकार कहलाते हैं| जो दोषी करार दिया जाए, मात्र उसपर ही हम प्रश्न करते हैं| जब भी यह अपराध हमारे “मेरे वाले धर्मगुरु” के नाम नहीं चढ़ता, हम उसके नाम का नमक बाजार से खरीदते खाते रहते हैं|

 

नीम का पेड़

नीम का पेड़ पढ़ते हुए आपको हिन्दुस्तान की उस राजनीति दांव –पेंच देखने को मिलते हैं, जो आजादी के बाद पैदा हुई| हमारी हिन्दुस्तानी सियासत कोई शतरंज की बिसात नहीं है कि आप मोहरों की अपनी कोई बंधी बंधी औकात हो| यहाँ तो प्यादे का व़जीर होना लाजमी है| व़जीर की तो कहते हैं औकात ही नहीं होती, केवल कीमत होती है| यूँ नीम का पेड़ सियासत और वजारत की कहानी नहीं होनी चाहिए थी, मगर हिन्दुस्तानी, खासकर गंगा- जमुनी दो-आब के पानी रंग ही कुछ ऐसा है सियासत की तो सुबह लोग दातून करते हैं| ऐसे में नीम के पेड़ की क्या बिसात, ये तो उस लोगों का कसूर है जो आते जाते उसे नीचे बतकही करते रहे होंगे| वर्ना तो जिस आँगन में उसने अपनी तमाम उम्र गुज़ारी वहां गुजरा तो गुजरा कुछ होगा|

नीम का पेड़ इस उपन्यास में शायद अकेला ऐसा शख्स है, जो आज के ज़माने में नहीं पहचाना जा सकता| रही मासूम रज़ा की यहीं मासूमियत रही कि उन्होंने एक पेड़ को सूत्रधार होने का मौका दिया| यहीं काम अगर उस कलई के उस पुराने लोटे बुधई के आंगन में पड़ा रहा करता होगा, तो आप पहचान जाते कि ये कौन है| उस लोटे और उसकी घिसी हुई पैंदी का जिक्र न करकर रज़ा साहब ने इस देश की सियासत के पालतू टट्टुओं के साथ न इंसाफी कर दी है| आदर्शवादी लोगों से अक्सर ऐसी गलतियाँ हो जातीं हैं|

ये कहानी उन दो पुराने रिश्तेदारों की है, जिनको जमींदारी के बैठे ठाले दिनों में सियासत खेलने का चस्का लगा होगा| जमींदारी जाती रही| जमींदारों और नबाबों को लगा कि बदल कर ओहदों का नाम बदलकर विधायकी और सांसदी में तब्दील हो गया है| हुआ दरअसल यूँ उलट कि विधायकी और सांसदी जमींदारी और नबाबी बन गई| बदलते वक़्त के साथ, नए प्यादे आते गए, वजारत बदलती रहीं और व़जीर बिकते रहे|

नीम के पेड़ की कहानी इतनी सरल है कि आप गौर भी नहीं करते कि सियासत में दांव खेल कौन रहा है| कहानी बदलते हिंदुस्तान की जमीन से उठती है| यह कहानी इन वादों का इशारा करती है जिनके बूते वोट खींच लिए जाते है| यह कहानी उस आदर्शवाद जिसके जीतने की हम उम्मीद करते हैं|

पुस्तक – नीम का पेड़

लेखक – राही मासूम रज़ा

प्रकाशक – राजकमल प्रकाशन

प्रकाशन वर्ष – 2003

विधा – उपन्यास

इस्ब्न – 978-81-267-0861-1

पृष्ठ संख्या – 350

मूल्य – 350 रुपये

अवैध चाय

अवैध चाय – हंसने का मन करता है न? अवैध चाय!!

सच्चाई यह है कि भारत में हर कार्यालय, विद्यालय, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय, गली, कूचे, मार्ग, महामार्ग, हाट, बाजार, सिनेमाघर और माल में अवैध चाय मिलती है| अवैध चाय का अवैध धंधा पिछले पांच-छः साल से धड़ल्ले से चल रहा है| पिछले पांच-छः साल क्यों?

क्यों पिछले पाँच-छः साल से सरकार ने हर खाने पीने की चीज़ बेचने के लिए एक पंजीकरण जरूरी कर दिया है| कुछ मामलों में पंजीकरण नहीं, बल्कि अनुमति-पत्र (लाइसेंस) जरूरी है| बिना पंजीकरण या अनुमति-पत्र के बनाये गए पेय और खाने को अवैध कहा जायेगा| वैसे दवाइयों के मामलें में इस तरह की दवाओं को सामान्यतः नकली कहा जाता है| आपके खाने को फिलहाल नकली नहीं कहा जा रहा|

मामला इतना संगीन हैं कि आपके ऑफिस में लगी चाय-कॉफ़ी की मशीन भी “शायद” अवैध है| अगर आप पुरानी दिल्ली/लखनऊ/हैदराबाद/कोई भी और शहर के किसी पुराने प्रसिद्ध भोजनालय में खाना खाते हैं तो हो सकता हैं, आप अवैध खाना खा रहे हैं|

मामला यहाँ तक नहीं रुकता| क्योंकि हिन्दुस्तानी होने के नाते आप दावत तो हर साल करते ही हैं| नहीं जनाब, मैं दारू पार्टी की बात नहीं कर रहा, जिसके अवैध होने का हर पार्टी-बाज दारूबाज को पता है| मैं बात कर रहा हूँ, शुद्ध सात्विक भोज/दावतों की, जिन्हें आप विवाह-भोज और ब्रह्म-भोज कहते हैं| आप जो पुरानी जान पहचान वाला खानदानी हलवाई पकड़ लाते हैं खाना बनाने के लिए, वो अवैध है|

यह वो कानून नहीं है, जिसके चलते देश के ७४ बड़े बूचडखाने गाय का मांस विदेश में बेचकर देश के लिए जरूरी विदेशी मुद्रा लाते हैं|

तो, अब ये कौन सा कानून है? यह वही क़ानून हैं जिसमें भारी-भरकम कंपनी की विलायती सिवईयां यानि नूडल बंद होने पर देश के हर चाय-पान वाले ने तालियाँ बजायीं थीं| यह वह क़ानून हैं जिसकी असली नकली मुहर (संख्या) खाना-पीना बनाने के सब सामान के पैकेट से लेकर डिब्बाबंद चाय-कॉफ़ी-टॉफ़ी-बिस्कुट-पिज़्ज़ा-बर्गर पर लगी होती है| यह वही कानून हैं, जिसकी मुहर (संख्या) बड़े बड़े होटल और भोजनालय के बिल पर पाई जाती है| यह वही क़ानून हैं, जिस में पंजीकरण न होने के कारण छोटे मोटे बूचडखाने जो देश की जनता के लिये मांस पैदा करते हैं, वो बंद किये जा रहे हैं|

आज बूचड़खाने बंद होंगे, कल सलाद की दूकान| और जब चाय-पान की दुकान बंद होगी तो आप सोचेंगें.. रहने दीजिये, कुछ नहीं सोचेंगें|

गौमांस के विरोध के चलते, देश का सारा मांस बंद हो रहा हैं, कल रबड़ी-फलूदा बंद हो जाए तो क्या दिक्कत है|

इस पोस्ट का मकसद हंगामा खड़ा करना नहीं है| देश के हर छोटे बड़े व्यवसायी के पास मौका है कि अपनी दूकान, होटल, रेस्टोरंट, ढाबा, ठेल, तख़्त, या चूल्हे का स्थाई पता और अपना पहचान पत्र देकर अपना पंजीकरण कराये| इस से आगे मैं क्या सलाह दे सकता हूँ? आप समझदार हैं|

टिपण्णी – इस आलेख में कही गई बातें कानूनी सलाह या निष्कर्ष नहीं हैं वरन हल्के फुल्के ढ़ंग से बेहद जटिल क़ानून समझाने का प्रयास है| कृपया, उचित कानूनी सलाह अवश्य लें|

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A post shared by ऐश्वर्य मोहन गहराना (@aishwaryamgahrana) on