भाड़ में जाओ

विश्वबंदी ३० मई – भाड़ में जाओ

सरकार के कटु आलोचक तो तालाबंदी के पहले चरण से लेकर आज तक सरकार की हर कार्यवाही को “भाड़ में जाओ” के रूप में अनुवादित करते रहे हैं परन्तु मुझे और अधिकांश जनता को सरकार की प्रारंभिक सदेच्छा पर विश्वास रहा| यह अलग बात है कि मोदी सरकार अपना काम इतना अधकचरा करती है, उसका परिणाम ख़राब ही रहता है| तालाबंदी के पहले चरण के समय जैसे ही ज़मात का मामला उठा था तभी लगने लगा था कि सरकार भाड़ में जाओ कहने के लिए रास्ता निकाल रही है| परन्तु ईद पर सरकार को शायद कोई मौका न मिला| खैर, सरकार ने आज अधिकारिक तौर पर तालाखोल की अधिसूचना कुछ इस तरह जारी की है कि उसे सरलता से “भाड़ में जाओ” के रूप में अनुवादित किया जा सके|

पहला काम यह है कि आगे किसी भी प्रकार का निर्णय उसे न लेना पड़े – अधिसूचना के अनुच्छेद पाँच के हिसाब से सभी कड़े निर्णय अब राज्य सरकार को लेने होंगे| वैसे यह उचित था कि इस प्रकार का निर्णय प्रारंभ से ही राज्यों के अधिकार क्षेत्र में रहता जो संविधानिक रूप से सही भी था/है|

देश में बीमारों और मृतकों की संख्या तेजी से बढ़ी है और आगे की लड़ाई की कोई योजना सरकार की तरफ से सार्वजानिक नहीं की गई है| सब रामभरोसे हैं – शायद इसीलिए मंदिर मस्जिद सबसे पहले खोले जा रहे हैं| याद रहे दुनिया भर में सबसे अधिक संक्रामक बीमारियाँ धर्मस्थलों और तीर्थस्थलों से ही फैलती हैं| करोना के मामले में ईरान, इटली, इस्रायल, इण्डिया सभी के अनुभव इसकी पुष्टि करते हैं| धर्मस्थलों और तीर्थस्थलों के साथ ही शापिंग माल, होटल, भोजनालय सब खोले जा रहे हैं| शराब के बाद धर्मं, बाजार, भोजन और पर्यटन भारतीय अर्थ व्यवस्था का प्रमुख आधार हैं| सरकार पर इन्हें खोलने के बहुत दबाब रहा है वर्ना इन सब से जनता का अंधविश्वास उठने का खतरा था|

सभी से अनुरोध है कि नकरात्मक रहें और सुरक्षित रहे, सकारात्मकता की अति घातक परिणाम देती है|

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घटते वेतन की अर्थ-व्यवस्था

विश्व-बंदी २8 मई – घटते वेतन की अर्थ-व्यवस्था

जब भी आर्थिक चुनौती सामने आती है तो सामान्य मानवीय स्वाभाव से यह अपेक्षा की जाती है कि खर्च में कटौती करे| आप अपनी चादर के अधिक पैर नहीं फैला सकते – भले ही आप कितना भी उधार लें या अपना दिवालिया पिटवा लें|

परन्तु सरकार के लिए यह स्तिथि इतनी सरल नहीं होती| उनकी जबाबदेही बहुत सी कठिन गणनाओं और निर्णय से उन्हें पीछे खींचती है| न सिर्फ़ भारत सरकार बल्कि विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा की गई घोषणाएं इस प्रकार के सामान्यीकृत गणित से प्रेरित हैं| बाजार आधारित वर्तमान अर्थव्यवस्था मूलतः खर्च करने की प्रवृत्ति और क्षमता पर आधारित है| खर्च न हो तो अर्थ व्यवस्था नहीं बचेगी| सामान्य घरों और विराट कंपनियों की अर्थ व्यवस्था को आप खर्च कम कर कर बचा सकते हैं परन्तु सरकार खर्च कम कर कर राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को बचा रही हैं या डुबा रही है यह सरल प्रश्न नहीं है|

इसलिए मैं वेतन घटाने के प्रश्न पर आशंकित हूँ| सरकार द्वारा वेतन घटाने से अर्थव्यवस्था पर बुरा प्रभाव पड़ता है| खासकर जब आप छोटे और मझौले उद्योगों और दैनिक कामगारों को रोजगार देना चाहते हों|

  • वेतन घटाने सेवेतनभोगी के आयकर योग्य आय में कमी आती है और प्रत्यक्ष कर की कम वसूली होती है|
  • सामान्य वेतनभोगी को अपने खर्च कम करने होते हैं| वह ऐसे खर्च सबसे पहले कम करेगा जिनके लिए घर में विकल्प मौजूद हैं – जूता पोलिश, प्रेसवाला, धोबी, सफाईवाला, सहायक दर्जी, कपड़ों की मरम्मत, फल, गैर मौसमी सब्जियाँ, प्रोटीन भोजन, बेकरी और बाजार के अन्य मिठाई-पकवान, घर की बहुत से गैर जरूरी मरम्मत, छोटे बच्चों की शैक्षिक सहायता, अखबार, पत्रिकाएं, गैर विद्यालय पुस्तकें, पर्यटन, वैद्य, हकीम, चिकित्सक, डिजायनर कपडे आदि बहुत लम्बी सूची हो सकती है| भले ही इनमें से अधिकतर वस्तु और सेवा कर के दायरे से बाहर रहेंगे परन्तु अर्थव्यवस्था में इस सब की गणना होती है|
  • जब इन सब लोगों और उद्योगों को इस प्रकार की समस्या आएगी तो इन सब के सेवा-प्रदाता और सामान विक्रेता (suppliers) आदि के व्यवसाय भी प्रभावित होंगे|
  • यह सभी लोग मिलकर बाजार बनाते हैं और इनके डूबने से बाजार डूबता है|
  • मेरा मोटा अनुमान, बिना किसी आँकड़ेबाजी, यह है कि अगर सरकार वेतन में ३०% प्रतिशत कटौती करती है तो निजी उद्यम भी इसी प्रकार की कटौती के लिए प्रेरित होंगे और यह कटौती अपने अंतिम परिणाम के रूप में अर्थव्यवस्था में ३० % तक की कमी कर देगी|
  • पुराने समय में राजे महराजे इसलिए अकाल आदि के समय में परोपकार के लिए बड़ी घोषणा की जगह बड़ी इमारत आदि की घोषणा करते थे – लखनऊ का बड़ा इमामबाड़ा हो या राजस्थान और गुजरात को बड़ी बड़ी बावड़ियां सभी सरकारी सहायता के उचित उदाहरण है| वर्तमान में मनरेगा भी इसी प्रकार की योजना है|

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विश्व-बंदी २१ मई

उपशीर्षक –  परदेशी जो न लौट सके

इस से पहले कि अर्थव्यवस्था चले, उसका आधार डोलने लगा है| जिन्हें कुछ माह पहले तक मानव संसाधन कहा जा रहा था – अपनी असली औकात यानि मजदूर के रूप में औद्योगिक परिदृश्य से दूर हो चुके हैं| जो मजदूर दो जून की रोटी की आशा में बंधुआ की तरह जीता मरता है – लौटा है|

अब इस बात पर बहस की गुंजायश नहीं रह गई है कि मजदूर अपने मूल स्थानों की ओर क्यों लौटे? सब जानते हैं उनकी मातृभूमि कम से कम तुरंत उनका स्वागत नहीं करेगी| उनके गाँव और उनके परिवार उन को शायद तुरंत न अपनाएँ| जिस गाँव कुल चार रोटी हैं वहां खाने वाले चार से बढ़कर सोलह हो गये हैं|

परन्तु सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि लौटा कौन कौन नहीं है?

जिनके पास जमीन में गड़ी अपनी नाल का पता है – वो लौट गए हैं| जिनके पास माँ – बाप – भाई – भाभी गाँव घर है लौटे हैं भले ही यह सब नाम मात्र की आशाएं हैं| वो लौट गये हैं जिनकी जड़ों में अभी जुड़ाव की आशा है| मगर क्या उन्होंने रोज़ी- रोटी वाले अपने नए वतन से जुड़ाव नहीं महसूस किया| किया तो मगर जुड़ाव में आसरा और आश्वस्ति की कमी थी| जिन्होंने किसी पुराने राहत शिविर की काली कहानियाँ सुनी थीं और जिन्हें रेन बसेरों के बास अपनी नाक में आज भी सुंघाई देती थी – लौट गए|

वो लोग नहीं लौटे जिनके पास अपना एक कमरा – एक छप्पर – एक झौपड़ – एक टपरी – एक चाल थी| नौकरी की आस थी| सड़क पर फैंक दिए जाने का भय न था|

वो नहीं लौटे जिनके पास जड़ें नहीं थीं – जिनके नाम कुछ भी हों मगर पुराने धाम देश के नक़्शे के बाहर हैं| नेपाली लौटे – बंगाली नहीं| वो नहीं लौटे जो घर से भाग कर आये थे| वो लडकियाँ नहीं लौंटी जिन्हें कोई घर नहीं अपनाएगा| वो भाई भी नहीं लौटे जिनके भाई के हाथ में खंजर हैं|

पाठकों से अनुरोध हैं बताएं उनके बारे में हो नहीं लौटे|

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विश्व-बंदी १९ मई

उपशीर्षक –  दूरियाँ दो गज रहें

बुतों बुर्कों पर आह वाले, वाह वाले, नकाब लगाए बैठें हैं,

सूरत पर उनकी मुस्कान आती हैं, नहीं आती, ख़ुदा जाने|

जिन्हें शिकवे हैं शिकायत है मुहब्बत है, हमसे दूर रहते हैं,

दुआ सलाम दूर की भली लगती हैं, गलबहियाँ ख़ुदा जाने|

जाहिर है छिपकर चार छत आया चाँद, चाँदनी छिपती रही,

ये दूरियाँ नजदीकियाँ रगड़े वो इश्क़ मुहब्बत के ख़ुदा जाने|

जो नजदीकियाँ घटाते हैं बढ़ाते हैं, अक्सर दोस्त नहीं लगते,

हम खुद से दूर रहते हैं इतना, रिश्ते-नातेदारियाँ ख़ुदा जाने|

महकते दरख़्त चन्दन के बहकते हैं, भुजंग गले नहीं लगते,

गेंदा, गुलाब, जूही माला में नहीं लगते, गुलोगजरा ख़ुदा जाने|

दूरियाँ दो गज रहें, नजदीकियाँ चार कोस, इश्किया रवायत है,

बात करते हैं इशारों से अशआरों से, तेरी नैनबतियाँ ख़ुदा जाने|

 

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विश्व-बंदी १८ मई

उपशीर्षक –  जीवन यापन का संकट

ऐसा नहीं है कि जीवन यापन का संकट केवल मजदूरों के लिए ही खड़ा हुआ है| इस संकट से हर कोई कम या ज्यादा, पर प्रभावित है| हर किसी की कमाई में लगभग तीस प्रतिशत की कमी आई है और हर किसी का इरादा खर्च में कम से कम बीस प्रतिशत की कमी करना है| निवेश का वर्तमान मूल्य (value) दो महीनों में तीस प्रतिशत घट चुका है| अगर सरकारी पैकेज की बात की जाए तो इसका कोई सकारात्मक प्रभाव देखने के लिए कम से कम साल भर इन्तजार करना होगा|

सरकारी घोषणाओं के प्रति मेरी निराशा का निजी कारण भी है – निजी रूप से इन प्रस्तावों के चलते मेरे काम में कम तीस से पचास प्रतिशत तक की कमी आने की आशंका है| यह अलग बात है कि मैं इस सब को पहले से ही संभाव्य मान कर आगे के कदम उठाने की तैयारी कर रहा था| परन्तु रास्ता कहाँ तक जाता है और गंतव्य कितनी दूर है मुझे नहीं मालूम|

मेरे लिए सकारात्मक यह है कि मैं जीवन में पिछले कई संकटों से गुजरकर उठ चुका हूँ| परन्तु मेरे जैसे हर के व्यक्ति के पीछे हजारों हैं, जिनके पास कोई मार्ग या मार्गदर्शन नहीं, न दृष्टि, न दृष्टिकोण| अन्य बुरे समय मुकाबले में यह स्तिथि यह मेरी तरक्की में एक बड़ा अडंगा है| जब अर्थव्यवस्था तरक्की कर रही हो तो आपके लिए आगे बढ़ना सरल है| परन्तु अकेले आगे बढ़ना कठिन है| सबसे बड़ी चुनौती है खेती और कुटीर उद्योग, अगर यह आगे नहीं बढ़ सके तो अर्थव्यवस्था की आधार संरचना कमजोर होगी| आप बड़ी अर्थव्यवस्था को ऊपर से बड़ा नहीं बना सकते इसके लिए इस अपने आधार को पहले मजबूत करना होता है| वर्तमान समय में भारत की अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी कठिनाई यह ही है कि पिछले बीस वर्ष की आर्थिक तरक्की के दौरान इसका आधार कमजोर हुआ है| घर का सबसे कम योग्य बेटा खेती के लिए छोड़ दिया जाता रहा है|

हम सबकी चुनौती यह है कि इस सबके बीच अपनी अपनी आजीविका को वर्तमान स्तर से नीचे न गिरने दिया जाए|

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विश्व-बंदी १७ मई

उपशीर्षक – आपूर्ति की जय,

माँग होए मोती बिके, बिन माँग न चून|

रहीम अगर आज दोहा लिखते तो वर्तमान सरकार को इसी प्रकार कुछ अर्थ नीति समझाते| यह अलग बात है कि ज्ञान देने के चक्कर में गाली गलौज का शिकार होते|

भारत पिछले तीन चार वर्षों से मंदी का शिकार है| नोटबंदी, तालाबंदी और श्रमिकबन्दी तक हर कदम ने माँग में कमी पैदा की है| करोना से पहले भी देश की अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए सरकार ने अपने प्रयास किये हैं|

इसके लिए सरकार ने बड़ी कंपनियों के करों में कमी की जो भले ही गलत कदम नहीं था मगर माँग बढ़ाने का काम नहीं कर सकता था| सरकार बजट के महीनों बाद बजट से भी अधिक बड़ा घोषणापत्र लेकर सामने आई| जैसा सबको पता था, कोई लाभ नहीं हुआ| बाजार में पैसा समाप्त होने लगा| सरकार ने व्यवस्था में धन बहाल करने के लिए कई प्रयास किए इनसे महंगाई तो बढ़ी, पर माँग नहीं| अगर आप आँकड़ों में देखें तो महंगाई यानि दाम जिस समय घटने चाहिए तब स्थिर रहे या बेहद कम बढ़े|

इस करोना काल में भी सरकार दो महीने के भीतर कई घोषणा लेकर आई| वर्तमान और दूसरी कड़ी को पांच दिन में शानदार रूप से आत्मनिर्भर भारत नाम से प्रचारित किया गया| जिसमें स्वतन्त्र निदेशकों के पंजीकरण जैसे सामान्य घोषणा की गई जो करोना के महीनों पहले से मौजूद थीं और न माँग बढ़ा सकती थीं न आपूर्ति| वैसे यह जरूर है कि मेरा स्वतंत्र निदेशक के लिए मैंने परीक्षा जरूर करोना तालाबंदी के दौरान उत्तीर्ण की| पिछले पांच छः दिन में सरकार के भी ऐसा कदम नहीं बता सकी जिससे आम भारतीय उपभोक्ता की और से माँग बढ़े| भारतीय उपभोक्ता को बेहद कठिन वेतन कटौती से लेकर रोजगार कटौती का सामना करना पड़ा है| छोटे दुकानदार, फेरीवाले, रेहड़ीवाले, छोटे चिकित्सक, छोटे वकील, छोटे लेखाकार सब आय की कमी का सामना कर रहे हैं| उनके खर्चे कम उस अनुपात में नहीं हुए हैं| किसानों के अपने उत्पाद का दाम नहीं मिल पाया है| भूखा प्यासा मजदूर पैदल अपने बचपन के घरों की और जा रहा है| जो मजदूर वापिस नहीं जा रहा वो या तो जड़ से कट चुका है या फिर शायद अवैध आप्रवासी है|

हर चीज सरकार के हाथ में नहीं है परन्तु सरकार इस बड़े मोटे से पैकेज में से कुछ धन सीधे इस आम जनता तक पहुंचाकर जनता के हाथ में कुछ क्रयशक्ति प्रदान कर सकती थी| सरकार बेरोजगारी भत्ता, मनरेगा, शहरी मनरेगा, मजदूरी सहायता जैसी महत्वपूर्ण बातों पर  चूक गई है| फ़िलहाल अर्थव्यवस्था ठीक होते नहीं नजर आ रही|

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विश्व-बंदी १६ मई

उपशीर्षक – त्रियोदशी में करोना दावत

करोना काल की अच्छी उपलब्धियों में एक यह भी है कि देश में त्रियोदशी संस्कारों में भारी कमी आई है| परन्तु मेरे गृह नगर के बारे में छपी खबर चिंता जनक थी|

शहर के एक बड़े सर्राफ़ की माताजी का हाल में स्वर्गवास हुआ| इसके बाद स्वाभाविक है कि उनके पुत्र, और पुत्रिओं के परिवार इकठ्ठा होते| इसमें शायद किसी को कोई आपत्ति भी नहीं होनी चाहिए| परन्तु इस परिवार ने अपनी माताजी के लिए त्रियोदशी संस्कार का आयोजन किया, जिसमें शहर भर के काफ़ी लोग सम्मलित हुए| दो दिन के बाद सर्राफ़ साहब की करोना से मृत्यु हो गई| मृत्यु के समाचार के बाद सरकार ने तुरंत तीन प्रमुख थाना क्षेत्रों में कर्फ्यू का ऐलान कर दिया जिससे कि बीमारी न फैले| साथ ही उन लोगों की जानकारी इकठ्ठा की गई जो त्रियोदशी में शामिल हुए थे| इस परिवार और समारोह में शामिल कई लोग करोना से संक्रमित पाए गए|

दुःख यह कि यह समाज का सभ्य और समझदार समझे जाने वाला तबका है| यह वह लोग हैं जो दूसरों के लिए आदर्श बनकर खड़े होते है|

इस पूरे इलाके में कर्फ्यू जारी है| कोई नहीं जानता कि सर्राफ़ परिवार के यहाँ मातमपुर्सी के लिए आए और बाद में त्रियोदशी समारोह में शामिल लोग कब कब किस किस से मिले| यह एक पूरी श्रंखला बनती है| यह सब जान पाना उतना सरल नहीं जितना लगता है| अलीगढ़ शहर ख़तरे की स्तिथि में अब लगभग एक महीने के लिए रहेगा| सरकार ने लगभग १५० लोगों के विरूद्ध मुकदमा कायम किया है|

कुछ अतिविश्वासी या अंधविश्वासी लोगों के कारण उनके सम्बन्धियों, मित्रों, परिवारों, पड़ौसियों, और यहाँ तक कि उनके आसपास से अनजाने में ही गुजर गए लोगों के लिए खतरा पैदा हुआ है|

अलीगढ़ वालों के समझदार होने का मेरा भ्रम इस समय कुचल गया है| मैं सिर्फ़ आशा करता हूँ कि जल्द सब ठीक हो|

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विश्व-बंदी १४ मई

उपशीर्षक – इस्तरी वाले कपड़े

तालाबंदी से ठीक पहले हमारे घर के लिए इस्तरी का काम करने वाली महिला जब आई तो बहुत डरी हुई थी| देश के अधिकतर इस्तरी का काम करने वालों की तरह वह भी पास गली में पार्क के किनारे ईंटों और बलुआ पत्थर के सहारे बनाए गए चबूतरे से काम करती है| इस प्रकार के सार्वजनिक स्थान पर खड़े होकर काम करने के कारण उसे भय था कि उसको संक्रमण का बहुत खतरा है| दिल्ली शहर में रहने तीन लोगों के इस परिवार के सभी सदस्यों के लिए काम करना जरूरी है| उस समय उसका एक बेटा मुंबई में था जो तालाबंदी वाली रात ही किसी तरह ट्रेन के शौचालय के सहारे बैठ का दिल्ली वापिस लौटा था| दूसरा एक निजी कंपनी के दफ्तर में हरकारे का काम करता था|

अचानक तालाबंदी हुई| आधे महीने का पैसा ख़त्म हो चुका था बाकि के लिए कोई आय नहीं थी| पहले पंद्रह दिन तो जैसे तैसे गुजर गए मगर उसके बाद कठिनाई शुरू हुई| बचत का पैसा कम हो चुका था और खाने की किल्लत हो रही थी| उसने अपने बंधे हुए ग्राहकों से सहायता मांगी और कुछ लोगों से सहायता की भी| परन्तु, अधिकांश लोगों के सामने खुद अपना ही नगदी का संकट सामने खड़ा था, तो कुछ को उस में अपना भविष्य दिखाई दिया| कुछ लोगों ने उसे सरकारी भोजन केंद्र पर जाने की सलाह दी| कहती है एक दिन बेटा गया भी, मगर उसे अच्छा नहीं लगा|

“मेहनत्त का न खाना तो चोरी या भीख लगता है, पिछले सप्ताह उसने मुझे कहा| लम्बी कतार में खड़े होने के बाद बीमार, भिखारी, मजदूर और कामगार में कोई फ़र्क नहीं लगता, साहब| वहां का खाना जैसा भी हो मगर गले से उतारने के लिए गैरत को घर पर रखना पड़ता है|”

वह उस दिन काम मांगने के लिए आई थी| सरकार ने धोबी आदि के काम की अनुमति दे दी है| हमें यह पता था कि उसकी मदद खैरात कर कर नहीं की जा सकती| कल इस्तरी के लिए हमने कपड़े दे दिए क्योंकि हम उसकी मदद करना चाहते थे| शाम तक कपड़े इस्तरी होकर आ भी गई| अब?

अब समस्या यह कि गली के नुक्कड़ पर चार घंटे रहे यह सुन्दर इस्तरी किए घरेलू कपड़े पहने जाये या नहीं| बेटे ने कहा, कपड़ों को संक्रमणमुक्त करने के लिए छिड़काव किया जाए| पत्नी बिना पहने धोने के पक्ष में थीं| पिता जी ने दो घंटे धूप में रखने की सलाह दी| आप क्या कहते हैं?

इस्तरी होकर आए कपड़े आज चार घंटे धूप में रखे गए, मगर पहनने से पहले की चिंता यानि भय जारी है|

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विश्व-बंदी १२ मई

उपशीर्षक – वसीयतें लिख ली जाएँ

वक्त आ गया है कि वसीयतें लिख ली जाएँ – त्रियोदशी कर कर निपटा दी जाए| पितृपक्ष छोडिए – आए न आए!!

नहीं, मैं नकरात्मक नहीं हूँ| मेरे लिए न मौत नकरात्मक है न वसीयत, बीमारी को जरूर मैं नकारात्मक समय समझता हूँ और मानता हूँ| वसीयत अपने बच्चों और शेष परिवार में भविष्य में होने वाले किसी भी झगड़े की सम्भावना को समाप्त करने की बात है|

इस समय वसीयत का महत्त्व बढ़ जाता है| किसी भी होनी-अनहोनी से समय परिवार के लिए बहुत कुछ जानना समझना और बचाना जरूरी है| साथ ही यह भी जरूरी है कि अपना जीवन भी ख़तरे में न पड़े|

सबसे पहले एक अपनी सारी संपत्ति और उधारियों का हिसाब लगाएं| अगले एक वर्ष के हिसाब से उधारियों के चुकाने का इंतजाम करने और घर खर्च का हिसाब करें| इस के साथ अन्य जरूरी जिम्मेदारियों के खर्च का बजट तैयार कर लें| बची संपत्ति के स्वमित्व तय कर दें| मैं सिर्फ़ सामान्य जानकारी लायक बात ही यहाँ कह रहा हूँ| अगर आप किसी प्रकार की दुविधा में हैं तो किसी विशेषज्ञ की सलाह ले सकते हैं| यह भी तय करें वसीयत का पता किसे हो और किसे न हो|

ध्यान दें आपके सभी ईमेल, सोशल मीडिया आदि एकाउंट्स भी आपकी संपत्ति हैं| आपकी मृत्यु के बाद इनका क्या करना है, यह बहुत जरूरी है| सभी सेवा प्रदाता आपके निर्णय को सुरक्षित रखते हैं और आपके अकाउंट को आपके जाने के बाद आर्काइव या बंद करने जैसे विकल्प आपके सामने रखते हैं| ध्यंद दें आपके एकाउंट्स में बहुत सी ऐसी जानकारी होती हैं जो बात में घर परिवार के लिए जरूरी हो|

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विश्व-बंदी १० मई

उपशीर्षक – श्रमिकविरोधी पूंजीपशुवाद  

देश के कथित पूंजीवादी शासक एक एक कर लगातार श्रमिक कानूनों को रद्द कर रहे हैं| एक विधि-सलाहकार होने के नाते मैं वर्तमान कानूनों का समर्थक नहीं हूँ, परन्तु इस प्रकार रद्द किए जाने का स्पष्ट नुक्सान देखता हूँ| पूंजीवादी दुर्भाग्य से यह गलत कदम उस समय उठाया जा रहा है, जिस समय उद्योगों के लिए श्रमिकों की जरूरत बढ़ रही है और जिन स्थानों पर उद्योगों की भीड़ हैं वहां श्रमिकों की भारी कमी है| ऊपर से देखने में लग सकता है कि अगर ऐसे में मजदूरों को रोका जाता है तो उद्योग को लाभ होगा| परन्तु दुर्भाग्य से रूकने के लिए मजदूर हैं ही नहीं| हर बीतते हुए दिन या तो वो लौट कर अपने गाँव घर जा रहे हैं, या असुरक्षित स्तिथियों में संक्रमण का बढ़ता ख़तरा उठा रहे हैं| साथ में महामारी और मृत्यु के नृत्य को पूँजीपशुओं की मानसिकता तांडव में बदल रही है|

यह सभी कानून इस लिए गलत नहीं हैं कि यह मजदूरों को कोई खास लाभ दे रहे हैं, न इसलिए कि मजदूर संगठनों पर कमुनिस्ट का कब्ज़ा है, यह इसलिए गलत हैं कि इनको न उद्योगपति समझ पाते हैं और न श्रमिक| ये पुराने श्रमिक कानून उस तरह का धर्म हैं जिसमें समस्त निष्ठा  ईश्वर को भुला कर कर्मकाण्डों पर टिका दी गई ही| यह क़ानून सिर्फ़ नौकरशाही के कागज़ों का पुलंदा मोटा करते हैं| इनमें सुधार के लिए, इन्हें सरल, समझने योग्य, पालन योग्य बनाने की आवश्यकता थी, न कि रद्द करने की|

वर्तमान में उद्योगों के वेतनदेय क्षमता नगण्य है, साथ ही वो मजदूरों को कोई अन्य लाभ – इज्जत, सुरक्षा, रोजगार गारंटी, स्वास्थ्य सुविधा या बीमा – कुछ देने के लिए न तो बाध्य हैं और न देने जा रहे हैं| पूँजीपशुओं की पूरी ताकत उन्हें गुलाम की तरह रखने में लगी हुई है| मगर गुलाम बनने के लिए आएगा कौन?

अगर मजदूरों का रोजगार प्रदाता उद्योग के आसपास रहने- खाने के बाद घर भेजने लायक बचत न हो, इज्जत न मिले और अगर उसे अपने गाँव के छोटे मोटे रोजगार में जीवन यापन संभव रहे और कम ख़तरा उठाना पड़े तो वो वापिस क्यों लौटेंगे|

हर बात का उचित लाभ भी होता है, अगर श्रमिक कानूनों के रद्द किए जाने के बाद भी यदि श्रमिक नहीं मिलते तो उद्योगों के लिए पूंजीपति के घर से दूर श्रमिक के द्वार पहुंचना होगा और महाराष्ट्र गुजरात की जगह अवध-मगध आना होगा

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विश्व-बंदी ६ मई

उपशीर्षक – गिरमिटिया

हिंदुस्तान में वक़्त सिर्फ़ पञ्चांग के लिए बदलता है, इंसान के लिए नहीं|

हम कितनी भी बड़ी बड़ी बात करें, कितना भी अपनी पुरानी और नई महानता का गान करें, हम नहीं सुधरते| उस पर तुर्रा यह है गिने चुने बे-अक्ल लोग गाना गाते रहते हैं कि देश बुरा लग रहा है तो देश से चले जाओ| मगर असलियत है थी है और देश का हर पिछड़ापन, महानता के इन्हीं चारणों पर टिका हुआ है|

भारत द्वारा अपने मजदूरों के साथ किया जा रहा व्यवहार दुनिया भर में बेइज्जती का उदहारण बना हुआ है| पहले मजदूरों और दैनिक कामगारों की स्तिथि पर विचार किए बिना तालाबंदी कर दी गई| कोई बात नहीं, सबने माना यह अतिव्याधि का समय है सरकार ने जल्दी में जो बना कर दिया| काम धंधा, रोजी रोटी, ठौर-ठिकाना हर चीज का सवाल लिए मजदूर जब निकल पड़ा घर जाने के लिए तो नाक बचाने के लिए खैराती इंतजामात किये गए| मजदूर भले ही रोटी के साथ करोना का शिकार हो जाए| जिन्हें इज्जत की रोटी की आदत हो वो या तो बेइज्जत महसूस करें या फिर हमेशा के लिए बेइज्जती की आदत पाल लें|

लॉक डाउन के लगभग खुलने के दो दिन पहले अचानक सरकार ने मजदूरों को घर जाने की अनुमति दी| मगर दुर्भाग्य! महंगे रेल किराए की वसूली हुई| इतने से भी काम नहीं बना तो पहले गुजरात से उन्हें जबरन रोके जाने की ख़बरें आईं बाद में कर्णाटक ने खुलकर उन्हें वापिस जाने देने से मना कर दिया|
क्या वो बंधुआ, गुलाम या गिरमिटिया हैं, कि आज़ाद नहीं किए जायेंगे?

मगर यह गुलामी इतने पर ही नहीं रूकती| सरकार हर किसी के लिए माई-बाप बनना चाहती है| सुरक्षित क्षेत्रों में हर काम की अनुमति देना और काम लेना समझ आता है| परन्तु असुरक्षित क्षेत्र में किसे अनुमति है किसे नहीं इसका कोई भी सुरक्षित मानदंड नहीं है| बहुत से काम जो घरों से हो सकते थे उन्हें घरों से किए जाने पर प्राथिमिकता दी जानी चाहिए| परन्तु न व्यवसायी न सरकार इस बात पर विचार कर रहे हैं| जिन्होंने रोजगार के समय अनुबंध किये हैं वो अपनी मानसिकता में नए किस्म के गिरमिटियों और आक़ाओं में बदल चुके हैं|

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विश्व-बंदी ५ मई

उपशीर्षक – सुरारसिक सम्मान

सुरा रसिकों का सम्मान सदा ही रहा है| यह ही कारण है देवता भी स्वर्ग में इसका सेवन करते हैं| परंपरागत रूप से कहा जाता रहा है सुरा का सेवन करे वह सुर और जो न करे असुर| राक्षस आदि अन्य गैर-असुर समुदायों में भी सुरा सेवन की वर्णनीय परंपरा रही है| अति सर्वस्त्र वर्जनीय है, उस में हम संदेह नहीं रखते| जिन्हें सुरा नहीं मिलती उन्हें भाँग अफ़ीम प्रकृति प्रदत्त साधन उपलब्ध हैं| इस्लाम में सुरा पर प्रतिबन्ध इसके इस्लाम-पूर्व असीरियाई मूल में मालूम होता है –हो सकता है असीरिया का सम्बन्ध प्राचीन असुरों से रहा हो| सुरा का समर्थन या विरोध करते समय तथ्य कौन देखता है, मैं भी नहीं देखता|

कल से देश के हर सभ्य राज्य ने सुरा से प्रतिबन्ध हटा लिया है – गुजरात और बिहार की गणना नासमझों में पहले से है अतः उनपर फ़र्क नहीं पड़ता| सरकारी कोषागार में धन धान्य की वर्षा हो रही है| यह सुरा का ही प्रताप है| कभी मंहगाई बढ़े, कर लगाए जाएँ, सुरा-रसिक कभी विरोध नहीं करते| अधिकांश तो मात्र इसलिए सुरा क्रय करते हैं कि सरकारी कोष में गुप्त दान दे सकें|

सुरा नकारात्मक भाव से ही नहीं नकारात्मक रोगों से भी मुक्ति का रामबाण माना गया है इसके औषध रूपों की महिमा आयुर्वेद में आसव और अरिष्टों के रूप में ख्यात होती है| इस समय भय, निराशा, रोग, मनोरोग, मन-व्याधि आदि का जो साम्राज्य व्याप्त है, सुरा उसे तोड़ने में नितांत सहायक है| यही कारण है कि राष्ट्र-हितैषी गृहस्थ-संत साधारण से साधारण वस्त्रों में बिना किसी मोह माया के जीवन- मृत्यु के अविनाशी काल चक्र का मर्म समझते हुए राष्ट्र कोष में गुप्त दान का पुण्य प्राप्त करते हुए सुरा का क्रय करने अवतरित हुए और लगभग विधि विधान के साथ सुरा का क्रय-अनुष्ठान संपन्न किया| अर्थशास्त्र में इस प्रकार सुराक्रय का पुण्य प्रधानमंत्री के कोश में दान देने के समकक्ष माना जाता रहा है|

सुरा को कभी भी गलत नहीं कहा जा सकता| इसका विलोप सदा ही आपराधियों द्वारा स्तरहीन सुरा के उत्पादन और अवैध बिक्री के रूप में सामने आता है| आवश्यकता उचित सेवन विधि का प्रचार करने में है| सुरा-रसिकों को गंदगी में वास न करना पड़े| उनके सुकोमल हाथों से हिंसा न हो, इसका प्रबंध हो| सुरा-रसिकों को अपनी कारों का सारथी न बनना पड़े, यही इच्छा है|

मरने वालों और नए बीमारों की संख्या पर क्या विचार किया जाए, यह व्यर्थ लगता है|

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विश्व-बंदी १ मई

उपशीर्षक – करोना काल में पूंजीपतिवाद का दबाब

मेरे मन में कभी भी इनफ़ोसिस के किसी भी संस्थापक सदस्य के लिए कोई विशेष सम्मान नहीं रहा| यह लोग पूँजीपतिवाद (न कि पूंजीवाद) का उचित उदहारण मालूम देते हैं| जिस देश में बेरोजगारी व्याप्त हो और कर्मचारियों पर पहले से ही १२ घंटे काम करने का पूंजीपतिवादी दबाब हो वहां यह महोदय और अधिक काम करने का प्रवचन दे रहे हैं|

वास्तव में मैं पिछले कई दिनों में सरकार का इस बात के लिए ही धन्यवाद कर रहा हूँ कि सरकार पूंजीपतिवाद के दबाब में आकर लॉक डाउन को न लागू करने या उठाने पर आमादा नहीं हुई| प्रकृति ने पूंजीपतिवादी समझी जाने वाली सरकार से लोकहितकारी राष्ट्र का पालन करवाने ने कुछ हद तक सफलता प्राप्त की है| करोना काल की सबसे बड़ी सीख अर्थव्यवस्था को सकल उत्पाद से नहीं बल्कि सकल प्रसन्नता से नापने में है|

शाम तक इस आशय की ख़बरें आ गई कि लॉकडाउन को दो हफ्ते के लिए बढ़ाते हुए इस में जबरदस्त परिवर्तन किए गए हैं| सरकारी अधिसूचनाओं को पढ़ना इतना सरल नहीं होता|  तमाम दबाब के बीच सरकार लोकहित, सकल प्रसन्नता, सकल स्वास्थ्य, सकल उत्पाद जैसी अवधारणाओं में उचित समन्वय बैठाने का देर दुरुस्त प्रयास कर रही है|

देश को पहले से ही लाल, संतरी, हरे मुख्य ज़ोन में बाँट दिया गया है| इन के अतिरिक्त राज्य सरकारों के आधीन कन्टेनमेंट ज़ोन भी है, जो सबसे गंभीर है| अब कुल मिला कर पूर्ण लॉक डाउन केवल कन्टेनमेंट ज़ोन में ही रह जाएगा| देश का हर बड़ा शहर नक्शे पर लाल रंग से रंगा हुआ दिखता है| अब कम महत्त्व के समझे जाने वाले पिछड़े इलाके हरे रंग में रंगते हुए ग्रामीण भारत के साथ देश की अर्थव्यवस्था संभालेंगे| विकास इस समय उत्तर नहीं प्रश्न है|

करोना काल कतई सरल नहीं| कोई आश्चर्य नहीं कि लॉक डाउन के टोन डाउन होते समय श्रेय लेने के लिए श्रेय-सुखी प्रधानमंत्री जनता के सामने नहीं आ रहे|

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विश्व-बंदी ३० अप्रैल

उपशीर्षक – वेतन कटौती का दिन

कोई  भी इस बार मई दिवस की शुभकामनाएं लेना देना नहीं चाहता|

इस बार किसी को वेतन का इन्तजार नहीं है, वेतन कटौती की बुरी तरह आशंका है| देश का हर अधिकारी कर्मचारी अपने मोबाइल में यह देखना चाहता है इस बार वेतन कितना कटकर आ रहा है| आज सुबह पहली चिंताजनक ख़बर यह थी की देश में १०० बड़ी कंपनियों में से २७ लम्बे समय वेतन देने की स्तिथि में नहीं हैं| दूसरी बुरी ख़बर तीसरे पहर आ चुकी थी, रिलायंस समूह वेतन कटौती कर रहा है| यह बात अलग है कि बड़ी कंपनियों की ख़बरें निचले स्तर पर वेतन कटौती अभी दर्ज़ नहीं कर रहीं हैं|

कठनाई सूक्ष्म, लघु, और मध्यम उद्यमों, दुकानदारों और उनके करोड़ों कर्मचारियों के लिए आने जा रही है| इन उद्योगों के पास न देने ले लिए पर्याप्त आय और जमा धन पूँजी है न कोई सरकारी सहायता| इन उद्योगों ने मार्च का आधा वेतन पुरानी आय और जमा धन पूँजी से दिया गया है| इसके बाद इनमें से अधिकतर उद्योगों की अप्रेल माह का पूरा वेतन देने की स्तिथि नहीं हैं| इनके कर्मचारी अघोषित रूप से बेरोजगार हैं ही, सरकारी कानूनी परिभाषा के परे अधिकतर सूक्ष्म और लघु उद्यमों के मालिक भी बेरोजगार की श्रेणी में हैं| लॉक डाउन को समर्थन देने से बाद भी यह कहना होगा कि अगर लॉक डाउन मई में जारी रहता है तो मध्यम उद्योग भी वेतन देने में अक्षम होंगे|

सरकार को यह गणना नहीं करनी कि उसे बीमारी से जीवन बचाना है या गिरती अर्थव्यवस्था से, बल्कि  यह गणना करनी है कि बीमारी से जीवन बचाने के लिए कितना खर्च उठा सकती है और कब तक| उतने दिन के भीतर बीमारी को काबू करना है और उसके बाद ही अर्थव्यवस्था को खोलना है|

निश्चित रूप से शुद्ध ग्रीन जोन में अर्थव्यवस्था को नियंत्रित रूप से खोला जा सकता है| कठिनाई यह भी है कि पिछले बीस वर्ष की सरकारी अनीतियों के कारण देश की अर्थव्यवस्था कुछ खास बड़े शहरों के आगे पीछे घुमने लगी है| इसे यथासंभव रूप से शीघ्रतापूर्वक विकेन्द्रीयकृत करना होगा| परन्तु फिलहाल कुछ तो शुरू हो मगर जीवन से बिना समझौता किए और बीमारी से बिना हार माने|

अंत में इतना और कहूँगा, सच है या नहीं परन्तु बहुत से पूंजीपति अर्थव्यवस्था को जल्दी खुलवाने के लिए दबाब की नीति के रूप में भी प्रयोग करने की कोशिश कर सकते हैं, ऐसी आशंकाएं सामने आई हैं|

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विश्व-बंदी २९ अप्रैल

उपशीर्षक – देर आयद हमेशा दुरुस्त आयद नहीं

बात शुरू करने से पहले: वास्तविक तौर पर महान अभिनेता माने जा सकने वाले इरफ़ान खान को कैंसर ने मानवता से छीन लिया| उन्होंने कम फ़िल्में कीं, मगर अच्छा प्रभाव छोड़ा|


शाम होते होते केंद्रीय गृह मंत्रालय का यह निर्णय सामने आया कि लॉक डाउन में फँसे हुए प्रवासी मजदूरों, छात्रों, पर्यटकों और तीर्थ यात्रियों को उनके घर जाने के लिए अंतराज्यीय यातायात शुरू करने की अनुमति दे दी गई है| यह अनुमति वास्तव में लॉक डाउन के पहले दिन होनी चाहिए थी, बल्कि ट्रेन सेवायें इन लोगों को यथास्थान पहुँचाने के बाद बंद होनी चाहिए थीं| इसकी कीमत इन लोगों ने भारी अवसाद, तनाव, आर्थिक तंगी, अनुत्पादक कार्य और समय की बर्बादी के बीच असुरक्षित आवास में असुरक्षित भोजन करते हुए करोना संक्रमण के ख़तरे के बीच रहकर चुकाई है| सरकार इन सभी लोगों को अनावश्यक रूप से दुर्भाग्य के सहारे छोड़े हुई थी| अब जब यह लोग भर लौटेंगे तो इसमें लम्बी कानूनी और स्वास्थ्य प्रक्रिया का होना आवश्यक होगा ही, साथ ही इन सभी को मानसिक और शारीरिक रूप से ठीक होने में महीनों का समय लगेगा| इन सभी लोगों को घर पहुँचने से ठीक पहले या ठीक बाद चौदह दिन तक के एकांतवास (क्वॉरंटीन) में रहना होगा| यह तथ्य और भी कठिनाई व्यक्त करता है कि हाल में काशी से तमिलनाडू और नांदेड़ साहब से पंजाब लौटा आकर लाये गए तीर्थ यात्रियों में यह यमदूत करोना संक्रमित बनाने में कामयाब रहा है| ध्यान रहे, सूरत में मजदूरों ने दंगा किया था और दिल्ली और मुम्बई में मजदूरों की हजारों मजदूरों की भीड़ अलग अलग समय में घर जाने की आशा में घर से निकल चुकी थी| दुनिया भर में भारतीय मजदूरों और छात्रों की हालत को देखते हुए इस अन्यथा प्रशंसित लॉक डाउन की कड़ी आलोचना होने लगी थी|

सरकार की दिशाहीन नीतियों की बेहद कड़ी आलोचना करने के साथ ही हमें इस बाद के लिए सरकार को धन्यवाद देना चाहिए की कम से कम उसने अपनी इस बुरी गलती को सुधारा और स्तिथियों को और अधिक ख़राब होने से शायद बचा लिया है|

यह निर्णय यह भी स्पष्ट करता है कि लॉक डाउन बढ़ाया जा रहा है, वर्ना लॉक डाउन की प्रस्तावित समाप्ति से चार दिन पहले इस निर्णय का कोई औचित्य नहीं है|

अब यदि सरकार सूक्ष्म, लघु, और मध्यम उद्यमों और उनके करोड़ों कर्मचारियों के लिए एक दो दिन में उचित निर्णय और कर ले तो मुझे लगता है, देश एक और माह का लॉक डाउन सँभालने का प्रयास कर सकता है| यह अलग बात है कि लम्बा लॉक डाउन उचित रहेगा या नहीं यह दस बीस साल बाद इतिहास की पुस्तकों से पता चलेगा|

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विश्व-बंदी २७ अप्रैल

उपशीर्षक – प्रकृति का पुनर्निर्माण

करोना के फैलाव के साथ साथ प्रकृति का विजयघोष स्पष्ट रूप से सुना गया है| दुनिया में हर व्यक्ति इसे अनुभव कर रहा है| सबसे बड़ी घोषणा प्रकृति ने ओज़ोनसुरक्षाकवच का पुनर्निर्माण के साथ की है| दुर्भाग्य से मानवता अभी भी प्रकृति के विजयघोष पर गंभीर नहीं है| अगर वर्ष २०२० में मानवता डायनासोर की तरह प्रकृति विलुप्ति का आदेश दे दे तो शायद पृथ्वी के नए सम्राट शायद १० लाख साल बाद मूर्ख मानवों की आत्मविलुप्ति को सहज ही पढ़ा रहे होंगे| यह ठीक वैसा ही है जैसे हम डायनासोर की विलुप्ति पढ़ते हैं| आज हम प्रकृति की यह चेतावनी स्पष्ट सुन सकते हैं: अगर मानव नहीं सुधरे तो पृथ्वी पर सबसे कब समय तक विचरण करने वाली प्राणी प्रजाति में मानव की गिनती की जाएगी|

ओज़ोन सुरक्षा कवच में अभी और भी छेद हैं और यह वाला सुराख़ इसी साल देखा गया था और इसे भरने में प्रकृति को मात्र दो या तीन महीने लगे| यह कार्य शायद करोना जन्य लॉक डाउन के कारण जल्दी संपन्न हो गया| इसके बनने और बिगड़ने का कारण जो भी रहा हो, दोनों घटना प्रकृति का स्पष्ट शक्ति प्रदर्शन हैं| यदि मानव अपनी बिगड़ीं हरकतें करने से कुछ और दिन रोका जा सका तो प्रकृति चाहे तो शेष ओज़ोन सुरक्षा कवच की मरम्मत भी कर सकती है|

प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों की बैठक के बाद यह स्पष्ट लगता है कि लॉकडाउन प्रतीकात्मक ढील के साथ बढ़ने जा रहा है| शहरी मध्यवर्ग आर्थिक दबाब के बाद भी डरा हुआ है और मुझे नहीं लगता कि स्तिथि जल्दी सामान्य होगी| गाँव और वन क्षेत्र को कदाचित इतनी चिंता न हो या फिर उनपर दबाब बहुत अधिक होगा| किसी मामूली इलाज के लिए भी अस्पताल जाने से लोग बचना पसंद करेंगे| इसका कारण मात्र भय नहीं बल्कि अस्पतालों को करोना के प्रति ध्यान केन्द्रित करने की भावना है| आश्चर्यजनक रूप से लोग अस्पतालों की कम जरूरत महसूस कर रहे हैं| स्वस्थ पर्यावरण, समुचित शारीरिक व मानसिक आराम और घर का ताजा खाना अच्छे स्वास्थ्य की कुंजी बनकर उभरे हैं|

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विश्व-बंदी २५ अप्रैल

उपशीर्षक – स्व-तालाबंदियों की यादें  

हमारे लिए न तो तालाबंदी पहली है न कर्फ्यू| परन्तु पुरानी सब तालाबंदी मेरे अपने विकल्प थे|

मेरे जीवन की पहली तालाबंदी बारहवीं की बोर्ड परीक्षा से पहले आई थी|

छोटे से कस्बे में पढाई को लेकर मारामारी का माहौल नहीं था| बल्कि हालात यह थे कि पढ़ाने वाले शिक्षक भी हार मानकर बैठने लगते थे| उधर गणित को लेकर मेरे मन में भय व्याप्त होने लगा था| दसवीं के बाद मैंने तय किया था कि बिना प्राइवेट ट्यूशन लिए गणित विज्ञान पढ़ना कठिन है| परन्तु भारतीय माता-पिता इस तरह की बात कहाँ सुनते हैं? इसके बाद डेढ़ साल मौज मस्ती में काट दिए कि अनुत्तीर्ण होने का ख़तरा साफ़ दिखाई दे रहा था| इससे पहले की मेरी पूरी पढ़ाई छात्रवृत्ति के साथ हुई थी और अनुत्तीर्ण होने की कोई आदत भी नहीं थी| पूरे क़स्बे मोहल्ले को लगता था कि कितना भी आवारागर्दी करेगा – तृतीय श्रेणी तो आएगा ही| यह दो एक हितेषियों को छोड़कर किसी के लिए चिंता का विषय न था|

अचानक नववर्ष के ठीक पहले मोहल्ले के एक बड़े ने बिन मांगी सलाह दी कि किनारे से उत्तीर्ण होने से बेहतर है कि इस बात खाली उत्तर पुस्तिका रखकर अगली बार मेहनत करना| मगर विद्रोह का कीड़ा तो दिमाग में घुसा हुआ ही था तो उत्तीर्ण होने का निर्णय किया| किताबें खोलने के बाद पता चला कि इस बार उत्तीर्ण होना कठिन लगता है| फिर क्या था, समय सारिणी बनाई और चार घंटे की नींद पर अपने आप को लाया गया| उन दिनों योग का ठीक ठाक अभ्यास था तो नींद के नियंत्रण में योग ध्यान का सहारा लिया| किसी ने नींद को तीन चार महीने के लिए टालने के लिए मन्त्र तंत्र भी बताए थे – जिसमें इक्कठा की गई नींद बाद में पूरी करना अनिवार्य था| वैसे नींद को छः घंटे से चार घंटे पर लाना कोई बड़ी बात नहीं थी – दण्ड-बैठक, आसन, त्राटक, आवारागर्दी, खटाई, गुड़, चीनी, मिर्च, घी, तेल का परहेज तय हुआ – प्राणायाम और ठंडाई जारी रही| तीन चार महीने पक्की रसोई से कोई सम्बन्ध नहीं रखा – रूखी रोटी, सब्ज़ी, सलाद, दही-बूरा| अंतिम परीक्षा के बाद पक्की रसोई की इच्छा जता कर सोने चला गया था पर सालों तक यह अंतिम इच्छा बनी रही जिसे माँ ने पूरा किया|

परिणाम आने के बहुत बाद समझ आया था कि उत्तीर्ण होने की मेरी ज़िद ग़लत थी – अनुत्तीर्ण होकर पूरी तैयारी के साथ दोबारा परीक्षा देना अधिक उचित था| प्रण किया कि आगे इसका ध्यान रखा जाएगा – मेरे सभी सनदी लेखाकार और कंपनी सचिव जानते ही होंगे कि ध्यान रखने का ईश्वर ने भरपूर मौका दिया – साथ में स्व-तालाबंदियों का भी|

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विश्व-बंदी २४ अप्रैल

उपशीर्षक – स्वदेशी और स्वावलंबन

क्या होता, अगर ३१ दिसंबर २०१९ को मैं आपसे कहता कि भारत को स्वदेशी और स्वावलंबन के सिद्धांत की और बढ़ना चाहिए और इन विषयों पर गाँधी के विचारों पर चिन्तन करना चाहिए? शायद मैं खुद अपने आपसे सहमत नहीं होता| परन्तु इस करोना काल में हम सब इस पर विचार कर रहे हैं| मैं नियंत्रित विदेशी निवेश और खुले व्यापार का समर्थक रहा हूँ| मेरी समाजवादी शिकायतें छद्म-पूंजीवाद से जरूर रही है|

पिछली शताब्दी में स्वदेशी के नाम पर स्थानीय उद्योगों के अपरिष्कृत उत्पाद ही जनता को उपलब्ध होते रहे हैं| यही कारण था कि १९९० तक भारत में विदेशी सामान को लेकर इतना उन्माद था कि तस्करों की पूरी फ़ौज माँग पूरा करने में लगी थी| भारत मानवता के इतिहास के लम्बे समय (५००० में से शायद पिछले २५० वर्ष छोड़कर) तक एक निर्यातक रहा है और विश्व-व्यापार के बड़े हिस्से पर अरब व्यापारियों के साथ हमारा नियंत्रण रहा है| यह कहना कि स्वावलंबन के नाम पर हम वर्तमान खुली विश्व व्यवस्था से पीछे हटें तो यह विश्व निर्यात और विश्व अर्थ-व्यवस्था पर पुनः स्थापन्न होने की भारतीय सम्भावना को नष्ट कर देगा|

परन्तु हमें संतुलन की आवश्यकता है| यह संतुलन तीव्र विकास से ही आ सकता है| हमें अपनी अपार जनशक्ति को प्रयोग करने की आवश्यकता है| हमें समझना है कि हमारा जनसँख्या घनत्व अभी तक हमारे हित में ही है और हालात उतने ख़राब नहीं जितने प्रचारित होते रहे हैं – जापान का उदहारण सामने है|

करोना काल यह समझने का अवसर है कि हम किस प्रकार और किस मार्ग पर आगे बढ़ना चाहते हैं| हमारी विश्व-व्यापार का मार्ग हजारों साल अरब व्यापारी रहे हैं हम उनके सहारे दुनिया में अपनी अर्थव्यवस्था को शीर्षस्थ बना कर रख सके हैं| यह स्तिथि तब पलट गई थी जब यूरोपीय व्यापारियों ने हमारे उत्पादन तंत्र पर नियंत्रण हासिल किया था| हमें व्यापार, पूँजी और नियंत्रण के चक्र को समझकर ही कुछ फ़ैसला करना चाहिए|

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विश्व-बंदी २३ अप्रैल

उपशीर्षक – नीरसता की काट

करोना काल में आप भले ही कितना काम या आराम करें एक नीरसता आपको घेर ही जाती है| इस सदी में अधिकतर लोग नीरस समय सारिणियों के साथ जीवनचर्या व्यतीत करते हैं| छात्र जीवन में आशावान भविष्य की आशा इस प्रकार की नीरसता को तोड़ती है| परन्तु मध्यवय में यह नीरसता टूटना इतना सरल नहीं होता| गर्मियों की उदास कर देने वाली छुट्टियाँ याद आतीं हैं जब लू-लपट के कारण दोपहर में घर से निकलना मना नहीं तो कठिन जरूर होता था| लोग ऑनलाइन मीटिंग्स, फिल्मों, टेलिविज़न, ऑडियो बुक्स और वेब सीरीजों में समय खपा रहे हैं| अगर शाम को आप अपने आप को यह नहीं कह पाते कि आज का आपका जीवनसार क्या रहा तो आपके जागृत मष्तिष्क को नींद नहीं आती|

कान में हेड फ़ोन लगाकर कठिन शास्त्रीय संगीत को गुना जा सकता है| अगर आप ध्यान से सुनें तो आप वाकई इस समझ सकते हैं और इसके गुण को आत्मसात कर सकते हैं| मुझे शास्त्रीय संगीत सुनना पसंद हैं भले ही मैं इसकी गंभीर शास्त्रीय में गहरी गोताखोरी नहीं करता| जिन रागों या बंदिशों को पहले नहीं सुना या पुनः पुनः सुनने की इच्छा थी, उन्हें सुन रहा हूँ|

हाल में मैंने ऑडियो बुक का भी प्रयोग करना शुरू किया है| इस का लाभ मैं पहले भी देख चुका हूँ| हम सब जानते कि ज्ञान प्रारंभ में श्रुति परंपरा के चलते ही आगे पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ा है| बहुत की प्राचीन पुस्तकें जैसे वेद श्रुति के रूप में आगे बढ़े| बाद में भी गुरुओं, शिक्षक, मौलवी आदि मौखिक परंपरा से ही पढ़ाते आए हैं| धर्मग्रंथों के सामूहिक पाठ की लम्बी परंपरा रही है| हम सब अभी भी अपनी अपनी कक्षाओं में श्रुति का ही प्रयोग करते हैं| लिपि के घटते बढ़ते महत्त्व की चर्चाएँ होती रहेंगी, परन्तु ज्ञान का सुस्पष्ट मार्ग कर्णमार्ग ही है| लिपि उसके दीर्घकालिक संरक्षण के लिए शायद उचित हो| मैं तो पीडीऍफ़ पुस्तकों को पढ़ते समय भी उसके रीड आउट लाउड फ़ीचर का प्रयोग करता हूँ| इससे ध्यान भटकने की संभावना कम रहती है|

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विश्व-बंदी २२ अप्रैल

उपशीर्षक – न्यायलोप और भीड़हिंसा

अगर समाचार सही हैं तो एक ऐसे गाँव ने जिसमें गैर हिन्दू आबादी नहीं है क्रोधित हिन्दूयों की बड़ी भीड़ ने दो साधू वेशभूषाधारियों की बच्चाचोर मानकर हत्या कर दी| मृतकों की वास्तविक साधुओं के रूप में पुष्टि हुई| कई दिनों तक भारत के दुष्प्रचारतंत्र (आप समाचार तंत्र कहने के लिए स्वतंत्र हैं) ने इसे मुस्लिम आतताई भीड़ द्वारा साधुओं की हत्या के रूप में प्रचारित कर दंगे या गृहयुद्ध के हालात पैदा करने का प्रयास किया| दुर्भाग्य से भारत में भीड़हिंसा परंपरा की तरह स्थापित हो रही है| दुष्प्रचारतंत्र ने वर्तमान घटना का दुष्प्रयोग भीड़हिंसा की बनती जा रही विशिष्ट सामुदायिक पहचान को पलटने के लिए किया था| परन्तु, भीड़हिंसा आखिर क्यों?

इतिहास में राजा-महाराजाओं में भी हमने न्यायप्रियता को सामान्य गुण के रूप में न लेकर विशिष्ट गुण के रूप में दर्ज किया है| मानवता में शासक से लेकर शासित तक का हिंसा ही न्याय का प्रमुख साधन रहा है| न्याय प्रणाली का ह्रास, सत्ता की निस्कृष्टता का पहला प्रमाण पस्तुत करते रहे हैं| पिछले कई दशकों से दुनिया भर के सभी इंगितों (इंडेक्स) में भारत सबसे पीछे न्याय सम्बन्धी इंगितों में ही है और स्तर लगातार गिर रहा है|

अगर न्याय का महंगा या विलंबित हो या न्याय प्रणाली भ्रष्ट तो क्या होगा? समाज वैकल्पिक न्याय व्यवस्था के बारे में विचार करेगा| सरकारी अवैचारिकता के चलते भारत में स्थानीय वैकल्पिक न्याय प्रणालियों का विकास नहीं हो सका है जैसे न्याय-पंचायत, मध्यस्थता और सुलह के औपचारिक ढ़ांचे खड़े नहीं हो सके| यहाँ तक कि बड़े बड़े न्यायाधिकरण निंदनीय रूप से न्यायाधीशों, न्यायविदों, अधिवक्ताओं और सरकारी अधिकारीयों के सेवानिवृत्ति केंद्र बनकर रह गए हैं|

विलंवित न्याय के चलते भारतीय राजनैतिक प्रणाली ने पहले तो पुलिस द्वारा की जाने वाली गिफ्तारियों को न्याय का समकक्ष बना दिया| झूठी या गलत गिरफ्तारियों के मामलों से भारत के तमाम न्यायिक निर्णय भरे पड़े हैं, सबूत के अभाव में आरोपी के छूटने की लम्बी चर्चा होती है परन्तु कोई सरकार या पुलिस से नहीं पूछता कि असली अपराधी कहाँ है या पूरे सबूत क्यों नहीं जुट सके| धीरे धीरे आरोपियों के अन्यायपूर्ण सरकारी हत्याओं को न्याय की संज्ञा दी जाने लगी| तुरंत न्याय का दावा| जिसे मारा गया वो असली गुनाहगार था या नहीं किसे पता? जब भी आनन फ़ानन न्याय की ख़बरें आतीं है, असली अपराधी दावत उड़ाते हैं|

जब जनता ने पाया कि न्याय तंत्र या क़ानून व्यवस्था तंत्र नाकारा है, तो उन्हें अपने हाथ में न्याय को ले लेने का विकल्प दिखाई दिया| जनता का क्रोध उस समय बढ़ जाता है जब अपराधी दूसरे गाँव, समाज, शहर, धर्म, जाति, जिले, प्रदेश, रंग, लिंग, भाषा आदि किसी का हो – कुल मिलाकर बाहरी| फिर जनता सिर्फ बच्चाचोर होने के हल्के से से शक में दो साधुओं के मार देती है| साधुओं द्वारा लॉक डाउन का समुचित पालन न करना उनके प्रति शक को कई गुना बढ़ा देता है| यह बहुत बड़ी कीमत है|

मैं गिरफ्तार हुए सभी आरोपियों को दोयम दर्जे का आरोपी मानता हूँ, भीड़हिंसा के सभी मामले ऐसे ही हैं| मैं पुलिस विभाग को तीसरे दर्जे का दोषी समझता हूँ| दुष्प्रचार तंत्र के बारे में क्या कहा जाए? वो तो नबाब साहबों की पालतू मुर्गा-बटेर हैं| पहले दर्जे के मेरे आरोपी पिछले पचास वर्ष में रहे सभी सांसद, विधायक, न्यायाधिकारी, और न्यायविद हैं| यह न्याय प्रणाली और उसको सहजने वालों का अपराध है|

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विश्व-बंदी २० अप्रैल

उपशीर्षक: भयातुर चिंताएं

कहना चाहता हूँ दिल्ली में डर लगता है| पर देश में डरना मना ही नहीं अक्षम्य पाप है|

वैसे भी इंसान भले ही बिना सोचे बड़े कौर खा ले मगर उसे बिना सोचे बड़ी बात नहीं कहनी चाहिए| करोना शायद इंसानियत को बदलने जा रहा है या शायद नहीं| हम १९१८ से तुलना शायद नहीं कर सकते क्योंकि मानवता और अर्थ व्यवस्था उस समय से बहुत बड़े हैं| जितनी तबाही करोना ने इस साल की है उसे करने में इसे १९१८ में शायद कई गुना समय लगता और आज के सन्दर्भ से देखें तो तबाही का कारण करोना से अधिक हमारी कमजोर चिकित्सा पद्यति होती| कितना दूरगामी प्रभाव वर्तमान बीमारी छोड़ती है, यह इतिहास जानेगा| यदि यह बीमारी लम्बे समय रहती है तो निश्चित ही इसके दूरगामी प्रभाव होंगे| अन्तराष्ट्रीय राजनीति जरूर गरमाई है परन्तु मुझे यह तात्कालिक गुस्से से अधिक फ़िलहाल इसका कोई सार नहीं दिखता| अगले महीने समीकरण किसी भी करवट बदल सकते हैं|

बहुत से गरीब जिन्हें खाने के लिए भीख, कूड़े और झूठन का सहारा था उनके लिए यह दिन कुछ राहत लायें हैं| जिन्हें खैरात लेना नहीं सुहाता उनके आत्मसम्मान पर बन आई है| बढ़ती ग़रीबी और घटता आत्मसम्मान उन्हें नकारा बना सकता है| निम्न मध्यवर्ग के लिए अलग कठिनाई हो सकतीं हैं|

उलट विस्थापन की प्रक्रिया शुरू होने की उम्मीद मुझे है| इसका कारण करोना नहीं बल्कि यह सीख है कि विकास का विकेन्द्रीयकरण होता तो हम बहुत से अपनी लगभग तिहाई अर्थव्यवस्था को चला सकते थे| देश के तिहाई ज़िलों में करोना का असर नहीं है| अगर गांव और तहसील/तालुकों की बात करें तो शायद दो तिहाई गाँव और तालुके एकदम अछूते हैं| इस तरह की स्तिथि में विकेन्द्रीय विकास निश्चित ही अर्थव्यवस्था की हानि को कम कर सकता है| हाँ, अगर विकास विकेन्द्रीय होता तो भौगोलिक रूप से अधिक क्षेत्र प्रभावित होता पर प्रभावित आबादी इतनी ही होती|

परन्तु यह सब अटकलें हैं| वास्तव में मेरा दिमाग यह सोच रहा है कि क्या दिल्ली जैसे महानगर सुरक्षित है? देखा जाये तो अलीगढ़ कहीं अधिक सुरक्षित लगता है| पर कब तक, कितना?

पर दुविधा यह है कि अगर केंद्रीयकृत विकास फैला तो जल्दी ही दिल्ली का प्रभामंडल राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दस बीस वर्ष में अलीगढ़ पहुँच जाएगा| अलीगढ़ की दिशा में गाज़ियाबाद, मेरठ, गौतम बुध नगर, और बुलंदशहर प्रभावित है साथ में निकटवर्ती आगरा भी|

ईश्वर नींद आप भेजते रहना|

विश्व-बंदी १९ अप्रैल

उपशीर्षक – राहत में कमी 

बाजार में बढ़ी हुई सख्ती देख कर लगता है कि सरकार का रुख़ और कड़ा हो रहा है और बहुत सी ढिलाई आसानी से अमल में नहीं आ पाएगी| दांया बांया कर कर लोगों द्वारा अपने कार्यालय खोलने की पूरी तैयारियाँ है| बहुत से कार्यालय कल खुलेंगे| घर में चिंता का माहौल है|

दिल्ली, महाराष्ट्र, पंजाब, तमिलनाडु और कर्णाटक की सरकारें बिना किसी राहत के लॉक डाउन को चलने के आदेश दे चुकी हैं| राज्य सरकारों का यह आदेश केंद्र सरकार के आदेश में दिए गए अधिकारों के तहत है और इसमें कोई विभेद नहीं है| यहाँ तक की केंद्र सरकार ने भी कुछ छूटों में वापिस कमी की है| देखना यह है कि राज्य सरकार के आदेश को कड़ाई से लागू किया जाता है या कठिनाई बढ़ने का खतरा उठाया जाता है| उम्मीद है दिल्ली राजनीति के दलदल में नहीं फंसेगा|

मरने वालों की संख्या देश में पांच सौ और पीड़ितों की सोलह हजार के पार निकल चुकी है| अन्य देशों के मुकाबले यह संख्या कम है, परन्तु ग्राफ़ के नीचे आने तक ख़ुशफ़हमी पाल लेना गलत होगा – हम बीमारी के प्रसार को टालने में कामयाब जरूर हुए हैं| परन्तु बीमारी की समाप्ति की घोषणा तब तक नहीं की जा सकती जब तक बीमारों की संख्या बढ़ने की ख़बरे आती रहेंगी| १९ अप्रेल की शाम पांच बजे, मन्त्रालय की वेबसाइट १३,२९५ लोगों के इलाज जारी होने के बारे में बता रही है|

मैं बहुत से कार्य समय पर नहीं कर पा रहा हूँ| घर से काम करने की पुरानी आदत के बाद भी कई रुकावटें हैं| घरेलू काम जो नौकर चाकर कर लेते हैं, उन्हें करना एक पहलू मात्र हैं| साथ ही इन कामों के साथ में ऑडियो पुस्तकें सुन रहा हूँ| सामाजिक चिंताएं मुझे व्यथित तो करती हैं पर इतना नहीं कि संतुलन खो बैठा जाए| भविष्य, जिसकी चिंता अनावश्यक है, उचित योजना का विषय है| योजना है, लागू करना सरल नहीं हो पाता| बहुत कुछ समझ से परे है| प्रश्न मानसिक रूप से अपने को दुरुस्त रखने का ही नहीं अपना ध्यान आवश्यक कार्यों में बनाए रखने का भी है|

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विश्व-बंदी १७ अप्रैल

उप-शीर्षक: संशोधित समेकित दिशानिर्देशों के साथ गृह मंत्रालय का आदेश

आज जब भारत सरकार के सूक्ष्म , लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय का ईमेल मिला| इसमें संशोधित समेकित दिशानिर्देशों के साथ गृह मंत्रालय का आदेश दिनांक 15.04.2020  संलग्न करते हुए मंत्रालय ने आग्रह किया है कि कोरोना वायरस संक्रमण को रोकने के लिए इकाइयों में सभी एहतियाती उपाय किए जाने चाहिए। साथ ही बहुत से मित्रों से वार्तालाप करते हुए समझ आया कि कुछ उद्योगपति और अधिकारी भले ही खुद घर पर बैठे हों, परन्तु कर्मचारियों और कामगारों के प्रति सहानुभूति न रखते हुए उन्हें येन-केन प्रकारेण कार्यालय में देखना चाहते हैं| तो सोचा कि इस सरकारी आदेश को कानूनी निगाह से देखा जाए| आज की करोना डायरी में यही सही|

मुख्य बात यह है कि अगर आपका कार्यालय या कारखाना अगर खोले जाने की अनुमत सूची में है तो उसे किस प्रकार की सावधानियाँ बरतनी है और किसे बुलाना यां नहीं बुलाना है|

आवश्यक रूप से कड़ा पाठ

क्यों कि यह आदेश एक ऐसे कानून से है जिसमें सजा का प्रावधान है और इसका उद्देश्य बेहद ख़तरनाक बीमारी को रोकना है, इसलिए इसको कड़ा नियम मानकर पढ़ना उचित होगा| इसका ढीला ढाला पाठ आपको सजा का भागी बना सकता है| इस कानून को तोड़ने पर आपको सजा देने के लिए आपकी दुर्भावना सिध्द करने की आवश्यकता नहीं होगी|

क्यों कि यह आदेश बेहद कम समय में तैयार किया गया है अतः इसमें कुछ बाते आगे पीछे हुई हैं| हमें इसे समग्र आधार पर ही पढ़ना चाहिए|

उलंघन पर सजाएँ

इस आदेश का उलंघन करने पर उलंघन करने वालों, जिनमें सरकारी कार्यालय व कंपनियों के अधिकारी शामिल हैं, को तो साल तक की जेल हो सकती है, साथ में जुरमाना तो है ही|

अनुमति नहीं है:

तेरह प्रकार की गतिविधियाँ पूरे देश में हर हाल में पूर्णतः बंद है| कुछ गतिविधियों को (पैराग्राफ ५-२० में) कन्टेनमेंट ज़ोन के बाहर अनुमति दी गई है| अन्य जिन गतिविधियों को अनुमति नहीं दी गई है उन्हें केवल घर से कार्य करने करवाने की अनुमति समझी जानी चाहिए और इसके लिए कार्यालय भूल कर भी न खोलें|

केंद्र सरकार में लगभग १७० ज़िलों को हॉट स्पॉट घोषित किया है| स्थानीय प्रशासन उन ज़िलों में इलाकों को कन्टेनमेंट ज़ोन घोषित कर सकता है, उदहारण के लिए दिल्ली में सभी नौ जिले हॉट स्पॉट हैं और इनमें इस समय कुल ६० कन्टेनमेंट ज़ोन हैं|

नहीं बुला सकते:

अनुमति के नियमों में सरकारी क्षेत्र और कुछेक अन्य क्षेत्र को अधिकतम अनुमति सीमा के अन्दर ही कर्मचारी बुलाने की अनुमति है| उदहारण के लिए सरकारी कार्यालयों में छोटे और मझोले अधिकारियों व् कर्मचारियों को ३०% से अधिक क्षमता में नहीं बुलाया जा सकता| परन्तु असली नियम यह नहीं है बल्कि अन्य है| असली नियम मैं नीचे बता रहा हूँ:

  • कन्टेनमेंट ज़ोन में रहने वाले कर्मचारी नहीं बुलाये जा सकते, पर यह घर से काम कर सकते हैं
  • ६५ वर्ष से अधिक आयु के कर्मचारी नहीं बुलाये जा सकते, पर यह घर से काम कर सकते हैं|
  • किसी भी बीमारी के ग्रस्त कर्मचारी, भले ही वो कार्यालय आने के लिए तैयार हों, नहीं बुलाये जा सकते, पर यह घर से काम कर सकते हैं|
  • ऐसा कोई स्त्री-पुरुष जिनकी कोई भी संतान पांच वर्ष के कम हो, नहीं बुलाये जा सकते, पर यह घर से काम कर सकते हैं|
  • बिना चिकित्सा बीमा कराएँ किसी व्यक्ति को नहीं बुलाया जा सकता, पर यह घर से काम कर सकते हैं|
  • कार्यालय और किसी भी मीटिंग में बैठे हर व्यक्ति को दूसरे से एक मीटर/६ फुट दूर खड़ा या बैठा होना चाहिए|
  • किसी भी मीटिंग में १० या अधिक लोग सामान्यतः नहीं बुलाए जाने चाहिए|
  • किसी भी गैर जरूरी व्यक्ति को कार्यालय आने की अनुमति नहीं होगी|

कार्यालय की तैयारी:

  • कार्यालय आने वाले हर व्यक्ति के आने जाने का प्रबंध कार्यालय करेगा, इसके लिए किसी भी सार्वजानिक वाहन का प्रयोग नहीं होगा|
  • किसी भी वाहन में उसकी क्षमता के चालीस प्रतिशत से अधिक लोग नहीं बैठे होंगे| यानि चार और पांच सीटों वाली कार में मात्र दो लोग| पचास लोगों की बस में बीस लोग मात्र|
  • कार्यालय खुलते और बंद होते समय सेनिटाइज़ किया जाएगा|
  • कार्यालय में आते हर वाहन और उपकरण को विषाणु रहित किया जायेगा – लेपटोप, पेन पेन्सिल को शामिल समझने में ही भलाई समझें|
  • कार्यालय में हर आते और जाते व्यक्ति के तापमान जाँचने की पूरी थर्मल स्क्रीनिंग व्यवस्था होगी|
  • हर उचित स्थान पर सेनिटाइज़र और हाथ धोने की व्यवस्था होगी|
  • भोजन-अवकाश के साथ नहीं होगा हर व्यक्ति अलग अलग भोजन करेगा| मित्रता और घुलने मिलने की अनुमति न दें|
  • कोई बड़ी मीटिंग नहीं होगी|
  • किसी भी हालात में एक साथ पांच व्यक्ति इकठ्ठे न हो| बेहतर समझ कहती है कि एक व्यक्ति प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से अधिक व्यक्तियों के संपर्क में न आए|
  • कार्यालय के निकटतम मौजूद कोविड -१९ जाँच केंद्र और अस्पताल और क्लिनिक की जानकारी उपलब्ध रहेगी|

विश्व-बंदी १६ अप्रैल

उपशीर्षक – यमदूत

मौन उदास भय के कितना बेहतर है यह जान पाना कि दुनिया काजल की कोठरी जितनी काली नहीं है| देश में ३२५ जिले में करोना का कोई मामला नहीं आया है, ७० जिले ख़तरे से बाहर आते हुए लगते है| मगर डरता है दिल, देश में ७३६ ज़िलों में से १७० ज़िले नक़्शे पर लाल रंगे गए हैं – दिल्ली के सभी नौ रत्न और पूरे का पूरा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र|

रोज दरवाज़ा खटकने पर ये आशंका होती है कि यमदूत तो नहीं| सुबह सुबह देशी गाय का अमृत माना जाने वाला दूध देने आने वाला दूधवाला भी समझता है, मैं उसे और वो मुझ में यमदूत के दर्शन करने की चेष्टा कर रहा है| मुझे नहीं मालूम कि मेरे कर्मफल का तुलन पत्र क्या कहता है| खाने पीने का सामान लेने या तो आप जाएँ या किसी को बुलाएँ – हिम्मत का काम लगता है| दवा लेने गया था तो दुकान का कारिन्दा बोला, यूपीआई कर दीजिए नगद ले तो लेंगे पर डर लगता है| ख़बर है एक पिज़्ज़ा देने वाले को विषाणु ने जकड़ा है सौ लोग अपने घर की निगाह्बंदी में हैं| रहम हो दुनिया पर|

करोना काल में में जीवन ने बदलना शुरू किया है| पहले यूपीआई का प्रयोग नहीं करता था अब हम नगद न देना चाहते हैं न लेना चाहते हैं| मन में ख़राब विचार न आएं इसके लिए झाड़ू बुहारू करते समय काम में मोबाइल के एप पर कान में हेडफ़ोन लगाए किताबें सुनता हूँ – पूरे ध्यान से| गाने पहले भी कम सुनता था अब भी कम सुनता हूँ – सुगम संगीत एकाग्रता की दरकार नहीं रखता _ ख़राब विचार आते जाते रहते हैं| साल में एक आध फ़िल्में देखने का हुआ ये है कि एक महीने की गिनती ही तीन पर है| खाने के शौक का ये कि हर हफ्ते में दो बार नए प्रयोग हो रहे हैं| यूं तो मैं हर दिन सोचता हूँ शाकाहारी और माँसाहारी के झमेले को छोड़ सर्वभक्षी बना जाए| मरना तो यूँ भी है| भला हो करोना विषाणु का कि दिल ने पक्का कर दिया है कि अगर यह जैविक हमला है तो अगला जैविक हथियार आलू पालक मूली बैगन है ही आएगा तो हम कुछ भी खाएगा| अन्न खाना पहले ही शास्त्रोक्त नहीं है शाकाहार में भी कंद मूल फल का ही विधान है|

नाइयों के पास जाने के ख़तरे को देखते हुए अपने सिर पर खुद से मशीन पहले ही चला चुका हूँ|

आगे आगे देखिए होता है क्या?

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विश्व-बंदी १५ अप्रैल

उपशीर्षक – मध्यवर्गीय असंवेदना 

केंद्र सरकार और अधिकतर राज्य सरकारें भले ही सम्यक दृष्टिकोण से करोना से लड़ने का प्रयास कर रहीं हों, विपक्ष भले ही सरकार के साथ खड़ा हो, परन्तु यह लड़ाई को वर्ग-भेद, धर्म-भेद, और शायद जाति भेद से प्रभावित हो रही है| अफ़सोस यह भी है कि धर्मान्धता और धर्म-भेद भले ही खुल कर सामने आया है, परन्तु वर्गभेद अधिक ख़तरनाक रूप से इस लड़ाई को प्रभावित कर रहा है|

भारत सहित दुनिया भर में शुरू से ही करोना ने हवाई यात्राओं के माध्यम से प्रवेश करते हुए मुख्यतः उच्च मध्यवर्ग और मध्य वर्ग को अधिक प्रभावित किया है, परन्तु इससे हो रही लड़ाई निम्न वर्ग के विरूद्ध असंवेदना के साथ शुरू हुई है|

रोग के खतरनाक वाहक होने के उच्चतम खतरों के बाद भी, उच्च मध्यवर्ग विदेशों से अपने घर वापिस आने में सरकारी सहायता और विमान प्राप्त करने में सफल रहा| इस वर्ग का एक बड़ा तबका लॉक डाउन के बावजूद सम्बंधित राज्य सरकारों की सहायता से हरिद्वार से अहमदाबाद और वाराणसी से आन्ध्र प्रदेश वापिस पहुँचाया गया|[i] यह सभी लोगों जहाँ रह रहे थे वहाँ इनके पास उचित रहना, खाना, देखभाल और इनका पूरा ध्यान रखने की व्यवस्था थी| परन्तु यह परिवार से दूर थे, इन्हें परिवार और परिवार को इनकी चिंता थी| क्या भारत के निम्न वर्ग के पास परिवार और पारिवारिक जिम्मेदारी नहीं है?

परन्तु पहले जब दिल्ली और बाद में सूरत और मुंबई के निम्न वर्ग ने घर वापिस जाने की अनुमति, सुविधा और सहायता मांगी तो उन्हें सरकारी लाठीचार्ज का सामना करना पड़ा| अफसोसनाक रूप से दिल्ली से एक बहुत बड़ा निम्न वर्गीय समुदाय पैदल ही घर की चल दिया| कौन सात दिन तक भूखा प्यासा पैदल लुधियाना और दिल्ली से चलकर बरेली या पटना जाता है? केरल से बिहार तक की यात्रायें दुनिया भर के समाचारों में दर्ज हुईं| जिस समय यह सब हो रहा था, निम्न वर्ग में करोना के संक्रमण का कोई मामला सामने नहीं आया था| मैं मानता हूँ, खतरा था और परन्तु बेहद सरल उपाय भी| यात्रा से पहले और बाद में जाँच और बहुत जरूरत होने पर कुछ दिन निगाहबंदी|

भारत में कुलीन ब्राह्मण भी अगर निम्नवर्गीय हो तो तीसरे दर्जे का नागरिक होता है| यह बात अलग है कि धर्म और जाति के नाम पर वो अपने आप को कुछ भी समझता रहे|

खैर, मुंबई में कल की घटना के लिए एक पत्रकार को ट्रेन चलने की अफवाह फ़ैलाने के लिए गिरफ़्तार किया गया है| भावनाओं का दुष्प्रयोग किसी ने भी किया हो भावनाएं है और उनका विष्फोट कष्टप्रद होगा| इसलिए उचित कदम उठने चाहिए|

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[i] https://m.jagran.com/uttar-pradesh/varanasi-city-twenty-buses-carrying-900-pilgrims-from-south-india-left-for-varanasi-20188325.html

https://m.timesofindia.com/city/ahmedabad/1800-people-stranded-in-uttarakhand-to-return-to-gujarat-in-28-buses/amp_articleshow/74862565.cms

https://www.bhaskar.com/amp/db-original/news/amit-shah-vijay-rupani-latest-updates-on-gujarat-pilgrims-return-from-haridwar-rishikesh-over-coronavirus-lockdown-127094521.html?__twitter_impression=true

https://newsd.in/gujarats-1800-pilgrims-return-from-haridwar-by-luxury-buses-in-amid-lockdown-amit-shah-vijay-rupani/amp/?__twitter_impression=true

विश्व-बंदी १३ अप्रैल

उपशीर्षक – अनिश्चितता

सभी चर्चाओं में एक बात स्पष्ट है| मध्य वर्ग लॉक डाउन के लिए मन-बेमन तैयार है| उच्च वर्ग को शायद कोई फर्क नहीं पड़ता परन्तु उनके लिए लम्बा लॉक डाउन अधिक कठिनाई भरा होगा| भारत के बाहर भी हालात अच्छे नहीं इसलिए उनकी चिंता है है कि किसी प्रकार काम धंधे को चलाया जाए| लम्बा लॉक डाउन उनकी संपत्ति को बैठे बिठाए नष्ट कर सकता है| वैसे भी अर्थ-व्यवस्था राम-भरोसे है|

निम्नवर्ग को पूछता कौन है, उनके पास विकल्प नहीं है| साथ ही, लंगरों, सरकारी भोजनालयों, रैन बसेरों का उनको सहारा है| इन में से बहुत से लोगों के लिए मुफ्तखोरी बढ़िया चीज है तो बहुत से अन्य आत्मसम्मान बचा कर रखने की लड़ाई हारने के कगार पर है| एक बार आत्म सम्मान नष्ट हो जाता है तो उन्हें नकारा होने से कोई नहीं रोक सकता| शहरी निम्न वर्ग में यह खतरा अधिक है क्योंकि उनका स्वभाविक सामाजिक ताना-बाना परवाहहीन होता है| आत्म-सम्मान सामाजिक सम्मान की कुंजी है| अगर सामाजिक सम्मान की इच्छा न हो तो आत्म सम्मान का कोई मतलब नहीं होता|

मध्यवर्ग की चिंताओं का समुद्रमंथन हो रहा है| यही कारण है कि यह वर्ग रामायण, महाभारत, गीता, कुरान, आध्यात्म, आदि की चर्चा में व्यस्त रहकर इस समय को काट लेना चाहता है परन्तु उनके पास कोई कारगर राह नहीं| यह वर्ग अपने आप को राष्ट्र का कर्णधार समझता है| इनके पास अपनी हर हार हानि का दोष देने के लिए कोई न कोई होता है – मुस्लिम, आरक्षण, अमीर, गरीब, पूंजीवाद, साम्यवाद, या फिर माता-पिता भी| यह वर्ग महानगरों में सबसे बुरे हालात का सामना करने जा रहा है| करोना की बीमारी भी मुख्यतः इसी वर्ग को प्रभावित कर रही है|

white ceramic sculpture with black face mask

Photo by cottonbro on Pexels.com

कल प्रधानमंत्री मोदी का राष्ट्र के नाम संबोधन है| अटकलों का बाजार गर्म है| लॉक डाउन बढ़ता है तो जान है, नहीं बढ़ता तो जहाँ है – वर्ना लटकती तलवार है| जनमानस लम्बे संघर्ष के लिए तैयार है| परन्तु हर किसी को विश्वास है कि किसी को हो मगर बीमारी उसे नहीं होगी| आज देर शाम बाजार की तरफ जाना पड़ा| आधे लोग नक़ाब नहीं पहने थे| मेरे सामने पुलिस वाले ने दो लोगों के डंडे लगाये और तीन लोग गलती से भूल आए की मिन्नत कर रहे थे| मिन्नत करने वालों में एक का कहना था कि उसके पास घर पर हजार रुपए वाला मास्क है| पुलिस वाले ने कहा तो उसे लॉकर में रखो और डंडा कहने के बाद पहनने के लिए सस्ता वाला मास्क खरीद लो|

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विश्व-बंदी १२ अप्रैल

उपशीर्षक – संशय और भूकम्प 

शुरूआती गर्मियों उदास छुट्टियाँ का रविवार बचपन में बड़ा भारी पड़ता था| रसोई पर कुछ खास करने का दबाव रहता तो अनुभव बदलते मौसम में गरिष्ट से बचने की सलाह देता| पंद्रह दिन में किस्से कहानी, किताबें, पतंगे, पतझड़ और खडूस हवाएं नीरस हो चुके होते – ककड़ी, खरबूजा, तरबूजा, खीरा, शर्बतों, और कचूमारों का सहारा भी कोई बहुत दिन तक आकर्षित नहीं कर पाता| दिल के राजा आम अभी बहुत दूर हैं| यहाँ तक आम पना भी अभी उपलब्ध नहीं दिखता|

लॉक डाउन में सबसे बड़ी बात यह कि घर में कोई सहायक नहीं, साफ़ सफाई, रसोई बाजार सब घर के लोगों को ही करने हैं साथ में अपने अपने दफ्तरों के काम भी करने हैं| टेलीविजन की आवाज कम करने के लिए कहने का खतरा भी गंभीर है – आखिर बच्चे क्या करें?

मित्रों के साथ दिन में राज्यों के मुख्यमंत्री राहत कोष में दिए गए योगदान को सामाजिक जिम्मेदारी खर्च न मानने की केंद्र सरकारी घोषणा पर चर्चा हुई| हम सब स्वयं-इच्छा योगदान को जबरन सरकारी कर बनाये जाने के सरकारी क़ानून से दुःख महसूस करते रहे हैं, इस बुरे दौर में सरकारी अहम् बेहद चिंता का विषय है| आम राय यह रही कि सरकार को इस बुरे दौर में राज्यों के मुख्यमंत्री राहत कोष में दिए योगदान को सामाजिक जिम्मेदारी खर्च मान लेना चाहिए था – कम से कम कुछ समय के लिए|

सुबह पंजाब में निहंग सिखों के समूह द्वारा पुलिस अधिकारी के हाथ काटने की घटना से बेहद अधिक दुःख हुआ| मुझे यह भारत के विरुद्ध और उससे अधिक मानवता के विरुद्ध युद्ध की घोषणा जैसा लगा| कट्टरपंथी हिन्दू मुस्लिम सिख देश को डुबो देंगे|

दिन घटना विहीन जा रहा था तभी मोबाइल हाथ से गिरा और आधी स्क्रीन चकनाचूर – काँच की एक छोटी किरच अंगूठे में लग गई| निकालने के देशी नुस्खे अजमाकर चुके ही थे कि मुआ भूकम्प आ धमका| बैठे ठाले यह भूकम्प मुझे ६ से ज्यादा का लगा और यह मानकर कि पहाड़ों या विदेश में केंद्र होगा मुझे ८-९ की आशंका हुई| भला भगवान् का, ३.१ का भूकम्प बताया जा रहा है| उसके बाद भयभीत दिल्ली का दिल बैठा हुआ लग रहा है| वैसे भी दिल्ली के दिल वाले इश्क, कबाब, शराब, शबाब, चाट पकौड़ी बिरयानी के अलावा डरपोक ही होते हैं|

भूकम्प के चलते कुछ दोस्तों रिश्तेदारों से बात हुई|

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विश्व-बंदी ७ अप्रैल

उपशीर्षक – आराम की थकान 

लॉक डाउन को बढ़ाये जाने की इच्छा, आशा, आशंका और समर्थन की मिली जुली भावना के साथ मुझे यह भी कहना चाहिए कि मैं इस से थकान भी महसूस कर रहा हूँ| साधारण परिस्तिथि में कई बार ऐसा हुआ है कि मैं महीनों घर से नहीं निकल सका हूँ| परन्तु जब आप मर्जी के मालिक हो तो आप कुछ भी कर सकते हैं| मुझे मालूम है कि लॉक डाउन के हटने के महीने दो महीने बाद भी शायद मैं आसानी से घर से न निकलूँ| परन्तु छोटी छोटी इच्छाएं होती रहती है| ऐसा नहीं कि मैं इन कामों के लिए जा नहीं सकता परन्तु लॉक डाउन के साथ आत्म नियंत्रण भी है| कई दिन से ब्रेड कटलेट खाने की इच्छा बलबती हो रही है| इन्द्रिय निग्रह के समस्त प्रयास भोजन पर ही सबसे पहले अटकते हैं| जिव्हा की वासना प्रबल होती है| अस्वादी और स्वाद रसिक होने का मेरा प्रयास तो सदा सफल है| अल्पआहारी होने के प्रयास में भी लगातार सफलता रही है| आज कांदे की सब्ज़ी बनाई खाई| अरहर की दाल तो पत्नी को मेरे हाथ की ही पसंद है| मजे की बात यह है कि साधारण चावल बनाना आज भी मुझे कठिन लगता है|

दो दिन से फल सब्ज़ी वालों की अचानक कमी हो गई है| अगर कल कोई ठेलेवाला नहीं आया तो फिर खुद जाकर सामान देखना पड़ेगा| दिन भर बार बार घर के आगे की सड़क और पीछे की गली में झाँकते बीत जाता है| कुछ तो दिखाई दे कोई तो कहानी हो कोई तो कहासुनी करे कुछ तो दिल लगे|

सड़क पर सूखे पत्ते बिखरे पड़े हैं| आज दो दिन बाद झाड़ू लगी मगर कुछ पल में ही सड़क पुनः पत्तों से भर गई| कड़ कड़ खड़ खड़ की आवाज करते हुए ये सूखे पत्ते जब हवा में नाचते गाते नीचे उतरते हैं तो दिल में संगीत उतरता है| जमीन पर बिछे हुए सूखे पत्तों पर चलना और उनकी आवाज सुनने में अपना अलग आनंद है| यह आनंद हमने अपने आप से छीन रखा है|

कल की गर्मी के बाद आज ठंडी हवा है| आसमान में बादल हैं| मौसम को भी अपनी जिन्दगी का कुछ पता नहीं| कब क्या क्या बदल जाए, क्या पता| दो महीने में दुनिया बदल गई| इंसान बदल गए|

मगर क्या वाकई हम बदल जायेंगे? लगता तो नहीं|

 

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विश्व- बंदी ४ अप्रैल

उपशीर्षक – निशानदेही 

आज लोदी रोड पुलिस थाने से फ़ोन आया| पति-पत्नी से पिछले एक महीने आने जाने का पूरा हिसाब पूछा गया| पूछताछ का तरीका बहुत मुलायम होने के बाद भी तोड़ा पुलिसिया ही था| कुछ चीज़े शायद स्वाभाव से नहीं निकलतीं या शायद मेरे मन में पुलिस कॉल की बात रही हो तो ऐसा महसूस हुआ| मेरा अनुभव है कि दिल्ली पुलिस शेष उत्तर भारत की पुलिस से कहीं अधिक जन सहयोगी है| मेरे जबाब में बस्ती निज़ामुद्दीन का ज़िक्र तक नहीं था तो उसने सीधे ही मुझ से पूछ लिया| मैंने अपना आवागमन मार्ग समझा दिया तो उसे थोड़ी संतुष्टि हुई| मगर फिर भी शंका के साथ उसने हालचाल और अतापता पूछ लिया| फिर भी उसे चिंता थी कि मेरा मोबाइल उस टावर की जद में कैसे आया तो तकनीकि और भौगोलिक जानकारी के साथ संतुष्ट करना पड़ा|

वैसे परिवार में सब पंद्रह दिन से घर में ही बंद हैं| मेरे अलावा कोई भी दूध सब्जी लेने के लिए भी सीढ़ियाँ नहीं उतरा| मोहल्ले के बाहर मेरी अंतिम यात्रा भी २० मार्च को हुई थीं| वह तारीख भी पुलिस वाले के रिकॉर्ड में भी थी| ऐसा इसलिए हुआ कि मैं बस्ती निज़ामुद्दीन से मात्र कुछ सौ मीटर से ही तो गुजरा था| मोबाइल टावर आपकी मौजूदगी तो दर्ज करते ही हैं| घर भी तो बहुत दूर नहीं है निजामुद्दीन से|

मोबाइल फोटोग्राफी का एक वेबीनार देखा| जोश में दो तीन फ़ोटो खींचे गए और विडियो बनाए गए| तो

मकान मालिक रोज हालचाल के लिए फ़ोन करते हैं| आज बैंक तक गए थे| पूछा तो कहने लगे बहुत जरूरी काम था| क्या दिन आए हैं – बैंक जाने के लिए भी सफाई देनी पड़ती है| वो घर के प्रांगण में ही टहलने का उपक्रम करते हैं वर्ना रोज लोदी गार्डन जाते थे|

घर में लिट्टी-चोखा बनाया गया| यहीं समय है कि नए नए पकवान बनाए खाए जाएँ| परन्तु घुमने फिरने की कमी के कारण अतिरिक्त व्यायाम का भी ध्यान रखना पड़ रहा है|

इन दिनों आसमान का नीलापन दिल चुरा लेने वाला है| चाँद पूरे रंग ढंग में चमकता है| तारों ने भी अपनी महफ़िल मजबूती से जमा ली है| हल्की ठंडक में बाहर ही सो जाने का मन करता है| बचपन के वो दिन याद आते है जब हम छत पर सोते थे| अभी समझ नहीं आता कि छत पर सोना उचित हैं या नहीं| अजीब सी बेचैनी महसूस होती है|

विश्व- बंदी १ अप्रैल

उपशीर्षक – अप्रैलफूल 

आज अप्रैलफूल है| पिछले एक माह से मानवता इसे मना रही है| किसी ने चीन का शेष विश्व पर जैविक हमला बताया तो किसी ने अमेरिका के चीन पर जैविक हमले और उस के वापसी हमले की बात की| कोई इसे लाइलाज बता रहा है तो किसी को मात्र सर्दी जुकाम जैसे लक्षण हो रहे हैं| कोई गोबर – घंटे से ठीक कर रहा है तो कोई नमाज़ से| भारत सरकार कहती है इस बीमारी का भारत में कोई सामुदायिक फैलाव नहीं हैं मगर स्थानीय फैलाव की बात कर रही है जो सामुदायिक फैलाव का मामूली सा हल्का रूप है| भारत के सरकारी आंकड़े का अध्ययन करने पर लगता है उतना बुरा हाल नहीं, मगर सरकारी आँकड़े पर भरोसा कौन करता है?

अभी तक के आंकड़े के हिसाब से दस प्रतिशत से अधिक मृत्यु दर नहीं है| कुछ वर्ष पहले मलेरिया हेजा आदि शायद अधिक खतरनाक थे| देखा जाये तो साधारण सर्दी जुकाम की भी तो कोई पक्की दवा हमारे पास नहीं हैं| हमें चिंता करने और सावधानी बरतने की जरूरत है, घृणा और डर की नहीं|

पिछले दो दिन से अचानक एक धर्म विशेष की संस्था विशेष को खलनायक मान लिया गया है, जो शायद काफी हद तक सही लगता है, मगर केंद्रीय और स्थानीय सरकार इस सन्दर्भ में अपनी गलतियाँ छुपाकर बैठ गईं है| तबलीग वालों से सबसे अधिक ख़तरा मुस्लिम समाज को है, क्योंकि ये उनके बीच जाकर बैठेंगे|

बीमारी से अधिक घृणा फ़ैल चुकी है और उस से अधिक फैला है डर| हिन्दू इस मुद्दे पर मुस्लिमों से घृणा सिर्फ अपना खून जला रहे हैं| किसी को अगर यह बीमारी लगती हैं तो फिलहाल अपने किसी निकट वाले से होने की सम्भावना अधिक है| इसका ध्यान रखें|

हजरत निजामुद्दीन को दिल्ली का संरक्षण माना जाता रहा है| तबलीग वाली घटना के सामने आने के बाद से जंगपुरा की सड़के काफी सुनसान पड़ी थी| तीसरे पहर दवा का छिडकाव होने के बाद फिर से हल्की चहल पहल हो गई| जनता खुद चीजों को बहुत हल्के में लेती है| शाम टहलने वाले भी निकले|

तबलीग का एक असर यह मिला की आज पीछे पार्क में मंदिर का घंटा कम बजा| पुलिस वाले की दिन से कह रहे थे कि घंटे को कोई भी छूता है, केवल एक आदमी ही बजाए| आज कुछ असर हुआ|

दोस्तों, रिश्तेदारों, पड़ोसियों से दूरी बनाकर रहें, बाकि लोग तो वैसे भी आपके पास नहीं आ पाएंगे| आज वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग पर रिश्तेदारों से बात हुई| बढ़िया रहा|

विश्व-बंदी ३१ मार्च

उपशीर्षक – वित्तवर्ष का अंत 

कुछ घंटों में यह वित्त वर्ष बुरी यादों के साथ समाप्त होने जा रहा है| मैं आशान्वित हूँ कि नया वर्ष फिर से बहारें लाएगा| इस साल पहले दस महीने शानदार बीते| बहुत कुछ नया सीखा, किया और कमाया| मगर बही खाते कर चटख लाल रंग उड़ा उड़ा उदास सा हो गया है|

लेनदारियां बहुत बढ़ चुकी हैं और इस माहौल में उनकी वसूली सरल तो नहीं दिखती| पिछले एक महीने से कोई खास बिल नहीं कटे| अप्रैल से जून से वैसे भी थोड़ा तंग रहता है| इस बार हालत शायद और तंग रहेंगे| उधर, मुवक्किल पैसा समय पर नहीं देते मगर सरकार को अपना वस्तु-सेवाकर तुरंत चाहिए होता है| सरकारी कर गांठ से देना बहुत भारी पड़ता है| जब सरकार खुद आपकी मुवक्किल हो तो स्तिथि नाजुक ही रहती है| केवल रकम वसूल हो जाने रेशमी भरोसा रहता है| हम सेवा प्रदाता तो सिर्फ कागज पर ही सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम हैं| जमीनी लाभ शायद कुछ नहीं|

इस समय बचत से लिए गए निवेश के हालात भी अच्छे नहीं| यह साँप छछुंदर की स्तिथि है| निवेश करें तो जवानी ख़राब, न करें तो बुढ़ापा| उसपर यह मंदी का समय किसी कंगाली से कम नहीं पड़ता| शेयर बाजार में मंदी के चलते निवेश बकत कुछ नहीं तो आज सरकार ने बचत वगैरा पर ब्याज घटा दी| कंगाली में आटा गीला हो चुका है| आटे से याद आया – पिछला गल्ला भी ख़त्म हो रहा हैं और इस महीने का गल्ला भरने के लिए आधे देश के पास पैसे नहीं बाकि बचे लोग के पास दूकान जाने की समस्या|

जिन लोगों के पास नौकरियां हैं उनकी भी समस्या है| लगभग सबको साल के आखिर और कार्यालय के बंद होने के कारण औना – पौना वेतन मिला है| मुनीम भी घर पर और याददाश्त से कितना हिसाब किताब लगायें|

ब्याज घटने से भविष्य निधि पर ७.१ फ़ीसदी, बचत पत्र पर ६.८ फ़ीसदी, किसान विकास पात्र पर ६.९ फ़ीसदी का ब्याज मिलेगा| बचत खाते पर सरकार ने ४ फीसदी पर ही ब्याज रखा हुआ है| इस सब से बुढ़ापे का गणित बिगड़ जाता है| मगर कुल मिलकर ब्याज की दर जीवनयापन की महंगाई की दर से कम होने का अंदेशा हो सकता है| यह बाद अलग है कि बाजार खुद मंदा हो रहे|

सरकार ने दिवालिया कानून को थोड़ा कमजोर थोड़ा सुस्त बनाया है तो काम धंधे में कमी रहेगी| इधर कुछ नया जानने सीखने की जरूरत रहेगी कि कुछ नया काम धंधा मिलता रहे|

प्रार्थना रहेगी बाज़ार में मंदी और देश में अकाल के हालात न बनें| यह नामुराद बीमारी और दुर्भिक्ष जल्दी दूर हो|

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विश्व-बंदी ३० मार्च

उपशीर्षक – संशय का दिन 

लाइव हिस्ट्री इंडिया ब्लॉग पर १८९७ में फैली प्लेग की बीमारी के बारे में पढ़ रहा था| इस बीमारी ने ही कांग्रेस को अंग्रेजपरस्तों के क्लब के स्थान पर होमरूल के लिए लड़ने वाले संगठन में बदल दिया था| प्लेग और होमरूल के बीच की कड़ी बना था एपिडेमिक डिजीज एक्ट, १८९७ नाम का अत्याचारी क़ानून जिसे वर्तमान सरकार ने पुनः लागू किया है| क्या भारत को पुनः कोई बाल गंगाधर तिलक मिलेगा?

बीमारों के संख्या ने हजार का आँकड़ा पार कर लिया है| सरकार ने दिल्ली के दो अधिकारिओं को बर्खास्त कर दिया है और दो के विरुद्ध कार्यवाही का आदेश दिया है – आरोप कि उन्होंने मजदूरों की भीड़ आनंद विहार और कौशाम्बी के बस अड्डों पर लगवाई|

सोचता हूँ अगर मेरे पिता होली अकेले अलीगढ़ होते या मेरा पूरा परिवार अलीगढ़ रहता होता तो क्या मैं खुद पैदल चलकर अलीगढ़ नहीं जाता? न आप ख़ुद अकेले मरना या बीमार होना चाहते हैं न किसी परिवारीजन को अकेले मरते या पड़े देखना चाहते हैं| दिल्ली में बिना कमाई के रहना, खाना, नहाना और पुलिस से पिटते रहता तो बाद की बात हैं| जननी जन्मभूमि स्वर्गादपि गरीयसी – जननी वो जमीन हैं जहाँ आपकी नाल गढ़ी हुई है| सरकार बीमारी पर नहीं राजनीति पर ध्यान दे रहीं है| बीमारी लम्बी चली और उसने मध्यवर्ग को लपेटा तो मोदीभक्त अपने नाना-दादा की तरह नेहरू-भक्त बनने में देर नहीं करेंगे|

इधर आज सोमवार भी है| अधिकारीयों को नहीं पता कि कर्मचारी से कितना काम लेना हैं – १. घरेलू सहायक न होने की वजह कर्मचारिओं के पास समय कम हैं; २. घर से काम करने की आदत नहीं, ३. उनके पास घर में कार्यालय की वैकल्पिक व्यवस्था नहीं है; और ४. अधिकारीयों और कर्मचारियों दोनों को समय का पूरा भान नहीं हो रहा|

राज्य सरकारें गाँव घर पहुँचने वाले लोगों  के साथ बुरा बर्ताव कर रहीं हैं| उन्हें डर है कि ये बीमारी के संवाहक हो सकते हैं| क्वॉरंटीन के नाम पर बाड़ों, जेलों, कैम्पों में एक साथ ठूंस दिया जा रहा है| हम विष्फोट की और बढ़ रहे हैं| सामुदायिक संक्रमण अपनी शुरुआत से साथ ही बुरे दौर में प्रवेश कर सकता है|

जर्मनी के एक राज्य के वित्त मंत्री ने गिरती अर्थव्यवस्था के चलते आत्म हत्या कर ली है| उधर मेरे पड़ोस में निजामुद्दीन बस्ती को पुलिस ने घेर लिए है, क्योंकि २०० लोगों को संक्रमण पाया गया है| जो लोग इनका धर्म पूछ रहे हैं उनसे अनुरोध है कि करोना के संवाहक हर धर्म में हैं और अधिकतर संक्रमण सरकार द्वारा कदम उठाने से पहले फैला है| इस सब में भारत सरकार, राज्य सरकार और जनता सभी की समान भागीदारी है| यह लड़ने का समय नहीं| कोई खुद बीमार नहीं पड़ना चाहता| हाँ, अगर अगर बीमार के प्रति घृणा फैलनी शुरू होगी तो कठिनाई बढ़ेंगी|

विश्व-बंदी २९ मार्च

उपशीर्षक – सरकारी क्षमा प्रार्थना 

ट्रेन के डिब्बों को १० हजार आइसोलेशन कैंप में बदला जा रहा है? क्या अस्पताल इतने कम पड़ने वाले हैं? बिस्तरों की कमी होने पर यह उचित हो सकता हैं – परन्तु बेहद चिंताजनक है| इस समय तक हजार लोग बीमार हो चुके हैं और सौ करीब ठीक हुए हैं| करोना से दोपहर तक २५ लोग मरे, इसके अतिरिक्त २२ लोग सरकार द्वारा किये गए आक्रामक लॉक डाउन से मारे गए हैं| 

प्रधानमंत्री ने निर्लज्ज होकर जनता से “इस उचित निर्णय से होने वाली कठिनाई” के लिए माफ़ी मांगी है|

इतिहास इस माफ़ी को उसी तरह याद रखेगा जिस तरह माता कुंती द्वारा अपने परित्यक्त पुत्र कर्ण से मांगी गई माफ़ी को याद करता है| उचित निर्णय यदि गलत तरीके से लिए जाये तो उचित नहीं रहते| लक्ष्य ही नहीं साधन, साध्य और समय का भी महत्त्व है| आपातकालीन निर्णय लेने में त्रुटियाँ हो सकती हैं, परन्तु यह निर्णय बीस दिन देर से लेने के बाद भी बिना योजना बनाये लिया गया| बिना गलती सुधारे मांगी गई माफ़ी का कोई मतलब नहीं| अब तो गलती सुधारने का समय भी निकलता जा रहा है| तत्काल ट्रेन चला कर फँसे हुए नागरिकों को उनके घर तक पहुँचाना चाहिए था| बसों के भरोसे यह काम देरी करेगा|

आज खुद प्रधानमंत्री ने कहा है परन्तु अमल करने की जिम्मेदारी सिर्फ जनता के सिर पर डाल दी:

किसी को नहीं पता क्या पिछले चार साल से हर दिन लगाये जाते इस आपातकाल में जनता को जीने का अधिकार कब ख़त्म हुआ? बीमारी का बहाना बनाकर लम्पटता को न छिपाया जाए तो बेहतर है| ठीक है कि घर से बाहर निकलना ख़तरनाक है| मगर हालत इतने क्यों बिगड़ने दिए गए?

एक मित्र से बात हुई| पति-पत्नी दौनों उत्तर प्रदेश स्वास्थ्य सेवाओं में हैं| पुलिस नाम पता और घर से निकलने की वजह की जगह पूछने डंडा चलाती है|

कोई भी तानाशाह हो, उसके पास हर समस्या का सबसे मानवीय समाधान भी सिर्फ़ डंडा है|

विश्व-बंदी २८ मार्च

उपशीर्षक – प्रसन्न प्रकृति के दुःख 

कौन कहता है कि यह दुःखभरा समय है? प्रकृति प्रसन्न है| दिल्ली के इतिहास में मार्च में कभी इतनी बारिश दर्ज नहीं दर्ज़ की गई| बसंत और वर्षा की प्रणय लीला चल रही है| यति और रति दोनों के लिए उचित समय है| इन्हीं फुर्सत के रात-दिन ढूंढने के लिए पिछली सात पुश्तें परेशां थीं|

पर्यावरण प्रदूषण का स्तर विनाशकारी चार सौ से घट कर चालीस पर आ चुका है| मेरे फैफड़े पिछले तीस साल ने पहली बार इतना प्रसन्न हैं| बार बार बदलते मौसम के बाद भी शायद ही कोई प्रदूषण से खांस रहा है|

परन्तु सावधानी हटने का ख़तरा हर घर के दरवाज़े पर खड़ा है| आजकल सब्ज़ी तरकारी भी घर के दरवाज़े पर ही शुद्ध की जा रही है – गंगाजल का स्थान एंटीसेप्टिक सेनिटाइजर ने ले लिया है| कुछ घरों में दरवाजे पर नहाने का भी इंतजाम है – जैसे शव-यात्रा से लौटने के समय होता है|

लोग भूले-बिसरों को फ़ोन कर कर हालचाल पूछ रहे हैं| चिंता नहीं भी है, कोई मलाल नहीं रखना चाहता|

बीमारी का आंकड़ा बढ़ रहा हैं| सरकार भी तो धर्मग्रन्थ के सहारे आ टिकी है| सरकारी दूरदर्शन “रामायण” “महाभारत” से सहारे जनता को घर में रोकना चाहती है| क्या पता गीता-पाठ (क़ुरान और बाइबिल) भी शुरू हो जाए? सब जिन्दा सलीब पर लटके हैं| देश भर के भूखे प्यासे गरीब अपने घरों के बड़े बूढों की चिंता में पैदल ही घर की दिशा में बढ़ रहे हैं| आजादी के बाद, कश्मीर के बाहर यह सबसे दुःख भरा पलायन है|

धृतराष्ट्र ने राज्य सरकारों से कहा है कि पलायन करने वालों को भोजन – पानी देकर रोका जाय| मगर उस बूढ़ी माँ – पिता का क्या जो आसराहीन गाँव में बैठे हैं| रोकेंगे कहाँ, कैम्पों में?? अगर अनहोनी हुई तो यह हिटलर के कैंप साबित होंगे|

सामान से भरे ट्रकों को लिए लाखों ट्रकचालक भूखें प्यासे सड़कों पर पड़े हैं? क्या मगर अमीरों और मध्यवर्ग को अपने गाल फुर्सत नहीं| पहले सत्ता नाकारा और  निकम्मी हुआ करती थी| अब जनता भी ऐसी ही है – सत्तर साल में यथा राजा, तथा प्रजा का चक्र पूरा हुआ|

शाम देश के सबसे बड़े टैक्सी ऑपरेटर ओला का सन्देश मिला, उनके ड्राइवर बिना काम के घर में बैठे हैं, सिर पर कार लोन भी है| उनके खाने का इंतजाम करने के लिए दान का अनुरोध किया जा रहा है|

विश्व-बंदी २७ मार्च

उपशीर्षक – नीला आकाश और बिलखती सड़कें 

तनाव को मुखमंडल की आभा बनने से रोकना मेरे लिए कठिन है| ७५ मिनिट की परीक्षा ५५ मिनिट में पूरी हुई| अब मैं किसी भी कंपनी में निर्देशक बन सकता हूँ| समयाभाव में अटका पड़ा यह काम पूरा हुआ|

कुछ और रुके पड़े काम पूरे किए जाने है| मृत्यु और काल आपके सबसे बड़े साथी हैं|

बारिश रुकने के बाद दोपहर में इतना नीला आसमान पहली बार दिखा| सोचता हूँ कहाँ होंगे वो लोग जो प्रदूषण के लिए किसान को कोसते थे? प्रकृति अंधपूंजीवाद पर भरी पड़ रही है| दुनिया की शानोशौकत बड़ी बड़ी गाड़ियाँ मूँह लटकाए घरों के बाहर धूल खाने लगी हैं|  प्रकृति ने पढ़े लिए समझदार आकाशगामी पैसे वालों को बीमारी फ़ैलाने के लिए अपना वाहन चुना है – माता शीतला का वाहन भी तो गधा ही है|

बड़े शहरों से जो लोग पैदल हजार पाँच सौ किलीमीटर जा रहे हैं क्या उनकी आने वाली पीढ़ियाँ वापिस बड़े शहरों की तरफ आसानी से रुख कर पाएंगीं? क्या विकास को मजबूर होकर छोटे मझोले शहरों की तरफ रुख करना पड़ेगा? क्या हानिकारक उद्योगों को बंद रखने पर जोर दिया जाने लगेगा? सब कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि हमें अच्छे पर्यावरण की कितनी आदत पड़ती है|

शाम तक गोल मोल सरकार ने माना कि विदेशों भ्रमण से लौटे वाले सभी यात्रियों नहीं खोजा सा सका है| हैरानी की बात यह है कि इतना खतरा उठाकर भी लोग क्यों छिपे पड़े हैं? उड़ीसा बालासोर में सरकार को एक क्लिनिक का लाइसेंस बंद करवाना पड़ा क्योंकि उस में विदेश भ्रमण से लौटे एक यात्री का अनिधिकृत रूप से इलाज किया गया था|

शाम तेज बारिश हुई और शानदार चाँद तारे दिखाई दिए| शायद यमुना का गन्दा काला पानी वापिस पारदर्शी श्यामल रंग में बदलने लगा हो|

क्या, हमें पूंजीवाद के सकल घरेलू उत्पाद की अवधारणा से इतर सकल घरेलू प्रसन्नता की और देखना होगा?

भविष्य बहुत कुछ कह सकता है|

विश्व-बंदी २६ मार्च

उपशीर्षक – कुछ नवारम्भ 

होली पर ही बहुत दिनों से छूटा हुआ योगाभ्यास पुनः प्रारंभ कर दिया था| आसन प्राणायाम के मौसम भी अच्छा हैं चैत्र का महिना भी|

सुबह से शरीर के बारे में सोच रहा हूँ| किसी भी प्रकार के फ़्लू-जुखाम-खाँसी के लिए गहराना परिवार का अजमाया नुस्खा है – एक कली लहसुन बराबर मात्रा के अदरक के साथ बढ़िया से चबाइए और मुँह चाय के घूँट लेने के लिए खोलिए| क्या इसे अजमाना चाहिए? आदतन हमारे घर में चैत्र नवरात्र से शरद नवरात्र के बीच कच्चा लहसुन खाने की परंपरा नहीं हैं|

दो दिन से सब्जी भी साबुन के गोल में धोकर रसोई में जा रही है| रसोई को चौका इसीलिए कहते हैं कि इसे बाकि दुनिया की गंदगी से क्वॉरंटीन (चौकस एकांतवास) रखा जाता है| आज नाश्ते रमास के चीले बनाये गए|

दोपहर वित्त मंत्रालय द्वारा गरीबों के लिए बनाई गई बकवास घोषणा को सुनकर दुःख हुआ| स्वयं सहायता समूह के लिए बिना गिरवी कर्ज की मात्रा दुगनी करने पर हँसी आई| यह कर्ज बड़ा नहीं सरल होना चाहिए| कर्मचारी बीमा राशि से अधिक धन निकालने की अनुमति से सिर्फ क्रोध आया| सरकार ने जिम्मेदारी की टोपी गरीब के सिर पहना दी है|मोदी सरकार मनरेगा की पुरानी विरोधी होने के बाद भी उसकी शरण में गई है मगर मुझे कोई आशा नहीं – कारण लॉक डाउन के दौरान मनरेगा रोजगार संभव नहीं| योजना पर हँस ने में भी बहुत रोना आया| ज़मीनी मुद्दों तक सरकार की पहुँच नहीं है|

दिन के तीसरे पहर आसमान में एक ड्रोन दिखाई दिया – मेरा अनुमान है कि निगरानी करने ले लिए पुलिस का नया तरीका रहा होगा| इस नकारात्मक समय में सकारत्मक लोगों को सड़कों पर बेफ़िक्र घूमने से रोकना होगा|

मुझे नकारात्मकता को सूंघ लेने और उसको हराते रहने की पुरानी आदत है| जीवन के समस्त नकारात्मक समय का उपयोग किया है| आज दिवेश से बात हुई| उसका आग्रह था कि कल मुझे कंपनियों स्वतंत्र निर्देशक की परीक्षा उत्तीर्ण कर लेनी चाहिए| मैं सोचने लगा तो उसने कहा, मैं आपको जानता हूँ आप आज शाम या कल सुबह इसे उत्तीर्ण का लें| पढ़ने और तनाव लेने से मना किया है| कल सुबह आठ बजे का समय तय रहा| फिर भी ,अगर मैं तनाव न लूँ तो धरती न डोलने लगे|

बारिश होने लगी है| बदलता मौसम भी स्वस्थ के लिए अच्छा नहीं| दौज का पतला सा चाँद और थोड़ा दूर तेज चमकदार शुक्र तारा दिखाई दिए| तनाव मुक्त करने के लिए प्रकृति के पास अपने तरीके हैं|

करोना कर्फ्यू दिवस

करोना का विषाणु और उस से अधिक उसका अग्रदूत भय हमारे साथ है| स्तिथि नियंत्रण में बताई जाती है, इस बात से सब धीरज धरे हुए हैं|

शीतला माता के पूजन का समय बीत गया है| किसी को याद नहीं कब शीतला माता आईं और गईं| कुछ बूढ़ी औरतों ने उन्हें भोग लगाया और कुछ भोग उन्होंने किए| संख्या बढ़ गई है| “रंज लीडर को बहुत है मगर आराम के साथ”|

अचानक भाषण कैसे लिखा जाए? समय तो चाहिए| जनसंपर्क विशेष अधिकारी ने समय माँगा तो सारे हाकिम ने हौले से साँस ली| चलो आठ पहर, चौबीस घंटा, साठ घड़ी का वक़्त मिला| सबने धीरज धरा|

घंटा बजा| सरकार ने भाषण दिया| अमीरों ने साजोसामान अपने गोदाम में भरे और गरीबों ने हिम्मतोहौसला अपनी अपनी गाँठ में बांध लिए| जनता ने ताली बजाई| शीतला माता मुस्कुराई, विषाणु ने धीरज धरा|

ऋतुराज ने भी धीरज धरा हुआ है| ऋतुराज बसंत ठिठका हुआ सा है| देर से आया इस बार| जाने का सोचता था रुक गया| विषाणु का डर है| मगर ऋतुराज की उपस्तिथि मात्र से माहौल में एक रूमानियत है|

भय और रूमानियत का पुराना रिश्ता है|

सुहानी सी सुबह है| इतना नीला आसमान – शायद वर्षों बाद देखा| हर हृदय निर्लिप्त है| न काम न भ्रमण न मौज मस्ती – केवल पस्ती| आलस्य भी नहीं| नेति नेति कह वेद पुकारा| उस से पहले कुछ नहीं भी नहीं था| मृत्यु प्रथम सत्य है|

साँसों में वायु प्रदूषण प्रदूषण का कोई अहसास नहीं| कहीं कोई ध्वनि प्रदूषण नहीं| आसपास ही नहीं दूर से भी परिंदों की आवाज़े आ रहीं है| आरती और अजान के बाद से कुछ नहीं सुनाई दिया| दूर रेलवे स्टेशन से आती आवाज भी दम तोड़ चुकी है| आज स्वतः ध्यान देर तक लगा|

दुनिया अपने अपने घरों में सिमट गई है| सड़कों पर शांति पसरी है और माथे पर अनागत चिंता की लकीरें| छः दूर घर से रोते बच्चे की आवाज भी स्पष्ट सुनाई देने लगी है| परिंदे अनजान आशंका के गीत गा रहे हैं| उन्हें नहीं पता शहरी सा दिखाई देने वाला मूर्ख इंसान कहाँ छिप गया है| गली के कुत्ते भी नहीं भौंक रहे| कोई सूखी रोटी फैंकने भी नहीं निकल रहा| आवारा गायें अपने भक्तों की राह जोहते हुए उदास बैठीं हैं|

लगता नहीं कोई टेलीविज़न भी देख रहा हो| जो बाहर झांक भी रहा है तो पड़ौस में आशंका की लहर दौड़ जा रही है| गुनगुनी धूप और हल्कापन लिए हुए मध्यम हवा – आनंद नहीं आध्याम का आभास दे रही है|

जिन्होंने घरों में जीवन भर का खाद्य भर लिया था, उन्हें भूख नहीं लग रही| भूखों को भोजन का पता नहीं|

दोपहर होते होते सड़क एकदम वीरान होने लगी है| बच्चे नियंत्रण में हैं| जनता कर्फ्यू के समर्थन में घुमने वाले भी शायद थक गए हैं|

पांच बजने को हैं| जनता धन्यवाद ज्ञापन की तैयारी कर रही हैं| धर्म के नाम पर वोट देने वालों के लिए विषाणु मर चुका है| ढोल मंजीरे ताशे और आधुनिक वाद्य सजने लगे हैं| पहले पांच मिनट के धन्यवाद ज्ञापन के बाद फूहड़ नाच गाना शुरू ही हुआ है कि समाचार आने लगे – सरकार वह सब कर रही है जो सरकार के आलोचक सरकार से चाहते थे| मूर्खता पर लगाम लग गई है| जितनी तेजी से नाच गाना शुरू हुआ उतनी तेजी से ख़त्म भी| मगर फिर भी कुछ नाच और नारे लग रहे हैं – मोदी है तो मुमकिन है| मोदी जी शायद सर पटकने के लिए दीवार खोज रहे हैं|

दिन शांति से ढल रहा है| शाम चुपके से उतर रही है| पर इस वक़्त पक्षी शांत हैं वो दिन भर के सन्नाटे के बाद अचानक हुए शोर शराबे से घबराये हुए हैं| झींगुर और क्षुद्र कीटों का गान सुनाई दे रहा है|

जनता कल की रोजी रोटी का हिसाब बना रही है| गरीब सोचता है कि पढ़े लिखे अमीर मालिक लोग हवाई जहाज से बीमारी लादकर क्यों ले आये| अमीर हिसाब लगा रहे हैं – इलाज कहाँ खरीदेंगे|

ट्रेन, मेट्रो , बस, दफ्तर बंद हैं| बकवास चालू है|

Janta Curfew

मैं रविवार २२ मार्च २०२० को जनता कर्फु के पालन की घोषणा करता हूँ और स्वैक्षिक रूप से २१ मार्च २०२० को भी जनता कर्फु का पालन करूंगा|
क्या आप इसका पालन करेंगे?

आप इस मीम को शेयर कर सकते हैं:

I m participating in #JanataCurfew on Sunday. Are you_ I will observe it on Saturday also. (1)

हम देखेंगे: फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

पहले प्रस्तुत है मूल रचना का हिंदी भावानुवाद जिसे श्री विपुल नागर ने किया है:

 

हम देखेंगे

निश्चित है कि हम भी देखेंगे
वो दिन कि जिसका वचन मिला है
जो वेदों में लिख रखा है

जब अत्याचार का हिमालय भी
रुई की तरह उड़ जाएगा
हम प्रजाजनों के कदमों तले
जब पृथ्वी धड़ धड़ धड़केगी
और शासक के सर के ऊपर
जब बिजली कड़ कड़ कड़केगी
जब स्वर्गलोक सी पृथ्वी से
सब असुर संहारे जाएँगे
हम दिल के सच्चे और वंचित
गद्दी पर बिठाए जाएँगे
सब मुकुट उछाले जाएँगे
सिंहासन तोड़े जाएँगे
बस नाम रहेगा ईश्वर का
जो सगुण भी है और निर्गुण भी
जो कर्ता भी है साक्षी भी
उठेगा “शिवोऽहम्” का नारा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो

और राज करेगा ब्रह्म-पुरुष
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो

हम देखेंगे!

मूल उर्दू रचना देवनागरी लिपि में: 

हम देखेंगे

लाज़िम है कि हम भी देखेंगे

वो दिन कि जिस का वादा है

जो लौह-ए-अज़ल में लिख्खा है

जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गिराँ

रूई की तरह उड़ जाएँगे

हम महकूमों के पाँव-तले

जब धरती धड़-धड़ धड़केगी

और अहल-ए-हकम के सर-ऊपर

जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी

जब अर्ज़-ए-ख़ुदा के काबे से

सब बुत उठवाए जाएँगे

हम अहल-ए-सफ़ा मरदूद-ए-हरम

मसनद पे बिठाए जाएँगे

सब ताज उछाले जाएँगे

सब तख़्त गिराए जाएँगे

बस नाम रहेगा अल्लाह का

जो ग़ाएब भी है हाज़िर भी

जो मंज़र भी है नाज़िर भी

उट्ठेगा अनल-हक़ का नारा

जो मैं भी हूँ और तुम भी हो

और राज करेगी ख़ल्क़-ए-ख़ुदा

जो मैं भी हूँ और तुम भी हो|

क्या इस रचना का विरोध उचित है?

ख़ुद हराम दिल्ली

प्रदूषण की मारी दिल्ली से बाहर निकलते समय आपके फेफड़े ख़ुशी से चीख चीख कर आपको धन्यवाद करने लगते हैं| कान आसपास आँख फाड़कर देखने लगते हैं – क्या जगह है कि सन्नाटे में शांति है? आँख हवा को सूंघने लगती है – क्या हुआ हवा को कि जलन नहीं हो रही? आती हुई उबास बंद होते ही नाक खुलकर जीने लगती है| त्वचा फिर एक बार साँस लेने लगती है| शहर बदलते ही स्वाद तो खैर बदल ही जाता है|

उत्तर भारत में नीला असमान देखना जीते जी स्वर्ग देखने का साकार सपना लगता है| दिल्ली को फर्क नहीं पड़ता| किसने पीछे पांच साल में ध्रुवतारा देखा? किसने पिछले बीस साल में रात के सन्नाटे में झींगुर का गान सुना? कौन धरती की सौंध को दो रात सूंघ पाया? हर कोई धीमी मर रहा है – खुद अपनी चुनी हुई हत्या – आत्महत्या नहीं कहूँगा| आत्महत्या में कम से कम दुस्साहस तो लगता है| हमारी मौत एक नाकारा मौत है| दिल्ली वाली मौत उधार का (की नहीं) वैश्या है जिसे हम सब बाप का माल समझकर भोगना चाहते हैं|

धर्म के नाम पर पांच – ग्यारह – इक्कीस दीपक नहीं जलाते – हर दिवाली हम पटाखे फोड़कर अपने धर्म से ज्यादा अपना गुरूर बचाते हैं| बात किसी धर्म की नहीं है हमारे गुरूर की है- हठधर्मिता की है| हमारी दलील हैं, हम क्या सब कूंए में कूद रहे हैं? मुझे मत रोको|

किसान को दोष देना अच्छा लगता है न| मान लिया किसान दोषी है – मगर साल के दो महीन  के लिए न| बाकि दस महीने के लिए एक बार अपनी आत्मा को ज़बाव तो दे कर तो देखो| मन और आत्मा का सम-विषम तो करो| दस महीने का दोष किसे दें – पाकिस्तान को, चीन को या अमेरिका को|

हमें अपनी आँख में धूल झोंकना अच्छा लगता है| सम-विषम अनुलोम-वियोम करेंगे| घर के अन्दर जो कार्बन मोनो ऑक्साइड रोज पैदा होता है – सोचा कभी? सीशा (लेड) वाला पुताई करवाई है दीवार पर कभी देखा कि बच्चे के पेट में और फैफड़ों में कब चला गया? दिन भर कान घौंस कर रखी गई गानों की आवाज कब दिमाग में ध्वनि-प्रदूषण कर गई – पूछा? दूध, दूध-मिठाई पीते वक़्त कभी सोचा कि आपको और आपके बच्चे को नकली दूध का वीडियो क्यों देखना पड़ता है? आप ने रेस्टोरंट में कभी बोला भैया ये वाले चार प्रदूषक मेरे खाने में मत डालना – कम स्वाद के लिए नहीं लडूंगा?

आइए सरकार को दोष दें| आइए किसान को दोष दें| बावर्ची को दोष दें| पड़ौसी को दोष दें|

नोट: इस बार दिल्ली से त्रिवेंद्रम आते समय सोचा नहीं था कि मैं दोनों शहरों में कोई तुलना करूंगा मगर…

लम्बा चौड़ा कराधान दायरा

संभावित अमीर और नए अमीर अक्सर यह मांग करते हैं कि सरकार करों के नाम पर उन्हें न लूटे और कराधान का दायरा बड़ा कर कर अधिक लोगों से करवसूल करे| मुझे अक्सर उनकी मांग के भोलेपन पर दया नहीं, तरस आता है| अक्सर यह लोग इस प्रकार का बर्ताव करते हैं कि मानो देश में कोई साम्यवादी या समाजवादी व्यवस्था उन्हें उनकी मेहनत और अमीरी के लिए परेशान कर रही है| दुनिया के हर पूंजीवादी देश में पूंजीपतियों पर अधिक कर हैं| अमेरिकी कांग्रेस तो और बढ़ाने पर विचार भी कर रही है| आखिर कराधान का दायरा बढ़ाने से इन लोगों की मुराद क्या है? क्या सरकार गरीबों से कर लेना शुरू करे? क्या गरीब कर नहीं देते?

वास्तविकता यह है कि गरीब कुल प्रतिशत में अमीरों के मुकाबले अधिक कर देते हैं| यह बाद नए वस्तु एवं सेवा कर अधिनियम के बाद बहुत अधिक विश्वास के साथ कही जा सकती है| भारत में दो प्रकार के कर लगते हैं:

  • प्रत्यक्ष कर यानि आयकर और
  • अप्रत्यक्ष कर यानि वस्तु एवं सेवा कर|

फिलहाल आयकर का दायरा बढ़ाने के दो तरीके हैं:

  • गरीबों से आयकर लेना;
  • अधिक लोगों को रोजगार देकर वर्तमान कर सीमा में लेकर आना;
  • वर्तमान कर सीमा के अन्दर के लोगों की कर चोरी पकड़ना|

गरीबों से कर लेना सरल तो हैं परन्तु एक गरीब की आयकर विवरणी को भरवाने और देखने मात्र में आयकर विभाग के कम से कम हजार रुपए खर्च होंगे| इतना ही पैसा कोई भी उनकी आयकर विवरणी भरने का भी लेगा| क्या आपको लगता हैं कि जिसका कर पांच हजार से कम हो उस की आयकर विवरणी भरवाने का कोई फायदा है| यही कारण है कि सरकार पांच लाख तक की आय वालों को आयकर विवरणी भरने से छूट देनी चाहिए| जिससे सरकार को फालतू खर्च न उठाना पड़े| परन्तु सरकार ऐसा नहीं कर पाती| बल्कि फालतू कर विवरणी को पढ़ने के लिए अब महंगी तकनीक का सहारा लिया जा रहा है|

सोचें क्यों? साथ ही यह भी सोचें कि इस प्रकार सरकार से आप कितना पैसा कर प्रशासन के मद में फालतू खर्च करवा रहे हैं|

पिछले बीस साल में सरकार और निजी क्षेत्र सबको खर्च कम करने की लत पड़ चुकी है| इसलिए नौकरियां नहीं दी जा रहीं| मगर क्या सोचा है कि हर नया नौकर अपनी नई आय खर्च करेगा तो हर साल में अपनी आय का लगभग २८% प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर से रूप में मिलाकर सरकार को सीधे और लगभग ५०% दूसरों के माध्यम से लौटा देगा| मैं उन नौकरियों की बात कर रहा हूँ जिन्हें पैदा नहीं करना वरन भरना मात्र है| नई नौकरियों में जरूर कुछ अधिक खर्च होगा|

कर चोरी पर मुझे कुछ नहीं कहना| मुझे लगता है कि यही लोग हैं जो कराधान के दायरा लेकर रोते रहते हैं और अक्सर खुद तस्करों की श्रेणी में आते हैं|

(विशेष टिपण्णी: तस्कर अप्रत्यक्ष कर के चोर को कहते हैं, प्रत्यक्ष कर के चोर के लिए करचोर जैसे सम्मानित शब्द का विधान किया गया है|)

अगर अप्रत्यक्ष कर की बात की जाए तो हाल में देश के सबसे सुलभ और सबसे सस्ते बिस्कुट की बिक्री में कमी की बात सामने आई| कहा गया नोटबंदी और अप्रत्यक्ष कर के कारण लोग इसे नहीं खरीद पा रहे| जबाब में कहा जाता है कि उस बिस्कुट पर कर नया तो नहीं है| चीनी या मसाले सब पर कर लगता है| इतना ही है कि अब नमक सत्याग्रह नहीं हो सकता क्योंकि उसकर घरेलू नमक पर इस समय शून्य की दर से लगता है|

जब भी आप कराधान के दायरे की बात करें सोचें कि कौन है जो कर के दायरे में नहीं है?

चलते चलते इतना जरूर कहूँगा, किसी भी समझदार अमीर की कार पर कोई कर नहीं लगता| क्या वास्तव में उसपर कर लगता है?

#गहरानाज्ञान #तीसराशनिचर

३७१ और नगालैंड

पिछले सप्ताह अपने आलेख ३७० से आगे में मैंने लिखा था, जन भावना से इतर नगालैंड सबसे गंभीर मुद्दा है| मोदी जी ने सरकार बनाते ही इस मुद्दे पर ध्यान दिया था जिसपर जनता (खासकर भक्त प्रजाति) ने कोई विशेष ध्यान नहीं दिया था|

पूर्वोत्तर भारत के बारे में शेष भारत की जानकारी अत्यल्प रही है| पूर्वोतर को समझने का सरल तरीका अनिल यादव की यात्रा पुस्तक वह भी कोई देस है महाराज हो सकता है| परन्तु यह पुस्तक आज का मेरा विषय नहीं है|

जिस समय भारत एक देश, एक संविधान, एक विधान, एक निशान, एक पतान जैसी बातों में उलझा रहता है, नगालैण्ड से अलगाववादियों द्वारा अपना अनधिकृत झंडा फहराए जाने की ख़बरें भारतीय मुख्यधारा मीडिया में हाशिए पर भी अपनी जगह नहीं बना पातीं| नगालैंड से आने वाली ख़बरों का हाशिए पर रहना शायद कई कारणों से है| शेष भारत को इस्लामिक कश्मीर में अधिक दिलचस्पी है, इसाई नगालैंड से उन्हें अधिक फर्क नहीं पड़ता| जिस समय हम कश्मीर पर उलझे रहते हैं, हम भूल जाते हैं नगालैंड का नाम Unrepresented Nations and Peoples Organization (UNPO) जैसे खतरनाक संगठन में सन १९९३ से मौजूद है| कश्मीर इस संस्था का सदस्य नहीं रहा| यह संस्था UNPO उन भौगोलिक इकाइयों का संगठन हैं जिनके भविष्य में स्वतंत्र राष्ट्र होने के बारे में अन्तराष्ट्रीय प्रयास जारी हैं| आर्मीनिया, पूर्वी तिमूर, एस्टोनिया, लात्विया, जॉर्जिया, पलाऊ, इस संस्था से निकलकर आज सयुंक्त राष्ट्र संघ के सदस्य बन चुके हैं|

३ अगस्त २०१५ में भारत सरकार ने UNPO में नगालैंड का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठन नेशनलिस्ट सोशलिस्ट कौंसिल ऑफ़ नागालैंड के साथ नई दिल्ली में शांति समझौता किया था| इस समझौते के विवरण किसी भी पक्ष ने जनता के समक्ष नहीं रखे हैं| २०१७ से माना जाता है कि दोनों पक्ष निर्णय के निकट हैं|

वर्तमान मुख्यमंत्री २००३ से २०१३ तक कांग्रेस और २०१८ से अब तक भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़कर मुख्यमंत्री हैं| मुख्यंत्री द्वारा  केंद्र (मोदी) सरकार के नागरिकता (संशोधन) विधेयक का विरोध किया जाना पिछले साल ख़बरों में रहा था| मुख्यमंत्री का विचार था यह कानून संविधान के अनुच्छेद ३७१ के अनुरूप नहीं हैं| कोई भी मुख्यंत्री अपने राज्य को मिले विशेषाधिकारों को बनाये रखने की बात करेगा| परन्तु भारत की जनता के लिए समझने की बात यह है कि अनुच्छेद ३७० के आगे भी राष्ट्रहित, एकता और अनेकता मौजूद है| अनुच्छेद ३७१ के अनुसार नगालैंड को निम्नलिखित विशेषधिकार प्राप्त हैं –

  • धार्मिक और सामाजिक गतिविधियां;
  • नगा संप्रदाय के कानून;
  • नगा कानूनों के आधार पर नागरिक और आपराधिक मामलों में न्याय; और
  • जमीन का स्वामित्व और खरीद-फरोख्त

मेरा आग्रह यही है कि जन-उन्माद के हटकर सोच समझ कर बातें की जाएँ| भारत्त की अनेकता इसकी शक्ति है| जनमत और जनप्रिय नेतृत्व को उन्माद के आधार पर निर्णय लेने के लिए न उकसाया जाए| राष्ट्र के हितों की समझपूर्वक रक्षा की जानी चाहिए|

३७० से आगे

राजनीतिक, कूटनीतिक और रणनीतिक निर्णयों में सही गलत के फ़ैसले संविधान तय नहीं करता| सही गलत का निर्णय इतिहास तय करता हैं और इतिहास इतिहासकरों से अधिक समर्थकों और जनकवियों पर आश्रित होता है| आप जो निर्णय आज सही माना जाए वह पांच हजार वर्ष बाद गलत माना जा सकता है|

भावनात्मक समर्थन या विरोध से हटकर कोई तय नहीं कर सकता कि कौरव और पांडवों में नीतिगत रूप से सही उत्तराधिकारी कौन था| कुरुवंश अगली तीन पीढ़ियों में समाप्त हो गया| रावण द्वारा अपनी बहन के अपमान का बदला लेने के निर्णय पर कोई प्रश्नचिन्ह नहीं हैं परन्तु प्रश्न यह है कि क्या उसने कठिन शत्रु से शत्रुता करनी चाहिए थी और क्या उसने सही तरीका अपनाया| आज इन प्रश्नों पर विचार का कोई लाभ नहीं|

कश्मीर पर अनुच्छेद ३७० का बना रहना या चले जाना इसी प्रकार का प्रश्न है जिसका उत्तर इतिहास देगा| अनुच्छेद ३७० का पक्ष विपक्ष उसके होने न होने के लाभ हानि पर आज केवल भावनात्मक उत्तर देता हैं| संविधान में इस प्रकार के अन्य अनुच्छेद सरलता से मौजूद हैं| जन भावना से इतर नगालैंड सबसे गंभीर मुद्दा है| मोदी जी ने सरकार बनाते ही इस मुद्दे पर ध्यान दिया था जिसपर जनता (खासकर भक्त प्रजाति) ने कोई विशेष ध्यान नहीं दिया था|

कश्मीर मात्र छद्म मुद्दा रहा है| एक रजवाड़े की महत्वाकांक्षा और जनभावनाओं पर उसका अनिर्णय कश्मीर की कुल कहानी हैं जिसमें दो बड़े देश स्थानीय जनता की भावनाओं के बारे में आज तक असमंजस और भय में रहे हैं| वर्ना हैदराबाद, गोवा सेन्य कार्यवाही और जूनागढ़ जनमत के साथ भारत में विलयित हुए हैं और उनकी जनता आज मानती हैं कि उनका भारत विलय उचित रहा है|

इस समय पक्ष विपक्ष के प्रश्न इस बात पर आधारित हैं कि क्या भारत की केन्द्रीय सरकार और शेष भारत की जनता कश्मीर की जनता के साथ भावनात्मक एकता बना पायेगी? खासकर तब जब अनुच्छेद ३७० को निष्प्रभावी बनाते समय केंद्र सरकार ने अतिशय तिकड़म का प्रयोग करते हुए कश्मीर की सशंकित जनता के मन में अधिक अविश्वास पैदा कर दिया हैं| अब इस कदम को सफल बनाने का सारा दारोमदार अब भारत की जनता पर है|

दुर्भाग्य से भारत की जनता का राष्ट्रीय एकता के प्रश्न पर अच्छा प्रदर्शन नहीं रहा है| सामाजिक माध्यमों में जिस प्रकार के असभ्य और अनुपयुक्त सन्देश एक हफ्ते में डाले गए उनसे भारतीय एकता पर मोदी सरकार के प्रयासों को उनके भक्तों की ओर से ही धक्का लगा है| यदि मोदी सरकार और भाजपा कार्यकर्त्ता “भक्त प्रजाति” के समर्थकों पर जल्द काबू नहीं करते तो यह वर्ग सरकार के लिए दूरगामी कठिनाई पैदा कर सकता है|

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बेरोजगारी – निजी समस्या

“आजकल क्या कर रहे हो?” जब भी रिश्तेदार यह सवाल पूछते हैं तो भारत का हर जवान जानता है कि वांछित उत्तर है – “बेरोजगार हूँ” और देय उत्तर है – “तैयारी कर रहा हूँ”| वास्तव में देश में कोई बेरोजगार नहीं है – नालायक, अच्छा  निकल गया, प्रतियोगी, प्रतिभागी, हतोत्साहित, कुछ तो करना ही है, कुछ तो कर ही रहे हैं, और आत्महत्यारे|

हमारी मानसिकता ही ऐसे बनी हुई है – कोई शिक्षक नहीं पढ़ता, खुद पढ़ना होता है|कोई नौकरी नहीं देता – खुद ढूंढनी पड़ती है| कोई रोजगार नहीं देगा, खुद अपने लिए रोजगार पैदा करो|

रोजगार की अर्थशास्त्रीय परिभाषा से भी हमें कुछ नहीं करना| हमारे यहाँ गड्ढा खोदता लंगड़ा लूला और नाला साफ करता हुआ स्नातक अभियंता रोजगार में ही माने जाते हैं| जबकि यह साफ़ है कि पहला उदहारण सामाजिक शोषण है और दूसरा बेरोजगारी या छद्म रोजगार| बेरोजगारी की सामाजिक स्वीकृति पढ़ना शुरू करते ही शुरू हो जाती है|

शिक्षा का बुरा हाल, शिक्षक और विद्यालयों से अधिक हमारे अभिभावकों के कारण है| दस अभिभावक विद्यालय या शिक्षक से जाकर नहीं भिड़ते की पढ़ाते क्यों नहीं|स्कूल से तो हमें हमें केवल पढ़े होने का ठप्पा चाहिए| विद्यलय में हम बच्चे के लिए वातानुकूलन, आदि सुविधाएँ देखते हैं| पढाई के स्तर जानने के लिए उत्तीर्ण होने वाले छात्रों की संख्या /प्रतिशत और स्नातक होने पर पहली नौकरी देखते हैं| हम निजी विद्यालय जाना पसंद करते हैं मगर यह नहीं देखते कि उनके पास कैसा पुस्तकालय है, कैसी प्रयोगशाला है| यह निजी विद्यालय भी विद्यार्थियों को वाणिज्य और कला आदि विषय लेने ले लिए प्रेरित करते हैं| उदहारण के लिए निजी विद्यालयों में विज्ञान विषयों का घटता स्तर देख सकते हैं| यही बात निजी महाविद्यालयों और निजी विश्वविद्यालयों के बारे में है| उसके बाद भी हम निजी कोचिंग में रटने का अभ्यास और महत्वपूर्ण प्रश्नों का तोतारटंत करते हैं| मगर जिन समाचारतन्त्र  में बिहार के प्रथम आये छात्रों का ज्ञान टटोला जाता है, वह निजी क्षेत्र के विद्यालयों पर तफ्सीश करने की हिम्मत भी नहीं करते| निजी विद्यालयों में शिक्षक अभिभावक बैठकों में अभिभावक मात्र उपदेश सुनने जाता है या अधिक हिम्मत करने पर उसे मात्र आश्वासन मिलता है| मगर सरकारी शिक्षकों पर लानत भेजने वाले हम निजी विद्यालय के अधपढ़ शिक्षक से प्रश्न करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते|

यहाँ से ही बेरोजगारी की स्वीकृति शुरू हो जाती है| हमारा बच्चा नालायक है, क्या पढ़ना है यह तय नहीं कर पाता और हमें इसे पैसा फैंक और दो लट्ठ मार कर किसी भी लायक बनाना है|

यहाँ से प्रतियोगिता और साक्षात्कार की तैयारी का अंतहीन सिलसिला शुरू होता है| सरकारी नौकरियां अस्वीकार्य तर्कों के साथ कम की जा रहीं है, मगर हम राजकोषीय घाटे के घटिया बहाने से बहला दिए गए हैं| क्या सरकार बिना संसाधन – मानव संसाधन के काम कर पायेगी| लगभग हर सरकारी विभाग कर्मचारियों की कमी का शिकार है| अधिकतर विभाग अनुबंध यानि गुलामीपत्र यानि संविदा पर अप्रशिक्षित कर्मचारी भर्ती कर रहे हैं| सरकार को अपने सचिव तक बाहर से अनुबंध पर लाने पड़ रहे हैं| मगर अगर सरकारी नौकरियां कम नहीं होंगी तो निजी क्षेत्र के सस्ती सेवा में कौन जाएगा| ध्यान दें कि जब सरकारी नौकरियां थीं तब लोग दोगुने वेतन में भी निजी क्षेत्र में नौकरी करने से कतराते थे| जब सरकारी नौकरियां नहीं है तो आरक्षण तो खैर बेमानी नाटकबाजी ही है|आरक्षण के समर्थन में मूर्ख और विरोध में महामूर्ख ही बात कर सकते हैं|

इस सब के बाद हमारे पास तर्क होता है कि क्या नौकरियां पेड़ पर उग रहीं हैं?  हमारे छात्र पढाई पूरी करने के बाद या तो घर पर बैठ कर तैयारी का प्रपंच करते हैं या फिर अपनी लिखित योग्यता से कमतर कोई भी रोजगार पकड़ लेते हैं| किसी शिकायत का न होना यह स्पष्ट करता है कि उन्हें पता है कि उनके कागज़ की असली कीमत क्या है|

कुछ समय पहले मैं एक कंपनी के लिए साक्षात्कार ले रहा था| मानव संसाधन विभाग की तरफ से सीधा संकेत था कि सरकारी डिप्लोमा होल्डर को निजी विद्यालय के स्नातक अभियंता से अधिक तरजीह देनी है| उनके तर्क साधारण थे| लाटसाहब ने पैसा फैंक कर कागज खरीदा है| यह बात हर अभिभावक और प्रतिभागी जानता है| किसी स्नातक ने अपने से कम पढ़े व्यक्ति के आधीन काम करने से मना नहीं किया|वह अनुभव और वास्तविक ज्ञान को समझते थे|

पिछले तीस वर्ष में सरकारें जनता को यह समझा पाने में कामयाब रहीं है कि शिक्षा और रोजगार सरकारी “खैरात” नहीं हैं, यह आपका निजी प्रश्न है|हमारे सरकारों के पास कोई नक्शा नहीं कि यह बता सकें कि अगले तीन पांच साल में कौन से और कितने रोजगार मिलने की सम्भावना हो सकती है| क्या पढाई की जाये, क्या नहीं? दूसरा इस जनसंख्या बहुल देश में भी हमने अपने कर्मचारियों को बारह घंटे काम करने की प्रेरणा दी है, जबकि अगर सब लोग केवल आठ घंटे काम करें तो डेढ़ गुना लोगों को रोजगार मिल जाये| संविदा आदि के चलते कर्मचारियों की गुणवत्ता घटी है| यह सब छद्म रोजगार और आधुनिक गुलामी या बंधुआ मजदूरी है|

देश में कश्मीरी पंडितों के पलायन से भी अधिक भयाभय तरीके से रोजगार सम्बन्धी पलायन हो रहा है| किसी भी योग्य युवा को अपने घर के आसपास उचित रोजगार अवसर नहीं मिल रहे| दिल्ली, मुंबई और अन्य महानगर पलायन से भरे पड़े हैं| सब जानते हैं कि असंतुलित विकास इस रोजगारी पलायन का कारण है| मगर न हम विकास पर प्रश्न उठा रहे हैं, न बेरोजगारी पर| विकास के नाम पर दो चार चिकनी सड़के हमारा दिल खुश कर देतीं हैं| हम पलायन कर रहे हैं, विस्थापित हो रहे हैं, हम पढ़ लिख कर अग्रीमेंट मजदूर बन रहे हैं जैसे कभी अनपढ़ गिरमिटिया मजदूर बनते थे|(अग्रीमेंट और गिरमिट एक ही अंग्रेजी शब्द के रूप हैं)

कोई प्रश्न नहीं है| प्रश्न तब ही नहीं था जब सत्तर साल पहले आरक्षण घोषित करते हुए सरकार ने ऐलान किया था कि सबको रोजगार नहीं हो पायेगा| प्रश्न तब भी नहीं है जब बेरोजगारी की सबसे भयाभय स्तिथि की सरकारी सूचना आती है| प्रश्न तब भी नहीं जब बेरोजगारी की बढ़ती संख्या देखकर सरकार पकौड़े तलने की सलाह देने लगती है

आखिर हतोत्साहित, शिकायतहीन और सस्ता मजदूर किस मालिक को अच्छा नहीं लगता – मालिक सरकार हो या बनिया|

कृपया, इस पोस्ट पर सकारात्मक आलोचना करें – नकारात्मक आलोचना हमें सुधरने पर विवश कर सकती है|

 

 

मतदान

कल मतदान का दिन है|

सालों ने एक छुट्टी बर्बाद कर दी| कोई इतवार को भी चुनाव रखता है क्या? इन कमीशन वालों को तो बस पाँच साल में एक बार काम करना होता है| मगर हम से इतवार को वोट दलवायेंगे| इन के सरकारी लोग भी सब थोड़े से पैसे और ओवरटाइम के लिए इतवार को दौड़ पड़ते हैं चलो वोट डालो|गर्मी भी तो कितनी है – हे भगवान ४२ पार|

चुनाव भी क्या है| लोग पैसा लेकर वोट डालने जाते हैं| दारू ठर्रे के लिए वोट हो जाता है| देखा है न सब मैले कुचले लोग कतार में खड़े रहते हैं जैसे कोई भंडारा हो| कोई मुफ्त में वोट डालने| कौन खड़ा हो इन कीड़ों के साथ| मैं तो नहीं जाता| गर्मी में मनाली जाएँ कि मतदान केंद्र?

कुछ नहीं होना इस देश का वैसे भी| सब एक थाली के चट्टे बट्टे हैं| कोई देश नहीं बदलता| देश अपने आप बदलता है|हर कोई चला आता है मैंने ये किया, उसने ये नहीं किया| अरे भाई, हमने अगर १२ घंटा कंपनी के ऑफिस में कुर्सी नहीं तोड़ी होती तो क्या कुछ कर लेते ये नेता लोग|

इन नेता लोग को तो वैसे भी कुछ नहीं करना होता| अफसर करते हैं अफसर| अब देखों अफसर ने कॉपी पेस्ट ड्राफ्ट कर के कोई टेढ़ा मेढ़ा कानून सा बना दिया| न बहस, न चर्चा, न बात न चीत, बस ये ये ये ये… …. हो गया पास|उखड़ गया घंटा|

कुछ भी कर लो, मंदिर नहीं बनेगा| न १९८४ वालों को सजा मिलेगी न २००२ वालों को| विकास की दर दुनिया ब्याज की दर की तरह ही थोड़ा थोड़ा बढ़ेगी| सरकार कोई भी हो| आरक्षण हटेगा नहीं, और हमें बिना काम वाली सरकारी नौकरी मिलेगी नहीं|

चुनाव क्या है, बड़े सेठ लोग का हँसी ठठ्ठा है| नेता नाचते हैं, मुजरे में भाषण करते हैं और वाह वाह सुनकर चल देते हैं| दस मिनिट में भाषण कूड़ा| कौन याद रखता है भाषण, अख़बार वाले| उनको तो बस रद्दी छापनी होती है| कोई काम की बात आती है अखबार में| वैसे आये भी तो क्या? कौन सा हमको पढ़ना है| हमें तो बस हीरोइन का फ़ोटो देखना है|

चल कहीं फ़िल्म देखने चलते हैं|

(अब यह बकबास कर ली हो या पढ़ ली हो तो चलें वोट डालने| हमारी दिल्ली में तो भैया कल है कल|)

जलियांवाला वाला बाग़

कौन याद करेगा तुम्हे, ऐ मरने वालो| कोई दस पांच बरस तुम्हारा नाम जिएगा| कुछ बीस चालीस बरस तुम्हारी याद आएगी| क्या कोई मंजर होगा कि तुम याद आओगे? याद आओगे किसी तारीख़ की तरह और उस दिन के ढलते सूरज के साथ बीत जाओगे| कोई, शायद कोई, तुम्हारी क़ब्र पर चिराग़ रोशन करेगा, मगर तुम्हे याद कौन करेगा? चिराग़ रोशन करने वाले दुआ से वास्ता रखते हैं, उन्हें तुम्हारे सलाम का क्या काम? तुम्हें भी क्या पता था कि उस शाम तुम ढल जाओगे? वो गुनगुनी शाम तुम्हारी आखिरी शाम होगी|

सौ बरस बीत गए| तुम्हारा कौन नाम लेवा है? तुम लाशों का वो ढेर हो जिस पर राजनीति के अघोरी अपनी साधना करते है| राजनीति की देवी जो बलि मांगती है, उस बलि का पवित्र बकरा तुम हो| तुम्हारा नाम बलि के प्रसाद की तरह टुकड़े टुकड़े बाँट दिया जायगा| ये मुल्क तुम्हारे नाम की बोटियाँ चबाकर तुम्हे याद करेगा|

तुम्हें याद करना एक रस्मी कवायद है| नेता तुम्हारी इन यादों को हर चुनाव में वोट के बदले बेच देगा| खरीदेगा कुछ जज़्बात, कुछ वोट, कुछ कुर्सियाँ और कुछ दिनों की सत्ता|

तुम्हारे नाम पर रोज नई तख्तियां लगेंगी| कुछ इमारतों में तुम्हारे नाम की कुछ इबारतें धूल खाया करेंगी| तुम्हारे नाम की कुछ सड़कों को सरकार अपने जूतों से और सरकारी गाड़ियाँ अपने पहियों से रौंदा करेंगी| तुम्हारे नाम पर नाम वाले पुल अपनी सरकारी रेत के साथ ढह जाया करेंगे, मानों नश्वर संसार का सार उन्हीं में निहित है|

नहीं, मैं रोता नहीं हूँ ओ मरने वाले| मैं हँसता भीं नहीं हूँ ओ जाने वाले| तुम्हारे नाम पर में अपने आंसुओं के कुछ जाम पीता हूँ| मैं तुम्हारी कब्र पर सोना चाहता हूँ| आओ, मुझे अपनी बाहों में ले लो|

मैं सो जाऊं, जब वो तुम्हें पुकारे, तुम्हारे नाम पर शोक गीत गायें, तुम्हारे नाम पर सदका करें| मैं सो जाऊं जब तुम उठो और बेचैनी से अपनी कब्र के ऊपर बैठ कर रोने लगो| मैं सो जाऊं जब तुम्हारा नाम झूठी जुबान पर आये| मैं सो जाऊं जब मैं तुम्हारी कब्र पर झूठा चिराग़ रोशन करूँ|

मैं सो जाऊं जब बैसाखी आये|

अनुच्छेद ३७० और आतंकवाद

कानून का कोई भी विद्यार्थी यह मानेगा कि भारतीय संविधान के बारे में आपको कुछ पता हो या न पता को मूल अधिकारों के बारे में पता होना चाहिए| परन्तु मूल अधिकारों के बारे में जानने वाले भारतीय अनुच्छेद ३७० को जानने वाले भारतियों से कम होंगे| मामला वाही है कि अपने सुख दुःख से अधिक इंसान दूसरे के संभावित सुखों से परेशान रहता है|

इन दिनों जब भी अनुच्छेद ३७० की बात आती है, इसे किसी न किसी रूप में आतंकवाद से जोड़ दिया जाता है| अज्ञान या अतार्किकता यह है कि ऐसा प्रचारित होता रहा है कि इसका लाभ मात्र राज्य के एक प्रखंड में रहने वाले एक धार्मिक समुदाय को मिला है| मैं नहीं जानता की आखिर उस प्रखंड के अन्य वर्ग और अन्य प्रखंड के निवासी इसका लाभ क्यों नहीं ले सकते| इस से

मजे की बात यह है कि जिस जम्मू कश्मीर राज्य से यह अनुच्छेद जुड़ा हुआ है, वह इस प्रकार के विशेष प्रावधान वाला अकेला राज्य नहीं है| कई अन्य राज्यों को भी अन्य अनुच्छेदों के अंतर्गत विशेष अधिकार मिले हुए हैं|

अब अगर हम आतंकवाद के मुद्दे पर बात करें तो भारत में बहुत से राज्य किसी न किसी प्रकार के आतंकवाद से जूझ रहे हैं| मध्य और पूर्वी भारत में नक्सलवाद है| उत्तरपूर्व में भी अलग अलग प्रकार से आतंकवाद मौजूद है| परन्तु कश्मीर और पंजाब के आतंकवाद की गूँज दिल्ली में सबसे सुनाई देती है| जी हाँ पंजाब में आज आतकवाद नहीं है| इस राज्य को कोई संवैधानिक विशेष अधिकार नहीं था| राज्य भले ही तकनीकि रूप से अल्पसंख्यक धार्मिक समूह से सम्बन्ध रखता हो परन्तु उन्हें बहुसंख्यक भारतीय आज अपनेपन से देखते हैं|

कश्मीर और पंजाब के आतंकवाद की समानता देखते हैं –

  • भारत पाकिस्तान सीमा
  • सीमावर्ती राज्य
  • धार्मिक अल्पसंख्यक
  • विदेशी धन
  • पाकिस्तानी समर्थन
  • मूल रूप से प्राकृतिक संसाधन में धनी क्षेत्र
  • प्रारंभिक दिनों में केंद्र में कांग्रेस का शासन
  • सरकार की राजनीतिक और कूटनीतिक गलतियाँ
  • हिन्दूवादी/ राष्ट्रवादी राजनीतिक दलों के अलगाववादियों से बनते बिगड़ते लुकाछिपी सम्बन्ध
  • स्थानीय असंतोष
  • आतंकवाद को प्रारंभिक तौर पर स्थानीय समर्थन
  • स्वतंत्र देश की मांग
  • अनियंत्रित पुलिस/सेन्य कार्यवाहियां
  • हर किसी अपराधी को आतंकवादी घोषित करने की पुलिसिया प्रवृत्ति
  • निर्दोष और आम नागरिकों पर दोनों और से निशाना
  • मानव अधिकार उलंघन

दोनों आतंकवाद का एक जैसा गठन साफ़ दिखाई देता है| जबकि पंजाब कोई विशेष दर्जा प्राप्त नहीं था जबकि जम्मू कश्मीर को खास संविधानिक दर्जा प्राप्त है| इसलिए अनुच्छेद ३७० को जम्मू कश्मीर आतंकवाद के लिए दोषी नहीं माना जाना चाहिए| अनुच्छेद ३७० को हटाना केवल आतंकवादियों के हित में काम करेगा कि भारत अपने संविधानिक वचन का पालन करने से पीछे हट रहा है|

हमें समस्या के राजनीतिक हल के लिए प्रयास किये जाने चाहिए| ऐरे गैरे अपराधियों को आतंकवादी कहने के स्थान पर उन्हें कानूनी तौर पर सजाएं दी जाएँ| स्थानीय नागरिकों के साथ सकारात्मक सम्बन्ध बनाये जाएँ| इन सुझावों में कुछ नया नहीं है| इन्हें भारत पंजाब, मिजोरम आदि राज्यों में आतंकवाद के विरुद्ध अजमाया जा चुका है|

चुनावी खच्चर

चुनावी खच्चर वह निरुद्देश्य निष्क्रिय प्राणी है जिसके होने न होने से चुनाव पर कोई असर नहीं पड़ता और वह चुनाव से बहुत कुछ प्राप्त करने की आशा करने से निराश रहता है| यह प्रायः मध्यवर्गीय मानसिकता से त्रस्त आयकरदाता होता है जिसके अनुसार देश का सारा सरकारी काम खासकर कर्ज माफ़ी और घोटाला उस के आयकर पैसे से चलता है| इसे प्रायः बिना बिल का सामान खरीदने की जुगाड़ करते, अनावश्यक रूप से रिश्वत देते, जुगाड़ भिड़ा कर मंहगे विद्यालयों में बच्चों का दाखिला कराने के बाद उन्हें लठ्ठ मार मार कर कोचिंग क्लास जाने के लिए विवश करते देखा जा सकता है| यह सड़क किनारे मूतते हुए नारा लगाता है – इस देश का कुछ नहीं हो सकता| अपनी बहन बेटी की सहेलियों के संग अश्लील हरकतें करने या करने के हसीन सपने देखते हुए यह अपनी माँ बहन की इज्जत बचाने की आशा में उन्हें ताले में बंद करने कोशिश करता है|

चुनावी खच्चर दुनिया भर की बड़ी बड़ी बातें बनाने के बाद, चाय और पान तम्बाकू की दुकान और अपने दफ़्तर की कोफी मशीन के किनारे पर खड़ा होकर घंटो बेमतलब बहस करने के बाद बड़े लीचड़ तरीके से घोषणा करता है – सब एक जैसे हैं, मैं तो इसलिए वोट डालने नहीं जाता|

चुनावी खच्चरों की तादाद देश की आबादी में लगभग तीस से चालीस फ़ीसदी मानी जाती है| हर चुनाव में मतदान केंद्र से अनुपस्तिथ रहे लोगों ने इनकी संख्या ९५ प्रतिशत तक होती है| चुनाव के दिन आसपास के इलाकों में तफ़रीह पर चले जाना पक्के चुनावी खच्चरों का विशिष्ठ लक्षण माना जाता है| हाँ, यह सामाजिक माध्यमों पर करें मतदान – देश महान जैसे नारे जरूर प्रेषित कर देता है| इन्हें चुनावी क़ानून के नाम पर सिंगापुर की याद आती रहती है कि वहां मतदान न करने पर सजा मिल सकती हैं|

चुनावी खच्चर को देशप्रेम से प्रेम होता है| चुनावी खच्चरों की औलादें अक्सर आस्ट्रेलिया कनाडा आदि देशों की वीज़ा कतारों में खड़े होकर और बाद में उन देशों में भारतीय सांस्कृतिक कार्यक्रम में जाकर देशप्रेम का अनूठा परिचय देते हैं| यहूदियों का देश इस्रायल इनका स्वर्ग और यहूदियों का दुश्मन हिटलर इन के बहुमत का इष्टदेव माना जाता हैं|

चुनावी खच्चर को कभी पता नहीं होता कि वह और उसके जैसे दूसरे चुनावी खच्चर अगर किसी ईमानदार निर्दलीय उम्मीदवार को अपना मत दे दें तो वह ईमानदार कर्मठ आदमी देश के काम आ सके|

चुनावी खच्चर खुद भी चुनाव नहीं लड़ता – उसे पता है उसके साथ के दूसरे चुनावी खच्चर उसे अपना मत नहीं देंगे|

चुनावी खच्चर को विशवास रहता है कि उसका मालिक, अधिकारी, शिक्षक, और बाप गधा है और अक्सर किसी असली गधे यानि बाहुबली, धर्मगुरु, फिल्म अभिनेता को यह अपना असली घोड़ा मान लेता है|

युद्ध का नशा

जब देश पिछले तीन युद्ध जीत चुके हो तब जनता के लिए युद्ध का विचार सरल होता है| परन्तु अगर देश पिछले पैतालीस साल से कोई युद्ध नहीं लड़ा हो तो यह विचार युद्ध के उन्माद में बदलना सरल होता है| किसी को यह याद नहीं रहता कि विजेता पक्ष से कितने लोग मारे गए, कितने घायल हुए, कितने बंदी बना और लौटे नहीं, कितने भगौड़े घोषित किये गए| सब जीत की कहानियाँ कहते हैं, जीत के घाव सीने पर नहीं होते| यह सब उस जनता के लिए अधिक सरल होता है, जिसका युद्ध से वास्ता मात्र टेलिविज़न पर पड़ता है| जिन्हें घर में सोफ़े पर बैठकर रिमोट हाथ में लेकर युद्ध देखना होता है उनके लिए युद्ध का अर्थ किसी विडियो गेम से अधिक नहीं होता|

युद्ध मूर्खों का मनोरंजन है, महामूर्खों का बदला है, और अपरिपक्व राजनीतिज्ञ की रणनीति है|

बहुत मित्र गीता और महाभारत को बार बार युद्ध के समर्थन में सामने लाते हैं| परन्तु सब जानते हैं कि स्वयं श्रीकृष्ण युद्ध की तैयारियां होने के बाद भी शांतिदूत बनकर कौरवों से मिलने गए थे| उन्होंने सालों साल टलते युद्ध को एक बार फिर टालने का प्रयास किया| महाभारत में हुई तबाही कथा के रूप में सबके सामने है| क्या मानवता, क्या भारतवर्ष, क्या जम्बूद्वीप विजयी हुआ? जिन्हें लगता है कि भारत और पाकिस्तान भारतवर्ष का भाग नहीं हैं, उन्हें सिर्फ क्षणिक इतिहास का बोध है| वह भूल रहे हैं कि गंधार से गंगासागर तक भारतवर्ष का अमूर्त स्वरुप है, इस भूमि में राज्य बनते बिगड़ते रहते हैं| वह भूल रहे हैं, देशों के मानचित्र समय बदलता है| महाभारत में रहे राष्ट्र आज नहीं हैं, मगर भारतवर्ष आज भी अपने घाव सहला रहा है|

किसी भी युद्ध का अंत अंतिम विनाश से होता है या फिर वार्तालाप से| यह सही है कि विजेता इतिहास रचता है| बार बार बांग्लादेश का उदाहरण न दें, वहाँ का सत्य मात्र भारतीय सेना नहीं है, जन विद्रोह, गहन कूटनीति, गंभीर राजनीति, सामरिक रणनीति और उचित समय का इन्तजार उसका मूल था| मगर उस जीत से भी भारत को क्या मिला – अवैध बांग्लादेशी अप्रवासी, असम समस्या, जलता हुआ उत्तर पूर्व, अप्रशिक्षित, घरेलू नौकर, और ढेर सारे युद्ध उन्मादी !!

किसी भी उन्माद से बचें| युद्ध की देवी बलि मांगती हैं – केवल दुश्मन की बलि नहीं|

चिकित्सा सेवा सुधार

यह लेख पिछले लेख स्वास्थ्य बीमा बनाम स्वास्थ्य सेवा की आगे की कड़ी है|

दुनिया भर में स्वास्थ्य सेवाएँ देना एक बेहद महंगा कार्य है| उस से भी अधिक महंगा है किसी भी बड़ी बीमारी के लिए मूलभूत ढांचा खड़ा करना| एक समय था कि सरकारें ही इस प्रकार के बड़े खर्चे वहां करने की स्तिथि में थीं| आज दुनिया भर में गरीबी कम हुई है और व्यवसायिक स्वास्थ्य दे पाना संभव हुआ है| मगर, आज भी बेहद बड़ी बीमारिओं के लिए व्यावसायिक तौर पर स्वास्थय सेवाएं दे पाना कठिन है| यह बड़े और महंगे खर्च वाले चिकित्सालय बेहद बड़े शहरों में ही उपलब्ध हो पा रहे हैं| दूसरी तरफ अच्छे अस्पतालों में इलाज कराने की चाह के चलते छोटे शहरों और गाँवों के अस्पतालों में मरीजों की कमी है| मरीजों की इस कमी के चलते अच्छे इन अस्पतालों के लिए अच्छे चिकित्सक ला पाना कठिन होता जा रहा है| इस समस्या से निपटने के लिए सरकारों को छोटे और बेहद बड़े अस्पातालों और इलाजों में निवेश करने की आवश्यकता है|

बीमा मरीज को इलाज सस्ता या मुफ्त दे सकता था, मगर इलाज नहीं दे सकता| इलाज उपलब्ध करने का काम सरकार का है, चाहे यह पूंजीवादी सरकार हो या साम्यवादी| निजी क्षेत्र को साथ लेकर चलना उचित है, परन्तु स्वास्थय सेवाओं की निजी क्षेत्र ही पर छोड़ देना उचित नहीं जान पड़ता| बीमा सम्बन्धी कोई भी सरकारी योजना आज केवल निजी चिकित्सालयों के दम पर सफल नहीं हो सकती|  उदाहरण के लिए आज तक निजी क्षेत्र एम्स जैसे एक भी संस्थान को खड़ा नहीं कर पाया है| टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल, मुंबई जैसे एक दो उदहारण को छोड़ दें तो निजी क्षेत्र का पूरा लक्ष्य स्वास्थ्य सेवाओं का व्यवसायिक दोहन तक ही सिमटा हुआ है|

मेरा सुझाव यह है कि

  • राज्य सरकारें (स्वास्थ्य राज्य का संवैधानिक विषय है) स्वास्थ्य सेवा की उपसेवा के रूप में बीमा पूल तैयार करें और उस से इक्कठा होने वाले धन से स्वास्थय सेवाए प्रदान करे|
  • हर नागरिक को इस सरकारी बीमा पूल से सरकारी और निजी चिकित्सालयों में चिकित्सा सुविधा मिले|
  • सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं का पूरा मूल्य लिया जाये और चिकत्सकों को भी सरकारी बीमा पूल से व्यवसायिक सेवामूल्य दिया जाए|
  • निजी क्षेत्र को चिकित्सा अनुसन्धान जैसे क्षेत्रों में आने के लिए प्रेरित किया जाए और उसका व्यवसायिक उपयोग करने की अनुमति हो|
  • दवाओं और अन्य उत्पादों पर मूल्य नियंत्रण हो परन्तु इतना नहीं कि यह क्षेत्र लाभ का सौदा नहीं रहे|
  • चिकित्सा उत्पाद क्षेत्र में आपसी प्रतिस्पर्था को बढ़ावा दिया जाये|

स्वास्थ्य बीमा बनाम स्वास्थ्य सेवा

बीमा, पूँजीवाद का सर्वाधिक साम्यवादी उत्पाद है| इसमें पूँजीवाद की लम्पटता और साम्यवाद की अनुत्पादकता का दुर्भाग्यपूर्ण सम्मिश्रण है|

बीमा का सीमित प्रयोग सफलता की कुंजी है| उदारहण के लिए केवल शुरूआती जीवन में लिया गया सावधि जीवन बीमा आपके परिवार को आर्थिक सुरक्षा देता है| अन्य जीवन बीमा उत्पाद बीमा कंपनी को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करते हैं|

मैं जिन बीमा उत्पादों का समर्थक हूँ उनमे स्वास्थ्य बीमा शामिल है| परन्तु कबीर दास जी बीमा के बारे में ही कह गए हैं: अति का भला न चुपड़ना| यहाँ हम केवल स्वास्थ्य बीमा की बात करेंगे|

पहली बात यह है कि इस बात का ख्याल रखा जाए कि बीमार न पड़ा जाए| उस तरह न सोचा जाये जिस तरह हम दिल्लीवाले वायु प्रदूषण सम्बन्धी बीमारियों के बारे में कभी कभी सोच लेते हैं – बीमा के खर्चे पर इलाज कराएँगे| ध्यान रखें चिकित्सा, शल्य चिकित्सा और दवाओं के दुष्प्रभाव आपको ही झेलने होंगे – बीमा कंपनी को नहीं| अच्छे पर्यावरण के लिए सरकार, साम्यवाद और पूँजीवाद से लड़िये– यह बहुत बड़ा बीमा है|

दूसरी बात, स्वास्थ्य बीमा केवल इस बात का आश्वासन है कि अगर आप कोई स्वास्थ्य सेवा लेंगे तो उसका खर्च बीमा कंपनी उठाएगी| यह बात तो हम सभी जानते हैं कि अधिकतर बीमा कंपनी बड़ी और खर्चीली बीमारियों को सामान्य स्वास्थ्य बीमा से बाहर रखतीं हैं| इस बीमारियों के लिए आपको अलग से बीमा लेना होत्ता है या फिर रामभरोसे बैठना होता है| अगर फिर भी बीमारी हो जाती है तब आपकी बचत खर्च होने लगती है| बीमा चाहे निजी हो या सरकारी, इस बात का ध्यान रखें|

तीसरी बात, अगर आप दुनिया की सारी बीमारियाँ अपने बीमा में शामिल करवा भी लेते हैं तो बीमा कंपनी इस बात की कोई गारंटी नहीं दे सकती कि किसी बीमारी का इलाज आपके देश में या फिर इस दुनिया में कहीं भी है| इस बारे में सोचने की गंभीर आवश्यकता है|

क्या हमारे पास स्वास्थ्य सेवा का मूलभूत ढाँचा है?

आरक्षण बेचारा!!

मानसून और चुनाव हमारे राष्ट्रीय मौसम हैं| इन मौसम में मेढ़क और नेता अपने बिल और बंगलों से बाहर निकल आते हैं| मॉनसून और चुनावों के बाद दिवाली शुरू हो जाती है, इसलिए पुराने साज-सामान और वादों को धो पौंछ कर चमकाया जाता है|

इस बार प्रधानमंत्री जी ने पुराने वादे को वादों के कब्रिस्तान से खोदखाद कर खड़ा कर किया है| गरीबों को दस फ़ीसदी आरक्षण मिलने जा रहा है| बधाईयाँ… , … …. … थोड़ी देर बाद|

सवाल यह नहीं रहा कि पिछले पच्चीस साल में कितने लोगों की आरक्षण का लाभ मिला और आरक्षित श्रेणी के कितने पद खाली छूट गए? सवाल खास ये है कि नौकरियां कहाँ हैं? आज बेरोजगारी का आंकड़ा ९ फीसदी के पास पहुँच चुका है| सरकारी नौकरियां लगातार घटी हैं, तो आरक्षण के वास्तविक अवसर कम होते रहे हैं| सरकारी खर्च में कटौती के नाम पर अधिकतर सरकारी काम ठेके पर हैं या व्यवसायिक करार दिए जाकर निजी क्षेत्र को बिक चुके हैं|

आरक्षण की इस घोषणा का सबसे खूबसूरत पहलू है – गरीबी का पैमाना|

सालाना आठ लाख की पारवारिक आय आरक्षण वाली गरीबी का पहला मापदंड है| गरीबी रेखा तो बेचारी आरक्षण वाली गरीबी आगे पानी मांगती है| यह आंकड़ा देश की प्रति व्यक्ति आय से बहुत अधिक है| देश की लगभग नब्बे प्रतिशत से अधिक आबादी इस आय निर्धारण के हिसाब से गरीब घोषित हो गई है| सरकार ढ़ाई लाख से उपर सालाना आय पर आयकर वसूलती है| बहुत से शहरी मित्र कहते हैं कि आयकर सीमा प्रतिव्यक्ति है और आरक्षण सीमा प्रतिपरिवार| मगर पति पति दोनों चार चार लाख से कम कमायें तो दोनों आयकर अमीर और आरक्षण गरीब होंगे|

मैं इस बात से सहमत होना चाहता हूँ कि गरीबी रेखा से नीचे वाले व्यक्ति को आरक्षण देने का कोई फायदा नहीं होगा| कारण वास्तविक गरीबी रेखा से नीचे वाले गरीब का बच्चा इतना पढ़ लिख नहीं पाता कि किसी सरकारी पद के लिए वास्तव में योग्य घोषित हो पाए| चपरासी के लिए भी कम से कम आठवीं पास उम्मीदवार चाहिए होता है| अगर किसी की वास्तव में लाभ देना है तो इस आरक्षण के लिए गरीबी की सीमा रेखा वास्तविक गरीबी रेखा से निश्चित ही ऊपर होनी चाहिए| मगर यह आठ लाख इस रेखा से बहुत ऊपर है|

जमीन या घर के पैमाइश भी बड़ी अजीब है| सौ एकड़ का सिचाई विहीन ऊसर किसी परिवार को अमीर नहीं बना सकता तो मरीन ड्राइव पर दस फुट का घर या दफ्तर लेना बहुत से अमीरों के बस की बात नहीं| कुल मिलाकर संपत्ति के आधार पर गरीबी का कोई वैज्ञानिक निर्धारण नहीं हो सकता|

ध्यान देने की बात है कि आर्थिक आधार पर आरक्षण देने का न मुद्दा नया है न प्रयास| यह मुद्दा संविधान सभा के सामने भी आया था और प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव ने बाकायदा नियम भी बनाया था| पहले संविधान सभा और बाद में उच्चतम न्यायालय ने इसे संविधान सम्मत नहीं पाया| संसद में विधेयक पास हुआ है, विधानसभाओं में भी हो जाएगा| मगर… … नौकरी हो तो मिलेगी|

शेष कुशल हैं| चुनाव की चुनावी बधाई|

हिंदी भाषी मजदूर: विकास और वापसी

विकास किसे पसंद नहीं? विकास हिंदी क्षेत्र का सबसे लोकप्रिय नारा है – बिहार और उत्तर प्रदेश में तो विकास के नारे और विकास की सरकार को पहला स्थान मिला हुआ है| देश का समग्र विकास हिंदी क्षेत्र का सबसे बड़ा सपना है| पान से लेकर चाय की दुकान तक पर हमारे क्षेत्र में विकास वार्ता होती रहती है|

कठिनाई है विकास करने की| ऐसा नहीं कि बिहार को विकास पसंद नहीं| जहाँ विकास की झलक भी दिखाई दे, हम पहुँच जाते हैं| देश का कोई नगर, कोई उद्योग, कोई सड़क, कोई भी विकास मंदिर ऐसा नहीं जहाँ हमारा श्रम न लगा हो|

हमारा विकास प्रेम भी ऐसा है कि जहाँ विकास की सम्भावना भी हो, वहाँ पहुँच जाते हैं| देश का विकास अगर हुआ है तो शायद हमारे मजदूरों के बाजुओं के बल पर ही हुआ है| मुंबई हो या चेन्नई उनकी सड़कों पर श्रम करता श्रमिक बिहार का नहीं तो हिंदी क्षेत्र का तो अवश्य ही है|

देश भर में हम हर स्थान पर हैं| विकास में हिंदी क्षेत्र के आप्रवासियों का योगदान मानने की जगह स्थानीय लोगों को लगता है कि हम उनके रोजगार छीनते हैं| अक्सर हम हम पर अपराध और गंदगी से हमें जोड़कर देखा जाने लगा है| किसी भी प्रदेश में स्थानीय अप्रशिक्षित मजदूरों की बेरोजगारी का कारण भी हमें ही माना जाने लगा है| पहले मुंबई और अब मध्यप्रदेश में हमारे विरुद्ध बातें उठने लगीं हैं| आज अनामंत्रित अतिथि का व्यवहार झेलना हमारी विडंवना है|

क्या हम जबरन वापसी के लिए विवश होंगे? क्या हमें उन गाँवों और शहरों में लौटना होगा जहाँ हम केवल यादें छोड़ आये हैं?

मगर ऐसा क्यों?

पहला यह कि अनामंत्रित अतिथि किसी को कोई पसंद नहीं करता| हम पहले पहुँचते हैं और फिर नौकरी ढूंढते हैं| अक्सर उन लोगों को टेड़ी निगाह से नहीं देखा जाता जिन्हें नौकरियाँ देकर आमंत्रित किया गया हो जैसे इंजिनियर या डॉक्टर|

दूसरा अप्रशिक्षित मजदूर आसानी से दिखाई दे जाने वाला समुदाय है| यह दिन भर सड़क या सार्वजानिक स्थानों पर दिखाई देने के कारण निगाह में जल्दी आता है| जब स्थानीय लोगों के मुकाबले आप्रवासी मजदूर अधिक दिखाई दें तो लोग सरलता से संज्ञान लेते हैं| हिंदी क्षेत्र में जनता और सरकारों के पास धन की कमी भी एक बड़ा कारण है| जब तक समृधि नहीं होती, लोग आदर नहीं करते| पंजाबी शरणार्थी हो या तिब्बती, सभी अपने साठ सत्तर के दशक की ऐसी कहानियां रखते हैं जब स्थानीय लोग हेयता का भाव रखने लगे थे| बाद में समृधि आने और हिंदी सिनेमा में पंजाबी दबदबे के चलते पंजाबी आज देश का प्रभावशाली सांस्कृतिक समुदाय है| इसी प्रकार, समृद्धि के साथ गुजरात का डांडिया और बिहार का छट भी प्रसिद्ध होने लगा है|

तीसरी और इन सब से बड़ी बात हैं – मतदाता के रूप में इस वर्ग की उदासी| यह तबका अपने स्थानीय चुनावों में ऐसा नेतृत्त्व नहीं चुन सका जो हिंदी प्रदेश विकास के सतत पथ पर ले जा सके| स्थानीय रोगजार, उद्योग और व्यवसाय नष्ट होते रहे| पलायन शुरू हो गया| हिंदी क्षेत्र सबसे बड़ा मानव संसाधन में सर्वाधिक धनी होने का कोई लाभ नहीं ले सका| दुर्भाग्य से देश की सरकारों का भी विकास सम्बन्धी नीति निर्माण गाँवों और छोटे कस्बे शहरों के हित में नहीं रहा| आज स्थानीय रोजगार की कमी के कारण हमें पलायन करना पड़ता है|

मुझे लगता है कि यह उचित है कि महाराष्ट्र, गुजरात और मध्यप्रदेश ही नहीं, देश के सभी राज्यों की सरकारें और कंपनियाँ स्थानीय लोगों को रोजगार में प्राथिमिकता दें| पलायन को सस्ते मजदूर के लालच में बढ़ावा न दिया जाये| हिंदी प्रदेशों में विकास पर स्थानीय राज्य सरकारें समुचित ध्यान दें|

 

चुनाव २०१८

उत्सवधर्मी भारतीय हर अवसर पर उत्सव का आनंद उठा ही लेते हैं| भारतीय त्योहारों में अलग अलग तरह के खेलों का आयोजन होता है| कभी पतंग के पेंच लड़ते हैं तो कभी तीतर बटेर और मुर्गे| चुनाव भी भारतीय लोकतंत्र का ऐसा ही त्यौहार है| इसके खेल में नेता लड़ाए जाते हैं| मजा ये कि लड़ने वाले खुद आगे आते हैं|

चुनाव के खेल में चौसर की बिसात है, क्रिकेट का पिच है, टेनिस का नेट है, हॉकी की छड़ी है, फ़ुटबाल का लक्ष्य है, शतरंज के वजीर हैं, साँप सीढ़ी के साँप हैं, कबड्डी का साँसे है, मुक्केबाजी का मुक्का है और कुश्ती की पटकनी है| किसी भी पल ठोंक पीट कर बाहर कर दिया जाना है| जो टिका उसके गले सोने का तमगा और सिर काँटों का ताज है| हर किसी की उँगलियाँ शुध्द देशी घी और सिर सरसों के खौलते तेल में है| हर किसी खेल में गणित का विज्ञान और जन संपर्क की कला है|

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हाल में चुनाव को आंकड़ों का गणित और गणित का खेल बताने के प्रयास चलते रहे हैं| प्रशांत किशोर में आंकड़ों के बूते जनता को अपने आंकड़े में जकड़ने का जंजाल बुना था| यह जाल जंजाल अगले चार साल में ही खुद प्रशांत किशोर के गले में पड़ता हुआ, मोदी शाह के गले से उतर छुआ लगता है| जिस गणित के दम पर शाह शहंशाह ज्ञात होते थे उसका शाह-मात उनके सामने है| पन्ना प्रमुखों के पञ्च-प्रमुख कुछ बोल नहीं पा रहे| ऐसा पहली बार नहीं हुआ है| चुनावों में सितारों का टूटना चलता रहा है| टूटे सितारों के नाम इतिहास में अंकित होते रहे हैं|

पहले दूसरी जाति या धर्म देश के दुश्मन नहीं मान लिए जाते थे, आज ऐसा हो रहा है| तकनीकि सामाजिक माध्यमों को असामाजिक स्तर पर गिराने के साथ राजनीति ने अपने आप को एक अंधकूप में धकेल दिया है| हाल फिलहाल राजनीति ने सामाजिक संबधों को धर्म और जाति की तरह ही विभाजनकारी रूप में विच्छेदित किया है| इस देश में सांड छुट्टे घूम रहे हैं और बैल बाप हो चुके है| यह देश गाय और सूअर का देश बनकर रह गया है|

मगर क्या स्थिति इतनी निराशाजनक है| नहीं, बिक्लुल नहीं| कम से कम पांच राज्यों के हालिया चुनाव आश्वस्त करते हैं| हिंदुत्व का नारा कमजोर हुआ कि न पुराने सिपहसालारों का राम मंदिर जनचर्चा में आया न नए सिपाही का मंदिर मंदिर भटकना| अंध विकास का मजबूत नारा छत्तीसगढ़ में खेत रहा तो अन्य जगह विकास के नारे का खोखलापन खुलकर सामने आया| मध्यप्रदेश में जनता ने चहुमुखी विकास का प्रश्न सामने रखा है जहाँ विकास के बाद भी जनता को अधूरी योजना कार्य और नेताओं के अहंकार का सामना करना पड़ा| यह परिघटना यह बताने के लिए पर्याप्त है कि जनता में सोचने समझने का काम हो रहा है| सामाजिक संचार माध्यम अपने हो हल्ले के बाद भी आम जनता को अपनी समस्याओं और उनके समाधानों के प्रति सोचने से विरत नहीं कर पा रहे|

सामाजिक संचार माध्यम अपनी प्रासंगिकता के बारे में सोचें, यह समय की आवश्यकता है|

दिवाली अब भी मनती है

वर्षा उपरांत स्वच्छ गगन में झिलमिलाते असंख्य तारक तारिकाएँ रात्रि को गगन विहार को निकलतीं| लगता सप्तपाताल से लेकर सप्तस्वर्ग तक असंख्य आकाश-गंगाएं कलकल बह रहीं हों| दूर अन्तरिक्ष तक बहती इन आकाशगंगाओं में हजारों देव, देवेश्वर, देवादिराज, सहायक देव, उपदेव, वनदेव, ग्रामदेव आदि विचरण करते| देवियों देवेश्वरियों, सहायक देवियों, वनदेवियों, उपदेवियों, ग्रामदेवियों की मनोहर छटा होती| आकाश मानों ईश्वर का जगमगाता प्रतिबिम्ब हो| प्रतिबिम्बों अधिष्ठाता देव रात्रिपति चन्द्र को ईर्ष्या होती| कांतिहीन चंन्द्र अमावस की उस रात अपनी माँ की शरण चला जाता है| धरती पर कहीं छिप जाता है| उस रचे अनन्त षड्यंत्र इन आकाशगंगाओं की निर्झर बहने से रोकना चाहते हैं|

अहो! वर्षा उपरांत की यह अमावस रात!! देखी है क्या किसी दूर जंगल पहाड़ी के माथे बैठ कर| लहराता हुआ महासागर उससे ईर्ष्या करता है| उस के झिलमिल निर्झर प्रकाश में वनकुल की बूढ़ी स्त्रियाँ सुई में धागा पिरोती हैं| प्रकाश की किरणें नहीं प्रकाश का झरना है| प्रकृति की लहलहाता हुआ आँचल है| वर्षा उपरांत अमावस की रात यह रात अपने नेत्रों से देखी है!!

अकेला चन्द्र ही तो नहीं जो अनंत आकाशगंगाओं से ईर्ष्या करता है| सृष्टि विजय का स्वप्न है, मानव|

प्रकृति का दासत्व उसका उत्सव है| कोई आम उत्सव नहीं यह| स्वर्ग के देवों को भी प्रतीक्षा रहती है| मानव अनन्त आकाश गंगाओं से टकरा जाता है| धरती पर असंख्य दीप झिलमिला उठते हैं| आकाशगंगाओं में विचरण करते असंख्य देव, देवियाँ, देवेश्वर, देवेश्वारियां, देवादिराज, देवाधिदेवी, सहायक देव-देवियाँ, उपदेव-देवियाँ, वनदेव – देवियाँ, ग्रामदेव-देवियाँ घुटनों के बल बैठ जाते हैं| आकाशगंगा के किनारों से यह असंख्य देव देवियाँ पृथ्वी पर ताका करते हैं| अहा! यह दीपोत्सव है, यह दिवाली है| हर वर्ष हर वर्षा दीप बढ़ते जाते हैं| घी – तेल के दिया-बाती अपना संसार सृजते हैं| असंख्य देव भौचक रहते हैं| असंख्य देवियाँ किलकारियां भरती हैं| कौन किसको सराहे| कौन किसकी प्रशश्ति गाये| कौन किस का गुणगान करे| कौन किस की संगीत साधे|

अब देवता विचरण नहीं करते| अब देवियों की छटा नहीं दिखती| अब देव खांसते हैं| अब देवियाँ चकित नहीं होतीं| अब आकाश ईश्वर का प्रतिबिम्ब नहीं होता| चन्द्र अमावस में मलिन नहीं होता| चन्द्र पूर्णिमा को मैला रहता है| चन्द्र चांदनी नहीं बिखेरता| इस चांदनी का चकोर मोल नहीं लगता| इस चांदनी में मिलावट है| इस चांदनी में शीतलता नहीं है|

मिठाइयाँ अब भी बनती है| पूड़ियाँ अब भी छनती हैं| बच्चे अब भी चहकते हैं| कपड़े अब भी महकते हैं| दीवारें अब भी चमकतीं हैं| प्रेमी अब भी बहकते हैं| दीपोत्सव अब भी होता है| दिवाली अब भी मनती है| आकाश में कालिख छाई है| हवाओं में जहर पलता है| दिग्दिगंत कोलाहल है| काल का शंख अब बजता है| ये मानव का अट्टाहास है| यह बारूद धमाका है| यह बारूद पटाखा है| यह बारूद का गुलशन है| यह बारूद की खेती है| यह बारूद का मन दीवाना है|

यह बारूद का उत्सव है| यहाँ दीपक किसने जाना है? यहाँ गंगा किसने देखी हैं? चाँद किसे अब पाना है? यहाँ खुद को किसने जाना?

यहाँ दमा का दम भी घुटता है| हर नाक पर यहाँ अब कपड़ा है|

बचपन का वो आहाता

बचपन सुहाना होता है| परी देश की अलग दुनिया| कार्टून फ़िल्म की दुनिया| दुनिया की एक चहारदीवारी होती है| उसके पार बिगड़ा पाकिस्तान| समाज नहीं बदलता, न शहर| शहर की आबादी लाख दो लाख थी, शहर के बाहर परकोटा था| आज गाँव और कालोनी के बाहर परकोटा है| लोहे के दरवाज़े लगे हैं| शहर में कई शहर रहते है| मोहल्ले और पड़ोस की अपनी दुनिया होती है| आहातों में जहाँ बसता है| गली गली में दाग़ देहलवी, कूचे कूचे पंकज उधास, कमरा कमरा जगजीत सिंह, गुसल गुसल मुहम्मद रफ़ी|

आहाता को कंपाउंड, काम्प्लेक्स, अपार्टमेन्ट, काउंटी, सिटी तक कहने के शौक गुजरे हैं| नक्शा बदल जाने से नक़्शे भी बदल जाते हैं| आहाते में चारों ओर घर के घर, एक प्रवेशद्वार – जरूरत और वक़्त के हिसाब से बड़ा छोटा| एक जैसे लोग – परिवारीजन – अपना खानदान – बस हम लोग| कभी कभी इतने बिखरे या बड़े परिवार, कि आपसी रिश्तेदारी उलझी गुलझी|

बीच में बड़ा सा घेर, दालान, आँगन, मैदान, छोटी बगीची, बाबाजी का अखाड़ा, धुल- धक्कड़, ढेर सारा प्यार, घमाघम गपशप, डूब मरा दारू दर्शन, रात की अन्ताक्षरी, औरतों की चिकचिक, बारिशों का सामूहिक बच्चा स्नान, दावतों का हलवाईखाना, नवरात्रों का रात्रिजागरण, गली क्रिकेट का गिल्ली डंडा, हफ़्ता हफ़्ता गाली गलौज, होली दिवाली मिलन सम्मलेन, गर्मियों का सामूहिक शयन, बुआओं का हल्ला गुल्ला स्वागत, लड़कियों की रुंधी रुंधी विदाई, सब का सब मान का पान|

किस का बच्चा किस ने पाला? किस ने किस के चौके रोटी खाई? किस ने किस के पतीले की दाल उड़ाई? कच्ची इमली किस ने खाई? किस को क्या पता चलना? किस को इस का पता करना? मगर फिर भी हर हफ़्ते लड़ना झगड़ना|

आहाते जीते थे, जिन्दा थे, आबाद थे, गुल-ओ-गुलज़ार थे, चहकते महकते थे, साँझा विरासत थे, सब के बुज़ुर्ग थे, सब की जान-ओ-अमानत थे| सबका मिलाजुला मेला दशहरा थे| रेडियो सीलोन का सिबाका गीत माला और आकाशवाणी का विविध भारती थे| आहाते रेडियो की झुमरी तलैया थे|

आहाते दोपहर को औरत, तिपहर को बच्चे, शाम को आदमी, रात को परिवार, सुबह को बूढ़े, दिन निकलते शिशु होते थे|

आहाते आहत हो गए| बदलते वक़्त ने आहट न की| बदलता वक़्त हँसते मुस्कुराते चुपचाप आहातों में चला आया, गुपचुप टेलिविज़न बन गया| काला सफ़ेद टेलिविज़न आहातों को बूढ़ा कर गया| आहाते इतवार के इतवार भजन कीर्तन सुनने लगे| आहाते रामानंद सागर हो गए| आहाते के गले में चित्रहार पड़ गया|

आहातों का मरना बाकि रहा| आहाते धूल फाँकने लगे| आहाते किसी कड़वी दवा का कार्बनिक कंपाउंड हो गए| गिटिर पिटिर गिरमिटिया उन्हें कंपाउंड कहने लगे|

आहाते के दिल खाड़ी युद्ध हो गये| दुनिया छोटी होती गई| एमस्टरडम आगरा आ गया| आहाते दुकान बन गये| आहाते में बंधी गौ माता नारा बन गई और दूर गोवा में गुम हो गई| गौशाला में बाइक और आहते में कार पार्किग हुई|

“आहाते जब तक हते, अपने हते” अधेड़ होते एक इंसाननुमा एग्जीक्यूटिव ड्रेस ने बोतल के सहारे पीज़ा गटकते हुए कहा| दो चश्मे उस बूढ़ी कपिला गाय की याद में आँसू बहाने लगे, जिसके पैर छूकर नवीं में नकल से नब्बे नंबर आये थे| काफ लेदर के जूतों पर पड़े वो आंसू आज भी ओस की तरह चमकते हैं|

शौर्य अङ्ग दीनदयाल

शौर्य अङ्ग दीनदयाल के बारे में आप ने सुना।

नहीं नहीं, नहीं सुना होगा। कोई है भी नहीं इस नाम का। मगर जिस तरह साम्प्रदायिक उन्माद है, व्यक्ति के धर्म/सम्प्रदाय से देशप्रेम निर्धारित हो रहा है यह आम अस्तित्व में आ सकता है।

उन्मादी तत्व सकते में हैं, ये औरंगजेब कौन है? ये औरंगजेब नाम वाला कैसे देशभक्त हो सकता है। एक तो मुस्लिम, ऊपर से इतना ख़तरनाक हिन्दू विरोधी नाम। शायद सरकार ने गलत नाम लिख दिया होगा।

हालात यह है कि निजी बातचीत में उन्मादी लोग औरंगजेब को शौर्य चक्र मिलना अपनी प्रिय सरकार का चुनावी दाँव पेच तक बता दे रहे हैं। क्या उनकी प्रिय सरकार वही सब कर रही है, जो पहले की तुष्टिकरण सरकार करती थी? फिर फ़र्क क्या रहा? क्या फ़ायदा हुआ आपको सरकार बदलने का। अपनी प्रिय सरकार पर तो भरोसा रखिये।

हालात ही ऐसे हैं। आम लोगों की दुनिया अक्सर अपनी गली मोहल्ले और नाते रिश्तेदारों के आगे नहीं होती। प्रायः हमारे गली मोहल्ले और नाते रिश्तेदार हमारी अपनी जाति के होते है। यह जरूर है कि नई कॉलोनियों में सवर्ण, दलित, और मुस्लिम जैसे थोड़ा बड़ा समूह रहता है, एक जाति के मोहल्ले कम हुए हैं, पर अभी हैं।ऐसे में दूसरी जाति और धर्म तो लगभग पराई दुनिया की तरह होते हैं। जिन से हम मिले नहीं कभी तो अविश्वास बना रहता है।

यह अविश्वास औए बढ़ रहा है। आपसी संवाद तो अब घर परिवार नाते रिश्तेदारी में भी सामाजिक नहीं रह गया, सोशल मीडिया ज्यादा हो गया है। संवाद की कमी ने अफवाह और कही-सुनी ने ले ली है।

मुस्लिम होना ही गलत हो गया है। लोगों को नहीं समझ आता कि अकबर का सेनापति हिन्दू और राणा प्रताप का सेनापति मुस्लिम कैसे हो सकता है। मात्र दिमाग़ी फितूर के चलते नाम बदल जा रहे हैं। जगहों के, योजनाओं के और शायद लोगों के भी। यह सब आज से नहीं हो रहा, पिछले चार पाँच साल से नहीं हो रहा। यह लंबी प्रक्रिया है, काम से कम पचास साल का इतिहास है इसके पीछे।

अब औरंगजेब को लीजिये। देश के लिए लड़ा। मुस्लिम था इसलिए साम्प्रदयिक तत्वों को भरोसा नहीं हो रहा। मुस्लिम होने के साथ उसका नाम और बड़ी अड़चन है। उन्हें लगता है कि कहीं न कहीं वो या उसके मातापिता मुग़ल शासक औरंगजेब की तरह हिन्दू विरोधी होंगे। यह अलग बात कि शासक औरंगजेब का हिन्दू विरोधी होना भी बहस का मुद्दा रहा है। ख़ुद शासक औरंगजेब का सेनापति हिन्दू था।

हाल में दिल्ली में औरंगजेब रोड का नाम अब्दुल कलाम मार्ग रख दिया गया। यह उन्मादियों के दिमाग में बुरा मुसलमान बनाम अच्छा मुसलमान का द्वंद था। ऐतिहासिक तथ्य जहां हैं वहीं रहेंगे। इसकी परिणति कहाँ होगी किसी को नहीं पता। आज बुरे तालिबान अच्छे तालिबान, बुरे मुसलमान अच्छे मुसलमान, मुसलमान हिन्दू, बुरे हिन्दू अच्छे हिन्दू तक कहीं भी जा सकती है।

धर्म से अगर इंसान का बुरा इंसान या अच्छा इंसान होना तय हो जाता तो न रामायण होती न महाभारत। न रावण, न कौरव।

इन दिनों जिस तरह के हालात है, इस औरंगजेब को देशभक्त मानने के लिए साम्प्रदायिक उन्मादियों के पास एक ही सरल तरीका है। नाम बदल देना। क्या उसका नाम शौर्य अंग दीनदयाल रख दिया जाए?

औरंगजेब को शौर्य चक्र मिलने का यह मौका सटीक मौका है कि हम साम्प्रदायिक उन्माद से बाहर आएं।

आरक्षित अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में जातिगत आरक्षण न दिए जाने का मुद्दा जोरों पर है| यह नया मुद्दा नहीं है| पिछले साठ सत्तर सालों से यह मुद्दा उठता रहा है| सरकारी पत्राचार होता रहा है| स्थानीय सवर्ण हिन्दू हमेशा इस विश्वविद्यालय में जातिगत आरक्षण के विरोध में रहे हैं| वास्तव में मुस्लिम समुदाय को इस विश्वविद्यालय में जातिगत आरक्षण से कोई फ़र्क नहीं पड़ता|

जातिगत आरक्षण के मुद्दे का सरकारी पत्राचार से बाहर आना कई परिकल्पनाओं पर आधारित है:

  1. इस विश्वविद्यालय में मुस्लिम तबके के लिए आरक्षण है|
  2. जातिगत आरक्षण से विश्वविद्यालय में लगभग आधे लोग उस आरक्षित तबके होंगे जो हिन्दू है या कम से कम सरकारी कागजों में हिन्दू माना जाता है|
  3. मुद्दा उठाने वालों को तात्कालिक राजनीतिक लाभ मिलेगा|

यह विश्वविद्यालय वास्तव में कोई धार्मिक या जातिगत आरक्षण नहीं देता| पचास प्रतिशत का आंतरिक छात्रों के लिए दिया जाने वाला आरक्षण और गैर मुस्लिम समुदाय का यहाँ पढने की इच्छा न रखना इस को मुस्लिम बहुल विश्वविद्यालय बनाने का काम बखूबी करता है|

यहाँ पढाई वास्तव में प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर शुरू होती है और यह छात्र आगे चलकर पचास प्रतिशत आरक्षण का लाभ पाते कहते हैं| ज़ाहिर हैं, प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर अधिकतर छात्र मुस्लिम परिवारों से होते हैं| इनमें भी अधिकतर छात्रों के परिवार के परिवार खानदानी तौर पर यहाँ के छात्र हैं| इसके बाद बची हुई सीटों के लिए खुला मैदान है| देश विदेश का हर सुखी संभ्रांत मुस्लिम परिवार अपने बच्चों को यहाँ पढ़ाने ले लिए दस दस साल से मेहनत का रहा होता है| उनके जेहन और यह गिने चुने विकल्प में होता हैं, जहाँ उनके बच्चे सुरक्षित होंगे| इस सोच में उनका दोष नहीं है न ही वो डरपोक हैं, यह असुरक्षा की भावना उनपर लादी गई है|

अभी तक इस विश्वविद्यालय में पढने वाले हिन्दू भी मुस्लिमों की तरह परिवार के परिवार पढ़ते रहे हैं| इसका कारण यह है कि सांप्रदायिक ताकतों के द्वारा खड़े किये गए पारस्परिक अविश्वास के चलते अन्य हिन्दू परिवार यहाँ अपने बच्चों को पढ़ने नहीं भेजते| साथ ही अलीगढ़ में दंगों की संख्या भले ही बहुत कम हो अलीगढ़ के बाहर लोग इसे इसी तरह देखते हैं कि यहाँ मानो बहुत लम्बा गृहयुद्ध चल रहा हो|

इस विश्वविद्यालय में जातिगत आरक्षण मांगने वालों का एक भ्रम (बल्कि गणित) यह भी है कि जातिगत आरक्षण की लाभार्थी जातियां हिन्दू हैं| ध्यान देने की बात यह है कि बड़ी संख्या में मुस्लिम जातियाँ भी आरक्षण का पात्र हैं और उनकी जनसंख्या भी कम नहीं है| यदि इस विश्वविद्यालय में जातिगत आरक्षण आता भी है तो आरक्षण का पात्र मुस्लिम तबका बड़ी संख्या में अपना हक ज़माने में कामयाब रहेगा| अगर आप विश्विद्यालय के मुस्लिम बहुमत को तोड़ना चाहते हैं तो ऐसा नहीं होगा| वास्तव में अगड़े और पिछड़े मुस्लिमों में आपस में मेलजोल का नेक काम होगा| अगर इस गणित को ध्यान से समझें तो धरातल पर राजनैतिक झुकाव में कोई परिवर्तन यह मुद्दा नहीं ला सकता|

हाँ, नुक्सान में कौन रहेगा? कुछ सवर्ण हिन्दू परिवार|

पानी की पहली लड़ाई

धौलाधार के ऊँचे पहाड़ों पर दूर एक प्राचीन मंदिर मिलता है| कहानियाँ बताती हैं कि कोई प्राचीन जनजातियों के राजाओं की लड़ाई हुई थी यहाँ| दोनों राजा मरने लगे| दोनों के एक दूसरे का दर्द समझ आया| एक दूसरे की प्रजा का दर्द समझ आया| मरते मरते समझौता हुआ| एक युद्ध स्मारक बना| यह युद्ध स्मारक अगर आज उसी रूप में होता तो शायद दुनिया का सबसे प्राचीन जल-युद्ध का स्मारक होता| जैसा होता है – स्मारक समय के साथ पूजास्थल बन गया और धीरे धीरे चार हजार साल बाद और अब से पांच हजार साल पहले मंदिर| यहाँ आज पंचमुखी शिवलिंग मंदिर है| अब यह गोरखा रेजिमेंट का अधिष्ठाता मंदिर है|

आज यह शिव मंदिर – एक कहानी और भी कहता है – भूकम्प की| धरती काँप उठी थी| मंदिर नष्ट हो गया| दूर एक चर्च बचा रहा| हिमालय के धौलाधार पहाड़ों के वीराने में लगभग बीस हजार लोग मारे गए| मंदिर दोबारा बनाया गया| उस भूकंप की चर्चा फिर कभी|

तब थार रेगिस्तान रेगिस्तान न था, नखलिस्तान भी न था, हरा भरा था| रेगिस्तान में अजयमेरु का पर्वत था| वही अजयमेरू जहाँ पुष्कर की झील है| अरावली की इन पहाड़ियों पर मौर्य काल से पहले एक बड़े राज्य के संकेत मिलते हैं जिसका स्थापत्य सिन्धु सभ्यता से मेल खाता है| यही एक भाग्सू राक्षस का राज्य था| सुनी सुनाई कहानियों के विपरीत यह राक्षस जनता का बहुत ध्यान रखता था| पर ग्लोबल वार्मिंग तब भी थी| हरा भरा अजयमेरू राज्य सूखे का सामना कर रहा था| राजा भाग्सू राक्षस ने पानी की ख़ोज की और हिमालय पर धौलाधार के पहाड़ों पर के झरने से पानी लाने का इंतजाम किया|

कथा के हिसाब से राजा भाग्सू राक्षस कमंडल में सारा पानी भरा और अपने राज्य चल दिया| स्थानीय राजा नाग डल को चिंता हुई| अगर पानी इस तरह चोरी होने लगा तो उसके राज्य में पानी का अकाल पड़ जायेगा| उसके राज्य में बर्फ़ तो बहुत थी मगर पानी?? ठण्डे हिमालय पर आप बर्फ नहीं पी सकते|

युद्ध शुरू हुआ| स्थानीय भूगोल ने स्थानीय राजा नाग डल की मदद की| राक्षस हारने लगा| उसने समझौते की गुहार लगाई| दोनों राजाओं ने पानी का मर्म, पानी की जरूरत और आपसी चिंताएं समझीं और संधिपत्र हस्ताक्षरित हुआ| यह सब आज से ९१३० साल पहले द्वापरयुग के मध्यकाल में हुआ|

इस युद्ध का स्थल आज दोनों महान राजाओं भाग्सू राक्षस और नाग दल के नाम पर भागसूनाग कहलाता है| हिमाचल में धर्मशाला के पास जो नाग डल झील है, वह इसी युद्ध या समझौते से अस्तित्व में आई| अजयमेरू तक भी पानी पहुंचा| कोई पुष्टि नहीं, मगर पुष्कर झील की याद हो आई| हो सकता है, नाग डल और पुष्कर प्राचीन बांध रहे हों, जिनके स्रोत नष्ट होते रहे और ताल रह गए|

अपनी प्रजा को प्रेम करने वाले दोनों महान राजाओं के राज्य, उनके वंश, उनकी जाति, उनके धर्म आज नहीं हैं| उस महान जल संधि का नाम भी विस्मृत ही है| इस वर्ष उस युद्ध का कारक भाग्सू नाग झरना मुझे सूखता मिला|

उनका युद्ध स्मारक आज गोरखा रायफल के अधिष्ठाता देवता के रूप में विद्यमान है| ५१२६ साल पहले राजा धर्मचंद के राज्य में यहाँ शिव मंदिर की स्थापना हुई| भागसूनाग मंदिर का नाम बिगाड़कर भागसुनाथ लिखा बोला जा रहा है| कल संभव है भाग्यसुधारनाथ भी हो जाए|

जब भी जाएँ कांगड़ा, धर्मशाला, मैक्लोडगंज, भाग्सूनाग जाएँ, मंदिर के बाहर लगे पत्थर पर लिखे इतिहास को बार बार पढ़े| उसके बाद भाग्सुनाग झरने में घटते हुए पानी को देखें| बचे खुचे ठन्डे पानी में हाथपैर डालते समय सोचें; आज इस स्थान से थोड़ा दूर शिमला में सरकार पानी नाप तौल कर दे रही है|

मेरी जानकारी में भाग्सूनाग का युद्ध जल के लिए पहला युद्ध है| आज यह मिथक है, कल इतिहास था|

कहते हैं अगला विश्वयुद्ध पानी के लिए होगा| भारत पाकिस्तान और भारत चीन पहले ही पानी की बात पर अधिक कहासुनी कर ने लगे हैं|

यदि आपको लगता है, बच्चों का भविष्य बचाना है, इस मिथिकीय कहानी को इष्ट मित्रों से साँझा करें शेयर करें|

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मनभेद की नीति

कई बार सोचता हूँ, क्या राजनीति तुच्छ बात है? कम से कम इस मुद्दे पर राजनीति नहीं होनी चाहिए| राजनीति का यह नकार हमारे लोकतंत्र की खूबी है| कोई राजनीति पसंद नहीं करता – राजनीतिज्ञ तो बिलकुल ही नहीं| संसद में हल्ला मचा रहता है – राजनीति न करो| राजनीति यानि विचार-विमर्श, शब्द संघर्ष – शास्त्रार्थ|

कैसे तय हो क्या सही है| बिना विचार –विमर्श के| मतदान मुद्दे नहीं तय करता| बिना विमर्श के होने वाला मतदान सिर्फ भाई-भतीजावाद है| विमर्श से भागना भीड़तन्त्र को मजबूत करना है – लोकतंत्र को नहीं| लेकिन बात विमर्श की नहीं ही रही| सड़क का संघर्ष आज विचार को जन-जन तक पहुँचाने का संघर्ष नहीं है, सब जोर-जबरदस्ती का मामला है| हिंसक संघर्ष स्वीकार्य होने लगे हैं और अनशन और प्रदर्शन को कोई नहीं पूछता|

लोकतंत्र के लिए आवश्यक है कि पहले मुद्दा हो, उसपर विचार हो, विमर्श हो उसको जनजन तक पहुँचाने की बात हो और फिर जिसका विचार पसंद आये उसे मत दे दिया जाए| आज पहले नेता चुन जाता है बाद में उसका विचार खोजा जाता है| विचार का भी क्या है, सत्ता के बाहर रहकर जिसका विरोध हो, वही सत्ता में आते ही प्रिय विचार हो जाता है| जब विचार के यह हाल हैं तो विमर्श के लिए अवसर ही कहाँ है?

विचार अगर लोकतंत्र का मूल न हो तब लोकतंत्र का नष्ट होना तय ही है| पहले यह भीड़तंत्र बनेगा और बाद में तंत्रहीनता|

आज भले ही सूचना तकनीकि अपने चरम पर हो मगर हम सूचनाएं हमारे हाथ में नहीं हैं|उनका नियंत्रण कोई और कर रहा है| सूचना बिक रही हैं| असुविधाजनक सूचना उपलब्ध नहीं होती| आप जिस पक्ष को एक बार हल्का सा भी समर्थन देते हैं, आपका सूचना तंत्र आपके पास विरोधी या विपक्षी सूचना नहीं आने देता| भ्रम का मायाजाल बन रहा है| जब तक सूचना के दुसरे पक्ष तक पहुँच नहीं होगी, लोकतंत्र समृद्ध नहीं होगा|

राजनीति में मतभेद होने अच्छी बात है, मनभेद नहीं होने चाहिए| मतभेद के लिए मत होना चाहिए| मनभेद के लिए मन| मन का क्या है, किसी पर भी आ जाता है और बाकि सब शत्रु लगने लगते हैं| बस यही नहीं होना चाहिए|

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हे राम!!

हे राम!

याद होगा तुम्हें

छू जाना उस पत्थर का, पथराई अहिल्या का,

मुझे भी याद है – तुम्हारा अधूरा काम||

कभी कभी मौका मिलने पर,

धिक्कारते तो होगे तुम, अपनी अंतरात्मा को||

सहज साहस न हुआ तुम्हें,

लतिया देते इंद्र को, गौतम को,

गरिया देते कुत्सित समाज को,

उदहारण न बन सके तुम||

हे राम!!

तीन अंगुलियाँ मेरी ओर उठीं हैं,

और इंगिता तुम्हारी ओर||

 

आरक्षण पर पारस्परिक कुतर्क

आरक्षण के समर्थन या विरोध में वाद –विवाद करते रहना धर्म, राजनीति, क्रिकेट और खाने-पीने के बाद भारतियों का प्रिय शगल है| मुझे आरक्षण की मांग मूर्खता और उसका विरोध महा-मूर्खता लगती है| सीधे शब्दों में कहूँ तो आरक्षण के पक्ष-विपक्ष में खड़े राजनीतिक दल या राजनेता भारत और किसी भी भारतवासी के हितेषी नहीं हो सकते| अगर आप चाहें, यह आगे न पढ़ें|

मेरे इस आलेख पर इस बात का कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि आरक्षण का प्रस्ताव अपने आप में उचित था या नहीं| हालाँकि मुझे पारदर्शिता के हित में अपनी निजी राय रख देनी चाहिए| मुझे लगता है, जब तक समाज में असमानता है –आरक्षण की आवश्यकता है|

प्रख्यात कुतर्क है कि आरक्षण का देश के विकास पर कुप्रभाव पड़ता है| परन्तु सभी जानते हैं कि अपेक्षागत तौर पर कम आरक्षण वाले हिंदीभाषी राज्य अधिक आरक्षण वाले दक्षिणी राज्यों से बेहद कम विकास कर पाए हैं| एक कारण यह है कि दक्षिणी राज्यों में आरक्षण और उसका सही अनुपालन अधिक बड़े जन समुदाय को आगे बढ़ने की प्रेरणा देने में सफल रहा है| दक्षिणी राज्यों में विश्विद्यालयों और सरकारी नौकरियों में आरक्षित और अनारक्षित प्रतिभागियों के योग्यता सूची में अंतिम आने वाले प्रतिभागीयों के योग्यतांक का अंतर लगातार घट रहा है| दक्षिणी राज्यों में अधिकतर प्रतिभागियों को आरक्षण अथवा बिना आरक्षण लगभग बराबर का संघर्ष करना पड़ रहा है| जबकि उत्तरी और पश्चिमी राज्यों में योग्यता प्रदर्शन की खाई बरक़रार है|

आरक्षण के समर्थन (और नई मांग) या विरोध में खड़े होने वाली भीड़ को देखें| भीड़ के अधिकतर सदस्य वो निरीह प्राणी होते हैं जो शायद किसी प्रतियोगी परीक्षा में दस प्रतिशत अंक भी न ला पायें| जब इस प्रकार के उग्र प्रदर्शन होते हैं उस समय उनके सभी योग्य जातिभाई सरकारी या निजी क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों का लाभ उठाने का उचित प्रयास कर रहे होते हैं|

जातिगत भेदभाव के विपरीत, सभी वर्गों से नए नए उद्यमी आगे आ रहे हैं| व्यापार के साथ साथ बड़े उद्योगों में भले ही सवर्णों और अन्य धनपतियों ने आधिपत्य कायम किया है, छोटे और मझोले उद्योगों में हमेशा की तरह शूद्र कही गई जातियों का आधिपत्य है| ध्यान देने की बात है कि प्रायः सभी उत्पादक और सेवा प्रदाता जातियाँ प्राचीन काल से शूद्र के रूप में वर्गीकृत होती रहीं हैं| दुःखद यह है कि इनमें अपने पारंपरिक कार्यों के प्रति वही घृणा भर दी गई है, जो सवर्ण सदा से उन कार्यों से करते रहे थे|

अब, आइये मुख्य मुद्दे पर आते हैं|

रोजगार सुधार

आरक्षण समर्थक और विरोधी दोनों ही वर्ग सरकारी नौकरी के लालच में एक दूसरे से लड़ रहे हैं| कोई नहीं देखता कि सभी उत्पादक रोजगारों के मुकाबले सरकारी क्षेत्र में बहुत कम अवसर हैं| साथ में, बड़े और विदेशी उद्योगों और संस्थानों के दबाव में आवश्यक सरकारी पद भी नहीं भरे जा रहे| लागत कम करने के नाम पर सरकारी क्षेत्र को मानव संसाधन विहीन करने की परंपरा चल रही है|  इस नाते प्रथम दृष्टया आरक्षण अप्रभावी हो रहा है| वास्तव में मांग होनी चाहिए कि सरकारी गैर सरकारी क्षेत्रों में सभी खाली पद समय पर भरे जाएँ| अनावश्यक निजीकरण न हो| कोई भी व्यक्ति अपने कार्यालय में विवश होकर या लालच में भी आठ घंटे से अधिक समय न बिताये| ओवरटाइम की व्यवस्था समाप्त हो| पूरे साल में कोई भी व्यक्ति अगर दो हजार घंटे पूरे कर ले उसे साल भर के सभी लाभ एक घंटे भी बिना कार्यालय जाए बाकि बचे हुए समय में मिलें| आप देखेंगे कि देश में न सिर्फ रोजगार बढ़ जायेगा बल्कि कार्यालय में जीवन काटते लोग, वास्तविक जिन्दगी जी पाएंगे|

विकास

यदि देश में समुचित विकास हो तो कोई कारण नहीं कि सभी रोजगार योग्य युवाओं को रोजगार न मिले| सोचिये अगर किसी समय एक लाख पदों के लिए भर्ती होनी हो और रोजगार योग्य कुल युवा भी एक लाख के आसपास हों| ऐसे में किसे आरक्षण की जरूरत होगी? जब भी कोई राजनेतिक दल आरक्षण के समर्थन या विरोध में कोई बात कहता है, वास्तव में वह विकास के प्रति अपनी द्रष्टिहीनता की घोषणा करता है| यही कारण है कि विकास का नारा लगाने वाले बड़े बड़े तुम्मन खां नेता आरक्षण का तुरुप  नारा अपनी वाणी में बनाये रखते हैं| ध्यान रहे की विकास किसी सरकारी फीताकाट योजना से नहीं आएगा, वरन उच्च शिक्षित युवाओं द्वारा प्रतियोगी माहौल में आगे बढ़कर काम करने से आएगा|

आपको को आश्चर्य होगा, मगर मुझे बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर और पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के अलावा कोई भी राजनेता सच में आरक्षण विरोधी नहीं लगा|

दिल्ली मेट्रो के दरवाजे इस स्टेशन पर नहीं खुलेंगे

दिल्ली मेट्रो के इस स्टेशन पर मेट्रो के दरवाजे नहीं खुलते| इस स्टेशन हर गेट पर ताला है| यह स्टेशन आज देश में बढ़ती बेरोजगारी और उसके सामने सरकारों की बेचारगी का प्रतीक है|

पिछले कई दिनों से ऐसा हो रहा है| जो लोग मेट्रो स्टेशन पहुँचते हैं उन्हें पता लगता है कि दरवाजे बंद हैं| जो लोग मेट्रो में सफ़र करते हैं उन्हें इस स्टेशन पर ही पता चलता है कि दरवाजे नहीं खुलेंगे| अक्सर लोग इस उद्घोषणा को सुन नहीं पाते| कानों में मोबाइल की ऊँगली डाले लोग अपने दुर्भाग्य के आगे बेबस हैं| यहाँ तक कि नौकरी ढूंढने जाते लोग, बेटे की नौकरी की दुआ करते लोग, आरक्षण का विरोध और समर्थन करते लोग सब बेबस हैं| लाला की नौकरी को गाली देते लोग, कपड़े की दुकान पर मैनेजमेंट का जलवा दिखाते लोग, तकनीकि महारत से गैर-तकनीकि काम करते लोग नहीं जानते कि दरवाजे क्यों बंद हैं| किसी को नहीं पता, कि सरकार उनसे डरी हुई है| किसी को नहीं पता कि सरकार उनसे क्यों डरी हुई है| किसी को नहीं पता कि एक “क्या, क्यों, कैसे” उनकी जिन्दगी में बहार ला सकता है| वो सरकार के सामने देश के करोड़ो बेरोगारों के नुमाइंदे बन सकते हैं|

अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारना इस देश का आदि धर्म है, राष्ट्रीय खेल है, राष्ट्रीय कर्तव्य है|

रेलवे को दो लाख श्रमशक्ति से वंचित कर घाटे में डाला जा रहा है| देश को पुलिस को दस लाख की श्रमशक्ति की कमी झेलने के लिए मजबूर किया गया है| देश के प्रधान न्यायालयों ने ही लगभग हज़ार श्रमशक्ति की कमी है| यहाँ तक कि देश की सेना में श्रमशक्ति की कमी की ख़बरें आती रहती है| देश के मात्र सरकारी संस्थान जिस श्रमशक्ति की कमी झेलने के लिए मजबूर हैं, लगभग उतने ही लोग देश में बेरोजगार हैं| क्या श्रमशक्ति के बिना देश तरक्की कर सकता है? शायद सरकारों को उम्मीद है किसी दिन देश के ये तमाम बेरोजगार हिमालय पर जाकर ताप करेंगे, ब्रह्मज्ञान अर्जित करेंगे और देश को तपशक्ति से विश्वशक्ति बना देंगे|

इस मेट्रो में यात्रा करते लोगों को पिछले पंद्रह दिन में नहीं पता कि दरवाजे क्यों नहीं खुलते| दरवाजे इसलिए नहीं खुलते क्योंकि सरकार को डर हैं कि आप नौकरी मांगने के लिए प्रदर्शन करते मुट्ठीभर देशद्रोहियों के साथ जाकर न खड़े हो जाएँ| वो मुट्ठीभर देशद्रोही जिनके साथ देश की संसद और विधानसभा में बैठा कोई शख्स नहीं हैं|

शौक बहराईची साहब का शेर है:

बर्बाद गुलिस्ताँ करने को बस एक ही उल्लू काफ़ी था
हर शाख़ पे उल्लू बैठा है अंजाम-ए-गुलिस्ताँ क्या होगा

अक्सर हम इसका मतलब नेता और अफसर से लगाते है, मगर इसका मतलब मतदाता से है| आप जो हैं, नेता इतने साल से आपको आपकी पहचान कराने में लगे हैं|

सम्बंधित ख़बरें:

http://www.business-standard.com/article/pti-stories/jln-metro-station-closed-due-to-student-protest-118030300372_1.html

http://www.newindianexpress.com/thesundaystandard/2018/mar/11/ssc-scam-protest-a-much-bigger-struggle-for-aspirants-1785135.html

सिलसिला जारी है…

राष्ट्रवाद बनाम मानवता

किसी देश का नागरिक होना मानव होने के बड़ा है, तो मानव जीवन पर धिक्कार है| दुनिया भर में तमाम कीट-पतंगे है तो अपने जन्म-स्थान के हाथ दो हाथ की दूरी अपने जीवन भर में यह नहीं करते, तमाम जानवर है जाने अनजाने अपने आपको निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में बांधे रहते हैं| मगर उन्हें खुद अपनी नस्ल और किसी दूसरी नस्ल की कोई परवाह नहीं होती| अगर आप मानव हैं तो आप अपनी, अपनी नस्ल की और तमाम प्रकृति की परवाह कर सकते हैं| मगर आप मानव हैं तो आपके पास वो सारे दुर्गुण भी हैं जो किसी और नस्ल के पास नहीं हैं| मानव झूठ, लालच फ़रेब और कमीनेपन की तमाम हरकतें कर सकता है| मानव जीवन के सबसे बड़े फरेबों में से धर्म और राष्ट्र हैं|

रहती दुनिया में अनेकों देश और धर्म बने, बनेगें, बिगड़ेंगे और दुनिया चलती रहगी| दुनिया का प्रकृति प्रदत्त नक्शा और मानव का प्रकृति प्रदत्त स्वभाव नहीं बदल सकता| मानव होना मानव की पहचान है|

राष्ट्र एक समूह के रूप में अपने हित रखता है| मगर राष्ट्रवाद हास्यास्पद परिकल्पना है| दुनिया के किसी भी राष्ट्र के नक्शे को आप एक हजार साल भी बिना बदले हुए नहीं देख सकते| आज भारत में राष्ट्रवाद का उबाल है| हर बात में राष्ट्रवाद को खड़ा किया जा रहा है| मगर हकीकत है की एक राष्ट्र के रूप में हमारे पास आज भी एक पक्का नक्शा नहीं है| भारत, पाकिस्तान और चीन जैसे बड़े बड़े देशों के अपनी सीमा को लेकर दावे और हकीकत में बहुत फर्क है| यहाँ तक की हमारी सेनाओं में राष्ट्रीय शुध्दता नहीं है| अगर राष्ट्र ही सब कुछ है तो भारतीय सेना में नेपाल की राष्ट्रीयता रखने वाले लोग कैसे हैं, कैसे अपने ओहदे से जुड़ी तमाम जिम्मेदारी वो लोग पूरी तरह निभा लेते हैं? कभी सोचा है?

राष्ट्रवाद किसी भी सत्ता के द्वारा फैलाये जाने वाला फ़रेब है, जो सत्ता की तमाम असफलताओं पर पर्दा डालने के लिए जनता में पैदा किया जाता रहा है| आजकल बड़े व्यापारी अपना माल बेचने और अपने ऊपर लगे आरोपों को नकारने के लिए भी राष्ट्रवाद का प्रयोग करते हैं| जो लोग थोड़ा टैक्स बचाने के लिए भारत की नागरिकता छोड़ देते हैं वो भी आम भारतियों के लिए राष्ट्रीयता के गाने गाते हैं| देश के तमाम बड़े व्यापारी, अभिनेता और करदाता भारत के नागरिक नहीं हैं| कर बचाने के लिए तमाम बड़े भारतीय लोग साल में छः महीने अलग अलग देशों में रहते हैं कि उन्हें आयकर विभाग भारत का आम निवासी न मान ले| भारत के पास बर्फीले पहाड़ों से लेकर गहरे समंदर तक तमाम नियामतें प्रकृति ने दी हैं, मगर भारत का राष्ट्रवादी समुदाय अक्सर छुट्टियों में देश से बाहर जाने के सपने देखता है| मुझे किसी से आपत्ति नहीं है| मगर जरूरत है, करनी में राष्ट्र का ध्यान रखने की| अगर आप अच्छे इंसान हैं तो धर्म और राष्ट्र मानव निर्मित हास्य हैं, उनपर विचार करने की आपको कोई जरूरत नहीं|

शाहजी पकौड़े वाले

कल बहुत दिनों बाद, फिर वो पकौड़ेवाला दिखाई दिया| मैंने उसे काफी इज्ज़त से अपने पास बुलाकर हालचाल पूछा और हालत – ए – हाजिरा पर उसका ख्याल जानना चाहा| कहने लगा, धंधे में पैसा तो कभी भी ज्यादा न था, रुपया कभी इस धंधे में देखा नहीं; मगर कुछ दिन से धंधे में इज्ज़त आ गई है| मैंने कहा, क्या पहले इज्ज़त नहीं थी| बोला, पहले केवल इज्जतदार लोग ही इज्ज़त दिया करते थे या फिर छोटे छोटे बच्चे| आजकल तो गली-कूचे में घूमते आवारा गुंडे मावली भी इज्ज़त देने लगे हैं| कहने लगा कि छठी गली का छुट्टा सांड बजरंगी भैया तो कभी कभी प्यार से बात करते करते पकौड़े बनाने के गुर सीखने लगा है| ख़ुशी से चहककर बोला भैया इस बार स्वतंत्र दिवस पर हम आपको गरम गरम जलेबी खिलाएंगे| मैंने पुछा, क्यों भाई? क्या अगस्त में बिटिया की शादी कर रहे हो| बोला नहीं भैया जी, सुना हैं मोदी सरकार उस दिन पकौड़े बेचने को भारत का राष्ट्रीय रोजगार घोषित कर देंगे| उस दिन से सब डाक्टर इंजीनियर डॉक्टर साइंटिस्ट सब लोग अपनी बेरोजगारी के दिनों में पकौड़े बेचा करेंगे| आप तो भैया, दिल्ली है कोर्ट के बाहर ही पकौड़े बेचना – वकील साहब पकौड़े वाले| और चिंता न करना, आपको गर्म गर्म पकौड़े हम बनवा कर भिजबा देंगे| आखिर इसने सारे लोग जब पकौड़े बेचेंगे तो कोई तो उन्हें पकौड़े बना बना कर सप्लाई करेगा|

अचानक, पुराने दिन याद करने लगा| बोला, जब अपने शहर के सरस्वती शिशु मंदिर में जब पढ़ते थे तो वहां के गुरूजी जलेबी बंटवाते थे गणतंत्र दिवस पर| इसबार गणतंत्र दिवस पर अपने शहर में था तो गुरूजी ढूंढते हुए आ पहुंचे| कहने लगे शाह जी, चलो.. बच्चों के लिए बीस किलो पकौड़े बना दो और पच्चीस किलो का बिल दे दो| मैंने कहा, गुरूजी पकौड़े चाहे पचास किलो बनवा लो मगर बिल की न कहो, एक तो हमको सात साल शिशु मंदिर रहकर नाम लिखना न आया तो बिल बनाने में तो ससुर हमको हाथरस जाकर ग्रेजुएशन करना पड़ेगा| गुरूजी बड़े प्यार से बोले, नालायक कितना कहा कि बात समझा करो| ये लो, बिल तो हम कम्पूटर से बना कर लाये हैं तुम इसपर अपनी चिड़िया मारो|

मैंने कहा, कि इस किस्से से एक फायदा हुआ कि तुम्हारा नाम हमें पता चल गया – शाह जी| कहने लगा… नाम तो अपना घासीलाल फौलादी है सरकार| वो तो आजकल हम सबको कहने लगे हैं कि जब मोदी जी अपने पापा की बनाई चाय लेकर स्टेशन पर चाय गरम चाय गरम चिल्लाते थे तो उनके पीछे पीछे हमारे बड़े भाई ताजा गरम पकौड़े का जोर लगाते घुमा करते थे| इसलिए आजलक लोग हमें अध्यक्ष जी का छोटा भाई समझने लगे हैं|

प्रदूषण का साल

दिल्ली में साल २०१७ प्रदूषण का साल रहा| हर साल बढ़ते प्रदूषण के लिए दिल्ली वाले नई नई दलीलें पेश करते हैं| इस दलीलों का कुल जमा मतलब यह होता है कि प्रदूषण का कारण दूसरे हैं, वो नहीं| इन दलीलों में दिल्ली वाले यह भूल जाते हैं कि प्रदूषण से बीमार पड़ना और मरना उनको है; दूसरों को नहीं|

मुझे साल २००५ में पहली बार बोला गया कि दिल्ली छोड़ कर किसी प्राकृतिक जगह में चले जाओ| मगर बहुत से कारण रहे, यह नहीं हो पाया| उस समय मुझे लाइलाज खाँसी का मरीज बताया गया| खैर, खाँसी का होमियोपैथी में इलाज हुआ और जो थोड़ा बहुत बचा था उसे देशी नुस्खे ने दूर कर दिया| दिल्ली में रहना आजकल एक अग्नि परीक्षा है| आज सुबह रोज इस उम्मीद में मोबाइल पर प्रदूषण का स्तर देखता हूँ कि शायद कम हो, मगर होता नहीं|

दशहरा के साथ जो ठंडक, उत्सव, मौज-मस्ती के जो दिन शुरू होते हैं वो मेरे लिए पस्ती के दिन बनने लगते हैं| नाक ढंकने के लिए कपड़े से लेकर मास्क तक का इंतजाम शुरू होने लगता है| फिर भी कुछ न कुछ चूक होती है| फ़िजाओं में फैला जहर कहीं न कहीं फेफड़ों तक पहुँचता ही है|

पिछले तीन हफ्ते से खाँसी से हाल बुरा रहा| बिना मास्क के घर से निकलने पर गले में खारिश और सीने में जलन होने लगती है| खाँसी से कमर टूट जाती है कई बार| इस दिसंबर में कमर में दर्द रहा| आज भी है| आँखों में जलन तो अब कहने की बात नहीं| यह सब शायद अकेले मुझे होता है| अगर बाकी लोगों को होता तो वो भी आवाज उठाते| अगर वो लोग गूंगे हैं, तो अपने बुढ़ापे तक बहरे और अंधे होने से कोई नहीं रोक सकता|

आप किसी भी राजनीतिक पार्टी से हों, पूछें तो सही पार्टी से क्या कर रहे हो उस देश या राज्य में जहाँ सत्ता में हो| अगर भाजपाई हो तो पूछो कि अगर सारा दोष राज्य का है तो उनकी दिल्ली सरकार बर्खास्त क्यों नहीं हो रही| अगर आप-पार्टी से हैं तो पूछे कि क्या कदम उठे| अगर राजनीति में गधे हो तो पूछो सब सरकारों से कि क्या कर रहे हो? कांग्रेस और कम्युनिस्ट से भी पूछो की सत्ता और विपक्ष में रहकर पर्यावरण पर तुम्हारे सरोकार क्या थे और हैं?

मगर मरने तक हम अपनी अपनी पार्टी को बचायेंगे, अपने अपने त्योहारों की कुरीतियों को बचायेंगे, अपने अपने धंधे के गंद छिपाएंगे| और किसी दिन खांसते खांसते एक गूंगी बहरी मौत मर जायेंगे|

जी तो पा नहीं रहे, आइये मिलकर मरें|

शरणार्थी और भारत

भारत को बहु-सांस्कृतिक सभ्यता बनाने में अलग अलग समुदायों का योगदान निर्विवादित है| हमारी अतिउप-संस्कृतियाँ महीन ताने-बानों से बनीं हैं| भारतीय सजातीय विवाहों में भी आधा समय इस बात में हंसी-ख़ुशी नष्ट हो जाता है कि वर-वधु पक्ष के रीति-रिवाज़ों में साम्य किस प्रकार बैठाया जाए| उप-संस्कृतियों के विकासक्रम में बहुत से तत्व रहे हैं, जिन्हें ठीक से न समझने वाला व्यक्ति विदेशी आक्रमणों से जोड़ कर शीघ्र निष्कर्ष पर पहुँच सकता है| परन्तु निर्विवाद रूप से हमारे उन-सांस्कृतिक विकास में अन्तराष्ट्रीय व्यापार और शरणार्थियों के योगदान को नकारा नहीं जा सकता|

अन्तराष्ट्रीय व्यापार के प्रमाण सिन्धु घाटी सभ्यता के समय से मिलने प्रारंभ हो जाते हैं| आक्रमण वाले सिद्धांत के विपरीत अन्तराष्ट्रीय व्यापार ने इस्लाम को अरब आक्रमणों से काफी पहले भारत पहुंचा दिया था|

भारत के सर्वांगीण विकास में शरणार्थियों का योगदान इनता मुखर और सामान्य स्वीकृत है कि हम उसपर विवेचना की ज़हमत नहीं उठाते| जिन शरणार्थियों को “खीर के एक कटोरे” से वचन में बाँट दिया गया था, उनका बेचा नमक आज सारा भारत खाता है| ग़दर के बाद भारत में आजादी की नियोजित लड़ाई का प्रारंभ करने वाली इंडियन नेशनल एसोसिएशन और उसके बाद इन्डियन नेशनल कांग्रेस के एक सह-संस्थापक दादा भाई नौरोजी उन्हीं पारसी शरणार्थियों के वंशज थे| आज जिन प्राचीन ईरानी कथा कहानियों को हम फारस और मुस्लिमों से जोड़ते हैं वो कदाचित पारसियों के साथ भारत चुकीं थीं|

भारत में पारसी अकेला समुदाय नहीं है जो शरणार्थी बनकर भारत आया| आजादी के बाद आये शरणार्थी तिब्बती समुदाय के साथ भी स्थानीय समाज के सामान्य रिश्ते हैं| बंटवारे के समय पाकिस्तान से आने वाले लोग भी वास्तव में शरणार्थी ही हैं| अफगान संकट के समय आने वाले अफगानों का भी भारत में शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व है|

पिछले कुछ दशकों में अक्सर बाहर से आने वाले शरणार्थियों को उपद्रव का कारण माना जा रहा है| यह उत्तरपूर्व में होने वाले त्रिकोणीय सामुदायिक संघर्ष के कारण है| देश के किसी क्षेत्र में शरणार्थियों का कैसा स्वागत होगा, इसमें क्षेत्रीय विकास महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है| आप उत्तरपूर्व भारत में अवैध बंगलादेशी आप्रवासियों का मुद्दा रोज सर उठाते देखेंगे| जबकि दिल्ली मुंबई के चुनावों में यह मुद्दा हाशिये से आगे नहीं बढ़ पाता| जब शरणार्थी (और रोजगार की तलाश में आने वाले लोग) देश के कम विकसित क्षेत्र में आकर रहते है, तब इस प्रकार के संघर्ष स्वाभाविक हैं| जहाँ संसाधनों सभी के लिए पूरे नहीं पड़ते| दलगत राजनीति इन संघर्षों की आड़ में अपनी नीतिगत खामियां छिपाने और वोट की फ़सल काटने का काम करती है|

रोहिंग्या शरणार्थियों को अवैध बताकर वापिस भेजा जा रहा है| अपनी मर्जी से तो लोग रोजगार के लिए भी अपनी जन्मभूमि नहीं छोड़ते| मुझे नहीं पता कि वैध शरणार्थी कैसे होते हैं? क्या उन्हें देश से भागने वाली सरकारें वीज़ा पासपोर्ट बनाकर भेजतीं हैं? क्या अपने देश से जान बचाकर भागता भूखा नंगा आदमी आपको डरा देता है? क्या इस बात के प्रबंध नहीं हो सकते कि उनपर दया और निगाह एक साथ रखी जा सके|

 

पुनश्च – शरणार्थियों के अपने राजनीतक महत्व भी हैं, अगर पाकिस्तान के शरणार्थी भारत न आने दिए गए तो शायद दक्षिण भारत का इतिहास अलग होता| इस पर हो सका तो फिर कभी|

मेरा वाला संत

मामला यह है ही नहीं कि कोई व्यक्ति संत है या नहीं है| सोशल मीडिया पर सारा मामला “मेरा वाला संत” का है| गलतियाँ, पाप, सजाएं और प्रायश्चित सामान्य से लेकर संत व्यक्ति को लगे ही रहते है| मानव है तो उसके पास मन भी है, गुण अवगुण भी| पहले भी संत, महंत, सन्यासियों, साधुओं ने अपराध किये हैं और सजाएँ भी होती रही है| सांसारिक प्रलोभन से तो महर्षि विश्वामित्र भी नहीं बच पाए थे, आजकल वाले तो अभी अध्यात्म के शुरुवाती पायदान पर हैं|

आजकल धर्मगुरु धर्मसत्ता, राजसत्ता, अर्थसत्ता के उच्चासन पर विराजमान हैं| समय और देश की सीमा के परे मानवमात्र की सोचने वाले धर्मगुरु देशप्रेम और युद्धशांति जैसे विषय में भाषण-विज्ञापन देते हैं| ब्रह्मचर्य से लेकर कंडोम तक बेच सकने वाले यह धर्मगुरु अपने समर्थकों का तन-मन-धन समर्थन रखते हैं| सत्ता की यह उच्चता ही उन्हें निरंकुश बनाती है| उन्हें पता है सत्ता दुरूपयोग के विरूद्ध खड़ा होने वाला कोई नहीं है| कारण – श्रृद्धा| जिसे हम अंध-श्रृद्धा कहते हैं वह आपके धर्मगुरु के शब्द में श्रृद्धा है| जिस समय कोई धर्मगुरु या उसका अनुयायी आपको प्रश्न करने से रोक दे तो यह अंध-श्रृद्धा है| जब आप आदर या श्रृद्धा के कारण अपने आप प्रश्न करने से रुक जाएँ तो भी यह अंध-श्रृद्धा है| अब आप किसी प्रश्न का उत्तर बिना किसी ख़ोजबीन के खुद ही देने लगें तो अंध-श्रृद्धा है| जब आपका गुरु समझ ले की आप श्रृद्धालू हैं तो समझ लें आप अंध-श्रृद्धालू हैं| अन्य लोगों की धर्मगुरु जिज्ञासू कह सकते हैं, श्रृद्धालू नहीं|

समर्थक और विरोधी प्रायः धर्मगुरुओं के अपराधों और घोटालों पर प्रश्न नहीं करते| बलात्कार और हत्या यदा-कदा अपवाद हैं| बलात्कार और हत्या दो आरोप हैं जिनपर श्रृद्धालू नकार भाव रखते हैं| देश के भारीभरकम धर्मगुरुओं द्वारा अपने गुरुओं या धर्मभाईयों को मरवाने के चटक चर्चे आश्रमों में घूमते रहते हैं और किस्सों की तरह मीडिया में भी| जो स्त्री-पुरुष तन का समर्पण रखते हैं, उन्हें कृपा मिलती रहती हैं| अन्य पाप के भागी, बलात्कार का शिकार कहलाते हैं| जो दोषी करार दिया जाए, मात्र उसपर ही हम प्रश्न करते हैं| जब भी यह अपराध हमारे “मेरे वाले धर्मगुरु” के नाम नहीं चढ़ता, हम उसके नाम का नमक बाजार से खरीदते खाते रहते हैं|

 

नीम का पेड़

नीम का पेड़ पढ़ते हुए आपको हिन्दुस्तान की उस राजनीति दांव –पेंच देखने को मिलते हैं, जो आजादी के बाद पैदा हुई| हमारी हिन्दुस्तानी सियासत कोई शतरंज की बिसात नहीं है कि आप मोहरों की अपनी कोई बंधी बंधी औकात हो| यहाँ तो प्यादे का व़जीर होना लाजमी है| व़जीर की तो कहते हैं औकात ही नहीं होती, केवल कीमत होती है| यूँ नीम का पेड़ सियासत और वजारत की कहानी नहीं होनी चाहिए थी, मगर हिन्दुस्तानी, खासकर गंगा- जमुनी दो-आब के पानी रंग ही कुछ ऐसा है सियासत की तो सुबह लोग दातून करते हैं| ऐसे में नीम के पेड़ की क्या बिसात, ये तो उस लोगों का कसूर है जो आते जाते उसे नीचे बतकही करते रहे होंगे| वर्ना तो जिस आँगन में उसने अपनी तमाम उम्र गुज़ारी वहां गुजरा तो गुजरा कुछ होगा|

नीम का पेड़ इस उपन्यास में शायद अकेला ऐसा शख्स है, जो आज के ज़माने में नहीं पहचाना जा सकता| रही मासूम रज़ा की यहीं मासूमियत रही कि उन्होंने एक पेड़ को सूत्रधार होने का मौका दिया| यहीं काम अगर उस कलई के उस पुराने लोटे बुधई के आंगन में पड़ा रहा करता होगा, तो आप पहचान जाते कि ये कौन है| उस लोटे और उसकी घिसी हुई पैंदी का जिक्र न करकर रज़ा साहब ने इस देश की सियासत के पालतू टट्टुओं के साथ न इंसाफी कर दी है| आदर्शवादी लोगों से अक्सर ऐसी गलतियाँ हो जातीं हैं|

ये कहानी उन दो पुराने रिश्तेदारों की है, जिनको जमींदारी के बैठे ठाले दिनों में सियासत खेलने का चस्का लगा होगा| जमींदारी जाती रही| जमींदारों और नबाबों को लगा कि बदल कर ओहदों का नाम बदलकर विधायकी और सांसदी में तब्दील हो गया है| हुआ दरअसल यूँ उलट कि विधायकी और सांसदी जमींदारी और नबाबी बन गई| बदलते वक़्त के साथ, नए प्यादे आते गए, वजारत बदलती रहीं और व़जीर बिकते रहे|

नीम के पेड़ की कहानी इतनी सरल है कि आप गौर भी नहीं करते कि सियासत में दांव खेल कौन रहा है| कहानी बदलते हिंदुस्तान की जमीन से उठती है| यह कहानी इन वादों का इशारा करती है जिनके बूते वोट खींच लिए जाते है| यह कहानी उस आदर्शवाद जिसके जीतने की हम उम्मीद करते हैं|

पुस्तक – नीम का पेड़
लेखक – राही मासूम रज़ा
प्रकाशक – राजकमल प्रकाशन
प्रकाशन वर्ष – 2003
विधा – उपन्यास
इस्ब्न – 978-81-267-0861-1
पृष्ठ संख्या – 350
मूल्य – 350 रुपये
यह पुस्तक अमेज़न पर यहाँ उपलब्ध है|

अवैध चाय

अवैध चाय – हंसने का मन करता है न? अवैध चाय!!

सच्चाई यह है कि भारत में हर कार्यालय, विद्यालय, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय, गली, कूचे, मार्ग, महामार्ग, हाट, बाजार, सिनेमाघर और माल में अवैध चाय मिलती है| अवैध चाय का अवैध धंधा पिछले पांच-छः साल से धड़ल्ले से चल रहा है| पिछले पांच-छः साल क्यों?

क्यों पिछले पाँच-छः साल से सरकार ने हर खाने पीने की चीज़ बेचने के लिए एक पंजीकरण जरूरी कर दिया है| कुछ मामलों में पंजीकरण नहीं, बल्कि अनुमति-पत्र (लाइसेंस) जरूरी है| बिना पंजीकरण या अनुमति-पत्र के बनाये गए पेय और खाने को अवैध कहा जायेगा| वैसे दवाइयों के मामलें में इस तरह की दवाओं को सामान्यतः नकली कहा जाता है| आपके खाने को फिलहाल नकली नहीं कहा जा रहा|

मामला इतना संगीन हैं कि आपके ऑफिस में लगी चाय-कॉफ़ी की मशीन भी “शायद” अवैध है| अगर आप पुरानी दिल्ली/लखनऊ/हैदराबाद/कोई भी और शहर के किसी पुराने प्रसिद्ध भोजनालय में खाना खाते हैं तो हो सकता हैं, आप अवैध खाना खा रहे हैं|

मामला यहाँ तक नहीं रुकता| क्योंकि हिन्दुस्तानी होने के नाते आप दावत तो हर साल करते ही हैं| नहीं जनाब, मैं दारू पार्टी की बात नहीं कर रहा, जिसके अवैध होने का हर पार्टी-बाज दारूबाज को पता है| मैं बात कर रहा हूँ, शुद्ध सात्विक भोज/दावतों की, जिन्हें आप विवाह-भोज और ब्रह्म-भोज कहते हैं| आप जो पुरानी जान पहचान वाला खानदानी हलवाई पकड़ लाते हैं खाना बनाने के लिए, वो अवैध है|

यह वो कानून नहीं है, जिसके चलते देश के ७४ बड़े बूचडखाने गाय का मांस विदेश में बेचकर देश के लिए जरूरी विदेशी मुद्रा लाते हैं|

तो, अब ये कौन सा कानून है? यह वही क़ानून हैं जिसमें भारी-भरकम कंपनी की विलायती सिवईयां यानि नूडल बंद होने पर देश के हर चाय-पान वाले ने तालियाँ बजायीं थीं| यह वह क़ानून हैं जिसकी असली नकली मुहर (संख्या) खाना-पीना बनाने के सब सामान के पैकेट से लेकर डिब्बाबंद चाय-कॉफ़ी-टॉफ़ी-बिस्कुट-पिज़्ज़ा-बर्गर पर लगी होती है| यह वही कानून हैं, जिसकी मुहर (संख्या) बड़े बड़े होटल और भोजनालय के बिल पर पाई जाती है| यह वही क़ानून हैं, जिस में पंजीकरण न होने के कारण छोटे मोटे बूचडखाने जो देश की जनता के लिये मांस पैदा करते हैं, वो बंद किये जा रहे हैं|

आज बूचड़खाने बंद होंगे, कल सलाद की दूकान| और जब चाय-पान की दुकान बंद होगी तो आप सोचेंगें.. रहने दीजिये, कुछ नहीं सोचेंगें|

गौमांस के विरोध के चलते, देश का सारा मांस बंद हो रहा हैं, कल रबड़ी-फलूदा बंद हो जाए तो क्या दिक्कत है|

इस पोस्ट का मकसद हंगामा खड़ा करना नहीं है| देश के हर छोटे बड़े व्यवसायी के पास मौका है कि अपनी दूकान, होटल, रेस्टोरंट, ढाबा, ठेल, तख़्त, या चूल्हे का स्थाई पता और अपना पहचान पत्र देकर अपना पंजीकरण कराये| इस से आगे मैं क्या सलाह दे सकता हूँ? आप समझदार हैं|

टिपण्णी – इस आलेख में कही गई बातें कानूनी सलाह या निष्कर्ष नहीं हैं वरन हल्के फुल्के ढ़ंग से बेहद जटिल क़ानून समझाने का प्रयास है| कृपया, उचित कानूनी सलाह अवश्य लें|

खिचड़ी-भोग

खिचड़ी भोग भी अपने आप में एक मुहावरा है| हर किसी को पकी पकाई खीर खिचड़ी चाहिए| कोई पकाना नहीं चाहता| यह मुहावरा शायद उस जमाने में बना होगा जब खिचड़ी देग दम करके बनती होगी| आजकल तो प्रेशर कुकर का जमाना है मगर वक्त है कि आज भी कम पड़ता है| हमारे कुछ मित्र तो उस दिन का इंतजार कर रहे है जिस दिन कोई पकी पकी खिचड़ी फेसबुक या व्हाट्सएप पर भेज दे और वो उसका लुफ्त उठा लें|

हमारे बहुत से गीताप्रेमी मित्र बनिए की दुकान पर टंगा गीतासार पढ़कर बड़े हुए| आजकल उसकी फ़ोटो मोबाइल में देखकर वेद-वेदांग के ज्ञाता हुए जाते हैं| हमारे एक मित्र मोदी-मार्ग पर चलने का उपदेश रोज भेज देते थे| आजकल शांत हैं, उन्होंने मोदी-मार्ग घर के दामाद जी को भी भेजा था और उन्होंने इसे ग्रहण कर लिया| एक अन्य मित्र माताजी के स्नेह-दोष के कारण भारतीय सेना की सेवा न कर पाए आजकल रोज दो चार पाकिस्तानी चटका देते हैं|

उधर, कामरेड रोज इतनी क्रांति करते हैं कि सड़क पर उतरने और अपने कैडर से बात करने का वक़्त नहीं निकलता| उनकी अभिव्यक्ति की आजादी भी आजकल ट्विटर-फेसबुक वाले भैया के हाथ गिरवी पड़ी है, गाहे – बगाहे लुपलुपाती रहती है|

एक मित्र ने सावरकर के नाम पर गौहत्या रोकने की मांग कर रहे थे| मैंने बोला कि सावरकर गाय को पशु मानते थे, माता नहीं| दो चार छंद सुना कर बोले; गौहत्या विरोध का आन्दोलन किसने शुरू किया| अठारवीं शताब्दी के स्वामी दयानंद सरस्वती का नाम लेने पर बोले आज से उनकी भक्ति| उनके हाथ सत्यार्थ प्रकाश थमा कर मुड़ा ही था कि उनकी जिव्हा पर पुनः सरस्वती विराजमान हो गई| एक दिन दोबारा मिलने अपर पूछने लगे, आप भगतसिंह को क्या मानते हैं| जानता था, कहाँ लपेटेंगे; जबाब दिया नास्तिक| उनका दिमाग भन्ना गया| “मैं नास्तिक क्यों हूँ” पकड़ाकर विदा किया| आजकल कन्नी काटने लगे हैं|

आजकल मित्र लोग मुझसे कानूनी बातों पर ही बात करते हैं| मगर नुक्ता निकल ही आता है| खैर, उसकी बातें फिर कभी| मुझे आज खाने में खिचड़ी बनानी है|

 

अकबर

अकबर का दौर अजीब हालत का दौर था| एक बदहवास सा मुल्क सकूं की तरफ बढ़ता है| अपनी लम्बी पारी से भी और बहुत लम्बी पारी खेलने की चाह में अबुल मुज़फ्फर जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर बादशाह ने अपनी हालत कुछ अजीब ही कर ली थी| यह उपन्यास उस “हालत –ए – अजीब” से शुरू होता है, जिसमें बादशाह सलामत कह उठे थे – “गाइ है सु हिंदू खावो और मुसलमान सूअर खावो|” यह वो शब्द है जिनको मूँह से निकलने पर तब और आज सिर्फ जुबां नहीं, सिर कट सकते हैं, और तख़्त बदल उठते हैं| यह वो बादशाह अकबर है, जिन्हें न सिर्फ पूर्व जन्म में शंकराचार्य के श्रेष्ठ ब्राह्मण कुल में जन्मे मुकुंद ब्राह्मण का अवतार बताया गया बल्कि जो खुद “अल्लाहो अकबर” को नए अर्थ देने की कोशिश में पाया गया| यह वो अकबर बादशाह है जो बाद में “दीन – ए- इलाही” की शुरुआत करता है और छोड़ सा देता है| वह बादशाह अकबर जो, “जैसे जिए वैसे मरे| ना किसी को पता किस दीन में जिए, ना किसी को पता किस दीन में मरे|”

यूँ; पुस्तक को पढ़ने और पसंद करने के बाद भी इसकी विधा के बारे में सोचना पड़ता है | हालांकि लेखक प्रकाशक इसे उपन्यास कहते हैं| मैं इसे ऐतिहासिक विवरण कहूँगा| हम सबको पढ़ना चाहिए| हिंदी में ऐतिहासिक उपन्यास बहुत है| शाज़ी ज़मां का “अकबर” इतिहास का पुनर्लेख है जिसे औपन्यासिकता प्रदान करने का कठिन प्रयास लेखक ने किया है| वो कुछ हद तक सफल होते होते असफल हो जाते हैं| असफल इसलिए कि आप पाठक इस से ऊब जाता है| तमाम प्रसंगों में सन्दर्भों की भरमार है| बकौल शाज़ी ज़मां, “इस उपन्यास की एक-एक घटना, एक-एक किरदार, एक-एक संवाद इतिहास पर आधारित है|”

समय, सनक और समझ से जूझते अकबर बादशाह की टक्कर पर हिंदुस्तान में डेढ़ हजार साल पहले सम्राट अशोक का जिक्र आता है| इन दो से बेहतर नाम महाकाव्यों में ही मिल सकते हैं| अकबर की जिन्दगी के ऊँचे नीचे पहलू इस विवरण में आए है जिनमें से एक को, इस पुस्तक को बाजार में बेचने के लिए भी उछाला गया था – अकबर के मूंह से निकली एक गाली जिसे तमाम हिंदुस्तान आज भी देता है| पुस्तक अकबर को उसके समकालीन लेखकों और इतिहासकारों के नज़रिए से हमारे सामने रखती है| अकबर के समकालीन इतिहास की जानने समझने के लिए यह महत्वपूर्ण विवरण प्रदान करती है| साथ है, हिंदुस्तान का अपना माहौल आज भी कुछ ज्यादा नहीं बदला है इसे समझा जा सकता है|

यह विवरण उपन्यास तो नहीं बन पाया है साथ ही उन महत्वपूर्ण बातों से नज़र चुराता सा निकल गया है जिन्हें इसके पत्रकार – इतिहासकार लेखक छु सकते थे| मसलन अकबर के हिंदुस्तान का फ़ारस, तुर्की, पुर्तगाल और पोप के साथ रिश्ता तो चर्चा में आता है; मगर उन हालत के बारे में टीस छोड़ जाता है जो तुर्की और इस्लाम के यूरोप और ईसाइयत से रिश्ते की वजह से पैदा हुए थे और नतीजतन हिंदुस्तान और दुनिया की तारीफ में बहुत उठापटक हुई| अकबर के जाने के बाद का दौर, धर्मतंत्र और राजतन्त्र के कमजोर होने का दौर भी था जिसने बाद में संविधानों और राष्ट्रों के लिए रास्ता खोल दिया था|

कुल मिला कर किस्सा यह शेख़ अबुल फ़ज़ल के अकबरनामा और मुल्ला अब्दुल क़ादिर बदायूंनी के ख़ुफ़िया मुन्तखबुत्तावारीख के इर्द गिर्द बुना गया है और इसमें तमाम लेखकों और इतिहासकारों की लिखत को रंगतभरे खुशबूदार मसालों के साथ परोसा गया है|

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पुस्तक – अकबर

लेखक – शाज़ी ज़मां

प्रकाशक – राजकमल प्रकाशन

प्रकाशन वर्ष – 2016

विधा – उपन्यास

इस्ब्न – 978-81-267-2953-1

पृष्ठ संख्या – 350

मूल्य – 350 रुपये

यह पुस्तक अमेज़न पर यहाँ उपलब्ध है|

 

प्यारे तस्कर

तस्कर, यह शब्द भारतियों के रौंगटे खड़े करने के लिए काफी है| भारत हत्यारों के बाद तस्करों से ही सबसे ज्यादा घृणा करता है, बलात्कारियों के भी ज्यादा| हम उन्हें देश का दुश्मन मानते हैं| अपराध की दुनिया के बादशाह – एक खूंखार अपराधी|

आखिर तस्कर होते कौन है? व्यापारी, जो अपने व्यापार पर कर (टैक्स) भुगतान नहीं करते| क्या इसमें भेदभाव करेंगे कि व्यापारी कौन सा कर नहीं दे रहा? सीमाकर (कस्टम ड्यूटी) न देने वाला तस्कर,! उत्पादकर (एक्साइज ड्यूटी) न देने वाला – विकास का कर्णधार!! बिक्रीकर न देने वाला विकास का वाहक!!! कैसा करभेद है? वास्तव में हम कारचोरों से प्रेम करते हैं… बस कुछेक को छोड़कर|

यह सभी उदाहरण अप्रत्यक्ष कर के हैं, जहाँ किसी करचोर को खुद कर नहीं देना होता बल्कि गरीब जनता से वसूलना होता है| क्या इन करचोरों में आपस में कोई अंतर है? क्या सब करचोर देश को खोखला नहीं करते? आइये कुतर्क करें| अपने प्रिय करचोरों का समर्थन करें|

एक होते हैं प्रत्यक्षकरचोर| इन्हें पता होता है कि करचोरी कर रहे हैं| मगर टैक्सबेस, हमारी मेहनत की कमाई मेहनत न करने वालों में मत बांटों जैसे बकवास बातों में यह सबको उलझाये रखते है| भारत में तीस प्रतिशत दर से कर देने में इनको नानी याद आती है, मगर साठ प्रतिशत की दर से कर लेने वाले देशों का विकास मांगते हैं| यह वो लुटेरे हैं जो भूल जाते हैं कि इनकी कमाई में देश का भी योगदान हैं वर्ना सोमालिया में जाकर कमाई कर कर दिखा दें| दुनिया का कोई देश कर के बिना विकसित नहीं हुआ| टैक्सबेस बढ़ाने की बातें कर चोरों और उन के पालतू राजनीतिक दलों की जुमलेबाजी है| अगर सरकारें कराधार – टैक्सबेस बढ़ाने के कल्पित ख्याल की जगह वर्तमान कर चोरों से निपट ले तो पाने आप टैक्सबेस बढ़ जाएगा|

मगर हमें तो करचोर पसंद है – तस्करों को छोड़कर|

आइये इस वर्ष के बजट भाषण का पैरा 141 पढ़े और गर्व करें|

सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे मरन्तु मोक्षं

चलिए सतयुग आ गया| सतयुग तो आ ही गया है| कालचक्र का यह आगमन तो सुनिश्चित ही था|

सतयुग वही समय तो है जब प्रत्येक मनुष्य सदेच्छा रखता है| आपको हल्की सी छींक आते है, प्रत्येक मानव मात्र आपके स्वास्थ्य के लिए अपनी चिंता, संवेदना और सदेच्छा वयक्त करता है – गॉड ब्लेस यू| प्रत्येक मनुष्य अपने धुर विरोधी का भी भविष्य उज्जवल देखना चाहता है| कुछ मित्र तो प्रतिदिन नियम पूर्वक प्रत्येक प्रातः के प्रत्येक के लिए शुभ होने की कामना करते करते ही महायोगी का जीवन जीते हैं| एक मित्र हर ज्ञात अज्ञात त्यौहार पर अपनी शुभकामनाओं का अकूत भण्डार भारत सरकार की किसी सरकारी अनुदान योजना की तरह रोज लुटा देते हैं| एक मित्र तो इतने शुभकामी हैं कि मुहर्रम पर भी नहीं चूकते – चार बाँस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण, ता ऊपर सुल्तान है, मत चूको चौहान  |

जब भी किसी मौसमी रोग – महारोग – महामारी का मौसम आता है तो दादी- नानी- परनानी की औषधियों से लेकर भविष्यतः दो सह्स्त्रब्धियों की औषधियों का महाज्ञान मित्र से प्राप्त होता है| किसी ज्ञात अज्ञात मृत अर्धमृत अमृत किसी भी मृत्यु पर मोक्ष की सदेच्छा का सन्देश देते रहना उनका प्रिय पुण्य है| जब एक परिचित सज्जन ने देवलोकगमन किया तो सन्देश मिलते ही उन्होंने जन्मजन्मान्तर से मुक्ति और मोक्ष की महाकामना के बाद ही जलपान चाय स्वीकार की| चाय सेवन के दौरान जब उनके पास शोक व्यक्त करने के अनंत सन्देश आने लगे तो पता चला कि देव्लोकगामी सज्जन कोई अन्य नहीं स्वयं उनके पिता है|

सतयुग में अप्सराएँ न हों तो क्या हो? रात्रिकाल एक दो कन्यायें तो निर्बाध रूप से शुभरात्रि और शुभस्वप्न के सन्देश दे ही देतीं है| सतयुग में स्वप्नदोष तो लगा ही रहता है|

जब से भारत में सूचनाक्रांति हुई है, सतयुग कर – कर मोबाइल – मोबाइल होता हुआ घर – घर आ पहुंचा है| किसी राजशिरोमणि का वचन नहीं, कि आप अच्छे दिन की प्रतीक्षा करते करते मोक्ष प्राप्त कर जाते| यह सतयुग ही तो अच्छे दिन है| आपका वचन पूरा होता है, पराक्रमी| तकनीकि सूचना की दूसरी पीढ़ी वाला महायज्ञ अश्वमेध यज्ञ की भांति समस्त भारतवर्ष में सूचना क्रांति के अश्व आज भी दौड़ा रहा है| आज उसकी पांचवी पीढ़ी अपनी महापताका लेकर क्रांति के युद्धस्थल की ओर अग्रसर है| हर कोई भारतवासी प्रत्येक जीवित के लिए शुभकामना और प्रत्येक मृत के लिए मोक्षकामना के साथ जीवित है| राग द्वेष कलियुग की पुरानी बातें है|

अथ श्री सत्यसूचना कथा:| अथ श्री अनुदानित स्पैक्ट्रम कथा:|