विश्व-बंदी २६ मार्च

होली पर ही बहुत दिनों से छूटा हुआ योगाभ्यास पुनः प्रारंभ कर दिया था| आसन प्राणायाम के मौसम भी अच्छा हैं चैत्र का महिना भी|

सुबह से शरीर के बारे में सोच रहा हूँ| किसी भी प्रकार के फ़्लू-जुखाम-खाँसी के लिए गहराना परिवार का अजमाया नुस्खा है – एक कली लहसुन बराबर मात्रा के अदरक के साथ बढ़िया से चबाइए और मुँह चाय के घूँट लेने के लिए खोलिए| क्या इसे अजमाना चाहिए? आदतन हमारे घर में चैत्र नवरात्र से शरद नवरात्र के बीच कच्चा लहसुन खाने की परंपरा नहीं हैं|

दो दिन से सब्जी भी साबुन के गोल में धोकर रसोई में जा रही है| रसोई को चौका इसीलिए कहते हैं कि इसे बाकि दुनिया की गंदगी से क्वारंटाइन (चौकस) रखा जाता है| आज नाश्ते रमास के चीले बनाये गए|

दोपहर वित्त मंत्रालय द्वारा गरीबों के लिए बनाई गई बकवास घोषणा को सुनकर दुःख हुआ| स्वयं सहायता समूह के लिए बिना गिरवी कर्ज की मात्रा दुगनी करने पर हँसी आई| यह कर्ज बड़ा नहीं सरल होना चाहिए| कर्मचारी बीमा राशि से अधिक धन निकालने की अनुमति से सिर्फ क्रोध आया| सरकार ने जिम्मेदारी की टोपी गरीब के सिर पहना दी है|मोदी सरकार मनरेगा की पुरानी विरोधी होने के बाद भी उसकी शरण में गई है मगर मुझे कोई आशा नहीं – कारण लॉक डाउन के दौरान मनरेगा रोजगार संभव नहीं| योजना पर हँस ने में भी बहुत रोना आया| ज़मीनी मुद्दों तक सरकार की पहुँच नहीं है|

दिन के तीसरे पहर आसमान में एक ड्रोन दिखाई दिया – मेरा अनुमान है कि निगरानी करने ले लिए पुलिस का नया तरीका रहा होगा| इस नकारात्मक समय में सकारत्मक लोगों को सड़कों पर बेफ़िक्र घूमने से रोकना होगा|

मुझे नकारात्मकता को सूंघ लेने और उसको हराते रहने की पुरानी आदत है| जीवन के समस्त नकारात्मक समय का उपयोग किया है| आज दिवेश से बात हुई| उसका आग्रह था कि कल मुझे कंपनियों स्वतंत्र निर्देशक की परीक्षा उत्तीर्ण कर लेनी चाहिए| मैं सोचने लगा तो उसने कहा, मैं आपको जानता हूँ आप आज शाम या कल सुबह इसे उत्तीर्ण का लें| पढ़ने और तनाव लेने से मना किया है| कल सुबह आठ बजे का समय तय रहा| फिर भी ,अगर मैं तनाव न लूँ तो धरती न डोलने लगे|

बारिश होने लगी है| बदलता मौसम भी स्वस्थ के लिए अच्छा नहीं| दौज का पतला सा चाँद और थोड़ा दूर तेज चमकदार शुक्र तारा दिखाई दिए| तनाव मुक्त करने के लिए प्रकृति के पास अपने तरीके हैं|

विश्व-बंदी २५ मार्च

नवसंवत्सर, नवरात्रि, गुड़ी पड़वा, उगाडी, नवरेह, सजिबू चेइरावबा कितने त्यौहार हैं आज? शांति बनी हुई है| अजान और घंटे की आवाज औपचारिकता कर कर रह गई| सड़क सूनी थीं और बहुत कम लोग निकल रहे थें| मगर बाजारों में गुपचुप भीड़ इक्कट्ठी हो रही थी|  भीड़ यानि राष्ट्रीय पराजय| पढ़े लिखों की नासमझी अभी भी नहीं थमी थी| पुलिस के अपनी फेरी निकालनी पड़ी| बाजार बार बार बंद कराने पड़े|

दोपहर बाद सब्जी बेचने वाले से थोड़ी सब्जी ख़रीदी| बताता था कि बाजार में हालत अच्छे नहीं हैं| पुलिस की सख्ती ने बाद भी भीड़ जुट रही है| सरकार में दिशा नहीं, जनता में कोई समझ नहीं|

बैंक खातों का हिसाब लगते हुए वस्तु एवं सेवाकर के तौर पर दिया गया वह पैसा बहुत अखरा जिनके बिलों पर पैसे नहीं आयें हैं| सरकार को निजी दुःख में मेरी गालियाँ इसी कर को लेकर निकलतीं रहीं हैं| आज मन बहुत कसैला हुआ| ग्राहक पैसा न दे तो सरकार से यह पैसा वापिस पाना सरल नहीं|

देर शाम पड़ौस के पार्क में कुछ युवा फ़ुटबाल खेल रहे थे और बीच बीच में जय श्रीराम का नारा लगा देते थे| शाम को टहलते लोग भी दिखाई दिए| दोपहर को भीड़ नहीं थी मगर रात ग्यारह बजे आज दिनों के बराबर ही लोग थे|

पत्नी के मुख पर चिंता की लकीरें थीं| आस्तिक ईश्वर, भाग्यवादी भाग्य और मोदीवादी मोदी पर भरोसा नहीं कर रहे| मैं संकट को स्वीकार कर चुका हूँ| न आना, शायद बहुत बढ़िया स्तिथि में संभव है| हम गंभीरता का दिखावा और अपने से खिलवाड़ कर रहे हैं|

मैं सोच रहा हूँ: एकांतवास का अर्थ भी दुनिया से कटना नहीं, वसुधैव कुटुम्बकम् पर विश्वास रखिए| पाण्डवों का एकांतवास सामाजिक दूरी का उचित उदहारण है| अहिल्या न बनें|

करोना कर्फ्यू दिवस

करोना का विषाणु और उस से अधिक उसका अग्रदूत भय हमारे साथ है| स्तिथि नियंत्रण में बताई जाती है, इस बात से सब धीरज धरे हुए हैं|

शीतला माता के पूजन का समय बीत गया है| किसी को याद नहीं कब शीतला माता आईं और गईं| कुछ बूढ़ी औरतों ने उन्हें भोग लगाया और कुछ भोग उन्होंने किए| संख्या बढ़ गई है| “रंज लीडर को बहुत है मगर आराम के साथ”|

अचानक भाषण कैसे लिखा जाए? समय तो चाहिए| जनसंपर्क विशेष अधिकारी ने समय माँगा तो सारे हाकिम ने हौले से साँस ली| चलो आठ पहर, चौबीस घंटा, साठ घड़ी का वक़्त मिला| सबने धीरज धरा|

घंटा बजा| सरकार ने भाषण दिया| अमीरों ने साजोसामान अपने गोदाम में भरे और गरीबों ने हिम्मतोहौसला अपनी अपनी गाँठ में बांध लिए| जनता ने ताली बजाई| शीतला माता मुस्कुराई, विषाणु ने धीरज धरा|

ऋतुराज ने भी धीरज धरा हुआ है| ऋतुराज बसंत ठिठका हुआ सा है| देर से आया इस बार| जाने का सोचता था रुक गया| विषाणु का डर है| मगर ऋतुराज की उपस्तिथि मात्र से माहौल में एक रूमानियत है|

भय और रूमानियत का पुराना रिश्ता है|

सुहानी सी सुबह है| इतना नीला आसमान – शायद वर्षों बाद देखा| हर हृदय निर्लिप्त है| न काम न भ्रमण न मौज मस्ती – केवल पस्ती| आलस्य भी नहीं| नेति नेति कह वेद पुकारा| उस से पहले कुछ नहीं भी नहीं था| मृत्यु प्रथम सत्य है|

साँसों में वायु प्रदूषण प्रदूषण का कोई अहसास नहीं| कहीं कोई ध्वनि प्रदूषण नहीं| आसपास ही नहीं दूर से भी परिंदों की आवाज़े आ रहीं है| आरती और अजान के बाद से कुछ नहीं सुनाई दिया| दूर रेलवे स्टेशन से आती आवाज भी दम तोड़ चुकी है| आज स्वतः ध्यान देर तक लगा|

दुनिया अपने अपने घरों में सिमट गई है| सड़कों पर शांति पसरी है और माथे पर अनागत चिंता की लकीरें| छः दूर घर से रोते बच्चे की आवाज भी स्पष्ट सुनाई देने लगी है| परिंदे अनजान आशंका के गीत गा रहे हैं| उन्हें नहीं पता शहरी सा दिखाई देने वाला मूर्ख इंसान कहाँ छिप गया है| गली के कुत्ते भी नहीं भौंक रहे| कोई सूखी रोटी फैंकने भी नहीं निकल रहा| आवारा गायें अपने भक्तों की राह जोहते हुए उदास बैठीं हैं|

लगता नहीं कोई टेलीविज़न भी देख रहा हो| जो बाहर झांक भी रहा है तो पड़ौस में आशंका की लहर दौड़ जा रही है| गुनगुनी धूप और हल्कापन लिए हुए मध्यम हवा – आनंद नहीं आध्याम का आभास दे रही है|

जिन्होंने घरों में जीवन भर का खाद्य भर लिया था, उन्हें भूख नहीं लग रही| भूखों को भोजन का पता नहीं|

दोपहर होते होते सड़क एकदम वीरान होने लगी है| बच्चे नियंत्रण में हैं| जनता कर्फ्यू के समर्थन में घुमने वाले भी शायद थक गए हैं|

पांच बजने को हैं| जनता धन्यवाद ज्ञापन की तैयारी कर रही हैं| धर्म के नाम पर वोट देने वालों के लिए विषाणु मर चुका है| ढोल मंजीरे ताशे और आधुनिक वाद्य सजने लगे हैं| पहले पांच मिनट के धन्यवाद ज्ञापन के बाद फूहड़ नाच गाना शुरू ही हुआ है कि समाचार आने लगे – सरकार वह सब कर रही है जो सरकार के आलोचक सरकार से चाहते थे| मूर्खता पर लगाम लग गई है| जितनी तेजी से नाच गाना शुरू हुआ उतनी तेजी से ख़त्म भी| मगर फिर भी कुछ नाच और नारे लग रहे हैं – मोदी है तो मुमकिन है| मोदी जी शायद सर पटकने के लिए दीवार खोज रहे हैं|

दिन शांति से ढल रहा है| शाम चुपके से उतर रही है| पर इस वक़्त पक्षी शांत हैं वो दिन भर के सन्नाटे के बाद अचानक हुए शोर शराबे से घबराये हुए हैं| झींगुर और क्षुद्र कीटों का गान सुनाई दे रहा है|

जनता कल की रोजी रोटी का हिसाब बना रही है| गरीब सोचता है कि पढ़े लिखे अमीर मालिक लोग हवाई जहाज से बीमारी लादकर क्यों ले आये| अमीर हिसाब लगा रहे हैं – इलाज कहाँ खरीदेंगे|

ट्रेन, मेट्रो , बस, दफ्तर बंद हैं| बकवास चालू है|

Janta Curfew

मैं रविवार २२ मार्च २०२० को जनता कर्फु के पालन की घोषणा करता हूँ और स्वैक्षिक रूप से २१ मार्च २०२० को भी जनता कर्फु का पालन करूंगा|
क्या आप इसका पालन करेंगे?

आप इस मीम को शेयर कर सकते हैं:

I m participating in #JanataCurfew on Sunday. Are you_ I will observe it on Saturday also. (1)

भय और सूचना

अगर दुनिया में मरने वालों को गिना जाए तो आतंक से अधिक लोग भय का शिकार हैं| भयाक्रांत मैं भी हूँ और आप भी|

भय और आतंक दुनिया के सबसे बड़े व्यवसाय हैं| आतंक अपराध के रूप में आता है और भय सूचना के रूप में| दुनिया में सबसे कम डरे हुए लोग सूचना के अभाव में जीते हैं, और बहादुर इन सूचनाओं के बाद भी भय पर विजय पाते हैं| भय से अधिक भयानक क्या होगा, भय का फैलाया जाना, भय को फ़ैलाने वाला? मगर भय जारी है|

भय फ़ैलाने की प्रक्रिया सरल होती है – आपका हित, हित चिंतन, हित हानि की सूचना और हित साधन का आग्रह| हमें सही और गलत सूचनाओं की परख करनी होती है| परन्तु अधिकांश सूचनाओं की परख करने का कोई तरीका नहीं होता|

आज सामाजिक प्रचार माध्यम बहुत तीव्रता से सूचना का प्रसार करते हैं| सूचनाओं का आवागमन इतनी तीव्रता से हो रहा है कि उनकी पुष्टि का समय नहीं है| हम सूचना माध्यम भी निर्भर नहीं कर पा रहे कि वह स्वविवेक का प्रयोग करकर सही सूचना ही पंहुचायेंगे| ऐसे में एक अतिरिक्त भय अधिक बढ़ता है – अगर सूचना सही निकली तो क्या होगा?

सूचना देने के लिए प्रयोग की गई भाषा का भी बड़ा असर होता है| शब्द चयन किसी भी सूचना को भयानक बना देता है| अधिकांशतः मीठे शब्द खतरनाक होते हैं और डरावने शब्द गीदड़ भभकी| उदहारण के लिए रंग निखारने की क्रीम अक्सर मीठे शब्दों में डर फैलातीं हैं और समाज को अरबों की चपत लगतीं हैं| दूसरी ओर हफ्ता और महिना वसूल करने वाले अपराधी भारी भरकम भाषा के बाद भी मीठे रिश्वतखोरों का मुकाबला करने में असमर्थ रहते हैं|

हाल में सारी दुनिया को भयभीत करने के पीछे भी सरकारों और अन्तराष्ट्रीय संस्थाओं की मीठी बातें हैं| कोरोना विषाणु से दुनिया भयाक्रांत है, अगर किसी को भी अधिक खतरनाक प्रदूषण की चिंता नहीं है| मैं इस भय को गलत और अनावश्यक नहीं कहता परन्तु प्रदूषण दुनिया को अधिक बीमार करता रहा है और लाखों की मृत्यु का कारण बना है|

अच्छा यह है कि इस भय के चलते शायद समय पर इस विषाणु के प्रसार को रोक लिया जाए|

तेजहीन तेजस

भारत स्वभावतः एक वर्णभेदी और वर्गभेदी राष्ट्र है| हमारे सामाजिक जीवन में वर्गभेद कदाचित वर्णभेद से कहीं अधिक है| जब से शिक्षा का निजीकरण बढ़ा है, लोग वर्ग के आधार पर अपने बच्चों के लिए विद्यालय का चयन करते हैं| जाति या वर्ण की बात वर्ग के बिना शहरी जीवन में करना बेकार है| शहरी सामाजिकता में जाति या वर्ण की बात करना असामाजिक माना जाने लगा है परन्तु वर्ग का अंदाज आसानी से लगाया जा सकता है|

कुछ वर्ष पहले जब में गृहनगर से ईएमयू ट्रेन से लौट रहा था तब किसी ने टोका की आजकल शताब्दी क्यों छोड़ दी आपने| सीधा सवाल यह कि आप निम्नवर्गीय ट्रेन में क्यों सफ़र कर रहे हैं? यही बात टाटा की बेहतरीन नेनो कार के बारे में भी है| इस साल २०१९ में पूरे देश में मात्र एक नेनो बिकी है| अगर देखा जाए तो आर्थिक मंदी, बढ़ते हुए निम्नमध्यवर्ग के चलते नेनो की बिक्री नहीं बढ़ी| कारण वर्ग व्यस्था में नीचे गिर जाने का भय| शायद ही किसी भारतीय घर में नेनो पहली कार के रूप में दिल से स्वीकार हुई है|वर्यग भेद की यह बात रेल और हवाई यातायात में भी लागू होती है|

अगर आप दिल्ली-मुंबई, दिल्ली लखनऊ, दिल्ली जयपुर, जैसे कमाऊ मार्गों के यातायात की बात करें तो हवाई यात्रा बहुत लोकप्रिय हैं जबकि इन मार्गों पर राजधानी या बढ़िया शताब्दी गाड़ियाँ सुलभ हैं और अधिक सुविधाजनक भी हैं| दिल्ली आगरा और दिल्ली जयपुर जैसे मार्गों पर उच्चस्तरीय टैक्सी और वातानुकूलित बसों को बहुत पसंद किया जाता है| रेल यात्रा उच्चवर्ग के लिए अधम होने जैसा विकल्प है|

दिल्ली आगरा मार्ग पर गतिमान एक्सप्रेस के सफल होने का कारण देशी विदेशी पर्यटकों के बीच इस ट्रेन का लोकप्रिय होना है| सरकार ने गतिमान एक्सप्रेस की सफलता के बाद अन्य उच्च स्तरीय गाड़ियों की सफलता की जो उम्मीद बाँधी है, वह भारतीय सन्दर्भ में उचित नहीं प्रतीत होती|

सरकार रेलवे को लाभ में लाना चाहती है| इसलिए सरकार का ध्यानबिन्दु उच्चवर्ग है जिसे बेहतर सुविधाओं के साथ रेलवे से जोड़ने की तैयारी चलती रही है| तेजस एक्सप्रेस इस प्रयास का एक हिस्सा है| लाभ को मूल आधार मानकर इसका निजीकरण भी किया गया है| परन्तु क्या यह महंगी ट्रेन मन चाहा लाभ दे पायेगी| मुझे इसमें संदेह है|

तेजस एक्सप्रेस को  हवाई मार्ग और स्वर्ण शताब्दी से कड़ी टक्कर मिलनी है| साथ ही इसका समय दिल्ली में कार्यालय बंद होने के समय से काफी पहले है| यदि आप किसी भी मंहगी गाड़ी को लाभ में रखना चाहते हैं तो उसका समय इस हिसाब से होना चाहिए कि उसके संभावित प्रयोगकर्ता समूह के समय से उसका मेल हो|हवाईयात्रियों को रेल की पटरी पर उतारने के लिए रेलवे को कड़ी मसक्कत करनी होगी| उनके हवाई यात्रा में लगने वाले समय और उसमें मिलने वाले आराम का बढ़िया विकल्प देना होगा| इसके साथ इसे हवाई यात्रा दर के मुकाबले लगभग पिचहत्तर प्रतिशत कम लागत पर उपलब्ध करना होगा|परन्तु मुझे इसका कोई आर्थिक लाभ और समाजिक औचित्य नहीं लगता|

बेहतर है कि रेलवे गैरवातानुकूलित परन्तु तेज गति ट्रेन विकसित करने पर ध्यान दे| इन ट्रेन के लिए रेलवे उचित सुविधाएँ देते हुए इन्हें उचित किराये पर चलाये|अंधाधुंध अनारक्षित टिकट जारी करने की पुरानी प्रवृत्ति पर या तो रोक लगाये या अनारक्षित स्थानों की संख्या में वृद्धि करे|
वास्तव में एक करोड़ लोगों से एक रूपये प्रति व्यक्ति का लाभ लेना सरल है एक व्यक्ति से एक करोड़ रुपये का लाभ लेना कठिन|

अन्त में:

 

बंद होते बैंक

मैं आजतक नहीं जानता कि वास्तव में बैंक होते क्यों हैं?

पहले भारत या पूरे एशिया में बैंक नहीं थे तब आम जनता की आवागमन और व्यापारिक जरूरत के लिए हवाला तंत्र था| यह वास्तव में पेमेंट बैंक सिस्टम है जिसे पश्चिमी बैंक प्रणाली के हित के लिए अवैध, गैरकानूनी और आपराधिक बनाकर पेश किया गया| जबकि इसे उसी प्रकार विनियमित किया जा सकता था, जैसे आज पेमेंट बैंक को किया जाता है| हर शहर और गाँव में कर्जदाता साहूकार भी थे जिनके ब्याज के कड़वे किस्से महशूर किये गए थे| सहूकारियां और हवाला आज भी है और कानूनन मना भी है|

बैंकतंत्र का मूल उद्देश्य बड़े समूह से धन बटोर कर उद्योग आदि में प्रयोग करने के लिए देना था|  यह एक उलट-साहूकारी है| आलोचक इसे समाजवाद से धन जुटाकर पूंजीवाद को देना भी कहते हैं| आज इसमें साहूकार की सूदखोरी, हवाला की हौल और पूंजीवाद की लम्पटता है| बाद में जब पूंजीपति असफल होता तो बैंक का बाजा बज जाता और पूंजीपति सो जाता| बहुत बार यह धोखाधड़ी का मामला भी होता|

आखिर बैंक क्यों असफल होते हैं?

भारत में बैंक बंद होना कोई नया घटनाक्रम नहीं हैं| आरम्भ में अधिकतर बैंक पूंजीपतियों ने समाज में मौजूद धन को ब्याज के बदले इकठ्ठा करकर अपने व्यवसाय के लिए प्रयोग करने के लिए खोले थे| इस तंत्र में कमी थी कि आमजन के लिए पैसा लगाना सरल था निकलना कठिन| इसके बाद बैंक का राष्ट्रियकरण हुआ| हालत बदले और लगा कि धोखेबाज रोक लिए जायेंगे| परन्तु छोटे बैंक, साहूकार आदि बने रहे| बड़े बैंक भी कोई नया व्यासायिक नमूना नहीं बना पाए| पूंजीपति बैंक का लाभ लेते लूटते रहे| हाल का दिवाला शोधन कानून भी कोई बहुत सफल नहीं दिखाई देता| हाल का पंजाब महाराष्ट्र सहकारी बैंक भी सामाजिक पूँजी पर पूंजीवादी कुदृष्टि की पुरानी कथा है|

फिलहाल इस सब का कोई इलाज नहीं दिखाई देता| सरकारी नीतियाँ जब तक पेमेंट बैंक, बचत बैंक और साहूकारी और निवेश व्यवस्था को अलग नहीं करेंगी यह सब चलेगा| परन्तु यह सब करना कोई सस्ता सौदा भी तो नहीं है|

आम जन को अपना ध्यान खुद रखना होगा| बैंक का बिचौलियापन पूँजी बाजार से ख़त्म होना चाहिए| इसके लिए निवेशक के रूप में आमजन को जागरूक होना होगा|