मनभावन कर्जा

देश का हर बड़ा बिल्डर बर्बादी के कगार पर खड़ा है| दिवालिया कानून उसके सर पर मंडरा रहा है|

किसी भी शहर के बाहर निकल जाओ, निर्माणाधीन मकानों की भरमार है| अगर सारे मकान किसी न किसी को रहने के लिए दे दिए जाएँ तो कोई बेघर न रहे| मगर न बेघरों के पास घर हैं, इन मकानों के पास मालिक| जिनके पास मकान हैं तो कई हैं|

सरकार दायीं हो या बायीं – देश में बेघरों को सस्ते कर्जे की रोज घोषणा होती है| मगर जिन्हें घर की जरूरत है उन्हें शायद कर्ज नहीं मिलता| चलो सरकार कहती है, लो भाई जिनके पास पहले से घर हैं – वही लोग दोबारा कर्ज ले लो और एक और मकान ले लो| क्या इससे बेघरों की समस्या कम होती है| ये दो चार घर कर्जे पर खरीदने वाले लोग तो शायद किराये पर भी घर नहीं उठाते| शायद ही इनमें से किसी ने किराये की आय दिखाकर आयकर भरा हो| तो भी इतना कर्ज देते रहने से किसी लाभ?

सरकारी महाजन को – बैंक को| बैंक ने बिल्डर को मोटा कर्जे दे रखा है| बैंक को पता है, ये अपना कर्ज नहीं चुकाएगा| पुराना गुण्डा मवाली और नया नया नेता है| बड़े मेनेजर का हमप्याला यार भी है|

अब बैंक किसी ऐसे को पकड़ता हैं जो आँख का अँधा और गाँठ का पूरा हो – या कम से कम इतना भोला हो कि घर की आड़ में गधा बनकर बैंक के लिए सोलह घंटे काम कर सके| उसे उसकी जरूरत और औकात से ज्यादा का घर खरीदवा दो| बिल्डर को जो पैसा मकान के बदले देना हो बैंक उसकी एंट्री घुमाकर बिल्डर का कर्जा कम थोड़ा कम कर देता है| अब आपकी मासिक किस्त भी बनी तीस साल या और ज्यादा – मूल कम ब्याज ज्यादा| अगर आप आठ रुपया सैकड़ा भी ब्याज देंगे तो चालीस साल में बैंक को एक लाख में मूलधन पर पक्का वाला सुरक्षित ढाई लाख ब्याज आदि मिल जायेगा| अगर आप इस मकान में रहते हैं तो तो भावनात्मक लगाव आपको इस मकान को खतरे में नहीं डालने देगा या फिर आप इस से बड़ा और महंगा मकान खरीदेंगे|

इसमें सबसे बड़ा लाभ है – बिल्डर का| जो मकान मांग आपूर्ति के आधार पर वास्तव में दस लाख का नहीं बिकना चाहिए, वो पच्चीस लाख में बिकता है| उसे अपना मकान बेचने पर कोई खर्चा नहीं करना पड़ता| यह काम अक्सर बैंक करता है| बिल्डर और सारे रियल एस्टेट उद्योग तो तो इस बात की चिंता नहीं करनी कि अगर उनके मकानों की कीमतें कम हो जाएँ तो क्या होगा? इस का नुक्सान तो बैंक को भुगतना है| मकानों की कीमतें गिरने पर लोग कर्जा उतारने में दिलचस्पी कम कर देंगे| उधर बिल्डर भी मकान न बिकने का हवाला देकर कर्जा नहीं चुकायेंगे|

कुल मिला कर अपनी जरूरत के आधार पर घर खरीदें आसन कर्जे के आधार पर नहीं|

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मोबाइल बैंकिंग और सुरक्षा

मेरा मोबाइल को लेकर रिकॉर्ड काफी ख़राब रहा है| पहला मोबाइल लेने के बाद पहले आठ साल में मुझे आठ मोबाइल खरीदने पड़े| मगर मुझे केवल दो मोबाइल ही सेवानिवृत्त करने का अवसर मिला, शेष मोबाइल किसी न किसी जेबकतरे या उसके ग्राहकों को सेवाएं देते रहे| बाद में बैंकों में मोबाइल पर सुविधाएँ देना शुरू किया और तरह तरह के एप्प बनने लगे| तथाकथित कैशलेस समय में सरकार आपको अनजाने ही सलाह दे रही है कि अपने सारे बैंक खाते अपने मोबाइल की एप्प में डालकर चलो|

मुझे उनके एप्प की सुरक्षा के बारे में कुछ नहीं कहना| पहला तो मुझे तकनीकि जानकारी नहीं| दूसरा अगर असुरक्षित भी हों तो भी उनके बारे में टिपण्णी करकर मैं मानहानि के मुक़दमे को दावत नहीं देना चाहता|

मगर मेरा मोबाइल कितना सुरक्षित है? कोई निवेश सलाहकार सलाह नहीं देता कि अपने सारे निवेश के जगह किये जाएँ तो क्या अपनी सारी जायदाद की चाभी अपने मोबाइल में रख देना उचित है|

मोबाइल का चोरी हो जाना दिल्ली जैसे शहर में इतनी आम बात है दिल्ली पुलिस उसकी उचित चोरी रिपोर्ट भी लिखना उचित नहीं समझती| मोबाइल आपका पुराना मोबाइल बेचने से ज्यादा पैसे कमाएगा या दुरूपयोग करकर?

मोबाइल सिम क्लोंनिंग तकनीकि तौर पर बच्चों का खेल है| मोबाइल सिम आपके मोबाइल की मास्टर चाभी है| मोबाइल सिम क्लोंनिंग के अलावा भी मोबाइल में सेंध लगाने के तरीके मौजूद हैं| बहुत सारे स्पाईवेयर मोजूद हैं, जिनमें से कुछ चाइल्ड प्रोटेक्शन के नाम पर खुले आम मिलते और प्रयोग होते हैं| साथ में मोबाइल मैलवेयर हैं हीं|  पर क्या यह घोषित शत्रु की वास्तविक शत्रु हैं?

हाल में एक छात्र समूह ने अपने एक साथी की बिना इच्छा मोबाइल छीन कर उसके मोबाइल एप्प का प्रयोग एक भोजनालय में कर दिया| लेकिन अगर सोचें तो यह चिंताजनक बात हैं| आपके कोई भी मित्र परिवारीजन आपके मोबाइल से कुछ भी खर्च कर सकते हैं – आपका लाड़ला या लाड़ली भी|

मुझे मोबाइल एप्प का विचार सिरे से ही इसलिए बेकार लगता हैं की यह अत्यंत सरल है| आपको या किसी गलत व्यक्ति की मोबाइल पर इसका प्रयोग करते में समय नहीं लगता| दूसरा किसी भी प्रकार के एकल प्रयोग कुंजीशब्द (OTP) भी उसी मोबाइल पर आते हैं|

मुझे जब भी प्रयोग करना होता हैं मोबाइल पर भी नेटबैंकिंग का प्रयोग करना हूँ| यह सुरक्षित समय लेती हैं और बहुत सारी जानकारी मोबाइल में जमा कर कर नहीं रखती| आपको हर जानकारी खुद से देनी होती है| मैं नेटबैंकिंग के लिए अक्सर ब्राउज़र कि सुरक्षा विंडो (इन्कोग्नितो या इनप्राइवेट विंडो) का प्रयोग करता हूँ| यह आपके सारे डाटा को कम से कम अपने यहाँ सुरक्षित नहीं रखती|

कार्ड भुगतान का खर्च

विमुद्रीकरण के बाद जन सामान्य को नगद भुगतान न करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है| पुरानी दिल्ली की एक दुकान पर भुगतान करने के लिए जब हमारे मित्र ने भुगतान करने के डेबिट कार्ड निकला तब दुकानदार ने कहा, साढ़े छः प्रतिशत अतिरिक्त देना होगा| ध्यान रहे मॉल में भुगतान करते समय इस प्रकार का अतिरिक्त भुगतान नहीं करना पड़ता| आइये, मुद्दे की पड़ताल करते हैं|

पुरानी दिल्ली के दूकानदार प्रायः कम सकल लाभ (gross profit) पर सामान बेचते हैं| उनके द्वारा कमाया जाने वाला सकल लाभ मॉल वालों के सकल लाभ से बहुत कम होता है| कम सकल लाभ कमाने के कारण, इनके पास अतिरिक्त खर्चों की गुंजायश बहुत कम होती है| इस लिए हर अतिरिक्त खर्चे को टाला जाता है| नगद भुगतान लेने के बाद यह लोग अपने  सारे खर्च नगद में करते हैं, घर में ले जाये जाने वाला शुद्ध लाभ भी नगद होता है और बैंक में केवल घरेलू बचत ही जमा की जाती है| इस प्रकार इन्हें नगदी प्रबंधन में समय और पैसा नहीं खर्च करना पड़ता|

जब किसी व्यापार प्रणाली को कार्ड से भुगतान लेना होता है तब उसे एक महंगी सुविधा अपने साथ जोड़नी होती है| इसमें कार्ड प्रदाता कंपनी, भुगतान प्रक्रिया कंपनी, इन्टरनेट सेवा कंपनी, बैंकिंग कंपनी सब उस व्यापार प्रक्रिया में जुड़ते हैं| अतिरिक्त खर्चे इस प्रकार हैं –

  • कार्ड धारक का वार्षिक शुल्क,
  • गेटवे चार्जेज – प्रायः कार्ड रीडर मशीन, उनका प्रबंधन, और बैंक आदि से मशीन का संपर्क एक महँगी प्रक्रिया है| कोई न कोई इस कीमत को अदा करता हैं और बाद में ग्राहक से वसूलता है|
  • हर भुगतान पर शुल्क – जो डेबिट कार्ड के मामले में आधा से डेढ़ प्रतिशत और क्रेडिट कार्ड के मामले में डेढ़ से तीन प्रतिशत तक होता है| सरकारी भुगतान जैसे स्टाम्प ड्यूटी, सरकार समर्थित सेवा जैसे रेलवे आरक्षण, आदि के मामले में भुगतान करने वाला इस कीमत को अदा करता है, जबकि मॉल आदि अपने लाभ में से इसे भुगतते हैं| ध्यान रहे कि मॉल के बड़े दुकानदारों के लिए नगदी का प्रबंधन भी उतना ही महंगा होता है| भुगतान प्रक्रिया भुगतान कर्ता, कंपनी कार्ड कंपनी, भुगतानकर्ता के बैंक, विक्रेता के बैंक और विक्रेता, आदि को जोड़ती है| इसका खर्च दूकानदार को, या कहें कि ग्राहक को ही देना होता है|
  • दोनों बैंक अपने अपने ग्राहक से बैंक चार्ज के नाम पर वसूली करतीं हैं| डेबिट कार्ड के मामले में यह चार्ज सीधे ही वसूला जा सकता है| क्रेडिट कार्ड के मामले में अगर आप समय पर पैसा नहीं दे पाते तो कंपनी को लाभ होता है| इस प्रकार की उधारी पर कंपनी 24 से 48 प्रतिशत तक बार्षिक ब्याज़ वसूलती है| इस प्रकार के लापरवाह ग्राहक कंपनी के लिए कीमती होते हैं, न कि समय पर पैसा लौटाने वाले|
  • इन सभी सेवा प्रदाताओं को संपर्क में लेन के लिए इन्टरनेट सेवा का प्रयोग होता है|

आपको ऐसे दुकानदार भी मिलेंगे जिनके पास कार्ड रीडर मशीन बंद पड़ी होंगी| कई बार छोटे दुकानदार डेबिट कार्ड या क्रेडिट कार्ड के इस प्रबंधन को अपने निकट के बड़े दुकानदार की मदद से अंजाम (आउटसोर्सिंग) देते हैं| यह बड़ा दुकानदार इस सुविधा के लिए कुछ रकम चार्ज करता है| यह चार्ज सामान्य चार्ज से लगभग ढाई – तीन गुना होता है| इसमें बड़े दुकानदार के सारे खर्चे और लाभ शामिल होते हैं| मूल रकम बड़े दुकानदार को सेवा मांगने वाले बड़े दुकानदार को देनी होती है| यह व्यापर की दुनिया में, तमाम सरकारी निमयों और वैट के बीच, जटिल और खर्चीली प्रकिर्या है|

इस प्रकार मुझे उस छोटे दुकानदार द्वारा डेबिट कार्ड के लिए साढ़े छः प्रतिशत मांगना गलत नहीं लगता|

पुनःश्च – मोबाइल वॉलेट में भी छिपी हुई कीमत होती है, जो फिलहाल आपके निजी आंकड़े के रूप में वसूली जा रही हैं|

पुनः पुनःश्च – नेशनल पेमेंट कारपोरेशन ऑफ़ इंडिया और आपके अपने बैंक द्वारा शुरू किया गया यूनिफाइड पेमेंट इंटरफ़ेस एक बेहतर विकल्प हो सकता है| अज्ञात कारणों से बैंक अपनी इस सुविधा का व्यापक प्रचार नहीं कर रहीं|

नगद नालायक

प्रचलित पांच सौ और एक हजार  रूपये के नोट की कानूनी मान्यता रद्द करने का स्वागत योग्य वर्तमान सरकारी फैसला काले धन को समाप्त करने के पुराने और असफल तरीकों में से एक है| इस से पहले जनवरी १९४६, १९५४, १९७८ में बड़े नोटों की कानूनी मान्यता रद्द की गई थी| दिक्कत यह रही कि विभिन्न कारणों से यह बड़े नोट, जैसा कि इस बार भी किया जा रहा है, दोबारा प्रचलन में लाये गए| परन्तु इस बार प्रक्रिया में अंतर भी दिखाई देता है|

इस प्रकार की प्रक्रिया में काले धन का वह मामूली हिस्सा जो नगद के रूप में रखा गया हो, लगभग नष्ट हो जाता है| इस प्रक्रिया में जो काला धन बाहर आने की आशा होती है, वह अपने आप में बड़ा और महत्वपूर्ण हिस्सा होता है| परन्तु यह काले धन को समाप्त नहीं करता, काले धन का अधिकतम हिस्सा रियल एस्टेट, सोना, और विदेशी बैंकों में होता है| इस बड़े हिस्से को नियंत्रित करने का प्रभावी उपाय सरकारों के लिए उठाना असंभव नहीं, परन्तु कठिन है| वर्तमान में काले धन की अर्थव्यवस्था सामान्य अर्थव्यवस्था के पच्चीस फ़ीसदी के बराबर है| वर्तमान प्रक्रिया भविष्य में काले धन के उत्पादन पर भी कोई समुचित रोक नहीं लगाती|

मोदी सरकार के फैसले में एक नई बात है, यह बेहद स्फूर्त प्रक्रिया के तौर पर और सीमित समय अवधि में हो रहा है| नगद में काला धन रखने वालों को अपने पुराने नोट नए नोटों से बदलने का मौका नहीं दिया गया है| सरकारी अधिसूचना के अनुसार वर्तमान प्रक्रिया नकली नोट, काला धन, आदि का मुकाबला करेगी|

परन्तु, इस प्रक्रिया का नुकसान निम्न आय वर्ग को होगा, जिनके पास अधिकतर धन नगद में होता है| असंगठित क्षेत्र के मजदूर, छोटे दूकानदार, फेरीवाले, आदि जब अपनी कल (८ नवम्बर २०१६) की आय घर ले कर जा चुके थे तब यह घोषणा हुई| उनकी अधिकतम आय/सम्पत्ति रद्दी बन गई और यह देखने की बात है कि वो आज (९ नवम्बर २०१६) किस प्रकार अपनी खरीददारी कर पाते हैं| उनके लिए बैंक की सुविधा, अगर है तो, एक दिन बाद होगी| परन्तु इनमें से अधिकतर के पास जन धन योजना के बाद भी बैंक अकाउंट नहीं है या दूर दराज इलाकों में है| यह सही है कि १० नवम्बर के बाद बैंक उनके अकाउंट खोल कर उसमें पैसा जमा कर सकती हैं, परन्तु यह वित्तीय भागीदारी प्रक्रिया का दुर्दांत रूप होगा| कारण, इनमें से अधिकतर के पास अपने पते के समुचित प्रमाण नहीं होते|

भारत में दूरदराज के ग्रामीण और जंगल इलाकों में बैंक और डाकघर की सुविधा न होने से वहां मौजूद लोगों को कठिनाई का सामना करना पड़ेगा| उनको अपनी छोटी छोटी बचत शहर ले जाकर बदलनी होगी या इस प्रक्रिया में बिचालियों को मोटा धन देना पड़ेगा|

अन्य भारतियों के लिए समस्या थोड़ी हास्यास्पद है, अधिकतर समझदार लोग अब नगद कम रखते हैं और बैंक मशीनें, अगर देती हैं तो, एक बार में पाँच से अधिक एक सौ के नोट नहीं देतीं| उनके पास खर्च सब्जी भाजी लेने के लिए उधार का विकल्प बचता है वह भी अगर उनका सब्जी वाला अगर कल सब्जी ला पाया तब| ऑनलाइन खरीदने वालों के लिए थोड़ा राहत रहेगी|

वर्तमान अधिसूचना

  • दिनांक ८ नवम्बर २०१६ को बैंक ग्राहकों की सेवा नहीं कर पाएंगे| अपना हिसाब किताब बनाकर रिज़र्व बैंक को देंगे|
  • दिनांक ८ और ९ नवम्बर को एटीएम काम नहीं करेंगी| उनमें से नगद धन राशि बैंक निकल लेंगी|
  • दिनांक ३० दिसंबर २०१६ तक केवल चार हजार रुपये की धनराशि तक के नोट प्रति व्यक्ति बदले जा सकते हैं|
  • चार हजार रुपये से लेकर पचास हजार रूपये की धनराशि बिना किसी पहचान प्रक्रिया के भी बैंक खाते में जमा कराई जा सकती है|
  • पचास हजार रूपये से अधिक की धन राशि जमा करने के लिए सामान्य नियम अनुसार पहचान प्रक्रिया पूरी करनी होगी|
  • जमाकर्ता किसी अन्य व्यक्ति के खाते में भी इस धन को जमा कर सकते हैं, परन्तु इसके लिए खाताधारक की सहमति और जमाकर्ता की पहचान प्रक्रिया पूरी होनी चाहिए|
  • १० नवम्बर से २४ नवम्बर २०१६ तक एक दिन में बैंक शाखा में जाकर केवल १०,००० रुपये निकाले जा सकेंगे, जबकि एक हफ्ते में केवल २०,००० रूपए|
  • १० नवम्बर से १८ नवम्बर तक एटीएम से प्रतिदिन प्रतिकार्ड २,००० रुपये निकाले जा सकेंगे और उसके बाद प्रतिदिन प्रतिकार्ड ४,००० रुपये निकलेंगे|
  • किसी भी प्रकार ने गैर नगद अंतरण – चैक, डिमांड ड्राफ्ट, डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड, मोबाइल बेलेट, इलेक्ट्रोनिक निधि अंतरण, पेमेंट बैंक आदि इस अवधि में मान्य रहेंगे|
  • अगर कोई व्यक्ति ३० दिसंबर तक नगद धनराशि नहीं बदल पता तो वह रिज़र्व बैंक में पहचान प्रक्रिया पूरी कर कर बदल सकेगा|

पहचान प्रक्रिया

पहचान प्रक्रिया के लिए पेन कार्ड, आधार कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, वोटर कार्ड, पासपोर्ट, आदि प्रयोग किये जा सकते हैं|

आयकर व्यवस्था

वर्तमान में अगर कोई व्यक्ति दो लाख से अधिक नगद धनराशि बैंक में जमा करता है तो इसकी सूचना बैंक आयकर विभाग को देती है| आयकर विभाग जांच का निर्णय के सकता है|

अनिवासी और प्रवासी

अगर आप भारत से बाहर हैं तो आप किसी अन्य व्यक्ति को भारत में रखे नगद खाते में जमा करने के लिए अधिकृत कर सकते हैं|

परिमाण आधारित विश्लेषण

काले धन की अर्थव्यवस्था अधिकतर निवेश नगद धनराशि में नहीं होता| किसी भी व्यक्ति के पास काले धन के एक करोड़ से अधिक रुपये होने की सम्भावना बहुत कम है| अधिकतर धन संपत्तियों, बेनामी संपत्तियों, कंपनियों, सोना – चांदी, और विदेशी बैंकों में होता है| बेनामी संपत्तियों के अलावा उनमें से किसी से निपटने की कोई सटीक योजना सरकार के पास नहीं है| संपत्तियों में काले धन के निवेश के कारण बहुत सारी निवास योग्य संपत्तियों पर मालिकों के ताले लटक रहे हैं| बाजार में सम्पतियों के अनावश्यक दाम इस सब के कारण बढ़े हुए हैं|

दूर दराज के क्षेत्रों और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों किसानों, मझोले दुकानदारों के लिए कोई समुचित व्यवस्था नहीं की गई है| पेट्रोल पंप आदि की तरह बिक्रीकर में पंजीकृत दुकानदारों को भी दो दिन तक अमान्य धनराशि स्वीकार करने की अनुमति मिलनी चाहिए थी|

सरकार ने नगद आधारित व्यवस्था को बैंक आधारित व्यवस्था में बदलने का अवसर हाथ से जाने दिया है| नए नोटों का प्रचलन सही निर्णय नहीं है|

हर प्रक्रिया में लाभ हानि होते है| वास्तविक परिणाम अगले पचास दिन में दिखाई देंगे| हमें सरकार का सहयोग करने का प्रयास करना चाहिए|

 

बचिए कंपनी फिक्स्ड डिपाजिट से

जल्दी से दोगुना होने वाला पैसा हम सभी को जान से ज्यादा नहीं तो कम प्यारा भी नहीं है| पहले ज़माने में पैसा दोगुना करने का काम बाबाजी लोग करते थे| आज के ज़माने में पैसा दोगुना करने का ठेका कंपनियों के पास है|

कंपनी फिक्स्ड डिपाजिट में अच्छे ब्याज का वादा ललचाता है| बड़ी कंपनी का नाम आपको आश्वस्त करता है| मगर हाल में कंपनी डिपाजिट में लोग बुरी तरह फंसे हुए हैं और कंपनियां कैश क्रंच यानि नगदी की कमी की गहरी खाई में धंसी हुईं हैं| कई जानी मानी कंपनियां नगद पैसे की कमी के चलते ट्रिब्यूनल के पास जाकर पैसा वापसी का समय बढ़वाने में लगी हैं|

हाल में एक सज्जन मिले, जो तीन चार साल पहले किसी बड़ी कंपनी में “की मैनेजरियल पेरसोनेल” कहे जाने वाले एक ऊँचे पद से रिटायरमेंट लेकर आये थे| रिटायरमेंट फण्ड में से ढेर सारा पैसा किसी और कंपनी के फिक्स्ड डिपाजिट में फिक्स्ड कर दिया| जब वापसी का टाइम आया तो कंपनी ने बोला इन्तजार करो, हम ट्रिब्यूनल से टाइम मांग कर आते हैं| सरकार ने बोला कंपनी ट्रिब्यूनल कंपनी ट्रिब्यूनल से टाइम मांग कर आती है| भगवान ने बोला धीरज धरो| खैर बाद में पैसा मिल तो गया, मगर जरूरत के समय पर नहीं|

कंपनी फिक्स्ड डिपाजिट आज सबसे अधिक रिस्क का निवेश है| पिछले कुछ समय में सरकार ने कुछ कदम उठाये हैं निवेशकों के हित में|

पहला कदम है, फिक्स्ड डिपाजिट लेने वाली कंपनी को क्रेडिट रेटिंग लेनी होती है| यह रेटिंग मात्र एक आकलन है और यह रिस्क का मोटा अंदाजा भर है|

दूसरा कदम है, डिपाजिट का बीमा| फिक्स्ड डिपाजिट लेने वाली कंपनी को बाजार से डिपाजिट का बीमा करवाना होता है| मगर आज तक सरकार इस कदम को टालने पर मजबूर है| कारण – बीमा कंपनी कंपनी डिपाजिट का बीमा करने को अपने लिए खतरनाक मानती हैं – मतलब बेहद घाटे का सौदा| इतने बड़े भारत देश में कोई बीमा कंपनी, किसी भाई बन्धु कंपनी के डिपाजिट का भी बीमा करने को तैयार नहीं|

तीसरा कदम है, कंपनी की जायदाद की गिरवी| यह गिरवी, कंपनी के डिपाजिट ट्रस्टी के नाम पर रखी जानी है|

चौथा कदम है – निवेशक जागरूकता| सरकार ने कंपनियों को कहा है कि वह निवेशकों को भेजे जाने वाले कागजातों में एक दावात्याग यानि डिस्क्लेमर डालें| डिस्क्लेमर की भाषा पढ़िए और सुरक्षित रहिये –

“यह स्पष्ट रूप से समझा जाये कि रजिस्ट्रार के पास परिपत्र (फॉर्म) अथवा विज्ञापन के प्ररूप में परिपत्र फाइल करने को यह न माना जाये कि उसे रजिस्ट्रार अथवा केन्द्रीय सरकार द्वारा संस्वीकृत अथवा अनुमोदन दिया गया है| रजिस्ट्रार अथवा केन्द्रीय सरकार की किसी भी जमा स्कीम की वित्तीय सुदृढ़ता के लिए, जिसके लिया जमा स्वीकार या आमंत्रित की गई है अथवा विज्ञपन के प्ररूप में परिपत्र में दिए गए विवरणों या मतों की सत्यता के लिए कोई जबाबदेही नहीं है| जमाकर्ता जामा स्कीमों में निवेश करने से पूर्व पूरी सतर्कता बरतें|”

निदेशक पहचान संख्या (Director Identification Number)

हाल में सुब्रमणियास्वामी ने प्रियंका गाँधी वाड्रा के विरुद्ध एक से अधिक DIN रखने के आरोप में शिकायत दर्ज की है| इसके बाद उन्होंने कारती चिदंबरम के विरुद्ध भी शिकायत दर्ज कराई| पहले यह चुनावी मामले लगते थे, परन्तु चुनावों के बाद भी DIN को लेकर उठा विवाद थम नहीं रहा है| सभी दल रोज नए लोगों पर DIN सम्बन्धी आरोप लगा रहे हैं|

हाल में दो मंत्रियों नितिन गडकरी और पियूष गोयल के ऊपर भी यही आरोप लगाये गए|

अभी ३१ मार्च २०१४ तक, एक से अधिक DIN रखना या उनके लिए प्रार्थना करने के लिए पांच हजार रुपये तक के दंड का प्रावधान था और अगर यह गलती ठीक नहीं की जा सकी तो पांच सौ रूपए प्रतिदिन के हिसाब से अतिरिक्त दंड लगता था| इस सजा को अब बढ़ा कर छः महीने की कैद और पचास हजार रुपये तक के जुर्माने के रूप में बढ़ा दिया गया है| साथ में अतिरिक्त दण्ड भी लगता हैं|

जब मैंने स्वयं इन आरोपों को जांचा तो पाया कि इस प्रकार के सभी DIN में कुछ समानता थी| आइये समझें|

पहले आवेदक द्वारा DIN के लिए ऑनलाइन प्रार्थनापत्र भरना पड़ता है, जिस से एक प्रोविजनल DIN मिलता है| इस प्रोविजनल DIN के साथ ही प्रार्थना पत्र को छापकर, सभी जरूरी कागजात लगाकर, पैसा जमा करने के सबूत के साथ जमा कराया जाता है| कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय का DIN विभाग इस DIN को अंतिम अनुमति देता हैं|

अनुभव के आधार पर मैं जानता हूँ कि स्वीकार होने वाले प्रार्थना पत्रों से अधिक अस्वीकार होने वाले प्रार्थना पत्र हैं| संलग्न कागजन में पिता के नाम का अंतर, वर्तनी सम्बन्धी गलती, या और भी कई अन्य कारण है जिनके कारण प्रोविजनल DIN नामंजूर होता है| यह सभी DIN मंत्रालय के पोर्टल MCA21 पर आवेदक के नाम पर दिखाई देते हैं| मगर अभी और भी कुछ जानना शेष है|

यदि आवेदक से फॉर्म भरते समय कोई गलती सूचना भर गयी, अथवा लिखने में कुछ गलती हो गयीं, तो भी प्रोविजनल  DIN दे दिया जाता है| कई बार आवेदक फॉर्म भरने के बाद आगे कार्यवाहीं नहीं करता, तो भी प्रोविजनल DIN दे दिया जाता है| आवेदक का प्रोविजनल DIN हर हाल में मंत्रालय के पोर्टल पर दिखाई देता है, तब भी जब अंतिम और मान्य DIN मिल जाये|

इसके कई परिणाम होते हैं:

१.       मंत्रालय पोर्टल् पर आवेदक के नाम से कई DIN दिखाई देते हैं;

२.       जल्दी मंत्रालय के पास प्रयोग किये जाने लायक DIN समाप्त हो जायेंगे|

मंत्रालय के एक उच्च अधिकारी ने अभी हाल में बताया कि पोर्टल पर एक से अधिक DIN दिखाई देना, किसी आवेदक को गलत साबित नहीं करता है|

कई विचार – विमर्शों के बाद मैंने पाया कि हमें कुछ बातों का ध्यान रखना होगा:

१.       एक PAN पर एक ही DIN मिल सकता हैं|

२.       एक से अधिक DIN किसी गलत तरीके से ही मिल सकते हैं जैसे फर्जी या एक से अधिक PAN|

३.       अगर कोई व्यक्ति एक से अधिक DIN प्रयोग कर रहा है तो यह उसकी गलती का सबूत है|

अपनी स्तिथि को साफ रखने के लिए हम, सूचना का अधिकार प्रयोग कर कर अपने DIN के बारे में सही स्तिथि को पता कर सकते हैं|

डायरेक्टर साहब

निवेशक जागरूकता श्रंखला ४

 

अभी हाल में मेरे पास कुछ ऐसे मामले आये जिनमे साधारण लोग कंपनी का डायरेक्टर बनने के लालच में पैसा गवां बैठे| यहाँ चालक लोगों में जल्दी तरक्की का रास्ता देखने वाले, पढ़े लिखे, नौजवानों को अपने जाल में फंसाया था|

 

Mr Ratan Tata with Dr Greg Gibbons and Dr Ben ...

Mr Ratan Tata with Dr Greg Gibbons and Dr Ben Wood WMG (Photo credit: wmgwarwick)

 

एक मामले में कुछ नए लोगों ने एक परिश्रमी, महत्वाकांक्षी युवक से मित्रता की| बाद में अपनी एक पुरानी कंपनी का काम सँभालने का ऑफर दिया वह भी पार्टनर, डायरेक्टर, और मुनाफे में हिस्सेदारी के साथ| इस यूवक ने कंपनी के शेयर में पन्दरह लाख का पैसा नगद में लगाया| कुछ दिनों में उसे मैनेजिंग डायरेक्टर बना दिया गया| पर दो महीने में ही कंपनी के प्रोमोटर लोग गायब हो गए| रजिस्ट्रार ऑफ़ कम्पनीज में शिकायत तो दर्ज कर दी गयी है| मगर कंपनी का ऑफिस तो इन मैनेजिंग डायरेक्टर साहब के घर पर ही था और प्रोमोटर के पते बदल गए हैं| जब तक सही पते नहीं मिल जाते, सरकारी कार्यवाही नहीं हो सकती| मगर मजे की बात यह है कि शिकायत का पता लगने के कई महीने बाद उन प्रोमोटर्स ने शिकायत करने वाले युवक से संपर्क कर कर  सौदेबाजी शुरू कर दी| इस सौदेबाजी में युवक को पंद्रह लाख में से केवल दस लाख का चेक दिया| मगर सुना है की वो चेक भी बाउंस हो गया है|

 

यह बहुत नुकसानदेय मामला है| अब दोबारा सौदे बजी हुई तो फिर इस युवक को कुछेक लाख का नुकसान हो जायेगा और अदालत के चक्कर में बहुत टाइम लगेगा|

 

एक दुसरे मामले में बेरोजगार युवक ने एक खोखा कंपनी में पैसे देकर जनरल मेनेजर की नौकरी कर ली| ये कंपनी कंसल्टेंसी का कम करने वाली थी| सारा दारोमदार इसी युवक पर था| कंपनी ने कुछ दिन तक उसी के पैसे में से उसे सैलरी दी मगर बाद ने वो लोग रफूचक्कर हो गए| अब इस युवक के पास लम्बी कानूनी कार्यवाही का न तो पैसा है न ही समय है| घर वालों ने भी उसको घर से लगभग बहार निकल रखा है|

 

दुर्भाग्य से दोनों ही मामलों में युवक पढ़े लिखे हैं| मेहनती और समझदार भी हैं| मगर थोड़ी और जागरूकता की जरुरत है|

 

हम सभी को लालच से बचना चाहिए| आप अपना पैसा लगा कर अपनी खुद की कंपनी में डायरेक्टर बनते है तो ठीक है| दुसरे की कंपनी में पैसा लगाकर उसमे डायरेक्टर बनना केवल मंझे हुए लोगों के लिए ही ठीक है| पूरी तरह से जांच पड़ताल कर लें|