विश्व-बंदी १६ मई

उपशीर्षक – त्रियोदशी में करोना दावत

करोना काल की अच्छी उपलब्धियों में एक यह भी है कि देश में त्रियोदशी संस्कारों में भारी कमी आई है| परन्तु मेरे गृह नगर के बारे में छपी खबर चिंता जनक थी|

शहर के एक बड़े सर्राफ़ की माताजी का हाल में स्वर्गवास हुआ| इसके बाद स्वाभाविक है कि उनके पुत्र, और पुत्रिओं के परिवार इकठ्ठा होते| इसमें शायद किसी को कोई आपत्ति भी नहीं होनी चाहिए| परन्तु इस परिवार ने अपनी माताजी के लिए त्रियोदशी संस्कार का आयोजन किया, जिसमें शहर भर के काफ़ी लोग सम्मलित हुए| दो दिन के बाद सर्राफ़ साहब की करोना से मृत्यु हो गई| मृत्यु के समाचार के बाद सरकार ने तुरंत तीन प्रमुख थाना क्षेत्रों में कर्फ्यू का ऐलान कर दिया जिससे कि बीमारी न फैले| साथ ही उन लोगों की जानकारी इकठ्ठा की गई जो त्रियोदशी में शामिल हुए थे| इस परिवार और समारोह में शामिल कई लोग करोना से संक्रमित पाए गए|

दुःख यह कि यह समाज का सभ्य और समझदार समझे जाने वाला तबका है| यह वह लोग हैं जो दूसरों के लिए आदर्श बनकर खड़े होते है|

इस पूरे इलाके में कर्फ्यू जारी है| कोई नहीं जानता कि सर्राफ़ परिवार के यहाँ मातमपुर्सी के लिए आए और बाद में त्रियोदशी समारोह में शामिल लोग कब कब किस किस से मिले| यह एक पूरी श्रंखला बनती है| यह सब जान पाना उतना सरल नहीं जितना लगता है| अलीगढ़ शहर ख़तरे की स्तिथि में अब लगभग एक महीने के लिए रहेगा| सरकार ने लगभग १५० लोगों के विरूद्ध मुकदमा कायम किया है|

कुछ अतिविश्वासी या अंधविश्वासी लोगों के कारण उनके सम्बन्धियों, मित्रों, परिवारों, पड़ौसियों, और यहाँ तक कि उनके आसपास से अनजाने में ही गुजर गए लोगों के लिए खतरा पैदा हुआ है|

अलीगढ़ वालों के समझदार होने का मेरा भ्रम इस समय कुचल गया है| मैं सिर्फ़ आशा करता हूँ कि जल्द सब ठीक हो|

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विश्व-बंदी १५ मई

उपशीर्षक – करोना के कारण बेहतर कॉर्पोरेट लोकतंत्र

करोना ने भारत ने कॉर्पोरेट सुशासन के लिए बेहतरीन उपहार दिया है| सरकार ने, जाने- अनजाने में, कंपनियों के अंश-धारकों (shareholders) के लिए लगभग सभी कंपनियों की आम सभाओं में शामिल होने की प्रक्रिया को सरल कर दिया है| लगता है कि सरकार ने यह अनजाने में ही किया है वर्ना इस दृष्टिकोण से अब तक प्रचार किया जा चुका होता और वित्तमंत्री इसे आत्मनिर्भर भारत वाली सरकारी पोटली में शामिल कर चुकी होतीं| ध्यान रहे कि यह सरलीकरण मात्र इसी वर्ष के लिए हुआ है|

अगर आप किसी  भारतीय कंपनी में अंशधारक हैं, तो यह वर्ष उस कंपनी की आम सभाओं में शामिल होने के लिए उचित वर्ष है| इस वर्ष दूर दराज के क्षेत्र में बैठा सामान्य अंशधारक जिसने कभी किसी कंपनी की असाधारण आम सभा या वार्षिक आम सभा में भाग नहीं किया है, इस वर्ष घर बैठे ही इसका अनुभव ले सकता है| इस से पहले दूरदराज के अंशधारक पिछले कुछ वर्षों से डाक-मतदान या ई-मतदान करते रहे हैं|

किसी कंपनी के अंशधारक के रूप में कंपनी की किसी भी आमसभा के शामिल होना आपका विशेष अधिकार है| इससे अपनी कंपनी, जिसके एक छोटे से मालिकाना हिस्सेदार हैं, को समझने और उसकी निर्णय प्रक्रिया में भाग लेने का अनुभव मिलता है| परन्तु बड़े शहरों के बाहर रहने वले अधिकतर अंशधारकों ने इस प्रकार का कोई अनुभव कभी नहीं लिया है| साथ ही बड़े शहरों में रहने वाले लोगों की शिकायत रही है, कि कुछ विशेष लोग वहाँ आकर अक्सर गड़बड़ी फैलाते हैं| परन्तु इस बार ऐसा कुछ होने की सम्भावना नहीं हैं|

इस बार आप ठीक उसी तरह कंपनियों की आम सभाओं में भाग ले सकते हैं जिस तरह आप अपने मोबाइल या कंप्यूटर से ग्रुप विडियो कॉल करते हैं या पिछले दो महीने से ऑनलाइन सभाएं कर रहे हैं|

शुरूआती आवश्यकताएं

बिना शक, मूल बात यह है कि आपके पास किसी कंपनी के शेयर होने चाहिए – चाहे यह पुराने कागज़ वाले शेयर सर्टिफिकेट के रूप में हों या आपके डीमेट खाते में दर्ज हो| आपके पास पहले से शेयर है तो बधाई, वर्ना तुरंत अपनी मनपसंद कंपनियों के कुछ शेयर जल्दी से खरीद लें| जिस दिन कम्पनी अपने अंशधारकों को आम सभा का बुलावा भेजेगी, उस से कम से कम हफ्ता दस दिन पहले यह खरीद आप कर कर रख लें| शेयर बाजार में इस दिनों मंदा चल रहा है आप कम खर्च में कुछ अच्छे शेयर खरीद सकते हैं| मगर ध्यान रहे मैं आपको यहाँ कोई निवेश सलाह नहीं दे रहा हूँ|

अब आते हैं आमसभा में शामिल होने की पहली जरूरत पर| तो आपके पास कोई भी ठीक ठाक चलता हुआ, कंप्यूटर, लैपटॉप या फिर मोबाइल होना चाहिए| ४जी सिम वाला कोई भी साधारण सा मोबाइल भी आप के काम आ सकता है|

दूसरी जरूरत, हमें मालूम ही है एक अच्छा सा इन्टरनेट| अगर आपके इलाके में बढ़िया ब्रॉडबैंड नहीं है तो इलाके का सबसे बेहतरीन स्पीड वाला इन्टरनेट कनेक्शन ले लें|

इसके बाद आपके पास अपना ख़ुद का एक ईमेल पता होना चाहिए| यह पता चालू हालात में होना बहुत जरूरी है| कहीं ऐसा न हो कि जब आम सभा का बुलावा आये तो आप खुल जा सिमसिम जपते रह जाएँ|

अगर आपके पास इतना है तो आप अपनी कंपनी में मालिकाना हक का इस्तेमाल करते हुए कॉर्पोरेट लोकतंत्र और कॉर्पोरेट सुशासन में अपना बहुमूल्य योगदान देने ले लिए तैयार हैं|

अरे थोड़ा सा तो रुकिए, पहले कंपनी या डिपाजिटरी या रजिस्ट्रार व ट्रान्सफर एजेंट से पता कर लें कि उनके पास आप का चलता हुआ ईमेल पता है| अगर नहीं है तो उन्हें इसे अद्यतन करने के लिए कहें| वैसे कंपनी वाले खुद भी आपसे पता करने के लिए अखबार में और अपनी वेबसाइट पर जनसूचना लगाकर आपसे आपके चालू ईमेल पते की जानकारी माँगेंगे|

अब आपको यह देखना है कि आपके पास किस प्रकार की कम्पनी के शेयर हैं – ईवोटिंग वाली या ईमेल-वोटिंग वाली| दोनों प्रकार की कंपनियों के लिए आम सभा में भाग लेने की प्रक्रिया अलग है और मैं इसे समझाने जा रहा हूँ|

ईमेल वोटिंग वाली कंपनियाँ

जिन कंपनियों में एक हजार से कम अंशधारक हैं, वह कंपनियां ईमेल से वोटिंग कराएंगी| इन कंपनियों की आम सभा में आपको ज्यादा बेहतर अनुभव मिलने की उम्मीद है| इनके शेयर आपको शेयर बाजार से शायद नहीं मिलेंगे|

यह कंपनियां आपको उनके रिकॉर्ड में दर्ज आपके ईमेल पते और अधिकतर मामलों में समाचारपत्र में जन सूचना देकर आम सभा का बुलावा देंगी|

कंपनियों की आम सभाएं विडियो कॉन्फ़्रेंसिंग या किसी अन्य चलचित्रीय विधि से संपन्न होंगी| इस वर्गीकरण की कम्पनियां लॉग इन करने वाले पहले ५०० सदस्यों को दोतरफ़ा संवाद की सुविधा उपलब्ध कराएंगी जबकि अन्य सदस्यों को एक तरफ़ा सीधा प्रसारण देखने की सुविधा मिलेगी| अधिकतर मामलों में किसी आम अंशधारक को दोतरफ़ा बातचीत की सुविधा की जरूरत नहीं होती जब तक कि आपके पास कोई महत्वपूर्ण प्रश्न या विचार नहीं है|

आम सभा में सभी विचार विमर्श के बाद यह कम्पनियां अपने अंशधारकों के पास ईमेल के माध्यम से मतदान की प्रक्रिया प्रारंभ करेंगी| आपको अपने मताधिकार का प्रयोग करना है|

मतदान में देरी होने पर, मतदान का निर्णय थोड़ी देर से लेकर थोड़े दिन के लिए आम सभा की बैठक को स्थगित करकर और बाद में पुनः बुलकर भी अंशधारकों को बता दिया जाएगा|

ईवोटिंग वाली कंपनियाँ

जिन कंपनियों में एक हजार या अधिक अंशधारक हैं, वह कंपनियां ईवोटिंग कराएंगी, यह ईमेल वोटिंग से अलग है| इन कंपनियों में से बड़ी कंपनियों के शेयर आपको शेयर बाजार मिल सकते हैं|

यह कंपनियां आपको उनके रिकॉर्ड में दर्ज आपके ईमेल पते पर और साथ ही अधिकतर मामलों में समाचारपत्र में जन सूचना देकर आम सभा का बुलावा देंगी|

कंपनियों की आम सभाएं विडियो कॉन्फ़्रेंसिंग या किसी अन्य चलचित्रीय विधि से संपन्न होंगी| यह वर्गीकरण की कम्पनियां लॉग इन करने वाले पहले १००० सदस्यों को दोतरफ़ा संवाद की सुविधा उपलब्ध कराएंगी जबकि अन्य सदस्यों को एक तरफ़ा सीधा प्रसारण देखने की सुविधा मिलेगी| अधिकतर मामलों में किसी आम अंशधारक को दोतरफ़ा बातचीत की सुविधा की जरूरत नहीं होती जब तक कि आपके पास कोई महत्वपूर्ण प्रश्न या विचार नहीं है|

इस कंपनियों में आम सभा की बैठक से पहले ईवोटिंग हो जाती हैं| इसके लिए आपके पास जरूरी सूचना आम सभा के बुलावे से साथ ही भेजी जाती है| इस प्रकार की कंपनियों की आम सभा में बहुत गंभीर विचार विमर्श पहले के मुकाबले कम हुआ है|

फिर भी जिन लोगों ने आम सभा से पहले मतदान नहीं किया है उन्हें मतदान की पुनः सुविधा मिलेगी| मतदान का निर्णय करने के लिए दो तीन दिन का समय दिया जाता है| मतदान का निर्णय कंपनी के वेबसाइट पर लगाया जाता है|

आशा करता हूँ, आपको कॉर्पोरेट लोकतंत्र में हिस्सा बनकर प्रसन्नता होगी और महत्वपूर्ण निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बनने का गौरव प्राप्त होगा|

 

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विश्व-बंदी ३१ मार्च

उपशीर्षक – वित्तवर्ष का अंत 

कुछ घंटों में यह वित्त वर्ष बुरी यादों के साथ समाप्त होने जा रहा है| मैं आशान्वित हूँ कि नया वर्ष फिर से बहारें लाएगा| इस साल पहले दस महीने शानदार बीते| बहुत कुछ नया सीखा, किया और कमाया| मगर बही खाते कर चटख लाल रंग उड़ा उड़ा उदास सा हो गया है|

लेनदारियां बहुत बढ़ चुकी हैं और इस माहौल में उनकी वसूली सरल तो नहीं दिखती| पिछले एक महीने से कोई खास बिल नहीं कटे| अप्रैल से जून से वैसे भी थोड़ा तंग रहता है| इस बार हालत शायद और तंग रहेंगे| उधर, मुवक्किल पैसा समय पर नहीं देते मगर सरकार को अपना वस्तु-सेवाकर तुरंत चाहिए होता है| सरकारी कर गांठ से देना बहुत भारी पड़ता है| जब सरकार खुद आपकी मुवक्किल हो तो स्तिथि नाजुक ही रहती है| केवल रकम वसूल हो जाने रेशमी भरोसा रहता है| हम सेवा प्रदाता तो सिर्फ कागज पर ही सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम हैं| जमीनी लाभ शायद कुछ नहीं|

इस समय बचत से लिए गए निवेश के हालात भी अच्छे नहीं| यह साँप छछुंदर की स्तिथि है| निवेश करें तो जवानी ख़राब, न करें तो बुढ़ापा| उसपर यह मंदी का समय किसी कंगाली से कम नहीं पड़ता| शेयर बाजार में मंदी के चलते निवेश बकत कुछ नहीं तो आज सरकार ने बचत वगैरा पर ब्याज घटा दी| कंगाली में आटा गीला हो चुका है| आटे से याद आया – पिछला गल्ला भी ख़त्म हो रहा हैं और इस महीने का गल्ला भरने के लिए आधे देश के पास पैसे नहीं बाकि बचे लोग के पास दूकान जाने की समस्या|

जिन लोगों के पास नौकरियां हैं उनकी भी समस्या है| लगभग सबको साल के आखिर और कार्यालय के बंद होने के कारण औना – पौना वेतन मिला है| मुनीम भी घर पर और याददाश्त से कितना हिसाब किताब लगायें|

ब्याज घटने से भविष्य निधि पर ७.१ फ़ीसदी, बचत पत्र पर ६.८ फ़ीसदी, किसान विकास पात्र पर ६.९ फ़ीसदी का ब्याज मिलेगा| बचत खाते पर सरकार ने ४ फीसदी पर ही ब्याज रखा हुआ है| इस सब से बुढ़ापे का गणित बिगड़ जाता है| मगर कुल मिलकर ब्याज की दर जीवनयापन की महंगाई की दर से कम होने का अंदेशा हो सकता है| यह बाद अलग है कि बाजार खुद मंदा हो रहे|

सरकार ने दिवालिया कानून को थोड़ा कमजोर थोड़ा सुस्त बनाया है तो काम धंधे में कमी रहेगी| इधर कुछ नया जानने सीखने की जरूरत रहेगी कि कुछ नया काम धंधा मिलता रहे|

प्रार्थना रहेगी बाज़ार में मंदी और देश में अकाल के हालात न बनें| यह नामुराद बीमारी और दुर्भिक्ष जल्दी दूर हो|

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बीमाकृत बचत

पिछले दो दशक में पर्यावरण सुरक्षा दिवाली के अवसर पर एक बड़ा प्रश्न रहा है| एक बार फिर से आर्थिक सुरक्षा का प्रश्न सामने खड़ा है|

नोटबंदी के बाद से कोई भी भारतीय अपनी मुद्रा में बचत्त और निवेश नहीं करना चाहता| मुद्रास्फीति का सामना करने वाले भारत जैसे देशों में मुद्रा में निवेश करना कोई भी समझदारी नहीं है| परन्तु यह भी सही बात हैं कि नोटबंदी होने तक मुद्रा बचत निवेश का सबसे सरल और तरल माध्यम था| भौगोलिक विशालता वाले देश में मुद्रास्फीति लागत के मुकाबले अन्य निवेश संसाधन तक पहुँचने की लागत अधिक रही है| अब यदपि स्तिथि में बड़ा बदलाव महसूस होता है| मुद्रा में निवेश मंहगा और अधिक जोखिम भरा है|

मुद्रा के बाद सरल तरल माने जाने वाले निवेश सोना, चाँदी, और संपत्ति कभी भी तरल नहीं रहे| यह निवेश भावनात्मक लगाव के कारण समय पर काम नहीं आते| अति गंभीर स्तिथि में इनकी कीमत और तरलता बुरी तरह गिर जाती है|

इसके बाद बैंक बचत खाता एक बड़ा सरल और तरल निवेश विकल्प है| परन्तु इसमें निवेशक को पूर्ण सुरक्षा वादा मात्र एक लाख रुपये तक के निवेश तक ही मिलता है| हाल के बैंक घोटालों और बैंक असफलता के बाद, बैंक अपने ग्राहकों को दिए जाने वाले दस्तावेज़ों पर मोहर लगाकर मात्र एक लाख तक के बीमा की जानकारी दे रहा है| यह बैंक की तरफ से उचित कदम है| परन्तु सुरक्षा की दृष्टि से हमारे पास क्या विकल्प है?

पहला विकल्प हो सकता है कि हम हर बैंक के बचत खाते में एक एक लाख रूपये का निवेश करें| परन्तु ऐसा करने से हमारे बचत खातों के निष्क्रिय घोषित होने का ख़तरा पैदा होता है| डाकघर बचत बैंक एक विकल्प हो सकता था परन्तु यह अब सरकारी विभाग नहीं रहा और इसमें निवेश करना बैंक निवेश से समान ही जोखिम भरा है|

हम भारत सरकार के सार्वभौमिक प्रतिभूति प्रपत्रों में निवेश कर सकते हैं| सरकारी प्रतिभूति निवेश बैंक निवेश से अधिक सुरक्षित है| इस की अपनी एक सीमा है| निवेशक अपनी मर्जी से निवेश नहीं कर सकता बल्कि सरकार तय करती है कि उसे किस सीमा तक उधार लेना है| पिछले दशक में कई देशों की सार्वभौमिक प्रतिभूतियों को भी असुरक्षित माना गया है|

मैं सामान्य निवेशक को बैंकों और निजी क्षेत्र की कंपनियों के सावधि जमा की सुरक्षा सम्बन्धी जोखिम के बारे में बताना चाहूँगा| इन सब के पास किसी न किसी क्रेडिट रेटिंग एजेंसी से ली गई क्रेडिट रेटिंग हो सकती है| परन्तु इनका कोई बीमा नहीं होता| कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय ने २०१४ में एक क़ानून बनाकर निजी क्षेत्र के कंपनियों को जमा बीमा करने के निर्देश दिए थे| परन्तु कोई बीमा कंपनी जमा बीमा करने के लिए तैयार नहीं हुई| हारकर १५ अगस्त २०१८ को सरकार ने जमा बीमा का प्रावधान वापिस ले लिया|

समझने वाली बात यह है कि हमें जानना और मानना चाहिए कि लगभग सभी निवेशों में अपने जोखिम हैं| हम को निवेश पर निगाह रखनी चाहिए| हिन्दू धर्म की अपरिग्रह और इस्लाम की केवल व्यावसायिक निवेश करने की सलाह को मानना चाहिए| दिवाली पर लक्ष्मी पूजन से पहले सरस्वती और गणेश पूजन के पीछे की अवधारणा को समझा जाए|

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बचकाना बिचौलिया

पिछली पोस्ट बंद होते बैंक में मैंने लिखा था:  बैंक का बिचौलियापन पूँजी बाजार से ख़त्म होना चाहिए| इसके लिए निवेशक के रूप में आमजन को जागरूक होना होगा|

बैंक उद्योगीकरण के समय की पूंजीवादी जरूरत थी जो जल्द ही एक धुर-पूंजीवादी विचार में बदल गया| बैंकों ने आमजन का पैसा लेकर उद्योगपति को देना शुरू किया| लुटे पिटे आमजन के लिए धन कमाने और खुद को साहूकार समझने का यह सुहाना मौका था| परन्तु जल्द ही बैंक पूंजीपति के हाथ के खिलौने बन गए| पूंजीपति से मिले ब्याज और बैंक के खर्च से बचा ख़ुचा धन ब्याज के नाम पर जमाकर्ता को मिलने लगा| आज भी वास्तव में पूंजीपति ही ब्याज के दर तय करता है – भले ही अब यह लोबिंग के माध्यम से किया जाता है| बैंक के पास तो उधार देने के भी भारी लक्ष्य हैं कि योग्य को भी वह उधार दे देते हैं| बैंक का लिखित उद्देश्य उस समय खंडित हो जाता है जब जरूरतमंद किसान नीलाम हो जाता है और पूंजीपति ८५ प्रतिशत का माफ़ीनामा ले लेता है|

इस्लाम स्पष्टतः और हिन्दू आदि धर्म किसी न किसी रूप में ब्याज आधारित तंत्र के विरोधी रहे हैं| क्योंकि ब्याज लेना देना वास्तव में धन का कोई उत्पादक प्रयोग नहीं करता| धन का वास्तविक प्रयोग उसके उत्पादक प्रयोग में है| बैंक खुद भले ही उत्पादक कार्यों के लिए धन देते हैं परन्तु उनका उत्पादन से कोई सम्बन्ध नहीं होता| ब्याज न निवेशक को पूरा परिणाम देता हैं न उसकी बौद्धिक क्षमता का पूरा प्रयोग करता है| धार्मिक नियमों के ऊपर उठकर देखें तो बैंकों में एक सीमा से अधिक निवेशक और अर्थव्यवस्था के लिए हानिकारक हैं| बैंक पूँजी की समुच्चय और समन्वय करने में भी विफल रहे हैं| वास्तव बैंक के पास अपने धन का समुचित निवेश करने की कोई उचित कुशलता भी नहीं होती| यही कारण है कि बैंक असफल होते रहते हैं|

बंद होते बैंक

मैं आजतक नहीं जानता कि वास्तव में बैंक होते क्यों हैं?

पहले भारत या पूरे एशिया में बैंक नहीं थे तब आम जनता की आवागमन और व्यापारिक जरूरत के लिए हवाला तंत्र था| यह वास्तव में पेमेंट बैंक सिस्टम है जिसे पश्चिमी बैंक प्रणाली के हित के लिए अवैध, गैरकानूनी और आपराधिक बनाकर पेश किया गया| जबकि इसे उसी प्रकार विनियमित किया जा सकता था, जैसे आज पेमेंट बैंक को किया जाता है| हर शहर और गाँव में कर्जदाता साहूकार भी थे जिनके ब्याज के कड़वे किस्से महशूर किये गए थे| सहूकारियां और हवाला आज भी है और कानूनन मना भी है|

बैंकतंत्र का मूल उद्देश्य बड़े समूह से धन बटोर कर उद्योग आदि में प्रयोग करने के लिए देना था|  यह एक उलट-साहूकारी है| आलोचक इसे समाजवाद से धन जुटाकर पूंजीवाद को देना भी कहते हैं| आज इसमें साहूकार की सूदखोरी, हवाला की हौल और पूंजीवाद की लम्पटता है| बाद में जब पूंजीपति असफल होता तो बैंक का बाजा बज जाता और पूंजीपति सो जाता| बहुत बार यह धोखाधड़ी का मामला भी होता|

आखिर बैंक क्यों असफल होते हैं?

भारत में बैंक बंद होना कोई नया घटनाक्रम नहीं हैं| आरम्भ में अधिकतर बैंक पूंजीपतियों ने समाज में मौजूद धन को ब्याज के बदले इकठ्ठा करकर अपने व्यवसाय के लिए प्रयोग करने के लिए खोले थे| इस तंत्र में कमी थी कि आमजन के लिए पैसा लगाना सरल था निकलना कठिन| इसके बाद बैंक का राष्ट्रियकरण हुआ| हालत बदले और लगा कि धोखेबाज रोक लिए जायेंगे| परन्तु छोटे बैंक, साहूकार आदि बने रहे| बड़े बैंक भी कोई नया व्यासायिक नमूना नहीं बना पाए| पूंजीपति बैंक का लाभ लेते लूटते रहे| हाल का दिवाला शोधन कानून भी कोई बहुत सफल नहीं दिखाई देता| हाल का पंजाब महाराष्ट्र सहकारी बैंक भी सामाजिक पूँजी पर पूंजीवादी कुदृष्टि की पुरानी कथा है|

फिलहाल इस सब का कोई इलाज नहीं दिखाई देता| सरकारी नीतियाँ जब तक पेमेंट बैंक, बचत बैंक और साहूकारी और निवेश व्यवस्था को अलग नहीं करेंगी यह सब चलेगा| परन्तु यह सब करना कोई सस्ता सौदा भी तो नहीं है|

आम जन को अपना ध्यान खुद रखना होगा| बैंक का बिचौलियापन पूँजी बाजार से ख़त्म होना चाहिए| इसके लिए निवेशक के रूप में आमजन को जागरूक होना होगा|

अनुपालन के खिलाफ दुष्प्रचार

राजनीति को भारत में दुष्प्रचार का एक गंदा खेल माना जाता है और जनता ने इसे जीवन की वास्तविकता के रूप में स्वीकार कर लिया है। दुर्भाग्य से, कुछ भारतीय पेशेवरों ने अनुपालन और अनुपालन पेशेवरों के खिलाफ दुष्प्रचार करना प्रारंभ किया है| मीडिया की भूमिका भी प्रश्नचिन्हों में घिरने लगी है। यह स्पष्ट है कि भारतीय मीडिया प्रकाशन करने से पहले कोई शोध नहीं करता है और तथ्यों को सत्यापित भी नहीं करता है। 12 जून 2019 को डेक्कन क्रॉनिकल द्वारा प्रकाशित और कुछ अन्य पत्रों द्वारा नक़ल कर छापे गए गए दुष्प्रचार का “वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण से फर्मों के लिए ई-फॉर्म 22 ए को माफ करने का आग्रह” शीर्षक से प्रकाशित किया गया था।

ऐसा लगता है कि एक चार्टर्ड अकाउंटेंट ने फॉर्म आईएनसी – 22 ए, जिसे लोकप्रिय रूप से प्रपत्र सक्रिय (फॉर्म एक्टिव) कहा जाता है, में दिये गए एक जाँच बिंदु के विरुद्ध पांच पृष्ठ का एक लम्बा ज्ञापन प्रस्तुत किया है। कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय द्वारा अच्छी तरह से तैयार किए गए इस प्रपत्र सक्रिय (फॉर्म एक्टिव) का उद्देश्य किसी कंपनी की अनुपालन स्थिति की जांच करना है। पूर्णतः अनुपालित कंपनी के मामले में कंपनी के पंजीकृत कार्यालय के अक्षांश देशान्तर (जियो टैगिंग) को छोड़कर यह प्रपत्र सक्रिय (फॉर्म एक्टिव) लगभग स्वतः भर जाता है। हमने प्रपत्र सक्रिय के बारे में पहले भी विस्तार से चर्चा की है| उसके बाद फॉर्म भरने का समय बढ़ाये जाने के समय; हमने किसी भी पेशे या अनुपालन शासन का को विरोध किये बिना एक व्यावहारिक समस्या के समाधान के लिए एक उचित तरीके पर भी चर्चा की थी। हालांकि, इस फॉर्म को भरने की तारीख को कुछ कठिनाई के आधार पर एक बार फिर से बढ़ाये जाने (आज 15 जून 2019 से आगे) की आवश्यकता हो सकती है, लेकिन उपरोक्त दुष्प्रचार प्रचार में उल्लेखित कुछ भी निश्चित जमीन आधार पर नहीं है।

कुछ महीनों पहले, कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय ने लगभग 5 लाख कंपनियों का नाम कम्पनी पंजी से हटा दिया था| इन कंपनियों ने अपने वार्षिक खातों और वार्षिक रिटर्न तीन या अधिक वित्तीय वर्षों से पंजीकरण कार्यालय में नहीं किये थे। दिलचस्प बात यह है कि कंपनी प्रवर्तकों, शेयरधारकों, निदेशकों, लेखा परीक्षकों, देनदारों और लेनदारों सहित इन कंपनियों के 0.01% हितधारकों ने भी इसपर कभी कोई आपत्ति भी नहीं जताई| केवल मुट्ठी भर हितधारकों ने ही अपनी कंपनियों के पुनर्जीवन के लिए राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण का दरवाजा खटखटाया। यह समझा जाता है कि पंजी से हटाई गईं आधे से अधिक कंपनियों के हितधारकों ने कुछ विशेष उद्देश्यों के लिए इन कंपनियों का उपयोग किया या यूँ कहें कि दुरुपयोग किया| वास्तव में इन कंपनियों को दुरुपयोग के बाद यूं ही छोड़ दिया गया था। इन कंपनियों में, जहां कॉर्पोरेट संरचना का दुरुपयोग किया गया था, उन्हें सही मायनों में शेल कंपनियां कहा जा सकता है। बाकी बंद की गई कंपनियां या तो उचित व्यवसाय योजना के बिना काम शुरू करने वाले निर्दोष प्रमोटरों से संबंधित हैं या उनके प्रमोटर अब जीवित नहीं हैं या कारोबार करने के बाद सेवानिवृत्त हो चुके हैं जिन्होंने अपनी कंपनियों को बंद किए बिना कारोबार को बंद कर दिया है।

हालाँकि, भारत में वर्तमान में संदिग्ध अनुपालन वाली भारतीय कंपनियों के बीच प्रपत्र सक्रिय (फॉर्म एक्टिव) का शुरू से ही दबा छिपा विरोध रहा है। यह भारत में एक कठोर वास्तविकता है कि कुछ हितधारक और कंपनियां व्यापार करने की कठिनाई के बहाने बुनियादी कानूनों का पालन नहीं करना चाहती हैं। सभी आलोचनाओं के बावजूद, भारत ने कंपनी अधिनियम, 2013 आने से बाद से कॉर्पोरेट अनुपालन पर ध्यान केंद्रित करते हुए भी सरल व्यापार इंगिता में श्रेष्ठता की और कदम बढ़ाये हैं| वर्तमान में, प्रपत्र सक्रिय (फॉर्म एक्टिव) के खिलाफ चल रही आलोचना उन कुछ हितधारकों की निराशा का प्रतिबिम्ब है जो कॉर्पोरेट संरचना का दुरुपयोग कर रहे हैं। सरकार के पास इस तरह के दुरूपयोग के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने और “नई शेल कंपनियों के बनने” पर यथासमय निगाह रखने का यह सही समय है। प्रपत्र सक्रिय (फॉर्म एक्टिव) ऐसी प्रभावी और यथासमय जाँचों में से एक है।

पूर्ण कालिक कंपनी सचिव की नियुक्ति

पूर्ण कालिक कंपनी सचिव की नियुक्ति दो दशक से अधिक समय से एक महत्त्वपूर्ण अनुपालन आवश्यकता है। कंपनी में नियुक्त कंपनी सचिव कंपनी के अनुपालन की स्थिति पर यथासमय निगाह रखते हैं और प्रबंधन को कानून का पालन करने के लिए यथासमय सलाह देते हैं। पूर्ण कालिक कंपनी सचिव गैर-अनुपालन से कंपनियों, उनके प्रमोटर और प्रबंधन को आगाह करते हैं। हालाँकि, एक कर्मचारी के रूप में वह गैर-अनुपालन को रोकने में असमर्थ हो सकते है, लेकिन वह निश्चित रूप से किसी भी नियोजित गैर-अनुपालन पर लाल झंडी जरूर दिखाते हैं| हालाँकि, लाल झंडी उठाने की उनकी भूमिका का इस्तेमाल कुछ विशेष हितधारकों द्वारा एक नकारात्मक पेशे के रूप में किया जाता है, जो उनके दुष्प्रचार के हिसाब से व्यवसाय और “व्यावसायिक लाभ” में बाधा डालते हैं। क्या फुटबॉल मैच में रेड कार्ड दिखाने वाले रैफरी को नकारात्मक व्यक्ति कहा जा सकता है? या कि वह खिलाड़ियों को सुचारू रूप से सुरक्षित और प्रसन्नता पूर्वक खेलने में मदद करने वाला सकारात्मक व्यक्ति को है?

पूर्ण कालिक कंपनी सचिव की नियुक्ति पूरी तरह से कानून की भावना का अनुपालन है और इससे अधिक ईमानदार व्यवसाय के लिए यथासमय कानूनी मदद और अनजाने में होने वाले उल्लंघन से खुद को बचाएं रखने का जरिया है। विवेकपूर्ण प्रबंधन वाली कई कंपनियां कानूनी आवश्यकता न होने पर भी या तो स्वेच्छा से कंपनी सचिव को नियुक्त करती हैं या यथासमय मदद पाने के लिए अभ्यासरत कंपनी सचिव की सेवाएं लेती हैं।

संख्या की कमी

आमतौर पर यह दावा किया जाता है कि सक्रिय कंपनियों की कुल संख्या लगभग 10 लाख है लेकिन उपलब्ध कंपनी सचिव संख्या मात्र 50 हजार ही हैं। हालांकि, सभी कंपनियों को एक पूर्णकालिक कंपनी सचिव को नियुक्त करने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन केवल पाँच करोड़ या उस से अधिक भुगतान पूंजी वाली कंपनियों को ही पूर्ण कालिक कंपनी सचिव रखने की कानूनी आवश्यकता होती है। यह दावा किया जाता है कि 90 हजार कंपनियों के लिए मात्र 45 हजार कंपनी सचिवों की उपलब्धता है| परन्तु आजकल दुर्भाग्य से आधे से अधिक कंपनी सचिव बेरोजगार या अर्धबेरोजगार हैं| यह लोग अपने वृद्ध माता-पिता और परेशान परिवारीजनों के सामने अपना चेहरा बचाने के लिए अभ्यास प्रमाण पत्र ले लेते हैं और व्यवसायिक संघर्ष में जुट जाते हैं। वर्तमान में किये जा रहे दुष्प्रचार के अनुसार उपलब्ध ४५ हजार कंपनी सचिवों में से 20 हजार पहले से ही कार्यरत हैं। हमारे पास लगभग 2 हज़ार के ऐसे कंपनी सचिव हो सकते हैं जो सफलतापूर्ण व्यावसायिक अभ्यास कर रहे हैं। शेष 23 हजार कंपनी सचिवों के बारे में क्या सूचना है? वह किसी लाभकारी कार्य के न होने कसे कारण जीवनयापन के लिए संघर्षरत हैं| जब तक ये सभी कंपनी सचिव उचित रूप से कार्यरत नहीं हो जाते, तब तक यह दावा नहीं किया जा सकता है कि कंपनी सचिवों की मांग और उपलब्धता में बहुत बड़ा अंतर है। पहले उपलब्धता को तो उचित उपयोग में आने दें।

प्रवासन का मुद्दा

यह दावा किया जाता है कि कंपनी सचिव विभिन्न कारणों से छोटे शहरों में जाने को तैयार नहीं हैं। यह कोई बढ़िया तर्क नहीं है। क्या छोटे शहरों में कॉरपोरेट कार्यालय या पंजीकृत कार्यालय वाली कंपनियों के साथ अन्य पेशेवर काम नहीं कर रहे हैं? मुद्दा हितधारकों की कंपनी सचिव की नियुक्ति के लिए अनिच्छा का है और इसलिए वे कंपनी सचिव को उचित पारिश्रमिक की पेशकश नहीं कर रहे हैं।

बजट की कमी

वर्तमान दुष्प्रचार में दावा किया कि कंपनी सचिव की नियुक्ति छोटी कंपनियों के बजट में नहीं समाती।यदि संस्थापकों ने अपने व्यवसाय के लिए एक निश्चित संगठनात्मक रूप का विकल्प चुना है तो उन्हें उस संगठनात्मक संरचना से जुड़े कानून का पालन करने की आवश्यकता होती है। क्या संस्थापकों को पिछले तीन दशकों से कंपनी सचिवों की नियुक्ति के आवश्यकता के बारे में पता नहीं है? क्या पांच करोड़ रुपये की चुकता पूंजी वाली कंपनी एक कम बजट की कंपनी है? ऐसा तभी होना चाहिए जब कि कंपनी ने अनुचित वित्तीय सलाह और योजना के आधार पर उच्च भुगतान पूंजी का चयन किया हो। ऐसी कंपनियां कानूनी रूप से अनुमत मार्ग का उपयोग करके अपनी भुगतान पूंजी को कम करने के लिए स्वतंत्र हैं। लेकिन वित्त सलाहकार इस तरह से सलाह क्यों देगा क्यों कि भुगतान पूंजी बढ़ाने के लिए पहली वाली सलाह बिना उचित कसौटी के दी थी।

सरकार को उच्चतर भुगतान पूंजी कंपनियों पर निगाह रखनी चाहिए क्योंकि गैर अनुपातिक उच्च भुगतान पूंजी का उपयोग अधिकतम बैंक ऋण प्राप्त करने के लिए किया जाता है| ऐसे ऋण बाद में समस्यापूर्ण परिसंपत्तियों में बदल जाते हैं।

अन्य नियुक्तियाँ

कंपनी सचिव का अनुपालन अधिकारी रूप में विरोध प्रपत्र सक्रिय (फॉर्म एक्टिव) को ठीक से देखे बिना लक्षित प्रचार के तहत किया जा रहा है| मुख्य वित्तीय अधिकारी, मुख्य कार्यकारी अधिकारी, प्रबंध निदेशक जैसे अन्य प्रमुख प्रबंधकीय कर्मियों की नियुक्ति न होने की स्थिति में भी फॉर्म अनुपालन सम्बन्धी त्रुटियां इंगित करता है| इन अन्य पदों पर नियुक्त किए जाने वाले व्यक्तियों की बहुत अधिक आपूर्ति हो सकती है क्योंकि इन पदों के लिए कोई विशिष्ट योग्यता निर्धारित नहीं है। यह एक विशेष कारण से है – कंपनी सचिव को यथासमय बेहतर अनुपालन में मदद करनी होती है और उसे अतियोग्य होने की आवश्यकता होती है।

निष्कर्ष

इस समय सरकार को हस्तक्षेप बनाये रखना चाहिए ताकि कंपनियों को अपने रोजगार में भले ही जबरन पर बेहतर प्रशिक्षित और जानकार पेशेवर बनाने में मदद मिल सके। सभी उपलब्ध योग्य कंपनी सचिवों की नियुक्ति हो जाने के बाद भी, सरकार को कंपनी सचिव नियुक्त करने की आवश्यकता को कम नहीं करना चाहिए, बल्कि छोटी कंपनियों के लिए योग्यता मानदंड में ढील देने की यह अनुमति दी जा सकती है कि, जो प्रशिक्षित कंपनी सचिव की निगरानी के अधीन एक अर्ध योग्य कंपनी सचिव की नियुक्ति की जा सके। यह निगरानीकर्ता प्रशिक्षित कंपनी सचिव होल्डिंग या सहायक या संबंधित कंपनी में सेवातर हो सकता है। कुछ मामलों में ऐसी निगरानी अभ्यासरत कंपनी सचिव को दी जा सकती है, लेकिन प्रत्येक अभ्यासरत कंपनी सचिव को 20 से अधिक कंपनियों के लिए नहीं यह जिम्मेदारी नहीं दी जाये।

जब सरकार शैशवावस्था में होती है तो कंपनियों के मस्तिष्क में कंप्लायंस डालने के लिए सरकार से आग्रह किया जाता है अन्यथा हम शेल कंपनियों को जारी रखेंगे।

व्यवहार में एक कंपनी सचिव होने के नाते, मैं कह सकता हूं कि रोजगार में कंपनी सचिव वास्तविक समय अनुपालन सलाहकार के साथ मदद करते हैं। निवारण हमेशा इलाज से बेहतर है। सरकार अनुपालन के अभाव में अन्य पाँच लाख शेल कंपनियों को बनना वहन नहीं कर सकती है।

चिकित्सा सेवा सुधार

यह लेख पिछले लेख स्वास्थ्य बीमा बनाम स्वास्थ्य सेवा की आगे की कड़ी है|

दुनिया भर में स्वास्थ्य सेवाएँ देना एक बेहद महंगा कार्य है| उस से भी अधिक महंगा है किसी भी बड़ी बीमारी के लिए मूलभूत ढांचा खड़ा करना| एक समय था कि सरकारें ही इस प्रकार के बड़े खर्चे वहां करने की स्तिथि में थीं| आज दुनिया भर में गरीबी कम हुई है और व्यवसायिक स्वास्थ्य दे पाना संभव हुआ है| मगर, आज भी बेहद बड़ी बीमारिओं के लिए व्यावसायिक तौर पर स्वास्थय सेवाएं दे पाना कठिन है| यह बड़े और महंगे खर्च वाले चिकित्सालय बेहद बड़े शहरों में ही उपलब्ध हो पा रहे हैं| दूसरी तरफ अच्छे अस्पतालों में इलाज कराने की चाह के चलते छोटे शहरों और गाँवों के अस्पतालों में मरीजों की कमी है| मरीजों की इस कमी के चलते अच्छे इन अस्पतालों के लिए अच्छे चिकित्सक ला पाना कठिन होता जा रहा है| इस समस्या से निपटने के लिए सरकारों को छोटे और बेहद बड़े अस्पातालों और इलाजों में निवेश करने की आवश्यकता है|

बीमा मरीज को इलाज सस्ता या मुफ्त दे सकता था, मगर इलाज नहीं दे सकता| इलाज उपलब्ध करने का काम सरकार का है, चाहे यह पूंजीवादी सरकार हो या साम्यवादी| निजी क्षेत्र को साथ लेकर चलना उचित है, परन्तु स्वास्थय सेवाओं की निजी क्षेत्र ही पर छोड़ देना उचित नहीं जान पड़ता| बीमा सम्बन्धी कोई भी सरकारी योजना आज केवल निजी चिकित्सालयों के दम पर सफल नहीं हो सकती|  उदाहरण के लिए आज तक निजी क्षेत्र एम्स जैसे एक भी संस्थान को खड़ा नहीं कर पाया है| टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल, मुंबई जैसे एक दो उदहारण को छोड़ दें तो निजी क्षेत्र का पूरा लक्ष्य स्वास्थ्य सेवाओं का व्यवसायिक दोहन तक ही सिमटा हुआ है|

मेरा सुझाव यह है कि

  • राज्य सरकारें (स्वास्थ्य राज्य का संवैधानिक विषय है) स्वास्थ्य सेवा की उपसेवा के रूप में बीमा पूल तैयार करें और उस से इक्कठा होने वाले धन से स्वास्थय सेवाए प्रदान करे|
  • हर नागरिक को इस सरकारी बीमा पूल से सरकारी और निजी चिकित्सालयों में चिकित्सा सुविधा मिले|
  • सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं का पूरा मूल्य लिया जाये और चिकत्सकों को भी सरकारी बीमा पूल से व्यवसायिक सेवामूल्य दिया जाए|
  • निजी क्षेत्र को चिकित्सा अनुसन्धान जैसे क्षेत्रों में आने के लिए प्रेरित किया जाए और उसका व्यवसायिक उपयोग करने की अनुमति हो|
  • दवाओं और अन्य उत्पादों पर मूल्य नियंत्रण हो परन्तु इतना नहीं कि यह क्षेत्र लाभ का सौदा नहीं रहे|
  • चिकित्सा उत्पाद क्षेत्र में आपसी प्रतिस्पर्था को बढ़ावा दिया जाये|

स्वास्थ्य बीमा बनाम स्वास्थ्य सेवा

बीमा, पूँजीवाद का सर्वाधिक साम्यवादी उत्पाद है| इसमें पूँजीवाद की लम्पटता और साम्यवाद की अनुत्पादकता का दुर्भाग्यपूर्ण सम्मिश्रण है|

बीमा का सीमित प्रयोग सफलता की कुंजी है| उदारहण के लिए केवल शुरूआती जीवन में लिया गया सावधि जीवन बीमा आपके परिवार को आर्थिक सुरक्षा देता है| अन्य जीवन बीमा उत्पाद बीमा कंपनी को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करते हैं|

मैं जिन बीमा उत्पादों का समर्थक हूँ उनमे स्वास्थ्य बीमा शामिल है| परन्तु कबीर दास जी बीमा के बारे में ही कह गए हैं: अति का भला न चुपड़ना| यहाँ हम केवल स्वास्थ्य बीमा की बात करेंगे|

पहली बात यह है कि इस बात का ख्याल रखा जाए कि बीमार न पड़ा जाए| उस तरह न सोचा जाये जिस तरह हम दिल्लीवाले वायु प्रदूषण सम्बन्धी बीमारियों के बारे में कभी कभी सोच लेते हैं – बीमा के खर्चे पर इलाज कराएँगे| ध्यान रखें चिकित्सा, शल्य चिकित्सा और दवाओं के दुष्प्रभाव आपको ही झेलने होंगे – बीमा कंपनी को नहीं| अच्छे पर्यावरण के लिए सरकार, साम्यवाद और पूँजीवाद से लड़िये– यह बहुत बड़ा बीमा है|

दूसरी बात, स्वास्थ्य बीमा केवल इस बात का आश्वासन है कि अगर आप कोई स्वास्थ्य सेवा लेंगे तो उसका खर्च बीमा कंपनी उठाएगी| यह बात तो हम सभी जानते हैं कि अधिकतर बीमा कंपनी बड़ी और खर्चीली बीमारियों को सामान्य स्वास्थ्य बीमा से बाहर रखतीं हैं| इस बीमारियों के लिए आपको अलग से बीमा लेना होत्ता है या फिर रामभरोसे बैठना होता है| अगर फिर भी बीमारी हो जाती है तब आपकी बचत खर्च होने लगती है| बीमा चाहे निजी हो या सरकारी, इस बात का ध्यान रखें|

तीसरी बात, अगर आप दुनिया की सारी बीमारियाँ अपने बीमा में शामिल करवा भी लेते हैं तो बीमा कंपनी इस बात की कोई गारंटी नहीं दे सकती कि किसी बीमारी का इलाज आपके देश में या फिर इस दुनिया में कहीं भी है| इस बारे में सोचने की गंभीर आवश्यकता है|

क्या हमारे पास स्वास्थ्य सेवा का मूलभूत ढाँचा है?

मनभावन कर्जा

देश का हर बड़ा बिल्डर बर्बादी के कगार पर खड़ा है| दिवालिया कानून उसके सर पर मंडरा रहा है|

किसी भी शहर के बाहर निकल जाओ, निर्माणाधीन मकानों की भरमार है| अगर सारे मकान किसी न किसी को रहने के लिए दे दिए जाएँ तो कोई बेघर न रहे| मगर न बेघरों के पास घर हैं, इन मकानों के पास मालिक| जिनके पास मकान हैं तो कई हैं|

सरकार दायीं हो या बायीं – देश में बेघरों को सस्ते कर्जे की रोज घोषणा होती है| मगर जिन्हें घर की जरूरत है उन्हें शायद कर्ज नहीं मिलता| चलो सरकार कहती है, लो भाई जिनके पास पहले से घर हैं – वही लोग दोबारा कर्ज ले लो और एक और मकान ले लो| क्या इससे बेघरों की समस्या कम होती है| ये दो चार घर कर्जे पर खरीदने वाले लोग तो शायद किराये पर भी घर नहीं उठाते| शायद ही इनमें से किसी ने किराये की आय दिखाकर आयकर भरा हो| तो भी इतना कर्ज देते रहने से किसी लाभ?

सरकारी महाजन को – बैंक को| बैंक ने बिल्डर को मोटा कर्जे दे रखा है| बैंक को पता है, ये अपना कर्ज नहीं चुकाएगा| पुराना गुण्डा मवाली और नया नया नेता है| बड़े मेनेजर का हमप्याला यार भी है|

अब बैंक किसी ऐसे को पकड़ता हैं जो आँख का अँधा और गाँठ का पूरा हो – या कम से कम इतना भोला हो कि घर की आड़ में गधा बनकर बैंक के लिए सोलह घंटे काम कर सके| उसे उसकी जरूरत और औकात से ज्यादा का घर खरीदवा दो| बिल्डर को जो पैसा मकान के बदले देना हो बैंक उसकी एंट्री घुमाकर बिल्डर का कर्जा कम थोड़ा कम कर देता है| अब आपकी मासिक किस्त भी बनी तीस साल या और ज्यादा – मूल कम ब्याज ज्यादा| अगर आप आठ रुपया सैकड़ा भी ब्याज देंगे तो चालीस साल में बैंक को एक लाख में मूलधन पर पक्का वाला सुरक्षित ढाई लाख ब्याज आदि मिल जायेगा| अगर आप इस मकान में रहते हैं तो तो भावनात्मक लगाव आपको इस मकान को खतरे में नहीं डालने देगा या फिर आप इस से बड़ा और महंगा मकान खरीदेंगे|

इसमें सबसे बड़ा लाभ है – बिल्डर का| जो मकान मांग आपूर्ति के आधार पर वास्तव में दस लाख का नहीं बिकना चाहिए, वो पच्चीस लाख में बिकता है| उसे अपना मकान बेचने पर कोई खर्चा नहीं करना पड़ता| यह काम अक्सर बैंक करता है| बिल्डर और सारे रियल एस्टेट उद्योग तो तो इस बात की चिंता नहीं करनी कि अगर उनके मकानों की कीमतें कम हो जाएँ तो क्या होगा? इस का नुक्सान तो बैंक को भुगतना है| मकानों की कीमतें गिरने पर लोग कर्जा उतारने में दिलचस्पी कम कर देंगे| उधर बिल्डर भी मकान न बिकने का हवाला देकर कर्जा नहीं चुकायेंगे|

कुल मिला कर अपनी जरूरत के आधार पर घर खरीदें आसन कर्जे के आधार पर नहीं|

मोबाइल बैंकिंग और सुरक्षा

मेरा मोबाइल को लेकर रिकॉर्ड काफी ख़राब रहा है| पहला मोबाइल लेने के बाद पहले आठ साल में मुझे आठ मोबाइल खरीदने पड़े| मगर मुझे केवल दो मोबाइल ही सेवानिवृत्त करने का अवसर मिला, शेष मोबाइल किसी न किसी जेबकतरे या उसके ग्राहकों को सेवाएं देते रहे| बाद में बैंकों में मोबाइल पर सुविधाएँ देना शुरू किया और तरह तरह के एप्प बनने लगे| तथाकथित कैशलेस समय में सरकार आपको अनजाने ही सलाह दे रही है कि अपने सारे बैंक खाते अपने मोबाइल की एप्प में डालकर चलो|

मुझे उनके एप्प की सुरक्षा के बारे में कुछ नहीं कहना| पहला तो मुझे तकनीकि जानकारी नहीं| दूसरा अगर असुरक्षित भी हों तो भी उनके बारे में टिपण्णी करकर मैं मानहानि के मुक़दमे को दावत नहीं देना चाहता|

मगर मेरा मोबाइल कितना सुरक्षित है? कोई निवेश सलाहकार सलाह नहीं देता कि अपने सारे निवेश के जगह किये जाएँ तो क्या अपनी सारी जायदाद की चाभी अपने मोबाइल में रख देना उचित है|

मोबाइल का चोरी हो जाना दिल्ली जैसे शहर में इतनी आम बात है दिल्ली पुलिस उसकी उचित चोरी रिपोर्ट भी लिखना उचित नहीं समझती| मोबाइल आपका पुराना मोबाइल बेचने से ज्यादा पैसे कमाएगा या दुरूपयोग करकर?

मोबाइल सिम क्लोंनिंग तकनीकि तौर पर बच्चों का खेल है| मोबाइल सिम आपके मोबाइल की मास्टर चाभी है| मोबाइल सिम क्लोंनिंग के अलावा भी मोबाइल में सेंध लगाने के तरीके मौजूद हैं| बहुत सारे स्पाईवेयर मोजूद हैं, जिनमें से कुछ चाइल्ड प्रोटेक्शन के नाम पर खुले आम मिलते और प्रयोग होते हैं| साथ में मोबाइल मैलवेयर हैं हीं|  पर क्या यह घोषित शत्रु की वास्तविक शत्रु हैं?

हाल में एक छात्र समूह ने अपने एक साथी की बिना इच्छा मोबाइल छीन कर उसके मोबाइल एप्प का प्रयोग एक भोजनालय में कर दिया| लेकिन अगर सोचें तो यह चिंताजनक बात हैं| आपके कोई भी मित्र परिवारीजन आपके मोबाइल से कुछ भी खर्च कर सकते हैं – आपका लाड़ला या लाड़ली भी|

मुझे मोबाइल एप्प का विचार सिरे से ही इसलिए बेकार लगता हैं की यह अत्यंत सरल है| आपको या किसी गलत व्यक्ति की मोबाइल पर इसका प्रयोग करते में समय नहीं लगता| दूसरा किसी भी प्रकार के एकल प्रयोग कुंजीशब्द (OTP) भी उसी मोबाइल पर आते हैं|

मुझे जब भी प्रयोग करना होता हैं मोबाइल पर भी नेटबैंकिंग का प्रयोग करना हूँ| यह सुरक्षित समय लेती हैं और बहुत सारी जानकारी मोबाइल में जमा कर कर नहीं रखती| आपको हर जानकारी खुद से देनी होती है| मैं नेटबैंकिंग के लिए अक्सर ब्राउज़र कि सुरक्षा विंडो (इन्कोग्नितो या इनप्राइवेट विंडो) का प्रयोग करता हूँ| यह आपके सारे डाटा को कम से कम अपने यहाँ सुरक्षित नहीं रखती|

कार्ड भुगतान का खर्च

विमुद्रीकरण के बाद जन सामान्य को नगद भुगतान न करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है| पुरानी दिल्ली की एक दुकान पर भुगतान करने के लिए जब हमारे मित्र ने भुगतान करने के डेबिट कार्ड निकला तब दुकानदार ने कहा, साढ़े छः प्रतिशत अतिरिक्त देना होगा| ध्यान रहे मॉल में भुगतान करते समय इस प्रकार का अतिरिक्त भुगतान नहीं करना पड़ता| आइये, मुद्दे की पड़ताल करते हैं|

पुरानी दिल्ली के दूकानदार प्रायः कम सकल लाभ (gross profit) पर सामान बेचते हैं| उनके द्वारा कमाया जाने वाला सकल लाभ मॉल वालों के सकल लाभ से बहुत कम होता है| कम सकल लाभ कमाने के कारण, इनके पास अतिरिक्त खर्चों की गुंजायश बहुत कम होती है| इस लिए हर अतिरिक्त खर्चे को टाला जाता है| नगद भुगतान लेने के बाद यह लोग अपने  सारे खर्च नगद में करते हैं, घर में ले जाये जाने वाला शुद्ध लाभ भी नगद होता है और बैंक में केवल घरेलू बचत ही जमा की जाती है| इस प्रकार इन्हें नगदी प्रबंधन में समय और पैसा नहीं खर्च करना पड़ता|

जब किसी व्यापार प्रणाली को कार्ड से भुगतान लेना होता है तब उसे एक महंगी सुविधा अपने साथ जोड़नी होती है| इसमें कार्ड प्रदाता कंपनी, भुगतान प्रक्रिया कंपनी, इन्टरनेट सेवा कंपनी, बैंकिंग कंपनी सब उस व्यापार प्रक्रिया में जुड़ते हैं| अतिरिक्त खर्चे इस प्रकार हैं –

  • कार्ड धारक का वार्षिक शुल्क,
  • गेटवे चार्जेज – प्रायः कार्ड रीडर मशीन, उनका प्रबंधन, और बैंक आदि से मशीन का संपर्क एक महँगी प्रक्रिया है| कोई न कोई इस कीमत को अदा करता हैं और बाद में ग्राहक से वसूलता है|
  • हर भुगतान पर शुल्क – जो डेबिट कार्ड के मामले में आधा से डेढ़ प्रतिशत और क्रेडिट कार्ड के मामले में डेढ़ से तीन प्रतिशत तक होता है| सरकारी भुगतान जैसे स्टाम्प ड्यूटी, सरकार समर्थित सेवा जैसे रेलवे आरक्षण, आदि के मामले में भुगतान करने वाला इस कीमत को अदा करता है, जबकि मॉल आदि अपने लाभ में से इसे भुगतते हैं| ध्यान रहे कि मॉल के बड़े दुकानदारों के लिए नगदी का प्रबंधन भी उतना ही महंगा होता है| भुगतान प्रक्रिया भुगतान कर्ता, कंपनी कार्ड कंपनी, भुगतानकर्ता के बैंक, विक्रेता के बैंक और विक्रेता, आदि को जोड़ती है| इसका खर्च दूकानदार को, या कहें कि ग्राहक को ही देना होता है|
  • दोनों बैंक अपने अपने ग्राहक से बैंक चार्ज के नाम पर वसूली करतीं हैं| डेबिट कार्ड के मामले में यह चार्ज सीधे ही वसूला जा सकता है| क्रेडिट कार्ड के मामले में अगर आप समय पर पैसा नहीं दे पाते तो कंपनी को लाभ होता है| इस प्रकार की उधारी पर कंपनी 24 से 48 प्रतिशत तक बार्षिक ब्याज़ वसूलती है| इस प्रकार के लापरवाह ग्राहक कंपनी के लिए कीमती होते हैं, न कि समय पर पैसा लौटाने वाले|
  • इन सभी सेवा प्रदाताओं को संपर्क में लेन के लिए इन्टरनेट सेवा का प्रयोग होता है|

आपको ऐसे दुकानदार भी मिलेंगे जिनके पास कार्ड रीडर मशीन बंद पड़ी होंगी| कई बार छोटे दुकानदार डेबिट कार्ड या क्रेडिट कार्ड के इस प्रबंधन को अपने निकट के बड़े दुकानदार की मदद से अंजाम (आउटसोर्सिंग) देते हैं| यह बड़ा दुकानदार इस सुविधा के लिए कुछ रकम चार्ज करता है| यह चार्ज सामान्य चार्ज से लगभग ढाई – तीन गुना होता है| इसमें बड़े दुकानदार के सारे खर्चे और लाभ शामिल होते हैं| मूल रकम बड़े दुकानदार को सेवा मांगने वाले बड़े दुकानदार को देनी होती है| यह व्यापर की दुनिया में, तमाम सरकारी निमयों और वैट के बीच, जटिल और खर्चीली प्रकिर्या है|

इस प्रकार मुझे उस छोटे दुकानदार द्वारा डेबिट कार्ड के लिए साढ़े छः प्रतिशत मांगना गलत नहीं लगता|

पुनःश्च – मोबाइल वॉलेट में भी छिपी हुई कीमत होती है, जो फिलहाल आपके निजी आंकड़े के रूप में वसूली जा रही हैं|

पुनः पुनःश्च – नेशनल पेमेंट कारपोरेशन ऑफ़ इंडिया और आपके अपने बैंक द्वारा शुरू किया गया यूनिफाइड पेमेंट इंटरफ़ेस एक बेहतर विकल्प हो सकता है| अज्ञात कारणों से बैंक अपनी इस सुविधा का व्यापक प्रचार नहीं कर रहीं|

नगद नालायक

प्रचलित पांच सौ और एक हजार  रूपये के नोट की कानूनी मान्यता रद्द करने का स्वागत योग्य वर्तमान सरकारी फैसला काले धन को समाप्त करने के पुराने और असफल तरीकों में से एक है| इस से पहले जनवरी १९४६, १९५४, १९७८ में बड़े नोटों की कानूनी मान्यता रद्द की गई थी| दिक्कत यह रही कि विभिन्न कारणों से यह बड़े नोट, जैसा कि इस बार भी किया जा रहा है, दोबारा प्रचलन में लाये गए| परन्तु इस बार प्रक्रिया में अंतर भी दिखाई देता है|

इस प्रकार की प्रक्रिया में काले धन का वह मामूली हिस्सा जो नगद के रूप में रखा गया हो, लगभग नष्ट हो जाता है| इस प्रक्रिया में जो काला धन बाहर आने की आशा होती है, वह अपने आप में बड़ा और महत्वपूर्ण हिस्सा होता है| परन्तु यह काले धन को समाप्त नहीं करता, काले धन का अधिकतम हिस्सा रियल एस्टेट, सोना, और विदेशी बैंकों में होता है| इस बड़े हिस्से को नियंत्रित करने का प्रभावी उपाय सरकारों के लिए उठाना असंभव नहीं, परन्तु कठिन है| वर्तमान में काले धन की अर्थव्यवस्था सामान्य अर्थव्यवस्था के पच्चीस फ़ीसदी के बराबर है| वर्तमान प्रक्रिया भविष्य में काले धन के उत्पादन पर भी कोई समुचित रोक नहीं लगाती|

मोदी सरकार के फैसले में एक नई बात है, यह बेहद स्फूर्त प्रक्रिया के तौर पर और सीमित समय अवधि में हो रहा है| नगद में काला धन रखने वालों को अपने पुराने नोट नए नोटों से बदलने का मौका नहीं दिया गया है| सरकारी अधिसूचना के अनुसार वर्तमान प्रक्रिया नकली नोट, काला धन, आदि का मुकाबला करेगी|

परन्तु, इस प्रक्रिया का नुकसान निम्न आय वर्ग को होगा, जिनके पास अधिकतर धन नगद में होता है| असंगठित क्षेत्र के मजदूर, छोटे दूकानदार, फेरीवाले, आदि जब अपनी कल (८ नवम्बर २०१६) की आय घर ले कर जा चुके थे तब यह घोषणा हुई| उनकी अधिकतम आय/सम्पत्ति रद्दी बन गई और यह देखने की बात है कि वो आज (९ नवम्बर २०१६) किस प्रकार अपनी खरीददारी कर पाते हैं| उनके लिए बैंक की सुविधा, अगर है तो, एक दिन बाद होगी| परन्तु इनमें से अधिकतर के पास जन धन योजना के बाद भी बैंक अकाउंट नहीं है या दूर दराज इलाकों में है| यह सही है कि १० नवम्बर के बाद बैंक उनके अकाउंट खोल कर उसमें पैसा जमा कर सकती हैं, परन्तु यह वित्तीय भागीदारी प्रक्रिया का दुर्दांत रूप होगा| कारण, इनमें से अधिकतर के पास अपने पते के समुचित प्रमाण नहीं होते|

भारत में दूरदराज के ग्रामीण और जंगल इलाकों में बैंक और डाकघर की सुविधा न होने से वहां मौजूद लोगों को कठिनाई का सामना करना पड़ेगा| उनको अपनी छोटी छोटी बचत शहर ले जाकर बदलनी होगी या इस प्रक्रिया में बिचालियों को मोटा धन देना पड़ेगा|

अन्य भारतियों के लिए समस्या थोड़ी हास्यास्पद है, अधिकतर समझदार लोग अब नगद कम रखते हैं और बैंक मशीनें, अगर देती हैं तो, एक बार में पाँच से अधिक एक सौ के नोट नहीं देतीं| उनके पास खर्च सब्जी भाजी लेने के लिए उधार का विकल्प बचता है वह भी अगर उनका सब्जी वाला अगर कल सब्जी ला पाया तब| ऑनलाइन खरीदने वालों के लिए थोड़ा राहत रहेगी|

वर्तमान अधिसूचना

  • दिनांक ८ नवम्बर २०१६ को बैंक ग्राहकों की सेवा नहीं कर पाएंगे| अपना हिसाब किताब बनाकर रिज़र्व बैंक को देंगे|
  • दिनांक ८ और ९ नवम्बर को एटीएम काम नहीं करेंगी| उनमें से नगद धन राशि बैंक निकल लेंगी|
  • दिनांक ३० दिसंबर २०१६ तक केवल चार हजार रुपये की धनराशि तक के नोट प्रति व्यक्ति बदले जा सकते हैं|
  • चार हजार रुपये से लेकर पचास हजार रूपये की धनराशि बिना किसी पहचान प्रक्रिया के भी बैंक खाते में जमा कराई जा सकती है|
  • पचास हजार रूपये से अधिक की धन राशि जमा करने के लिए सामान्य नियम अनुसार पहचान प्रक्रिया पूरी करनी होगी|
  • जमाकर्ता किसी अन्य व्यक्ति के खाते में भी इस धन को जमा कर सकते हैं, परन्तु इसके लिए खाताधारक की सहमति और जमाकर्ता की पहचान प्रक्रिया पूरी होनी चाहिए|
  • १० नवम्बर से २४ नवम्बर २०१६ तक एक दिन में बैंक शाखा में जाकर केवल १०,००० रुपये निकाले जा सकेंगे, जबकि एक हफ्ते में केवल २०,००० रूपए|
  • १० नवम्बर से १८ नवम्बर तक एटीएम से प्रतिदिन प्रतिकार्ड २,००० रुपये निकाले जा सकेंगे और उसके बाद प्रतिदिन प्रतिकार्ड ४,००० रुपये निकलेंगे|
  • किसी भी प्रकार ने गैर नगद अंतरण – चैक, डिमांड ड्राफ्ट, डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड, मोबाइल बेलेट, इलेक्ट्रोनिक निधि अंतरण, पेमेंट बैंक आदि इस अवधि में मान्य रहेंगे|
  • अगर कोई व्यक्ति ३० दिसंबर तक नगद धनराशि नहीं बदल पता तो वह रिज़र्व बैंक में पहचान प्रक्रिया पूरी कर कर बदल सकेगा|

पहचान प्रक्रिया

पहचान प्रक्रिया के लिए पेन कार्ड, आधार कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, वोटर कार्ड, पासपोर्ट, आदि प्रयोग किये जा सकते हैं|

आयकर व्यवस्था

वर्तमान में अगर कोई व्यक्ति दो लाख से अधिक नगद धनराशि बैंक में जमा करता है तो इसकी सूचना बैंक आयकर विभाग को देती है| आयकर विभाग जांच का निर्णय के सकता है|

अनिवासी और प्रवासी

अगर आप भारत से बाहर हैं तो आप किसी अन्य व्यक्ति को भारत में रखे नगद खाते में जमा करने के लिए अधिकृत कर सकते हैं|

परिमाण आधारित विश्लेषण

काले धन की अर्थव्यवस्था अधिकतर निवेश नगद धनराशि में नहीं होता| किसी भी व्यक्ति के पास काले धन के एक करोड़ से अधिक रुपये होने की सम्भावना बहुत कम है| अधिकतर धन संपत्तियों, बेनामी संपत्तियों, कंपनियों, सोना – चांदी, और विदेशी बैंकों में होता है| बेनामी संपत्तियों के अलावा उनमें से किसी से निपटने की कोई सटीक योजना सरकार के पास नहीं है| संपत्तियों में काले धन के निवेश के कारण बहुत सारी निवास योग्य संपत्तियों पर मालिकों के ताले लटक रहे हैं| बाजार में सम्पतियों के अनावश्यक दाम इस सब के कारण बढ़े हुए हैं|

दूर दराज के क्षेत्रों और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों किसानों, मझोले दुकानदारों के लिए कोई समुचित व्यवस्था नहीं की गई है| पेट्रोल पंप आदि की तरह बिक्रीकर में पंजीकृत दुकानदारों को भी दो दिन तक अमान्य धनराशि स्वीकार करने की अनुमति मिलनी चाहिए थी|

सरकार ने नगद आधारित व्यवस्था को बैंक आधारित व्यवस्था में बदलने का अवसर हाथ से जाने दिया है| नए नोटों का प्रचलन सही निर्णय नहीं है|

हर प्रक्रिया में लाभ हानि होते है| वास्तविक परिणाम अगले पचास दिन में दिखाई देंगे| हमें सरकार का सहयोग करने का प्रयास करना चाहिए|

 

बचिए कंपनी फिक्स्ड डिपाजिट से

जल्दी से दोगुना होने वाला पैसा हम सभी को जान से ज्यादा नहीं तो कम प्यारा भी नहीं है| पहले ज़माने में पैसा दोगुना करने का काम बाबाजी लोग करते थे| आज के ज़माने में पैसा दोगुना करने का ठेका कंपनियों के पास है|

कंपनी फिक्स्ड डिपाजिट में अच्छे ब्याज का वादा ललचाता है| बड़ी कंपनी का नाम आपको आश्वस्त करता है| मगर हाल में कंपनी डिपाजिट में लोग बुरी तरह फंसे हुए हैं और कंपनियां कैश क्रंच यानि नगदी की कमी की गहरी खाई में धंसी हुईं हैं| कई जानी मानी कंपनियां नगद पैसे की कमी के चलते ट्रिब्यूनल के पास जाकर पैसा वापसी का समय बढ़वाने में लगी हैं|

हाल में एक सज्जन मिले, जो तीन चार साल पहले किसी बड़ी कंपनी में “की मैनेजरियल पेरसोनेल” कहे जाने वाले एक ऊँचे पद से रिटायरमेंट लेकर आये थे| रिटायरमेंट फण्ड में से ढेर सारा पैसा किसी और कंपनी के फिक्स्ड डिपाजिट में फिक्स्ड कर दिया| जब वापसी का टाइम आया तो कंपनी ने बोला इन्तजार करो, हम ट्रिब्यूनल से टाइम मांग कर आते हैं| सरकार ने बोला कंपनी ट्रिब्यूनल कंपनी ट्रिब्यूनल से टाइम मांग कर आती है| भगवान ने बोला धीरज धरो| खैर बाद में पैसा मिल तो गया, मगर जरूरत के समय पर नहीं|

कंपनी फिक्स्ड डिपाजिट आज सबसे अधिक रिस्क का निवेश है| पिछले कुछ समय में सरकार ने कुछ कदम उठाये हैं निवेशकों के हित में|

पहला कदम है, फिक्स्ड डिपाजिट लेने वाली कंपनी को क्रेडिट रेटिंग लेनी होती है| यह रेटिंग मात्र एक आकलन है और यह रिस्क का मोटा अंदाजा भर है|

दूसरा कदम है, डिपाजिट का बीमा| फिक्स्ड डिपाजिट लेने वाली कंपनी को बाजार से डिपाजिट का बीमा करवाना होता है| मगर आज तक सरकार इस कदम को टालने पर मजबूर है| कारण – बीमा कंपनी कंपनी डिपाजिट का बीमा करने को अपने लिए खतरनाक मानती हैं – मतलब बेहद घाटे का सौदा| इतने बड़े भारत देश में कोई बीमा कंपनी, किसी भाई बन्धु कंपनी के डिपाजिट का भी बीमा करने को तैयार नहीं|

तीसरा कदम है, कंपनी की जायदाद की गिरवी| यह गिरवी, कंपनी के डिपाजिट ट्रस्टी के नाम पर रखी जानी है|

चौथा कदम है – निवेशक जागरूकता| सरकार ने कंपनियों को कहा है कि वह निवेशकों को भेजे जाने वाले कागजातों में एक दावात्याग यानि डिस्क्लेमर डालें| डिस्क्लेमर की भाषा पढ़िए और सुरक्षित रहिये –

“यह स्पष्ट रूप से समझा जाये कि रजिस्ट्रार के पास परिपत्र (फॉर्म) अथवा विज्ञापन के प्ररूप में परिपत्र फाइल करने को यह न माना जाये कि उसे रजिस्ट्रार अथवा केन्द्रीय सरकार द्वारा संस्वीकृत अथवा अनुमोदन दिया गया है| रजिस्ट्रार अथवा केन्द्रीय सरकार की किसी भी जमा स्कीम की वित्तीय सुदृढ़ता के लिए, जिसके लिया जमा स्वीकार या आमंत्रित की गई है अथवा विज्ञपन के प्ररूप में परिपत्र में दिए गए विवरणों या मतों की सत्यता के लिए कोई जबाबदेही नहीं है| जमाकर्ता जामा स्कीमों में निवेश करने से पूर्व पूरी सतर्कता बरतें|”

निदेशक पहचान संख्या (Director Identification Number)

हाल में सुब्रमणियास्वामी ने प्रियंका गाँधी वाड्रा के विरुद्ध एक से अधिक DIN रखने के आरोप में शिकायत दर्ज की है| इसके बाद उन्होंने कारती चिदंबरम के विरुद्ध भी शिकायत दर्ज कराई| पहले यह चुनावी मामले लगते थे, परन्तु चुनावों के बाद भी DIN को लेकर उठा विवाद थम नहीं रहा है| सभी दल रोज नए लोगों पर DIN सम्बन्धी आरोप लगा रहे हैं|

हाल में दो मंत्रियों नितिन गडकरी और पियूष गोयल के ऊपर भी यही आरोप लगाये गए|

अभी ३१ मार्च २०१४ तक, एक से अधिक DIN रखना या उनके लिए प्रार्थना करने के लिए पांच हजार रुपये तक के दंड का प्रावधान था और अगर यह गलती ठीक नहीं की जा सकी तो पांच सौ रूपए प्रतिदिन के हिसाब से अतिरिक्त दंड लगता था| इस सजा को अब बढ़ा कर छः महीने की कैद और पचास हजार रुपये तक के जुर्माने के रूप में बढ़ा दिया गया है| साथ में अतिरिक्त दण्ड भी लगता हैं|

जब मैंने स्वयं इन आरोपों को जांचा तो पाया कि इस प्रकार के सभी DIN में कुछ समानता थी| आइये समझें|

पहले आवेदक द्वारा DIN के लिए ऑनलाइन प्रार्थनापत्र भरना पड़ता है, जिस से एक प्रोविजनल DIN मिलता है| इस प्रोविजनल DIN के साथ ही प्रार्थना पत्र को छापकर, सभी जरूरी कागजात लगाकर, पैसा जमा करने के सबूत के साथ जमा कराया जाता है| कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय का DIN विभाग इस DIN को अंतिम अनुमति देता हैं|

अनुभव के आधार पर मैं जानता हूँ कि स्वीकार होने वाले प्रार्थना पत्रों से अधिक अस्वीकार होने वाले प्रार्थना पत्र हैं| संलग्न कागजन में पिता के नाम का अंतर, वर्तनी सम्बन्धी गलती, या और भी कई अन्य कारण है जिनके कारण प्रोविजनल DIN नामंजूर होता है| यह सभी DIN मंत्रालय के पोर्टल MCA21 पर आवेदक के नाम पर दिखाई देते हैं| मगर अभी और भी कुछ जानना शेष है|

यदि आवेदक से फॉर्म भरते समय कोई गलती सूचना भर गयी, अथवा लिखने में कुछ गलती हो गयीं, तो भी प्रोविजनल  DIN दे दिया जाता है| कई बार आवेदक फॉर्म भरने के बाद आगे कार्यवाहीं नहीं करता, तो भी प्रोविजनल DIN दे दिया जाता है| आवेदक का प्रोविजनल DIN हर हाल में मंत्रालय के पोर्टल पर दिखाई देता है, तब भी जब अंतिम और मान्य DIN मिल जाये|

इसके कई परिणाम होते हैं:

१.       मंत्रालय पोर्टल् पर आवेदक के नाम से कई DIN दिखाई देते हैं;

२.       जल्दी मंत्रालय के पास प्रयोग किये जाने लायक DIN समाप्त हो जायेंगे|

मंत्रालय के एक उच्च अधिकारी ने अभी हाल में बताया कि पोर्टल पर एक से अधिक DIN दिखाई देना, किसी आवेदक को गलत साबित नहीं करता है|

कई विचार – विमर्शों के बाद मैंने पाया कि हमें कुछ बातों का ध्यान रखना होगा:

१.       एक PAN पर एक ही DIN मिल सकता हैं|

२.       एक से अधिक DIN किसी गलत तरीके से ही मिल सकते हैं जैसे फर्जी या एक से अधिक PAN|

३.       अगर कोई व्यक्ति एक से अधिक DIN प्रयोग कर रहा है तो यह उसकी गलती का सबूत है|

अपनी स्तिथि को साफ रखने के लिए हम, सूचना का अधिकार प्रयोग कर कर अपने DIN के बारे में सही स्तिथि को पता कर सकते हैं|

डायरेक्टर साहब

निवेशक जागरूकता श्रंखला ४

 

अभी हाल में मेरे पास कुछ ऐसे मामले आये जिनमे साधारण लोग कंपनी का डायरेक्टर बनने के लालच में पैसा गवां बैठे| यहाँ चालक लोगों में जल्दी तरक्की का रास्ता देखने वाले, पढ़े लिखे, नौजवानों को अपने जाल में फंसाया था|

 

Mr Ratan Tata with Dr Greg Gibbons and Dr Ben ...

Mr Ratan Tata with Dr Greg Gibbons and Dr Ben Wood WMG (Photo credit: wmgwarwick)

 

एक मामले में कुछ नए लोगों ने एक परिश्रमी, महत्वाकांक्षी युवक से मित्रता की| बाद में अपनी एक पुरानी कंपनी का काम सँभालने का ऑफर दिया वह भी पार्टनर, डायरेक्टर, और मुनाफे में हिस्सेदारी के साथ| इस यूवक ने कंपनी के शेयर में पन्दरह लाख का पैसा नगद में लगाया| कुछ दिनों में उसे मैनेजिंग डायरेक्टर बना दिया गया| पर दो महीने में ही कंपनी के प्रोमोटर लोग गायब हो गए| रजिस्ट्रार ऑफ़ कम्पनीज में शिकायत तो दर्ज कर दी गयी है| मगर कंपनी का ऑफिस तो इन मैनेजिंग डायरेक्टर साहब के घर पर ही था और प्रोमोटर के पते बदल गए हैं| जब तक सही पते नहीं मिल जाते, सरकारी कार्यवाही नहीं हो सकती| मगर मजे की बात यह है कि शिकायत का पता लगने के कई महीने बाद उन प्रोमोटर्स ने शिकायत करने वाले युवक से संपर्क कर कर  सौदेबाजी शुरू कर दी| इस सौदेबाजी में युवक को पंद्रह लाख में से केवल दस लाख का चेक दिया| मगर सुना है की वो चेक भी बाउंस हो गया है|

 

यह बहुत नुकसानदेय मामला है| अब दोबारा सौदे बजी हुई तो फिर इस युवक को कुछेक लाख का नुकसान हो जायेगा और अदालत के चक्कर में बहुत टाइम लगेगा|

 

एक दुसरे मामले में बेरोजगार युवक ने एक खोखा कंपनी में पैसे देकर जनरल मेनेजर की नौकरी कर ली| ये कंपनी कंसल्टेंसी का कम करने वाली थी| सारा दारोमदार इसी युवक पर था| कंपनी ने कुछ दिन तक उसी के पैसे में से उसे सैलरी दी मगर बाद ने वो लोग रफूचक्कर हो गए| अब इस युवक के पास लम्बी कानूनी कार्यवाही का न तो पैसा है न ही समय है| घर वालों ने भी उसको घर से लगभग बहार निकल रखा है|

 

दुर्भाग्य से दोनों ही मामलों में युवक पढ़े लिखे हैं| मेहनती और समझदार भी हैं| मगर थोड़ी और जागरूकता की जरुरत है|

 

हम सभी को लालच से बचना चाहिए| आप अपना पैसा लगा कर अपनी खुद की कंपनी में डायरेक्टर बनते है तो ठीक है| दुसरे की कंपनी में पैसा लगाकर उसमे डायरेक्टर बनना केवल मंझे हुए लोगों के लिए ही ठीक है| पूरी तरह से जांच पड़ताल कर लें|

 

 

 

नकली दोस्त

निवेशक जागरूकता श्रंखला ३ 

कहते है खराब या नकली दोस्तों से तो एक अच्छा दुश्मन बेहतर है| साथ ही सच्चाई यह है कि आज बिना मतलब के कोई दोस्ती भी नहीं करता|

सबकी बात ध्यान से सुनें, समझें, मगर अपना दिमाग जरूर लगाएं| अगर बात आपकी समझ के परे है तो उसे समझने की फालतू मेहनत न करें न ही दुसरे की बात पर बिना समझे भरोसा करें|

पुरानी कहावत है जिस गली जाना नहीं उसका रास्ता क्या पूछना|

दूसरी एक बात और है| अगर आधी बात समझ में आ जाये तो वो और खतरनाक होती है| हमें जोश तो पूरा आ जाता है, मगर होता क्या है, नुकसान| महाभारत में अभिमन्यु की कहानी तो सबने सुनी है| चक्रव्यूह की आधी जानकारी थी| जोश में जा पहुंचा चक्रव्यूह में| जान चली गयी| तो भाई किसी ऐसे चक्रव्यूह में अपना हाथ न डालें कि उस से बाहर आन एक रास्ता न पता हो|

हर कोई चक्रव्यूह के अन्दर जाने का रास्ता तो बता देता है, चक्रव्यूह से बाहर आने का नहीं|

कहीं ऐसा न हो कि जिन्दगी भर की जेल जैसा हो जाये; पहुँच तो गए, मगर अब निकलें कैसे|

अगर आपको नहीं पता कि जहां पैसा लगवाया जा रहा है, वहां से पैसा किस तरह से निकलेगा तो पैसा न डालें|

आप कहीं भी पैसा लगाते है तो वो आपके पैसे को अपने घर नहीं रखता, आगे किसी न किसी काम में लगाता है| चाहे वो पोस्ट ऑफिस हो, बैंक ही, बीमा हो, कोई कंपनी हो या और कोई हो| कोई घर से ब्याज नहीं देता, कोई घर से मुनाफा नहीं देता| इसलिए सब ये चाहते हैं कि आप बस पैसा लगा दें, मगर निकालें नहीं|

ये आपका काम है कि सारी जानकारी लें, सब कुछ अच्छे से समझ लें| पैसा लगेगा कैसे और निकलेगा कैसे| आखिर आपका पैसा है|

ये पैसे का मामला है, पैसे का| जब आज की दुनिया में पैसे के लिए भाई भाई नहीं रहता; तो अनजान या कोई दोस्त, रिश्तेदार भाई कैसे बन सकता है|

आपकी कमाई है, आपकी बचत है| दस बार सोचें, कहीं आपका कोई नुकसान न हो जाये| 

दोगुना पैसा

निवेशक जागरूकता श्रंखला २

 

क्या कोई पैसा दुगना कर सकता है? जादू से या किसी और तरह से?

मुझे तो आजतक कोई ऐसा इंसान या भगवान् नहीं मिला|

क्या रामायण में भगवान् राम में अपने लिए जादू से, तंत्र – मंत्र से कंद मूल फल या पैसा पैदा किया? कहते हैं वो तो भगवान् थे, अगर चाहते तो कर सकते थे| मगर उन्होंने नहीं किया| न ही भगवान् कृष्ण ने ऐसा किया| न ही किसी और ने| सृष्टि का नियम है मेहनत कर कर पैसा कमाना| अगर भगवान् भी धरती पर आते हैं तो मेहनत करते है, जैसे सारे इंसान करते हैं|

तो जादू से तो पैसा दुगना नहीं होता|

रही बात साल दो साल में दुगना पैसा कर देने वाले किसी धंधे की| अगर ऐसा कोई धंधा होता तो हम सभी वही धंधा कर रहे होते| दुनिया भर के राजे महाराजे सारा लड़ाई – झगड़ा छोड़ कर उसी धंधे में लग जाते| टाटा बिड़ला भी क्यों इतनी बड़ी मिल – कारखाने लगाते| इतने पढ़े लिखे लोग पागल हैं क्या जो दिन रात मेहनत करते चार पैसे कमाने के लिए|

लोग रोज नई नई स्कीम लेकर आ जाते हैं| इसमें पैसा लगाओ, उसमे लगाओ; घना मुनाफा है| मैं उनसे कहता हूँ; भाई अगर है तो जाओ पहले खुद लगा दो, अपने घर का सारा पैसा लगा लो, पडोसी से और दोस्तों से भी लेकर लगा तो जब अमीर हो जाओ तो आना| तब हम भी इस स्कीम में पैसा लगा देंगे| एक साहब ने कहा, कि ये मौका दुबारा नहीं आएगा; मैंने कहा हर साल कोई न कोई भला आदमी आ जाता है इन मौकों को लेकर; अभी तुम अपना भला करो|

सोचिये; कायदे के एक साल में ज्यादा से ज्यादा कितने कमाए जा सकते है| अगर माने तो एक साल में पैसे दोगुने तो हो सकते हैं, मगर साल भर उस पैसे के साथ मेहनत करने के बाद| जैसे किसी रिक्शा मालिक को लीजिये| एक नया रिक्शा बाजार में ५००० रुपए से भी कम में आ जाता है, अगर रिक्शा मालिक, रिक्शा चालक से ३० रुपए रोज किराया लेता है तो उसे पूरे साल में १०००० रूपये की कमाई होती है| मगर इस सब में किराया बसूलने और सरकारी भाग दौड़ की मेहनत भी करनी होती है, घर बैठ कर पैसे दोगुने नहीं होते| बिना मेहनत के नहीं हो सकते| [1]

 

बचत और महंगाई

निवेशक जागरूकता श्रंखला १

हम कमाते किस लिए हैं; खर्च करने के लिए| मगर हम सारी जिन्दगी कभी नहीं कमाते| जीवन के पहले बीस पच्चीस साल हम कमाने लायक नहीं होते और बाद के पंद्रह बीस साल कमाने लायक नहीं रहते|

कुछ खर्चे रोज होते है, कुछ हर महीने तो कुछ हर साल.. कुछ कब हो जाये पता ही नहीं चलता.. शादी – ब्याह, हारी – बीमारी|

हमारी कमाई और महंगाई लगभग थोडा आगे पीछे बढ़ते रहते है|

कहते हैं कि जितनी चादर हो उतने पैर पसारो| हम सबकी यही कोशिश होती है| ज्यादातर तो हमारी कमाई से जरूरी खर्च पूरे हो जाते हैं, मगर कई बार खर्चे हमारी कमाई से ज्यादा होते है| इसी तरह के खर्चों के लिए हमें बचत करनी होती है|

अगर हम पिछले साल १०,००० रूपये की बचत की पैसे घर में रख लिए तो आज भी हमारे घर में वो १०,००० रुपए पड़े है जो वक्त जरूरत काम आयेंगे| मगर पिछले साल १०,००० रुपए में ८.५० कुंतल गेंहू ख़रीदा जा सकता था मगर इस बार तो घर में रखे उन १०,००० रुपए से ७.५० कुंतल गेंहू ही आ पा रहा है|

यही है बचत और महंगाई का खेल जिसमे महंगाई हमें खेल खिलाती है|

पहली जरूरत तो यही है कि हम बचत को घर में न रखें; कुछ ऐसा करें की घर में रखा पैसा भी बढ़ता रहे|

मगर यहीं दिक्कत शुरू होती है, कई पीर – फ़कीर – गुरु – बाबा हैं जो पैसा दुगना या दस गुना कर देते है| उधर बहुत सारे लोग है जिनके पास पैसा बढ़ाने के नए नए बढाया तरीके है, जिसमे वो एक दिन हमारा सारा पैसा लेकर गायब हो जाते है| कहा जाता है, कंपनी भाग गई|

हमारी मेहनत की कमाई और उस से भी ज्यादा मेहनत से की गई बचत की दुश्मन ये महंगाई नहीं है, उस से भी बड़ा दुश्मन है हमारा लालच|

गिन लीजिये हर साल कितनी कंपनी लोगों का पैसा लेकर भाग जातीं है| और मजे की बात है हम लोग जो टाटा – बिडला, सरकारी बैंक – पोस्ट ऑफिस को दस रुपए भी आसानी से नहीं देते इन भागने वाली कंपनी को दे देते हैं|