इसकी हिंदी क्या है?

समाचार के अनुसार, एक व्यक्ति ने वित्तमंत्री अरुण जेटली से “बुलेट ट्रेन” की हिंदी पूछ ली| हिंदी वालों में हिंदी पूछ लेना उनता ही सामान्य हो चला है, जितना अंग्रेजी वालों का हर भाषा के शब्द उठाकर अंगीकार और आत्मसात कर लेना| हर बात की हिंदी करवाना गुलाम मानसिकता की पराकाष्ठा का प्रतीक है| हिंदीवादी लोग भाषा के स्वतंत्र व्यकित्त्व की चाह में हिंदी को मात्र संस्कृतनिष्ठ शब्दों समेट देना चाहते हैं| इस प्रकार हिंदी को संस्कृत की उपभाषा बन जाने का ख़तरा बढ़ रहा है| संस्कृत निष्ठता के पीछे फ़ारसी शब्दों को नकारने की भावना से प्रारंभ होकर अब अंग्रेजी शब्दों को नकारने तक जा पहुंची गई है| विरोध की यह भावना इस तथ्य को भी नकारती है कि फारसी और संस्कृत एक ही स्रोत को भाषाएँ हैं|

अंग्रेजी से पहले फ़ारसी विश्वभाषा के दर्जा रख चुकी है| फ़ारसी के प्रसार में उन पारसियों और ईरानियों  का हाथ कम रहा, जिनकी मूल रूप से यह भाषा है| भारत में आये अरब, तुर्क, अफगान, मंगोल, मुग़ल आदि सबने फ़ारसी को सामान्य और राजनितिक जीवन में अधिक महत्व दिया| कारण शायद यही है कि फ़ारसी में अंगीकार, आत्मसात और समाहित करने की भावना और क्षमता अधिक रही| यही स्वीकार वृत्ति एक समय में छोटे से समूह की भाषा मानी जाने वाली अंग्रेजी को विश्वभाषा बनाने में सफल रही| आज अंग्रेजी उन देशों में भी स्वीकार है जहाँ उनके लोगों का राज नहीं रहा था|

आज भारतीय समाज इस बात की चर्चा करता है कि अंग्रेजी में कितने भारतीय मूल के शब्द हैं| क्या अंग्रेजी उन भारतीय शब्दों को अपना पाती, अगर वह अपने रोमन या ग्रीक मूलों से अपने लिए शब्द गढ़ने में समय नष्ट करती| अपने भाषा मूलों से शब्द गढ़ना गलत नहीं है| परन्तु इसे हास्यास्पद नहीं हो जाना चाहिए| शब्द सरल और सर्वस्वीकार होने चाहिए| लोहपथगामिनी जैसे शब्द स्वीकार नहीं हो पाए| परन्तु इस प्रकार के शब्दों के कारण सरकारी हिंदी और साहित्यिक विश्व की सबसे दुरूह भाषाओँ में से एक बन चुकी हैं|

अगली बार अगर आपको किसी शब्द की हिंदी न आये तो शेम्पू के स्थान पर मूल भारतीय चम्पू का प्रयोग करने का प्रयास करें| बुलेट ट्रेन की हिंदी उसके बाद ढूंढेंगे| जैसा जेटली बुलेट ट्रेन की हिंदी पूछे जाने पर कहते हैं, “थोड़ा गंभीर होने का भी प्रयास कीजिये”|

 

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शरणार्थी और भारत

भारत को बहु-सांस्कृतिक सभ्यता बनाने में अलग अलग समुदायों का योगदान निर्विवादित है| हमारी अतिउप-संस्कृतियाँ महीन ताने-बानों से बनीं हैं| भारतीय सजातीय विवाहों में भी आधा समय इस बात में हंसी-ख़ुशी नष्ट हो जाता है कि वर-वधु पक्ष के रीति-रिवाज़ों में साम्य किस प्रकार बैठाया जाए| उप-संस्कृतियों के विकासक्रम में बहुत से तत्व रहे हैं, जिन्हें ठीक से न समझने वाला व्यक्ति विदेशी आक्रमणों से जोड़ कर शीघ्र निष्कर्ष पर पहुँच सकता है| परन्तु निर्विवाद रूप से हमारे उन-सांस्कृतिक विकास में अन्तराष्ट्रीय व्यापार और शरणार्थियों के योगदान को नकारा नहीं जा सकता|

अन्तराष्ट्रीय व्यापार के प्रमाण सिन्धु घाटी सभ्यता के समय से मिलने प्रारंभ हो जाते हैं| आक्रमण वाले सिद्धांत के विपरीत अन्तराष्ट्रीय व्यापार ने इस्लाम को अरब आक्रमणों से काफी पहले भारत पहुंचा दिया था|

भारत के सर्वांगीण विकास में शरणार्थियों का योगदान इनता मुखर और सामान्य स्वीकृत है कि हम उसपर विवेचना की ज़हमत नहीं उठाते| जिन शरणार्थियों को “खीर के एक कटोरे” से वचन में बाँट दिया गया था, उनका बेचा नमक आज सारा भारत खाता है| ग़दर के बाद भारत में आजादी की नियोजित लड़ाई का प्रारंभ करने वाली इंडियन नेशनल एसोसिएशन और उसके बाद इन्डियन नेशनल कांग्रेस के एक सह-संस्थापक दादा भाई नौरोजी उन्हीं पारसी शरणार्थियों के वंशज थे| आज जिन प्राचीन ईरानी कथा कहानियों को हम फारस और मुस्लिमों से जोड़ते हैं वो कदाचित पारसियों के साथ भारत चुकीं थीं|

भारत में पारसी अकेला समुदाय नहीं है जो शरणार्थी बनकर भारत आया| आजादी के बाद आये शरणार्थी तिब्बती समुदाय के साथ भी स्थानीय समाज के सामान्य रिश्ते हैं| बंटवारे के समय पाकिस्तान से आने वाले लोग भी वास्तव में शरणार्थी ही हैं| अफगान संकट के समय आने वाले अफगानों का भी भारत में शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व है|

पिछले कुछ दशकों में अक्सर बाहर से आने वाले शरणार्थियों को उपद्रव का कारण माना जा रहा है| यह उत्तरपूर्व में होने वाले त्रिकोणीय सामुदायिक संघर्ष के कारण है| देश के किसी क्षेत्र में शरणार्थियों का कैसा स्वागत होगा, इसमें क्षेत्रीय विकास महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है| आप उत्तरपूर्व भारत में अवैध बंगलादेशी आप्रवासियों का मुद्दा रोज सर उठाते देखेंगे| जबकि दिल्ली मुंबई के चुनावों में यह मुद्दा हाशिये से आगे नहीं बढ़ पाता| जब शरणार्थी (और रोजगार की तलाश में आने वाले लोग) देश के कम विकसित क्षेत्र में आकर रहते है, तब इस प्रकार के संघर्ष स्वाभाविक हैं| जहाँ संसाधनों सभी के लिए पूरे नहीं पड़ते| दलगत राजनीति इन संघर्षों की आड़ में अपनी नीतिगत खामियां छिपाने और वोट की फ़सल काटने का काम करती है|

रोहिंग्या शरणार्थियों को अवैध बताकर वापिस भेजा जा रहा है| अपनी मर्जी से तो लोग रोजगार के लिए भी अपनी जन्मभूमि नहीं छोड़ते| मुझे नहीं पता कि वैध शरणार्थी कैसे होते हैं? क्या उन्हें देश से भागने वाली सरकारें वीज़ा पासपोर्ट बनाकर भेजतीं हैं? क्या अपने देश से जान बचाकर भागता भूखा नंगा आदमी आपको डरा देता है? क्या इस बात के प्रबंध नहीं हो सकते कि उनपर दया और निगाह एक साथ रखी जा सके|

 

पुनश्च – शरणार्थियों के अपने राजनीतक महत्व भी हैं, अगर पाकिस्तान के शरणार्थी भारत न आने दिए गए तो शायद दक्षिण भारत का इतिहास अलग होता| इस पर हो सका तो फिर कभी|

ले साँस भी आहिस्ता

आज पर्यावरण की बात सबके दिल-ओ-दिमाग़ में कहीं न कहीं घर किये रहती है| दूर तक सोचने वाले बहुत पहले से इन बातों पर सोच-विचार करते रहे| ख़ुदा-इ-सुखन मीर तकी मीर अठाहरवीं सदी में कहे अपने एक शेर में कहते हैं:

ले साँस भी आहिस्ता कि नाज़ुक है बहुत काम,
आफ़ाक़ की इस कारगह-ए-शीशागरी का |

सांस भी सोच समझ कर लीजिये, यह दुनिया कांच का कारखाना है| कांच के कारखाने में उड़ता हुआ बुरादा, शायद उस वक़्त प्रदुषण को समझने का सबसे बढ़िया जरिया रहा हो| आज कांच का बुरादा अकेला नहीं है, तमाम ख़राब चीज़े हैं, जो हमारे पर्यावरण को और दुनिया को गन्दा करती हैं और सांस लेना दूभर हो चला है| आज प्रदुषण आज सड़क पर या नदियों में नहीं रहता, यह घर में भी है|

यहाँ तक कि जो एयर फ्रेशनर हम घर को तरोताजा करने के लिए दिन भर उड़ाते रहते हैं, वह खतरनाक प्रदूषण है| इस तरह की बहुत सी चीज़ों से हमारा रिश्ता आज ऐसा हो गया है कि पहचान नहीं आता कि ये आस्तीन के सांप हैं, इनसे बचना चाहिए|

प्रदूषण घटाने के लिए प्रयोग होने वाला हमारा गैस का चूल्हा जहरीली कार्बन मोनोआक्साइड से रसोई भर देता है| एक अदद छोटे से मच्छर से बचने के लिए हम मच्छरदानी की जगह न दिखाई देने वाले जहरीले धुंए का इस्तेमाल तो हम ख़ुशी से करते ही हैं| वक़्त-बेवक़्त कीड़ेमकोड़े मारने के लिए जहर तो पूरे होश हवास में छिड़का ही जाता है|

आज प्रदूषण घर के दर-ओ-दीवार में छिपा बैठा है| घर के दीवारों और छतों में लेड और एस्बेस्टस छिपे रहते हैं, जो पेंट, टाइल्स, और कई अन्य उत्पाद में प्रयोग होते हैं| इसी तरह से स्टोव, हीटर, चिमनी, एयरकंडीशनर, फ्रिज भी घरेलू प्रदूषण अपना योगदान देते हैं| सिगरेट पीने वाले मेहमान आ जाएँ तो बात ही क्या हैं?

खाने में जो प्रदूषण हम प्रयोग करते हैं उसका कुछ कहना बेकार है| बिना जहर का खाना हमें रास नहीं आता| क्या कभी मैंने या आपने यह कहकर कोई सब्ज़ी खरीदी है जिसमें कीड़े मारने का ज़हर न लगा हो? बिना ज़हर की सब्ज़ी अक्सर कीड़े पकड़ लेती है, थोड़ा भी बासी होने पर जल्द ख़राब हो जाती है|

आज बाहर के मुकाबले घर पाँच गुना तक अधिक प्रदूषित है| भारत में यह आंकड़ा ख़तरनाक हो जाता है जब देखते हैं की दुनिया के बीस में से तेरह सबसे ज्यादा प्रदूषित शहर भारत में हैं|

संत कबीर कहते है:

अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप| 
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।

अगर हम अपने घर में होने वाले अतिरक्त उपभोग को कम कर दें तो प्रदुषण कम कर दें| जैसे ऐसे उपाय की रसोई गैस, हीटर, स्टोव आदि का प्रयोग कम हो| इससे इनसे निकलने वाली गैस को कम किया जा सकता है| मच्छर मक्खी कीड़ेमकोड़े मारने के जहरों का प्रयोग कम करें और मच्छरदानी का प्रयोग हो| बढ़िया पेंट, टाइल्स, आदि का प्रयोग हो| प्राकृतिक हवा की घर में आवाजाही हो तो घरेलू प्रदूषण को घर से बाहर निकलने का रास्ता मिलेगा| घर में लगाये जाने वाले कई पौधे भी प्रदूषण से लड़ सकते हैं| कुछ विशेष प्रकार के पेंट घरेलू प्रदुषण न सिर्फ कम फैलाते हैं बल्कि कुछ प्रदूषक तत्वों को सोख भी लेते हैं|

 

हिंदी में विनम्रता

Please, remove your shoes outside.

इस अंग्रेजी वाक्य का सही हिंदी अनुवाद क्या है?

  1. कृपया, अपने जूते बाहर उतार|
  2. अपने जूते बाहर उतारें|
  3. अपने जूते बाहर उतारिये|
  4. अपने जूते बाहर उतारियेगा|
  5. अपने जूते बाहर उतारने की कृपा करें|
  6. भगवान् के लिए अपने जूते बाहर उतार लीजिये|
  7. जूते बाहर उतार ले|
  8. जूते बाहर उतार ले, प्लीज|

हम हिन्दुस्तानियों पर अक्सर रूखा होने का इल्जाम लगता है| कहते हैं, हमारे यहाँ Please या Sorry जैसे निहायत ही जरूरी शब्द नहीं होते|

अक्सर हम तमाम बातों की तरह बिना सोचे मान भी लेते हैं| अब ऊपर लिखे वाक्यों को देखें|

हमारे क्रिया शब्दों में सभ्यता और विनम्रता का समावेश आसानी से हो जाता है तो रूखेपन का भी| हम प्लीज जैसे शब्दों के साथ भी रूखे हो सकते हैं और बिना प्लीज के भी विनम्र| आइये ऊपर दिए अनुवादों को दोबारा देखें|

  1. कृपया, अपने जूते बाहर उतार| यह एक शाब्दिक अनुवाद है और किसी भी लहजे से गलत नहीं हैं| मगर हिन्दुस्तानी सभ्यता के दायरे में यह गलत हैं क्योकि “उतार” में अपना रूखापन है जो प्लीज क्या प्लीज के चाचा भी दूर नहीं कर सकते|
  2. अपने जूते बाहर उतारें| यहाँ प्लीज के बगैर ही आदर हैं, विनम्रता है| क्या यहाँ प्लीज के छोंके के जरूरत है? इसके अंग्रेजी अनुवाद में आपको प्लीज लगाना पड़ेगा|
  3. अपने जूते बाहर उतारिये| क्या कहिये? ये तो आप जानते हैं कि इसमें पहले वाले विकल्प से अधिक विनम्रता है| अब इनती विनम्रता का अंगेजी में अनुवाद तो करें| आपको शारीरिक भाषा (gesture) का सहारा लेना पड़ेगा, शब्द शायद न मिलें|
  4. अपने जूते बाहर उतारियेगा| हम तो लखनऊ का मजाक उड़ाते रहेंगे| यहाँ आपको अंग्रेजी और शारीरिक भाषा कम पड़ जायेंगे| उचित अनुवाद करते समय कमरदर्द का ध्यान रखियेगा|
  5. अपने जूते बाहर उतारने की कृपा करें| क्या लगता है यह उचित वाक्य है| इसमें अपना हल्का रूखापन है| आपका संबोधित व्यक्ति को अभिमानग्रस्त या उचित ध्यान न देने वाला समझ रहे हैं और कृपा का आग्रह कर रहे हैं| यदि यह व्यक्ति आपके दर्जे से काफी बड़ा नहीं है तो यह वाक्य अनुचित होगा|
  6. कृपया, अपने जूते बाहर उतार लीजिये| लगता है न, कोई पत्नी अपने पति के हल्का डांट रही है|
  7. जूते बाहर उतार ले| यह तो आप अक्सर अपने बच्चों, छोटों और मित्रों को बोलते ही है| सामान तो है ही नहीं|
  8. जूते बाहर उतार ले/लें, प्लीज| यह विनम्रता है या खिसियानी प्रार्थना| हिंदी लहजे के हिसाब से तो खीज ही है|

वैसे आप कितनी बार विकल्प दो तीन और चार में कृपया का तड़का लगाते हैं?

मेरा वाला संत

मामला यह है ही नहीं कि कोई व्यक्ति संत है या नहीं है| सोशल मीडिया पर सारा मामला “मेरा वाला संत” का है| गलतियाँ, पाप, सजाएं और प्रायश्चित सामान्य से लेकर संत व्यक्ति को लगे ही रहते है| मानव है तो उसके पास मन भी है, गुण अवगुण भी| पहले भी संत, महंत, सन्यासियों, साधुओं ने अपराध किये हैं और सजाएँ भी होती रही है| सांसारिक प्रलोभन से तो महर्षि विश्वामित्र भी नहीं बच पाए थे, आजकल वाले तो अभी अध्यात्म के शुरुवाती पायदान पर हैं|

आजकल धर्मगुरु धर्मसत्ता, राजसत्ता, अर्थसत्ता के उच्चासन पर विराजमान हैं| समय और देश की सीमा के परे मानवमात्र की सोचने वाले धर्मगुरु देशप्रेम और युद्धशांति जैसे विषय में भाषण-विज्ञापन देते हैं| ब्रह्मचर्य से लेकर कंडोम तक बेच सकने वाले यह धर्मगुरु अपने समर्थकों का तन-मन-धन समर्थन रखते हैं| सत्ता की यह उच्चता ही उन्हें निरंकुश बनाती है| उन्हें पता है सत्ता दुरूपयोग के विरूद्ध खड़ा होने वाला कोई नहीं है| कारण – श्रृद्धा| जिसे हम अंध-श्रृद्धा कहते हैं वह आपके धर्मगुरु के शब्द में श्रृद्धा है| जिस समय कोई धर्मगुरु या उसका अनुयायी आपको प्रश्न करने से रोक दे तो यह अंध-श्रृद्धा है| जब आप आदर या श्रृद्धा के कारण अपने आप प्रश्न करने से रुक जाएँ तो भी यह अंध-श्रृद्धा है| अब आप किसी प्रश्न का उत्तर बिना किसी ख़ोजबीन के खुद ही देने लगें तो अंध-श्रृद्धा है| जब आपका गुरु समझ ले की आप श्रृद्धालू हैं तो समझ लें आप अंध-श्रृद्धालू हैं| अन्य लोगों की धर्मगुरु जिज्ञासू कह सकते हैं, श्रृद्धालू नहीं|

समर्थक और विरोधी प्रायः धर्मगुरुओं के अपराधों और घोटालों पर प्रश्न नहीं करते| बलात्कार और हत्या यदा-कदा अपवाद हैं| बलात्कार और हत्या दो आरोप हैं जिनपर श्रृद्धालू नकार भाव रखते हैं| देश के भारीभरकम धर्मगुरुओं द्वारा अपने गुरुओं या धर्मभाईयों को मरवाने के चटक चर्चे आश्रमों में घूमते रहते हैं और किस्सों की तरह मीडिया में भी| जो स्त्री-पुरुष तन का समर्पण रखते हैं, उन्हें कृपा मिलती रहती हैं| अन्य पाप के भागी, बलात्कार का शिकार कहलाते हैं| जो दोषी करार दिया जाए, मात्र उसपर ही हम प्रश्न करते हैं| जब भी यह अपराध हमारे “मेरे वाले धर्मगुरु” के नाम नहीं चढ़ता, हम उसके नाम का नमक बाजार से खरीदते खाते रहते हैं|

 

हमारी गोमती

अलीगढ़ शहर में जब आप थोड़ा बड़े होने लगते हो तो आगरा या दिल्ली में से एक आपको अपना दूसरा घर लगने लगता है| आजकल विकास की मार के कारण आगरा छूट गया है और दिल्ली – नॉएडा ही विकल्प बचे हैं| अलीगढ़ शहर से दिल्ली जाने के साधन कुछ भी हों, पर वो रेलवे ट्रैक पर ही चलते हैं| बस का विकल्प हमने एटा–मैनपुरी–कासगंज वालों के लिए छोड़ रखा है| पुराने समय में कभी एज़ीएन सुबह अलीगढ़ वालों को दिल्ली पहुंचा देती| बाद में ईएमयू ट्रेन नई दिल्ली और पुरानी दिल्ली तक जाने लगीं| बचे खुचे लोगों को हाथरस वालों को एचेडी और टूंडला वालों की टीएडी का आसरा रहता| मगर जलवा अगर रहा तो गोमती का, जिसे मगध के अलावा किसी ने चुनोती न दी|[1] भले ही दोनों ट्रेन आजकल भारत सरकार की गति की तरह ही ढुलमुल चलतीं हैं, मगर जलवा कायम है|

जिस ज़माने में बिहार की राजधानी से मगध सुबह सवा नौ तक आ जाती थी, अलीगढ़ वाले औकात से गिरना कम ही पसंद करते थे| मजबूरी को छोड़ दें तो, छोटे बनिए और उनके कुली ही मगध से जाते थे| उन दिनों और आजकल भी, लटककर ही सही मगर आन बान के साथ गोमती से जाना ही समझदारी है| गोमती में भले ही दो- चार अनारक्षित डिब्बे होते हैं मगर ये कहाँ होते हैं इसका पता लेखक को नहीं है| इसके चौदह पंद्रह आरक्षित कुर्सीयान डिब्बों में आरक्षण पागल, सनकी, बूढ़े, गर्भवती, बच्चेवालियाँ या नई-नवेलियाँ करातीं है| ये तो होली मिलन के दिनों में टीटी मिलने और अपने सालाना टारगेट का रोना सुनाने न आये तो पता भी न चले कि इसका आरक्षण किधर होता है| इन डिब्बों में बैठना, खड़े होना, लड़ना और लटकना मिलकर दोसौ से तीनसौ भलेमानस प्रति डिब्बा यात्रा करते हैं| इन डिब्बों में आप नैसर्गिक मनोरंजन करते, लड़ते – झगड़ते, कूदते-फाँदते, कोहनीबाजी और उंगलबाजी करते हुए आराम से सफ़र कर सकते हैं, वर्ना गप्प मारने और ताश पीटने के काम तो निठल्ले भी कर ही लेते हैं|

नए पैसे वाले लौड़े–लौंडियाँ आजकल एसी वैसी में चलने लगे हैं| इनकों दादरी और गाज़ियाबाद तक ही टिकना होता हैं| ये मोबाइल पकड़ प्रजाति कंप्यूटर की गुलामी करने को देश का विकास समझती है और इन्टरनेट पर भगत सिंह की क्रांति करती रहती है| धीरे धीरे अधेड़, परिवारीजन भी इस एसी में जाने लगे हैं; मगर जाड़ों में इसमें इतना दम घुटता है कि लालू याद आते हैं और चारा चोटाला तेल लेने चला जाता है| बकौल रेलवे, वोट के अलावा कुल जमा इन दो डिब्बों के लिए ही हो तो पूरी गोमती चलाई जाती है|

एक नेताजी टाइप डिब्बा भी है, उसका न पूछे| एक बार हमने पूछा था तो पता चला उसमें अम्बानी का चाचा, अखिलेस का ताऊ, माया का भाया, टाइप कोई होता है – कभी कभी| डिब्बा इसलिए होता है कि कहीं चाइना पाकिस्तान को पता न चल जाये कि इत्ती बड़ी गाड़ी में एक पिद्दी एसी फर्स्ट क्लास नहीं है|

[1] कृपया भूलकर भी इन्हें मगध एक्सप्रेस और गोमती एक्सप्रेस के वाह्यात सरकारी नामों से न पुकारें, भावनाएं आहत हो सकतीं हैं|

संस्कृत समस्या

मेरे लिए संस्कृत बचपन में अंकतालिका में अच्छे अंक लाने और मातृभाषा हिंदी को बेहतर समझने का माध्यम रही थी| बाद में जब संस्कृत सहित अपनी पढ़ी चारों भाषाओँ को आगे पढ़ने की इच्छा हुई तब रोजगार की जरूरतों ने उसे पीछे धकेल दिया| यदा कदा संध्या-हवन के लायक संस्कृत आती ही थी और पुरोहित तो मुझे बनना नहीं था| फिर भी संस्कृत पढ़ने की इच्छा ने कभी दम नही तोड़ा| जिन दिनों अलीगढ़ के धर्मसमाज महाविद्यालय में अध्ययनरत था संस्कृत पढ़ने की पूनः इच्छा हुई| उसी प्रांगण में धर्मसमाज संस्कृत महाविद्यालय भी था, जो प्रवेश आदि की जानकारी लेने पहुँचा| जानकारी देने वाले को दुःख हुआ कि मैं मुख्यतः धर्मग्रन्थ पढ़ने के लिए नहीं बल्कि कालिदास, शूद्रक, पंचतंत्र आदि साहित्य को पढने के संस्कृत सीखना चाहता था| उनका तर्क था कि यह सब तो अनुवाद से पढ़े जा सकते हैं| संस्कृत में कामसूत्र पढ़ना तो कदाचित उनके लिए पातक ही था| उनके अनुसार धर्मग्रन्थ पढ़कर अगर अपना जीवन और संस्कृत पाठ सफल नहीं किया तो जीवन और जीवन में संस्कृत पढ़ना व्यर्थ है|

विकट दुराग्रह है संस्कृत पढ़ाने वालों का भी| वेद –पुराण तक समेट दी गई संस्कृत एक गतिहीन अजीवित भाषा प्रतीत होती है| संस्कृत के बहुआयामी व्यक्तित्व को दुराग्रहपूर्ण हानि पहुंचाई जा रही है| एक ऐसी भाषा जिसमें जीवन की बहुत सारे आयामों पर साहित्य उपलब्ध है| संस्कृत को केवल धर्म तक समेट देना, उन लोगों को संस्कृत से दूर कर देता है जिन्हें धर्म में थोड़ा कम रूचि है|

अभूतपूर्व समर्थन के चलते संस्कृत विलुप्त होने की आशंकाओं से जूझ रही भाषाओँ में अग्रगण्य है| आपको मेरा आरोप विचित्र लगेगा और है भी| संस्कृत को समर्थन देने वालों का संस्कृत के प्रति एक धार्मिक दुराग्रह है| वह संस्कृत का प्रचार चाहते हैं और शूद्रों, मलेच्छों, यवनों, नास्तिकों के संस्कृत पढने के प्रति आशंकाग्रस्त भी रहते हैं| यह दुराग्रह संस्कृत को धर्म विशेष की भाषा सीमित भाषा बनाने का | कार्यकर रहा है| अन्यथा संस्कृत को समूचे भारत की भाषा बनाया जा सकता था|

समाचार है कि दिल्ली विश्वविद्यालय को अपने संस्कृत पाठ्यक्रम के लिए छात्र नहीं मिल सके हैं| कैसे मिलें? शिक्षक ने नाम पर दुराग्रही अध्यापक हैं| रोजगार ने नाम पर केवल अध्यापन, अनुवाद और पुरोहिताई है| आप आत्मसुखायः किसी को पढ़ने नहीं देना चाहते| संस्कृत पाठ्यक्रम में साहित्यिक गतिविधियों पर जब तक अध्यापक और छात्र ध्यान नहीं देंगे, यह पाठ्यक्रम नीरस बना ही रहेगा| जिसको पुरोहिताई, धर्म-मर्म आदि में रूचि है उनके लिए अन्य कुछ विश्वविद्यालय बेहतर विकल्प हैं|

यद्यपि आजकल सामाजिक माध्यमों में संस्कृत का प्रचार प्रसार करने के लिए भी कुछ गुणीजन समय निकालकर काम कर रहे हैं| परन्तु जब तक संस्कृतपंडितों के संस्कृत मुक्त नहीं होती, अच्छे दिन अभी दूर हैं|