विश्व-बंदी ३० मार्च

लाइव हिस्ट्री इंडिया ब्लॉग पर १८९७ में फैली प्लेग की बीमारी के बारे में पढ़ रहा था| इस बीमारी ने ही कांग्रेस को अंग्रेजपरस्तों के क्लब के स्थान पर होमरूल के लिए लड़ने वाले संगठन में बदल दिया था| प्लेग और होमरूल के बीच की कड़ी बना था एपिडेमिक डिजीज एक्ट, १८९७ नाम का अत्याचारी क़ानून जिसे वर्तमान सरकार ने पुनः लागू किया है| क्या भारत को पुनः कोई बाल गंगाधर तिलक मिलेगा?

बीमारों के संख्या ने हजार का आँकड़ा पार कर लिया है| सरकार ने दिल्ली के दो अधिकारिओं को बर्खास्त कर दिया है और दो के विरुद्ध कार्यवाही का आदेश दिया है – आरोप कि उन्होंने मजदूरों की भीड़ आनंद विहार और कौशाम्बी के बस अड्डों पर लगवाई|

सोचता हूँ अगर मेरे पिता होली अकेले अलीगढ़ होते या मेरा पूरा परिवार अलीगढ़ रहता होता तो क्या मैं खुद पैदल चलकर अलीगढ़ नहीं जाता? न आप ख़ुद अकेले मरना या बीमार होना चाहते हैं न किसी परिवारीजन को अकेले मरते या पड़े देखना चाहते हैं| दिल्ली में बिना कमाई के रहना, खाना, नहाना और पुलिस से पिटते रहता तो बाद की बात हैं| जननी जन्मभूमि स्वर्गादपि गरीयसी – जननी वो जमीन हैं जहाँ आपकी नाल गढ़ी हुई है| सरकार बीमारी पर नहीं राजनीति पर ध्यान दे रहीं है| बीमारी लम्बी चली और उसने मध्यवर्ग को लपेटा तो मोदीभक्त अपने नाना-दादा की तरह नेहरू-भक्त बनने में देर नहीं करेंगे|

इधर आज सोमवार भी है| अधिकारीयों को नहीं पता कि कर्मचारी से कितना काम लेना हैं – १. घरेलू सहायक न होने की वजह कर्मचारिओं के पास समय कम हैं; २. घर से काम करने की आदत नहीं, ३. उनके पास घर में कार्यालय की वैकल्पिक व्यवस्था नहीं है; और ४. अधिकारीयों और कर्मचारियों दोनों को समय का पूरा भान नहीं हो रहा|

राज्य सरकारें गाँव घर पहुँचने वाले लोगों  के साथ बुरा बर्ताव कर रहीं हैं| उन्हें डर है कि ये बीमारी के संवाहक हो सकते हैं| क्वारंटाइन के नाम पर बाड़ों, जेलों, कैम्पों में एक साथ ठूंस दिया जा रहा है| हम विष्फोट की और बढ़ रहे हैं| सामुदायिक संक्रमण अपनी शुरुआत से साथ ही बुरे दौर में प्रवेश कर सकता है|

जर्मनी के एक राज्य के वित्त मंत्री ने गिरती अर्थव्यवस्था के चलते आत्म हत्या कर ली है| उधर मेरे पड़ोस में निजामुद्दीन बस्ती को पुलिस ने घेर लिए है, क्योंकि २०० लोगों को संक्रमण पाया गया है| जो लोग इनका धर्म पूछ रहे हैं उनसे अनुरोध है कि करोना के संवाहक हर धर्म में हैं और अधिकतर संक्रमण सरकार द्वारा कदम उठाने से पहले फैला है| इस सब में भारत सरकार, राज्य सरकार और जनता सभी की समान भागीदारी है| यह लड़ने का समय नहीं| कोई खुद बीमार नहीं पड़ना चाहता| हाँ, अगर अगर बीमार के प्रति घृणा फैलनी शुरू होगी तो कठिनाई बढ़ेंगी|

विश्व-बंदी २९ मार्च

ट्रेन के डिब्बों को १० हजार आइसोलेशन कैंप में बदला जा रहा है? क्या अस्पताल इतने कम पड़ने वाले हैं? बिस्तरों की कमी होने पर यह उचित हो सकता हैं – परन्तु बेहद चिंताजनक है| इस समय तक हजार लोग बीमार हो चुके हैं और सौ करीब ठीक हुए हैं| करोना से दोपहर तक २५ लोग मरे, इसके अतिरिक्त २२ लोग सरकार द्वारा किये गए आक्रामक लॉक डाउन से मारे गए हैं| 

प्रधानमंत्री ने निर्लज्ज होकर जनता से “इस उचित निर्णय से होने वाली कठिनाई” के लिए माफ़ी मांगी है|

इतिहास इस माफ़ी को उसी तरह याद रखेगा जिस तरह माता कुंती द्वारा अपने परित्यक्त पुत्र कर्ण से मांगी गई माफ़ी को याद करता है| उचित निर्णय यदि गलत तरीके से लिए जाये तो उचित नहीं रहते| लक्ष्य ही नहीं साधन, साध्य और समय का भी महत्त्व है| आपातकालीन निर्णय लेने में त्रुटियाँ हो सकती हैं, परन्तु यह निर्णय बीस दिन देर से लेने के बाद भी बिना योजना बनाये लिया गया| बिना गलती सुधारे मांगी गई माफ़ी का कोई मतलब नहीं| अब तो गलती सुधारने का समय भी निकलता जा रहा है| तत्काल ट्रेन चला कर फँसे हुए नागरिकों को उनके घर तक पहुँचाना चाहिए था| बसों के भरोसे यह काम देरी करेगा|

आज खुद प्रधानमंत्री ने कहा है परन्तु अमल करने की जिम्मेदारी सिर्फ जनता के सिर पर डाल दी:

किसी को नहीं पता क्या पिछले चार साल से हर दिन लगाये जाते इस आपातकाल में जनता को जीने का अधिकार कब ख़त्म हुआ? बीमारी का बहाना बनाकर लम्पटता को न छिपाया जाए तो बेहतर है| ठीक है कि घर से बाहर निकलना ख़तरनाक है| मगर हालत इतने क्यों बिगड़ने दिए गए?

एक मित्र से बात हुई| पति-पत्नी दौनों उत्तर प्रदेश स्वास्थ्य सेवाओं में हैं| पुलिस नाम पता और घर से निकलने की वजह की जगह पूछने डंडा चलाती है|

कोई भी तानाशाह हो, उसके पास हर समस्या का सबसे मानवीय समाधान भी सिर्फ़ डंडा है|

विश्व-बंदी २८ मार्च

कौन कहता है कि यह दुःखभरा समय है? प्रकृति प्रसन्न है| दिल्ली के इतिहास में मार्च में कभी इतनी बारिश दर्ज नहीं दर्ज़ की गई| बसंत और वर्षा की प्रणय लीला चल रही है| यति और रति दोनों के लिए उचित समय है| इन्हीं फुर्सत के रात-दिन ढूंढने के लिए पिछली सात पुश्तें परेशां थीं|

पर्यावरण प्रदूषण का स्तर विनाशकारी चार सौ से घट कर चालीस पर आ चुका है| मेरे फैफड़े पिछले तीस साल ने पहली बार इतना प्रसन्न हैं| बार बार बदलते मौसम के बाद भी शायद ही कोई प्रदूषण से खांस रहा है|

परन्तु सावधानी हटने का ख़तरा हर घर के दरवाज़े पर खड़ा है| आजकल सब्ज़ी तरकारी भी घर के दरवाज़े पर ही शुद्ध की जा रही है – गंगाजल का स्थान एंटीसेप्टिक सेनिटाइजर ने ले लिया है| कुछ घरों में दरवाजे पर नहाने का भी इंतजाम है – जैसे शव-यात्रा से लौटने के समय होता है|

लोग भूले-बिसरों को फ़ोन कर कर हालचाल पूछ रहे हैं| चिंता नहीं भी है, कोई मलाल नहीं रखना चाहता|

बीमारी का आंकड़ा बढ़ रहा हैं| सरकार भी तो धर्मग्रन्थ के सहारे आ टिकी है| सरकारी दूरदर्शन “रामायण” “महाभारत” से सहारे जनता को घर में रोकना चाहती है| क्या पता गीता-पाठ (क़ुरान और बाइबिल) भी शुरू हो जाए? सब जिन्दा सलीब पर लटके हैं| देश भर के भूखे प्यासे गरीब अपने घरों के बड़े बूढों की चिंता में पैदल ही घर की दिशा में बढ़ रहे हैं| आजादी के बाद, कश्मीर के बाहर यह सबसे दुःख भरा पलायन है|

धृतराष्ट्र ने राज्य सरकारों से कहा है कि पलायन करने वालों को भोजन – पानी देकर रोका जाय| मगर उस बूढ़ी माँ – पिता का क्या जो आसराहीन गाँव में बैठे हैं| रोकेंगे कहाँ, कैम्पों में?? अगर अनहोनी हुई तो यह हिटलर के कैंप साबित होंगे|

सामान से भरे ट्रकों को लिए लाखों ट्रकचालक भूखें प्यासे सड़कों पर पड़े हैं? क्या मगर अमीरों और मध्यवर्ग को अपने गाल फुर्सत नहीं| पहले सत्ता नाकारा और  निकम्मी हुआ करती थी| अब जनता भी ऐसी ही है – सत्तर साल में यथा राजा, तथा प्रजा का चक्र पूरा हुआ|

शाम देश के सबसे बड़े टैक्सी ऑपरेटर ओला का सन्देश मिला, उनके ड्राइवर बिना काम के घर में बैठे हैं, सिर पर कार लोन भी है| उनके खाने का इंतजाम करने के लिए दान का अनुरोध किया जा रहा है|

विश्व-बंदी २७ मार्च

तनाव को मुखमंडल की आभा बनने से रोकना मेरे लिए कठिन है| ७५ मिनिट की परीक्षा ५५ मिनिट में पूरी हुई| अब मैं किसी भी कंपनी में निर्देशक बन सकता हूँ| समयाभाव में अटका पड़ा यह काम पूरा हुआ|

कुछ और रुके पड़े काम पूरे किए जाने है| मृत्यु और काल आपके सबसे बड़े साथी हैं|

बारिश रुकने के बाद दोपहर में इतना नीला आसमान पहली बार दिखा| सोचता हूँ कहाँ होंगे वो लोग जो प्रदूषण के लिए किसान को कोसते थे? प्रकृति अंधपूंजीवाद पर भरी पड़ रही है| दुनिया की शानोशौकत बड़ी बड़ी गाड़ियाँ मूँह लटकाए घरों के बाहर धूल खाने लगी हैं|  प्रकृति ने पढ़े लिए समझदार आकाशगामी पैसे वालों को बीमारी फ़ैलाने के लिए अपना वाहन चुना है – माता शीतला का वाहन भी तो गधा ही है|

बड़े शहरों से जो लोग पैदल हजार पाँच सौ किलीमीटर जा रहे हैं क्या उनकी आने वाली पीढ़ियाँ वापिस बड़े शहरों की तरफ आसानी से रुख कर पाएंगीं? क्या विकास को मजबूर होकर छोटे मझोले शहरों की तरफ रुख करना पड़ेगा? क्या हानिकारक उद्योगों को बंद रखने पर जोर दिया जाने लगेगा? सब कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि हमें अच्छे पर्यावरण की कितनी आदत पड़ती है|

शाम तक गोल मोल सरकार ने माना कि विदेशों भ्रमण से लौटे वाले सभी यात्रियों नहीं खोजा सा सका है| हैरानी की बात यह है कि इतना खतरा उठाकर भी लोग क्यों छिपे पड़े हैं? उड़ीसा बालासोर में सरकार को एक क्लिनिक का लाइसेंस बंद करवाना पड़ा क्योंकि उस में विदेश भ्रमण से लौटे एक यात्री का अनिधिकृत रूप से इलाज किया गया था|

शाम तेज बारिश हुई और शानदार चाँद तारे दिखाई दिए| शायद यमुना का गन्दा काला पानी वापिस पारदर्शी श्यामल रंग में बदलने लगा हो|

क्या, हमें पूंजीवाद के सकल घरेलू उत्पाद की अवधारणा से इतर सकल घरेलू प्रसन्नता की और देखना होगा?

भविष्य बहुत कुछ कह सकता है|

विश्व-बंदी २६ मार्च

होली पर ही बहुत दिनों से छूटा हुआ योगाभ्यास पुनः प्रारंभ कर दिया था| आसन प्राणायाम के मौसम भी अच्छा हैं चैत्र का महिना भी|

सुबह से शरीर के बारे में सोच रहा हूँ| किसी भी प्रकार के फ़्लू-जुखाम-खाँसी के लिए गहराना परिवार का अजमाया नुस्खा है – एक कली लहसुन बराबर मात्रा के अदरक के साथ बढ़िया से चबाइए और मुँह चाय के घूँट लेने के लिए खोलिए| क्या इसे अजमाना चाहिए? आदतन हमारे घर में चैत्र नवरात्र से शरद नवरात्र के बीच कच्चा लहसुन खाने की परंपरा नहीं हैं|

दो दिन से सब्जी भी साबुन के गोल में धोकर रसोई में जा रही है| रसोई को चौका इसीलिए कहते हैं कि इसे बाकि दुनिया की गंदगी से क्वारंटाइन (चौकस) रखा जाता है| आज नाश्ते रमास के चीले बनाये गए|

दोपहर वित्त मंत्रालय द्वारा गरीबों के लिए बनाई गई बकवास घोषणा को सुनकर दुःख हुआ| स्वयं सहायता समूह के लिए बिना गिरवी कर्ज की मात्रा दुगनी करने पर हँसी आई| यह कर्ज बड़ा नहीं सरल होना चाहिए| कर्मचारी बीमा राशि से अधिक धन निकालने की अनुमति से सिर्फ क्रोध आया| सरकार ने जिम्मेदारी की टोपी गरीब के सिर पहना दी है|मोदी सरकार मनरेगा की पुरानी विरोधी होने के बाद भी उसकी शरण में गई है मगर मुझे कोई आशा नहीं – कारण लॉक डाउन के दौरान मनरेगा रोजगार संभव नहीं| योजना पर हँस ने में भी बहुत रोना आया| ज़मीनी मुद्दों तक सरकार की पहुँच नहीं है|

दिन के तीसरे पहर आसमान में एक ड्रोन दिखाई दिया – मेरा अनुमान है कि निगरानी करने ले लिए पुलिस का नया तरीका रहा होगा| इस नकारात्मक समय में सकारत्मक लोगों को सड़कों पर बेफ़िक्र घूमने से रोकना होगा|

मुझे नकारात्मकता को सूंघ लेने और उसको हराते रहने की पुरानी आदत है| जीवन के समस्त नकारात्मक समय का उपयोग किया है| आज दिवेश से बात हुई| उसका आग्रह था कि कल मुझे कंपनियों स्वतंत्र निर्देशक की परीक्षा उत्तीर्ण कर लेनी चाहिए| मैं सोचने लगा तो उसने कहा, मैं आपको जानता हूँ आप आज शाम या कल सुबह इसे उत्तीर्ण का लें| पढ़ने और तनाव लेने से मना किया है| कल सुबह आठ बजे का समय तय रहा| फिर भी ,अगर मैं तनाव न लूँ तो धरती न डोलने लगे|

बारिश होने लगी है| बदलता मौसम भी स्वस्थ के लिए अच्छा नहीं| दौज का पतला सा चाँद और थोड़ा दूर तेज चमकदार शुक्र तारा दिखाई दिए| तनाव मुक्त करने के लिए प्रकृति के पास अपने तरीके हैं|

विश्व-बंदी २५ मार्च

नवसंवत्सर, नवरात्रि, गुड़ी पड़वा, उगाडी, नवरेह, सजिबू चेइरावबा कितने त्यौहार हैं आज? शांति बनी हुई है| अजान और घंटे की आवाज औपचारिकता कर कर रह गई| सड़क सूनी थीं और बहुत कम लोग निकल रहे थें| मगर बाजारों में गुपचुप भीड़ इक्कट्ठी हो रही थी|  भीड़ यानि राष्ट्रीय पराजय| पढ़े लिखों की नासमझी अभी भी नहीं थमी थी| पुलिस के अपनी फेरी निकालनी पड़ी| बाजार बार बार बंद कराने पड़े|

दोपहर बाद सब्जी बेचने वाले से थोड़ी सब्जी ख़रीदी| बताता था कि बाजार में हालत अच्छे नहीं हैं| पुलिस की सख्ती ने बाद भी भीड़ जुट रही है| सरकार में दिशा नहीं, जनता में कोई समझ नहीं|

बैंक खातों का हिसाब लगते हुए वस्तु एवं सेवाकर के तौर पर दिया गया वह पैसा बहुत अखरा जिनके बिलों पर पैसे नहीं आयें हैं| सरकार को निजी दुःख में मेरी गालियाँ इसी कर को लेकर निकलतीं रहीं हैं| आज मन बहुत कसैला हुआ| ग्राहक पैसा न दे तो सरकार से यह पैसा वापिस पाना सरल नहीं|

देर शाम पड़ौस के पार्क में कुछ युवा फ़ुटबाल खेल रहे थे और बीच बीच में जय श्रीराम का नारा लगा देते थे| शाम को टहलते लोग भी दिखाई दिए| दोपहर को भीड़ नहीं थी मगर रात ग्यारह बजे आज दिनों के बराबर ही लोग थे|

पत्नी के मुख पर चिंता की लकीरें थीं| आस्तिक ईश्वर, भाग्यवादी भाग्य और मोदीवादी मोदी पर भरोसा नहीं कर रहे| मैं संकट को स्वीकार कर चुका हूँ| न आना, शायद बहुत बढ़िया स्तिथि में संभव है| हम गंभीरता का दिखावा और अपने से खिलवाड़ कर रहे हैं|

मैं सोच रहा हूँ: एकांतवास का अर्थ भी दुनिया से कटना नहीं, वसुधैव कुटुम्बकम् पर विश्वास रखिए| पाण्डवों का एकांतवास सामाजिक दूरी का उचित उदहारण है| अहिल्या न बनें|

जनता कर्फ्यू और लॉकडाउन के बीच

रविवार को रात उतरते उतरते जनता कर्फ्यू की सफलता का जोश उतरने लगा था| बहुत कम होता है सरकार गंभीर और जनता अधीर हो| कहाँ कर्फ्यू कहाँ लॉकडाउन है, यह चर्चा का विषय है| जनमानस में वास्तविकता तस्वीर ले चुकी है|

क्या समय है यह? कश्मीर के बाहर लॉकडाउन और कर्फ्यू के अंतर को किसी भारतीय ने अनुभव नहीं किया था| ऑडियो या विडियो कॉन्फ़्रेंसिंग के साथ सब के दफ़्तर बैठकों, दस्तरखानों और ख़्वाबगाहों में सज गए हैं| मैं अपने मुवक्किल कंपनियों के लिए ‘कोविद-१९ के प्रति लड़ने के तैयारी के घोषणापत्र” भर कर ऑनलाइन जमा कर रहा हूँ| क़ानून, सरकार और मुवक्किल करवट बदल रहे हैं| कुछ देर पहले अनिवार्य बताया गया यह घोषणापत्र अब मर्जी का मालिक हो गया है| राज आग्रह को भी राजहठ मानकर उसे जमा किया जा रहा है|

खबरें अच्छी नहीं हैं| शेयर बाजार लुढ़कने और गिरने की बात आज पुरानी हो चुकी थी – लगता था कि तीसवें माले के कूदने वाले को छब्बीसवें माले पर जैसे तैसे रोका गया है| महीने भर में बाजार चालीस हजार से छब्बीस हजार पर हैं| शेयर बाजार में लगा बहुत सारा पैसा डूब चुका है|

पिछले एक महीने में बहुत कुछ बदल चुका था और अब यह सुबह से शाम बदल जाता है| माहौल में अंदेशा था और सरकार राहत देने के लिए सुझाव मांग रही थी| राज्य सरकारें अपने आपातकालीन प्रयासों को युद्ध मान चुकी थीं| अगर सख्ती नहीं की तो देश बचाना मुश्किल होगा|

जिन्हें पैसे से सब कुछ खरीदने की आदत थी या जिन्हें हर रोज पानी पीने के लिए कूआँ खोदना था – अब भी गंभीरता समझने में नाकाम लगते थे| हर कोई मुख पर डर और दर्द लाने से बच रहा था| अभी भी नकारात्मक को नकार देने की सकारात्मकता चरम पर है| या शायद उम्मीद पर अभी भी दुनिया कायम थी|

यह एक भावहीन रात थी|

मंगलकामना मंगलवार का प्रारंभ हुआ और बाजार में कुछ होने की उम्मीद थी| वित्तमंत्री को दोपहर और प्रधानमंत्री को शाम को देश में बात करनी थी| वित्तमंत्री के संयत और शान्त शब्दों में लम्बी लड़ाई के ठंडी आह थी| बहुत सारे पत्र-प्रपत्र भरने से राहत दे दी गई थी|

शाम होने को थी और मौसम ख़राब हो रहा था| ठंडी हवाओं वाली आंधी और उसके बाद बारिश| प्रधानमंत्री आठ बजे राष्ट्र के सामने थे| देश अपने आप को इक्कीस दिन के लिए बंद कर रहा रहा था| यह जनता कर्फ्यू नहीं, सरकारी लॉक डाउन है| अगर आप इक्कीस दिन घर में बंद नहीं रहते तो देश इक्कीस साल पीछे चला जाएगा| शांत संयत गंभीर शब्दों में इस दशक का सबसे प्रभावी वक्ता गंभीरतम खतरे से आगाह कर रहा था| परन्तु मन में एक टीस थी – अगर आप अनुशासित नहीं हुए तो और गंभीर कदम उठाने होंगे|

इस रात सम्वत्सर २०७६ दबे कदम इतिहास के काले पन्नों में गुम हो गया|