रोग – उपरांत


पिछले साल करोना काल पर बहुत लिखा| प्रेक्षक होकर लिखना कितना सरल था?

बीमार होते ही आराम और मनोरंजन से आगे सोच नहीं पाते| मनोरंजन!! सकारात्मक शब्द का प्रयोग उचित तो है न?

जीवन की सच्चाई, ज्ञान, आत्मज्ञान, जीवन मृत्यु, सत्य, असत्य, कितने पराए लगते हैं? मृत्यु का भय नहीं, परन्तु स्वागत भी तो सरल नहीं – ओह! वसीयत तक नहीं लिखी| क्या नेत्रदान हो पाएगा – शवदान? अंतिम संस्कार तो प्रेतप्रश्न है – क्या चिंता?

चिकित्सक की चेतावनी: आप दोनों रोगग्रस्त हैं – आराम और उपचार के अतिरिक्त कोई कर्म नहीं| मन कहता है निपटा लो काम, कम से कम लेनदारी का हिसाब तो पीछे छोड़ जाओ| ओह! क्या पितामह की लेनदारियां वसूल हुईं थीं? चाचा जी बताते रहे हैं – भिखारी सा दुत्कार मिलता था| काम करने के तुरंत बाद कौन पैसा देता है? इस वक़्त तो सब लेनदार हैं, दाता बस राम| कितना सरल सा खाता है – क्या किया इतना पढ़लिखकर?

छोटी सी बेटी माँ बाप को पुकारती| दूर से दुलारता ममत्व? पूर्वजन्म का दृश्य घूम गया – सती होती माँ चिता से ही बेटी को दिलासा देती थी| कितना बुरा सोचता हूँ न मैं? हृदय हार गया और बेटी को गले लगा लिया, मास्क और दस्ताने पहन और पहनवा कर| बेटी रोती थी – उसने तो आज तक खुद रूमाल भी न उठाया था – अचानक बड़ी हो गई माँ बाप के गले लगने के लिए – कितनी छोटी हैं न वो| ममत्व नहीं जीता – रोग जीता| बेटी बीमार हुई| स्वयं को कोसना भी तो गलत है? कौन समझता दुःख? माँ – बाप ने आपस में समझ लिया – चिर मौन| जी कातर होता था| उन तीन दिन रोग और उपचार का असर न होता, तो नींद न आती| बीमार बच्चों के घर में कोई सोता है क्या? तीन दिन में बेटी ठीक हुई और फिर से अपनी सुध ली| सुध? उफ़, हम तो बेसुध ही थे|

चिकित्सक ने कहा था – जब तक मरण सामने ने दिखे चिकित्सालय जाने का न सोचना| मैंने कहाँ, अपना तो बीमा भी नहीं| बोले, तब तो जल्दी ठीक हो जाओगे – बीमारियाँ अनावश्यक औषध का बुरा मानतीं हैं| किसी चिकित्सालय में तिल धरने की जगह न थी तो जाकर क्या करते| खुद की तीमारदारी, ऊपर से सैकड़ों नीम हकीमों की उबाऊ सलाहें| नीम हकीम रूठते भी तो क्या खूब हैं – कोई कातिल महबूबा भी उतना खूब न रूठती होगी| एक ने तो रूठकर “जल्द ठीक होकर उठ जाओ” का भुना हुआ सन्देश दे फैंका| हाय तेरी मासूमियत – मर जवाँ| खुद से ही आँख ततेरी – चुप करो कुलक्षण – बड़े हैं हमारा बुरा नहीं चाहते होंगे|

ज्वर भी कितना उदास था| रूठ कर दिल से लगा बैठा था| हिलना तो दूर, न हँसता न रोता| एक सौ एक की गिनती पकड़ कर बैठा रहा पांच दिन| पत्नी का भी यही हाल पर उन्हें आठ दिन गुदगुदाता रहा| जिस दिन भाग्यवान की प्राणवायु ९० से उतरी, भले ही घंटे दो घंटे में वापिस बढ़ गई – दिल धड़कता न था – मशीन गिन जरूर रही थी| उनकी प्राणवायु और मेरी धड़कन ९२ पर टिक गई| दिलासा देने के लिए यह भी खूब बहाना था|

स्वाद और गंध जाने का एक फ़ायदा हुआ – बीमारों वाला जो भोजन मंगाया जा रहा था उसमें अपनी मर्जी के गंध और स्वाद की कल्पना कर कर तृप्त होना संभव था| जब स्वाद और गंध लौटे तो बेटे को गले लगाया – कितनी जल्दी झूठ बोलना सीख लिया रे| उसने बोला – आप ही तो कहते हो – जो मिले उसका स्वाद लेना सीखो| डपट दिया मैंने – सत्रह का पहाड़ा तो याद नहीं होता, बातें बनाना सीख लिया| उसे थिएटर नहीं कराना चाहिए था|

ठीक तो हो गए, जिन्दगी वापिस ढर्रे पर है, इस अनुभव का भी स्वागत है – पर दोबारा न आना प्रिय|

अलविदा|

शेर-हिरण की पहेली


अगर आप भूखे शेर को हिरण का पीछा करते देखें तो क्या करेंगे? पुरानी पहेली है| अगर आप कुछ नहीं करते तो कायर, नाकारा, मांसाहारी, हिंसक, शोषक, और मूर्ख मान लिए जाते हैं| मजे की बात हैं जो लोग हत्यारे अपराधी या बलात्कारी को छोड़िए जेबकतरे से भी किसी को बचाने का प्रयास नहीं करते, इस कल्पित पहेली के शेर के सामने कूद मरने के लिए आमादा रहते हैं|

यदि आपको हिरण के जीवन की चिंता है तो शेर का मुक़ाबला करने की जगह उसके लिए प्राकृतिक दुर्घटना में कुछ ही पल पहले मृत किसी जानवर का इंतजाम करना होगा| उसे हिरण या कोई और जानवर चाहिए, उसे ताज़ा मांस चाहिए होता है| यह श्रमसाध्य या लगभग असाध्य काम हम आप तो नहीं ही करेंगे| हम नहीं सोचेंगे कि शेर भूखा है और उसका भोजन घास नहीं मांस है| अगर आप शेर का सामना कर कर हिरण को बचा लेते हैं तो अपने आप को कई प्राकृतिक, धार्मिक और आध्यात्मिक प्रश्नव्यूह में फंसा लेते हैं| क्या आप अन्जाने में शेर की हत्या करना चाहते हैं? क्या आप हिरण के कार्मिक चक्र में हस्तक्षेप करना चाहते हैं? क्या आप ईश्वर निर्धारित प्राकृतिक भोजन श्रेणी को बदल देना चाहते हैं?

हिरण का जन्म किसी कार्मिक चक्र के कारण हुआ है और उसके जीवनचक्र के अनुसार उसका मरण होना ही है| जंगल की प्राकृतिक सम्भावना उसके शिकार होने में ही है| हम कुछ भी करें उनकी मृत्यु निश्चित है| हिरण के लिए हिरण योनि से मुक्ति का समय है| क्या हम इसमें हस्तक्षेप करेंगे?

शेर या कोई भी शिकारी जानवर भूख से अधिक शिकार नहीं करता और इस एक शिकार पर कई जानवरों और उसके उपरांत सैकड़ों क्षुद्र कीटों का उदर पोषण होता है| शेर यदि मात्र मनमौज के लिए भूख से अधिक शिकार करता है तो उसके लिए पाप होता है| यह पाप तो तब भी होता है जब हम शाकाहारी या सात्विक भोजन भी भूख से अधिक खाते हैं और उदररोग का दण्ड पाते हैं जो मोटापे से लेकर कई कष्टों तक जाता है|

शेर और हिरण की इस पहेली में हमें मात्र प्रेक्षक ही बनना है| यह हमारा दण्ड या पुरस्कार हो सकता है| निर्लिप्त प्रेक्षक बनकर आप ईश्वर और ईश्वरीय नियम में आस्था रखते हैं| सबसे बड़ी बात आप अपने आप को हत्या करने से बचा लेते हैं|

नए ब्लॉग पोस्ट की अद्यतन सूचना के लिए t.me/gahrana पर जाएँ या ईमेल अनुसरण करें:

Enter your email address to subscribe to this blog and receive notifications of new posts by email.

भीषण लू-लपट और करोना


विश्व-बंदी २६ मई – भीषण लू-लपट और करोना

जब आप यह पढ़ रहे होंगे तब भारत में करोना के डेढ़ लाख मामलों की पुष्टि हो चुकी होगी| कोई बुरी खबर नहीं सुनना चाहता| मुझे कई बार लगता है कि लोग यह मान चुके हैं कि यह सिर्फ़ दूसरे धर्म, जाति, वर्ग, रंग, राज्य में होगा| सरकार के आँकड़े कोई नहीं देखता न किसी को उसके सच्चे या झूठे होने का कोई सरोकार है| आँकड़ों को कलाबाजी में हर राजनैतिक दल शामिल है हर किसी की किसी न किसी राज्य में सरकार है| कलाबाजी ने सरकार से अधिक समाचार विक्रेता शामिल हैं जो मांग के आधार पर ख़बर बना रहे हैं| जनता शामिल है जो विशेष प्रकार कि स्वसकरात्मक और परनकारात्मक समाचार चाहती है|

इधर गर्मी का दिल्ली में बुरा हाल है| हार मान कर कल घर का वातानुकूलन दुरुस्त कराया गया| चालीस के ऊपर का तापमान मकान की सबसे ऊपरी मंजिल में सहन करना कठिन होता है| खुली छत पर सोने का सुख उठाया जा सकता है परन्तु सबको इससे अलग अलग चिंताएं हैं|

मेरा मोबाइल पिछले एक महीने से ख़राब चल रहा है परन्तु काम चलाया जा रहा है – इसी मैं भलाई है| तीन दिन पहले एक लैपटॉप भी धोखा दे गया| आज मजबूरन उसे ठीक कराया गया| उस के ख़राब होने में गर्मी का भी दोष बताया गया|

इस सप्ताह घर में गृह सहायिका को भी आने के लिए कहा गया है| क्योंकि पत्नी को उनके कार्यालय ने सप्ताह में तीन दिन कार्यालय आने का आदेश जारी किया है|

यह एक ऐसा समय है कि धर्म और अर्थ में सामंजस्य बैठना कठिन है – धर्म है कि जीवन की रक्षा की जाए अर्थ विवश करता है कि जीवन को संकट मैं डाला जाए| मुझे सदा से घर में कार्यालय रखने का विचार रहा इसलिए मैं थोड़ा सुरक्षित महसूस करता हूँ| मैं चाहता हूँ कि जबतक बहुत आवश्यक न हो घर से बाहर न निकला जाए| मैं अति नहीं कर रहा चाहता हूँ कोई भी अति न करे| न असुरक्षित समझने की न सुरक्षित समझने की| गर्मी और करोना से बचें – भीषण लू-लपट और करोना का मिला जुला संकट बहुत गंभीर हो सकता है|

Enter your email address to subscribe to this blog and receive notifications of new posts by email.