बीमाकृत बचत


पिछले दो दशक में पर्यावरण सुरक्षा दिवाली के अवसर पर एक बड़ा प्रश्न रहा है| एक बार फिर से आर्थिक सुरक्षा का प्रश्न सामने खड़ा है|

नोटबंदी के बाद से कोई भी भारतीय अपनी मुद्रा में बचत्त और निवेश नहीं करना चाहता| मुद्रास्फीति का सामना करने वाले भारत जैसे देशों में मुद्रा में निवेश करना कोई भी समझदारी नहीं है| परन्तु यह भी सही बात हैं कि नोटबंदी होने तक मुद्रा बचत निवेश का सबसे सरल और तरल माध्यम था| भौगोलिक विशालता वाले देश में मुद्रास्फीति लागत के मुकाबले अन्य निवेश संसाधन तक पहुँचने की लागत अधिक रही है| अब यदपि स्तिथि में बड़ा बदलाव महसूस होता है| मुद्रा में निवेश मंहगा और अधिक जोखिम भरा है|

मुद्रा के बाद सरल तरल माने जाने वाले निवेश सोना, चाँदी, और संपत्ति कभी भी तरल नहीं रहे| यह निवेश भावनात्मक लगाव के कारण समय पर काम नहीं आते| अति गंभीर स्तिथि में इनकी कीमत और तरलता बुरी तरह गिर जाती है|

इसके बाद बैंक बचत खाता एक बड़ा सरल और तरल निवेश विकल्प है| परन्तु इसमें निवेशक को पूर्ण सुरक्षा वादा मात्र एक लाख रुपये तक के निवेश तक ही मिलता है| हाल के बैंक घोटालों और बैंक असफलता के बाद, बैंक अपने ग्राहकों को दिए जाने वाले दस्तावेज़ों पर मोहर लगाकर मात्र एक लाख तक के बीमा की जानकारी दे रहा है| यह बैंक की तरफ से उचित कदम है| परन्तु सुरक्षा की दृष्टि से हमारे पास क्या विकल्प है?

पहला विकल्प हो सकता है कि हम हर बैंक के बचत खाते में एक एक लाख रूपये का निवेश करें| परन्तु ऐसा करने से हमारे बचत खातों के निष्क्रिय घोषित होने का ख़तरा पैदा होता है| डाकघर बचत बैंक एक विकल्प हो सकता था परन्तु यह अब सरकारी विभाग नहीं रहा और इसमें निवेश करना बैंक निवेश से समान ही जोखिम भरा है|

हम भारत सरकार के सार्वभौमिक प्रतिभूति प्रपत्रों में निवेश कर सकते हैं| सरकारी प्रतिभूति निवेश बैंक निवेश से अधिक सुरक्षित है| इस की अपनी एक सीमा है| निवेशक अपनी मर्जी से निवेश नहीं कर सकता बल्कि सरकार तय करती है कि उसे किस सीमा तक उधार लेना है| पिछले दशक में कई देशों की सार्वभौमिक प्रतिभूतियों को भी असुरक्षित माना गया है|

मैं सामान्य निवेशक को बैंकों और निजी क्षेत्र की कंपनियों के सावधि जमा की सुरक्षा सम्बन्धी जोखिम के बारे में बताना चाहूँगा| इन सब के पास किसी न किसी क्रेडिट रेटिंग एजेंसी से ली गई क्रेडिट रेटिंग हो सकती है| परन्तु इनका कोई बीमा नहीं होता| कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय ने २०१४ में एक क़ानून बनाकर निजी क्षेत्र के कंपनियों को जमा बीमा करने के निर्देश दिए थे| परन्तु कोई बीमा कंपनी जमा बीमा करने के लिए तैयार नहीं हुई| हारकर १५ अगस्त २०१८ को सरकार ने जमा बीमा का प्रावधान वापिस ले लिया|

समझने वाली बात यह है कि हमें जानना और मानना चाहिए कि लगभग सभी निवेशों में अपने जोखिम हैं| हम को निवेश पर निगाह रखनी चाहिए| हिन्दू धर्म की अपरिग्रह और इस्लाम की केवल व्यावसायिक निवेश करने की सलाह को मानना चाहिए| दिवाली पर लक्ष्मी पूजन से पहले सरस्वती और गणेश पूजन के पीछे की अवधारणा को समझा जाए|

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बचकाना बिचौलिया


पिछली पोस्ट बंद होते बैंक में मैंने लिखा था:  बैंक का बिचौलियापन पूँजी बाजार से ख़त्म होना चाहिए| इसके लिए निवेशक के रूप में आमजन को जागरूक होना होगा|

बैंक उद्योगीकरण के समय की पूंजीवादी जरूरत थी जो जल्द ही एक धुर-पूंजीवादी विचार में बदल गया| बैंकों ने आमजन का पैसा लेकर उद्योगपति को देना शुरू किया| लुटे पिटे आमजन के लिए धन कमाने और खुद को साहूकार समझने का यह सुहाना मौका था| परन्तु जल्द ही बैंक पूंजीपति के हाथ के खिलौने बन गए| पूंजीपति से मिले ब्याज और बैंक के खर्च से बचा ख़ुचा धन ब्याज के नाम पर जमाकर्ता को मिलने लगा| आज भी वास्तव में पूंजीपति ही ब्याज के दर तय करता है – भले ही अब यह लोबिंग के माध्यम से किया जाता है| बैंक के पास तो उधार देने के भी भारी लक्ष्य हैं कि योग्य को भी वह उधार दे देते हैं| बैंक का लिखित उद्देश्य उस समय खंडित हो जाता है जब जरूरतमंद किसान नीलाम हो जाता है और पूंजीपति ८५ प्रतिशत का माफ़ीनामा ले लेता है|

इस्लाम स्पष्टतः और हिन्दू आदि धर्म किसी न किसी रूप में ब्याज आधारित तंत्र के विरोधी रहे हैं| क्योंकि ब्याज लेना देना वास्तव में धन का कोई उत्पादक प्रयोग नहीं करता| धन का वास्तविक प्रयोग उसके उत्पादक प्रयोग में है| बैंक खुद भले ही उत्पादक कार्यों के लिए धन देते हैं परन्तु उनका उत्पादन से कोई सम्बन्ध नहीं होता| ब्याज न निवेशक को पूरा परिणाम देता हैं न उसकी बौद्धिक क्षमता का पूरा प्रयोग करता है| धार्मिक नियमों के ऊपर उठकर देखें तो बैंकों में एक सीमा से अधिक निवेशक और अर्थव्यवस्था के लिए हानिकारक हैं| बैंक पूँजी की समुच्चय और समन्वय करने में भी विफल रहे हैं| वास्तव बैंक के पास अपने धन का समुचित निवेश करने की कोई उचित कुशलता भी नहीं होती| यही कारण है कि बैंक असफल होते रहते हैं|

बंद होते बैंक


मैं आजतक नहीं जानता कि वास्तव में बैंक होते क्यों हैं?

पहले भारत या पूरे एशिया में बैंक नहीं थे तब आम जनता की आवागमन और व्यापारिक जरूरत के लिए हवाला तंत्र था| यह वास्तव में पेमेंट बैंक सिस्टम है जिसे पश्चिमी बैंक प्रणाली के हित के लिए अवैध, गैरकानूनी और आपराधिक बनाकर पेश किया गया| जबकि इसे उसी प्रकार विनियमित किया जा सकता था, जैसे आज पेमेंट बैंक को किया जाता है| हर शहर और गाँव में कर्जदाता साहूकार भी थे जिनके ब्याज के कड़वे किस्से महशूर किये गए थे| सहूकारियां और हवाला आज भी है और कानूनन मना भी है|

बैंकतंत्र का मूल उद्देश्य बड़े समूह से धन बटोर कर उद्योग आदि में प्रयोग करने के लिए देना था|  यह एक उलट-साहूकारी है| आलोचक इसे समाजवाद से धन जुटाकर पूंजीवाद को देना भी कहते हैं| आज इसमें साहूकार की सूदखोरी, हवाला की हौल और पूंजीवाद की लम्पटता है| बाद में जब पूंजीपति असफल होता तो बैंक का बाजा बज जाता और पूंजीपति सो जाता| बहुत बार यह धोखाधड़ी का मामला भी होता|

आखिर बैंक क्यों असफल होते हैं?

भारत में बैंक बंद होना कोई नया घटनाक्रम नहीं हैं| आरम्भ में अधिकतर बैंक पूंजीपतियों ने समाज में मौजूद धन को ब्याज के बदले इकठ्ठा करकर अपने व्यवसाय के लिए प्रयोग करने के लिए खोले थे| इस तंत्र में कमी थी कि आमजन के लिए पैसा लगाना सरल था निकलना कठिन| इसके बाद बैंक का राष्ट्रियकरण हुआ| हालत बदले और लगा कि धोखेबाज रोक लिए जायेंगे| परन्तु छोटे बैंक, साहूकार आदि बने रहे| बड़े बैंक भी कोई नया व्यासायिक नमूना नहीं बना पाए| पूंजीपति बैंक का लाभ लेते लूटते रहे| हाल का दिवाला शोधन कानून भी कोई बहुत सफल नहीं दिखाई देता| हाल का पंजाब महाराष्ट्र सहकारी बैंक भी सामाजिक पूँजी पर पूंजीवादी कुदृष्टि की पुरानी कथा है|

फिलहाल इस सब का कोई इलाज नहीं दिखाई देता| सरकारी नीतियाँ जब तक पेमेंट बैंक, बचत बैंक और साहूकारी और निवेश व्यवस्था को अलग नहीं करेंगी यह सब चलेगा| परन्तु यह सब करना कोई सस्ता सौदा भी तो नहीं है|

आम जन को अपना ध्यान खुद रखना होगा| बैंक का बिचौलियापन पूँजी बाजार से ख़त्म होना चाहिए| इसके लिए निवेशक के रूप में आमजन को जागरूक होना होगा|