तेजहीन तेजस

भारत स्वभावतः एक वर्णभेदी और वर्गभेदी राष्ट्र है| हमारे सामाजिक जीवन में वर्गभेद कदाचित वर्णभेद से कहीं अधिक है| जब से शिक्षा का निजीकरण बढ़ा है, लोग वर्ग के आधार पर अपने बच्चों के लिए विद्यालय का चयन करते हैं| जाति या वर्ण की बात वर्ग के बिना शहरी जीवन में करना बेकार है| शहरी सामाजिकता में जाति या वर्ण की बात करना असामाजिक माना जाने लगा है परन्तु वर्ग का अंदाज आसानी से लगाया जा सकता है|

कुछ वर्ष पहले जब में गृहनगर से ईएमयू ट्रेन से लौट रहा था तब किसी ने टोका की आजकल शताब्दी क्यों छोड़ दी आपने| सीधा सवाल यह कि आप निम्नवर्गीय ट्रेन में क्यों सफ़र कर रहे हैं? यही बात टाटा की बेहतरीन नेनो कार के बारे में भी है| इस साल २०१९ में पूरे देश में मात्र एक नेनो बिकी है| अगर देखा जाए तो आर्थिक मंदी, बढ़ते हुए निम्नमध्यवर्ग के चलते नेनो की बिक्री नहीं बढ़ी| कारण वर्ग व्यस्था में नीचे गिर जाने का भय| शायद ही किसी भारतीय घर में नेनो पहली कार के रूप में दिल से स्वीकार हुई है|वर्यग भेद की यह बात रेल और हवाई यातायात में भी लागू होती है|

अगर आप दिल्ली-मुंबई, दिल्ली लखनऊ, दिल्ली जयपुर, जैसे कमाऊ मार्गों के यातायात की बात करें तो हवाई यात्रा बहुत लोकप्रिय हैं जबकि इन मार्गों पर राजधानी या बढ़िया शताब्दी गाड़ियाँ सुलभ हैं और अधिक सुविधाजनक भी हैं| दिल्ली आगरा और दिल्ली जयपुर जैसे मार्गों पर उच्चस्तरीय टैक्सी और वातानुकूलित बसों को बहुत पसंद किया जाता है| रेल यात्रा उच्चवर्ग के लिए अधम होने जैसा विकल्प है|

दिल्ली आगरा मार्ग पर गतिमान एक्सप्रेस के सफल होने का कारण देशी विदेशी पर्यटकों के बीच इस ट्रेन का लोकप्रिय होना है| सरकार ने गतिमान एक्सप्रेस की सफलता के बाद अन्य उच्च स्तरीय गाड़ियों की सफलता की जो उम्मीद बाँधी है, वह भारतीय सन्दर्भ में उचित नहीं प्रतीत होती|

सरकार रेलवे को लाभ में लाना चाहती है| इसलिए सरकार का ध्यानबिन्दु उच्चवर्ग है जिसे बेहतर सुविधाओं के साथ रेलवे से जोड़ने की तैयारी चलती रही है| तेजस एक्सप्रेस इस प्रयास का एक हिस्सा है| लाभ को मूल आधार मानकर इसका निजीकरण भी किया गया है| परन्तु क्या यह महंगी ट्रेन मन चाहा लाभ दे पायेगी| मुझे इसमें संदेह है|

तेजस एक्सप्रेस को  हवाई मार्ग और स्वर्ण शताब्दी से कड़ी टक्कर मिलनी है| साथ ही इसका समय दिल्ली में कार्यालय बंद होने के समय से काफी पहले है| यदि आप किसी भी मंहगी गाड़ी को लाभ में रखना चाहते हैं तो उसका समय इस हिसाब से होना चाहिए कि उसके संभावित प्रयोगकर्ता समूह के समय से उसका मेल हो|हवाईयात्रियों को रेल की पटरी पर उतारने के लिए रेलवे को कड़ी मसक्कत करनी होगी| उनके हवाई यात्रा में लगने वाले समय और उसमें मिलने वाले आराम का बढ़िया विकल्प देना होगा| इसके साथ इसे हवाई यात्रा दर के मुकाबले लगभग पिचहत्तर प्रतिशत कम लागत पर उपलब्ध करना होगा|परन्तु मुझे इसका कोई आर्थिक लाभ और समाजिक औचित्य नहीं लगता|

बेहतर है कि रेलवे गैरवातानुकूलित परन्तु तेज गति ट्रेन विकसित करने पर ध्यान दे| इन ट्रेन के लिए रेलवे उचित सुविधाएँ देते हुए इन्हें उचित किराये पर चलाये|अंधाधुंध अनारक्षित टिकट जारी करने की पुरानी प्रवृत्ति पर या तो रोक लगाये या अनारक्षित स्थानों की संख्या में वृद्धि करे|
वास्तव में एक करोड़ लोगों से एक रूपये प्रति व्यक्ति का लाभ लेना सरल है एक व्यक्ति से एक करोड़ रुपये का लाभ लेना कठिन|

अन्त में:

 

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बंद होते बैंक

मैं आजतक नहीं जानता कि वास्तव में बैंक होते क्यों हैं?

पहले भारत या पूरे एशिया में बैंक नहीं थे तब आम जनता की आवागमन और व्यापारिक जरूरत के लिए हवाला तंत्र था| यह वास्तव में पेमेंट बैंक सिस्टम है जिसे पश्चिमी बैंक प्रणाली के हित के लिए अवैध, गैरकानूनी और आपराधिक बनाकर पेश किया गया| जबकि इसे उसी प्रकार विनियमित किया जा सकता था, जैसे आज पेमेंट बैंक को किया जाता है| हर शहर और गाँव में कर्जदाता साहूकार भी थे जिनके ब्याज के कड़वे किस्से महशूर किये गए थे| सहूकारियां और हवाला आज भी है और कानूनन मना भी है|

बैंकतंत्र का मूल उद्देश्य बड़े समूह से धन बटोर कर उद्योग आदि में प्रयोग करने के लिए देना था|  यह एक उलट-साहूकारी है| आलोचक इसे समाजवाद से धन जुटाकर पूंजीवाद को देना भी कहते हैं| आज इसमें साहूकार की सूदखोरी, हवाला की हौल और पूंजीवाद की लम्पटता है| बाद में जब पूंजीपति असफल होता तो बैंक का बाजा बज जाता और पूंजीपति सो जाता| बहुत बार यह धोखाधड़ी का मामला भी होता|

आखिर बैंक क्यों असफल होते हैं?

भारत में बैंक बंद होना कोई नया घटनाक्रम नहीं हैं| आरम्भ में अधिकतर बैंक पूंजीपतियों ने समाज में मौजूद धन को ब्याज के बदले इकठ्ठा करकर अपने व्यवसाय के लिए प्रयोग करने के लिए खोले थे| इस तंत्र में कमी थी कि आमजन के लिए पैसा लगाना सरल था निकलना कठिन| इसके बाद बैंक का राष्ट्रियकरण हुआ| हालत बदले और लगा कि धोखेबाज रोक लिए जायेंगे| परन्तु छोटे बैंक, साहूकार आदि बने रहे| बड़े बैंक भी कोई नया व्यासायिक नमूना नहीं बना पाए| पूंजीपति बैंक का लाभ लेते लूटते रहे| हाल का दिवाला शोधन कानून भी कोई बहुत सफल नहीं दिखाई देता| हाल का पंजाब महाराष्ट्र सहकारी बैंक भी सामाजिक पूँजी पर पूंजीवादी कुदृष्टि की पुरानी कथा है|

फिलहाल इस सब का कोई इलाज नहीं दिखाई देता| सरकारी नीतियाँ जब तक पेमेंट बैंक, बचत बैंक और साहूकारी और निवेश व्यवस्था को अलग नहीं करेंगी यह सब चलेगा| परन्तु यह सब करना कोई सस्ता सौदा भी तो नहीं है|

आम जन को अपना ध्यान खुद रखना होगा| बैंक का बिचौलियापन पूँजी बाजार से ख़त्म होना चाहिए| इसके लिए निवेशक के रूप में आमजन को जागरूक होना होगा|

३७० से आगे

राजनीतिक, कूटनीतिक और रणनीतिक निर्णयों में सही गलत के फ़ैसले संविधान तय नहीं करता| सही गलत का निर्णय इतिहास तय करता हैं और इतिहास इतिहासकरों से अधिक समर्थकों और जनकवियों पर आश्रित होता है| आप जो निर्णय आज सही माना जाए वह पांच हजार वर्ष बाद गलत माना जा सकता है|

भावनात्मक समर्थन या विरोध से हटकर कोई तय नहीं कर सकता कि कौरव और पांडवों में नीतिगत रूप से सही उत्तराधिकारी कौन था| कुरुवंश अगली तीन पीढ़ियों में समाप्त हो गया| रावण द्वारा अपनी बहन के अपमान का बदला लेने के निर्णय पर कोई प्रश्नचिन्ह नहीं हैं परन्तु प्रश्न यह है कि क्या उसने कठिन शत्रु से शत्रुता करनी चाहिए थी और क्या उसने सही तरीका अपनाया| आज इन प्रश्नों पर विचार का कोई लाभ नहीं|

कश्मीर पर अनुच्छेद ३७० का बना रहना या चले जाना इसी प्रकार का प्रश्न है जिसका उत्तर इतिहास देगा| अनुच्छेद ३७० का पक्ष विपक्ष उसके होने न होने के लाभ हानि पर आज केवल भावनात्मक उत्तर देता हैं| संविधान में इस प्रकार के अन्य अनुच्छेद सरलता से मौजूद हैं| जन भावना से इतर नगालैंड सबसे गंभीर मुद्दा है| मोदी जी ने सरकार बनाते ही इस मुद्दे पर ध्यान दिया था जिसपर जनता (खासकर भक्त प्रजाति) ने कोई विशेष ध्यान नहीं दिया था|

कश्मीर मात्र छद्म मुद्दा रहा है| एक रजवाड़े की महत्वाकांक्षा और जनभावनाओं पर उसका अनिर्णय कश्मीर की कुल कहानी हैं जिसमें दो बड़े देश स्थानीय जनता की भावनाओं के बारे में आज तक असमंजस और भय में रहे हैं| वर्ना हैदराबाद, गोवा सेन्य कार्यवाही और जूनागढ़ जनमत के साथ भारत में विलयित हुए हैं और उनकी जनता आज मानती हैं कि उनका भारत विलय उचित रहा है|

इस समय पक्ष विपक्ष के प्रश्न इस बात पर आधारित हैं कि क्या भारत की केन्द्रीय सरकार और शेष भारत की जनता कश्मीर की जनता के साथ भावनात्मक एकता बना पायेगी? खासकर तब जब अनुच्छेद ३७० को निष्प्रभावी बनाते समय केंद्र सरकार ने अतिशय तिकड़म का प्रयोग करते हुए कश्मीर की सशंकित जनता के मन में अधिक अविश्वास पैदा कर दिया हैं| अब इस कदम को सफल बनाने का सारा दारोमदार अब भारत की जनता पर है|

दुर्भाग्य से भारत की जनता का राष्ट्रीय एकता के प्रश्न पर अच्छा प्रदर्शन नहीं रहा है| सामाजिक माध्यमों में जिस प्रकार के असभ्य और अनुपयुक्त सन्देश एक हफ्ते में डाले गए उनसे भारतीय एकता पर मोदी सरकार के प्रयासों को उनके भक्तों की ओर से ही धक्का लगा है| यदि मोदी सरकार और भाजपा कार्यकर्त्ता “भक्त प्रजाति” के समर्थकों पर जल्द काबू नहीं करते तो यह वर्ग सरकार के लिए दूरगामी कठिनाई पैदा कर सकता है|

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अनुपालन के खिलाफ दुष्प्रचार

राजनीति को भारत में दुष्प्रचार का एक गंदा खेल माना जाता है और जनता ने इसे जीवन की वास्तविकता के रूप में स्वीकार कर लिया है। दुर्भाग्य से, कुछ भारतीय पेशेवरों ने अनुपालन और अनुपालन पेशेवरों के खिलाफ दुष्प्रचार करना प्रारंभ किया है| मीडिया की भूमिका भी प्रश्नचिन्हों में घिरने लगी है। यह स्पष्ट है कि भारतीय मीडिया प्रकाशन करने से पहले कोई शोध नहीं करता है और तथ्यों को सत्यापित भी नहीं करता है। 12 जून 2019 को डेक्कन क्रॉनिकल द्वारा प्रकाशित और कुछ अन्य पत्रों द्वारा नक़ल कर छापे गए गए दुष्प्रचार का “वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण से फर्मों के लिए ई-फॉर्म 22 ए को माफ करने का आग्रह” शीर्षक से प्रकाशित किया गया था।

ऐसा लगता है कि एक चार्टर्ड अकाउंटेंट ने फॉर्म आईएनसी – 22 ए, जिसे लोकप्रिय रूप से प्रपत्र सक्रिय (फॉर्म एक्टिव) कहा जाता है, में दिये गए एक जाँच बिंदु के विरुद्ध पांच पृष्ठ का एक लम्बा ज्ञापन प्रस्तुत किया है। कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय द्वारा अच्छी तरह से तैयार किए गए इस प्रपत्र सक्रिय (फॉर्म एक्टिव) का उद्देश्य किसी कंपनी की अनुपालन स्थिति की जांच करना है। पूर्णतः अनुपालित कंपनी के मामले में कंपनी के पंजीकृत कार्यालय के अक्षांश देशान्तर (जियो टैगिंग) को छोड़कर यह प्रपत्र सक्रिय (फॉर्म एक्टिव) लगभग स्वतः भर जाता है। हमने प्रपत्र सक्रिय के बारे में पहले भी विस्तार से चर्चा की है| उसके बाद फॉर्म भरने का समय बढ़ाये जाने के समय; हमने किसी भी पेशे या अनुपालन शासन का को विरोध किये बिना एक व्यावहारिक समस्या के समाधान के लिए एक उचित तरीके पर भी चर्चा की थी। हालांकि, इस फॉर्म को भरने की तारीख को कुछ कठिनाई के आधार पर एक बार फिर से बढ़ाये जाने (आज 15 जून 2019 से आगे) की आवश्यकता हो सकती है, लेकिन उपरोक्त दुष्प्रचार प्रचार में उल्लेखित कुछ भी निश्चित जमीन आधार पर नहीं है।

कुछ महीनों पहले, कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय ने लगभग 5 लाख कंपनियों का नाम कम्पनी पंजी से हटा दिया था| इन कंपनियों ने अपने वार्षिक खातों और वार्षिक रिटर्न तीन या अधिक वित्तीय वर्षों से पंजीकरण कार्यालय में नहीं किये थे। दिलचस्प बात यह है कि कंपनी प्रवर्तकों, शेयरधारकों, निदेशकों, लेखा परीक्षकों, देनदारों और लेनदारों सहित इन कंपनियों के 0.01% हितधारकों ने भी इसपर कभी कोई आपत्ति भी नहीं जताई| केवल मुट्ठी भर हितधारकों ने ही अपनी कंपनियों के पुनर्जीवन के लिए राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण का दरवाजा खटखटाया। यह समझा जाता है कि पंजी से हटाई गईं आधे से अधिक कंपनियों के हितधारकों ने कुछ विशेष उद्देश्यों के लिए इन कंपनियों का उपयोग किया या यूँ कहें कि दुरुपयोग किया| वास्तव में इन कंपनियों को दुरुपयोग के बाद यूं ही छोड़ दिया गया था। इन कंपनियों में, जहां कॉर्पोरेट संरचना का दुरुपयोग किया गया था, उन्हें सही मायनों में शेल कंपनियां कहा जा सकता है। बाकी बंद की गई कंपनियां या तो उचित व्यवसाय योजना के बिना काम शुरू करने वाले निर्दोष प्रमोटरों से संबंधित हैं या उनके प्रमोटर अब जीवित नहीं हैं या कारोबार करने के बाद सेवानिवृत्त हो चुके हैं जिन्होंने अपनी कंपनियों को बंद किए बिना कारोबार को बंद कर दिया है।

हालाँकि, भारत में वर्तमान में संदिग्ध अनुपालन वाली भारतीय कंपनियों के बीच प्रपत्र सक्रिय (फॉर्म एक्टिव) का शुरू से ही दबा छिपा विरोध रहा है। यह भारत में एक कठोर वास्तविकता है कि कुछ हितधारक और कंपनियां व्यापार करने की कठिनाई के बहाने बुनियादी कानूनों का पालन नहीं करना चाहती हैं। सभी आलोचनाओं के बावजूद, भारत ने कंपनी अधिनियम, 2013 आने से बाद से कॉर्पोरेट अनुपालन पर ध्यान केंद्रित करते हुए भी सरल व्यापार इंगिता में श्रेष्ठता की और कदम बढ़ाये हैं| वर्तमान में, प्रपत्र सक्रिय (फॉर्म एक्टिव) के खिलाफ चल रही आलोचना उन कुछ हितधारकों की निराशा का प्रतिबिम्ब है जो कॉर्पोरेट संरचना का दुरुपयोग कर रहे हैं। सरकार के पास इस तरह के दुरूपयोग के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने और “नई शेल कंपनियों के बनने” पर यथासमय निगाह रखने का यह सही समय है। प्रपत्र सक्रिय (फॉर्म एक्टिव) ऐसी प्रभावी और यथासमय जाँचों में से एक है।

पूर्ण कालिक कंपनी सचिव की नियुक्ति

पूर्ण कालिक कंपनी सचिव की नियुक्ति दो दशक से अधिक समय से एक महत्त्वपूर्ण अनुपालन आवश्यकता है। कंपनी में नियुक्त कंपनी सचिव कंपनी के अनुपालन की स्थिति पर यथासमय निगाह रखते हैं और प्रबंधन को कानून का पालन करने के लिए यथासमय सलाह देते हैं। पूर्ण कालिक कंपनी सचिव गैर-अनुपालन से कंपनियों, उनके प्रमोटर और प्रबंधन को आगाह करते हैं। हालाँकि, एक कर्मचारी के रूप में वह गैर-अनुपालन को रोकने में असमर्थ हो सकते है, लेकिन वह निश्चित रूप से किसी भी नियोजित गैर-अनुपालन पर लाल झंडी जरूर दिखाते हैं| हालाँकि, लाल झंडी उठाने की उनकी भूमिका का इस्तेमाल कुछ विशेष हितधारकों द्वारा एक नकारात्मक पेशे के रूप में किया जाता है, जो उनके दुष्प्रचार के हिसाब से व्यवसाय और “व्यावसायिक लाभ” में बाधा डालते हैं। क्या फुटबॉल मैच में रेड कार्ड दिखाने वाले रैफरी को नकारात्मक व्यक्ति कहा जा सकता है? या कि वह खिलाड़ियों को सुचारू रूप से सुरक्षित और प्रसन्नता पूर्वक खेलने में मदद करने वाला सकारात्मक व्यक्ति को है?

पूर्ण कालिक कंपनी सचिव की नियुक्ति पूरी तरह से कानून की भावना का अनुपालन है और इससे अधिक ईमानदार व्यवसाय के लिए यथासमय कानूनी मदद और अनजाने में होने वाले उल्लंघन से खुद को बचाएं रखने का जरिया है। विवेकपूर्ण प्रबंधन वाली कई कंपनियां कानूनी आवश्यकता न होने पर भी या तो स्वेच्छा से कंपनी सचिव को नियुक्त करती हैं या यथासमय मदद पाने के लिए अभ्यासरत कंपनी सचिव की सेवाएं लेती हैं।

संख्या की कमी

आमतौर पर यह दावा किया जाता है कि सक्रिय कंपनियों की कुल संख्या लगभग 10 लाख है लेकिन उपलब्ध कंपनी सचिव संख्या मात्र 50 हजार ही हैं। हालांकि, सभी कंपनियों को एक पूर्णकालिक कंपनी सचिव को नियुक्त करने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन केवल पाँच करोड़ या उस से अधिक भुगतान पूंजी वाली कंपनियों को ही पूर्ण कालिक कंपनी सचिव रखने की कानूनी आवश्यकता होती है। यह दावा किया जाता है कि 90 हजार कंपनियों के लिए मात्र 45 हजार कंपनी सचिवों की उपलब्धता है| परन्तु आजकल दुर्भाग्य से आधे से अधिक कंपनी सचिव बेरोजगार या अर्धबेरोजगार हैं| यह लोग अपने वृद्ध माता-पिता और परेशान परिवारीजनों के सामने अपना चेहरा बचाने के लिए अभ्यास प्रमाण पत्र ले लेते हैं और व्यवसायिक संघर्ष में जुट जाते हैं। वर्तमान में किये जा रहे दुष्प्रचार के अनुसार उपलब्ध ४५ हजार कंपनी सचिवों में से 20 हजार पहले से ही कार्यरत हैं। हमारे पास लगभग 2 हज़ार के ऐसे कंपनी सचिव हो सकते हैं जो सफलतापूर्ण व्यावसायिक अभ्यास कर रहे हैं। शेष 23 हजार कंपनी सचिवों के बारे में क्या सूचना है? वह किसी लाभकारी कार्य के न होने कसे कारण जीवनयापन के लिए संघर्षरत हैं| जब तक ये सभी कंपनी सचिव उचित रूप से कार्यरत नहीं हो जाते, तब तक यह दावा नहीं किया जा सकता है कि कंपनी सचिवों की मांग और उपलब्धता में बहुत बड़ा अंतर है। पहले उपलब्धता को तो उचित उपयोग में आने दें।

प्रवासन का मुद्दा

यह दावा किया जाता है कि कंपनी सचिव विभिन्न कारणों से छोटे शहरों में जाने को तैयार नहीं हैं। यह कोई बढ़िया तर्क नहीं है। क्या छोटे शहरों में कॉरपोरेट कार्यालय या पंजीकृत कार्यालय वाली कंपनियों के साथ अन्य पेशेवर काम नहीं कर रहे हैं? मुद्दा हितधारकों की कंपनी सचिव की नियुक्ति के लिए अनिच्छा का है और इसलिए वे कंपनी सचिव को उचित पारिश्रमिक की पेशकश नहीं कर रहे हैं।

बजट की कमी

वर्तमान दुष्प्रचार में दावा किया कि कंपनी सचिव की नियुक्ति छोटी कंपनियों के बजट में नहीं समाती।यदि संस्थापकों ने अपने व्यवसाय के लिए एक निश्चित संगठनात्मक रूप का विकल्प चुना है तो उन्हें उस संगठनात्मक संरचना से जुड़े कानून का पालन करने की आवश्यकता होती है। क्या संस्थापकों को पिछले तीन दशकों से कंपनी सचिवों की नियुक्ति के आवश्यकता के बारे में पता नहीं है? क्या पांच करोड़ रुपये की चुकता पूंजी वाली कंपनी एक कम बजट की कंपनी है? ऐसा तभी होना चाहिए जब कि कंपनी ने अनुचित वित्तीय सलाह और योजना के आधार पर उच्च भुगतान पूंजी का चयन किया हो। ऐसी कंपनियां कानूनी रूप से अनुमत मार्ग का उपयोग करके अपनी भुगतान पूंजी को कम करने के लिए स्वतंत्र हैं। लेकिन वित्त सलाहकार इस तरह से सलाह क्यों देगा क्यों कि भुगतान पूंजी बढ़ाने के लिए पहली वाली सलाह बिना उचित कसौटी के दी थी।

सरकार को उच्चतर भुगतान पूंजी कंपनियों पर निगाह रखनी चाहिए क्योंकि गैर अनुपातिक उच्च भुगतान पूंजी का उपयोग अधिकतम बैंक ऋण प्राप्त करने के लिए किया जाता है| ऐसे ऋण बाद में समस्यापूर्ण परिसंपत्तियों में बदल जाते हैं।

अन्य नियुक्तियाँ

कंपनी सचिव का अनुपालन अधिकारी रूप में विरोध प्रपत्र सक्रिय (फॉर्म एक्टिव) को ठीक से देखे बिना लक्षित प्रचार के तहत किया जा रहा है| मुख्य वित्तीय अधिकारी, मुख्य कार्यकारी अधिकारी, प्रबंध निदेशक जैसे अन्य प्रमुख प्रबंधकीय कर्मियों की नियुक्ति न होने की स्थिति में भी फॉर्म अनुपालन सम्बन्धी त्रुटियां इंगित करता है| इन अन्य पदों पर नियुक्त किए जाने वाले व्यक्तियों की बहुत अधिक आपूर्ति हो सकती है क्योंकि इन पदों के लिए कोई विशिष्ट योग्यता निर्धारित नहीं है। यह एक विशेष कारण से है – कंपनी सचिव को यथासमय बेहतर अनुपालन में मदद करनी होती है और उसे अतियोग्य होने की आवश्यकता होती है।

निष्कर्ष

इस समय सरकार को हस्तक्षेप बनाये रखना चाहिए ताकि कंपनियों को अपने रोजगार में भले ही जबरन पर बेहतर प्रशिक्षित और जानकार पेशेवर बनाने में मदद मिल सके। सभी उपलब्ध योग्य कंपनी सचिवों की नियुक्ति हो जाने के बाद भी, सरकार को कंपनी सचिव नियुक्त करने की आवश्यकता को कम नहीं करना चाहिए, बल्कि छोटी कंपनियों के लिए योग्यता मानदंड में ढील देने की यह अनुमति दी जा सकती है कि, जो प्रशिक्षित कंपनी सचिव की निगरानी के अधीन एक अर्ध योग्य कंपनी सचिव की नियुक्ति की जा सके। यह निगरानीकर्ता प्रशिक्षित कंपनी सचिव होल्डिंग या सहायक या संबंधित कंपनी में सेवातर हो सकता है। कुछ मामलों में ऐसी निगरानी अभ्यासरत कंपनी सचिव को दी जा सकती है, लेकिन प्रत्येक अभ्यासरत कंपनी सचिव को 20 से अधिक कंपनियों के लिए नहीं यह जिम्मेदारी नहीं दी जाये।

जब सरकार शैशवावस्था में होती है तो कंपनियों के मस्तिष्क में कंप्लायंस डालने के लिए सरकार से आग्रह किया जाता है अन्यथा हम शेल कंपनियों को जारी रखेंगे।

व्यवहार में एक कंपनी सचिव होने के नाते, मैं कह सकता हूं कि रोजगार में कंपनी सचिव वास्तविक समय अनुपालन सलाहकार के साथ मदद करते हैं। निवारण हमेशा इलाज से बेहतर है। सरकार अनुपालन के अभाव में अन्य पाँच लाख शेल कंपनियों को बनना वहन नहीं कर सकती है।

बेरोजगारी – निजी समस्या

“आजकल क्या कर रहे हो?” जब भी रिश्तेदार यह सवाल पूछते हैं तो भारत का हर जवान जानता है कि वांछित उत्तर है – “बेरोजगार हूँ” और देय उत्तर है – “तैयारी कर रहा हूँ”| वास्तव में देश में कोई बेरोजगार नहीं है – नालायक, अच्छा  निकल गया, प्रतियोगी, प्रतिभागी, हतोत्साहित, कुछ तो करना ही है, कुछ तो कर ही रहे हैं, और आत्महत्यारे|

हमारी मानसिकता ही ऐसे बनी हुई है – कोई शिक्षक नहीं पढ़ता, खुद पढ़ना होता है|कोई नौकरी नहीं देता – खुद ढूंढनी पड़ती है| कोई रोजगार नहीं देगा, खुद अपने लिए रोजगार पैदा करो|

रोजगार की अर्थशास्त्रीय परिभाषा से भी हमें कुछ नहीं करना| हमारे यहाँ गड्ढा खोदता लंगड़ा लूला और नाला साफ करता हुआ स्नातक अभियंता रोजगार में ही माने जाते हैं| जबकि यह साफ़ है कि पहला उदहारण सामाजिक शोषण है और दूसरा बेरोजगारी या छद्म रोजगार| बेरोजगारी की सामाजिक स्वीकृति पढ़ना शुरू करते ही शुरू हो जाती है|

शिक्षा का बुरा हाल, शिक्षक और विद्यालयों से अधिक हमारे अभिभावकों के कारण है| दस अभिभावक विद्यालय या शिक्षक से जाकर नहीं भिड़ते की पढ़ाते क्यों नहीं|स्कूल से तो हमें हमें केवल पढ़े होने का ठप्पा चाहिए| विद्यलय में हम बच्चे के लिए वातानुकूलन, आदि सुविधाएँ देखते हैं| पढाई के स्तर जानने के लिए उत्तीर्ण होने वाले छात्रों की संख्या /प्रतिशत और स्नातक होने पर पहली नौकरी देखते हैं| हम निजी विद्यालय जाना पसंद करते हैं मगर यह नहीं देखते कि उनके पास कैसा पुस्तकालय है, कैसी प्रयोगशाला है| यह निजी विद्यालय भी विद्यार्थियों को वाणिज्य और कला आदि विषय लेने ले लिए प्रेरित करते हैं| उदहारण के लिए निजी विद्यालयों में विज्ञान विषयों का घटता स्तर देख सकते हैं| यही बात निजी महाविद्यालयों और निजी विश्वविद्यालयों के बारे में है| उसके बाद भी हम निजी कोचिंग में रटने का अभ्यास और महत्वपूर्ण प्रश्नों का तोतारटंत करते हैं| मगर जिन समाचारतन्त्र  में बिहार के प्रथम आये छात्रों का ज्ञान टटोला जाता है, वह निजी क्षेत्र के विद्यालयों पर तफ्सीश करने की हिम्मत भी नहीं करते| निजी विद्यालयों में शिक्षक अभिभावक बैठकों में अभिभावक मात्र उपदेश सुनने जाता है या अधिक हिम्मत करने पर उसे मात्र आश्वासन मिलता है| मगर सरकारी शिक्षकों पर लानत भेजने वाले हम निजी विद्यालय के अधपढ़ शिक्षक से प्रश्न करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते|

यहाँ से ही बेरोजगारी की स्वीकृति शुरू हो जाती है| हमारा बच्चा नालायक है, क्या पढ़ना है यह तय नहीं कर पाता और हमें इसे पैसा फैंक और दो लट्ठ मार कर किसी भी लायक बनाना है|

यहाँ से प्रतियोगिता और साक्षात्कार की तैयारी का अंतहीन सिलसिला शुरू होता है| सरकारी नौकरियां अस्वीकार्य तर्कों के साथ कम की जा रहीं है, मगर हम राजकोषीय घाटे के घटिया बहाने से बहला दिए गए हैं| क्या सरकार बिना संसाधन – मानव संसाधन के काम कर पायेगी| लगभग हर सरकारी विभाग कर्मचारियों की कमी का शिकार है| अधिकतर विभाग अनुबंध यानि गुलामीपत्र यानि संविदा पर अप्रशिक्षित कर्मचारी भर्ती कर रहे हैं| सरकार को अपने सचिव तक बाहर से अनुबंध पर लाने पड़ रहे हैं| मगर अगर सरकारी नौकरियां कम नहीं होंगी तो निजी क्षेत्र के सस्ती सेवा में कौन जाएगा| ध्यान दें कि जब सरकारी नौकरियां थीं तब लोग दोगुने वेतन में भी निजी क्षेत्र में नौकरी करने से कतराते थे| जब सरकारी नौकरियां नहीं है तो आरक्षण तो खैर बेमानी नाटकबाजी ही है|आरक्षण के समर्थन में मूर्ख और विरोध में महामूर्ख ही बात कर सकते हैं|

इस सब के बाद हमारे पास तर्क होता है कि क्या नौकरियां पेड़ पर उग रहीं हैं?  हमारे छात्र पढाई पूरी करने के बाद या तो घर पर बैठ कर तैयारी का प्रपंच करते हैं या फिर अपनी लिखित योग्यता से कमतर कोई भी रोजगार पकड़ लेते हैं| किसी शिकायत का न होना यह स्पष्ट करता है कि उन्हें पता है कि उनके कागज़ की असली कीमत क्या है|

कुछ समय पहले मैं एक कंपनी के लिए साक्षात्कार ले रहा था| मानव संसाधन विभाग की तरफ से सीधा संकेत था कि सरकारी डिप्लोमा होल्डर को निजी विद्यालय के स्नातक अभियंता से अधिक तरजीह देनी है| उनके तर्क साधारण थे| लाटसाहब ने पैसा फैंक कर कागज खरीदा है| यह बात हर अभिभावक और प्रतिभागी जानता है| किसी स्नातक ने अपने से कम पढ़े व्यक्ति के आधीन काम करने से मना नहीं किया|वह अनुभव और वास्तविक ज्ञान को समझते थे|

पिछले तीस वर्ष में सरकारें जनता को यह समझा पाने में कामयाब रहीं है कि शिक्षा और रोजगार सरकारी “खैरात” नहीं हैं, यह आपका निजी प्रश्न है|हमारे सरकारों के पास कोई नक्शा नहीं कि यह बता सकें कि अगले तीन पांच साल में कौन से और कितने रोजगार मिलने की सम्भावना हो सकती है| क्या पढाई की जाये, क्या नहीं? दूसरा इस जनसंख्या बहुल देश में भी हमने अपने कर्मचारियों को बारह घंटे काम करने की प्रेरणा दी है, जबकि अगर सब लोग केवल आठ घंटे काम करें तो डेढ़ गुना लोगों को रोजगार मिल जाये| संविदा आदि के चलते कर्मचारियों की गुणवत्ता घटी है| यह सब छद्म रोजगार और आधुनिक गुलामी या बंधुआ मजदूरी है|

देश में कश्मीरी पंडितों के पलायन से भी अधिक भयाभय तरीके से रोजगार सम्बन्धी पलायन हो रहा है| किसी भी योग्य युवा को अपने घर के आसपास उचित रोजगार अवसर नहीं मिल रहे| दिल्ली, मुंबई और अन्य महानगर पलायन से भरे पड़े हैं| सब जानते हैं कि असंतुलित विकास इस रोजगारी पलायन का कारण है| मगर न हम विकास पर प्रश्न उठा रहे हैं, न बेरोजगारी पर| विकास के नाम पर दो चार चिकनी सड़के हमारा दिल खुश कर देतीं हैं| हम पलायन कर रहे हैं, विस्थापित हो रहे हैं, हम पढ़ लिख कर अग्रीमेंट मजदूर बन रहे हैं जैसे कभी अनपढ़ गिरमिटिया मजदूर बनते थे|(अग्रीमेंट और गिरमिट एक ही अंग्रेजी शब्द के रूप हैं)

कोई प्रश्न नहीं है| प्रश्न तब ही नहीं था जब सत्तर साल पहले आरक्षण घोषित करते हुए सरकार ने ऐलान किया था कि सबको रोजगार नहीं हो पायेगा| प्रश्न तब भी नहीं है जब बेरोजगारी की सबसे भयाभय स्तिथि की सरकारी सूचना आती है| प्रश्न तब भी नहीं जब बेरोजगारी की बढ़ती संख्या देखकर सरकार पकौड़े तलने की सलाह देने लगती है

आखिर हतोत्साहित, शिकायतहीन और सस्ता मजदूर किस मालिक को अच्छा नहीं लगता – मालिक सरकार हो या बनिया|

कृपया, इस पोस्ट पर सकारात्मक आलोचना करें – नकारात्मक आलोचना हमें सुधरने पर विवश कर सकती है|

 

 

जेल घर

कभी सोचा है आपने – जेल में कौन रहता है? आतंकवादी, नक्सलवादी, घोटालेबाज, अपराधी??

अक्सर नहीं| जेल में आम तौर पर परिवारी लोग रहते हैं| मेरे और आपके जैसे|

जेल हम सब का घर हो सकता है – कभी भी कहीं भी| यह कुछ हद तक हमारे प्रिय परिवार पर निर्भर करता है तो कुछ पुलिस और समाज पर| हम में से कोई भी कभी भी अपराधी करार हो सकता है| अक्सर विश्वास किया जाता है, एक बार पकड़े जायेंगे तो पुलिस कूट कूट कर किसी का भी अपराधी तत्त्व बाहर निकाल ही लाएगी| पुलिस यह करे न करे, समाज जेल जाने पर अपराधी होने का हो पक्का वाला ठप्पा लगाएगा| उसके लिए किसी का आतंकवादी होना जरूरी नहीं| भले ही हम किसी भी अपराधी को देखते ही या पकड़ते ही गोली मार देने की बात करें, मगर अगला जेल में अगला निवास किसी का भी हो सकता है|

कभी सोचा है – जेल बाकि के जीवन का आपका घर|

“ऐसे बहुत से प्रकरण देखे जहाँ भाई खेत के छोटे से टुकड़े के लिए खून के प्यासे हो गए, कितनी बीवियों ने अपने प्रेमियों के लिए अपने पति का खून कर दिया , कितने पतियों ने अपनी बीवी को शंका के आधार पर जिन्दा जला दिया, कितनी बहुओं ने केवल अपने अहंकार की तुष्टि और पैसों के लिए वृद्ध सास ससुर, दूर दूर की ननद, देवरानी, जेठानियों को झूठे दहेज़ के केस में जेल भेजकर आनंद मनाया|”

– जेल अधीक्षक, मध्य प्रदेश

लालच में आप देश नहीं, वह सपना बेचते और तोड़ते हैं, जिसे हम और आप घर कहते हैं| या तो खुद जेल पहुँच जाते हैं या अपने किसी सगे को जेल भेज देते हैं| दोनों में से कुछ भी बात हो, सबको मिलता है – थाना कचहरी अदालत और मकान की सूनी दीवारें| फिर ज्यादा जोर चला तो पारिवारिक रंजिश शुरू हो पीढ़ी दर पीढ़ी चलती है, तब भी जब गाँव, शहर, मजहब सब बदल जाते हैं|

आपका घर और आपका पास पड़ौस दुनिया की सबसे खौफ़नाक जगह हैं| यहाँ से सीधा रास्ता उस घर जाता है जिसे आम हिन्दुस्तानी मजाक में ससुराल कहता है| यह तभी तक स्वर्ग हैं, जब तक यहाँ सब कुछ ठीक ठाक चल रहा है|

ध्यान रहे पारिवारिक झगड़ों में विजय नहीं होती – कौरव या पाण्डव – किसी का वंश नहीं बचता|

कम लिखा ज्यादा समझना|

अनुच्छेद ३७० और आतंकवाद

कानून का कोई भी विद्यार्थी यह मानेगा कि भारतीय संविधान के बारे में आपको कुछ पता हो या न पता को मूल अधिकारों के बारे में पता होना चाहिए| परन्तु मूल अधिकारों के बारे में जानने वाले भारतीय अनुच्छेद ३७० को जानने वाले भारतियों से कम होंगे| मामला वाही है कि अपने सुख दुःख से अधिक इंसान दूसरे के संभावित सुखों से परेशान रहता है|

इन दिनों जब भी अनुच्छेद ३७० की बात आती है, इसे किसी न किसी रूप में आतंकवाद से जोड़ दिया जाता है| अज्ञान या अतार्किकता यह है कि ऐसा प्रचारित होता रहा है कि इसका लाभ मात्र राज्य के एक प्रखंड में रहने वाले एक धार्मिक समुदाय को मिला है| मैं नहीं जानता की आखिर उस प्रखंड के अन्य वर्ग और अन्य प्रखंड के निवासी इसका लाभ क्यों नहीं ले सकते| इस से

मजे की बात यह है कि जिस जम्मू कश्मीर राज्य से यह अनुच्छेद जुड़ा हुआ है, वह इस प्रकार के विशेष प्रावधान वाला अकेला राज्य नहीं है| कई अन्य राज्यों को भी अन्य अनुच्छेदों के अंतर्गत विशेष अधिकार मिले हुए हैं|

अब अगर हम आतंकवाद के मुद्दे पर बात करें तो भारत में बहुत से राज्य किसी न किसी प्रकार के आतंकवाद से जूझ रहे हैं| मध्य और पूर्वी भारत में नक्सलवाद है| उत्तरपूर्व में भी अलग अलग प्रकार से आतंकवाद मौजूद है| परन्तु कश्मीर और पंजाब के आतंकवाद की गूँज दिल्ली में सबसे सुनाई देती है| जी हाँ पंजाब में आज आतकवाद नहीं है| इस राज्य को कोई संवैधानिक विशेष अधिकार नहीं था| राज्य भले ही तकनीकि रूप से अल्पसंख्यक धार्मिक समूह से सम्बन्ध रखता हो परन्तु उन्हें बहुसंख्यक भारतीय आज अपनेपन से देखते हैं|

कश्मीर और पंजाब के आतंकवाद की समानता देखते हैं –

  • भारत पाकिस्तान सीमा
  • सीमावर्ती राज्य
  • धार्मिक अल्पसंख्यक
  • विदेशी धन
  • पाकिस्तानी समर्थन
  • मूल रूप से प्राकृतिक संसाधन में धनी क्षेत्र
  • प्रारंभिक दिनों में केंद्र में कांग्रेस का शासन
  • सरकार की राजनीतिक और कूटनीतिक गलतियाँ
  • हिन्दूवादी/ राष्ट्रवादी राजनीतिक दलों के अलगाववादियों से बनते बिगड़ते लुकाछिपी सम्बन्ध
  • स्थानीय असंतोष
  • आतंकवाद को प्रारंभिक तौर पर स्थानीय समर्थन
  • स्वतंत्र देश की मांग
  • अनियंत्रित पुलिस/सेन्य कार्यवाहियां
  • हर किसी अपराधी को आतंकवादी घोषित करने की पुलिसिया प्रवृत्ति
  • निर्दोष और आम नागरिकों पर दोनों और से निशाना
  • मानव अधिकार उलंघन

दोनों आतंकवाद का एक जैसा गठन साफ़ दिखाई देता है| जबकि पंजाब कोई विशेष दर्जा प्राप्त नहीं था जबकि जम्मू कश्मीर को खास संविधानिक दर्जा प्राप्त है| इसलिए अनुच्छेद ३७० को जम्मू कश्मीर आतंकवाद के लिए दोषी नहीं माना जाना चाहिए| अनुच्छेद ३७० को हटाना केवल आतंकवादियों के हित में काम करेगा कि भारत अपने संविधानिक वचन का पालन करने से पीछे हट रहा है|

हमें समस्या के राजनीतिक हल के लिए प्रयास किये जाने चाहिए| ऐरे गैरे अपराधियों को आतंकवादी कहने के स्थान पर उन्हें कानूनी तौर पर सजाएं दी जाएँ| स्थानीय नागरिकों के साथ सकारात्मक सम्बन्ध बनाये जाएँ| इन सुझावों में कुछ नया नहीं है| इन्हें भारत पंजाब, मिजोरम आदि राज्यों में आतंकवाद के विरुद्ध अजमाया जा चुका है|