बाबरी दिवाली

राम और बाबर का पांच सौ साल पुराना रिश्ता लगभग अटूट है| किसी भी अदालत का कोई फैसला इस रिश्ते को नहीं तोड़ सकता| यह रिश्ता मंदिर मस्जिद का मोहताज नहीं है| यह रिश्ता दिवाली का है|

दिवाली उद्गम भले ही भगवान राम के अयोध्या वापिस आने से जुड़ा हो परन्तु किसी न किसी दिन भारतीय दिवाली को आधुनिक बनाने का श्रेय ज़हीर-उड़-दीन बाबर को जरूर दिया जायेगा| वैसे तो दिवाली को अति-आधुनिक प्रकाश-प्रदूषित बनाने का जिम्मा भी चंगेज़ी इलाकों के बाशिंदों को दिया जाना चाहिए|

जब राम अयोध्या वापिस लौटे – लगभग सभी ग्रन्थ – गाथाएं – गवैये सहमत हैं – नागरिकों ने दीवले जलाकर उन का स्वागत किया| दिवाली से जुड़े सारे शब्द दीवलों से जाकर जुड़ते हैं| चाहे किसी का दीवाला निकलना हो या किसी की दिवाली होनी हो; दीवले चुपचाप अपनी उपस्तिथि का अहसास करा देते हैं| यह अलग बात है कि बाबरी और चीनी दिवाली में दीवलों की सदेह उपस्तिथि कम होती जा रही है|

बाबर समरकंद से जब भारत आया तो अपने साथ हिंदुस्तान के लिए वो नायब तोहफ़ा लाया जिसके खिलाफ कोई शब्द सुनना किसी कट्टर हिंदूवादी या इस्लामवादी को शायद ही गवारा हो| यह बेशकीमती तोहफा है – बारूद और उसकी औलाद आतिशबाजी| बाबर या उसके दिखावापसंद वंशजों ने दिवाली के दीयों की रौशनी से मुकाबला करने के लिए आतिशबाजी के जौहर दिखाने शुरू किये| धीरे धीरे आज यह आतिशबाजी दिवाली का सबसे दुखद पर्याय बन गई है| अदालती फरमानों के बाद भी दिवाली पर आतिशबाजी होती है| राम से सहज सच्चे सुन्दर दीवलों का मजाक बाबर की आतिशबाजी आजतक उड़ाती है|

बाबर के खानदानी मंगोलों की कृपा से आजकल उनके मूल देश चीन से आने वाली प्रकाशलड़ियाँ भी तो कुछ कम नहीं| झूठीं चमक-दमक प्रकाश प्रदूषण – लाभ कोई नहीं|

पढेलिखे कहे जाने वाले लोग आतिशबाजी कर कर मलेरिया और डेंगू तो रोकने का दावा करने में नहीं चूकते| बेचारे भूल जाते हैं हमारे सीधे सादे राम जी की कृपा से मिट्टी का सस्ता सा दिया भी मच्छर मार लेता हैं और आबोहवा भी ख़राब नहीं करता|

मगर माटी के दिया कोई क्यों ले – उससे दिखावा कहाँ हो पाता है? उसकी धमक कहाँ पड़ोसी के कान में जाती है, उसकी रौशनी से कौन नातेदार चौंधियाता है? चुपचाप पड़ा रहता है – तेल की धार देखते देखते सो जाता है|

जाने कब राम जी की दिवाली वापिस आएगी|

दिवाली पर पहले लिखे गए आलेख:

रंगीन दीवले 

अहोई कथा – दीवाली व्यथा

दिवाली अब भी मानती है

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तेजहीन तेजस

भारत स्वभावतः एक वर्णभेदी और वर्गभेदी राष्ट्र है| हमारे सामाजिक जीवन में वर्गभेद कदाचित वर्णभेद से कहीं अधिक है| जब से शिक्षा का निजीकरण बढ़ा है, लोग वर्ग के आधार पर अपने बच्चों के लिए विद्यालय का चयन करते हैं| जाति या वर्ण की बात वर्ग के बिना शहरी जीवन में करना बेकार है| शहरी सामाजिकता में जाति या वर्ण की बात करना असामाजिक माना जाने लगा है परन्तु वर्ग का अंदाज आसानी से लगाया जा सकता है|

कुछ वर्ष पहले जब में गृहनगर से ईएमयू ट्रेन से लौट रहा था तब किसी ने टोका की आजकल शताब्दी क्यों छोड़ दी आपने| सीधा सवाल यह कि आप निम्नवर्गीय ट्रेन में क्यों सफ़र कर रहे हैं? यही बात टाटा की बेहतरीन नेनो कार के बारे में भी है| इस साल २०१९ में पूरे देश में मात्र एक नेनो बिकी है| अगर देखा जाए तो आर्थिक मंदी, बढ़ते हुए निम्नमध्यवर्ग के चलते नेनो की बिक्री नहीं बढ़ी| कारण वर्ग व्यस्था में नीचे गिर जाने का भय| शायद ही किसी भारतीय घर में नेनो पहली कार के रूप में दिल से स्वीकार हुई है|वर्यग भेद की यह बात रेल और हवाई यातायात में भी लागू होती है|

अगर आप दिल्ली-मुंबई, दिल्ली लखनऊ, दिल्ली जयपुर, जैसे कमाऊ मार्गों के यातायात की बात करें तो हवाई यात्रा बहुत लोकप्रिय हैं जबकि इन मार्गों पर राजधानी या बढ़िया शताब्दी गाड़ियाँ सुलभ हैं और अधिक सुविधाजनक भी हैं| दिल्ली आगरा और दिल्ली जयपुर जैसे मार्गों पर उच्चस्तरीय टैक्सी और वातानुकूलित बसों को बहुत पसंद किया जाता है| रेल यात्रा उच्चवर्ग के लिए अधम होने जैसा विकल्प है|

दिल्ली आगरा मार्ग पर गतिमान एक्सप्रेस के सफल होने का कारण देशी विदेशी पर्यटकों के बीच इस ट्रेन का लोकप्रिय होना है| सरकार ने गतिमान एक्सप्रेस की सफलता के बाद अन्य उच्च स्तरीय गाड़ियों की सफलता की जो उम्मीद बाँधी है, वह भारतीय सन्दर्भ में उचित नहीं प्रतीत होती|

सरकार रेलवे को लाभ में लाना चाहती है| इसलिए सरकार का ध्यानबिन्दु उच्चवर्ग है जिसे बेहतर सुविधाओं के साथ रेलवे से जोड़ने की तैयारी चलती रही है| तेजस एक्सप्रेस इस प्रयास का एक हिस्सा है| लाभ को मूल आधार मानकर इसका निजीकरण भी किया गया है| परन्तु क्या यह महंगी ट्रेन मन चाहा लाभ दे पायेगी| मुझे इसमें संदेह है|

तेजस एक्सप्रेस को  हवाई मार्ग और स्वर्ण शताब्दी से कड़ी टक्कर मिलनी है| साथ ही इसका समय दिल्ली में कार्यालय बंद होने के समय से काफी पहले है| यदि आप किसी भी मंहगी गाड़ी को लाभ में रखना चाहते हैं तो उसका समय इस हिसाब से होना चाहिए कि उसके संभावित प्रयोगकर्ता समूह के समय से उसका मेल हो|हवाईयात्रियों को रेल की पटरी पर उतारने के लिए रेलवे को कड़ी मसक्कत करनी होगी| उनके हवाई यात्रा में लगने वाले समय और उसमें मिलने वाले आराम का बढ़िया विकल्प देना होगा| इसके साथ इसे हवाई यात्रा दर के मुकाबले लगभग पिचहत्तर प्रतिशत कम लागत पर उपलब्ध करना होगा|परन्तु मुझे इसका कोई आर्थिक लाभ और समाजिक औचित्य नहीं लगता|

बेहतर है कि रेलवे गैरवातानुकूलित परन्तु तेज गति ट्रेन विकसित करने पर ध्यान दे| इन ट्रेन के लिए रेलवे उचित सुविधाएँ देते हुए इन्हें उचित किराये पर चलाये|अंधाधुंध अनारक्षित टिकट जारी करने की पुरानी प्रवृत्ति पर या तो रोक लगाये या अनारक्षित स्थानों की संख्या में वृद्धि करे|
वास्तव में एक करोड़ लोगों से एक रूपये प्रति व्यक्ति का लाभ लेना सरल है एक व्यक्ति से एक करोड़ रुपये का लाभ लेना कठिन|

अन्त में:

 

बचकाना बिचौलिया

पिछली पोस्ट बंद होते बैंक में मैंने लिखा था:  बैंक का बिचौलियापन पूँजी बाजार से ख़त्म होना चाहिए| इसके लिए निवेशक के रूप में आमजन को जागरूक होना होगा|

बैंक उद्योगीकरण के समय की पूंजीवादी जरूरत थी जो जल्द ही एक धुर-पूंजीवादी विचार में बदल गया| बैंकों ने आमजन का पैसा लेकर उद्योगपति को देना शुरू किया| लुटे पिटे आमजन के लिए धन कमाने और खुद को साहूकार समझने का यह सुहाना मौका था| परन्तु जल्द ही बैंक पूंजीपति के हाथ के खिलौने बन गए| पूंजीपति से मिले ब्याज और बैंक के खर्च से बचा ख़ुचा धन ब्याज के नाम पर जमाकर्ता को मिलने लगा| आज भी वास्तव में पूंजीपति ही ब्याज के दर तय करता है – भले ही अब यह लोबिंग के माध्यम से किया जाता है| बैंक के पास तो उधार देने के भी भारी लक्ष्य हैं कि योग्य को भी वह उधार दे देते हैं| बैंक का लिखित उद्देश्य उस समय खंडित हो जाता है जब जरूरतमंद किसान नीलाम हो जाता है और पूंजीपति ८५ प्रतिशत का माफ़ीनामा ले लेता है|

इस्लाम स्पष्टतः और हिन्दू आदि धर्म किसी न किसी रूप में ब्याज आधारित तंत्र के विरोधी रहे हैं| क्योंकि ब्याज लेना देना वास्तव में धन का कोई उत्पादक प्रयोग नहीं करता| धन का वास्तविक प्रयोग उसके उत्पादक प्रयोग में है| बैंक खुद भले ही उत्पादक कार्यों के लिए धन देते हैं परन्तु उनका उत्पादन से कोई सम्बन्ध नहीं होता| ब्याज न निवेशक को पूरा परिणाम देता हैं न उसकी बौद्धिक क्षमता का पूरा प्रयोग करता है| धार्मिक नियमों के ऊपर उठकर देखें तो बैंकों में एक सीमा से अधिक निवेशक और अर्थव्यवस्था के लिए हानिकारक हैं| बैंक पूँजी की समुच्चय और समन्वय करने में भी विफल रहे हैं| वास्तव बैंक के पास अपने धन का समुचित निवेश करने की कोई उचित कुशलता भी नहीं होती| यही कारण है कि बैंक असफल होते रहते हैं|

बंद होते बैंक

मैं आजतक नहीं जानता कि वास्तव में बैंक होते क्यों हैं?

पहले भारत या पूरे एशिया में बैंक नहीं थे तब आम जनता की आवागमन और व्यापारिक जरूरत के लिए हवाला तंत्र था| यह वास्तव में पेमेंट बैंक सिस्टम है जिसे पश्चिमी बैंक प्रणाली के हित के लिए अवैध, गैरकानूनी और आपराधिक बनाकर पेश किया गया| जबकि इसे उसी प्रकार विनियमित किया जा सकता था, जैसे आज पेमेंट बैंक को किया जाता है| हर शहर और गाँव में कर्जदाता साहूकार भी थे जिनके ब्याज के कड़वे किस्से महशूर किये गए थे| सहूकारियां और हवाला आज भी है और कानूनन मना भी है|

बैंकतंत्र का मूल उद्देश्य बड़े समूह से धन बटोर कर उद्योग आदि में प्रयोग करने के लिए देना था|  यह एक उलट-साहूकारी है| आलोचक इसे समाजवाद से धन जुटाकर पूंजीवाद को देना भी कहते हैं| आज इसमें साहूकार की सूदखोरी, हवाला की हौल और पूंजीवाद की लम्पटता है| बाद में जब पूंजीपति असफल होता तो बैंक का बाजा बज जाता और पूंजीपति सो जाता| बहुत बार यह धोखाधड़ी का मामला भी होता|

आखिर बैंक क्यों असफल होते हैं?

भारत में बैंक बंद होना कोई नया घटनाक्रम नहीं हैं| आरम्भ में अधिकतर बैंक पूंजीपतियों ने समाज में मौजूद धन को ब्याज के बदले इकठ्ठा करकर अपने व्यवसाय के लिए प्रयोग करने के लिए खोले थे| इस तंत्र में कमी थी कि आमजन के लिए पैसा लगाना सरल था निकलना कठिन| इसके बाद बैंक का राष्ट्रियकरण हुआ| हालत बदले और लगा कि धोखेबाज रोक लिए जायेंगे| परन्तु छोटे बैंक, साहूकार आदि बने रहे| बड़े बैंक भी कोई नया व्यासायिक नमूना नहीं बना पाए| पूंजीपति बैंक का लाभ लेते लूटते रहे| हाल का दिवाला शोधन कानून भी कोई बहुत सफल नहीं दिखाई देता| हाल का पंजाब महाराष्ट्र सहकारी बैंक भी सामाजिक पूँजी पर पूंजीवादी कुदृष्टि की पुरानी कथा है|

फिलहाल इस सब का कोई इलाज नहीं दिखाई देता| सरकारी नीतियाँ जब तक पेमेंट बैंक, बचत बैंक और साहूकारी और निवेश व्यवस्था को अलग नहीं करेंगी यह सब चलेगा| परन्तु यह सब करना कोई सस्ता सौदा भी तो नहीं है|

आम जन को अपना ध्यान खुद रखना होगा| बैंक का बिचौलियापन पूँजी बाजार से ख़त्म होना चाहिए| इसके लिए निवेशक के रूप में आमजन को जागरूक होना होगा|

लम्बा चौड़ा कराधान दायरा

संभावित अमीर और नए अमीर अक्सर यह मांग करते हैं कि सरकार करों के नाम पर उन्हें न लूटे और कराधान का दायरा बड़ा कर कर अधिक लोगों से करवसूल करे| मुझे अक्सर उनकी मांग के भोलेपन पर दया नहीं, तरस आता है| अक्सर यह लोग इस प्रकार का बर्ताव करते हैं कि मानो देश में कोई साम्यवादी या समाजवादी व्यवस्था उन्हें उनकी मेहनत और अमीरी के लिए परेशान कर रही है| दुनिया के हर पूंजीवादी देश में पूंजीपतियों पर अधिक कर हैं| अमेरिकी कांग्रेस तो और बढ़ाने पर विचार भी कर रही है| आखिर कराधान का दायरा बढ़ाने से इन लोगों की मुराद क्या है? क्या सरकार गरीबों से कर लेना शुरू करे? क्या गरीब कर नहीं देते?

वास्तविकता यह है कि गरीब कुल प्रतिशत में अमीरों के मुकाबले अधिक कर देते हैं| यह बाद नए वस्तु एवं सेवा कर अधिनियम के बाद बहुत अधिक विश्वास के साथ कही जा सकती है| भारत में दो प्रकार के कर लगते हैं:

  • प्रत्यक्ष कर यानि आयकर और
  • अप्रत्यक्ष कर यानि वस्तु एवं सेवा कर|

फिलहाल आयकर का दायरा बढ़ाने के दो तरीके हैं:

  • गरीबों से आयकर लेना;
  • अधिक लोगों को रोजगार देकर वर्तमान कर सीमा में लेकर आना;
  • वर्तमान कर सीमा के अन्दर के लोगों की कर चोरी पकड़ना|

गरीबों से कर लेना सरल तो हैं परन्तु एक गरीब की आयकर विवरणी को भरवाने और देखने मात्र में आयकर विभाग के कम से कम हजार रुपए खर्च होंगे| इतना ही पैसा कोई भी उनकी आयकर विवरणी भरने का भी लेगा| क्या आपको लगता हैं कि जिसका कर पांच हजार से कम हो उस की आयकर विवरणी भरवाने का कोई फायदा है| यही कारण है कि सरकार पांच लाख तक की आय वालों को आयकर विवरणी भरने से छूट देनी चाहिए| जिससे सरकार को फालतू खर्च न उठाना पड़े| परन्तु सरकार ऐसा नहीं कर पाती| बल्कि फालतू कर विवरणी को पढ़ने के लिए अब महंगी तकनीक का सहारा लिया जा रहा है|

सोचें क्यों? साथ ही यह भी सोचें कि इस प्रकार सरकार से आप कितना पैसा कर प्रशासन के मद में फालतू खर्च करवा रहे हैं|

पिछले बीस साल में सरकार और निजी क्षेत्र सबको खर्च कम करने की लत पड़ चुकी है| इसलिए नौकरियां नहीं दी जा रहीं| मगर क्या सोचा है कि हर नया नौकर अपनी नई आय खर्च करेगा तो हर साल में अपनी आय का लगभग २८% प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर से रूप में मिलाकर सरकार को सीधे और लगभग ५०% दूसरों के माध्यम से लौटा देगा| मैं उन नौकरियों की बात कर रहा हूँ जिन्हें पैदा नहीं करना वरन भरना मात्र है| नई नौकरियों में जरूर कुछ अधिक खर्च होगा|

कर चोरी पर मुझे कुछ नहीं कहना| मुझे लगता है कि यही लोग हैं जो कराधान के दायरा लेकर रोते रहते हैं और अक्सर खुद तस्करों की श्रेणी में आते हैं|

(विशेष टिपण्णी: तस्कर अप्रत्यक्ष कर के चोर को कहते हैं, प्रत्यक्ष कर के चोर के लिए करचोर जैसे सम्मानित शब्द का विधान किया गया है|)

अगर अप्रत्यक्ष कर की बात की जाए तो हाल में देश के सबसे सुलभ और सबसे सस्ते बिस्कुट की बिक्री में कमी की बात सामने आई| कहा गया नोटबंदी और अप्रत्यक्ष कर के कारण लोग इसे नहीं खरीद पा रहे| जबाब में कहा जाता है कि उस बिस्कुट पर कर नया तो नहीं है| चीनी या मसाले सब पर कर लगता है| इतना ही है कि अब नमक सत्याग्रह नहीं हो सकता क्योंकि उसकर घरेलू नमक पर इस समय शून्य की दर से लगता है|

जब भी आप कराधान के दायरे की बात करें सोचें कि कौन है जो कर के दायरे में नहीं है?

चलते चलते इतना जरूर कहूँगा, किसी भी समझदार अमीर की कार पर कोई कर नहीं लगता| क्या वास्तव में उसपर कर लगता है?

#गहरानाज्ञान #तीसराशनिचर

तीन घंटा बनाम मेरी मर्जी

फिल्म और टेलिविज़न कम या कहें कि नहीं देखने की आदत का मेरे जीवन में बड़ा योगदान रहा है| मगर ऐसा भी तो नहीं है कि मुझे दृश्य साहित्य पसंद नहीं है| टेलिविज़न का नारदीय रूप यानि देशी समाचार चैनल कभी पसंद नहीं आये| परन्तु शुद्ध दूरदर्शन के शुद्ध ज़माने में वृत्तचित्र देख लेता था| वर्ना रेडियो कहीं बेहतर उपाय है| कहीं भी बैठ उठ कर सुन लिया| बीबीसी, दुयुचे वैले, वॉयस ऑव अमेरिका से लेकर रेडियो पाकिस्तान तक दुनिया भर के दोनों तीनों पक्ष से समाचार सुन लिए जाते थे| टेलीविज़न समाचार में नाटकीयता अधिक और गंभीरता कम है|

दृश्य साहित्य के तौर पर मैं कभी कुछेक टेलिविज़न नाटकों और गिने चुने सीरियल से आगे नहीं बढ़ पाया| फिल्मों का हाल यह कि तीन घंटे बैठना हमेशा भारी पड़ता था| मैं टिक कर नहीं बैठ सकता| हर आधा घंटे के भीतर अन्दर का ऊदबिलाब ऊलने लगता है| कोई फिल्म टीवी पर दो-तीन बार आ गई या किसी वजह से लेटे पड़े हैं तो साल दो साल में फिल्म पूरी हो गई| हॉल में फिल्म देखने का यह हाल रहा कि सिनेमा हॉल में देखी गई फिल्मों की संख्या अभी तक दर्जन नहीं पकड़ती| लगता है घुट कर मर जाऊँगा इस कैद में|

फिर सूचना क्रांति हुई| आपको कभी भी फ़िल्म रोकने चलाने की सुविधा हो गई| जब जिनता मन आये देख लो| मगर उसमें भी कई हाल में आपका मोबाइल आपके समय और आपकी जगह पर फ़िल्म सीरियल और समूचा दृश्य साहित्य उपलब्ध कराने लगा है| कई बार एक दृश्य देख कर रुके और ढेर सारा मनन चिन्तन और विश्लेषण कर लिया| मन हुआ तो प्यारी सी दोस्ताना किताब की तरह लगे रहे|

जिस प्रकार अच्छी किताब यह करती है कि वह कब तक आपको पढ़वाती जाएगी, ये फ़िल्में और सीरियल भी खुद तय करते हैं| मगर आपको कैद में नहीं बंधना पड़ता|

फिर भी मैं किताबों को पसंद करता हूँ, भले ही वह किन्दल, मोबाइल या लेपटॉप पर क्यों न हो| किताबें आपसे अधिक बात करती हैं और आपकी समझ को खुला वितान देतीं हैं| दृश्य माध्यम में आप शांत निर्लिप्त प्रेक्षक होते हैं जिन्हें निर्देशक और अभिनेता की निगाह से दुनिया देखनी होती है|

सुना है, कुछ इंटरैक्टिव कहानियों पर काम हो रहा हैं| परन्तु… शरद पूणिमा की पीली गुलाबी सी बेलाई ठंडक को निर्देशक की निगाह से समझने की जो मजबूरी इन माध्यम में है वह किताब में नहीं है|

फिर भी जो है, स्वागत योग्य है|

अच्छी फिल्मों और सीरियल के बाद उनकी मूल कहानी पढ़ी जाए तो नए सोपान अब भी खुलते हैं और शायद आगे भी खुलते रहेंगे|

भेदभाव उत्पादक यंत्र

मोटर वाहन एक ऐसा यंत्र है जो अपने मालिक और चालक को मनुष्य के स्तर के उठा कर सांड के स्तर पर लाकर रख देता है| जिस की जितनी बड़ी गाड़ी, उतना बड़ा सांड| मोटरवाहन की कुर्सियाँ उस सिंहासन की तरह है जहाँ से दूसरों ख़ासकर पैदल चलने वालों और कीड़े मकौड़े में कोई फर्क नहीं दिखाई देता|

एक हिन्दुस्तानी सड़क दुनिया का सबसे ख़तरनाक इलाका है जहाँ किसी को भी गाली गलौज कर सकते हो, पुलिस को अपने बाप का नाम बता सकते हो, दरोगा से उसकी औकात पूछ सकते हो, छोटी गाड़ी में बैठे बूढ़े पर हाथ उठा सकते हो, और सबसे बड़ी बात बिना गलती माफ़ी मांग लेने वाले को खानदानी पापी मान सकते हो| अगर आपको वर्णभेद और जातिभेद हमारी पुश्तैनी भेदभावी आदतें समझनी हैं तो हिन्दुस्तानी सड़क बढ़िया ठिकाना है| यहाँ आपके रंग, आपके कपड़े, आपकी गाड़ी और आप की सहनशील स्वभाव आपको वर्णभेद का शिकार बना सकता है| यह ऐसा भेदभाव है जिसमें आपके कर्म, जन्म, रंग आपके बारे में कुछ तय नहीं करते| आपको पददलित बनाने का काम इस बात से भी तय हो सकता है कि आप अपनी दसकरोड़ी गाड़ी को मरम्मत के लिए दे आये हैं और पिताजी की दो लाखी गाड़ी लेकर सड़क पर उतरे हैं| यह भेदभाव ही है जिसके कारण एक सस्ती मगर बढ़िया गाड़ी हिन्दुस्तानी बाजार में बिक भी नहीं सकी|

जो आदमी सड़क पर गलत हाथ पर चलता हुआ बिना किसी लाल हरी रौशनी का ध्यान दिए अपने वाहन में आकर बैठता है वह भी चाहता है कि हर सूअर या कीड़ा मकौड़ा सारे नियम का पालन करे| वास्तव में उसे अपने लिए सब सुविधाएँ चाहिए मसलन – रास्ता साफ़ हो, चमकदार सड़क हो, कोई रास्ता जाम न मिले, पुलिस वाला बिकाऊ हो और हर अँधा-बहरा भी उस का वाहन देखे और फालतू बजता उसका भोंपू सुने और आपातचिकित्सा वाहन भी उसके लिए रास्ता छोड़ दें|

मोटर वाहन भेदभाव के सबसे बुरे शिकार मजदूर, रिक्शाचालक, ऑटोचालक, रेहड़ीवाले, टैक्सीवाले हैं| उनका कोई दिन मोटर वाहन वाले किसी न किसी दैत्य से बिना गाली सुने नहीं बीतता|