पानी की पहली लड़ाई

धौलाधार के ऊँचे पहाड़ों पर दूर एक प्राचीन मंदिर मिलता है| कहानियाँ बताती हैं कि कोई प्राचीन जनजातियों के राजाओं की लड़ाई हुई थी यहाँ| दोनों राजा मरने लगे| दोनों के एक दूसरे का दर्द समझ आया| एक दूसरे की प्रजा का दर्द समझ आया| मरते मरते समझौता हुआ| एक युद्ध स्मारक बना| यह युद्ध स्मारक अगर आज उसी रूप में होता तो शायद दुनिया का सबसे प्राचीन जल-युद्ध का स्मारक होता| जैसा होता है – स्मारक समय के साथ पूजास्थल बन गया और धीरे धीरे चार हजार साल बाद और अब से पांच हजार साल पहले मंदिर| यहाँ आज पंचमुखी शिवलिंग मंदिर है| अब यह गोरखा रेजिमेंट का अधिष्ठाता मंदिर है|

आज यह शिव मंदिर – एक कहानी और भी कहता है – भूकम्प की| धरती काँप उठी थी| मंदिर नष्ट हो गया| दूर एक चर्च बचा रहा| हिमालय के धौलाधार पहाड़ों के वीराने में लगभग बीस हजार लोग मारे गए| मंदिर दोबारा बनाया गया| उस भूकंप की चर्चा फिर कभी|

तब थार रेगिस्तान रेगिस्तान न था, नखलिस्तान भी न था, हरा भरा था| रेगिस्तान में अजयमेरु का पर्वत था| वही अजयमेरू जहाँ पुष्कर की झील है| अरावली की इन पहाड़ियों पर मौर्य काल से पहले एक बड़े राज्य के संकेत मिलते हैं जिसका स्थापत्य सिन्धु सभ्यता से मेल खाता है| यही एक भाग्सू राक्षस का राज्य था| सुनी सुनाई कहानियों के विपरीत यह राक्षस जनता का बहुत ध्यान रखता था| पर ग्लोबल वार्मिंग तब भी थी| हरा भरा अजयमेरू राज्य सूखे का सामना कर रहा था| राजा भाग्सू राक्षस ने पानी की ख़ोज की और हिमालय पर धौलाधार के पहाड़ों पर के झरने से पानी लाने का इंतजाम किया|

कथा के हिसाब से राजा भाग्सू राक्षस कमंडल में सारा पानी भरा और अपने राज्य चल दिया| स्थानीय राजा नाग डल को चिंता हुई| अगर पानी इस तरह चोरी होने लगा तो उसके राज्य में पानी का अकाल पड़ जायेगा| उसके राज्य में बर्फ़ तो बहुत थी मगर पानी?? ठण्डे हिमालय पर आप बर्फ नहीं पी सकते|

युद्ध शुरू हुआ| स्थानीय भूगोल ने स्थानीय राजा नाग डल की मदद की| राक्षस हारने लगा| उसने समझौते की गुहार लगाई| दोनों राजाओं ने पानी का मर्म, पानी की जरूरत और आपसी चिंताएं समझीं और संधिपत्र हस्ताक्षरित हुआ| यह सब आज से ९१३० साल पहले द्वापरयुग के मध्यकाल में हुआ|

इस युद्ध का स्थल आज दोनों महान राजाओं भाग्सू राक्षस और नाग दल के नाम पर भागसूनाग कहलाता है| हिमाचल में धर्मशाला के पास जो नाग डल झील है, वह इसी युद्ध या समझौते से अस्तित्व में आई| अजयमेरू तक भी पानी पहुंचा| कोई पुष्टि नहीं, मगर पुष्कर झील की याद हो आई| हो सकता है, नाग डल और पुष्कर प्राचीन बांध रहे हों, जिनके स्रोत नष्ट होते रहे और ताल रह गए|

अपनी प्रजा को प्रेम करने वाले दोनों महान राजाओं के राज्य, उनके वंश, उनकी जाति, उनके धर्म आज नहीं हैं| उस महान जल संधि का नाम भी विस्मृत ही है| इस वर्ष उस युद्ध का कारक भाग्सू नाग झरना मुझे सूखता मिला|

उनका युद्ध स्मारक आज गोरखा रायफल के अधिष्ठाता देवता के रूप में विद्यमान है| ५१२६ साल पहले राजा धर्मचंद के राज्य में यहाँ शिव मंदिर की स्थापना हुई| भागसूनाग मंदिर का नाम बिगाड़कर भागसुनाथ लिखा बोला जा रहा है| कल संभव है भाग्यसुधारनाथ भी हो जाए|

जब भी जाएँ कांगड़ा, धर्मशाला, मैक्लोडगंज, भाग्सूनाग जाएँ, मंदिर के बाहर लगे पत्थर पर लिखे इतिहास को बार बार पढ़े| उसके बाद भाग्सुनाग झरने में घटते हुए पानी को देखें| बचे खुचे ठन्डे पानी में हाथपैर डालते समय सोचें; आज इस स्थान से थोड़ा दूर शिमला में सरकार पानी नाप तौल कर दे रही है|

मेरी जानकारी में भाग्सूनाग का युद्ध जल के लिए पहला युद्ध है| आज यह मिथक है, कल इतिहास था|

कहते हैं अगला विश्वयुद्ध पानी के लिए होगा| भारत पाकिस्तान और भारत चीन पहले ही पानी की बात पर अधिक कहासुनी कर ने लगे हैं|

यदि आपको लगता है, बच्चों का भविष्य बचाना है, इस मिथिकीय कहानी को इष्ट मित्रों से साँझा करें शेयर करें|

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असफलता

असफलता का अपना एक नशा और मजा होता है| आप या तो किसी गन्दी नाली में पड़े होते हैं या दार्शनिक बन जाते हैं| आपको असफल होने का शौक नहीं होता| आपको पता रहता है, आप की सफलता अभी कितनी फ़ीकी है| कभी रंग तो कभी रंगत में सुधार करने का चाव लगा होता है|

असफलता का सबसे बड़ा फायदा है लोग आप को पागल और झक्की समझते हैं| आप अकेले छोड़ दिए जाते हैं| असफल इंसान जानता है, किस तरह माँ की ममता और बाप का दुलार  अज्ञातवास पर चले जाते हैं| भाभियाँ और बहनें सामने परोसी गई थालियाँ उठा ले जातीं हैं| यह सब वक्त की मार नहीं, प्रेरणा है| भूखे पेट विचार बहुत आते हैं, और संकल्प भी| जितना भूखा पेट, उतनी लम्बी मजबूत जिद – उतना भरोसा| एक ही शर्त – टूटना नहीं है| झुकना और फिर फिर खड़े हो जाना आप सीख जाते हैं| आत्मविश्वास और आत्मसम्मान बनाकर रखना और शांत रहना – यही परीक्षा है|

खूब सारी असफलता के बाद जब सफलता आती है तो उसकी मस्ती अलग है| वो सारे नाते रिश्तेदार जो आपको पहचानते नहीं थे – उन्हें अचानक सारे रिश्ते याद आ जाते| वो लाड़ दुलार जो कभी देने का सपना भी उन्हें आया होता है उनका भी हिसाब किताब होने लगता है| समझ नहीं आता कि कितना मुस्कराएँ| पर मुस्कराएँ जरूर|

असफलता का एक और फायदा है, हर परिस्तिथि में आप ढलना सीख जाते हैं| कोई भी नई असफलता आपको बेचैन नहीं करती| आप जानते हैं, यह कुछ दिन की बात है| आप संघर्ष कर सकते हैं| लोगों की कुटिल मुस्कान आपको नहीं डराती|
इस नशे से बाहर न आयें| क्योंकि असफलता में कमाया गया नशा आपको सकारात्मक बनाये रखने में मदद देता है| आपको संभाल कर रखता है|

असफलता का नशा आपको सफलता के जहरीले नशे से दूर रखता है|

मनभेद की नीति

कई बार सोचता हूँ, क्या राजनीति तुच्छ बात है? कम से कम इस मुद्दे पर राजनीति नहीं होनी चाहिए| राजनीति का यह नकार हमारे लोकतंत्र की खूबी है| कोई राजनीति पसंद नहीं करता – राजनीतिज्ञ तो बिलकुल ही नहीं| संसद में हल्ला मचा रहता है – राजनीति न करो| राजनीति यानि विचार-विमर्श, शब्द संघर्ष – शास्त्रार्थ|

कैसे तय हो क्या सही है| बिना विचार –विमर्श के| मतदान मुद्दे नहीं तय करता| बिना विमर्श के होने वाला मतदान सिर्फ भाई-भतीजावाद है| विमर्श से भागना भीड़तन्त्र को मजबूत करना है – लोकतंत्र को नहीं| लेकिन बात विमर्श की नहीं ही रही| सड़क का संघर्ष आज विचार को जन-जन तक पहुँचाने का संघर्ष नहीं है, सब जोर-जबरदस्ती का मामला है| हिंसक संघर्ष स्वीकार्य होने लगे हैं और अनशन और प्रदर्शन को कोई नहीं पूछता|

लोकतंत्र के लिए आवश्यक है कि पहले मुद्दा हो, उसपर विचार हो, विमर्श हो उसको जनजन तक पहुँचाने की बात हो और फिर जिसका विचार पसंद आये उसे मत दे दिया जाए| आज पहले नेता चुन जाता है बाद में उसका विचार खोजा जाता है| विचार का भी क्या है, सत्ता के बाहर रहकर जिसका विरोध हो, वही सत्ता में आते ही प्रिय विचार हो जाता है| जब विचार के यह हाल हैं तो विमर्श के लिए अवसर ही कहाँ है?

विचार अगर लोकतंत्र का मूल न हो तब लोकतंत्र का नष्ट होना तय ही है| पहले यह भीड़तंत्र बनेगा और बाद में तंत्रहीनता|

आज भले ही सूचना तकनीकि अपने चरम पर हो मगर हम सूचनाएं हमारे हाथ में नहीं हैं|उनका नियंत्रण कोई और कर रहा है| सूचना बिक रही हैं| असुविधाजनक सूचना उपलब्ध नहीं होती| आप जिस पक्ष को एक बार हल्का सा भी समर्थन देते हैं, आपका सूचना तंत्र आपके पास विरोधी या विपक्षी सूचना नहीं आने देता| भ्रम का मायाजाल बन रहा है| जब तक सूचना के दुसरे पक्ष तक पहुँच नहीं होगी, लोकतंत्र समृद्ध नहीं होगा|

राजनीति में मतभेद होने अच्छी बात है, मनभेद नहीं होने चाहिए| मतभेद के लिए मत होना चाहिए| मनभेद के लिए मन| मन का क्या है, किसी पर भी आ जाता है और बाकि सब शत्रु लगने लगते हैं| बस यही नहीं होना चाहिए|

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उर्दू जुबां हमारी…

हर हिंदी बोलने वाले, खासकर उर्दू को पराया मानने वाले को सामान्य उर्दू जरूर आती है| यह भी कह सकते है कि उर्दू में पलने बढ़ने वाले हर हिन्दुस्तानी को सामान्य हिंदी जरूर आती है| आखिर इन दोनों भाषाओँ का रिश्ता ही कुछ ऐसा है कि बिना दोनों भाषाएँ जाने आप दूसरी को सही से नहीं जान सकते| वर्ना आपको पता कैसे चलेगा कि दूसरी भाषा से कैसे बचा जाए|

इन दोनों भाषाओँ में गुत्थी इस तरह उलझी है कि पता नहीं चलता कि आम बोलचाल में कौन हिंदी बोल रहा हैं या कौन उर्दू| अक्सर माना जाता है की अगर प्रोफ़ेसर साहब ने संस्कृत पढ़ी है तो वो हिंदी बोल रहे हैं और अगर अरबी-फ़ारसी पढ़ी है तो उर्दू|

कई बार लोग यह जानने के लिए कि बोलने वाला हिंदी बोल रहा है या उर्दू, उस से लिखवाकर देखते हैं| अगर देवनागरी लिपि में लिखा तो हिंदी और नश्तालिक़ में लिखा तो उर्दू| मगर मोबाइल के ज़माने में मामला थोड़ा पेचीदा हो गया है| नए लोग रोमन में लिखते हैं| अगर अंग्रेज बहादुर आज होते तो रोमन हिंदी या रोमन उर्दू के लिए शायद कोई नया नाम देते और हम उसे भी एक भाषा मान लेते| कई बार सोचता हूँ कि क्या लिपि बदलने से भाषा का नाम बदल जायेगा| किसी ज़माने में हिंदी कैथी लिपि में और पिछले ज़माने में संस्कृत ब्राह्मी में लिखी जाती थी| उस से भी पहले संस्कृत और अवेस्ता (पुरानी फ़ारसी) एक ही लिपि में लिखे जा रहे थे और उनके शब्द में एक दुसरे में घुले-मिले थे|

आज पंजाबी गुरुमुखी और शाहमुखी में लिखी जाकर भी एक भाषा है| खुद भारत में सिन्धी, एक साथ देवनागरी और अरबी लिपि में लिखी जा रही है| भारतीय प्रशासनिक सेवा में सिन्धी और संथाली भाषाओँ के प्रश्नपत्रों के लिए दो लिपियाँ तय की गई हैं|

वास्तव में हिंदी-उर्दू का झगड़ा ब्रिटिश इंग्लिश और अमेरिकन इंग्लिश के झगड़े से कहीं अलग नहीं है| मगर जिस तरह उर्दू को भारतीय नेताओं ने थाली में सजाकर पाकिस्तान को दे दिया है, उस तरह अमेरिकन इंग्लिश को थाल में सजाकर नहीं दिया गया है|

दो विचार

कागज़ी सम्बन्ध

जगत मिथ्या पर भरोसा करने वाली मानव सभ्यता, आज इस मिथ्या जगत में बनाई गई छद्म दुनिया में जी रही है| आज आपसी संबंधों में आपसी संवाद की जगह कागजों पर लिखे गए भावों ने ले ली है| चेहरे के भाव, शारीरिक भाव भंगिमाएं क्या लिखे हुए शब्दों में अभिव्यक्ति पा सकती हैं? क्या कभी जिव्हा से निकले स्वरों के आरोह अवरोह को लिखे हुए शब्द पकड़ पाएंगे? क्या प्रेमी-प्रेमिकाओं के आपसी नयनाचार को प्रेम पत्र अभिव्यक्तकर पाएंगे? क्या होगा जब लिखे हुए शब्दों का छद्म भोली भाली कन्याओं की समझ में नहीं आ पायेगा?

लिखित शब्दों में आज अश्लीलता परोसी जा रही है, उस पर नियंत्रण करना मुश्किल है| सबसे बड़ी बात है की सारी मानवता अपने लिए कोई एक भाषा या लिपि विकसित नहीं कर पायेगी|

वास्तव में भाव भंगिमाओं की आदिम भाषा ही मानवता का सत्य है|

 

कृत्रिम समझदारी

कृत्रिम समझदारी का विकास हो चुका है| हर चीज आज आभासी है| मिथ्या जगत में छद्म का विकास हुआ है| आज संबंधों को मोबाइल की स्क्रीन पर निभाया जा रहा है| क्या तरह तरह के निशान भाषा या लिपि का विकास कर रहे हैं या चित्रलिपियों की तरह के दुरूहता का गठन कर रहे हैं| क्या मुख से उच्चारित शब्द या हस्तलेख में लिखे गए भावों का नाश हो जायेगा| आज सब कुछ त्वरित है| समय का कोई आनंद नहीं| बच्चे समय से पहले बड़े हो रहे हैं| भले ही चिकित्सा जगत ने आयु पर विजय प्राप्त करने की ओर बड़े कदम उठाये हैं, मगर बूढ़े हृदयों से मानव समाज भरा हुआ है| मोबाइल के रूप में वो राक्षसी तोता सबके हाथ में लग गया है जिसमें हमने अपने अपने प्राण डाल दिए हैं| तोता मरा, राक्षस मरा| मोबाइल मरा हम मरे|

अब बच्चों को लिखने पढने की क्या भाषा सीखने की जरूरत नहीं रह गए| हमारे भाषा हीन विचारों को पकड़ने की तकनीकि सामने है|

 

नगद नारायण दर्शन दो

भारत के बाजारों में नगद की कमी कोई नई बात नहीं| सामान्य तौर पर आम चुनावों से पहले नगद की कमी हमेशा अनुभव की जाती है| मगर इस बार समस्या ज्यादा विकट मालूम होती है| ख़ासकर तकनीकि रूप से नगद को इस बार बाजार में नहीं ही होना चाहिए|

चुनावों से पहले जारी हुए आँकड़े बताते हैं कि चुनावी चंदे में भारी बढ़ोतरी हुई है| कॉर्पोरेट चंदा तो, आशा के अनुरूप, लगभग पूरा ही सत्ताधारियों को मिला है| कॉर्पोरेट चंदे को आम जनता में कानूनी तरीके से किया गया भ्रष्टाचार माना जाता है| पिछले बजट में कंपनी क़ानून में बदलाव करकर किसी भी कंपनी द्वारा दिए जा सकने वाले चंदे की उच्च सीमा को हटा दिया गया| इस समय चुनावी चंदे के रूप में दिया गया पैसा, नगद में हो या बैंक में, चुनाव से पहले अर्थव्यवस्था में वापिस नहीं आएगा|

विमुद्रीकरण के बाद कहा गया था कि डिजिटल अर्थव्यवस्था को बढ़ावा दिया जायेगा| साथ ही अर्थव्यवस्था का बड़ा भाग नगद पर काम कर रहा है – चिकित्सा, वकालत और रोजमर्रा का खर्चा नगद में करना अभी भी मजबूरी है| इसलिए पूर्णतः डिजिटल नागरिक भी लगभग एक माह की राशि नगद में रख रहे हैं| क्योंकि किसी को भरोसा नहीं कि जरूरत के समय आस पास के सौ एटीएम में से एक भी काम कर रहा हो| पिछले कुछ समय में शहरों में एटीएम की संख्या में कमी की गई है या स्थानांतरित की गई हैं|

दूसरी तरफ सरकारी आँकड़े बताते हैं, विमुद्रीकरण की अपार सफलता के बाबजूद आज पहले से भी अधिक नगदी अर्थव्यवस्था में मौजूद है| कहाँ है यह धन? आज अर्थव्यवस्था में नये प्रचलित दोहजारी नोट की बहुतायत है| पुराना नगद जमा काला धन अब दोहजारी की शक्ल में अपने स्थान पर वापिस जमा है|

कालेधनसंग्रह के अलावा, एटीएम और पर्स दोनों को दोहजारी बहुत रास आता है| इस कारण

बाजार में लगभग हर कोई दोहजारी लेकर घूम रहा है| अधिकतर समय लेनदेन के लिए दोहजारी के मुकाबले छोटे नोटों की जरूरत होती है| जब इस बड़े नोट के कारण लेनदेन में छुट्टे की समस्या आती है तो यह नगदी की कमी का आभास कराता है|

वास्तव में विमुद्रीकरण का मानसिक हमला और दोहजारी नोट मिलकर आम बाजार विनिमय को कठिन बना रहे हैं| यही नगद की लक्ष्य से अधिक आपूर्ति के बाद भी बाजार में कमी का सत्य है| इस बात के भी समाचार हैं कि अर्थवयवस्था में नगद की मात्रा विमुद्रीकरण के स्तर को पार कर जाने की खबर के बाद सरकार ने नगद छापने में कटौती कर दी थी| इसमें सभी मूल्यवर्ग के नोट शामिल थे|

अच्छा यह है कि दोहजारी को छापना बंद कर दिया जाए| पांच सौ रूपये से अधिक मूल्य के नोट प्रचलन से बाहर रहें| इस से अधिक मूल्य के लेनदेन के लिए जनता को बैंकिंग माध्यमों , खासकर कार्ड और मोबाइल लेनदेन के तरीके उपलब्ध कराये जाएँ| मगर सरकारी जबरदस्ती न हो|

हालाँकि सबसे अच्छी खबर यह है कि चुनाव साल भर के भीतर हो जाने हैं| दलगत राजनीति में फंसा पैसा जल्दी अर्थव्यवस्था में वापिस आ जायेगा|

हे राम!!

हे राम!

याद होगा तुम्हें

छू जाना उस पत्थर का, पथराई अहिल्या का,

मुझे भी याद है – तुम्हारा अधूरा काम||

कभी कभी मौका मिलने पर,

धिक्कारते तो होगे तुम, अपनी अंतरात्मा को||

सहज साहस न हुआ तुम्हें,

लतिया देते इंद्र को, गौतम को,

गरिया देते कुत्सित समाज को,

उदहारण न बन सके तुम||

हे राम!!

तीन अंगुलियाँ मेरी ओर उठीं हैं,

और इंगिता तुम्हारी ओर||