लोरियां

बचपन में हम सबने सुनीं हैं लोरियां| माएं, दादियाँ, नानियाँ सुनातीं थी लोरियां| जब पिता के मन में ममता जागती है, तब भी लोरी सुनाई देती है|

लोरियां माँ के दूध के बाद ममता का सबसे मीठा भाव है| संगीत और शब्द का नैसर्गिक सरल और सुलझा हुआ रूप लोरियां| अधिकतर लोरियां स्वतःस्फूर्त होतीं है| शांत रात्रि में जब बच्चा गोद में आता है तब हृदय में पैदा होने वाले स्पंदन से निकलती हैं लोरियां| कभी धुन नहीं होती तो कभी शब्द नहीं होते… ध्वनि होती है, भावनाएं होती हैं| लोरियां बनती बिगड़ती रहती हैं| अक्सर याद नहीं रहती, याद नहीं रखीं जातीं|

फिर भी कई बार होता है, लोरियां कवि और गीतकार गाते हैं, शब्दों और धुनों में पिरोते हैं| कभी कभी माओं का हृदय शब्दों को यादगार लोरियों में बदल देता है| ऐसी लोरियां लोकगीत की तरह समाज में विचरतीं है, फिल्मों में गाई जातीं है| उनके संकलन भी आते हैं|

हाल में मैंने यह पुस्तक खरीदी है – लोरियां| एक छोटी सी बच्ची के पिता को खरीदना भी और क्या चाहिए? इसमें कुछ लोकलोरियां हैं तो महाकवियों की प्रसिद्ध लोरियां भीं हैं| हालाँकि कुछ गीतों को शायद गलती से लोरी कह दिया गया है| जैसे – जसोदा हरि पालने झुलावै|

कवियों और गीतकारों की लिखी लोरियों में ममता का भाव कम रह जाता है, काव्य और गीत का तकनीकी पक्ष मजबूत होने लगता है| इसमें कुछ अच्छे प्रयास भी हुए है| कई बार प्रसिद्ध गीतकार और कवि बेहतर शब्दों के जाल में उलझकर साधारण सी लोरी लिख पाते है| दूसरी ओर एक स्वतःस्फूर्त लोरी लिखे जाने पर उतनी सुन्दर नहीं जान पड़ती जितना वो ममतामयी गले से गाये जागते समय होती है|

आज जब लोरियां गाने का समय टेलीविजन के सामने निकल जाता है| लोरियों का अपना महत्व बरकारार है| यह हमारे शिशुओं का प्राकृतिक अधिकार है कि वो ममतामयी धुनें, शब्द और गीत सुने – लोरियां सुनें| यह पुस्तक इस दिशा में उचित कदम है|

शकुंतला सिरोठिया, कन्हैयालाल मत्त, प्रकाश मनु की लोरियां, लोरियों के नैसर्गिक सौंदर्य के निकट है| अन्य लोरियां गेय कम पठनीय अधिक हैं| कुल मिलकर पचास लोरियों की यह पुस्तक संग्रहणीय है|

 पुस्तक – लोरियां

लेखक – संकलन

प्रकाशक – राष्ट्रिय पुस्तक न्यास

प्रकाशन वर्ष – 2011

विधा – लोरी

इस्ब्न – 9788123761817)

पृष्ठ संख्या – 54

मूल्य –  45 रुपये

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नीम का पेड़

नीम का पेड़ पढ़ते हुए आपको हिन्दुस्तान की उस राजनीति दांव –पेंच देखने को मिलते हैं, जो आजादी के बाद पैदा हुई| हमारी हिन्दुस्तानी सियासत कोई शतरंज की बिसात नहीं है कि आप मोहरों की अपनी कोई बंधी बंधी औकात हो| यहाँ तो प्यादे का व़जीर होना लाजमी है| व़जीर की तो कहते हैं औकात ही नहीं होती, केवल कीमत होती है| यूँ नीम का पेड़ सियासत और वजारत की कहानी नहीं होनी चाहिए थी, मगर हिन्दुस्तानी, खासकर गंगा- जमुनी दो-आब के पानी रंग ही कुछ ऐसा है सियासत की तो सुबह लोग दातून करते हैं| ऐसे में नीम के पेड़ की क्या बिसात, ये तो उस लोगों का कसूर है जो आते जाते उसे नीचे बतकही करते रहे होंगे| वर्ना तो जिस आँगन में उसने अपनी तमाम उम्र गुज़ारी वहां गुजरा तो गुजरा कुछ होगा|

नीम का पेड़ इस उपन्यास में शायद अकेला ऐसा शख्स है, जो आज के ज़माने में नहीं पहचाना जा सकता| रही मासूम रज़ा की यहीं मासूमियत रही कि उन्होंने एक पेड़ को सूत्रधार होने का मौका दिया| यहीं काम अगर उस कलई के उस पुराने लोटे बुधई के आंगन में पड़ा रहा करता होगा, तो आप पहचान जाते कि ये कौन है| उस लोटे और उसकी घिसी हुई पैंदी का जिक्र न करकर रज़ा साहब ने इस देश की सियासत के पालतू टट्टुओं के साथ न इंसाफी कर दी है| आदर्शवादी लोगों से अक्सर ऐसी गलतियाँ हो जातीं हैं|

ये कहानी उन दो पुराने रिश्तेदारों की है, जिनको जमींदारी के बैठे ठाले दिनों में सियासत खेलने का चस्का लगा होगा| जमींदारी जाती रही| जमींदारों और नबाबों को लगा कि बदल कर ओहदों का नाम बदलकर विधायकी और सांसदी में तब्दील हो गया है| हुआ दरअसल यूँ उलट कि विधायकी और सांसदी जमींदारी और नबाबी बन गई| बदलते वक़्त के साथ, नए प्यादे आते गए, वजारत बदलती रहीं और व़जीर बिकते रहे|

नीम के पेड़ की कहानी इतनी सरल है कि आप गौर भी नहीं करते कि सियासत में दांव खेल कौन रहा है| कहानी बदलते हिंदुस्तान की जमीन से उठती है| यह कहानी इन वादों का इशारा करती है जिनके बूते वोट खींच लिए जाते है| यह कहानी उस आदर्शवाद जिसके जीतने की हम उम्मीद करते हैं|

पुस्तक – नीम का पेड़

लेखक – राही मासूम रज़ा

प्रकाशक – राजकमल प्रकाशन

प्रकाशन वर्ष – 2003

विधा – उपन्यास

इस्ब्न – 978-81-267-0861-1

पृष्ठ संख्या – 350

मूल्य – 350 रुपये

अकबर

अकबर का दौर अजीब हालत का दौर था| एक बदहवास सा मुल्क सकूं की तरफ बढ़ता है| अपनी लम्बी पारी से भी और बहुत लम्बी पारी खेलने की चाह में अबुल मुज़फ्फर जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर बादशाह ने अपनी हालत कुछ अजीब ही कर ली थी| यह उपन्यास उस “हालत –ए – अजीब” से शुरू होता है, जिसमें बादशाह सलामत कह उठे थे – “गाइ है सु हिंदू खावो और मुसलमान सूअर खावो|” यह वो शब्द है जिनको मूँह से निकलने पर तब और आज सिर्फ जुबां नहीं, सिर कट सकते हैं, और तख़्त बदल उठते हैं| यह वो बादशाह अकबर है, जिन्हें न सिर्फ पूर्व जन्म में शंकराचार्य के श्रेष्ठ ब्राह्मण कुल में जन्मे मुकुंद ब्राह्मण का अवतार बताया गया बल्कि जो खुद “अल्लाहो अकबर” को नए अर्थ देने की कोशिश में पाया गया| यह वो अकबर बादशाह है जो बाद में “दीन – ए- इलाही” की शुरुआत करता है और छोड़ सा देता है| वह बादशाह अकबर जो, “जैसे जिए वैसे मरे| ना किसी को पता किस दीन में जिए, ना किसी को पता किस दीन में मरे|”

यूँ; पुस्तक को पढ़ने और पसंद करने के बाद भी इसकी विधा के बारे में सोचना पड़ता है | हालांकि लेखक प्रकाशक इसे उपन्यास कहते हैं| मैं इसे ऐतिहासिक विवरण कहूँगा| हम सबको पढ़ना चाहिए| हिंदी में ऐतिहासिक उपन्यास बहुत है| शाज़ी ज़मां का “अकबर” इतिहास का पुनर्लेख है जिसे औपन्यासिकता प्रदान करने का कठिन प्रयास लेखक ने किया है| वो कुछ हद तक सफल होते होते असफल हो जाते हैं| असफल इसलिए कि आप पाठक इस से ऊब जाता है| तमाम प्रसंगों में सन्दर्भों की भरमार है| बकौल शाज़ी ज़मां, “इस उपन्यास की एक-एक घटना, एक-एक किरदार, एक-एक संवाद इतिहास पर आधारित है|”

समय, सनक और समझ से जूझते अकबर बादशाह की टक्कर पर हिंदुस्तान में डेढ़ हजार साल पहले सम्राट अशोक का जिक्र आता है| इन दो से बेहतर नाम महाकाव्यों में ही मिल सकते हैं| अकबर की जिन्दगी के ऊँचे नीचे पहलू इस विवरण में आए है जिनमें से एक को, इस पुस्तक को बाजार में बेचने के लिए भी उछाला गया था – अकबर के मूंह से निकली एक गाली जिसे तमाम हिंदुस्तान आज भी देता है| पुस्तक अकबर को उसके समकालीन लेखकों और इतिहासकारों के नज़रिए से हमारे सामने रखती है| अकबर के समकालीन इतिहास की जानने समझने के लिए यह महत्वपूर्ण विवरण प्रदान करती है| साथ है, हिंदुस्तान का अपना माहौल आज भी कुछ ज्यादा नहीं बदला है इसे समझा जा सकता है|

यह विवरण उपन्यास तो नहीं बन पाया है साथ ही उन महत्वपूर्ण बातों से नज़र चुराता सा निकल गया है जिन्हें इसके पत्रकार – इतिहासकार लेखक छु सकते थे| मसलन अकबर के हिंदुस्तान का फ़ारस, तुर्की, पुर्तगाल और पोप के साथ रिश्ता तो चर्चा में आता है; मगर उन हालत के बारे में टीस छोड़ जाता है जो तुर्की और इस्लाम के यूरोप और ईसाइयत से रिश्ते की वजह से पैदा हुए थे और नतीजतन हिंदुस्तान और दुनिया की तारीफ में बहुत उठापटक हुई| अकबर के जाने के बाद का दौर, धर्मतंत्र और राजतन्त्र के कमजोर होने का दौर भी था जिसने बाद में संविधानों और राष्ट्रों के लिए रास्ता खोल दिया था|

कुल मिला कर किस्सा यह शेख़ अबुल फ़ज़ल के अकबरनामा और मुल्ला अब्दुल क़ादिर बदायूंनी के ख़ुफ़िया मुन्तखबुत्तावारीख के इर्द गिर्द बुना गया है और इसमें तमाम लेखकों और इतिहासकारों की लिखत को रंगतभरे खुशबूदार मसालों के साथ परोसा गया है|

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पुस्तक – अकबर

लेखक – शाज़ी ज़मां

प्रकाशक – राजकमल प्रकाशन

प्रकाशन वर्ष – 2016

विधा – उपन्यास

इस्ब्न – 978-81-267-2953-1

पृष्ठ संख्या – 350

मूल्य – 350 रुपये

 

मानव संसाधन विभाग की अनकही

मानव संसाधन विभाग को कंपनियों में सबसे अधिक उबाऊ माना जाता है और प्रायः उन्हें किसी सफलता का श्रेय नहीं मिलता| बहुत सी कंपनियां इस विभाग के काम को ठेके पर करवातीं हैं, मगर इससे लाभ शायद ही होता हो| यहाँ शांत मुद्रा में बैठे लोग ऐसे कारनामे करते हैं जो किसी बैलेंस शीट, प्रॉफिट लोस अकाउंट या एनुअल रिपोर्ट में नहीं आते| उन के जिक्र कंपनियों के कागजात में केवल खर्च के रूप में दर्ज होते हैं|

हरमिंदर सिंह का अपना ब्लॉग बेहद चर्चित और अपने खास मुद्दे पर शायद इकलौता हिंदी ब्लॉग है| हरमिंदर वृद्ध्ग्राम नाम से एक बेहतर ब्लॉग लिखते हैं| उनके ब्लॉग ने समय समय पर मीडिया और सामाजिक मीडिया में स्थान बनाया है| हरमिंदर सिंह ने मानव संसाधन से सम्बंधित पढाई – लिखाई के बाद मानव संसाधन विभाग में नौकरी भी की है और उस पर अब उपन्यास भी लिख दिया है| यह हरमिंदर का पहला उपन्यास है और विभागीय अनुभव का भरपूर लाभ उन्हें मिला है|

हरमिंदर सिंह अपनी शांत शैली में यह पूरा उपन्यास लिख गए हैं| अगर आप किसी कंपनी में नौकर रहे हैं तो आप इस शैली को पहचान पाएंगे| यूँ हरमिंदर हमेशा ही शांत लिखते हुए अपनी और पाठक की उत्तेजना पर काबू रखते हैं| उनके पात्र अपना क्रोध और प्रेम प्रदर्शित करते हुए लगभग शांत रहे हैं| कथानक में उपन्यासों जैसी उठापटक और गतिशीलता नहीं है| सारी कहनियाँ अलग अलग दिन की घटनाओं का जिक्र भर है, जो की उपन्यास के नाम से भी मालूम होता है| पूरा उपन्यास इन छोटी छोटी कहानियों से मिलकर साकार होता है| कब यह छोटी छोटी घटनाएँ मिलकर उपन्यास का रूप ले लेती हैं, पाठक को पता ही नहीं चलता|

पाठक को अंतिम दो अध्याय तक समझ नहीं आता कि कहानी शुरू कब हुई? कुछ पाठकों के लिए यह उबाऊ हो सकता है| आप पढ़ते पढ़ते मूल कहानी को ढूंढते रह जाते हैं| मगर इसकी खूबसूरती है, उपन्यास की छोटी छोटी कहानियों में छिपी मूल कहानी को लगभग दोबारा पढ़कर ढूँढना पड़ता है|

सूत्रधार मानव संसाधन विभाग में नया भर्ती हुआ है| स्वभावतः उसकी सोच में नौकरी और जीवन से जुड़े पहलू छाये रहते हैं| स्वभाव से गंभीर होते हुए कई बार वो दार्शनिक होते होते रह जाता है मगर पते की कई बातें करता है| उसकी छोड़ी हुई सूक्तियां उपन्यास में जगह जगह छितरी पड़ी हैं| विभाग की उबाऊ जिन्दगी को रंगते हुए कर्मचारी जीवन में आगे बढ़ रहे हैं| उनके बीच का हास्य, प्रेम, भावुकता, आदि नामालूम तरीके से आगे बढती हैं| लेखक उन भावनाओं की स्वाभाविक गंभीरता बरकरार रखने में कामयाब रहा है| अधिकतर उपन्यास अपने रसीले वर्णन में अपना औचित्य खो बैठते हैं| परन्तु इस उपन्यास की यह शांत शैली उनको वास्तविकता प्रदान करती है|

हमेशा चमत्कार की प्रतीक्षा करते हिंदी साहित्य जगत में इस उपन्यास को शायद कोई महत्व न दिया जाए| हो सकता है यह उपन्यास हिंदी की खेमेबाजी से बचकर दूर निकल जाए| उपन्यास की भाषा वर्तमान प्रचालन की रोजमर्रा वाली गंगा जमुनी हिंदी है| पंडिताऊ संस्कृतनिष्ठ होने का कोई आग्रह इसमें नहीं हैं| उपन्यास की गति का धीमा होना उसके पाठ में बाधा नहीं बनता बल्कि उचित समय पर समाप्त होकर उपन्यास पाठक को एक आकर्षण में बांध लेता है|

पुस्तक – एच. आर. डायरीज़ – मानव संसाधन विभाग की अनकही

लेखक – हरमिंदर सिंह

प्रकाशक – ओपन क्रेयोंस डॉट कॉम

प्रकाशन वर्ष – 2016

विधा – उपन्यास/कहानी

इस्ब्न – 978-93-52017-78-2

पृष्ठ संख्या – 180

मूल्य – 210 रूपये

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Bhrigu Mahesh, PhD – the thriller

This weekend, I finished this book, Bhrigu Mahesh, PhD THE WITCH OF SENDUWAR, a thriller. This is a first book by a budding author. It seems a book published under self publishing option.

The author, Nisha Singh is a crime fiction enthusiast who has written short stories for several publications. She enjoys reading and watching movies and currently resides somewhere in Uttar Pradesh. As Nisha Singh is a trained pharmacist, I presumed it a medical crime thriller, but it is not.

A detective is on a quest to solve a complex mystery to separate truth from a local legend.  Superstitious villagers believe that a witch killed as punishment an innocent boy. His mother believes otherwise. Nothing mysterious seems about death of a child, whose brain is not so developed. Any child in India falls from rooftop and die. This is one common happening in Indian villages. This is also true that illiterate villagers believe some supernatural power regulates such deaths.  This thriller is successful to build a case for investigation with some suspicious events thereafter.

The story has so repetitively explained that readers may predict final story. However, there are many small filler incidents which distract mind of readers from guess but not for long period. Readers want to know with intelligent guesses how case may be otherwise. Half of mystery solved in mind of readers but readers become interested to know how, why and where detective reached to the conclusion. Same time, first chapter of the thriller compel readers to read further to connect significance of this parallel story. Readers guessed again correctly.

The detective and his scribe talk more, discuss points to irritate readers. Yes, book following famous Sherlock Holmes and Dr. Watson story format. I immediately lost interest in at least one character in the thriller, as he is nothing intelligent to do in such thriller. The long discussion between detective and his scribe seems to be filler for otherwise a short story.  They discuss more, readers seems to be less interested. There are few turning points where mystery may take sharp turn but interestingly, all these points proves to be useless and story remain same.

Thriller is not well researched. In a motion picture, one can overlook minor details but not the book. Minor details usually leave impact in mind of a good reader. Story is woven around a remote village somewhere in Bihar. Tendu leaves are not a produce there, but mentioned in the book. This may be good if, author paid a visit or two to a place in that region to have firsthand knowledge about geography, culture, agriculture, buildings, and social order etc. Such minor details when goes wrong kills joy of reading thriller.  Some important facts in story itself are not corroborated correctly. Date Saturday 14th June become Saturday 13th June without reason. Writer had not spent time on editing.  Lack of professional editing reflects prominently from the book.

With proper edition, 2nd edition of book may have about 200 pages and correct fact.

P.S. This is a family thriller – murder mystery with little dose of romance. I count it a plus point.

Book Details

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Title: Bhrigu Mahesh, PhD THE WITCH OF SENDUWAR
Authors: Nisha Singh
Publisher: Partridge
Publishing year: 2016
Genre: Fiction – Crime thriller, Mystery,
ISBN: 978-1-4828-7322-1
Binding: paperback
Number of Pages: 311
Price: Rs. 499

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विक्रम नायक के लोग

विक्रम नायक से बात करते समय आपको जिन्दगी के किरमिच (canvas)  का वो हिस्सा दिखाई देता है, जिसे आप जिन्दगी भर ‘अर्जुन की आँख’ बनने के फेर में नजरअंदाज कर देते हैं| विक्रम जिन्दगी को कितना करीब से बारीकी से और ‘दोनों आँखों’ से देखते हैं, उसकी बानगी आपको उन रेखाचित्रों में मिल जाएगी जिन्हें तमाम ‘लप्रेकों’ में मूल पाठ से दो कदम आगे या पीछे रचा गया है|

मेरे हाथ में विक्रम नायक की वो पुस्तिका है, जो ‘बिन मांगे मोती मिले’ की तर्ज पर मुझे उपहार में दी थी| मैं आज लेखक, चित्रकार, फिल्मकार, अभिनेता, निर्देशक, और मित्र को भूल कर उस कार्टूनिस्ट की बात करना चाहता हूँ जो इस संग्रह में है|

संग्रह के मुखपृष्ठ पर हाथी देश का नक्शा है, जिसे आँख पर पट्टी बांधे लोग महसूस कर रहे हैं| किताब के अन्दर एक पन्ने पर गाँधीजी की मूर्ति के नीचे एक बच्चा सेब खाने की कोशिश कर रहा है – वही आई-फ़ोन वाला|

‘सेव टाइगर’ के वक्त में ‘सेव फार्मर’ की बात भी हैं| लोग उस अर्थतंत्र को भी देखते है जिसमें आम जनता के दिनभर परिश्रम करने से खास जनता के घर में दौलत आती है| यह वो देश है जिसमें हम सबको हजारों अधिकार हैं, उन अधिकारों को प्राप्त करने के लाखों तरीकें हैं और अधिकारों का हनन करने वाले कर्तव्य का पाठ पढ़ाते मिलते हैं|

मैं एक पन्ने पर रुक गया हूँ, आंकड़ों में एक भूख कम हो गई है, सरकार भुखमरी मिटा रही है न| जी हाँ, एक भूख मर गई है – भुखमरी से|

एक सरकारी नहर हैं, नेताजी को उसमें तैराकी का मन किया तो लव लश्कर के साथ पहुंचे| देखा तो एक चरवाहे की भेड़ें नहर में चर रहीं हैं| अब, जब गाँव में बाढ़  आएगी तभी तो नहर में पानी आएगा न| चरवाहा कुछ ऐसा ही नेताजी को समझाने की कोशिश कर रहा है|

अरे, इस पन्ने पर कुछ कुत्ते बैठे हैं, बीच में रखी हड्डी को लेकर चर्चा हो रही है| जब आम सहमति बन जाएगी तो हड्डी पर कार्यवाही होगी| विक्रम तो नहीं बताते मगर लगता है, इन कुत्तों ने कुछ दिन पहले ‘किसी’ को काट लिया होगा|

अरे याद आया, गांधीजी के तीन बन्दर थे न| वही जो कहीं गायब हो गए थे| अब नया बन्दर आया है, जिसके कानों पर एअर-फ़ोन, आँखों पर चमकीला चश्मा और मूँह में ड्रिंक लगा हुआ है| उसे अब अच्छा दीखता हैं, अच्छा ही सुनाई देता है और अच्छा ही स्वाद आता है|

एक जमाना था जब जनता राशन की लाइन में घंटों खड़ी रहती थी और राशन नहीं मिलता था, अब अच्छे दिन आ गए हैं| जनता अब कुर्सियों पर बैठ कर इन्तजार करती है|

यह सब एक बानगी है, विक्रम नायक के लोगों की|

6 Degrees – Game of Blogs

Name of 5 characters are same. Descriptions of these 5 characters are same. They are characters of 3 different stories, not written by 3 different fiction writers but by 3 different teams of bloggers. Location of these stories is one – Mumbai. Is it case of plagiarism? Oh no! All this is in one book, yes one book.

“6 Degrees – Game of Blogs” is a collection of 3 fictions written by three teams and have 3 different dimension of fiction writing. All three stories have suspense and thrill. Each story has about 30,000 words spanning more than 120 pages.

Bloggers participated in a blogging event called “Game of Blogs” organised by BlogAdda. Descriptions of Five character and a few other details were shared. The bloggers were put into teams of 8-10, and each team must come up with a story. 10 days to come up with 10 episodes. The best teams move forward to the next round. 3 rounds of this game of blogs were not a simple fun but a hard competition. 300 bloggers from 30 locations participated. One this is most common – the collaborative spirit. After 3 rounds, 3 teams emerged as winners and those stories were published into a book – 6 Degrees – Game of Blogs.

The Awakening

This is a science fiction where mythology is used to carry fiction forward. This makes approach different but lovable mix of myths, science, family, and thrill – for we Indians. A closely knit family of three was living a happy life in Mumbai. Two guests appear from nowhere. Page by page new mysteries reveals themselves. Humanity came into danger and need urgent intervention from some sort of superpower.  Though, readers assume the climax well before, how events turn up is real fun.

Entangled Lives

This is a murder mystery with lot of drama and doubts.  A loosely knit happy family of three with one maid suddenly face murder in the house in presence of two strangers. No one knows the criminal. Police investigations legally ended up with a confession which creates doubt in mind of investigating officer. But, mystery never solved legally. This is strongly built and best story in the book.

Missing – a journey within

A daughter of happy family goes missing. A son of another happy family leaved the hope and home. Fortune bring them to same point of time and place to make them friend. This story has well knitted stories of different characters.

This book is a nice collection of collaborative spirit of creative minds to develop same idea into different direction into well knitted, well crafted, well-developed, well written, well-edited, well presented fictions. Language is easy English with few local terms from Mumbai and Delhi. Stories has good and steady pace with required melodrama and suspense.

Book Details

Title: 6 Degrees – Game of Blogs
Authors: 3 teams of bloggers
Publisher: Leadstart Publishing, Mumbai
Publishing year: 2016
Genre: Fiction – Science Fiction, Murder Mystery, Thriller,
ISBN: 978-93-5201-389-0
Binding: paperback
Number of Pages: 422
Price: Rs. 349

Team of Bloggers:

The Awakening – Team by lines

Anmol Rawat – http://anmolrawat.blogspot.in
Preethi Venugopal – http://tulipsandme.blogspot.in
Saumyaa Verma – http://callitate.blogspot.in
Tina Basu – http://twinklingtinawrites.blogspot.in
Ashutosh Bhandari – http://aybeescorner.blogspot.in
Paresh Godhwani – http://pareshgodhwani.blogspot.in
Prerna Maynil – http://prernamaynil.blogspot.in
Ramanathan P – http://allthreeaces.com

Entangled Lives – Team Potliwale Baba

Shoumik De – http://thesolutionbaba.wordpress.com
Srilakshni I – http://iamstri.wordpress.com
Sneha Bhattacharjee – http://snehabhattacharjee.blogspot.in
Hemant – http://shoooonya.blogspot.in
Shamim Rizwana – http://livelaughlovewithsharu.wordpress.com
Nirav Thakkaer – http://niravthakker.com
Tushar – http://tusharmangl.blogspot.in
Ritu Pandey – http://altruisticgirt.wordpress.com

Missing – A Journey within – Team Tete – a – Ten

Sharon D Souza – http://thekeybunch.com
Oindrila De – http://notallmoonshine.blogspotin
Anupriya Mishra – http://anupriyamishra.com
Vaisakhi Mishra – http://thewordpool.blogspot.in
Tinu Menachary – http://someolfnewstuff.blogspot.in
Gauri Kamath – http://survivaloftheoptimist.blogspot.in
Ritesh Agrawal – http://abookisasexything.com
Aayan Banarjee – http://gyanban.com
Raghu Chaitanya – http://ummwowhuh.blogspot.in

6 Degrees is India’s first book published through collaborative blogging, written completely by bloggers for the Game of Blogs activity at BlogAdda. Know more about Game of Blogs here. You can buy 6 Degrees: Game of Blogs if you liked the review.