नीम का पेड़

नीम का पेड़ पढ़ते हुए आपको हिन्दुस्तान की उस राजनीति दांव –पेंच देखने को मिलते हैं, जो आजादी के बाद पैदा हुई| हमारी हिन्दुस्तानी सियासत कोई शतरंज की बिसात नहीं है कि आप मोहरों की अपनी कोई बंधी बंधी औकात हो| यहाँ तो प्यादे का व़जीर होना लाजमी है| व़जीर की तो कहते हैं औकात ही नहीं होती, केवल कीमत होती है| यूँ नीम का पेड़ सियासत और वजारत की कहानी नहीं होनी चाहिए थी, मगर हिन्दुस्तानी, खासकर गंगा- जमुनी दो-आब के पानी रंग ही कुछ ऐसा है सियासत की तो सुबह लोग दातून करते हैं| ऐसे में नीम के पेड़ की क्या बिसात, ये तो उस लोगों का कसूर है जो आते जाते उसे नीचे बतकही करते रहे होंगे| वर्ना तो जिस आँगन में उसने अपनी तमाम उम्र गुज़ारी वहां गुजरा तो गुजरा कुछ होगा|

नीम का पेड़ इस उपन्यास में शायद अकेला ऐसा शख्स है, जो आज के ज़माने में नहीं पहचाना जा सकता| रही मासूम रज़ा की यहीं मासूमियत रही कि उन्होंने एक पेड़ को सूत्रधार होने का मौका दिया| यहीं काम अगर उस कलई के उस पुराने लोटे बुधई के आंगन में पड़ा रहा करता होगा, तो आप पहचान जाते कि ये कौन है| उस लोटे और उसकी घिसी हुई पैंदी का जिक्र न करकर रज़ा साहब ने इस देश की सियासत के पालतू टट्टुओं के साथ न इंसाफी कर दी है| आदर्शवादी लोगों से अक्सर ऐसी गलतियाँ हो जातीं हैं|

ये कहानी उन दो पुराने रिश्तेदारों की है, जिनको जमींदारी के बैठे ठाले दिनों में सियासत खेलने का चस्का लगा होगा| जमींदारी जाती रही| जमींदारों और नबाबों को लगा कि बदल कर ओहदों का नाम बदलकर विधायकी और सांसदी में तब्दील हो गया है| हुआ दरअसल यूँ उलट कि विधायकी और सांसदी जमींदारी और नबाबी बन गई| बदलते वक़्त के साथ, नए प्यादे आते गए, वजारत बदलती रहीं और व़जीर बिकते रहे|

नीम के पेड़ की कहानी इतनी सरल है कि आप गौर भी नहीं करते कि सियासत में दांव खेल कौन रहा है| कहानी बदलते हिंदुस्तान की जमीन से उठती है| यह कहानी इन वादों का इशारा करती है जिनके बूते वोट खींच लिए जाते है| यह कहानी उस आदर्शवाद जिसके जीतने की हम उम्मीद करते हैं|

पुस्तक – नीम का पेड़

लेखक – राही मासूम रज़ा

प्रकाशक – राजकमल प्रकाशन

प्रकाशन वर्ष – 2003

विधा – उपन्यास

इस्ब्न – 978-81-267-0861-1

पृष्ठ संख्या – 350

मूल्य – 350 रुपये

अवैध चाय

अवैध चाय – हंसने का मन करता है न? अवैध चाय!!

सच्चाई यह है कि भारत में हर कार्यालय, विद्यालय, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय, गली, कूचे, मार्ग, महामार्ग, हाट, बाजार, सिनेमाघर और माल में अवैध चाय मिलती है| अवैध चाय का अवैध धंधा पिछले पांच-छः साल से धड़ल्ले से चल रहा है| पिछले पांच-छः साल क्यों?

क्यों पिछले पाँच-छः साल से सरकार ने हर खाने पीने की चीज़ बेचने के लिए एक पंजीकरण जरूरी कर दिया है| कुछ मामलों में पंजीकरण नहीं, बल्कि अनुमति-पत्र (लाइसेंस) जरूरी है| बिना पंजीकरण या अनुमति-पत्र के बनाये गए पेय और खाने को अवैध कहा जायेगा| वैसे दवाइयों के मामलें में इस तरह की दवाओं को सामान्यतः नकली कहा जाता है| आपके खाने को फिलहाल नकली नहीं कहा जा रहा|

मामला इतना संगीन हैं कि आपके ऑफिस में लगी चाय-कॉफ़ी की मशीन भी “शायद” अवैध है| अगर आप पुरानी दिल्ली/लखनऊ/हैदराबाद/कोई भी और शहर के किसी पुराने प्रसिद्ध भोजनालय में खाना खाते हैं तो हो सकता हैं, आप अवैध खाना खा रहे हैं|

मामला यहाँ तक नहीं रुकता| क्योंकि हिन्दुस्तानी होने के नाते आप दावत तो हर साल करते ही हैं| नहीं जनाब, मैं दारू पार्टी की बात नहीं कर रहा, जिसके अवैध होने का हर पार्टी-बाज दारूबाज को पता है| मैं बात कर रहा हूँ, शुद्ध सात्विक भोज/दावतों की, जिन्हें आप विवाह-भोज और ब्रह्म-भोज कहते हैं| आप जो पुरानी जान पहचान वाला खानदानी हलवाई पकड़ लाते हैं खाना बनाने के लिए, वो अवैध है|

यह वो कानून नहीं है, जिसके चलते देश के ७४ बड़े बूचडखाने गाय का मांस विदेश में बेचकर देश के लिए जरूरी विदेशी मुद्रा लाते हैं|

तो, अब ये कौन सा कानून है? यह वही क़ानून हैं जिसमें भारी-भरकम कंपनी की विलायती सिवईयां यानि नूडल बंद होने पर देश के हर चाय-पान वाले ने तालियाँ बजायीं थीं| यह वह क़ानून हैं जिसकी असली नकली मुहर (संख्या) खाना-पीना बनाने के सब सामान के पैकेट से लेकर डिब्बाबंद चाय-कॉफ़ी-टॉफ़ी-बिस्कुट-पिज़्ज़ा-बर्गर पर लगी होती है| यह वही कानून हैं, जिसकी मुहर (संख्या) बड़े बड़े होटल और भोजनालय के बिल पर पाई जाती है| यह वही क़ानून हैं, जिस में पंजीकरण न होने के कारण छोटे मोटे बूचडखाने जो देश की जनता के लिये मांस पैदा करते हैं, वो बंद किये जा रहे हैं|

आज बूचड़खाने बंद होंगे, कल सलाद की दूकान| और जब चाय-पान की दुकान बंद होगी तो आप सोचेंगें.. रहने दीजिये, कुछ नहीं सोचेंगें|

गौमांस के विरोध के चलते, देश का सारा मांस बंद हो रहा हैं, कल रबड़ी-फलूदा बंद हो जाए तो क्या दिक्कत है|

इस पोस्ट का मकसद हंगामा खड़ा करना नहीं है| देश के हर छोटे बड़े व्यवसायी के पास मौका है कि अपनी दूकान, होटल, रेस्टोरंट, ढाबा, ठेल, तख़्त, या चूल्हे का स्थाई पता और अपना पहचान पत्र देकर अपना पंजीकरण कराये| इस से आगे मैं क्या सलाह दे सकता हूँ? आप समझदार हैं|

टिपण्णी – इस आलेख में कही गई बातें कानूनी सलाह या निष्कर्ष नहीं हैं वरन हल्के फुल्के ढ़ंग से बेहद जटिल क़ानून समझाने का प्रयास है| कृपया, उचित कानूनी सलाह अवश्य लें|

#Tea #ChaBar #OxfordBookStore #_soidelhi

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खिचड़ी-भोग

खिचड़ी भोग भी अपने आप में एक मुहावरा है| हर किसी को पकी पकाई खीर खिचड़ी चाहिए| कोई पकाना नहीं चाहता| यह मुहावरा शायद उस जमाने में बना होगा जब खिचड़ी देग दम करके बनती होगी| आजकल तो प्रेशर कुकर का जमाना है मगर वक्त है कि आज भी कम पड़ता है| हमारे कुछ मित्र तो उस दिन का इंतजार कर रहे है जिस दिन कोई पकी पकी खिचड़ी फेसबुक या व्हाट्सएप पर भेज दे और वो उसका लुफ्त उठा लें|

हमारे बहुत से गीताप्रेमी मित्र बनिए की दुकान पर टंगा गीतासार पढ़कर बड़े हुए| आजकल उसकी फ़ोटो मोबाइल में देखकर वेद-वेदांग के ज्ञाता हुए जाते हैं| हमारे एक मित्र मोदी-मार्ग पर चलने का उपदेश रोज भेज देते थे| आजकल शांत हैं, उन्होंने मोदी-मार्ग घर के दामाद जी को भी भेजा था और उन्होंने इसे ग्रहण कर लिया| एक अन्य मित्र माताजी के स्नेह-दोष के कारण भारतीय सेना की सेवा न कर पाए आजकल रोज दो चार पाकिस्तानी चटका देते हैं|

उधर, कामरेड रोज इतनी क्रांति करते हैं कि सड़क पर उतरने और अपने कैडर से बात करने का वक़्त नहीं निकलता| उनकी अभिव्यक्ति की आजादी भी आजकल ट्विटर-फेसबुक वाले भैया के हाथ गिरवी पड़ी है, गाहे – बगाहे लुपलुपाती रहती है|

एक मित्र ने सावरकर के नाम पर गौहत्या रोकने की मांग कर रहे थे| मैंने बोला कि सावरकर गाय को पशु मानते थे, माता नहीं| दो चार छंद सुना कर बोले; गौहत्या विरोध का आन्दोलन किसने शुरू किया| अठारवीं शताब्दी के स्वामी दयानंद सरस्वती का नाम लेने पर बोले आज से उनकी भक्ति| उनके हाथ सत्यार्थ प्रकाश थमा कर मुड़ा ही था कि उनकी जिव्हा पर पुनः सरस्वती विराजमान हो गई| एक दिन दोबारा मिलने अपर पूछने लगे, आप भगतसिंह को क्या मानते हैं| जानता था, कहाँ लपेटेंगे; जबाब दिया नास्तिक| उनका दिमाग भन्ना गया| “मैं नास्तिक क्यों हूँ” पकड़ाकर विदा किया| आजकल कन्नी काटने लगे हैं|

आजकल मित्र लोग मुझसे कानूनी बातों पर ही बात करते हैं| मगर नुक्ता निकल ही आता है| खैर, उसकी बातें फिर कभी| मुझे आज खाने में खिचड़ी बनानी है|

 

अकबर

अकबर का दौर अजीब हालत का दौर था| एक बदहवास सा मुल्क सकूं की तरफ बढ़ता है| अपनी लम्बी पारी से भी और बहुत लम्बी पारी खेलने की चाह में अबुल मुज़फ्फर जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर बादशाह ने अपनी हालत कुछ अजीब ही कर ली थी| यह उपन्यास उस “हालत –ए – अजीब” से शुरू होता है, जिसमें बादशाह सलामत कह उठे थे – “गाइ है सु हिंदू खावो और मुसलमान सूअर खावो|” यह वो शब्द है जिनको मूँह से निकलने पर तब और आज सिर्फ जुबां नहीं, सिर कट सकते हैं, और तख़्त बदल उठते हैं| यह वो बादशाह अकबर है, जिन्हें न सिर्फ पूर्व जन्म में शंकराचार्य के श्रेष्ठ ब्राह्मण कुल में जन्मे मुकुंद ब्राह्मण का अवतार बताया गया बल्कि जो खुद “अल्लाहो अकबर” को नए अर्थ देने की कोशिश में पाया गया| यह वो अकबर बादशाह है जो बाद में “दीन – ए- इलाही” की शुरुआत करता है और छोड़ सा देता है| वह बादशाह अकबर जो, “जैसे जिए वैसे मरे| ना किसी को पता किस दीन में जिए, ना किसी को पता किस दीन में मरे|”

यूँ; पुस्तक को पढ़ने और पसंद करने के बाद भी इसकी विधा के बारे में सोचना पड़ता है | हालांकि लेखक प्रकाशक इसे उपन्यास कहते हैं| मैं इसे ऐतिहासिक विवरण कहूँगा| हम सबको पढ़ना चाहिए| हिंदी में ऐतिहासिक उपन्यास बहुत है| शाज़ी ज़मां का “अकबर” इतिहास का पुनर्लेख है जिसे औपन्यासिकता प्रदान करने का कठिन प्रयास लेखक ने किया है| वो कुछ हद तक सफल होते होते असफल हो जाते हैं| असफल इसलिए कि आप पाठक इस से ऊब जाता है| तमाम प्रसंगों में सन्दर्भों की भरमार है| बकौल शाज़ी ज़मां, “इस उपन्यास की एक-एक घटना, एक-एक किरदार, एक-एक संवाद इतिहास पर आधारित है|”

समय, सनक और समझ से जूझते अकबर बादशाह की टक्कर पर हिंदुस्तान में डेढ़ हजार साल पहले सम्राट अशोक का जिक्र आता है| इन दो से बेहतर नाम महाकाव्यों में ही मिल सकते हैं| अकबर की जिन्दगी के ऊँचे नीचे पहलू इस विवरण में आए है जिनमें से एक को, इस पुस्तक को बाजार में बेचने के लिए भी उछाला गया था – अकबर के मूंह से निकली एक गाली जिसे तमाम हिंदुस्तान आज भी देता है| पुस्तक अकबर को उसके समकालीन लेखकों और इतिहासकारों के नज़रिए से हमारे सामने रखती है| अकबर के समकालीन इतिहास की जानने समझने के लिए यह महत्वपूर्ण विवरण प्रदान करती है| साथ है, हिंदुस्तान का अपना माहौल आज भी कुछ ज्यादा नहीं बदला है इसे समझा जा सकता है|

यह विवरण उपन्यास तो नहीं बन पाया है साथ ही उन महत्वपूर्ण बातों से नज़र चुराता सा निकल गया है जिन्हें इसके पत्रकार – इतिहासकार लेखक छु सकते थे| मसलन अकबर के हिंदुस्तान का फ़ारस, तुर्की, पुर्तगाल और पोप के साथ रिश्ता तो चर्चा में आता है; मगर उन हालत के बारे में टीस छोड़ जाता है जो तुर्की और इस्लाम के यूरोप और ईसाइयत से रिश्ते की वजह से पैदा हुए थे और नतीजतन हिंदुस्तान और दुनिया की तारीफ में बहुत उठापटक हुई| अकबर के जाने के बाद का दौर, धर्मतंत्र और राजतन्त्र के कमजोर होने का दौर भी था जिसने बाद में संविधानों और राष्ट्रों के लिए रास्ता खोल दिया था|

कुल मिला कर किस्सा यह शेख़ अबुल फ़ज़ल के अकबरनामा और मुल्ला अब्दुल क़ादिर बदायूंनी के ख़ुफ़िया मुन्तखबुत्तावारीख के इर्द गिर्द बुना गया है और इसमें तमाम लेखकों और इतिहासकारों की लिखत को रंगतभरे खुशबूदार मसालों के साथ परोसा गया है|

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पुस्तक – अकबर

लेखक – शाज़ी ज़मां

प्रकाशक – राजकमल प्रकाशन

प्रकाशन वर्ष – 2016

विधा – उपन्यास

इस्ब्न – 978-81-267-2953-1

पृष्ठ संख्या – 350

मूल्य – 350 रुपये

 

प्यारे तस्कर

तस्कर, यह शब्द भारतियों के रौंगटे खड़े करने के लिए काफी है| भारत हत्यारों के बाद तस्करों से ही सबसे ज्यादा घृणा करता है, बलात्कारियों के भी ज्यादा| हम उन्हें देश का दुश्मन मानते हैं| अपराध की दुनिया के बादशाह – एक खूंखार अपराधी|

आखिर तस्कर होते कौन है? व्यापारी, जो अपने व्यापार पर कर (टैक्स) भुगतान नहीं करते| क्या इसमें भेदभाव करेंगे कि व्यापारी कौन सा कर नहीं दे रहा? सीमाकर (कस्टम ड्यूटी) न देने वाला तस्कर,! उत्पादकर (एक्साइज ड्यूटी) न देने वाला – विकास का कर्णधार!! बिक्रीकर न देने वाला विकास का वाहक!!! कैसा करभेद है? वास्तव में हम कारचोरों से प्रेम करते हैं… बस कुछेक को छोड़कर|

यह सभी उदाहरण अप्रत्यक्ष कर के हैं, जहाँ किसी करचोर को खुद कर नहीं देना होता बल्कि गरीब जनता से वसूलना होता है| क्या इन करचोरों में आपस में कोई अंतर है? क्या सब करचोर देश को खोखला नहीं करते? आइये कुतर्क करें| अपने प्रिय करचोरों का समर्थन करें|

एक होते हैं प्रत्यक्षकरचोर| इन्हें पता होता है कि करचोरी कर रहे हैं| मगर टैक्सबेस, हमारी मेहनत की कमाई मेहनत न करने वालों में मत बांटों जैसे बकवास बातों में यह सबको उलझाये रखते है| भारत में तीस प्रतिशत दर से कर देने में इनको नानी याद आती है, मगर साठ प्रतिशत की दर से कर लेने वाले देशों का विकास मांगते हैं| यह वो लुटेरे हैं जो भूल जाते हैं कि इनकी कमाई में देश का भी योगदान हैं वर्ना सोमालिया में जाकर कमाई कर कर दिखा दें| दुनिया का कोई देश कर के बिना विकसित नहीं हुआ| टैक्सबेस बढ़ाने की बातें कर चोरों और उन के पालतू राजनीतिक दलों की जुमलेबाजी है| अगर सरकारें कराधार – टैक्सबेस बढ़ाने के कल्पित ख्याल की जगह वर्तमान कर चोरों से निपट ले तो पाने आप टैक्सबेस बढ़ जाएगा|

मगर हमें तो करचोर पसंद है – तस्करों को छोड़कर|

आइये इस वर्ष के बजट भाषण का पैरा 141 पढ़े और गर्व करें|

सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे मरन्तु मोक्षं

चलिए सतयुग आ गया| सतयुग तो आ ही गया है| कालचक्र का यह आगमन तो सुनिश्चित ही था|

सतयुग वही समय तो है जब प्रत्येक मनुष्य सदेच्छा रखता है| आपको हल्की सी छींक आते है, प्रत्येक मानव मात्र आपके स्वास्थ्य के लिए अपनी चिंता, संवेदना और सदेच्छा वयक्त करता है – गॉड ब्लेस यू| प्रत्येक मनुष्य अपने धुर विरोधी का भी भविष्य उज्जवल देखना चाहता है| कुछ मित्र तो प्रतिदिन नियम पूर्वक प्रत्येक प्रातः के प्रत्येक के लिए शुभ होने की कामना करते करते ही महायोगी का जीवन जीते हैं| एक मित्र हर ज्ञात अज्ञात त्यौहार पर अपनी शुभकामनाओं का अकूत भण्डार भारत सरकार की किसी सरकारी अनुदान योजना की तरह रोज लुटा देते हैं| एक मित्र तो इतने शुभकामी हैं कि मुहर्रम पर भी नहीं चूकते – चार बाँस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण, ता ऊपर सुल्तान है, मत चूको चौहान  |

जब भी किसी मौसमी रोग – महारोग – महामारी का मौसम आता है तो दादी- नानी- परनानी की औषधियों से लेकर भविष्यतः दो सह्स्त्रब्धियों की औषधियों का महाज्ञान मित्र से प्राप्त होता है| किसी ज्ञात अज्ञात मृत अर्धमृत अमृत किसी भी मृत्यु पर मोक्ष की सदेच्छा का सन्देश देते रहना उनका प्रिय पुण्य है| जब एक परिचित सज्जन ने देवलोकगमन किया तो सन्देश मिलते ही उन्होंने जन्मजन्मान्तर से मुक्ति और मोक्ष की महाकामना के बाद ही जलपान चाय स्वीकार की| चाय सेवन के दौरान जब उनके पास शोक व्यक्त करने के अनंत सन्देश आने लगे तो पता चला कि देव्लोकगामी सज्जन कोई अन्य नहीं स्वयं उनके पिता है|

सतयुग में अप्सराएँ न हों तो क्या हो? रात्रिकाल एक दो कन्यायें तो निर्बाध रूप से शुभरात्रि और शुभस्वप्न के सन्देश दे ही देतीं है| सतयुग में स्वप्नदोष तो लगा ही रहता है|

जब से भारत में सूचनाक्रांति हुई है, सतयुग कर – कर मोबाइल – मोबाइल होता हुआ घर – घर आ पहुंचा है| किसी राजशिरोमणि का वचन नहीं, कि आप अच्छे दिन की प्रतीक्षा करते करते मोक्ष प्राप्त कर जाते| यह सतयुग ही तो अच्छे दिन है| आपका वचन पूरा होता है, पराक्रमी| तकनीकि सूचना की दूसरी पीढ़ी वाला महायज्ञ अश्वमेध यज्ञ की भांति समस्त भारतवर्ष में सूचना क्रांति के अश्व आज भी दौड़ा रहा है| आज उसकी पांचवी पीढ़ी अपनी महापताका लेकर क्रांति के युद्धस्थल की ओर अग्रसर है| हर कोई भारतवासी प्रत्येक जीवित के लिए शुभकामना और प्रत्येक मृत के लिए मोक्षकामना के साथ जीवित है| राग द्वेष कलियुग की पुरानी बातें है|

अथ श्री सत्यसूचना कथा:| अथ श्री अनुदानित स्पैक्ट्रम कथा:|

 

 

 

तू जो कह दे, उसे जुबां में हंसकर अपनी दे दूँ,

ये मौसम गुनगुना है, हवाओं में खुशबू है|

फ़िजाओं में घुला है, नशा तेरे होने का – साथी||

 

पत्थर भी गुनगुनाते हैं, गीत भौरों की जुबां में,

कौवे भी गाते हैं, मुहब्बत के मुस्कुराते तराने|

तेरी ही आवाज़ में, मैं आवाज आज देता हूँ,

गुमशुम सी हंसती है, हस्ती मेरे, मेरे होने की||

 

जिन्दगी में तरन्नुम है, तरानों में रस्मी रवानी है,

बचपन की बचकानी बातें, आज मेरी जवानी हैं|

अमावास की रातों में, अब पूनम की चाँदनी है,

तेरी दरियादिली में, मेरी मस्त जिन्दादिली है||

 

तू जो कह दे, उसे जुबां में हंसकर अपनी दे दूँ,

तेरे परचम की अदा पर, निछावर रंग मेरे दिल के|

मेरा हमसफ़र तू, मेरा सरमाया तू, तू ख़ुदा है,

आगोश में तेरे आने को, मेरा सिर यूँ झुका है||