बूढ़े घर

बूढ़े घर चुपचाप खड़े रहते हैं, बूढ़े सन्यासी की तरह ध्यान मग्न| बूढ़े घर क्रोध नहीं करते| पुराने बरगद की तरह पनाह देते हैं किसी को भी| जिन घरों पर कभी जमींदार, साहबी और दौलत का नशा तारी था, आज अपनी झुकी और टूटी कमर पर हाथ रखे चुपचाप देखते रहते हैं, बूढ़ी दीवार के किनारे सहारा लेने वाले अजनबी को बच्चे की तरह| क्या पता इनमें से कोई अपना ही बच्चा हो, बुढ़ापे में ठीक से पहचान नहीं आता| बूढ़े घर को हर बच्चे से उम्मीद है, उसे अपने पराये का फ़र्क नहीं| जो आ जाये वह ही उसका अपना बशिंदा हैं| कौन गैर, कौन पराये, कौन अजनबी, और अनजान जब अपने ही छोड़ गए तो क्या कौन, क्या क्यों?

पुराने शहर के हरे भरे हाट बाजार के सहारे कोई भूलाबिसरा आज भी उन्हें याद करता है| सोचता है, उस बूढ़े हर के पुराने बाशिंदे आज कैसे होंगे? कोई नहीं सोचता वो पुराना घर आज कैसा होगा| होगा, होगा या नहीं होगा, किसे बूढ़े घरों की परवाह है|

पुराने घर दालान की दीवार पर लगी वो बंद पड़ी हुई पुरानी चाबी वाली घड़ी कोई चोर नहीं चुराता| कोई उसमें चाबी नहीं भरता| कोई उनके नीचे बैठ कर हुक्का नहीं गुड़गुड़ाता| मगर वो घड़ी आज भी चलती हैं, घड़ी दर घड़ी, पहर दर पहर| ये बूढ़ा घर आज भी उसमें अपना वक़्त देखा करता है|

वक़्त बूढ़े घर की छाती पर चुपचाप मूँग दलता है| वक़्त की चक्की में दो पाट नहीं होते, ये बूढ़ा घर निचला पाट है| बूढ़े घर की छाती से वक्त का चूना झड़ा करता है| यादों की सीलन पपड़ी छोड़ जाती हैं| पुरानी मुहब्बत लौन बनकर बुरकती रहती है|

बूढ़े घर बूढ़ी माँ की तरह होते हैं| कोई आये तो आँचल में पनाह देते हैं| कोई न आये तो दुआ देते हैं| बूढ़े घर के पुराने आँगन में आज भी गिलहरी दाना ढूढ़ती| तोते आज भी आकर कोई पुराना किस्सा सुनाते हैं| बिल्लियाँ अक्सर चहलकदमी करतीं हैं| छिपकलियाँ आज भी उन्हें मलेरिया और डेंगू के खतरनाक मच्छरों से महफ़ूज रखतीं हैं| बूढ़े घर के पुराने आंगन में पुराने जीने के सहारे आज भी रात में चोर उतरा करते हैं| ये चोर चुपचाप आज भी कोई पुरानी याद ढूँढते हैं, शायद मिल जाए छोटी चाची के नाक की वो पुरानी नथ को चाचा की हाथापाई में आँगन में ही कहीं गुम हो गई थी| शायद मिल जाए कोई पुराना खजाना को बाबा ने दीवार में चिनाई करा कर छिपा दिया था| पुराने घर के सहारे कभी कभी नए पियक्कड़ उतर आते हैं पीते हैं देशी ठर्रा| जिस घर में ठंडाई की बहार थी, कांजी की मौजें थीं, जहाँ घड़ों में शर्बत घुला करते थे, आज वहाँ बैठ आकर भडुए की महफ़िल में कडुआ पिया जाता है|

जिन लोगों की ये बूढ़ा घर विरासत में मिला था आज अपने सपनों के घर में सपने देखते हैं इस बूढ़े घर के| उन्हें अक्सर याद आता है इसके आँगन में लड़कियों का गुट्टे खेलना, लड़कों का छत पर पतंग उड़ाना, बूढों का बरामदे में बढ़िया गप्पा और लम्बी  डींग मारते हुए हुक्के गुड़गुड़ाना, दादियों का छत पर आचार के आम की फांकें सुखाना, चाचियों का आँगन में बैठकर दाल बीनना, माँ का रसोई में कचोड़ी बनाना| वातानुकूलित सपने आज भी याद करते हैं भरी सर्दियों में रजाई में बैठकर गरमागरम मूंगफलियाँ चबाना|

वक़्त अक्सर देखता है, नई पीढ़ी का जाते जाते एक पुराना घर छोड़ जाना| ये पुराने घर अक्सर मायूस मिलते हैं| ये अक्सर मायूस मिलते है, गिरा दिए जाने तक या फिर एक हेरिटेज हवेली बना दिए जाने तक|

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रणछोड़

रण छोड़ दिया और भाग निकले, कायर!!

किसी ने तो कहा ही होगा उन्हें; “रण छोड़ दिया और भाग निकले कायर!!”
धिक्कारा गया होगा। क्षत्रिय होने का धर्म, जीवन का मर्म बताया गया होगा।
सोचा भी न गया होगा कि रणछोड़ 64 कलाओं के ज्ञाता हैं।

जीवन में बहुत से रगड़े झगड़े होते हैं। हमें अपने मतलब के रगड़े झगड़े चुनने होते हैं। मतलब नहीं कि रगड़े में हम अपना दिमाग़ रगड़ने लगें। मतलब नहीं कि बेकार के झगड़े में जीवन की लंबी लड़ाई गवां दी जाए।
अर्थ यह नहीं कि सिद्धान्त से समझौता करना है। नहीं। सिद्धान्त पर कायम रहें। अपना विचार दृढ़ता से रखें। अगर यह छोटी लड़ाई है तो इस से हट जाएं। शांति रहेगी। बड़ी लड़ाई की ताकत और समझ बनी रहेगी।
मगर ये छोटे मोटे झगड़े और रोज रोज के रगड़े छोड़ देना सरल काम नहीं है। आदत नहीं लत हो जाती हैं इनकी। रोज रोज के रगड़े में किसी को रगड़ देना संतोष देता है। इस संतोष का अपना सुख और नशा है। यह संतोष है कि कुछ तो किया प्रतिपक्ष का हमने, रगड़ दिया उसे। छोटी मोटी जीत भी यही आनंद प्रदान करती है।
मगर इन छोटे मोटे रगड़ो झगड़ों में हम खोते भी बहुत कुछ हैं। यह उन झगड़ों में हार जाने और रगड़ों में रगड़ जाने के कहीं ज्यादा है।
आप दिमाग़ का बेकार प्रयोग करते हैं जो कई बार नकारात्मक भी हो सकता है। आप को मन की शांति खो देनी होती है। आप का अहम आप पर राज करने लगता है कि आप को पता नहीं चलता।
हाल में मैंने ऐसा ही एक और झगड़ा छोड़ दिया। इस तरह जब आप झगड़ा छोड़ कर चल देते हैं तो आपका प्रतिपक्ष हार जाता है। उन्हें जीत का नहीं उन के झगड़े को महत्व न दिए जाने का दुःख होता है। वो अक्सर हार महसूस करते हैं।
आप का झगड़े से हट जाने शायद ही कभी उनकी जीत होती है।
सावधान रहें, यह झगड़ा दोबारा आप के सामने नहीं आएगा, अगर खुद न चाहें।

वो रात गुजरी थी

वो रात गुजरी थी खड़ामा खड़ामा
किसी चोर पुराने की तरह गुपचुप,
उम्मीद में लौ ए चराग़ शमा ए सुब
दिल बैठे बैठे जाता रहा जाता रहा।

चुपचुप चीखते चटखते तलवे तले
जमीन थी भी कुछ बोझिल बोझिल
उम्मीद के लम्बे साये से डरता हुआ
हौसला हमसाया बैठा रहा बैठा रहा।

दूर सितारे की गर्मी से भरमता हुआ
धड़कन भर धड़कते हुए धधकता रहा
नाउम्मीदियों में रात कुछ बाकी रही
यूँ गुजर रही जागता रहा जागता रहा।

उड़न गाथा

हवाई यात्रा का बेहतरीन पहलू है समय की बचत और बेकार पहलू है समय की बर्बादी।

पहली पहली उड़ान से यह बात समझ आ गई थी। आप सोलह घंटे की रेलयात्रा को घटा कर दो घंटे की हवाई यात्रा में बदल सकते है। लेकिन समय की बचत कितनी हुई, यह सीधा गणित नहीं होता। आप चौदह घंटे नहीं बचाते।

आपका प्रस्थान बिन्दु जो अक्सर आपका घर होता है से लेकर गन्तव्य बिन्दु तक का समय और आराम का विश्लेषण करना होता है। उदाहरण के लिए दिल्ली से मुम्बई की उड़ान दो घण्टे की है। आपको एयरपोर्ट पर किसी भी हालत में एक घण्टा पहले पहुँचना होता है वरना आपको उड़ान में बैठने की अनुमति नहीं मिल पाएगी। रास्ते के ट्रैफिक और किसी भी असंभावना के लिए भी समय का थोड़ा ख़्याल रखना होता है। इसी लिए ज्यादातर लोग दो घण्टे पहले हवाई अड्डे पर पहुंचते हैं। नई दिल्ली हवाई अड्डे के टर्मिनल तीन जैसे बड़े टर्मिनल पर आपको डिपार्चर गेट तक पहुंचने में भी थोड़ा बहुत समय लगता है।

इस प्रकार सुबह साढ़े सात बजे की उड़ान पकड़ने के लिए आपकी घर से ढाई तीन घंटे पहले निकलना सुनिश्चित करना होता है। यानि आपको देर से देर पाँच बजे घर छोड़ना होगा। पाँच बजे घर से निकलने के लिए आपको एक या दो घण्टे पहले उठना होता है, यह समय इस पर निर्भर है कि कितने लोगों के तैयार होना है। बच्चों को इतनी सुबह जगाना भी आजकल टेढ़ी खीर है।

एक अकेले इंसान को भी अगर हवाई यात्रा करनी है लगभग तीन घंटे पहले जागना होता है। यानि साढ़े सात की उड़ान के लिए चार बजे के आसपास। अगर सुबह नींद से परेशान नहीं होना चाहते तो छः घण्टे पहले सोना भी सुनिश्चित करें।

इसी तरह विमान से उतरने के बात सामान पट्टी से सामान लेने में भी पंद्रह से तीस मिनिट का समय लग जाता है। इसके बाद वाहन अपना हो या किराये का, आप दस पंद्रह मिनट लगते हैं।

इस तरह आपको दो घण्टे की उड़ान के लिए वास्तव में छः घण्टे का समय लगाना होता है। यदि यह उड़ान सुबह सबेरे की है तो रात भर नींद का तो न पूछिये। करवट बदल बदल रात बात जाती है। यदि यह उड़ान दोपहर की है तो दिन न यहाँ का रहता है न वहाँ का।

रेल यात्रा मुझे सुविधाजनक लगती है क्योंकि रेल आपको यात्रा के दौरान सोने का एक अच्छा अवसर प्रदान करती है।

शौर्य अङ्ग दीनदयाल

शौर्य अङ्ग दीनदयाल के बारे में आप ने सुना।

नहीं नहीं, नहीं सुना होगा। कोई है भी नहीं इस नाम का। मगर जिस तरह साम्प्रदायिक उन्माद है, व्यक्ति के धर्म/सम्प्रदाय से देशप्रेम निर्धारित हो रहा है यह आम अस्तित्व में आ सकता है।

उन्मादी तत्व सकते में हैं, ये औरंगजेब कौन है? ये औरंगजेब नाम वाला कैसे देशभक्त हो सकता है। एक तो मुस्लिम, ऊपर से इतना ख़तरनाक हिन्दू विरोधी नाम। शायद सरकार ने गलत नाम लिख दिया होगा।

हालात यह है कि निजी बातचीत में उन्मादी लोग औरंगजेब को शौर्य चक्र मिलना अपनी प्रिय सरकार का चुनावी दाँव पेच तक बता दे रहे हैं। क्या उनकी प्रिय सरकार वही सब कर रही है, जो पहले की तुष्टिकरण सरकार करती थी? फिर फ़र्क क्या रहा? क्या फ़ायदा हुआ आपको सरकार बदलने का। अपनी प्रिय सरकार पर तो भरोसा रखिये।

हालात ही ऐसे हैं। आम लोगों की दुनिया अक्सर अपनी गली मोहल्ले और नाते रिश्तेदारों के आगे नहीं होती। प्रायः हमारे गली मोहल्ले और नाते रिश्तेदार हमारी अपनी जाति के होते है। यह जरूर है कि नई कॉलोनियों में सवर्ण, दलित, और मुस्लिम जैसे थोड़ा बड़ा समूह रहता है, एक जाति के मोहल्ले कम हुए हैं, पर अभी हैं।ऐसे में दूसरी जाति और धर्म तो लगभग पराई दुनिया की तरह होते हैं। जिन से हम मिले नहीं कभी तो अविश्वास बना रहता है।

यह अविश्वास औए बढ़ रहा है। आपसी संवाद तो अब घर परिवार नाते रिश्तेदारी में भी सामाजिक नहीं रह गया, सोशल मीडिया ज्यादा हो गया है। संवाद की कमी ने अफवाह और कही-सुनी ने ले ली है।

मुस्लिम होना ही गलत हो गया है। लोगों को नहीं समझ आता कि अकबर का सेनापति हिन्दू और राणा प्रताप का सेनापति मुस्लिम कैसे हो सकता है। मात्र दिमाग़ी फितूर के चलते नाम बदल जा रहे हैं। जगहों के, योजनाओं के और शायद लोगों के भी। यह सब आज से नहीं हो रहा, पिछले चार पाँच साल से नहीं हो रहा। यह लंबी प्रक्रिया है, काम से कम पचास साल का इतिहास है इसके पीछे।

अब औरंगजेब को लीजिये। देश के लिए लड़ा। मुस्लिम था इसलिए साम्प्रदयिक तत्वों को भरोसा नहीं हो रहा। मुस्लिम होने के साथ उसका नाम और बड़ी अड़चन है। उन्हें लगता है कि कहीं न कहीं वो या उसके मातापिता मुग़ल शासक औरंगजेब की तरह हिन्दू विरोधी होंगे। यह अलग बात कि शासक औरंगजेब का हिन्दू विरोधी होना भी बहस का मुद्दा रहा है। ख़ुद शासक औरंगजेब का सेनापति हिन्दू था।

हाल में दिल्ली में औरंगजेब रोड का नाम अब्दुल कलाम मार्ग रख दिया गया। यह उन्मादियों के दिमाग में बुरा मुसलमान बनाम अच्छा मुसलमान का द्वंद था। ऐतिहासिक तथ्य जहां हैं वहीं रहेंगे। इसकी परिणति कहाँ होगी किसी को नहीं पता। आज बुरे तालिबान अच्छे तालिबान, बुरे मुसलमान अच्छे मुसलमान, मुसलमान हिन्दू, बुरे हिन्दू अच्छे हिन्दू तक कहीं भी जा सकती है।

धर्म से अगर इंसान का बुरा इंसान या अच्छा इंसान होना तय हो जाता तो न रामायण होती न महाभारत। न रावण, न कौरव।

इन दिनों जिस तरह के हालात है, इस औरंगजेब को देशभक्त मानने के लिए साम्प्रदायिक उन्मादियों के पास एक ही सरल तरीका है। नाम बदल देना। क्या उसका नाम शौर्य अंग दीनदयाल रख दिया जाए?

औरंगजेब को शौर्य चक्र मिलने का यह मौका सटीक मौका है कि हम साम्प्रदायिक उन्माद से बाहर आएं।

असफलता

असफलता का अपना एक नशा और मजा होता है| आप या तो किसी गन्दी नाली में पड़े होते हैं या दार्शनिक बन जाते हैं| आपको असफल होने का शौक नहीं होता| आपको पता रहता है, आप की सफलता अभी कितनी फ़ीकी है| कभी रंग तो कभी रंगत में सुधार करने का चाव लगा होता है|

असफलता का सबसे बड़ा फायदा है लोग आप को पागल और झक्की समझते हैं| आप अकेले छोड़ दिए जाते हैं| असफल इंसान जानता है, किस तरह माँ की ममता और बाप का दुलार  अज्ञातवास पर चले जाते हैं| भाभियाँ और बहनें सामने परोसी गई थालियाँ उठा ले जातीं हैं| यह सब वक्त की मार नहीं, प्रेरणा है| भूखे पेट विचार बहुत आते हैं, और संकल्प भी| जितना भूखा पेट, उतनी लम्बी मजबूत जिद – उतना भरोसा| एक ही शर्त – टूटना नहीं है| झुकना और फिर फिर खड़े हो जाना आप सीख जाते हैं| आत्मविश्वास और आत्मसम्मान बनाकर रखना और शांत रहना – यही परीक्षा है|

खूब सारी असफलता के बाद जब सफलता आती है तो उसकी मस्ती अलग है| वो सारे नाते रिश्तेदार जो आपको पहचानते नहीं थे – उन्हें अचानक सारे रिश्ते याद आ जाते| वो लाड़ दुलार जो कभी देने का सपना भी उन्हें आया होता है उनका भी हिसाब किताब होने लगता है| समझ नहीं आता कि कितना मुस्कराएँ| पर मुस्कराएँ जरूर|

असफलता का एक और फायदा है, हर परिस्तिथि में आप ढलना सीख जाते हैं| कोई भी नई असफलता आपको बेचैन नहीं करती| आप जानते हैं, यह कुछ दिन की बात है| आप संघर्ष कर सकते हैं| लोगों की कुटिल मुस्कान आपको नहीं डराती|
इस नशे से बाहर न आयें| क्योंकि असफलता में कमाया गया नशा आपको सकारात्मक बनाये रखने में मदद देता है| आपको संभाल कर रखता है|

असफलता का नशा आपको सफलता के जहरीले नशे से दूर रखता है|

मनभेद की नीति

कई बार सोचता हूँ, क्या राजनीति तुच्छ बात है? कम से कम इस मुद्दे पर राजनीति नहीं होनी चाहिए| राजनीति का यह नकार हमारे लोकतंत्र की खूबी है| कोई राजनीति पसंद नहीं करता – राजनीतिज्ञ तो बिलकुल ही नहीं| संसद में हल्ला मचा रहता है – राजनीति न करो| राजनीति यानि विचार-विमर्श, शब्द संघर्ष – शास्त्रार्थ|

कैसे तय हो क्या सही है| बिना विचार –विमर्श के| मतदान मुद्दे नहीं तय करता| बिना विमर्श के होने वाला मतदान सिर्फ भाई-भतीजावाद है| विमर्श से भागना भीड़तन्त्र को मजबूत करना है – लोकतंत्र को नहीं| लेकिन बात विमर्श की नहीं ही रही| सड़क का संघर्ष आज विचार को जन-जन तक पहुँचाने का संघर्ष नहीं है, सब जोर-जबरदस्ती का मामला है| हिंसक संघर्ष स्वीकार्य होने लगे हैं और अनशन और प्रदर्शन को कोई नहीं पूछता|

लोकतंत्र के लिए आवश्यक है कि पहले मुद्दा हो, उसपर विचार हो, विमर्श हो उसको जनजन तक पहुँचाने की बात हो और फिर जिसका विचार पसंद आये उसे मत दे दिया जाए| आज पहले नेता चुन जाता है बाद में उसका विचार खोजा जाता है| विचार का भी क्या है, सत्ता के बाहर रहकर जिसका विरोध हो, वही सत्ता में आते ही प्रिय विचार हो जाता है| जब विचार के यह हाल हैं तो विमर्श के लिए अवसर ही कहाँ है?

विचार अगर लोकतंत्र का मूल न हो तब लोकतंत्र का नष्ट होना तय ही है| पहले यह भीड़तंत्र बनेगा और बाद में तंत्रहीनता|

आज भले ही सूचना तकनीकि अपने चरम पर हो मगर हम सूचनाएं हमारे हाथ में नहीं हैं|उनका नियंत्रण कोई और कर रहा है| सूचना बिक रही हैं| असुविधाजनक सूचना उपलब्ध नहीं होती| आप जिस पक्ष को एक बार हल्का सा भी समर्थन देते हैं, आपका सूचना तंत्र आपके पास विरोधी या विपक्षी सूचना नहीं आने देता| भ्रम का मायाजाल बन रहा है| जब तक सूचना के दुसरे पक्ष तक पहुँच नहीं होगी, लोकतंत्र समृद्ध नहीं होगा|

राजनीति में मतभेद होने अच्छी बात है, मनभेद नहीं होने चाहिए| मतभेद के लिए मत होना चाहिए| मनभेद के लिए मन| मन का क्या है, किसी पर भी आ जाता है और बाकि सब शत्रु लगने लगते हैं| बस यही नहीं होना चाहिए|

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