मैं भी

मैं भी, साल २०१८ के दो ख़तरनाक शब्द| पुरुषों में डर है कि इन दो शब्दों के साथ उनका नाम न लिखा हो| प्रवृत्ति विशेष के पुरुष बुरी तरह घबराये हुए हैं तो अन्य पुरुष अकारण परेशान किये जाने की आशंका से ग्रसित हैं| इन दोनों प्रकार के पुरुषों में एक बात का संतोष भी है – उनकी बेटी, बहन या पत्नी अपने की अकेला और असहाय महसूस नहीं कर रहें होगीं| तो एक मूर्खतापूर्ण चिंता भी है कि कहीं उनकी बेटी, बहन या पत्नी अपने प्रति अन्याय की बात बात उठाकर परिवार की योनि अर्थात इज्जत दाँव पर न लगा दें और शोषित होने के जन्मजात अभिशाप के मुक्त न हो जाएँ|  

मुद्दे की राजनीति, मुद्दे की राजनीति, मुद्दे से जुड़े क़ानून और उनके संभावित दुरूपयोग चर्चा में हैं| किस कानून या आन्दोलन का दुरूपयोग नहीं होता? हमारा ध्यान सकारात्मक पहलू पर होना चहिये| युवा लड़कियों के परिवार सुरक्षित वातावरण महसूस कर रहे हैं| जिन कंपनी या संस्थानों में यौन शोषण सम्बन्धी समिति का गठन नहीं था या ठीक से नहीं था, वो सलाह के लिए संपर्क कर रहे है|

जिस प्रकार के आवाजें उठ रहीं हैं, आन्दोलन में गंभीरता आएगी और यौन शोषण सम्बन्धी कानून के लैंगिकसंतुलन की ओर बढ़ने में भी मदद मिलेगी| उम्मीद है कि शोषण का शिकार रहे पुरुष भी शोषक पुरुषों और महिलाओं के प्रति आवाज उठाने की हिम्मत करेंगे|

इस समय कई प्रकार की भ्रान्ति जनता में फैली हुई है| बहुत से लोग यह मान कर चल रहे हैं कि आपकी हँसी मजाक भी इस प्रकार के आरोपों का आधार बन सकते हैं| वास्तव में ऐसा नहीं है| इस प्रकार के दुर्भाग्यपूर्ण आरोप दुर्भावनावश लगाये तो जा सकते हैं परन्तु यह कानून की लड़ाई में नहीं टिक पाएंगे| परन्तु आपसी हँसी मजाक की परिभाषा सत्ता और समाज के अलग अलग पायदान खड़े हर व्यक्ति के लिए अलग हो जाती है| भाभी और साली के साथ भारत में मजाक का रिश्ता माना जाता है| मगर आप अपनी साली से जो मजाक करते है वो भाभी से नहीं करते, यह एक सत्य है| मजाक आप अपनी बहन से भी कर लेते हैं मगर यह वह मजाक नहीं होते जो आप भाभी या साली से कर लेते हैं| यही बात महिला मित्र के साथ लागू होती है| प्रायः पुरुष महिला सहकर्मियों के साथ शुरुआत से ही भाभी या साली वाले रिश्ते तक पहुँचने की कोशिश करते हैं| देखने की बात है कि सम्बंधित महिला इस हँसी मजाक को किस तरह ले रहीं हैं| यदि आप ही मुख्यतः मजाक प्रारम्भ करते रहे हैं तो आप फँस सकते हैं क्योंकि महिला आपके साथ अपनी ओर से मजाक नहीं कर रही| सहकर्मी के कपड़ो, श्रृंगार, अंगों आदि पर बात करना गलत है, कम से कम जब यह सब पिछली बार की बात में पसंद न किया गया हो|

एक बात और कहनी पड़ती है| भारत को कामसूत्र का देश माना जाता है| देश में कामसूत्र छिप कर पढ़ने की पुस्तक रही है| सब पाठक जानते हैं कि इस पुस्तक के कौन कौन से अध्याय उन्होंने पढ़े हैं| मगर कामसूत्र का सबसे महत्वपूर्ण भाग है, किस स्त्री से सम्बन्ध रखने चाहिए, किस से नहीं| कामसूत्र पुराना ग्रन्थ है| समय के साथ इस सूची में कुछ परिवर्तन की आवश्यकता अवश्य बनी होगी, मगर प्रासंगिकता बरक़रार है| हर स्त्री आपके लिए नहीं है| स्त्री की सहमति के लिए कामसूत्र में जोर दिया गया है| सहमति के प्रयासों पर और उनकी हद समझने की भारतीय पुरुषों की जरूरत है| भारतीय समाज को यौन शिक्षा की आवश्यकता है| यौन शिक्षा के पाठ्यक्रम को समझने की उस से भी बड़ी आवश्यकता है|

जिन दिनों हम यह सब बातें कर रहे हैं, भारतवासी नारीशक्ति के सबसे बड़े उत्सव नवरात्र के उत्साह में डूबे हुए हैं| हर वर्ष प्रश्न उठते हैं कि स्त्रीशोषक पुरुष किस मूँह किस  शृद्धा से नवरात्रि मना पाते हैं| कन्याभ्रुण हत्या करने वाले अपनी पाप मुक्ति के लिए जोर शोर से कंचक जिमाने और नवरात्रि के भण्डारे करते पाए जाते हैं| नवरात्रि का यह त्यौहार एक बात की भी याद दिलाता है कि पुरुषसत्ता सर्वोपरि नहीं हैं और पुरुषसत्ता को मानवता का अस्तित्व बचाने के लिए नारीशक्ति की शरण लेनी पड़ी है और उसे अपनी समस्त शक्तियों से भी नवाजना पड़ा है|

आइये बेहतर समाज की ओर कदम बढ़ाएं|

https://gahrana.com/2013/11/29/sexual-abuse-in-the-corporate-world-hindi/

https://aishmghrana.me/2013/03/06/ring-the-bell-stop-violence-against-women/

https://gahrana.com/2015/12/21/do-not-sit-quiet-hindi/

https://gahrana.com/2013/08/02/%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%85%E0%A4%AC%E0%A4%B2%E0%A4%BE-%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%80/

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तिवारी जी की सरकारी हत्या

तिवारी जी की सरकारी हत्या “उत्तर भारतीय सवर्ण हिन्दू स्वयंपोषी शहरी मध्यमवर्ग” के लिए कानफोड़ू धमाका साबित हुए।

सवाल को कई थे मगर पूछे न गए, न जाएंगे। वो तो तिवारी की की सहकर्मी मुस्लिम हुईं, वरना “मुहब्बती जिहाद” का मीडियाई मामला बन जाता। ख़ैर ये तो बाद में किस्से गढ़ने की बात हुई कि मुस्लिम लड़कियां जिहादी क्यों नहीं होती और मुहब्बत वाला जिहाद क्यों नहीं करतीं। प्याज, सरकारी फ़ाइल और मीडियाई मामलों की परतें तो खुलती उतरती रहतीं हैं, सो अभी के लिए मामले का यह पहलू मुल्तवी। मुद्दा खास पर चलते हैं।

उत्तर भारतीय सवर्ण हिन्दू स्वयंपोषी शहरी मध्यमवर्ग को तिवारी जी की सरकारी हत्या के कानफाड़ू धमाके से झटका ऐसा लगा है कि हलाल हुए जाते हैं।

उत्तर भारतीय सवर्ण हिन्दू स्वयंपोषी शहरी मध्यमवर्ग इंसानी बिरादरी का वो हिस्सा है जो स्वयंपोषी बने रहने के लिए कुत्ते की दुम की तरह डोलने और कबूतर की तरह मिचमिचाने का आदि है।

यह हिंदुस्तानी समाज का जो नासूर है जिसे हर तरह के भेदभाव ढूंढ लेने में महारत है। बस इनकी चाकरी बनी रहे और इनके मालिकान की काली सफेद आमदनी।

सरकारी गोली से आदिवासी मरें तो यह पुलिसियों से पहले उन्हें नक्सल का दर्जा दे दें। दलित, पिछड़ा, मुसलमान, पूर्वोत्तरी, कश्मीरी, झोपड़पट्टी, किसान, मज़दूर, दाढ़ीवाला, सांवला, काला, औरतजात, औरतबाज, कुछ भी इनके निशाने पर आ सकता है। वो तो गनीमत हैं आजकल राष्ट्रवाद के जोर के चलते सैनिकों की इज्ज़त है वरना रेलवे की दूसरा दर्जा बोगी तबादले पर जा रहे दस सैनिक बैठा कर के देखिए।

अन्नदाता किसान भले ही उच्च कुलीन ब्राह्मण या सूर्यवंशी क्षत्रिय क्यों न हो, उसकी रैली में सरकारी लाठी तो चलवा दीजिये। उत्तर भारतीय सवर्ण हिन्दू स्वयंपोषी शहरी मध्यमवर्ग ऐसे खुश हो जाते हैं जैसे सब्सिडी वाला तिलचट्टा जूते से कुचल कर मारा जा रहा हो। सब्जी किसान को सब्सिडी न दो, और उस से प्याज़ दो रुपये किलो खरीद कर दिल्ली मुम्बई में पच्चीस रुपये किलो बेच दो। इनके पास दारू, दावत, टीवी, कार, मोबाइल सब के लिए बड़ा बटुआ है, बस किसान मज़दूर और रिक्शेवाले ही लुटेरे हैं। उन पर गोली चलाते रहो।

मुझे तिवारी जी से बैर नहीं है वरन उस मानसिकता पर है तो तिवारी ही की अपना मानकर हो – हल्ला कर रही है|मगर उस वक़्त सब को साँप सूंघ जाता है जब “कोई और मरता” है| दर्द केवल अपनों के मरने पर होता है| 

आख़िर क़ानून के राज्य में पुलिस द्वारा किसी की भी हत्या क्यों हो? सब गिरफ्तारियाँ हों, मुकदमा चले और सजाएँ मिलें या बरी हो जाएँ| मगर इस के लिए पूरा तंत्र चाहिये| सबूत जुटाने के लिए पूरा विभाग खड़ा करना होगा| गवाहों की सुरक्षा का मसला है| उस से ऊपर फ़र्जी मुकदमों और झूठे आरोपों के के मामलों में भी उचित कानून होने चाहिए|

ये मीडिया ट्रायल बंद होने चाहिए| पुलिस को शिकारी कुत्ता समझने की प्रकम वृत्ति ख़तरनाक है कि पट्टा खोला और शिकार हाज़िर| पुलिस को तहकीकात का समय मिलना चाहिए और अपनी तहकीकात पर अच्छे से सोच विचार का भी| यहाँ तक की नामजद मामलों में भी कम से कम हफ्ते भर का समय पुलिस के पास होना चाहिए| पुलिस को तत्काल जनता, नेता, पत्रकार, मंत्री, मुख्यमंत्री आदि दबावों से मुक्ति मिलनी चाहिए| हो सके तो दैनिक कानून व्यवस्था और आपराधिक मामलों की तहकीकात दोनों के लिए तुरंत अलग अलग व्यवस्था होनी चाहिए|

वरना सौ पचास “और लोगों” के बाद फिर कोई तिवारी जी या गुप्ता जी मारे जायेंगे और आप को दुःख झेलना होगा|

 

नगद नारायण दर्शन दो

भारत के बाजारों में नगद की कमी कोई नई बात नहीं| सामान्य तौर पर आम चुनावों से पहले नगद की कमी हमेशा अनुभव की जाती है| मगर इस बार समस्या ज्यादा विकट मालूम होती है| ख़ासकर तकनीकि रूप से नगद को इस बार बाजार में नहीं ही होना चाहिए|

चुनावों से पहले जारी हुए आँकड़े बताते हैं कि चुनावी चंदे में भारी बढ़ोतरी हुई है| कॉर्पोरेट चंदा तो, आशा के अनुरूप, लगभग पूरा ही सत्ताधारियों को मिला है| कॉर्पोरेट चंदे को आम जनता में कानूनी तरीके से किया गया भ्रष्टाचार माना जाता है| पिछले बजट में कंपनी क़ानून में बदलाव करकर किसी भी कंपनी द्वारा दिए जा सकने वाले चंदे की उच्च सीमा को हटा दिया गया| इस समय चुनावी चंदे के रूप में दिया गया पैसा, नगद में हो या बैंक में, चुनाव से पहले अर्थव्यवस्था में वापिस नहीं आएगा|

विमुद्रीकरण के बाद कहा गया था कि डिजिटल अर्थव्यवस्था को बढ़ावा दिया जायेगा| साथ ही अर्थव्यवस्था का बड़ा भाग नगद पर काम कर रहा है – चिकित्सा, वकालत और रोजमर्रा का खर्चा नगद में करना अभी भी मजबूरी है| इसलिए पूर्णतः डिजिटल नागरिक भी लगभग एक माह की राशि नगद में रख रहे हैं| क्योंकि किसी को भरोसा नहीं कि जरूरत के समय आस पास के सौ एटीएम में से एक भी काम कर रहा हो| पिछले कुछ समय में शहरों में एटीएम की संख्या में कमी की गई है या स्थानांतरित की गई हैं|

दूसरी तरफ सरकारी आँकड़े बताते हैं, विमुद्रीकरण की अपार सफलता के बाबजूद आज पहले से भी अधिक नगदी अर्थव्यवस्था में मौजूद है| कहाँ है यह धन? आज अर्थव्यवस्था में नये प्रचलित दोहजारी नोट की बहुतायत है| पुराना नगद जमा काला धन अब दोहजारी की शक्ल में अपने स्थान पर वापिस जमा है|

कालेधनसंग्रह के अलावा, एटीएम और पर्स दोनों को दोहजारी बहुत रास आता है| इस कारण

बाजार में लगभग हर कोई दोहजारी लेकर घूम रहा है| अधिकतर समय लेनदेन के लिए दोहजारी के मुकाबले छोटे नोटों की जरूरत होती है| जब इस बड़े नोट के कारण लेनदेन में छुट्टे की समस्या आती है तो यह नगदी की कमी का आभास कराता है|

वास्तव में विमुद्रीकरण का मानसिक हमला और दोहजारी नोट मिलकर आम बाजार विनिमय को कठिन बना रहे हैं| यही नगद की लक्ष्य से अधिक आपूर्ति के बाद भी बाजार में कमी का सत्य है| इस बात के भी समाचार हैं कि अर्थवयवस्था में नगद की मात्रा विमुद्रीकरण के स्तर को पार कर जाने की खबर के बाद सरकार ने नगद छापने में कटौती कर दी थी| इसमें सभी मूल्यवर्ग के नोट शामिल थे|

अच्छा यह है कि दोहजारी को छापना बंद कर दिया जाए| पांच सौ रूपये से अधिक मूल्य के नोट प्रचलन से बाहर रहें| इस से अधिक मूल्य के लेनदेन के लिए जनता को बैंकिंग माध्यमों , खासकर कार्ड और मोबाइल लेनदेन के तरीके उपलब्ध कराये जाएँ| मगर सरकारी जबरदस्ती न हो|

हालाँकि सबसे अच्छी खबर यह है कि चुनाव साल भर के भीतर हो जाने हैं| दलगत राजनीति में फंसा पैसा जल्दी अर्थव्यवस्था में वापिस आ जायेगा|

हे राम!!

हे राम!

याद होगा तुम्हें

छू जाना उस पत्थर का, पथराई अहिल्या का,

मुझे भी याद है – तुम्हारा अधूरा काम||

कभी कभी मौका मिलने पर,

धिक्कारते तो होगे तुम, अपनी अंतरात्मा को||

सहज साहस न हुआ तुम्हें,

लतिया देते इंद्र को, गौतम को,

गरिया देते कुत्सित समाज को,

उदहारण न बन सके तुम||

हे राम!!

तीन अंगुलियाँ मेरी ओर उठीं हैं,

और इंगिता तुम्हारी ओर||

 

आरक्षण पर पारस्परिक कुतर्क

आरक्षण के समर्थन या विरोध में वाद –विवाद करते रहना धर्म, राजनीति, क्रिकेट और खाने-पीने के बाद भारतियों का प्रिय शगल है| मुझे आरक्षण की मांग मूर्खता और उसका विरोध महा-मूर्खता लगती है| सीधे शब्दों में कहूँ तो आरक्षण के पक्ष-विपक्ष में खड़े राजनीतिक दल या राजनेता भारत और किसी भी भारतवासी के हितेषी नहीं हो सकते| अगर आप चाहें, यह आगे न पढ़ें|

मेरे इस आलेख पर इस बात का कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि आरक्षण का प्रस्ताव अपने आप में उचित था या नहीं| हालाँकि मुझे पारदर्शिता के हित में अपनी निजी राय रख देनी चाहिए| मुझे लगता है, जब तक समाज में असमानता है –आरक्षण की आवश्यकता है|

प्रख्यात कुतर्क है कि आरक्षण का देश के विकास पर कुप्रभाव पड़ता है| परन्तु सभी जानते हैं कि अपेक्षागत तौर पर कम आरक्षण वाले हिंदीभाषी राज्य अधिक आरक्षण वाले दक्षिणी राज्यों से बेहद कम विकास कर पाए हैं| एक कारण यह है कि दक्षिणी राज्यों में आरक्षण और उसका सही अनुपालन अधिक बड़े जन समुदाय को आगे बढ़ने की प्रेरणा देने में सफल रहा है| दक्षिणी राज्यों में विश्विद्यालयों और सरकारी नौकरियों में आरक्षित और अनारक्षित प्रतिभागियों के योग्यता सूची में अंतिम आने वाले प्रतिभागीयों के योग्यतांक का अंतर लगातार घट रहा है| दक्षिणी राज्यों में अधिकतर प्रतिभागियों को आरक्षण अथवा बिना आरक्षण लगभग बराबर का संघर्ष करना पड़ रहा है| जबकि उत्तरी और पश्चिमी राज्यों में योग्यता प्रदर्शन की खाई बरक़रार है|

आरक्षण के समर्थन (और नई मांग) या विरोध में खड़े होने वाली भीड़ को देखें| भीड़ के अधिकतर सदस्य वो निरीह प्राणी होते हैं जो शायद किसी प्रतियोगी परीक्षा में दस प्रतिशत अंक भी न ला पायें| जब इस प्रकार के उग्र प्रदर्शन होते हैं उस समय उनके सभी योग्य जातिभाई सरकारी या निजी क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों का लाभ उठाने का उचित प्रयास कर रहे होते हैं|

जातिगत भेदभाव के विपरीत, सभी वर्गों से नए नए उद्यमी आगे आ रहे हैं| व्यापार के साथ साथ बड़े उद्योगों में भले ही सवर्णों और अन्य धनपतियों ने आधिपत्य कायम किया है, छोटे और मझोले उद्योगों में हमेशा की तरह शूद्र कही गई जातियों का आधिपत्य है| ध्यान देने की बात है कि प्रायः सभी उत्पादक और सेवा प्रदाता जातियाँ प्राचीन काल से शूद्र के रूप में वर्गीकृत होती रहीं हैं| दुःखद यह है कि इनमें अपने पारंपरिक कार्यों के प्रति वही घृणा भर दी गई है, जो सवर्ण सदा से उन कार्यों से करते रहे थे|

अब, आइये मुख्य मुद्दे पर आते हैं|

रोजगार सुधार

आरक्षण समर्थक और विरोधी दोनों ही वर्ग सरकारी नौकरी के लालच में एक दूसरे से लड़ रहे हैं| कोई नहीं देखता कि सभी उत्पादक रोजगारों के मुकाबले सरकारी क्षेत्र में बहुत कम अवसर हैं| साथ में, बड़े और विदेशी उद्योगों और संस्थानों के दबाव में आवश्यक सरकारी पद भी नहीं भरे जा रहे| लागत कम करने के नाम पर सरकारी क्षेत्र को मानव संसाधन विहीन करने की परंपरा चल रही है|  इस नाते प्रथम दृष्टया आरक्षण अप्रभावी हो रहा है| वास्तव में मांग होनी चाहिए कि सरकारी गैर सरकारी क्षेत्रों में सभी खाली पद समय पर भरे जाएँ| अनावश्यक निजीकरण न हो| कोई भी व्यक्ति अपने कार्यालय में विवश होकर या लालच में भी आठ घंटे से अधिक समय न बिताये| ओवरटाइम की व्यवस्था समाप्त हो| पूरे साल में कोई भी व्यक्ति अगर दो हजार घंटे पूरे कर ले उसे साल भर के सभी लाभ एक घंटे भी बिना कार्यालय जाए बाकि बचे हुए समय में मिलें| आप देखेंगे कि देश में न सिर्फ रोजगार बढ़ जायेगा बल्कि कार्यालय में जीवन काटते लोग, वास्तविक जिन्दगी जी पाएंगे|

विकास

यदि देश में समुचित विकास हो तो कोई कारण नहीं कि सभी रोजगार योग्य युवाओं को रोजगार न मिले| सोचिये अगर किसी समय एक लाख पदों के लिए भर्ती होनी हो और रोजगार योग्य कुल युवा भी एक लाख के आसपास हों| ऐसे में किसे आरक्षण की जरूरत होगी? जब भी कोई राजनेतिक दल आरक्षण के समर्थन या विरोध में कोई बात कहता है, वास्तव में वह विकास के प्रति अपनी द्रष्टिहीनता की घोषणा करता है| यही कारण है कि विकास का नारा लगाने वाले बड़े बड़े तुम्मन खां नेता आरक्षण का तुरुप  नारा अपनी वाणी में बनाये रखते हैं| ध्यान रहे की विकास किसी सरकारी फीताकाट योजना से नहीं आएगा, वरन उच्च शिक्षित युवाओं द्वारा प्रतियोगी माहौल में आगे बढ़कर काम करने से आएगा|

आपको को आश्चर्य होगा, मगर मुझे बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर और पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के अलावा कोई भी राजनेता सच में आरक्षण विरोधी नहीं लगा|

दिल्ली मेट्रो के दरवाजे इस स्टेशन पर नहीं खुलेंगे

दिल्ली मेट्रो के इस स्टेशन पर मेट्रो के दरवाजे नहीं खुलते| इस स्टेशन हर गेट पर ताला है| यह स्टेशन आज देश में बढ़ती बेरोजगारी और उसके सामने सरकारों की बेचारगी का प्रतीक है|

पिछले कई दिनों से ऐसा हो रहा है| जो लोग मेट्रो स्टेशन पहुँचते हैं उन्हें पता लगता है कि दरवाजे बंद हैं| जो लोग मेट्रो में सफ़र करते हैं उन्हें इस स्टेशन पर ही पता चलता है कि दरवाजे नहीं खुलेंगे| अक्सर लोग इस उद्घोषणा को सुन नहीं पाते| कानों में मोबाइल की ऊँगली डाले लोग अपने दुर्भाग्य के आगे बेबस हैं| यहाँ तक कि नौकरी ढूंढने जाते लोग, बेटे की नौकरी की दुआ करते लोग, आरक्षण का विरोध और समर्थन करते लोग सब बेबस हैं| लाला की नौकरी को गाली देते लोग, कपड़े की दुकान पर मैनेजमेंट का जलवा दिखाते लोग, तकनीकि महारत से गैर-तकनीकि काम करते लोग नहीं जानते कि दरवाजे क्यों बंद हैं| किसी को नहीं पता, कि सरकार उनसे डरी हुई है| किसी को नहीं पता कि सरकार उनसे क्यों डरी हुई है| किसी को नहीं पता कि एक “क्या, क्यों, कैसे” उनकी जिन्दगी में बहार ला सकता है| वो सरकार के सामने देश के करोड़ो बेरोगारों के नुमाइंदे बन सकते हैं|

अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारना इस देश का आदि धर्म है, राष्ट्रीय खेल है, राष्ट्रीय कर्तव्य है|

रेलवे को दो लाख श्रमशक्ति से वंचित कर घाटे में डाला जा रहा है| देश को पुलिस को दस लाख की श्रमशक्ति की कमी झेलने के लिए मजबूर किया गया है| देश के प्रधान न्यायालयों ने ही लगभग हज़ार श्रमशक्ति की कमी है| यहाँ तक कि देश की सेना में श्रमशक्ति की कमी की ख़बरें आती रहती है| देश के मात्र सरकारी संस्थान जिस श्रमशक्ति की कमी झेलने के लिए मजबूर हैं, लगभग उतने ही लोग देश में बेरोजगार हैं| क्या श्रमशक्ति के बिना देश तरक्की कर सकता है? शायद सरकारों को उम्मीद है किसी दिन देश के ये तमाम बेरोजगार हिमालय पर जाकर ताप करेंगे, ब्रह्मज्ञान अर्जित करेंगे और देश को तपशक्ति से विश्वशक्ति बना देंगे|

इस मेट्रो में यात्रा करते लोगों को पिछले पंद्रह दिन में नहीं पता कि दरवाजे क्यों नहीं खुलते| दरवाजे इसलिए नहीं खुलते क्योंकि सरकार को डर हैं कि आप नौकरी मांगने के लिए प्रदर्शन करते मुट्ठीभर देशद्रोहियों के साथ जाकर न खड़े हो जाएँ| वो मुट्ठीभर देशद्रोही जिनके साथ देश की संसद और विधानसभा में बैठा कोई शख्स नहीं हैं|

शौक बहराईची साहब का शेर है:

बर्बाद गुलिस्ताँ करने को बस एक ही उल्लू काफ़ी था
हर शाख़ पे उल्लू बैठा है अंजाम-ए-गुलिस्ताँ क्या होगा

अक्सर हम इसका मतलब नेता और अफसर से लगाते है, मगर इसका मतलब मतदाता से है| आप जो हैं, नेता इतने साल से आपको आपकी पहचान कराने में लगे हैं|

सम्बंधित ख़बरें:

http://www.business-standard.com/article/pti-stories/jln-metro-station-closed-due-to-student-protest-118030300372_1.html

http://www.newindianexpress.com/thesundaystandard/2018/mar/11/ssc-scam-protest-a-much-bigger-struggle-for-aspirants-1785135.html

सिलसिला जारी है…

आतंकित सरकारें

किसी भी देश में आतंकवाद को बढ़ावा तभी मिल सकता है जब उस देश की सरकारें और उन सरकारों को चुनने वाली जनता डरपोक हो| जब भी हम किसी व्यक्ति या संगठन को आतंकवादी कहते हैं वो उसका सीधा अर्थ है कि हम डरे हुए हैं|

डरना उस कायरता का परिचायक है| कोई भी बहादुर देश किसी व्यक्ति या संगठन को अपराधी या अपराधिक संगठन कहे, तो समझ आता हैं| नियम क़ानून तोड़ने वाला व्यक्ति अपराधी है|कोई भी व्यक्ति एक देश काल में अपराध हो सकता है किसी अन्य देश काल में नहीं| उदाहरण के लिए मानहानि पहले बहुत से देशों में अपराध माना जाता था, परन्तु अब अधिकांश देश इस अपराध नहीं मानते|

जब हम किसी व्यक्ति या संगठन के उचित या अनुचित किसी भी कार्य से डरते हैं और उस डर को स्वीकार करते हैं तो उसे आतंकवादी कहते हैं|हम आतंकवाद का अपनी आतंरिक शक्ति में सामना नहीं कर पाते| यही कारण हैं कि सुदूर यूरोप में हुए बम धमाके हमारे “बहादुर” भारतियों को सोशल मीडिया में सक्रिय कर देते हैं| दूसरी ओर हम अपने देश में होने वाले बलात्कार, हत्याओं, रोज रोज की सड़क दुर्घटनाओं और चिकित्सीय लापरवाही से नहीं डरते| हम किसी सड़क दुर्घटना या दंगों में मारे गए 10 लोग नहीं डराते वरन हम सुदूर देश में किसी बम धमाके से डर जाते हैं|हमें गुजरात, राजस्थान या मुंबई में पत्थर फैंकते और बस जलाते उपद्रवी लड़के आतंकवादी नहीं लगते बल्कि कश्मीर में बम फैंकते लड़के हमारी नींद उड़ा देते हैं|हमारा अपना चुना हुआ डर ही हमें अधिक डराता है|

आतंकवाद दरअसल आतंकवादियों से अधिक उन लोगों का हथियार है जो इससे पैदा होने वाले डर से लाभान्वित होते हैं या डरने में जिन्हें प्रसन्नता मिलती हैं| दुनिया के दर्जन भर देश तबाह करने के बाद भी अमेरिका दुनिया का सबसे आतंकित मुल्क हैं – उसकी डरी हुई बहादुरी आतंकवाद के मुकाबले कहीं इंसानों की हर साल जान ले लेती है| कश्मीर में जितने लोग हर साल कुल मिला कर अपराधी और आतंकवादी घटनाओं में मारे जाते हैं कम से कम उतने लोग राजधानी दिल्ली या मुंबई में अपराधी घटनाओं में मारे जाते हैं| मगर हम नहीं डरते|अपराध और अपराधी हमें नहीं डराते| अपराधों से लड़ने वाले पुलिसवालों को उतना बड़ा मैडल नहीं मिलता जितना किसी कथित आतंकवादी से लड़ने वाले पुलिसवाले को मिलता है|

आतंकवाद की एक खास बात है, दुनिया की कोई भी सरकार आतंकवाद के आगे घुटने नहीं टेकती| आतंकवाद से लड़ने की कसमें खाना दुनिया भर की राजनीति में रोजमर्रा का शगल है| मगर छोटे छोटे अपराधियों और गुंडों के समूह के आगे सरकारें जब तब घुटने टेकती रहती हैं| भारत देश में पिछले सौ सालों में बहुत सी किताबें, नाटक और फ़िल्में सिर्फ इसलिए प्रतिबंधित हो गई कि सरकारों को कानून व्यवस्था के लिए ख़तरा लगा| हम सब जानते हैं यह ख़तरा उन किताबों, नाटकों और फिल्मों से नहीं बल्कि उनका कथित तौर पर विरोध करने वालों से था| सरकारें उनसे लड़ने में असमर्थ थीं और इतनी डरी हुयीं थी कि उन्हें आतंकवादी या अपराधी कहने का भी साहस न जुटा सकीं| उनसे लड़ने की बात तो दूर की बात है, पिछले सौ सालों में बहुत से हलफनामे सरकारों ने अदालत में दिए हैं कि किताबें, नाटक या फ़िल्में क़ानून व्यवस्था बिगाड़ देंगी – मतलब इतना बिगाड़ देंगी कि सरकार संभाल न पायेगी|

उफ़!! पिछले सौ साल में कोई सरकार हलफनामों में यह न कहने की हिम्मत भी न जुटा सकी कि वो जिनसे डरी हुई है वो किताब, नाटक या फिल्म नहीं गुण्डा तत्व हैं|

 

 

 

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