विश्व-बंदी १६ मई

उपशीर्षक – त्रियोदशी में करोना दावत

करोना काल की अच्छी उपलब्धियों में एक यह भी है कि देश में त्रियोदशी संस्कारों में भारी कमी आई है| परन्तु मेरे गृह नगर के बारे में छपी खबर चिंता जनक थी|

शहर के एक बड़े सर्राफ़ की माताजी का हाल में स्वर्गवास हुआ| इसके बाद स्वाभाविक है कि उनके पुत्र, और पुत्रिओं के परिवार इकठ्ठा होते| इसमें शायद किसी को कोई आपत्ति भी नहीं होनी चाहिए| परन्तु इस परिवार ने अपनी माताजी के लिए त्रियोदशी संस्कार का आयोजन किया, जिसमें शहर भर के काफ़ी लोग सम्मलित हुए| दो दिन के बाद सर्राफ़ साहब की करोना से मृत्यु हो गई| मृत्यु के समाचार के बाद सरकार ने तुरंत तीन प्रमुख थाना क्षेत्रों में कर्फ्यू का ऐलान कर दिया जिससे कि बीमारी न फैले| साथ ही उन लोगों की जानकारी इकठ्ठा की गई जो त्रियोदशी में शामिल हुए थे| इस परिवार और समारोह में शामिल कई लोग करोना से संक्रमित पाए गए|

दुःख यह कि यह समाज का सभ्य और समझदार समझे जाने वाला तबका है| यह वह लोग हैं जो दूसरों के लिए आदर्श बनकर खड़े होते है|

इस पूरे इलाके में कर्फ्यू जारी है| कोई नहीं जानता कि सर्राफ़ परिवार के यहाँ मातमपुर्सी के लिए आए और बाद में त्रियोदशी समारोह में शामिल लोग कब कब किस किस से मिले| यह एक पूरी श्रंखला बनती है| यह सब जान पाना उतना सरल नहीं जितना लगता है| अलीगढ़ शहर ख़तरे की स्तिथि में अब लगभग एक महीने के लिए रहेगा| सरकार ने लगभग १५० लोगों के विरूद्ध मुकदमा कायम किया है|

कुछ अतिविश्वासी या अंधविश्वासी लोगों के कारण उनके सम्बन्धियों, मित्रों, परिवारों, पड़ौसियों, और यहाँ तक कि उनके आसपास से अनजाने में ही गुजर गए लोगों के लिए खतरा पैदा हुआ है|

अलीगढ़ वालों के समझदार होने का मेरा भ्रम इस समय कुचल गया है| मैं सिर्फ़ आशा करता हूँ कि जल्द सब ठीक हो|

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विश्व-बंदी १५ मई

उपशीर्षक – करोना के कारण बेहतर कॉर्पोरेट लोकतंत्र

करोना ने भारत ने कॉर्पोरेट सुशासन के लिए बेहतरीन उपहार दिया है| सरकार ने, जाने- अनजाने में, कंपनियों के अंश-धारकों (shareholders) के लिए लगभग सभी कंपनियों की आम सभाओं में शामिल होने की प्रक्रिया को सरल कर दिया है| लगता है कि सरकार ने यह अनजाने में ही किया है वर्ना इस दृष्टिकोण से अब तक प्रचार किया जा चुका होता और वित्तमंत्री इसे आत्मनिर्भर भारत वाली सरकारी पोटली में शामिल कर चुकी होतीं| ध्यान रहे कि यह सरलीकरण मात्र इसी वर्ष के लिए हुआ है|

अगर आप किसी  भारतीय कंपनी में अंशधारक हैं, तो यह वर्ष उस कंपनी की आम सभाओं में शामिल होने के लिए उचित वर्ष है| इस वर्ष दूर दराज के क्षेत्र में बैठा सामान्य अंशधारक जिसने कभी किसी कंपनी की असाधारण आम सभा या वार्षिक आम सभा में भाग नहीं किया है, इस वर्ष घर बैठे ही इसका अनुभव ले सकता है| इस से पहले दूरदराज के अंशधारक पिछले कुछ वर्षों से डाक-मतदान या ई-मतदान करते रहे हैं|

किसी कंपनी के अंशधारक के रूप में कंपनी की किसी भी आमसभा के शामिल होना आपका विशेष अधिकार है| इससे अपनी कंपनी, जिसके एक छोटे से मालिकाना हिस्सेदार हैं, को समझने और उसकी निर्णय प्रक्रिया में भाग लेने का अनुभव मिलता है| परन्तु बड़े शहरों के बाहर रहने वले अधिकतर अंशधारकों ने इस प्रकार का कोई अनुभव कभी नहीं लिया है| साथ ही बड़े शहरों में रहने वाले लोगों की शिकायत रही है, कि कुछ विशेष लोग वहाँ आकर अक्सर गड़बड़ी फैलाते हैं| परन्तु इस बार ऐसा कुछ होने की सम्भावना नहीं हैं|

इस बार आप ठीक उसी तरह कंपनियों की आम सभाओं में भाग ले सकते हैं जिस तरह आप अपने मोबाइल या कंप्यूटर से ग्रुप विडियो कॉल करते हैं या पिछले दो महीने से ऑनलाइन सभाएं कर रहे हैं|

शुरूआती आवश्यकताएं

बिना शक, मूल बात यह है कि आपके पास किसी कंपनी के शेयर होने चाहिए – चाहे यह पुराने कागज़ वाले शेयर सर्टिफिकेट के रूप में हों या आपके डीमेट खाते में दर्ज हो| आपके पास पहले से शेयर है तो बधाई, वर्ना तुरंत अपनी मनपसंद कंपनियों के कुछ शेयर जल्दी से खरीद लें| जिस दिन कम्पनी अपने अंशधारकों को आम सभा का बुलावा भेजेगी, उस से कम से कम हफ्ता दस दिन पहले यह खरीद आप कर कर रख लें| शेयर बाजार में इस दिनों मंदा चल रहा है आप कम खर्च में कुछ अच्छे शेयर खरीद सकते हैं| मगर ध्यान रहे मैं आपको यहाँ कोई निवेश सलाह नहीं दे रहा हूँ|

अब आते हैं आमसभा में शामिल होने की पहली जरूरत पर| तो आपके पास कोई भी ठीक ठाक चलता हुआ, कंप्यूटर, लैपटॉप या फिर मोबाइल होना चाहिए| ४जी सिम वाला कोई भी साधारण सा मोबाइल भी आप के काम आ सकता है|

दूसरी जरूरत, हमें मालूम ही है एक अच्छा सा इन्टरनेट| अगर आपके इलाके में बढ़िया ब्रॉडबैंड नहीं है तो इलाके का सबसे बेहतरीन स्पीड वाला इन्टरनेट कनेक्शन ले लें|

इसके बाद आपके पास अपना ख़ुद का एक ईमेल पता होना चाहिए| यह पता चालू हालात में होना बहुत जरूरी है| कहीं ऐसा न हो कि जब आम सभा का बुलावा आये तो आप खुल जा सिमसिम जपते रह जाएँ|

अगर आपके पास इतना है तो आप अपनी कंपनी में मालिकाना हक का इस्तेमाल करते हुए कॉर्पोरेट लोकतंत्र और कॉर्पोरेट सुशासन में अपना बहुमूल्य योगदान देने ले लिए तैयार हैं|

अरे थोड़ा सा तो रुकिए, पहले कंपनी या डिपाजिटरी या रजिस्ट्रार व ट्रान्सफर एजेंट से पता कर लें कि उनके पास आप का चलता हुआ ईमेल पता है| अगर नहीं है तो उन्हें इसे अद्यतन करने के लिए कहें| वैसे कंपनी वाले खुद भी आपसे पता करने के लिए अखबार में और अपनी वेबसाइट पर जनसूचना लगाकर आपसे आपके चालू ईमेल पते की जानकारी माँगेंगे|

अब आपको यह देखना है कि आपके पास किस प्रकार की कम्पनी के शेयर हैं – ईवोटिंग वाली या ईमेल-वोटिंग वाली| दोनों प्रकार की कंपनियों के लिए आम सभा में भाग लेने की प्रक्रिया अलग है और मैं इसे समझाने जा रहा हूँ|

ईमेल वोटिंग वाली कंपनियाँ

जिन कंपनियों में एक हजार से कम अंशधारक हैं, वह कंपनियां ईमेल से वोटिंग कराएंगी| इन कंपनियों की आम सभा में आपको ज्यादा बेहतर अनुभव मिलने की उम्मीद है| इनके शेयर आपको शेयर बाजार से शायद नहीं मिलेंगे|

यह कंपनियां आपको उनके रिकॉर्ड में दर्ज आपके ईमेल पते और अधिकतर मामलों में समाचारपत्र में जन सूचना देकर आम सभा का बुलावा देंगी|

कंपनियों की आम सभाएं विडियो कॉन्फ़्रेंसिंग या किसी अन्य चलचित्रीय विधि से संपन्न होंगी| इस वर्गीकरण की कम्पनियां लॉग इन करने वाले पहले ५०० सदस्यों को दोतरफ़ा संवाद की सुविधा उपलब्ध कराएंगी जबकि अन्य सदस्यों को एक तरफ़ा सीधा प्रसारण देखने की सुविधा मिलेगी| अधिकतर मामलों में किसी आम अंशधारक को दोतरफ़ा बातचीत की सुविधा की जरूरत नहीं होती जब तक कि आपके पास कोई महत्वपूर्ण प्रश्न या विचार नहीं है|

आम सभा में सभी विचार विमर्श के बाद यह कम्पनियां अपने अंशधारकों के पास ईमेल के माध्यम से मतदान की प्रक्रिया प्रारंभ करेंगी| आपको अपने मताधिकार का प्रयोग करना है|

मतदान में देरी होने पर, मतदान का निर्णय थोड़ी देर से लेकर थोड़े दिन के लिए आम सभा की बैठक को स्थगित करकर और बाद में पुनः बुलकर भी अंशधारकों को बता दिया जाएगा|

ईवोटिंग वाली कंपनियाँ

जिन कंपनियों में एक हजार या अधिक अंशधारक हैं, वह कंपनियां ईवोटिंग कराएंगी, यह ईमेल वोटिंग से अलग है| इन कंपनियों में से बड़ी कंपनियों के शेयर आपको शेयर बाजार मिल सकते हैं|

यह कंपनियां आपको उनके रिकॉर्ड में दर्ज आपके ईमेल पते पर और साथ ही अधिकतर मामलों में समाचारपत्र में जन सूचना देकर आम सभा का बुलावा देंगी|

कंपनियों की आम सभाएं विडियो कॉन्फ़्रेंसिंग या किसी अन्य चलचित्रीय विधि से संपन्न होंगी| यह वर्गीकरण की कम्पनियां लॉग इन करने वाले पहले १००० सदस्यों को दोतरफ़ा संवाद की सुविधा उपलब्ध कराएंगी जबकि अन्य सदस्यों को एक तरफ़ा सीधा प्रसारण देखने की सुविधा मिलेगी| अधिकतर मामलों में किसी आम अंशधारक को दोतरफ़ा बातचीत की सुविधा की जरूरत नहीं होती जब तक कि आपके पास कोई महत्वपूर्ण प्रश्न या विचार नहीं है|

इस कंपनियों में आम सभा की बैठक से पहले ईवोटिंग हो जाती हैं| इसके लिए आपके पास जरूरी सूचना आम सभा के बुलावे से साथ ही भेजी जाती है| इस प्रकार की कंपनियों की आम सभा में बहुत गंभीर विचार विमर्श पहले के मुकाबले कम हुआ है|

फिर भी जिन लोगों ने आम सभा से पहले मतदान नहीं किया है उन्हें मतदान की पुनः सुविधा मिलेगी| मतदान का निर्णय करने के लिए दो तीन दिन का समय दिया जाता है| मतदान का निर्णय कंपनी के वेबसाइट पर लगाया जाता है|

आशा करता हूँ, आपको कॉर्पोरेट लोकतंत्र में हिस्सा बनकर प्रसन्नता होगी और महत्वपूर्ण निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बनने का गौरव प्राप्त होगा|

 

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विश्व-बंदी १० मई

उपशीर्षक – श्रमिकविरोधी पूंजीपशुवाद  

देश के कथित पूंजीवादी शासक एक एक कर लगातार श्रमिक कानूनों को रद्द कर रहे हैं| एक विधि-सलाहकार होने के नाते मैं वर्तमान कानूनों का समर्थक नहीं हूँ, परन्तु इस प्रकार रद्द किए जाने का स्पष्ट नुक्सान देखता हूँ| पूंजीवादी दुर्भाग्य से यह गलत कदम उस समय उठाया जा रहा है, जिस समय उद्योगों के लिए श्रमिकों की जरूरत बढ़ रही है और जिन स्थानों पर उद्योगों की भीड़ हैं वहां श्रमिकों की भारी कमी है| ऊपर से देखने में लग सकता है कि अगर ऐसे में मजदूरों को रोका जाता है तो उद्योग को लाभ होगा| परन्तु दुर्भाग्य से रूकने के लिए मजदूर हैं ही नहीं| हर बीतते हुए दिन या तो वो लौट कर अपने गाँव घर जा रहे हैं, या असुरक्षित स्तिथियों में संक्रमण का बढ़ता ख़तरा उठा रहे हैं| साथ में महामारी और मृत्यु के नृत्य को पूँजीपशुओं की मानसिकता तांडव में बदल रही है|

यह सभी कानून इस लिए गलत नहीं हैं कि यह मजदूरों को कोई खास लाभ दे रहे हैं, न इसलिए कि मजदूर संगठनों पर कमुनिस्ट का कब्ज़ा है, यह इसलिए गलत हैं कि इनको न उद्योगपति समझ पाते हैं और न श्रमिक| ये पुराने श्रमिक कानून उस तरह का धर्म हैं जिसमें समस्त निष्ठा  ईश्वर को भुला कर कर्मकाण्डों पर टिका दी गई ही| यह क़ानून सिर्फ़ नौकरशाही के कागज़ों का पुलंदा मोटा करते हैं| इनमें सुधार के लिए, इन्हें सरल, समझने योग्य, पालन योग्य बनाने की आवश्यकता थी, न कि रद्द करने की|

वर्तमान में उद्योगों के वेतनदेय क्षमता नगण्य है, साथ ही वो मजदूरों को कोई अन्य लाभ – इज्जत, सुरक्षा, रोजगार गारंटी, स्वास्थ्य सुविधा या बीमा – कुछ देने के लिए न तो बाध्य हैं और न देने जा रहे हैं| पूँजीपशुओं की पूरी ताकत उन्हें गुलाम की तरह रखने में लगी हुई है| मगर गुलाम बनने के लिए आएगा कौन?

अगर मजदूरों का रोजगार प्रदाता उद्योग के आसपास रहने- खाने के बाद घर भेजने लायक बचत न हो, इज्जत न मिले और अगर उसे अपने गाँव के छोटे मोटे रोजगार में जीवन यापन संभव रहे और कम ख़तरा उठाना पड़े तो वो वापिस क्यों लौटेंगे|

हर बात का उचित लाभ भी होता है, अगर श्रमिक कानूनों के रद्द किए जाने के बाद भी यदि श्रमिक नहीं मिलते तो उद्योगों के लिए पूंजीपति के घर से दूर श्रमिक के द्वार पहुंचना होगा और महाराष्ट्र गुजरात की जगह अवध-मगध आना होगा

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विश्व-बंदी ७ मई

उपशीर्षक – करोना काल में कार्यालय सुरक्षा

जिन चिंताओं का निदान सरलता से संभव है, उन्हें नकारात्मक विचार नहीं कहा जा सकता| करोना काल में असुरक्षित कार्यालय की चिंता इसी प्रकार की चिंता है| सुरक्षा का सकारात्मक विचार है|

दिल्ली महानगर में करोना का शिकार हुए लोगों में एक हिस्सा उन लोगों का है, जो इस से लड़ने के लिए सड़कों या अस्पतालों में तैनात रहे है| हो सकता है इनके बचाव के लिए कुछ और कदम उठाए जा सकते थे, परन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि अर्थव्यवस्था खोल दिए जाने की स्तिथि में अन्य कार्यालय भी बीमारी फैलायेंगे| परन्तु असावधानी भयाभय स्तिथि उत्त्पन्न कर सकती है|

सामान्यतः सुरक्षित माने जाने वाले कार्यालयों को लेकर आम अधिकारीयों, कर्मचारियों और उनके परिवारों में अधिक चिंता है| क्योंकि इस प्रकार के कार्यालयों में लापरवाही का स्तर अधिक पाया जाता है|

मेरा स्पष्ट मत है, इन कार्यालयों में किसी भी प्रकार की लापरवाही के कारण किसी भी कर्मचारी या अधिकारी को बीमारी या एकांतवास का सामना करना पड़ता है तो इसकी आपराधिक जिम्मेदारी उस कार्यालय या संस्था के कार्यपालक अधिकारियों और कार्यकारिणी के सदस्यों की होगी – कंपनी के मामले में मुख्य कार्यपालक अधिकारी और निदेशक मंडल, संस्थाओं के मामले में सचिव और कार्यपालक कार्यकारिणी|

सुरक्षा के दो स्तर हैं जिनका पालन होना है – भले ही वह सरकारी दिशानिर्देशों का भाग हो या न हो: पहला कार्यालय स्तर पर और दूसरा कर्मचारी से सुरक्षित आवागमन को लेकर|

कार्यालय स्तर पर:

  • जबतक असंभव न हो जाए, अधिकारी व कर्मचारी घर से काम करें| उन्हें अपने सप्ताह से ४० ४५ घंटे स्वयं सुनने की सुविधा दें परन्तु कार्य अवश्य पूरा करवाएं|टीसीएस का उदहारण लेकर चलें|
  • कार्य के आवश्यक उपकरण – कलम, कंप्यूटर, काग़ज आदि कार्यालय दे सकता है और अगर अधिकारी व कर्मचारी अपने निजी उपकरण प्रयोग करता है तो मानदेय दिया जा करता है|
  • केवल स्वस्थ्य अधिकारी व कर्मचारी को ही कार्यालय आने की अनुमति दें| सभी अधिकारियों व कर्मचारियों को दैनिक स्वास्थ्य सूचना दर्ज करने के लिए कहा जा सकता है|
  • हर अधिकारी व कर्मचारी को अपने साथ रह रहे परिवारीजनों के स्वस्थ्य की सूचना देने की अनुमति रहे और अगर साथ रह रहे किसी परिवारीजन को स्वास्थ्य सम्बन्धी असुविधा या कठिनाई महसूस हो तो सम्बंधित अधिकारी या कर्मचारी को तुरंत घर से ही कार्य करने के लिए कहा जाए|
  • कार्यालय में तापमापक, साबुन, सेनिटाईज़र, जल, पेय जल, आदि की सम्पूर्ण व्यवस्था हो| सफाई का उच्च कोटि का प्रबंध हो| कड़ाई से दैनिक उच्चस्तरीय जाँच सुनिश्चित हो|
  • हर व्यक्ति मास्क, मुखोटे, घूँघट, पर्दा, बुर्का, हिज़ाब, चादर, दुप्पटे, अगौछे, गमछा आदि का अवश्य प्रयोग करे|
  • यथा संभव अधिकारियों व कर्मचारियों के कार्यालय पहुँचने और निकलने के समय अलग अलग हों| भोजनावकाश समय भी भिन्न रहे|

आवागमन स्तर पर

  • अधिकारी व कर्मचारी घर से निकलने से एक घंटे पूर्व और पहुँचने के एक घंटे बाद तापमान ले और स्वस्थ्य दर्ज करे|
  • भीड़ से बचे| कार्यालय प्रदत्त या निजी वाहन का प्रयोग हो| अनावश्यक गप्पों, मुलाकातों, बैठकों और सम्मेलनों से बचें|
  • बिना स्वास्थ्य जाँच किए किसी अधिकारी व कर्मचारी को कार्यालय में प्रवेश न करने दिया जाए|
  • हर अधिकारी व कर्मचारी को यह दर्ज करना अनिवार्य हो कि वह आज का काम घर से क्यों नहीं कर सकता था? कार्यालय में उसकी कितने समय के लिए उपस्तिथि आवश्यक है और उसके बाद उसे घर बिना दोबारा पूछे घर जाने की सामान्य अनुमति होनी चाहिए|
  • सरकारी छुट्टियों के दिन कार्यालय कतई न खुलें| काम की दैनिक लेखा-जोखा लिया जा सकता है|

सभी उच्च अधिकारीयों के लिए यह आवश्यक है कि कम से कम अपने स्तर से तीन स्तर नीचे के सभी अधिकारियों व कर्मचारियों के स्वास्थ्य पर निगाह रखें और उनसे अधिकतम कार्य घर से ही करवाने का प्रबंध करें|

अगर कोई भी अधिकारी, संस्था, कंपनी, कार्यालय या विभाग सामान्य आवश्यक सावधानियों का पालन नहीं करता तो आपराधिक कार्यवाही के लिए तैयार रहे, भले ही सजा आपको सेवानिवृत्ति के बाद ही क्यों न मिले| न तो सरकार और न ही सरकार के दिशा-निर्देश (भले ही आधे- अधूरे रह गए हों) इस आपराधिक लापरवाही की सजा दिलवाने से आपको रोक पायेगी, जब तक की सामान्य बुद्धि युक्ति सुरक्षा न अपनाई गई हो|

अगर सुरक्षा के सामान्य बौद्धिक नियमों का पालन करने की ठान ली जाए तो सावधानियाँ न तो कठिन हैं न ही महंगी हैं|

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विश्व-बंदी २२ अप्रैल

उपशीर्षक – न्यायलोप और भीड़हिंसा

अगर समाचार सही हैं तो एक ऐसे गाँव ने जिसमें गैर हिन्दू आबादी नहीं है क्रोधित हिन्दूयों की बड़ी भीड़ ने दो साधू वेशभूषाधारियों की बच्चाचोर मानकर हत्या कर दी| मृतकों की वास्तविक साधुओं के रूप में पुष्टि हुई| कई दिनों तक भारत के दुष्प्रचारतंत्र (आप समाचार तंत्र कहने के लिए स्वतंत्र हैं) ने इसे मुस्लिम आतताई भीड़ द्वारा साधुओं की हत्या के रूप में प्रचारित कर दंगे या गृहयुद्ध के हालात पैदा करने का प्रयास किया| दुर्भाग्य से भारत में भीड़हिंसा परंपरा की तरह स्थापित हो रही है| दुष्प्रचारतंत्र ने वर्तमान घटना का दुष्प्रयोग भीड़हिंसा की बनती जा रही विशिष्ट सामुदायिक पहचान को पलटने के लिए किया था| परन्तु, भीड़हिंसा आखिर क्यों?

इतिहास में राजा-महाराजाओं में भी हमने न्यायप्रियता को सामान्य गुण के रूप में न लेकर विशिष्ट गुण के रूप में दर्ज किया है| मानवता में शासक से लेकर शासित तक का हिंसा ही न्याय का प्रमुख साधन रहा है| न्याय प्रणाली का ह्रास, सत्ता की निस्कृष्टता का पहला प्रमाण पस्तुत करते रहे हैं| पिछले कई दशकों से दुनिया भर के सभी इंगितों (इंडेक्स) में भारत सबसे पीछे न्याय सम्बन्धी इंगितों में ही है और स्तर लगातार गिर रहा है|

अगर न्याय का महंगा या विलंबित हो या न्याय प्रणाली भ्रष्ट तो क्या होगा? समाज वैकल्पिक न्याय व्यवस्था के बारे में विचार करेगा| सरकारी अवैचारिकता के चलते भारत में स्थानीय वैकल्पिक न्याय प्रणालियों का विकास नहीं हो सका है जैसे न्याय-पंचायत, मध्यस्थता और सुलह के औपचारिक ढ़ांचे खड़े नहीं हो सके| यहाँ तक कि बड़े बड़े न्यायाधिकरण निंदनीय रूप से न्यायाधीशों, न्यायविदों, अधिवक्ताओं और सरकारी अधिकारीयों के सेवानिवृत्ति केंद्र बनकर रह गए हैं|

विलंवित न्याय के चलते भारतीय राजनैतिक प्रणाली ने पहले तो पुलिस द्वारा की जाने वाली गिफ्तारियों को न्याय का समकक्ष बना दिया| झूठी या गलत गिरफ्तारियों के मामलों से भारत के तमाम न्यायिक निर्णय भरे पड़े हैं, सबूत के अभाव में आरोपी के छूटने की लम्बी चर्चा होती है परन्तु कोई सरकार या पुलिस से नहीं पूछता कि असली अपराधी कहाँ है या पूरे सबूत क्यों नहीं जुट सके| धीरे धीरे आरोपियों के अन्यायपूर्ण सरकारी हत्याओं को न्याय की संज्ञा दी जाने लगी| तुरंत न्याय का दावा| जिसे मारा गया वो असली गुनाहगार था या नहीं किसे पता? जब भी आनन फ़ानन न्याय की ख़बरें आतीं है, असली अपराधी दावत उड़ाते हैं|

जब जनता ने पाया कि न्याय तंत्र या क़ानून व्यवस्था तंत्र नाकारा है, तो उन्हें अपने हाथ में न्याय को ले लेने का विकल्प दिखाई दिया| जनता का क्रोध उस समय बढ़ जाता है जब अपराधी दूसरे गाँव, समाज, शहर, धर्म, जाति, जिले, प्रदेश, रंग, लिंग, भाषा आदि किसी का हो – कुल मिलाकर बाहरी| फिर जनता सिर्फ बच्चाचोर होने के हल्के से से शक में दो साधुओं के मार देती है| साधुओं द्वारा लॉक डाउन का समुचित पालन न करना उनके प्रति शक को कई गुना बढ़ा देता है| यह बहुत बड़ी कीमत है|

मैं गिरफ्तार हुए सभी आरोपियों को दोयम दर्जे का आरोपी मानता हूँ, भीड़हिंसा के सभी मामले ऐसे ही हैं| मैं पुलिस विभाग को तीसरे दर्जे का दोषी समझता हूँ| दुष्प्रचार तंत्र के बारे में क्या कहा जाए? वो तो नबाब साहबों की पालतू मुर्गा-बटेर हैं| पहले दर्जे के मेरे आरोपी पिछले पचास वर्ष में रहे सभी सांसद, विधायक, न्यायाधिकारी, और न्यायविद हैं| यह न्याय प्रणाली और उसको सहजने वालों का अपराध है|

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विश्व-बंदी १७ अप्रैल

उप-शीर्षक: संशोधित समेकित दिशानिर्देशों के साथ गृह मंत्रालय का आदेश

आज जब भारत सरकार के सूक्ष्म , लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय का ईमेल मिला| इसमें संशोधित समेकित दिशानिर्देशों के साथ गृह मंत्रालय का आदेश दिनांक 15.04.2020  संलग्न करते हुए मंत्रालय ने आग्रह किया है कि कोरोना वायरस संक्रमण को रोकने के लिए इकाइयों में सभी एहतियाती उपाय किए जाने चाहिए। साथ ही बहुत से मित्रों से वार्तालाप करते हुए समझ आया कि कुछ उद्योगपति और अधिकारी भले ही खुद घर पर बैठे हों, परन्तु कर्मचारियों और कामगारों के प्रति सहानुभूति न रखते हुए उन्हें येन-केन प्रकारेण कार्यालय में देखना चाहते हैं| तो सोचा कि इस सरकारी आदेश को कानूनी निगाह से देखा जाए| आज की करोना डायरी में यही सही|

मुख्य बात यह है कि अगर आपका कार्यालय या कारखाना अगर खोले जाने की अनुमत सूची में है तो उसे किस प्रकार की सावधानियाँ बरतनी है और किसे बुलाना यां नहीं बुलाना है|

आवश्यक रूप से कड़ा पाठ

क्यों कि यह आदेश एक ऐसे कानून से है जिसमें सजा का प्रावधान है और इसका उद्देश्य बेहद ख़तरनाक बीमारी को रोकना है, इसलिए इसको कड़ा नियम मानकर पढ़ना उचित होगा| इसका ढीला ढाला पाठ आपको सजा का भागी बना सकता है| इस कानून को तोड़ने पर आपको सजा देने के लिए आपकी दुर्भावना सिध्द करने की आवश्यकता नहीं होगी|

क्यों कि यह आदेश बेहद कम समय में तैयार किया गया है अतः इसमें कुछ बाते आगे पीछे हुई हैं| हमें इसे समग्र आधार पर ही पढ़ना चाहिए|

उलंघन पर सजाएँ

इस आदेश का उलंघन करने पर उलंघन करने वालों, जिनमें सरकारी कार्यालय व कंपनियों के अधिकारी शामिल हैं, को तो साल तक की जेल हो सकती है, साथ में जुरमाना तो है ही|

अनुमति नहीं है:

तेरह प्रकार की गतिविधियाँ पूरे देश में हर हाल में पूर्णतः बंद है| कुछ गतिविधियों को (पैराग्राफ ५-२० में) कन्टेनमेंट ज़ोन के बाहर अनुमति दी गई है| अन्य जिन गतिविधियों को अनुमति नहीं दी गई है उन्हें केवल घर से कार्य करने करवाने की अनुमति समझी जानी चाहिए और इसके लिए कार्यालय भूल कर भी न खोलें|

केंद्र सरकार में लगभग १७० ज़िलों को हॉट स्पॉट घोषित किया है| स्थानीय प्रशासन उन ज़िलों में इलाकों को कन्टेनमेंट ज़ोन घोषित कर सकता है, उदहारण के लिए दिल्ली में सभी नौ जिले हॉट स्पॉट हैं और इनमें इस समय कुल ६० कन्टेनमेंट ज़ोन हैं|

नहीं बुला सकते:

अनुमति के नियमों में सरकारी क्षेत्र और कुछेक अन्य क्षेत्र को अधिकतम अनुमति सीमा के अन्दर ही कर्मचारी बुलाने की अनुमति है| उदहारण के लिए सरकारी कार्यालयों में छोटे और मझोले अधिकारियों व् कर्मचारियों को ३०% से अधिक क्षमता में नहीं बुलाया जा सकता| परन्तु असली नियम यह नहीं है बल्कि अन्य है| असली नियम मैं नीचे बता रहा हूँ:

  • कन्टेनमेंट ज़ोन में रहने वाले कर्मचारी नहीं बुलाये जा सकते, पर यह घर से काम कर सकते हैं
  • ६५ वर्ष से अधिक आयु के कर्मचारी नहीं बुलाये जा सकते, पर यह घर से काम कर सकते हैं|
  • किसी भी बीमारी के ग्रस्त कर्मचारी, भले ही वो कार्यालय आने के लिए तैयार हों, नहीं बुलाये जा सकते, पर यह घर से काम कर सकते हैं|
  • ऐसा कोई स्त्री-पुरुष जिनकी कोई भी संतान पांच वर्ष के कम हो, नहीं बुलाये जा सकते, पर यह घर से काम कर सकते हैं|
  • बिना चिकित्सा बीमा कराएँ किसी व्यक्ति को नहीं बुलाया जा सकता, पर यह घर से काम कर सकते हैं|
  • कार्यालय और किसी भी मीटिंग में बैठे हर व्यक्ति को दूसरे से एक मीटर/६ फुट दूर खड़ा या बैठा होना चाहिए|
  • किसी भी मीटिंग में १० या अधिक लोग सामान्यतः नहीं बुलाए जाने चाहिए|
  • किसी भी गैर जरूरी व्यक्ति को कार्यालय आने की अनुमति नहीं होगी|

कार्यालय की तैयारी:

  • कार्यालय आने वाले हर व्यक्ति के आने जाने का प्रबंध कार्यालय करेगा, इसके लिए किसी भी सार्वजानिक वाहन का प्रयोग नहीं होगा|
  • किसी भी वाहन में उसकी क्षमता के चालीस प्रतिशत से अधिक लोग नहीं बैठे होंगे| यानि चार और पांच सीटों वाली कार में मात्र दो लोग| पचास लोगों की बस में बीस लोग मात्र|
  • कार्यालय खुलते और बंद होते समय सेनिटाइज़ किया जाएगा|
  • कार्यालय में आते हर वाहन और उपकरण को विषाणु रहित किया जायेगा – लेपटोप, पेन पेन्सिल को शामिल समझने में ही भलाई समझें|
  • कार्यालय में हर आते और जाते व्यक्ति के तापमान जाँचने की पूरी थर्मल स्क्रीनिंग व्यवस्था होगी|
  • हर उचित स्थान पर सेनिटाइज़र और हाथ धोने की व्यवस्था होगी|
  • भोजन-अवकाश के साथ नहीं होगा हर व्यक्ति अलग अलग भोजन करेगा| मित्रता और घुलने मिलने की अनुमति न दें|
  • कोई बड़ी मीटिंग नहीं होगी|
  • किसी भी हालात में एक साथ पांच व्यक्ति इकठ्ठे न हो| बेहतर समझ कहती है कि एक व्यक्ति प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से अधिक व्यक्तियों के संपर्क में न आए|
  • कार्यालय के निकटतम मौजूद कोविड -१९ जाँच केंद्र और अस्पताल और क्लिनिक की जानकारी उपलब्ध रहेगी|

विश्व-बंदी ३१ मार्च

उपशीर्षक – वित्तवर्ष का अंत 

कुछ घंटों में यह वित्त वर्ष बुरी यादों के साथ समाप्त होने जा रहा है| मैं आशान्वित हूँ कि नया वर्ष फिर से बहारें लाएगा| इस साल पहले दस महीने शानदार बीते| बहुत कुछ नया सीखा, किया और कमाया| मगर बही खाते कर चटख लाल रंग उड़ा उड़ा उदास सा हो गया है|

लेनदारियां बहुत बढ़ चुकी हैं और इस माहौल में उनकी वसूली सरल तो नहीं दिखती| पिछले एक महीने से कोई खास बिल नहीं कटे| अप्रैल से जून से वैसे भी थोड़ा तंग रहता है| इस बार हालत शायद और तंग रहेंगे| उधर, मुवक्किल पैसा समय पर नहीं देते मगर सरकार को अपना वस्तु-सेवाकर तुरंत चाहिए होता है| सरकारी कर गांठ से देना बहुत भारी पड़ता है| जब सरकार खुद आपकी मुवक्किल हो तो स्तिथि नाजुक ही रहती है| केवल रकम वसूल हो जाने रेशमी भरोसा रहता है| हम सेवा प्रदाता तो सिर्फ कागज पर ही सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम हैं| जमीनी लाभ शायद कुछ नहीं|

इस समय बचत से लिए गए निवेश के हालात भी अच्छे नहीं| यह साँप छछुंदर की स्तिथि है| निवेश करें तो जवानी ख़राब, न करें तो बुढ़ापा| उसपर यह मंदी का समय किसी कंगाली से कम नहीं पड़ता| शेयर बाजार में मंदी के चलते निवेश बकत कुछ नहीं तो आज सरकार ने बचत वगैरा पर ब्याज घटा दी| कंगाली में आटा गीला हो चुका है| आटे से याद आया – पिछला गल्ला भी ख़त्म हो रहा हैं और इस महीने का गल्ला भरने के लिए आधे देश के पास पैसे नहीं बाकि बचे लोग के पास दूकान जाने की समस्या|

जिन लोगों के पास नौकरियां हैं उनकी भी समस्या है| लगभग सबको साल के आखिर और कार्यालय के बंद होने के कारण औना – पौना वेतन मिला है| मुनीम भी घर पर और याददाश्त से कितना हिसाब किताब लगायें|

ब्याज घटने से भविष्य निधि पर ७.१ फ़ीसदी, बचत पत्र पर ६.८ फ़ीसदी, किसान विकास पात्र पर ६.९ फ़ीसदी का ब्याज मिलेगा| बचत खाते पर सरकार ने ४ फीसदी पर ही ब्याज रखा हुआ है| इस सब से बुढ़ापे का गणित बिगड़ जाता है| मगर कुल मिलकर ब्याज की दर जीवनयापन की महंगाई की दर से कम होने का अंदेशा हो सकता है| यह बाद अलग है कि बाजार खुद मंदा हो रहे|

सरकार ने दिवालिया कानून को थोड़ा कमजोर थोड़ा सुस्त बनाया है तो काम धंधे में कमी रहेगी| इधर कुछ नया जानने सीखने की जरूरत रहेगी कि कुछ नया काम धंधा मिलता रहे|

प्रार्थना रहेगी बाज़ार में मंदी और देश में अकाल के हालात न बनें| यह नामुराद बीमारी और दुर्भिक्ष जल्दी दूर हो|

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बीमाकृत बचत

पिछले दो दशक में पर्यावरण सुरक्षा दिवाली के अवसर पर एक बड़ा प्रश्न रहा है| एक बार फिर से आर्थिक सुरक्षा का प्रश्न सामने खड़ा है|

नोटबंदी के बाद से कोई भी भारतीय अपनी मुद्रा में बचत्त और निवेश नहीं करना चाहता| मुद्रास्फीति का सामना करने वाले भारत जैसे देशों में मुद्रा में निवेश करना कोई भी समझदारी नहीं है| परन्तु यह भी सही बात हैं कि नोटबंदी होने तक मुद्रा बचत निवेश का सबसे सरल और तरल माध्यम था| भौगोलिक विशालता वाले देश में मुद्रास्फीति लागत के मुकाबले अन्य निवेश संसाधन तक पहुँचने की लागत अधिक रही है| अब यदपि स्तिथि में बड़ा बदलाव महसूस होता है| मुद्रा में निवेश मंहगा और अधिक जोखिम भरा है|

मुद्रा के बाद सरल तरल माने जाने वाले निवेश सोना, चाँदी, और संपत्ति कभी भी तरल नहीं रहे| यह निवेश भावनात्मक लगाव के कारण समय पर काम नहीं आते| अति गंभीर स्तिथि में इनकी कीमत और तरलता बुरी तरह गिर जाती है|

इसके बाद बैंक बचत खाता एक बड़ा सरल और तरल निवेश विकल्प है| परन्तु इसमें निवेशक को पूर्ण सुरक्षा वादा मात्र एक लाख रुपये तक के निवेश तक ही मिलता है| हाल के बैंक घोटालों और बैंक असफलता के बाद, बैंक अपने ग्राहकों को दिए जाने वाले दस्तावेज़ों पर मोहर लगाकर मात्र एक लाख तक के बीमा की जानकारी दे रहा है| यह बैंक की तरफ से उचित कदम है| परन्तु सुरक्षा की दृष्टि से हमारे पास क्या विकल्प है?

पहला विकल्प हो सकता है कि हम हर बैंक के बचत खाते में एक एक लाख रूपये का निवेश करें| परन्तु ऐसा करने से हमारे बचत खातों के निष्क्रिय घोषित होने का ख़तरा पैदा होता है| डाकघर बचत बैंक एक विकल्प हो सकता था परन्तु यह अब सरकारी विभाग नहीं रहा और इसमें निवेश करना बैंक निवेश से समान ही जोखिम भरा है|

हम भारत सरकार के सार्वभौमिक प्रतिभूति प्रपत्रों में निवेश कर सकते हैं| सरकारी प्रतिभूति निवेश बैंक निवेश से अधिक सुरक्षित है| इस की अपनी एक सीमा है| निवेशक अपनी मर्जी से निवेश नहीं कर सकता बल्कि सरकार तय करती है कि उसे किस सीमा तक उधार लेना है| पिछले दशक में कई देशों की सार्वभौमिक प्रतिभूतियों को भी असुरक्षित माना गया है|

मैं सामान्य निवेशक को बैंकों और निजी क्षेत्र की कंपनियों के सावधि जमा की सुरक्षा सम्बन्धी जोखिम के बारे में बताना चाहूँगा| इन सब के पास किसी न किसी क्रेडिट रेटिंग एजेंसी से ली गई क्रेडिट रेटिंग हो सकती है| परन्तु इनका कोई बीमा नहीं होता| कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय ने २०१४ में एक क़ानून बनाकर निजी क्षेत्र के कंपनियों को जमा बीमा करने के निर्देश दिए थे| परन्तु कोई बीमा कंपनी जमा बीमा करने के लिए तैयार नहीं हुई| हारकर १५ अगस्त २०१८ को सरकार ने जमा बीमा का प्रावधान वापिस ले लिया|

समझने वाली बात यह है कि हमें जानना और मानना चाहिए कि लगभग सभी निवेशों में अपने जोखिम हैं| हम को निवेश पर निगाह रखनी चाहिए| हिन्दू धर्म की अपरिग्रह और इस्लाम की केवल व्यावसायिक निवेश करने की सलाह को मानना चाहिए| दिवाली पर लक्ष्मी पूजन से पहले सरस्वती और गणेश पूजन के पीछे की अवधारणा को समझा जाए|

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बचकाना बिचौलिया

पिछली पोस्ट बंद होते बैंक में मैंने लिखा था:  बैंक का बिचौलियापन पूँजी बाजार से ख़त्म होना चाहिए| इसके लिए निवेशक के रूप में आमजन को जागरूक होना होगा|

बैंक उद्योगीकरण के समय की पूंजीवादी जरूरत थी जो जल्द ही एक धुर-पूंजीवादी विचार में बदल गया| बैंकों ने आमजन का पैसा लेकर उद्योगपति को देना शुरू किया| लुटे पिटे आमजन के लिए धन कमाने और खुद को साहूकार समझने का यह सुहाना मौका था| परन्तु जल्द ही बैंक पूंजीपति के हाथ के खिलौने बन गए| पूंजीपति से मिले ब्याज और बैंक के खर्च से बचा ख़ुचा धन ब्याज के नाम पर जमाकर्ता को मिलने लगा| आज भी वास्तव में पूंजीपति ही ब्याज के दर तय करता है – भले ही अब यह लोबिंग के माध्यम से किया जाता है| बैंक के पास तो उधार देने के भी भारी लक्ष्य हैं कि योग्य को भी वह उधार दे देते हैं| बैंक का लिखित उद्देश्य उस समय खंडित हो जाता है जब जरूरतमंद किसान नीलाम हो जाता है और पूंजीपति ८५ प्रतिशत का माफ़ीनामा ले लेता है|

इस्लाम स्पष्टतः और हिन्दू आदि धर्म किसी न किसी रूप में ब्याज आधारित तंत्र के विरोधी रहे हैं| क्योंकि ब्याज लेना देना वास्तव में धन का कोई उत्पादक प्रयोग नहीं करता| धन का वास्तविक प्रयोग उसके उत्पादक प्रयोग में है| बैंक खुद भले ही उत्पादक कार्यों के लिए धन देते हैं परन्तु उनका उत्पादन से कोई सम्बन्ध नहीं होता| ब्याज न निवेशक को पूरा परिणाम देता हैं न उसकी बौद्धिक क्षमता का पूरा प्रयोग करता है| धार्मिक नियमों के ऊपर उठकर देखें तो बैंकों में एक सीमा से अधिक निवेशक और अर्थव्यवस्था के लिए हानिकारक हैं| बैंक पूँजी की समुच्चय और समन्वय करने में भी विफल रहे हैं| वास्तव बैंक के पास अपने धन का समुचित निवेश करने की कोई उचित कुशलता भी नहीं होती| यही कारण है कि बैंक असफल होते रहते हैं|

बंद होते बैंक

मैं आजतक नहीं जानता कि वास्तव में बैंक होते क्यों हैं?

पहले भारत या पूरे एशिया में बैंक नहीं थे तब आम जनता की आवागमन और व्यापारिक जरूरत के लिए हवाला तंत्र था| यह वास्तव में पेमेंट बैंक सिस्टम है जिसे पश्चिमी बैंक प्रणाली के हित के लिए अवैध, गैरकानूनी और आपराधिक बनाकर पेश किया गया| जबकि इसे उसी प्रकार विनियमित किया जा सकता था, जैसे आज पेमेंट बैंक को किया जाता है| हर शहर और गाँव में कर्जदाता साहूकार भी थे जिनके ब्याज के कड़वे किस्से महशूर किये गए थे| सहूकारियां और हवाला आज भी है और कानूनन मना भी है|

बैंकतंत्र का मूल उद्देश्य बड़े समूह से धन बटोर कर उद्योग आदि में प्रयोग करने के लिए देना था|  यह एक उलट-साहूकारी है| आलोचक इसे समाजवाद से धन जुटाकर पूंजीवाद को देना भी कहते हैं| आज इसमें साहूकार की सूदखोरी, हवाला की हौल और पूंजीवाद की लम्पटता है| बाद में जब पूंजीपति असफल होता तो बैंक का बाजा बज जाता और पूंजीपति सो जाता| बहुत बार यह धोखाधड़ी का मामला भी होता|

आखिर बैंक क्यों असफल होते हैं?

भारत में बैंक बंद होना कोई नया घटनाक्रम नहीं हैं| आरम्भ में अधिकतर बैंक पूंजीपतियों ने समाज में मौजूद धन को ब्याज के बदले इकठ्ठा करकर अपने व्यवसाय के लिए प्रयोग करने के लिए खोले थे| इस तंत्र में कमी थी कि आमजन के लिए पैसा लगाना सरल था निकलना कठिन| इसके बाद बैंक का राष्ट्रियकरण हुआ| हालत बदले और लगा कि धोखेबाज रोक लिए जायेंगे| परन्तु छोटे बैंक, साहूकार आदि बने रहे| बड़े बैंक भी कोई नया व्यासायिक नमूना नहीं बना पाए| पूंजीपति बैंक का लाभ लेते लूटते रहे| हाल का दिवाला शोधन कानून भी कोई बहुत सफल नहीं दिखाई देता| हाल का पंजाब महाराष्ट्र सहकारी बैंक भी सामाजिक पूँजी पर पूंजीवादी कुदृष्टि की पुरानी कथा है|

फिलहाल इस सब का कोई इलाज नहीं दिखाई देता| सरकारी नीतियाँ जब तक पेमेंट बैंक, बचत बैंक और साहूकारी और निवेश व्यवस्था को अलग नहीं करेंगी यह सब चलेगा| परन्तु यह सब करना कोई सस्ता सौदा भी तो नहीं है|

आम जन को अपना ध्यान खुद रखना होगा| बैंक का बिचौलियापन पूँजी बाजार से ख़त्म होना चाहिए| इसके लिए निवेशक के रूप में आमजन को जागरूक होना होगा|

लम्बा चौड़ा कराधान दायरा

संभावित अमीर और नए अमीर अक्सर यह मांग करते हैं कि सरकार करों के नाम पर उन्हें न लूटे और कराधान का दायरा बड़ा कर कर अधिक लोगों से करवसूल करे| मुझे अक्सर उनकी मांग के भोलेपन पर दया नहीं, तरस आता है| अक्सर यह लोग इस प्रकार का बर्ताव करते हैं कि मानो देश में कोई साम्यवादी या समाजवादी व्यवस्था उन्हें उनकी मेहनत और अमीरी के लिए परेशान कर रही है| दुनिया के हर पूंजीवादी देश में पूंजीपतियों पर अधिक कर हैं| अमेरिकी कांग्रेस तो और बढ़ाने पर विचार भी कर रही है| आखिर कराधान का दायरा बढ़ाने से इन लोगों की मुराद क्या है? क्या सरकार गरीबों से कर लेना शुरू करे? क्या गरीब कर नहीं देते?

वास्तविकता यह है कि गरीब कुल प्रतिशत में अमीरों के मुकाबले अधिक कर देते हैं| यह बाद नए वस्तु एवं सेवा कर अधिनियम के बाद बहुत अधिक विश्वास के साथ कही जा सकती है| भारत में दो प्रकार के कर लगते हैं:

  • प्रत्यक्ष कर यानि आयकर और
  • अप्रत्यक्ष कर यानि वस्तु एवं सेवा कर|

फिलहाल आयकर का दायरा बढ़ाने के दो तरीके हैं:

  • गरीबों से आयकर लेना;
  • अधिक लोगों को रोजगार देकर वर्तमान कर सीमा में लेकर आना;
  • वर्तमान कर सीमा के अन्दर के लोगों की कर चोरी पकड़ना|

गरीबों से कर लेना सरल तो हैं परन्तु एक गरीब की आयकर विवरणी को भरवाने और देखने मात्र में आयकर विभाग के कम से कम हजार रुपए खर्च होंगे| इतना ही पैसा कोई भी उनकी आयकर विवरणी भरने का भी लेगा| क्या आपको लगता हैं कि जिसका कर पांच हजार से कम हो उस की आयकर विवरणी भरवाने का कोई फायदा है| यही कारण है कि सरकार पांच लाख तक की आय वालों को आयकर विवरणी भरने से छूट देनी चाहिए| जिससे सरकार को फालतू खर्च न उठाना पड़े| परन्तु सरकार ऐसा नहीं कर पाती| बल्कि फालतू कर विवरणी को पढ़ने के लिए अब महंगी तकनीक का सहारा लिया जा रहा है|

सोचें क्यों? साथ ही यह भी सोचें कि इस प्रकार सरकार से आप कितना पैसा कर प्रशासन के मद में फालतू खर्च करवा रहे हैं|

पिछले बीस साल में सरकार और निजी क्षेत्र सबको खर्च कम करने की लत पड़ चुकी है| इसलिए नौकरियां नहीं दी जा रहीं| मगर क्या सोचा है कि हर नया नौकर अपनी नई आय खर्च करेगा तो हर साल में अपनी आय का लगभग २८% प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर से रूप में मिलाकर सरकार को सीधे और लगभग ५०% दूसरों के माध्यम से लौटा देगा| मैं उन नौकरियों की बात कर रहा हूँ जिन्हें पैदा नहीं करना वरन भरना मात्र है| नई नौकरियों में जरूर कुछ अधिक खर्च होगा|

कर चोरी पर मुझे कुछ नहीं कहना| मुझे लगता है कि यही लोग हैं जो कराधान के दायरा लेकर रोते रहते हैं और अक्सर खुद तस्करों की श्रेणी में आते हैं|

(विशेष टिपण्णी: तस्कर अप्रत्यक्ष कर के चोर को कहते हैं, प्रत्यक्ष कर के चोर के लिए करचोर जैसे सम्मानित शब्द का विधान किया गया है|)

अगर अप्रत्यक्ष कर की बात की जाए तो हाल में देश के सबसे सुलभ और सबसे सस्ते बिस्कुट की बिक्री में कमी की बात सामने आई| कहा गया नोटबंदी और अप्रत्यक्ष कर के कारण लोग इसे नहीं खरीद पा रहे| जबाब में कहा जाता है कि उस बिस्कुट पर कर नया तो नहीं है| चीनी या मसाले सब पर कर लगता है| इतना ही है कि अब नमक सत्याग्रह नहीं हो सकता क्योंकि उसकर घरेलू नमक पर इस समय शून्य की दर से लगता है|

जब भी आप कराधान के दायरे की बात करें सोचें कि कौन है जो कर के दायरे में नहीं है?

चलते चलते इतना जरूर कहूँगा, किसी भी समझदार अमीर की कार पर कोई कर नहीं लगता| क्या वास्तव में उसपर कर लगता है?

#गहरानाज्ञान #तीसराशनिचर

३७१ और नगालैंड

पिछले सप्ताह अपने आलेख ३७० से आगे में मैंने लिखा था, जन भावना से इतर नगालैंड सबसे गंभीर मुद्दा है| मोदी जी ने सरकार बनाते ही इस मुद्दे पर ध्यान दिया था जिसपर जनता (खासकर भक्त प्रजाति) ने कोई विशेष ध्यान नहीं दिया था|

पूर्वोत्तर भारत के बारे में शेष भारत की जानकारी अत्यल्प रही है| पूर्वोतर को समझने का सरल तरीका अनिल यादव की यात्रा पुस्तक वह भी कोई देस है महाराज हो सकता है| परन्तु यह पुस्तक आज का मेरा विषय नहीं है|

जिस समय भारत एक देश, एक संविधान, एक विधान, एक निशान, एक पतान जैसी बातों में उलझा रहता है, नगालैण्ड से अलगाववादियों द्वारा अपना अनधिकृत झंडा फहराए जाने की ख़बरें भारतीय मुख्यधारा मीडिया में हाशिए पर भी अपनी जगह नहीं बना पातीं| नगालैंड से आने वाली ख़बरों का हाशिए पर रहना शायद कई कारणों से है| शेष भारत को इस्लामिक कश्मीर में अधिक दिलचस्पी है, इसाई नगालैंड से उन्हें अधिक फर्क नहीं पड़ता| जिस समय हम कश्मीर पर उलझे रहते हैं, हम भूल जाते हैं नगालैंड का नाम Unrepresented Nations and Peoples Organization (UNPO) जैसे खतरनाक संगठन में सन १९९३ से मौजूद है| कश्मीर इस संस्था का सदस्य नहीं रहा| यह संस्था UNPO उन भौगोलिक इकाइयों का संगठन हैं जिनके भविष्य में स्वतंत्र राष्ट्र होने के बारे में अन्तराष्ट्रीय प्रयास जारी हैं| आर्मीनिया, पूर्वी तिमूर, एस्टोनिया, लात्विया, जॉर्जिया, पलाऊ, इस संस्था से निकलकर आज सयुंक्त राष्ट्र संघ के सदस्य बन चुके हैं|

३ अगस्त २०१५ में भारत सरकार ने UNPO में नगालैंड का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठन नेशनलिस्ट सोशलिस्ट कौंसिल ऑफ़ नागालैंड के साथ नई दिल्ली में शांति समझौता किया था| इस समझौते के विवरण किसी भी पक्ष ने जनता के समक्ष नहीं रखे हैं| २०१७ से माना जाता है कि दोनों पक्ष निर्णय के निकट हैं|

वर्तमान मुख्यमंत्री २००३ से २०१३ तक कांग्रेस और २०१८ से अब तक भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़कर मुख्यमंत्री हैं| मुख्यंत्री द्वारा  केंद्र (मोदी) सरकार के नागरिकता (संशोधन) विधेयक का विरोध किया जाना पिछले साल ख़बरों में रहा था| मुख्यमंत्री का विचार था यह कानून संविधान के अनुच्छेद ३७१ के अनुरूप नहीं हैं| कोई भी मुख्यंत्री अपने राज्य को मिले विशेषाधिकारों को बनाये रखने की बात करेगा| परन्तु भारत की जनता के लिए समझने की बात यह है कि अनुच्छेद ३७० के आगे भी राष्ट्रहित, एकता और अनेकता मौजूद है| अनुच्छेद ३७१ के अनुसार नगालैंड को निम्नलिखित विशेषधिकार प्राप्त हैं –

  • धार्मिक और सामाजिक गतिविधियां;
  • नगा संप्रदाय के कानून;
  • नगा कानूनों के आधार पर नागरिक और आपराधिक मामलों में न्याय; और
  • जमीन का स्वामित्व और खरीद-फरोख्त

मेरा आग्रह यही है कि जन-उन्माद के हटकर सोच समझ कर बातें की जाएँ| भारत्त की अनेकता इसकी शक्ति है| जनमत और जनप्रिय नेतृत्व को उन्माद के आधार पर निर्णय लेने के लिए न उकसाया जाए| राष्ट्र के हितों की समझपूर्वक रक्षा की जानी चाहिए|

३७० से आगे

राजनीतिक, कूटनीतिक और रणनीतिक निर्णयों में सही गलत के फ़ैसले संविधान तय नहीं करता| सही गलत का निर्णय इतिहास तय करता हैं और इतिहास इतिहासकरों से अधिक समर्थकों और जनकवियों पर आश्रित होता है| आप जो निर्णय आज सही माना जाए वह पांच हजार वर्ष बाद गलत माना जा सकता है|

भावनात्मक समर्थन या विरोध से हटकर कोई तय नहीं कर सकता कि कौरव और पांडवों में नीतिगत रूप से सही उत्तराधिकारी कौन था| कुरुवंश अगली तीन पीढ़ियों में समाप्त हो गया| रावण द्वारा अपनी बहन के अपमान का बदला लेने के निर्णय पर कोई प्रश्नचिन्ह नहीं हैं परन्तु प्रश्न यह है कि क्या उसने कठिन शत्रु से शत्रुता करनी चाहिए थी और क्या उसने सही तरीका अपनाया| आज इन प्रश्नों पर विचार का कोई लाभ नहीं|

कश्मीर पर अनुच्छेद ३७० का बना रहना या चले जाना इसी प्रकार का प्रश्न है जिसका उत्तर इतिहास देगा| अनुच्छेद ३७० का पक्ष विपक्ष उसके होने न होने के लाभ हानि पर आज केवल भावनात्मक उत्तर देता हैं| संविधान में इस प्रकार के अन्य अनुच्छेद सरलता से मौजूद हैं| जन भावना से इतर नगालैंड सबसे गंभीर मुद्दा है| मोदी जी ने सरकार बनाते ही इस मुद्दे पर ध्यान दिया था जिसपर जनता (खासकर भक्त प्रजाति) ने कोई विशेष ध्यान नहीं दिया था|

कश्मीर मात्र छद्म मुद्दा रहा है| एक रजवाड़े की महत्वाकांक्षा और जनभावनाओं पर उसका अनिर्णय कश्मीर की कुल कहानी हैं जिसमें दो बड़े देश स्थानीय जनता की भावनाओं के बारे में आज तक असमंजस और भय में रहे हैं| वर्ना हैदराबाद, गोवा सेन्य कार्यवाही और जूनागढ़ जनमत के साथ भारत में विलयित हुए हैं और उनकी जनता आज मानती हैं कि उनका भारत विलय उचित रहा है|

इस समय पक्ष विपक्ष के प्रश्न इस बात पर आधारित हैं कि क्या भारत की केन्द्रीय सरकार और शेष भारत की जनता कश्मीर की जनता के साथ भावनात्मक एकता बना पायेगी? खासकर तब जब अनुच्छेद ३७० को निष्प्रभावी बनाते समय केंद्र सरकार ने अतिशय तिकड़म का प्रयोग करते हुए कश्मीर की सशंकित जनता के मन में अधिक अविश्वास पैदा कर दिया हैं| अब इस कदम को सफल बनाने का सारा दारोमदार अब भारत की जनता पर है|

दुर्भाग्य से भारत की जनता का राष्ट्रीय एकता के प्रश्न पर अच्छा प्रदर्शन नहीं रहा है| सामाजिक माध्यमों में जिस प्रकार के असभ्य और अनुपयुक्त सन्देश एक हफ्ते में डाले गए उनसे भारतीय एकता पर मोदी सरकार के प्रयासों को उनके भक्तों की ओर से ही धक्का लगा है| यदि मोदी सरकार और भाजपा कार्यकर्त्ता “भक्त प्रजाति” के समर्थकों पर जल्द काबू नहीं करते तो यह वर्ग सरकार के लिए दूरगामी कठिनाई पैदा कर सकता है|

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अनुपालन के खिलाफ दुष्प्रचार

राजनीति को भारत में दुष्प्रचार का एक गंदा खेल माना जाता है और जनता ने इसे जीवन की वास्तविकता के रूप में स्वीकार कर लिया है। दुर्भाग्य से, कुछ भारतीय पेशेवरों ने अनुपालन और अनुपालन पेशेवरों के खिलाफ दुष्प्रचार करना प्रारंभ किया है| मीडिया की भूमिका भी प्रश्नचिन्हों में घिरने लगी है। यह स्पष्ट है कि भारतीय मीडिया प्रकाशन करने से पहले कोई शोध नहीं करता है और तथ्यों को सत्यापित भी नहीं करता है। 12 जून 2019 को डेक्कन क्रॉनिकल द्वारा प्रकाशित और कुछ अन्य पत्रों द्वारा नक़ल कर छापे गए गए दुष्प्रचार का “वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण से फर्मों के लिए ई-फॉर्म 22 ए को माफ करने का आग्रह” शीर्षक से प्रकाशित किया गया था।

ऐसा लगता है कि एक चार्टर्ड अकाउंटेंट ने फॉर्म आईएनसी – 22 ए, जिसे लोकप्रिय रूप से प्रपत्र सक्रिय (फॉर्म एक्टिव) कहा जाता है, में दिये गए एक जाँच बिंदु के विरुद्ध पांच पृष्ठ का एक लम्बा ज्ञापन प्रस्तुत किया है। कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय द्वारा अच्छी तरह से तैयार किए गए इस प्रपत्र सक्रिय (फॉर्म एक्टिव) का उद्देश्य किसी कंपनी की अनुपालन स्थिति की जांच करना है। पूर्णतः अनुपालित कंपनी के मामले में कंपनी के पंजीकृत कार्यालय के अक्षांश देशान्तर (जियो टैगिंग) को छोड़कर यह प्रपत्र सक्रिय (फॉर्म एक्टिव) लगभग स्वतः भर जाता है। हमने प्रपत्र सक्रिय के बारे में पहले भी विस्तार से चर्चा की है| उसके बाद फॉर्म भरने का समय बढ़ाये जाने के समय; हमने किसी भी पेशे या अनुपालन शासन का को विरोध किये बिना एक व्यावहारिक समस्या के समाधान के लिए एक उचित तरीके पर भी चर्चा की थी। हालांकि, इस फॉर्म को भरने की तारीख को कुछ कठिनाई के आधार पर एक बार फिर से बढ़ाये जाने (आज 15 जून 2019 से आगे) की आवश्यकता हो सकती है, लेकिन उपरोक्त दुष्प्रचार प्रचार में उल्लेखित कुछ भी निश्चित जमीन आधार पर नहीं है।

कुछ महीनों पहले, कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय ने लगभग 5 लाख कंपनियों का नाम कम्पनी पंजी से हटा दिया था| इन कंपनियों ने अपने वार्षिक खातों और वार्षिक रिटर्न तीन या अधिक वित्तीय वर्षों से पंजीकरण कार्यालय में नहीं किये थे। दिलचस्प बात यह है कि कंपनी प्रवर्तकों, शेयरधारकों, निदेशकों, लेखा परीक्षकों, देनदारों और लेनदारों सहित इन कंपनियों के 0.01% हितधारकों ने भी इसपर कभी कोई आपत्ति भी नहीं जताई| केवल मुट्ठी भर हितधारकों ने ही अपनी कंपनियों के पुनर्जीवन के लिए राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण का दरवाजा खटखटाया। यह समझा जाता है कि पंजी से हटाई गईं आधे से अधिक कंपनियों के हितधारकों ने कुछ विशेष उद्देश्यों के लिए इन कंपनियों का उपयोग किया या यूँ कहें कि दुरुपयोग किया| वास्तव में इन कंपनियों को दुरुपयोग के बाद यूं ही छोड़ दिया गया था। इन कंपनियों में, जहां कॉर्पोरेट संरचना का दुरुपयोग किया गया था, उन्हें सही मायनों में शेल कंपनियां कहा जा सकता है। बाकी बंद की गई कंपनियां या तो उचित व्यवसाय योजना के बिना काम शुरू करने वाले निर्दोष प्रमोटरों से संबंधित हैं या उनके प्रमोटर अब जीवित नहीं हैं या कारोबार करने के बाद सेवानिवृत्त हो चुके हैं जिन्होंने अपनी कंपनियों को बंद किए बिना कारोबार को बंद कर दिया है।

हालाँकि, भारत में वर्तमान में संदिग्ध अनुपालन वाली भारतीय कंपनियों के बीच प्रपत्र सक्रिय (फॉर्म एक्टिव) का शुरू से ही दबा छिपा विरोध रहा है। यह भारत में एक कठोर वास्तविकता है कि कुछ हितधारक और कंपनियां व्यापार करने की कठिनाई के बहाने बुनियादी कानूनों का पालन नहीं करना चाहती हैं। सभी आलोचनाओं के बावजूद, भारत ने कंपनी अधिनियम, 2013 आने से बाद से कॉर्पोरेट अनुपालन पर ध्यान केंद्रित करते हुए भी सरल व्यापार इंगिता में श्रेष्ठता की और कदम बढ़ाये हैं| वर्तमान में, प्रपत्र सक्रिय (फॉर्म एक्टिव) के खिलाफ चल रही आलोचना उन कुछ हितधारकों की निराशा का प्रतिबिम्ब है जो कॉर्पोरेट संरचना का दुरुपयोग कर रहे हैं। सरकार के पास इस तरह के दुरूपयोग के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने और “नई शेल कंपनियों के बनने” पर यथासमय निगाह रखने का यह सही समय है। प्रपत्र सक्रिय (फॉर्म एक्टिव) ऐसी प्रभावी और यथासमय जाँचों में से एक है।

पूर्ण कालिक कंपनी सचिव की नियुक्ति

पूर्ण कालिक कंपनी सचिव की नियुक्ति दो दशक से अधिक समय से एक महत्त्वपूर्ण अनुपालन आवश्यकता है। कंपनी में नियुक्त कंपनी सचिव कंपनी के अनुपालन की स्थिति पर यथासमय निगाह रखते हैं और प्रबंधन को कानून का पालन करने के लिए यथासमय सलाह देते हैं। पूर्ण कालिक कंपनी सचिव गैर-अनुपालन से कंपनियों, उनके प्रमोटर और प्रबंधन को आगाह करते हैं। हालाँकि, एक कर्मचारी के रूप में वह गैर-अनुपालन को रोकने में असमर्थ हो सकते है, लेकिन वह निश्चित रूप से किसी भी नियोजित गैर-अनुपालन पर लाल झंडी जरूर दिखाते हैं| हालाँकि, लाल झंडी उठाने की उनकी भूमिका का इस्तेमाल कुछ विशेष हितधारकों द्वारा एक नकारात्मक पेशे के रूप में किया जाता है, जो उनके दुष्प्रचार के हिसाब से व्यवसाय और “व्यावसायिक लाभ” में बाधा डालते हैं। क्या फुटबॉल मैच में रेड कार्ड दिखाने वाले रैफरी को नकारात्मक व्यक्ति कहा जा सकता है? या कि वह खिलाड़ियों को सुचारू रूप से सुरक्षित और प्रसन्नता पूर्वक खेलने में मदद करने वाला सकारात्मक व्यक्ति को है?

पूर्ण कालिक कंपनी सचिव की नियुक्ति पूरी तरह से कानून की भावना का अनुपालन है और इससे अधिक ईमानदार व्यवसाय के लिए यथासमय कानूनी मदद और अनजाने में होने वाले उल्लंघन से खुद को बचाएं रखने का जरिया है। विवेकपूर्ण प्रबंधन वाली कई कंपनियां कानूनी आवश्यकता न होने पर भी या तो स्वेच्छा से कंपनी सचिव को नियुक्त करती हैं या यथासमय मदद पाने के लिए अभ्यासरत कंपनी सचिव की सेवाएं लेती हैं।

संख्या की कमी

आमतौर पर यह दावा किया जाता है कि सक्रिय कंपनियों की कुल संख्या लगभग 10 लाख है लेकिन उपलब्ध कंपनी सचिव संख्या मात्र 50 हजार ही हैं। हालांकि, सभी कंपनियों को एक पूर्णकालिक कंपनी सचिव को नियुक्त करने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन केवल पाँच करोड़ या उस से अधिक भुगतान पूंजी वाली कंपनियों को ही पूर्ण कालिक कंपनी सचिव रखने की कानूनी आवश्यकता होती है। यह दावा किया जाता है कि 90 हजार कंपनियों के लिए मात्र 45 हजार कंपनी सचिवों की उपलब्धता है| परन्तु आजकल दुर्भाग्य से आधे से अधिक कंपनी सचिव बेरोजगार या अर्धबेरोजगार हैं| यह लोग अपने वृद्ध माता-पिता और परेशान परिवारीजनों के सामने अपना चेहरा बचाने के लिए अभ्यास प्रमाण पत्र ले लेते हैं और व्यवसायिक संघर्ष में जुट जाते हैं। वर्तमान में किये जा रहे दुष्प्रचार के अनुसार उपलब्ध ४५ हजार कंपनी सचिवों में से 20 हजार पहले से ही कार्यरत हैं। हमारे पास लगभग 2 हज़ार के ऐसे कंपनी सचिव हो सकते हैं जो सफलतापूर्ण व्यावसायिक अभ्यास कर रहे हैं। शेष 23 हजार कंपनी सचिवों के बारे में क्या सूचना है? वह किसी लाभकारी कार्य के न होने कसे कारण जीवनयापन के लिए संघर्षरत हैं| जब तक ये सभी कंपनी सचिव उचित रूप से कार्यरत नहीं हो जाते, तब तक यह दावा नहीं किया जा सकता है कि कंपनी सचिवों की मांग और उपलब्धता में बहुत बड़ा अंतर है। पहले उपलब्धता को तो उचित उपयोग में आने दें।

प्रवासन का मुद्दा

यह दावा किया जाता है कि कंपनी सचिव विभिन्न कारणों से छोटे शहरों में जाने को तैयार नहीं हैं। यह कोई बढ़िया तर्क नहीं है। क्या छोटे शहरों में कॉरपोरेट कार्यालय या पंजीकृत कार्यालय वाली कंपनियों के साथ अन्य पेशेवर काम नहीं कर रहे हैं? मुद्दा हितधारकों की कंपनी सचिव की नियुक्ति के लिए अनिच्छा का है और इसलिए वे कंपनी सचिव को उचित पारिश्रमिक की पेशकश नहीं कर रहे हैं।

बजट की कमी

वर्तमान दुष्प्रचार में दावा किया कि कंपनी सचिव की नियुक्ति छोटी कंपनियों के बजट में नहीं समाती।यदि संस्थापकों ने अपने व्यवसाय के लिए एक निश्चित संगठनात्मक रूप का विकल्प चुना है तो उन्हें उस संगठनात्मक संरचना से जुड़े कानून का पालन करने की आवश्यकता होती है। क्या संस्थापकों को पिछले तीन दशकों से कंपनी सचिवों की नियुक्ति के आवश्यकता के बारे में पता नहीं है? क्या पांच करोड़ रुपये की चुकता पूंजी वाली कंपनी एक कम बजट की कंपनी है? ऐसा तभी होना चाहिए जब कि कंपनी ने अनुचित वित्तीय सलाह और योजना के आधार पर उच्च भुगतान पूंजी का चयन किया हो। ऐसी कंपनियां कानूनी रूप से अनुमत मार्ग का उपयोग करके अपनी भुगतान पूंजी को कम करने के लिए स्वतंत्र हैं। लेकिन वित्त सलाहकार इस तरह से सलाह क्यों देगा क्यों कि भुगतान पूंजी बढ़ाने के लिए पहली वाली सलाह बिना उचित कसौटी के दी थी।

सरकार को उच्चतर भुगतान पूंजी कंपनियों पर निगाह रखनी चाहिए क्योंकि गैर अनुपातिक उच्च भुगतान पूंजी का उपयोग अधिकतम बैंक ऋण प्राप्त करने के लिए किया जाता है| ऐसे ऋण बाद में समस्यापूर्ण परिसंपत्तियों में बदल जाते हैं।

अन्य नियुक्तियाँ

कंपनी सचिव का अनुपालन अधिकारी रूप में विरोध प्रपत्र सक्रिय (फॉर्म एक्टिव) को ठीक से देखे बिना लक्षित प्रचार के तहत किया जा रहा है| मुख्य वित्तीय अधिकारी, मुख्य कार्यकारी अधिकारी, प्रबंध निदेशक जैसे अन्य प्रमुख प्रबंधकीय कर्मियों की नियुक्ति न होने की स्थिति में भी फॉर्म अनुपालन सम्बन्धी त्रुटियां इंगित करता है| इन अन्य पदों पर नियुक्त किए जाने वाले व्यक्तियों की बहुत अधिक आपूर्ति हो सकती है क्योंकि इन पदों के लिए कोई विशिष्ट योग्यता निर्धारित नहीं है। यह एक विशेष कारण से है – कंपनी सचिव को यथासमय बेहतर अनुपालन में मदद करनी होती है और उसे अतियोग्य होने की आवश्यकता होती है।

निष्कर्ष

इस समय सरकार को हस्तक्षेप बनाये रखना चाहिए ताकि कंपनियों को अपने रोजगार में भले ही जबरन पर बेहतर प्रशिक्षित और जानकार पेशेवर बनाने में मदद मिल सके। सभी उपलब्ध योग्य कंपनी सचिवों की नियुक्ति हो जाने के बाद भी, सरकार को कंपनी सचिव नियुक्त करने की आवश्यकता को कम नहीं करना चाहिए, बल्कि छोटी कंपनियों के लिए योग्यता मानदंड में ढील देने की यह अनुमति दी जा सकती है कि, जो प्रशिक्षित कंपनी सचिव की निगरानी के अधीन एक अर्ध योग्य कंपनी सचिव की नियुक्ति की जा सके। यह निगरानीकर्ता प्रशिक्षित कंपनी सचिव होल्डिंग या सहायक या संबंधित कंपनी में सेवातर हो सकता है। कुछ मामलों में ऐसी निगरानी अभ्यासरत कंपनी सचिव को दी जा सकती है, लेकिन प्रत्येक अभ्यासरत कंपनी सचिव को 20 से अधिक कंपनियों के लिए नहीं यह जिम्मेदारी नहीं दी जाये।

जब सरकार शैशवावस्था में होती है तो कंपनियों के मस्तिष्क में कंप्लायंस डालने के लिए सरकार से आग्रह किया जाता है अन्यथा हम शेल कंपनियों को जारी रखेंगे।

व्यवहार में एक कंपनी सचिव होने के नाते, मैं कह सकता हूं कि रोजगार में कंपनी सचिव वास्तविक समय अनुपालन सलाहकार के साथ मदद करते हैं। निवारण हमेशा इलाज से बेहतर है। सरकार अनुपालन के अभाव में अन्य पाँच लाख शेल कंपनियों को बनना वहन नहीं कर सकती है।

एक थैले वाला मुकदमा

विज्ञापन का सबसे बेहतर तरीका है – समाचार में छा जाना| अभी हाल में जूता कंपनी बाटा पर एक थैले के लिए हुआ मुकदमा बाटा के लिए इसी प्रकार का समाचार साबित हो रहा है| सामान के साथ थैला देने के लिए दाम वसूलने का काम पहली बार नहीं हुआ| दिल्ली में मदर डेरी भी बिना पैसे वसूले आपको थैला नहीं देती| इसी प्रकार के अन्य और भी संस्थान हैं| मगर इन सभी मामलों में ग्राहक के पास यह थैला खरीदने या न खरीदने का विकल्प रहता है| अगर वह अपने हाथ में अपना खरीदा हुआ सामान ले जाना चाहे तो उसकी मर्जी पर निर्भर करता है| दुर्भाग्य से आजकल ग्राहक मुफ्त के थैले को अपना अधिकार समझते हैं| कई बार ऐसा भी होता है कि कुछ ग्राहक थैला न देने पर भद्दी भाषा का प्रयोग करते हैं| मुफ्त के यह थैले प्रायः घर और बाहर कूड़े का एक प्रमुख कारण बन रहे हैं| इन दिनों कूड़ादान और कूड़ाघरों में सबसे अधिक कूड़ा थैलों और अन्य बारदाने (पैकिंग मटेरियल) का ही है|

दिनेश प्रसाद रतूरी बनाम बाटा इंडिया लिमिटेड मजेदार मुकदमा है| जहाँ तक मुझे लगता है, इस फैसले पर जल्दी ही अपील होनी चाहिए| इस प्रकार यह लम्बे समय तक बाटा को खबर में रख सकता है|

ग्राहक ने शिकायत की है कि बिना बताए या पूछे थैला उन्हें बेचा गया| मामला साधारण था| ग्राहक थैले की यह बिक्री स्वीकार करने से मना कर सकता था और जूता या जूते का डिब्बा साथ ले जा सकता था| उस पर थैला ले जाने की कोई जबरदस्ती नहीं होनी चाहिए थी| क्योंकि थैला बेचने का कोई करार नहीं हुआ, कोई बात नहीं हुई तो यह बिक्री तुरंत निरस्त करने योग्य थी| निर्णय में लिखे गए तथ्य यह नहीं बताते कि ग्राहक ने थैले की यह बिक्री रद्द करने का प्रयास किया या नहीं किया| क्या ग्राहक मात्र मुफ्त थैले की मांग करता रहा और बाद में बिक्री स्वीकार कर कर वहां से चल दिया? जी, उसने थैले को स्वीकार किया मगर उसका मानना था कि मुफ्त थैला उसका अधिकार था, खासकर जब कि उस थैले पर कंपनी का लोगो ब्रांड आदि लगे हुए थे|

इस मुक़दमे में यह दावा किया गया है कि दुकानदार मुफ्त में ग्राहकों को थैला देने के लिए बाध्य है| मुझे यह दावा बिल्कुल गलत लगता है| इस समय बाटा को छोड़कर किसी भी अन्य दुकानदार के लिए मेरी तत्काल सलाह है कि तुरंत अपनी दूकान में सूचना लिखवा दें – थैला घर से लायें या खरीदें, मुफ्त नहीं मिलेगा|

दूसरी बात ग्राहक का कहना है कि इस थैले पर विज्ञापन लिखा हुआ है और उस थैले को दे कर बाटा कंपनी उनसे बिना पारिश्रमिक दिए विज्ञापन करवा रही थी| अब आपकी कार, फ्रिज, टेलिविज़न, चश्मे, कमीज कुरता सब पर कोई न कोई ब्रांड या लोगो लगा हुआ है| क्या यह विज्ञापन है, या आपके घर की ब्रांड वैल्यू? आप सब अब स्वीकार कर लें कि आप बेगारी की माडलिंग और विज्ञापन सेवा कर रहे हैं| वास्तव में होता उल्टा है, हम उस ब्रांड को घर लाने और दुनिया को दिखाने में गर्व कर रहे होते हैं| विक्रेता हमें यहीं गर्व बेचता है और उसके दाम वसूलता है|

बाटा का दावा है कि उसने पर्यावरण हित का ध्यान रखकर यह थैला बेचा| यह अपने आप में बचकाना बचाव था|

अगर पर्यावरण हित का ध्यान था तो ग्राहक को बार बार प्रयोग करने वाला थैला बेचना चाहिए था या उपहार में देना चाहिए था| सबसे बेहतर था कि कंपनी अपने ग्राहकों पर अपने घर से मजबूत कपड़े का बार बार प्रयोग हो सकने वाला थैला लाने के लिए दबाव बनाती|

वास्तव में यह गलत बचाव बाटा के विरुद्ध जाता है| ऐसा लगता है कि वह गलत और जबरन बिक्री को जायज ठहराने का कमजोर प्रयास कर रही है| इस गलत बचाव से यह महसूस होता है कि यह थैले की गलत तरीके से की गई बिक्री का मामला बनता है| इस प्रकार के बचाव से उसने इस थैले की जबरन बिक्री स्वीकार कर ली| अगर आप गलत तरीक से बिक्री करते हैं तो यह कानूनन गलत है|

होना यह चाहिए था कि कंपनी कहती कि वह पर्यावरण हित में ग्राहकों को अपने घर से बार बार प्रयोग हो सकते वाला थैला लाने के लिए प्रोत्साहित करती है और विशेष मामलों में ग्राहक की मांग पर उन्हें थैला बेचती है| क्योंकि यह ग्राहक अपने साथ अपना थैला नहीं लाया था, इसलिए यह थैला उसने खुद खरीदा| थैले पर कंपनी का कोई भी विज्ञापन इस थैले को सस्ता रखने का प्रयास है और कागज का अधिक बेहतर उपयोग भी है|

दुर्भाग्य से इस मुक़दमे के फ़ैसले में विक्रेता को अपने सभी ग्राहकों को आगे से मुफ्त में थैले देने का आदेश दिया गया है| वास्तव में यह अपने आप में गलत होगा| कम्पनी यह थैले अपने लाभ में से नहीं देगी वरन अपनी लागत में वह इसे जोड़ेंगे और जूतों के दाम बढ़ जायंगे| हो सकता है, ३९९ रूपए का जूता आधिकारिक रूप से ४०२ रुपए का हो जाए| एक साथ दो जोड़ी जूते खरीदने ओर ग्राहक को ८०१ रूपए की जगह ८०४ रुपए खर्च करने पड़े|

साथ ही इस निर्णय से हमेशा अपना थैला लेकर चलने वले जागरूक पर्यावरण प्रेमी ग्राहकों को हताशा होगी|

तुरंत आवश्यकता है कि जागरूक कंपनियां अपने ग्राहकों की कपड़े के मजबूत थैले साथ लाने के लिए प्रेरित करें| पोलीथिन, प्लास्टिक, कागज़ और महीन कपड़े के कमज़ोर एकल प्रयोग थैलों को देना तुरन और पूरी कड़ाई से बंद करें| अपने साथ थैला न लाने वाले ग्राहकों को पच्चीस पचास रुपये का मजबूत खादी का थैला खरीदने का विकल्प दें|

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चिकित्सा सेवा सुधार

यह लेख पिछले लेख स्वास्थ्य बीमा बनाम स्वास्थ्य सेवा की आगे की कड़ी है|

दुनिया भर में स्वास्थ्य सेवाएँ देना एक बेहद महंगा कार्य है| उस से भी अधिक महंगा है किसी भी बड़ी बीमारी के लिए मूलभूत ढांचा खड़ा करना| एक समय था कि सरकारें ही इस प्रकार के बड़े खर्चे वहां करने की स्तिथि में थीं| आज दुनिया भर में गरीबी कम हुई है और व्यवसायिक स्वास्थ्य दे पाना संभव हुआ है| मगर, आज भी बेहद बड़ी बीमारिओं के लिए व्यावसायिक तौर पर स्वास्थय सेवाएं दे पाना कठिन है| यह बड़े और महंगे खर्च वाले चिकित्सालय बेहद बड़े शहरों में ही उपलब्ध हो पा रहे हैं| दूसरी तरफ अच्छे अस्पतालों में इलाज कराने की चाह के चलते छोटे शहरों और गाँवों के अस्पतालों में मरीजों की कमी है| मरीजों की इस कमी के चलते अच्छे इन अस्पतालों के लिए अच्छे चिकित्सक ला पाना कठिन होता जा रहा है| इस समस्या से निपटने के लिए सरकारों को छोटे और बेहद बड़े अस्पातालों और इलाजों में निवेश करने की आवश्यकता है|

बीमा मरीज को इलाज सस्ता या मुफ्त दे सकता था, मगर इलाज नहीं दे सकता| इलाज उपलब्ध करने का काम सरकार का है, चाहे यह पूंजीवादी सरकार हो या साम्यवादी| निजी क्षेत्र को साथ लेकर चलना उचित है, परन्तु स्वास्थय सेवाओं की निजी क्षेत्र ही पर छोड़ देना उचित नहीं जान पड़ता| बीमा सम्बन्धी कोई भी सरकारी योजना आज केवल निजी चिकित्सालयों के दम पर सफल नहीं हो सकती|  उदाहरण के लिए आज तक निजी क्षेत्र एम्स जैसे एक भी संस्थान को खड़ा नहीं कर पाया है| टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल, मुंबई जैसे एक दो उदहारण को छोड़ दें तो निजी क्षेत्र का पूरा लक्ष्य स्वास्थ्य सेवाओं का व्यवसायिक दोहन तक ही सिमटा हुआ है|

मेरा सुझाव यह है कि

  • राज्य सरकारें (स्वास्थ्य राज्य का संवैधानिक विषय है) स्वास्थ्य सेवा की उपसेवा के रूप में बीमा पूल तैयार करें और उस से इक्कठा होने वाले धन से स्वास्थय सेवाए प्रदान करे|
  • हर नागरिक को इस सरकारी बीमा पूल से सरकारी और निजी चिकित्सालयों में चिकित्सा सुविधा मिले|
  • सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं का पूरा मूल्य लिया जाये और चिकत्सकों को भी सरकारी बीमा पूल से व्यवसायिक सेवामूल्य दिया जाए|
  • निजी क्षेत्र को चिकित्सा अनुसन्धान जैसे क्षेत्रों में आने के लिए प्रेरित किया जाए और उसका व्यवसायिक उपयोग करने की अनुमति हो|
  • दवाओं और अन्य उत्पादों पर मूल्य नियंत्रण हो परन्तु इतना नहीं कि यह क्षेत्र लाभ का सौदा नहीं रहे|
  • चिकित्सा उत्पाद क्षेत्र में आपसी प्रतिस्पर्था को बढ़ावा दिया जाये|

स्वास्थ्य बीमा बनाम स्वास्थ्य सेवा

बीमा, पूँजीवाद का सर्वाधिक साम्यवादी उत्पाद है| इसमें पूँजीवाद की लम्पटता और साम्यवाद की अनुत्पादकता का दुर्भाग्यपूर्ण सम्मिश्रण है|

बीमा का सीमित प्रयोग सफलता की कुंजी है| उदारहण के लिए केवल शुरूआती जीवन में लिया गया सावधि जीवन बीमा आपके परिवार को आर्थिक सुरक्षा देता है| अन्य जीवन बीमा उत्पाद बीमा कंपनी को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करते हैं|

मैं जिन बीमा उत्पादों का समर्थक हूँ उनमे स्वास्थ्य बीमा शामिल है| परन्तु कबीर दास जी बीमा के बारे में ही कह गए हैं: अति का भला न चुपड़ना| यहाँ हम केवल स्वास्थ्य बीमा की बात करेंगे|

पहली बात यह है कि इस बात का ख्याल रखा जाए कि बीमार न पड़ा जाए| उस तरह न सोचा जाये जिस तरह हम दिल्लीवाले वायु प्रदूषण सम्बन्धी बीमारियों के बारे में कभी कभी सोच लेते हैं – बीमा के खर्चे पर इलाज कराएँगे| ध्यान रखें चिकित्सा, शल्य चिकित्सा और दवाओं के दुष्प्रभाव आपको ही झेलने होंगे – बीमा कंपनी को नहीं| अच्छे पर्यावरण के लिए सरकार, साम्यवाद और पूँजीवाद से लड़िये– यह बहुत बड़ा बीमा है|

दूसरी बात, स्वास्थ्य बीमा केवल इस बात का आश्वासन है कि अगर आप कोई स्वास्थ्य सेवा लेंगे तो उसका खर्च बीमा कंपनी उठाएगी| यह बात तो हम सभी जानते हैं कि अधिकतर बीमा कंपनी बड़ी और खर्चीली बीमारियों को सामान्य स्वास्थ्य बीमा से बाहर रखतीं हैं| इस बीमारियों के लिए आपको अलग से बीमा लेना होत्ता है या फिर रामभरोसे बैठना होता है| अगर फिर भी बीमारी हो जाती है तब आपकी बचत खर्च होने लगती है| बीमा चाहे निजी हो या सरकारी, इस बात का ध्यान रखें|

तीसरी बात, अगर आप दुनिया की सारी बीमारियाँ अपने बीमा में शामिल करवा भी लेते हैं तो बीमा कंपनी इस बात की कोई गारंटी नहीं दे सकती कि किसी बीमारी का इलाज आपके देश में या फिर इस दुनिया में कहीं भी है| इस बारे में सोचने की गंभीर आवश्यकता है|

क्या हमारे पास स्वास्थ्य सेवा का मूलभूत ढाँचा है?

दिवाली अब भी मनती है

वर्षा उपरांत स्वच्छ गगन में झिलमिलाते असंख्य तारक तारिकाएँ रात्रि को गगन विहार को निकलतीं| लगता सप्तपाताल से लेकर सप्तस्वर्ग तक असंख्य आकाश-गंगाएं कलकल बह रहीं हों| दूर अन्तरिक्ष तक बहती इन आकाशगंगाओं में हजारों देव, देवेश्वर, देवादिराज, सहायक देव, उपदेव, वनदेव, ग्रामदेव आदि विचरण करते| देवियों देवेश्वरियों, सहायक देवियों, वनदेवियों, उपदेवियों, ग्रामदेवियों की मनोहर छटा होती| आकाश मानों ईश्वर का जगमगाता प्रतिबिम्ब हो| प्रतिबिम्बों अधिष्ठाता देव रात्रिपति चन्द्र को ईर्ष्या होती| कांतिहीन चंन्द्र अमावस की उस रात अपनी माँ की शरण चला जाता है| धरती पर कहीं छिप जाता है| उस रचे अनन्त षड्यंत्र इन आकाशगंगाओं की निर्झर बहने से रोकना चाहते हैं|

अहो! वर्षा उपरांत की यह अमावस रात!! देखी है क्या किसी दूर जंगल पहाड़ी के माथे बैठ कर| लहराता हुआ महासागर उससे ईर्ष्या करता है| उस के झिलमिल निर्झर प्रकाश में वनकुल की बूढ़ी स्त्रियाँ सुई में धागा पिरोती हैं| प्रकाश की किरणें नहीं प्रकाश का झरना है| प्रकृति की लहलहाता हुआ आँचल है| वर्षा उपरांत अमावस की रात यह रात अपने नेत्रों से देखी है!!

अकेला चन्द्र ही तो नहीं जो अनंत आकाशगंगाओं से ईर्ष्या करता है| सृष्टि विजय का स्वप्न है, मानव|

प्रकृति का दासत्व उसका उत्सव है| कोई आम उत्सव नहीं यह| स्वर्ग के देवों को भी प्रतीक्षा रहती है| मानव अनन्त आकाश गंगाओं से टकरा जाता है| धरती पर असंख्य दीप झिलमिला उठते हैं| आकाशगंगाओं में विचरण करते असंख्य देव, देवियाँ, देवेश्वर, देवेश्वारियां, देवादिराज, देवाधिदेवी, सहायक देव-देवियाँ, उपदेव-देवियाँ, वनदेव – देवियाँ, ग्रामदेव-देवियाँ घुटनों के बल बैठ जाते हैं| आकाशगंगा के किनारों से यह असंख्य देव देवियाँ पृथ्वी पर ताका करते हैं| अहा! यह दीपोत्सव है, यह दिवाली है| हर वर्ष हर वर्षा दीप बढ़ते जाते हैं| घी – तेल के दिया-बाती अपना संसार सृजते हैं| असंख्य देव भौचक रहते हैं| असंख्य देवियाँ किलकारियां भरती हैं| कौन किसको सराहे| कौन किसकी प्रशश्ति गाये| कौन किस का गुणगान करे| कौन किस की संगीत साधे|

अब देवता विचरण नहीं करते| अब देवियों की छटा नहीं दिखती| अब देव खांसते हैं| अब देवियाँ चकित नहीं होतीं| अब आकाश ईश्वर का प्रतिबिम्ब नहीं होता| चन्द्र अमावस में मलिन नहीं होता| चन्द्र पूर्णिमा को मैला रहता है| चन्द्र चांदनी नहीं बिखेरता| इस चांदनी का चकोर मोल नहीं लगता| इस चांदनी में मिलावट है| इस चांदनी में शीतलता नहीं है|

मिठाइयाँ अब भी बनती है| पूड़ियाँ अब भी छनती हैं| बच्चे अब भी चहकते हैं| कपड़े अब भी महकते हैं| दीवारें अब भी चमकतीं हैं| प्रेमी अब भी बहकते हैं| दीपोत्सव अब भी होता है| दिवाली अब भी मनती है| आकाश में कालिख छाई है| हवाओं में जहर पलता है| दिग्दिगंत कोलाहल है| काल का शंख अब बजता है| ये मानव का अट्टाहास है| यह बारूद धमाका है| यह बारूद पटाखा है| यह बारूद का गुलशन है| यह बारूद की खेती है| यह बारूद का मन दीवाना है|

यह बारूद का उत्सव है| यहाँ दीपक किसने जाना है? यहाँ गंगा किसने देखी हैं? चाँद किसे अब पाना है? यहाँ खुद को किसने जाना?

यहाँ दमा का दम भी घुटता है| हर नाक पर यहाँ अब कपड़ा है|

मनभावन कर्जा

देश का हर बड़ा बिल्डर बर्बादी के कगार पर खड़ा है| दिवालिया कानून उसके सर पर मंडरा रहा है|

किसी भी शहर के बाहर निकल जाओ, निर्माणाधीन मकानों की भरमार है| अगर सारे मकान किसी न किसी को रहने के लिए दे दिए जाएँ तो कोई बेघर न रहे| मगर न बेघरों के पास घर हैं, इन मकानों के पास मालिक| जिनके पास मकान हैं तो कई हैं|

सरकार दायीं हो या बायीं – देश में बेघरों को सस्ते कर्जे की रोज घोषणा होती है| मगर जिन्हें घर की जरूरत है उन्हें शायद कर्ज नहीं मिलता| चलो सरकार कहती है, लो भाई जिनके पास पहले से घर हैं – वही लोग दोबारा कर्ज ले लो और एक और मकान ले लो| क्या इससे बेघरों की समस्या कम होती है| ये दो चार घर कर्जे पर खरीदने वाले लोग तो शायद किराये पर भी घर नहीं उठाते| शायद ही इनमें से किसी ने किराये की आय दिखाकर आयकर भरा हो| तो भी इतना कर्ज देते रहने से किसी लाभ?

सरकारी महाजन को – बैंक को| बैंक ने बिल्डर को मोटा कर्जे दे रखा है| बैंक को पता है, ये अपना कर्ज नहीं चुकाएगा| पुराना गुण्डा मवाली और नया नया नेता है| बड़े मेनेजर का हमप्याला यार भी है|

अब बैंक किसी ऐसे को पकड़ता हैं जो आँख का अँधा और गाँठ का पूरा हो – या कम से कम इतना भोला हो कि घर की आड़ में गधा बनकर बैंक के लिए सोलह घंटे काम कर सके| उसे उसकी जरूरत और औकात से ज्यादा का घर खरीदवा दो| बिल्डर को जो पैसा मकान के बदले देना हो बैंक उसकी एंट्री घुमाकर बिल्डर का कर्जा कम थोड़ा कम कर देता है| अब आपकी मासिक किस्त भी बनी तीस साल या और ज्यादा – मूल कम ब्याज ज्यादा| अगर आप आठ रुपया सैकड़ा भी ब्याज देंगे तो चालीस साल में बैंक को एक लाख में मूलधन पर पक्का वाला सुरक्षित ढाई लाख ब्याज आदि मिल जायेगा| अगर आप इस मकान में रहते हैं तो तो भावनात्मक लगाव आपको इस मकान को खतरे में नहीं डालने देगा या फिर आप इस से बड़ा और महंगा मकान खरीदेंगे|

इसमें सबसे बड़ा लाभ है – बिल्डर का| जो मकान मांग आपूर्ति के आधार पर वास्तव में दस लाख का नहीं बिकना चाहिए, वो पच्चीस लाख में बिकता है| उसे अपना मकान बेचने पर कोई खर्चा नहीं करना पड़ता| यह काम अक्सर बैंक करता है| बिल्डर और सारे रियल एस्टेट उद्योग तो तो इस बात की चिंता नहीं करनी कि अगर उनके मकानों की कीमतें कम हो जाएँ तो क्या होगा? इस का नुक्सान तो बैंक को भुगतना है| मकानों की कीमतें गिरने पर लोग कर्जा उतारने में दिलचस्पी कम कर देंगे| उधर बिल्डर भी मकान न बिकने का हवाला देकर कर्जा नहीं चुकायेंगे|

कुल मिला कर अपनी जरूरत के आधार पर घर खरीदें आसन कर्जे के आधार पर नहीं|

आतंकित सरकारें

किसी भी देश में आतंकवाद को बढ़ावा तभी मिल सकता है जब उस देश की सरकारें और उन सरकारों को चुनने वाली जनता डरपोक हो| जब भी हम किसी व्यक्ति या संगठन को आतंकवादी कहते हैं वो उसका सीधा अर्थ है कि हम डरे हुए हैं|

डरना उस कायरता का परिचायक है| कोई भी बहादुर देश किसी व्यक्ति या संगठन को अपराधी या अपराधिक संगठन कहे, तो समझ आता हैं| नियम क़ानून तोड़ने वाला व्यक्ति अपराधी है|कोई भी व्यक्ति एक देश काल में अपराध हो सकता है किसी अन्य देश काल में नहीं| उदाहरण के लिए मानहानि पहले बहुत से देशों में अपराध माना जाता था, परन्तु अब अधिकांश देश इस अपराध नहीं मानते|

जब हम किसी व्यक्ति या संगठन के उचित या अनुचित किसी भी कार्य से डरते हैं और उस डर को स्वीकार करते हैं तो उसे आतंकवादी कहते हैं|हम आतंकवाद का अपनी आतंरिक शक्ति में सामना नहीं कर पाते| यही कारण हैं कि सुदूर यूरोप में हुए बम धमाके हमारे “बहादुर” भारतियों को सोशल मीडिया में सक्रिय कर देते हैं| दूसरी ओर हम अपने देश में होने वाले बलात्कार, हत्याओं, रोज रोज की सड़क दुर्घटनाओं और चिकित्सीय लापरवाही से नहीं डरते| हम किसी सड़क दुर्घटना या दंगों में मारे गए 10 लोग नहीं डराते वरन हम सुदूर देश में किसी बम धमाके से डर जाते हैं|हमें गुजरात, राजस्थान या मुंबई में पत्थर फैंकते और बस जलाते उपद्रवी लड़के आतंकवादी नहीं लगते बल्कि कश्मीर में बम फैंकते लड़के हमारी नींद उड़ा देते हैं|हमारा अपना चुना हुआ डर ही हमें अधिक डराता है|

आतंकवाद दरअसल आतंकवादियों से अधिक उन लोगों का हथियार है जो इससे पैदा होने वाले डर से लाभान्वित होते हैं या डरने में जिन्हें प्रसन्नता मिलती हैं| दुनिया के दर्जन भर देश तबाह करने के बाद भी अमेरिका दुनिया का सबसे आतंकित मुल्क हैं – उसकी डरी हुई बहादुरी आतंकवाद के मुकाबले कहीं इंसानों की हर साल जान ले लेती है| कश्मीर में जितने लोग हर साल कुल मिला कर अपराधी और आतंकवादी घटनाओं में मारे जाते हैं कम से कम उतने लोग राजधानी दिल्ली या मुंबई में अपराधी घटनाओं में मारे जाते हैं| मगर हम नहीं डरते|अपराध और अपराधी हमें नहीं डराते| अपराधों से लड़ने वाले पुलिसवालों को उतना बड़ा मैडल नहीं मिलता जितना किसी कथित आतंकवादी से लड़ने वाले पुलिसवाले को मिलता है|

आतंकवाद की एक खास बात है, दुनिया की कोई भी सरकार आतंकवाद के आगे घुटने नहीं टेकती| आतंकवाद से लड़ने की कसमें खाना दुनिया भर की राजनीति में रोजमर्रा का शगल है| मगर छोटे छोटे अपराधियों और गुंडों के समूह के आगे सरकारें जब तब घुटने टेकती रहती हैं| भारत देश में पिछले सौ सालों में बहुत सी किताबें, नाटक और फ़िल्में सिर्फ इसलिए प्रतिबंधित हो गई कि सरकारों को कानून व्यवस्था के लिए ख़तरा लगा| हम सब जानते हैं यह ख़तरा उन किताबों, नाटकों और फिल्मों से नहीं बल्कि उनका कथित तौर पर विरोध करने वालों से था| सरकारें उनसे लड़ने में असमर्थ थीं और इतनी डरी हुयीं थी कि उन्हें आतंकवादी या अपराधी कहने का भी साहस न जुटा सकीं| उनसे लड़ने की बात तो दूर की बात है, पिछले सौ सालों में बहुत से हलफनामे सरकारों ने अदालत में दिए हैं कि किताबें, नाटक या फ़िल्में क़ानून व्यवस्था बिगाड़ देंगी – मतलब इतना बिगाड़ देंगी कि सरकार संभाल न पायेगी|

उफ़!! पिछले सौ साल में कोई सरकार हलफनामों में यह न कहने की हिम्मत भी न जुटा सकी कि वो जिनसे डरी हुई है वो किताब, नाटक या फिल्म नहीं गुण्डा तत्व हैं|

 

 

 

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मोबाइल बैंकिंग और सुरक्षा

मेरा मोबाइल को लेकर रिकॉर्ड काफी ख़राब रहा है| पहला मोबाइल लेने के बाद पहले आठ साल में मुझे आठ मोबाइल खरीदने पड़े| मगर मुझे केवल दो मोबाइल ही सेवानिवृत्त करने का अवसर मिला, शेष मोबाइल किसी न किसी जेबकतरे या उसके ग्राहकों को सेवाएं देते रहे| बाद में बैंकों में मोबाइल पर सुविधाएँ देना शुरू किया और तरह तरह के एप्प बनने लगे| तथाकथित कैशलेस समय में सरकार आपको अनजाने ही सलाह दे रही है कि अपने सारे बैंक खाते अपने मोबाइल की एप्प में डालकर चलो|

मुझे उनके एप्प की सुरक्षा के बारे में कुछ नहीं कहना| पहला तो मुझे तकनीकि जानकारी नहीं| दूसरा अगर असुरक्षित भी हों तो भी उनके बारे में टिपण्णी करकर मैं मानहानि के मुक़दमे को दावत नहीं देना चाहता|

मगर मेरा मोबाइल कितना सुरक्षित है? कोई निवेश सलाहकार सलाह नहीं देता कि अपने सारे निवेश के जगह किये जाएँ तो क्या अपनी सारी जायदाद की चाभी अपने मोबाइल में रख देना उचित है|

मोबाइल का चोरी हो जाना दिल्ली जैसे शहर में इतनी आम बात है दिल्ली पुलिस उसकी उचित चोरी रिपोर्ट भी लिखना उचित नहीं समझती| मोबाइल आपका पुराना मोबाइल बेचने से ज्यादा पैसे कमाएगा या दुरूपयोग करकर?

मोबाइल सिम क्लोंनिंग तकनीकि तौर पर बच्चों का खेल है| मोबाइल सिम आपके मोबाइल की मास्टर चाभी है| मोबाइल सिम क्लोंनिंग के अलावा भी मोबाइल में सेंध लगाने के तरीके मौजूद हैं| बहुत सारे स्पाईवेयर मोजूद हैं, जिनमें से कुछ चाइल्ड प्रोटेक्शन के नाम पर खुले आम मिलते और प्रयोग होते हैं| साथ में मोबाइल मैलवेयर हैं हीं|  पर क्या यह घोषित शत्रु की वास्तविक शत्रु हैं?

हाल में एक छात्र समूह ने अपने एक साथी की बिना इच्छा मोबाइल छीन कर उसके मोबाइल एप्प का प्रयोग एक भोजनालय में कर दिया| लेकिन अगर सोचें तो यह चिंताजनक बात हैं| आपके कोई भी मित्र परिवारीजन आपके मोबाइल से कुछ भी खर्च कर सकते हैं – आपका लाड़ला या लाड़ली भी|

मुझे मोबाइल एप्प का विचार सिरे से ही इसलिए बेकार लगता हैं की यह अत्यंत सरल है| आपको या किसी गलत व्यक्ति की मोबाइल पर इसका प्रयोग करते में समय नहीं लगता| दूसरा किसी भी प्रकार के एकल प्रयोग कुंजीशब्द (OTP) भी उसी मोबाइल पर आते हैं|

मुझे जब भी प्रयोग करना होता हैं मोबाइल पर भी नेटबैंकिंग का प्रयोग करना हूँ| यह सुरक्षित समय लेती हैं और बहुत सारी जानकारी मोबाइल में जमा कर कर नहीं रखती| आपको हर जानकारी खुद से देनी होती है| मैं नेटबैंकिंग के लिए अक्सर ब्राउज़र कि सुरक्षा विंडो (इन्कोग्नितो या इनप्राइवेट विंडो) का प्रयोग करता हूँ| यह आपके सारे डाटा को कम से कम अपने यहाँ सुरक्षित नहीं रखती|

अवैध चाय

अवैध चाय – हंसने का मन करता है न? अवैध चाय!!

सच्चाई यह है कि भारत में हर कार्यालय, विद्यालय, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय, गली, कूचे, मार्ग, महामार्ग, हाट, बाजार, सिनेमाघर और माल में अवैध चाय मिलती है| अवैध चाय का अवैध धंधा पिछले पांच-छः साल से धड़ल्ले से चल रहा है| पिछले पांच-छः साल क्यों?

क्यों पिछले पाँच-छः साल से सरकार ने हर खाने पीने की चीज़ बेचने के लिए एक पंजीकरण जरूरी कर दिया है| कुछ मामलों में पंजीकरण नहीं, बल्कि अनुमति-पत्र (लाइसेंस) जरूरी है| बिना पंजीकरण या अनुमति-पत्र के बनाये गए पेय और खाने को अवैध कहा जायेगा| वैसे दवाइयों के मामलें में इस तरह की दवाओं को सामान्यतः नकली कहा जाता है| आपके खाने को फिलहाल नकली नहीं कहा जा रहा|

मामला इतना संगीन हैं कि आपके ऑफिस में लगी चाय-कॉफ़ी की मशीन भी “शायद” अवैध है| अगर आप पुरानी दिल्ली/लखनऊ/हैदराबाद/कोई भी और शहर के किसी पुराने प्रसिद्ध भोजनालय में खाना खाते हैं तो हो सकता हैं, आप अवैध खाना खा रहे हैं|

मामला यहाँ तक नहीं रुकता| क्योंकि हिन्दुस्तानी होने के नाते आप दावत तो हर साल करते ही हैं| नहीं जनाब, मैं दारू पार्टी की बात नहीं कर रहा, जिसके अवैध होने का हर पार्टी-बाज दारूबाज को पता है| मैं बात कर रहा हूँ, शुद्ध सात्विक भोज/दावतों की, जिन्हें आप विवाह-भोज और ब्रह्म-भोज कहते हैं| आप जो पुरानी जान पहचान वाला खानदानी हलवाई पकड़ लाते हैं खाना बनाने के लिए, वो अवैध है|

यह वो कानून नहीं है, जिसके चलते देश के ७४ बड़े बूचडखाने गाय का मांस विदेश में बेचकर देश के लिए जरूरी विदेशी मुद्रा लाते हैं|

तो, अब ये कौन सा कानून है? यह वही क़ानून हैं जिसमें भारी-भरकम कंपनी की विलायती सिवईयां यानि नूडल बंद होने पर देश के हर चाय-पान वाले ने तालियाँ बजायीं थीं| यह वह क़ानून हैं जिसकी असली नकली मुहर (संख्या) खाना-पीना बनाने के सब सामान के पैकेट से लेकर डिब्बाबंद चाय-कॉफ़ी-टॉफ़ी-बिस्कुट-पिज़्ज़ा-बर्गर पर लगी होती है| यह वही कानून हैं, जिसकी मुहर (संख्या) बड़े बड़े होटल और भोजनालय के बिल पर पाई जाती है| यह वही क़ानून हैं, जिस में पंजीकरण न होने के कारण छोटे मोटे बूचडखाने जो देश की जनता के लिये मांस पैदा करते हैं, वो बंद किये जा रहे हैं|

आज बूचड़खाने बंद होंगे, कल सलाद की दूकान| और जब चाय-पान की दुकान बंद होगी तो आप सोचेंगें.. रहने दीजिये, कुछ नहीं सोचेंगें|

गौमांस के विरोध के चलते, देश का सारा मांस बंद हो रहा हैं, कल रबड़ी-फलूदा बंद हो जाए तो क्या दिक्कत है|

इस पोस्ट का मकसद हंगामा खड़ा करना नहीं है| देश के हर छोटे बड़े व्यवसायी के पास मौका है कि अपनी दूकान, होटल, रेस्टोरंट, ढाबा, ठेल, तख़्त, या चूल्हे का स्थाई पता और अपना पहचान पत्र देकर अपना पंजीकरण कराये| इस से आगे मैं क्या सलाह दे सकता हूँ? आप समझदार हैं|

टिपण्णी – इस आलेख में कही गई बातें कानूनी सलाह या निष्कर्ष नहीं हैं वरन हल्के फुल्के ढ़ंग से बेहद जटिल क़ानून समझाने का प्रयास है| कृपया, उचित कानूनी सलाह अवश्य लें|

कार्ड भुगतान का खर्च

विमुद्रीकरण के बाद जन सामान्य को नगद भुगतान न करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है| पुरानी दिल्ली की एक दुकान पर भुगतान करने के लिए जब हमारे मित्र ने भुगतान करने के डेबिट कार्ड निकला तब दुकानदार ने कहा, साढ़े छः प्रतिशत अतिरिक्त देना होगा| ध्यान रहे मॉल में भुगतान करते समय इस प्रकार का अतिरिक्त भुगतान नहीं करना पड़ता| आइये, मुद्दे की पड़ताल करते हैं|

पुरानी दिल्ली के दूकानदार प्रायः कम सकल लाभ (gross profit) पर सामान बेचते हैं| उनके द्वारा कमाया जाने वाला सकल लाभ मॉल वालों के सकल लाभ से बहुत कम होता है| कम सकल लाभ कमाने के कारण, इनके पास अतिरिक्त खर्चों की गुंजायश बहुत कम होती है| इस लिए हर अतिरिक्त खर्चे को टाला जाता है| नगद भुगतान लेने के बाद यह लोग अपने  सारे खर्च नगद में करते हैं, घर में ले जाये जाने वाला शुद्ध लाभ भी नगद होता है और बैंक में केवल घरेलू बचत ही जमा की जाती है| इस प्रकार इन्हें नगदी प्रबंधन में समय और पैसा नहीं खर्च करना पड़ता|

जब किसी व्यापार प्रणाली को कार्ड से भुगतान लेना होता है तब उसे एक महंगी सुविधा अपने साथ जोड़नी होती है| इसमें कार्ड प्रदाता कंपनी, भुगतान प्रक्रिया कंपनी, इन्टरनेट सेवा कंपनी, बैंकिंग कंपनी सब उस व्यापार प्रक्रिया में जुड़ते हैं| अतिरिक्त खर्चे इस प्रकार हैं –

  • कार्ड धारक का वार्षिक शुल्क,
  • गेटवे चार्जेज – प्रायः कार्ड रीडर मशीन, उनका प्रबंधन, और बैंक आदि से मशीन का संपर्क एक महँगी प्रक्रिया है| कोई न कोई इस कीमत को अदा करता हैं और बाद में ग्राहक से वसूलता है|
  • हर भुगतान पर शुल्क – जो डेबिट कार्ड के मामले में आधा से डेढ़ प्रतिशत और क्रेडिट कार्ड के मामले में डेढ़ से तीन प्रतिशत तक होता है| सरकारी भुगतान जैसे स्टाम्प ड्यूटी, सरकार समर्थित सेवा जैसे रेलवे आरक्षण, आदि के मामले में भुगतान करने वाला इस कीमत को अदा करता है, जबकि मॉल आदि अपने लाभ में से इसे भुगतते हैं| ध्यान रहे कि मॉल के बड़े दुकानदारों के लिए नगदी का प्रबंधन भी उतना ही महंगा होता है| भुगतान प्रक्रिया भुगतान कर्ता, कंपनी कार्ड कंपनी, भुगतानकर्ता के बैंक, विक्रेता के बैंक और विक्रेता, आदि को जोड़ती है| इसका खर्च दूकानदार को, या कहें कि ग्राहक को ही देना होता है|
  • दोनों बैंक अपने अपने ग्राहक से बैंक चार्ज के नाम पर वसूली करतीं हैं| डेबिट कार्ड के मामले में यह चार्ज सीधे ही वसूला जा सकता है| क्रेडिट कार्ड के मामले में अगर आप समय पर पैसा नहीं दे पाते तो कंपनी को लाभ होता है| इस प्रकार की उधारी पर कंपनी 24 से 48 प्रतिशत तक बार्षिक ब्याज़ वसूलती है| इस प्रकार के लापरवाह ग्राहक कंपनी के लिए कीमती होते हैं, न कि समय पर पैसा लौटाने वाले|
  • इन सभी सेवा प्रदाताओं को संपर्क में लेन के लिए इन्टरनेट सेवा का प्रयोग होता है|

आपको ऐसे दुकानदार भी मिलेंगे जिनके पास कार्ड रीडर मशीन बंद पड़ी होंगी| कई बार छोटे दुकानदार डेबिट कार्ड या क्रेडिट कार्ड के इस प्रबंधन को अपने निकट के बड़े दुकानदार की मदद से अंजाम (आउटसोर्सिंग) देते हैं| यह बड़ा दुकानदार इस सुविधा के लिए कुछ रकम चार्ज करता है| यह चार्ज सामान्य चार्ज से लगभग ढाई – तीन गुना होता है| इसमें बड़े दुकानदार के सारे खर्चे और लाभ शामिल होते हैं| मूल रकम बड़े दुकानदार को सेवा मांगने वाले बड़े दुकानदार को देनी होती है| यह व्यापर की दुनिया में, तमाम सरकारी निमयों और वैट के बीच, जटिल और खर्चीली प्रकिर्या है|

इस प्रकार मुझे उस छोटे दुकानदार द्वारा डेबिट कार्ड के लिए साढ़े छः प्रतिशत मांगना गलत नहीं लगता|

पुनःश्च – मोबाइल वॉलेट में भी छिपी हुई कीमत होती है, जो फिलहाल आपके निजी आंकड़े के रूप में वसूली जा रही हैं|

पुनः पुनःश्च – नेशनल पेमेंट कारपोरेशन ऑफ़ इंडिया और आपके अपने बैंक द्वारा शुरू किया गया यूनिफाइड पेमेंट इंटरफ़ेस एक बेहतर विकल्प हो सकता है| अज्ञात कारणों से बैंक अपनी इस सुविधा का व्यापक प्रचार नहीं कर रहीं|

काले धन के सफ़ेदपोश स्रोत

सुनकर हँसी आती है, मगर काले धन के अधिकतर स्रोत सफ़ेदपोश हैं और समाज में अपनी इज्जत रखते हैं| काले धन की सरकारी और लोकप्रिय परिभाषा में जमीन आसमान का अंतर है| जनसामान्य में काले धन का अर्थ है भ्रष्टाचार यानि रिश्वत का पैसा| जनसामान्य की अवधारणा में सरकारी घोटाले का अर्थ भी सिर्फ रिश्वत होता है| काले धन की सरकारी परिभाषा बहुत व्यापक है इसमें वह सभी धन आता है जिसका हिसाब किताब सरकार के पास न हो| भले ही सरकारें मानें या नहीं; ऐसा धन जिसका हिसाब किताब सरकार के बस में न हो, वो भी काला धन मान लिया जाता है|

इस पोस्ट में इसपर विस्तार से चर्चा करेंगे|

काला धन

सरकार जिस धन को अघोषित धन कहती है उसका सामान्य अनुवाद काला धन किया जाता है|

काला धन वास्तव में वह धन है जिसका हिसाब किताब सरकार को न दिया गया हो और हिसाब किताब देने की कानूनी जरूरत न होने पर जिसका हिसाब किताब सरकार ने न लगाया हो| इसमें शामिल धन इस प्रकार होता है (पढ़ते समय सफ़ेदपोश स्रोतों की पहचान आप खुद कर पाएंगे| कृपया धनात्मक और ऋणात्मक चिन्ह पर भी ध्यान देते रहें|) –

+ भ्रष्टाचार/रिश्वत, जिसे हम सब जानते हैं| परन्तु रिश्वत या उपहार लेने के ऐसे तरीके भी विकसित हुए हैं, जिसमें रिश्वत का धन सफ़ेद रहता है| जैसे कोई भ्रष्ट अधिकारी की पत्नी/बेटी को सलाहकार के रूप में वेतन या कीमत दे| भ्रष्टाचार के बड़े हिस्से में सरकारी क्षेत्र शामिल नहीं होता मगर यह छोटा सरकारी हिस्सा आम जनता को बेहद परेशान करता है| निजी क्षेत्र में खरीदफरोख्त के लाभ में हिस्सेदारी का व्यापक चलन है, मगर… भगवान मूंह न खुलवाए| निजी स्कूल, निजी चिकित्सालय, बिजली कम्पनियां, आदि समय समय पर जनता के साथ कालेधन वाला लेनदेन करने ले लिए चर्चा में आते हैं|

– घोटाला, बोफोर्स घोटाले में कथित रूप से खाया गया कमीशन भ्रष्टाचार की श्रेणी में है| टूजी घोटाले में अधिक दाम की चीज स्पेक्ट्रम को कम दाम पर बेचने का आरोप है, ऐसा करना गलत परन्तु कालाधन नहीं पैदा करता| हाँ, ऐसा करने के लिए रिश्वत दिए जाने में भ्रष्टाचारजन्य कालाधन पैदा होगा|

+ गोलगप्पा, जी हाँ स्ट्रीट फ़ूड या ढ़ाबे कालेधन का सबसे बड़ा स्रोत है| यहाँ होने वाली आय आयकर के लिए रिपोर्ट नहीं होती| अगर कोई स्टाल केवल हर दिन १०० प्लेट मात्र बीस रुपये प्लेट की दर से मात्र गोलगप्पे बेचती है तो भी आयकर की सीमा में आने लायक धन प्राप्त कर लेती है| परन्तु यह धन काले धन में बदल जाता है|

– बड़े भोजनालय जिनमें आपको बिल मिलता है वहां पर दिया गया नगद धन बहुत बार कालाधन होता है, मगर यहाँ खर्च होने के बाद यह कालाधन सफ़ेद हो सकता है, बशर्ते यह भोजनालय सरकार को ठीक से सभी कर दे| इस क्षेत्र में अगर मगर बहुत है|

+ किराना आदि दुकान, कोई भी दुकान जहाँ आप बिल नहीं लेते देते काला धन पैदा करती है| भले ही दुकानदार कुछ भी कहे, कर चोरी के कारण यह कालाधन पैदा करती हैं| मजे की बात है, यह व्यापारी वर्ग भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज उठाने वाला प्रमुख तबका है| यह लोग अपनी कर चोरी को कठिन प्रक्रियाओं के हवाले से जायज बताते रहे हैं| बिक्रीकर से जीएसटी का वर्तमान सफ़र इन सभी लोगों द्वारा पैदा किये जाने वाले कालेधन को ख़त्म करने का कठिन प्रयास है| प्रक्रिया का सरलीकरण कहीं अधिक सुरक्षित समाधान हो सकता था और जीएसटी की प्रस्तावित कठिन प्रणाली अभी रोड़ा बनी रहेगी| अगर आपने बिल नहीं लिया है, बैंक भुगतान नहीं किया है, तो काला धन यहाँ पैदा होता है|

+ दहेज़, जी हाँ, दहेज़ भारत में काले धन के प्रमुख सोत में से एक है| जब भी दहेज़ में नगद धनराशि स्वीकार की जाती है तब काले धन का उत्पादन होता है| सामान्य घरों में बहुत सारा नगद धन भ्रष्टाचार से नहीं दहेज़ से आता है| दहेज़ में बेटी के नाम की पासबुक, फिक्स्ड डिपाजिट आदि कालेधन को भी रोकते हैं और बेटी का भविष्य भी बचाते हैं|

+ घरेलू बचत, यह सोचना हास्यास्पद लगता है परन्तु नगद बचतें अल्प मात्रा में ही सही मगर काले धन को जन्म देती हैं| जब हम इन बचतों को बैंक में नहीं जमा करते तो दो खतरे रहते हैं – पहला, मुद्रास्फीति इस नगद धन को क्रयशक्ति कम कर देती है| दूसरा, लम्बी अवधि के बाद आज इस प्रकार की बचत को आयकर विभाग को समझा पाना मुश्किल और महंगा कार्य है|

+ मकान किराया, जब इस वर्ष सरकार ने आयकर सम्बंधित आंकड़े प्रकाशित किये थे| उन्हें देखकर प्रहले दृष्टि में प्रतीत होता था कि यह देश में किराये से आय की संख्या न होकर देश भर में किराये पर उठाये गए मकानों की संख्या है| जी हाँ, अगर किराया आयकर रिटर्न में न दिखाया जाए तो काला धन है| आप हाउस रेंट अलाउंस और किराये से आय के आंकड़े देखकर हँसी नहीं रोक पाएंगे|

+रियल एस्टेट, जब भी आप मकान खरीदें तब अधिकतर विक्रेता आयकर और क्रेता स्टाम्प ड्यूटी बचने के लिए कम कर कर मूल्य लिखाते हैं और काले धन पैदा होता है| कई मामलों में क्रेता बैंक लोन लेने के लिए पूरा मूल्य चुकाना चाहें तो विक्रेता कर-राशि की अतिरिक्त मांग करते हैं| रियल एस्टेट काला धन खपाने का सबसे प्रचलित तरीका है| रियल एस्टेट में काले धन का दुष्प्रभाव दिल्ली के आसपास खाली पड़े आवासीय इकाइयों के रूप में दिखता है जिसे कोई अब नहीं खरीद पा रहा है|

– सोना – चांदी, काले धन का अधिकतम निवेश कालाधन माना जाता है| सोने ने दाउद इब्राहीम से लेकर सर्राफ़ा सरताजों की जिन्दगी चमकदार काली करने में मदद की है| इनमें से आज कोई देशद्रोही और कोई देशप्रेमी कहलाता है, मगर बड़ी मात्रा में धन काला है| काली सम्पत्ति की खरीद फरोख्त काला धन पैदा करती है|

+ अवैध धंधे, वैश्यावृत्ति, ड्रग; जब धंधा अवैध है तब कमाई कानून को कैसे दिखाई जाए? कुछ लोग एक हिस्सा बैंक में डालते हैं मगर बड़ा हिस्सा काला रहता है|

– शराब; कुछ भी कहिये, कितनी घृणा करें| शराब काले को सफ़ेद करती है| अधिकतर इसकी खरीद काले धन से होती है| मेहनत की कमाई स्वाद के दीवाने ही बरबाद करते हैं, बाकि लोग काला पैसा दुकान पर देते हैं| जो बिक्री के बाद अकाउंट में जाने के कारण सफ़ेद हो जाता है|

+ विदेशों से तस्करी; इस प्रकार के तस्करों से भारत घृणा करता है| सीमाशुल्क की चोरी से लाया गया माल बिक्रीकर और आयकर वालों को कौन बताएगा? पैसे के लेनदेन में अन्तराष्ट्रीय हवाला का प्रयोग होता है|

+ करखानों से तस्करी (कच्चे का काम); यह सफ़ेदपोश तस्करी है| इज्जत का नाम है – कच्चा काम| इसमें उत्पादशुल्क, बिक्रीकर, आयकर सब बच जाते हैं| लेनदेन में सफेदपोश हवाला की सेवाएं ली जातीं है|

  • उपरोक्त दोनों तस्करियों में अन्तराष्ट्रीय हवाला और सफेदपोश हवाला में वही अंतर है जो पाकिस्तान सरकार अफगानी तालिबान और पाकिस्तानी तालिबान में बताती है|

+ सरकारी शिक्षकों की निजी कोचिंग; हम शिक्षकों का सम्मान करते हैं इसलिए इस मुद्दे को रहने देते हैं|

+ सरकारी डॉक्टर, सरकारी वकील की निजी सेवाएं; यह लोग परे पेशेवर भाई हैं इसलिए यहाँ भी माफ़ किया जाये|

+ कृषि आय; यह से सरकारी सफ़ेद गाय| क्या कहें, बालीवुड वाले लम्बू मोटू सब तो किसान भाई हैं| वैसे मामला यह है कि कृषि अर्थव्यवस्था नगद आधारित है, इस कारण गांव – देहात के अन्य कार्य भी नगद आधारित होते हैं| नगद की इस कृषि अर्थव्यवस्था को नगद की काली अर्थव्यवस्था से जुड़ने में जरा सहूलियत होती है| अगर यह सरकारी आयकर व्यवस्था से जुड़ने के प्रयास करे तो किसान भाई का गैर – कृषि आयकर दोगुना या तीन गुना हो जाता है|

क्या कुछ छूट गया? हो सकता है| भारतीय शादी – ब्याह, चुनाव, और होली – दिवाली – ईद काले धन के सबसे बड़े उत्सव हैं| ईमानदार लोग यहाँ सोच समझ कर तंग हाथ पैसा खर्च करते हैं, कई बार होश में बिक्रीकर बचा जाते हैं|

 

नगद नालायक

प्रचलित पांच सौ और एक हजार  रूपये के नोट की कानूनी मान्यता रद्द करने का स्वागत योग्य वर्तमान सरकारी फैसला काले धन को समाप्त करने के पुराने और असफल तरीकों में से एक है| इस से पहले जनवरी १९४६, १९५४, १९७८ में बड़े नोटों की कानूनी मान्यता रद्द की गई थी| दिक्कत यह रही कि विभिन्न कारणों से यह बड़े नोट, जैसा कि इस बार भी किया जा रहा है, दोबारा प्रचलन में लाये गए| परन्तु इस बार प्रक्रिया में अंतर भी दिखाई देता है|

इस प्रकार की प्रक्रिया में काले धन का वह मामूली हिस्सा जो नगद के रूप में रखा गया हो, लगभग नष्ट हो जाता है| इस प्रक्रिया में जो काला धन बाहर आने की आशा होती है, वह अपने आप में बड़ा और महत्वपूर्ण हिस्सा होता है| परन्तु यह काले धन को समाप्त नहीं करता, काले धन का अधिकतम हिस्सा रियल एस्टेट, सोना, और विदेशी बैंकों में होता है| इस बड़े हिस्से को नियंत्रित करने का प्रभावी उपाय सरकारों के लिए उठाना असंभव नहीं, परन्तु कठिन है| वर्तमान में काले धन की अर्थव्यवस्था सामान्य अर्थव्यवस्था के पच्चीस फ़ीसदी के बराबर है| वर्तमान प्रक्रिया भविष्य में काले धन के उत्पादन पर भी कोई समुचित रोक नहीं लगाती|

मोदी सरकार के फैसले में एक नई बात है, यह बेहद स्फूर्त प्रक्रिया के तौर पर और सीमित समय अवधि में हो रहा है| नगद में काला धन रखने वालों को अपने पुराने नोट नए नोटों से बदलने का मौका नहीं दिया गया है| सरकारी अधिसूचना के अनुसार वर्तमान प्रक्रिया नकली नोट, काला धन, आदि का मुकाबला करेगी|

परन्तु, इस प्रक्रिया का नुकसान निम्न आय वर्ग को होगा, जिनके पास अधिकतर धन नगद में होता है| असंगठित क्षेत्र के मजदूर, छोटे दूकानदार, फेरीवाले, आदि जब अपनी कल (८ नवम्बर २०१६) की आय घर ले कर जा चुके थे तब यह घोषणा हुई| उनकी अधिकतम आय/सम्पत्ति रद्दी बन गई और यह देखने की बात है कि वो आज (९ नवम्बर २०१६) किस प्रकार अपनी खरीददारी कर पाते हैं| उनके लिए बैंक की सुविधा, अगर है तो, एक दिन बाद होगी| परन्तु इनमें से अधिकतर के पास जन धन योजना के बाद भी बैंक अकाउंट नहीं है या दूर दराज इलाकों में है| यह सही है कि १० नवम्बर के बाद बैंक उनके अकाउंट खोल कर उसमें पैसा जमा कर सकती हैं, परन्तु यह वित्तीय भागीदारी प्रक्रिया का दुर्दांत रूप होगा| कारण, इनमें से अधिकतर के पास अपने पते के समुचित प्रमाण नहीं होते|

भारत में दूरदराज के ग्रामीण और जंगल इलाकों में बैंक और डाकघर की सुविधा न होने से वहां मौजूद लोगों को कठिनाई का सामना करना पड़ेगा| उनको अपनी छोटी छोटी बचत शहर ले जाकर बदलनी होगी या इस प्रक्रिया में बिचालियों को मोटा धन देना पड़ेगा|

अन्य भारतियों के लिए समस्या थोड़ी हास्यास्पद है, अधिकतर समझदार लोग अब नगद कम रखते हैं और बैंक मशीनें, अगर देती हैं तो, एक बार में पाँच से अधिक एक सौ के नोट नहीं देतीं| उनके पास खर्च सब्जी भाजी लेने के लिए उधार का विकल्प बचता है वह भी अगर उनका सब्जी वाला अगर कल सब्जी ला पाया तब| ऑनलाइन खरीदने वालों के लिए थोड़ा राहत रहेगी|

वर्तमान अधिसूचना

  • दिनांक ८ नवम्बर २०१६ को बैंक ग्राहकों की सेवा नहीं कर पाएंगे| अपना हिसाब किताब बनाकर रिज़र्व बैंक को देंगे|
  • दिनांक ८ और ९ नवम्बर को एटीएम काम नहीं करेंगी| उनमें से नगद धन राशि बैंक निकल लेंगी|
  • दिनांक ३० दिसंबर २०१६ तक केवल चार हजार रुपये की धनराशि तक के नोट प्रति व्यक्ति बदले जा सकते हैं|
  • चार हजार रुपये से लेकर पचास हजार रूपये की धनराशि बिना किसी पहचान प्रक्रिया के भी बैंक खाते में जमा कराई जा सकती है|
  • पचास हजार रूपये से अधिक की धन राशि जमा करने के लिए सामान्य नियम अनुसार पहचान प्रक्रिया पूरी करनी होगी|
  • जमाकर्ता किसी अन्य व्यक्ति के खाते में भी इस धन को जमा कर सकते हैं, परन्तु इसके लिए खाताधारक की सहमति और जमाकर्ता की पहचान प्रक्रिया पूरी होनी चाहिए|
  • १० नवम्बर से २४ नवम्बर २०१६ तक एक दिन में बैंक शाखा में जाकर केवल १०,००० रुपये निकाले जा सकेंगे, जबकि एक हफ्ते में केवल २०,००० रूपए|
  • १० नवम्बर से १८ नवम्बर तक एटीएम से प्रतिदिन प्रतिकार्ड २,००० रुपये निकाले जा सकेंगे और उसके बाद प्रतिदिन प्रतिकार्ड ४,००० रुपये निकलेंगे|
  • किसी भी प्रकार ने गैर नगद अंतरण – चैक, डिमांड ड्राफ्ट, डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड, मोबाइल बेलेट, इलेक्ट्रोनिक निधि अंतरण, पेमेंट बैंक आदि इस अवधि में मान्य रहेंगे|
  • अगर कोई व्यक्ति ३० दिसंबर तक नगद धनराशि नहीं बदल पता तो वह रिज़र्व बैंक में पहचान प्रक्रिया पूरी कर कर बदल सकेगा|

पहचान प्रक्रिया

पहचान प्रक्रिया के लिए पेन कार्ड, आधार कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, वोटर कार्ड, पासपोर्ट, आदि प्रयोग किये जा सकते हैं|

आयकर व्यवस्था

वर्तमान में अगर कोई व्यक्ति दो लाख से अधिक नगद धनराशि बैंक में जमा करता है तो इसकी सूचना बैंक आयकर विभाग को देती है| आयकर विभाग जांच का निर्णय के सकता है|

अनिवासी और प्रवासी

अगर आप भारत से बाहर हैं तो आप किसी अन्य व्यक्ति को भारत में रखे नगद खाते में जमा करने के लिए अधिकृत कर सकते हैं|

परिमाण आधारित विश्लेषण

काले धन की अर्थव्यवस्था अधिकतर निवेश नगद धनराशि में नहीं होता| किसी भी व्यक्ति के पास काले धन के एक करोड़ से अधिक रुपये होने की सम्भावना बहुत कम है| अधिकतर धन संपत्तियों, बेनामी संपत्तियों, कंपनियों, सोना – चांदी, और विदेशी बैंकों में होता है| बेनामी संपत्तियों के अलावा उनमें से किसी से निपटने की कोई सटीक योजना सरकार के पास नहीं है| संपत्तियों में काले धन के निवेश के कारण बहुत सारी निवास योग्य संपत्तियों पर मालिकों के ताले लटक रहे हैं| बाजार में सम्पतियों के अनावश्यक दाम इस सब के कारण बढ़े हुए हैं|

दूर दराज के क्षेत्रों और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों किसानों, मझोले दुकानदारों के लिए कोई समुचित व्यवस्था नहीं की गई है| पेट्रोल पंप आदि की तरह बिक्रीकर में पंजीकृत दुकानदारों को भी दो दिन तक अमान्य धनराशि स्वीकार करने की अनुमति मिलनी चाहिए थी|

सरकार ने नगद आधारित व्यवस्था को बैंक आधारित व्यवस्था में बदलने का अवसर हाथ से जाने दिया है| नए नोटों का प्रचलन सही निर्णय नहीं है|

हर प्रक्रिया में लाभ हानि होते है| वास्तविक परिणाम अगले पचास दिन में दिखाई देंगे| हमें सरकार का सहयोग करने का प्रयास करना चाहिए|

 

समान नागरिक संहिता

समान नागरिक संहिता पर वर्तमान बहस की पृष्ठभूमि कुछ अलग तरीके से पैदा हुई मगर इसने पहली बार इसपर चर्चा का अवसर दिया है|

एक मुस्लिम महिला ने कुछ सुन्नी मुस्लिम समुदायों में प्रचलित तलाक – उल – बिद्दत (जिसे अधिकतर मुस्लिम उचित नहीं मानते) भारत में समाप्त करने के लिए अदालत से गुहार की| मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के अतिरिक्त विश्वभर में कुछेक मुस्लिम ही इस तलाक प्रणाली के समर्थक होंगे| दुनिया के तमाम मुस्लिम देश इसे ख़त्म कर चुके हैं, अतः मुझे नहीं लगता कि इसपर बहस करने की जरूरत है| मगर, कोई भी भारतीय राजनीतिक दल तलाक़ – उल – बिद्दत का विरोध नहीं करना चाहता और समान नागरिक संहिता पर बहस उसी विषयांतर का प्रयास मात्र है|

एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि बहुसंख्यक, अल्पसंख्यक और असंख्यक सभी समुदाय अपनी विविधता और पहचान को बचाय रखना चाहते हैं| कोई भी व्यक्ति धार्मिक क्या, पारवारिक रीति-रिवाज तक नहीं छोड़ना चाहता| विविधता में एकता ही हमारी राष्ट्रीय पहचान है और इसे बचाए रखना समान नागरिक संहिता के लिए सबसे बड़ी चुनौती है|

अगर समान नागरिक संहिता में अब तक की आम सहमति पर बात की जाय तो बात सिर्फ इतनी है –

“सभी स्त्री और पुरुष अपनी अपनी रीति – रिवाज, परम्पराओं और विचारों के अनुसार “विषमलिंगी” विवाह, तलाक, संतान, नामकरण, मृत्यु और उत्तराधिकार संबंधी प्रक्रिया का पालन करते हुए, जन्म, विवाह, मृत्यु और उतराधिकार का पंजीकरण कराएँगे और बिना वसीयत के मामलों में भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम का पालन करेंगे|”

अगर सारी बहस के बाद भी मामला इतना ही निकलना है तो मुझे लगता है कि यह सारी बहस मात्र अतिवाद और अतिरंजना है| बात अगर निकली है तो दूर तक जानी चाहिए|

समान नागरिक संहिता के सन्दर्भ में दहेज़, सती, विधवा विवाह, विधुर विवाह, बालविवाह, मैत्री करार, विधवा अधिकार, सगोत्र परन्तु विधि सम्मत विवाह, विजातीय विवाह, विधर्मी विवाह, समलैंगिक सम्बन्ध, बेटियों का उत्तराधिकार, बलात्कार, बलात्कार जन्य बालक का उतराधिकार, विशिष्ठ परिस्तिथियों में स्त्रियों और पुरुषों की दूसरे विवाह की आवश्यकता, नियोग, सरोगेसी, स्त्री – पुरुष खतना, विवाह पूर्व यौन सम्बन्ध, विवाहेत्तर यौन सम्बन्ध, विवाह उपरांत अवांछित आकस्मिक यौन सम्बन्ध, मासिक धर्म, राजोनोवृत्ति, पारिवारिक हिंसा, व्यवसायिक हिन्दू संयुक्त परिवार, समान सम्पत्ति अधिकार संबंधी राष्ट्र व्यापी कानून, आदि पर गंभीर चर्चा का अभाव है| बहुत से लोग वर्तमान कानूनों के हवाले से इनमें से कुछ मुद्दों पर बात नहीं करना चाहते| तो कुछ इनमें से कुछ मुद्दों को मुद्दा नहीं मानते| मगर समान आचार संहिता को बिना गंभीर चर्चा किये नहीं बनाया जाना चाहिए|

एकल विवाह आज अतिवादी रूप से आधुनिक माना जा रहा है, परन्तु इस अतिवाद के चलते बहुत से लोग छिपा कर दूसरे विवाह करते हैं या विवाहेत्तर सम्बन्ध रखते हैं| इन छिपे विवाहों और विवाहेत्तर संबंधों से होने वाली संतान को अकारण एकल विवाह अतिवाद का शिकार होना पड़ता है|

मुद्दे बहुत हैं, मगर बहस और चर्चा की इच्छा शक्ति की हमारे वर्तमान इंस्टेंट नूडल समाज में बेहद कमी है|

 

आपका डाटा बेचता व्हाट्सएप्प

फेसबुक ने व्हाट्सएप्प को इतना मंहगा क्यों खरीदा जबकि व्हाट्सएप्प तो मुफ्त है कोई आय नहीं उसकी, इस बात का खुला जबाब अब सामने आने लगा है।

ऊपर जो स्क्रीन शॉट आप देख रहे हैं  तो उस से आपको प्यार से बरगलाया गया है कि अगर आप व्हाट्सएप्प की शर्तों से सहमत नहीं है तो आपको व्हाट्सएप्प कॉलिंग जैसी महान सुविधा नहीं मिलेगी। ज्यादातर लोग सहमति दे देंगे यह उनका विश्वास है।

मगर कुछ मेरे जैसे पागल सनकी लोग टर्म कंडीशन पढ़ लेते हैं।

यहाँ आपको दिखाई देता है खुला धोखा। जो बात पहले  नहीं बताई गई वो बात यहाँ बताई गयी है, इतनी खुलकर कि आप नजरअंदाज कर दें।

यहाँ पर शब्दजाल है, मकड़जाल वाला। आप कंफ्यूज है कि टिक हटाना है या लगाना है।

मेरी समझ के हिसाब से हटा कर एग्री का बटन दबाएं।

वैसे व्हाट्सएप्प के दावे के हिसाब से कुछ भी डाटा शेयर नहीं होगा। आपके मोबाइल को पढ़कर व्हाट्सएप्प आपका खरीददारी प्रोफाइल बनायेगा और केवल उसे ही फेसबुक को देगा।

फेस बुक उस प्रोफाइल से आपके वॉल पर विज्ञापन चलायेगा।

बचिए कंपनी फिक्स्ड डिपाजिट से

जल्दी से दोगुना होने वाला पैसा हम सभी को जान से ज्यादा नहीं तो कम प्यारा भी नहीं है| पहले ज़माने में पैसा दोगुना करने का काम बाबाजी लोग करते थे| आज के ज़माने में पैसा दोगुना करने का ठेका कंपनियों के पास है|

कंपनी फिक्स्ड डिपाजिट में अच्छे ब्याज का वादा ललचाता है| बड़ी कंपनी का नाम आपको आश्वस्त करता है| मगर हाल में कंपनी डिपाजिट में लोग बुरी तरह फंसे हुए हैं और कंपनियां कैश क्रंच यानि नगदी की कमी की गहरी खाई में धंसी हुईं हैं| कई जानी मानी कंपनियां नगद पैसे की कमी के चलते ट्रिब्यूनल के पास जाकर पैसा वापसी का समय बढ़वाने में लगी हैं|

हाल में एक सज्जन मिले, जो तीन चार साल पहले किसी बड़ी कंपनी में “की मैनेजरियल पेरसोनेल” कहे जाने वाले एक ऊँचे पद से रिटायरमेंट लेकर आये थे| रिटायरमेंट फण्ड में से ढेर सारा पैसा किसी और कंपनी के फिक्स्ड डिपाजिट में फिक्स्ड कर दिया| जब वापसी का टाइम आया तो कंपनी ने बोला इन्तजार करो, हम ट्रिब्यूनल से टाइम मांग कर आते हैं| सरकार ने बोला कंपनी ट्रिब्यूनल कंपनी ट्रिब्यूनल से टाइम मांग कर आती है| भगवान ने बोला धीरज धरो| खैर बाद में पैसा मिल तो गया, मगर जरूरत के समय पर नहीं|

कंपनी फिक्स्ड डिपाजिट आज सबसे अधिक रिस्क का निवेश है| पिछले कुछ समय में सरकार ने कुछ कदम उठाये हैं निवेशकों के हित में|

पहला कदम है, फिक्स्ड डिपाजिट लेने वाली कंपनी को क्रेडिट रेटिंग लेनी होती है| यह रेटिंग मात्र एक आकलन है और यह रिस्क का मोटा अंदाजा भर है|

दूसरा कदम है, डिपाजिट का बीमा| फिक्स्ड डिपाजिट लेने वाली कंपनी को बाजार से डिपाजिट का बीमा करवाना होता है| मगर आज तक सरकार इस कदम को टालने पर मजबूर है| कारण – बीमा कंपनी कंपनी डिपाजिट का बीमा करने को अपने लिए खतरनाक मानती हैं – मतलब बेहद घाटे का सौदा| इतने बड़े भारत देश में कोई बीमा कंपनी, किसी भाई बन्धु कंपनी के डिपाजिट का भी बीमा करने को तैयार नहीं|

तीसरा कदम है, कंपनी की जायदाद की गिरवी| यह गिरवी, कंपनी के डिपाजिट ट्रस्टी के नाम पर रखी जानी है|

चौथा कदम है – निवेशक जागरूकता| सरकार ने कंपनियों को कहा है कि वह निवेशकों को भेजे जाने वाले कागजातों में एक दावात्याग यानि डिस्क्लेमर डालें| डिस्क्लेमर की भाषा पढ़िए और सुरक्षित रहिये –

“यह स्पष्ट रूप से समझा जाये कि रजिस्ट्रार के पास परिपत्र (फॉर्म) अथवा विज्ञापन के प्ररूप में परिपत्र फाइल करने को यह न माना जाये कि उसे रजिस्ट्रार अथवा केन्द्रीय सरकार द्वारा संस्वीकृत अथवा अनुमोदन दिया गया है| रजिस्ट्रार अथवा केन्द्रीय सरकार की किसी भी जमा स्कीम की वित्तीय सुदृढ़ता के लिए, जिसके लिया जमा स्वीकार या आमंत्रित की गई है अथवा विज्ञपन के प्ररूप में परिपत्र में दिए गए विवरणों या मतों की सत्यता के लिए कोई जबाबदेही नहीं है| जमाकर्ता जामा स्कीमों में निवेश करने से पूर्व पूरी सतर्कता बरतें|”

प्यारी पवित्र पुलिस

भारत का शायद ही कोई गाँव या शहर ऐसा होगा जहाँ घर द्वार पर पुलिसवाले को देख कर घर के लोग सहम न जाते हों| पुलिस का अपनी गली में आना ही एक गाली है और घर के सब लोगों की गर्दन झुका देने के लिए काफी है| घर की बैठक में पुलिस वाला रोज हुक्का पीने आये और सलाम ठोंक का जाए तो दस कोस तक इज्जत अपना झंडा लहराती है| जिन गांवों में खाप पंचायत या जात पंचायत या नक्सल आदि का दबदबा हो तो उस गांव में पुलिस बिना अनुमति घुसने नहीं दी जाती, यह अक्सर दावा किया जाता है|

कोई भी शरीफ़ आदमी अभी किसी पुलिस वाले से रास्ता नहीं पूछता, किसी पुलिस वाले की दी बीड़ी नहीं पीता, किसी पुलिस वाले दुआ सलाम नहीं करता| अगर गलती से कोई पुलिस वाला रास्ता काट जाये तो लोग भैरों बाबा का नाम जपते हैं| ऐसे में पुलिस वाले को और हनुमानजी को प्रसाद चढ़ा कर अपने पिछले पापों का प्रायश्चित करते हैं|

देश में हर गली, मोहल्ले, प्रान्त और यहाँ तक थानों में भी पुलिस के प्रति इसी तरह का अविश्वास है|

मगर, मगर…

इस देश में सबसे अधिक पुलिस पर विश्वास करते हैं –

  • अगर पुलिस किसी मजदूर किसान को विकास विरोधी बता दे;
  • अगर पुलिस किसी गंवार देहाती आदमी को नक्सल बता दे;
  • अगर पुलिस किसी दलित को चोर, डकैत, अपराधी प्रवृत्ति बता दे;
  • अगर पुलिस किसी सरकारी अधिकारी और कर्मचारी को भ्रष्ट बता दे;
  • अगर पुलिस किसी औरत को वैश्या, चरित्रहीन, कुलटा, बता दे;
  • अगर पुलिस किसी मुस्लिम को आतंकवादी बता दे;
  • अगर पुलिस किसी अच्छे पढ़े लिखे को उपरोक्त में से किसी के प्रति सहानुभूति रखने वाला बता दे;

देश की पुलिस पवित्र है, उनका मनोबल ऊँचा रहना चाहिए… तब तक … जब तक वो पड़ौसी को झूठे मुकदमें में फंसाती हैं; पसंदीदा नेता के तलबे साफ़ करती है; जिनके खिलाफ डटकर दुष्प्रचार है उन्हें ख़त्म करती है|

किसी को पुलिस का ऊँचा मनोबल देश के हित में नहीं चाहिए; निष्पक्ष न्याय के लिए नहीं चाहिए|
इस देश का एक सपना है, पुलिस का मनोबल देश गाय – भैंस – भेड़ –बकरी के रेवड़ की तरह ऊँचा होना चाहिए…
इति शुभम…||

अलीराजपुर का भगोरिया

होली के एक सप्ताह पूर्व भारत के प्राचीनतम निवासी भील और भिलाला आदिवासी जातियां अपने सदस्यों को अपना जीवनसाथी चुनने का अवसर प्रदान करतीं है| यह वह सुविधा है, जो आज सभ्य भारतीय समाज में सुलभ नहीं है, माँगनी पड़तीं है| भगोरिया एक अनुशासित प्रक्रिया है, जिसमें होली से ठीक पहले के सप्ताह में लगने वाले स्थानीय हाट (साप्ताहिक बाजार) भगोरिया मेले और उत्सव में बदल जाते हैं| खरीददारी, उत्सव, नाचगाना, और छोटे छोटे मनोरंजन के साथ प्राचीनता का नवीनता के साथ संगम देखते ही बनता है| इस वर्ष मुझे भगोरिया मेलों में शामिल होने का अवसर मिला|

चित्रों में भगोरिया – भ्रमण

भगोरिया के साथ प्रचलित रूप से मध्यप्रदेश के झाबूआ जिले का नाम जुड़ा हुआ है| झाबूआ दरअसल जिला बन जाने के कारण प्रसिद्ध हुआ और प्राचीन अलीराजपुर राज्य को अपना महत्व हासिल करने के लिए 2008 में स्वतंत्र जिला बनने तक इन्तजार करना पड़ा| प्राचीन भील राज्य आली और मध्यकालीन राजपुर मिलन से अलीराजपुर की नीव पड़ी|[i] वैसे भगोरिया का आयोजन मध्यप्रदेश के मालवा क्षेत्र के सभी आदिवासी बहुल जिलों झाबूआ, धार, खरगौन, अलीराजपुर आदि में होता है| जितना दूर दराज क्षेत्र में जाते हैं, भगोरिया अपने अधिक मूल रूप में दिखाई देता है|

चांदी के महत्वपूर्ण भारी भरकम गहनों के लदी असाधारण सौंदर्य की धनी भील और भिलाला कन्याएं एक सामूहिक गणवेश में झुण्ड के झुण्ड मेले का आनंद लेने आतीं हैं| हर झुण्ड की लडकियां आज भी एक जैसे रंग के भिलोंडी लहंगे और ओढ़नी पहनतीं हैं| परन्तु इस सामूहिकता में एकलता की थाप भी यदा कदा दिखाई देती है| जैसा कि हमेशा होता है, लड़कों में आधुनिक परिधानों का शौक मेले के पारंपरिक सौंदर्य को थोड़ा कम कर देता है| परन्तु कुछ लड़के फैंटे, कड़े और कंडोरे पहने दिखाई देते हैं|

उमरिया के भगोरिया में आती भिलाला कन्यायें

उमरिया के भगोरिया में आती भिलाला कन्यायें

मध्यमवर्गीय आधुनिकता के थपेड़े, सार्वजानिक प्रेम अभिवयक्ति को कम कर रहें हैं| पहली निगाह के प्रेम का स्थान अब पुराने प्रेम की कभी कभार वाली अभिव्यक्ति ने ले लिया है| ज्यादातर सम्बन्ध पारवारिक और सामाजिक पूर्व स्वीकृति से ही तय होने लगे हैं| दापा (वर पक्ष द्वारा दिया जाना वाला वधुमूल्य) कई बार भगोरिया से भागने के बाद भी देना पड़ता है|

यदि आप उस प्राचीन रूमानी इश्क़ और स्वयंवर के लिए भगोरिया आना चाहते हैं तो न आयें| न ही यह दिल्ली के प्रगति मैदान में होने वाले बड़े मेलों की तरह सजावटी है| मगर बहुत कुछ है भगोरिया में जो देखने और शामिल होने लायक है|

उमरिया:

सोंडवा विकासखंड का उमरिया गाँव बढ़िया सड़क और बाजार के कारण आकर्षित करता है| यह आम भारतीय कस्बों के बाजार जैसा ही है| सम्पन्नता के कारण यहाँ पर आने वाले लोगों में आत्मविश्वास दिखाई देता है| हम भारतवासी मेलों में सबसे अधिक भोजन की ओर आकर्षित होते हैं| यहाँ पर बढ़िया पकौड़े हर पांचवी दुकान पर मिल रहे थे| हाट में दुकान सँभालने और हाथ बंटाने वाली महिलाओं का काफी अच्छा अनुपात था| यहाँ पर भगोरिया के लिए निर्धारित मैदान भीड़ के कारण छोटा पड़ रहा था और आपात स्तिथि के लिए निकास नहीं था| पास के गांवों से भील और भिलाला समुदाय के लड़के लड़कियों के जत्थे लगातार आ रहे थे| जिन परिवार में बच्चे छोटे हैं वह ही पारवारिक इकाई के रूप में आते देते हैं| वृद्ध दंपत्ति में साथ आते में दिखाई दिए| लड़के लड़कियां अपने अपने अलग अलग समूह में आते हैं| आप सौन्दर्यबोध और सम्पन्नता के आधार पर आसानी से भील और भिलाला लड़कियों को पहचान सकते हैं|

यहाँ हम जैसे पर्यटकों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है| बड़े बड़े कैमरे सबसे अधिक फोकस उन भारी भरकम चांदी के गहनों की ओर कर रहे हैं, जिन्हें खरीदना आज आसान काम नहीं है| हाट में आये स्थानीय दुकानदार जागरूक हैं|  आदिवासी सामान की दुकान पर आदिवासियों और बाहरी लोगों का जमघट है| हमने यहाँ के स्थानीय गायकों के भगोरिया गीत भी पेन ड्राइव में खरीदकर लिए|[ii]

वालपुर:

इस से पहले वालपुर गाँव में मुझे अपेक्षागत रूप से अधिक ग्रामीण झलक दिखाई दी| इस छोटे से गाँव में इसके आकर से दो तीन गुना बड़ा हाट लगा था| बहुत से लोगें ने भगोरिया के उसी तरह से पंडाल लगाये थे जैसे दिल्ली में भंडारों के लगते हैं| यह शायद भील बहुल इलाका है, सम्पन्नता कम है और स्वभाव की सरलता अधिक| टूटी फूटी सड़क, बहुत सारी धूल के बाद भी वालपुर मुझे आकर्षित करता है| यहाँ स्थानीय जरूरत का साधारण सामान अधिक है| मैं मुख्य चौराहे पर रखे पत्थर पर खड़ा होकर चारों तरफ देख रहा हूँ| भीड़ अनुशासित है, मगर पुलिस भी अधिक है| ताड़ी पीकर आये लड़के लड़कियां भी अधिक है| एक पुलिसकर्मी मुझे कहता है, जब तक आप शांत है, बहुत सुरक्षित है; किसी की भावना को हल्की सी चोट आपके लिए बहुत हानिकारक हो सकती है| यहाँ लोग जब तक सरल हैं, सब ठीक है मगर क्रोध जगाने के स्तिथि में बहुत भड़क सकते हैं| लड़कियां बहुत शांत शर्मीली सहमी हुई और कम आत्मविश्वास में हैं| लड़के हर कदम पर पुलिस से बचकर चलते हैं| थोड़ी थोड़ी दूर छोटे छोटे समूह में लोग मस्ती में नाच रहे हैं| झाबूआ नर्मदा ग्रामीण बैंक के परिसर में भी दो बड़े ढ़ोल, लम्बी बांसुरी और अन्य वाद्य बज रहे हैं| लोग नाच रहे है| इसके बराबर में तरह तरह के आधुनिक और प्राचीन झूले लगे हैं| थोड़ी दूर मैदान में कई बड़े बड़े ढ़ोल हैं और उनके चारों ओर घूम घूम कर नाच चल रहा है| धुल कदम ताल के साथ बहुत ऊपर तक उठ रही है| धूल के अलावा प्रदूषण नहीं है|

वालपुर भगोरिया में बांसुरी

वालपुर भगोरिया में बांसुरी

रतालू बहुत बिक रहा है| रतालू दक्षिण अमेरिका से आलू के आने तक भारत का मुख्य खाद्य रहा है| सब्जियाँ, मछलियाँ, मांस, सूखी मछलियाँ सब अलग अलग गलियों या इलाकों में बिक रहीं है| पकोड़े और बड़ी बड़ी जलेबियाँ सबसे अधिक भीड़ बटोर रहे हैं| मैं खांड के कंगन और हार देख कर उधर जाता हूँ| यह होली की पूजा में देवता पर चढ़ेंगे, प्रसाद में खाए जायेंगे| मैं बताता हूँ दिल्ली में खण्ड के खिलौने  दिवाली पर बिकते है; दुकानदार कहता है… पढ़ लिख कर तो सब लोग उल्टा काम करते हैं, दिल्ली वाले पढ़े लिखे होते है| उसकी पत्नी “इनका” मुझे फ़ोटो लेने के लिए आग्रह करती है| बाद में हँसकर कहती है, भगोरिया नाचने गाने का त्यौहार है, लड़कियों के फ़ोटो लेने का नहीं|

हल्की सी बातचीत पर लोग अपनेपन से बात करते हैं| आपके गुलाल लगाते हैं और आपसे लगवाते हैं| पुलिस शाम की साढ़े पांच बजे मेले को बंद करा देगी| पूरे प्रशासनिक अमले को अगले दिन अगले गाँव के भगोरिया इंतजाम भी करना है| हम लोग चल देते हैं| अगले दिन पता चलता है, हम लोगों के निकलते ही पुलिस ने लाठियां चलाई, कुछ लड़की छेड़ने का मामला था| बताने वाला लड़का पूछता है अगर लड़की से बात भी नहीं कर पाएंगे तो भगोरिया कैसे होगा? साथ ही मानता है कि लड़की छेड़ने के मामले बढ़ते जा रहे हैं|

पर्यटकों से:

पर्यटक अपनी सुविधा से भगोरिया के लिए किसी भी स्थान होने वाले हाट में जा सकते हैं| आपको सुविधा और संस्कृति में सामंजस्य बिठाने की कोशिश करनी होगी| मध्यप्रदेश पर्यटन विकास निगम भगोरिया के अवसर पर स्विस टेंट की व्यवस्था करता हैं| जहाँ सुविधाजनक रूप से रहा जा सकता है| अगर आप साथ में कट्ठीवाड़ा जाने का कार्यक्रम बनाते हैं तो यह सुखद अनुभव होगा|

सुझाव:

विकास और जनसँख्या विस्फ़ोट के साथ आज मेले आदि के लिए बड़े मैदान की कमी होती जा रही है| इसके लिए मेले स्थल के निकट बड़े मैदान की व्यवस्था की जरूरत है| हर हाट में आदिवासी हस्तशिल्प और खान-पान आदि को थोड़ा प्रोत्साहन मिलना चाहिए| आदिवासी गीत संगीत पर वालीवुड का असर देखा जा रहा है, मगर उसके प्रोत्साहन के लिए भगोरिया मेले माध्यम बन सकते हैं| क्या ताड़ी को गोवा की फैनी की तरह प्रोत्साहित किया जा सकता है?

सभी चित्र: ऐश्वर्य मोहन गहराना

[यह यात्रा मध्य प्रदेश पर्यटन विकास निगम द्वारा आयोजित की गई थी]

[i] आली और राजपुर से मिलकर बने अलीराजपुर शब्द में मुस्लिम हस्तक्षेप न खोंजें| यह भील राज्य आली का अवशेष है|

[ii] लगभग १०० भगोरिया गीत हमें मानसी ट्रेवल के दुर्गेश राजगुरु (सिसोदिया) – डिम्पी भाई ने खरीदकर उपहार में दिए| आपका हार्दिक धन्यवाद|

कंपनियों द्वारा चुनावी चंदा देने के कानून में सुधार का समय

हाल में भारत सरकार के द्वारा कम्पनी कानून में सुधार के लिए सलाह देने के लिए गठित की गई समिति ने अपनी सिफारिशें सरकार को एक फरवरी २०१६ को सौप दीं| सरकार यद्यपि इन प्रस्तावों और सुझावों के अनुरूप कानून बनाने या कानूनी सुधार करने के लिए बाध्य नहीं है, परन्तु सभी सम्बंधित पक्षों (शायद निवेशकों को छोड़कर) का समिति में प्रतिनिधित्व होने के कारण और व्यापक सलाह मशविरे का तरीका अपनाये जाने के कारण इस समिति की सलाहों का अपना महत्त्व है| यह सिफारिश ऐसे महवपूर्ण समय में आयीं हैं, जब भारत सरकार “भारत में निर्माण” और “व्यावसायिक सरलीकरण” के सुनहरे नारों को जल्दी से जल्दी अमली जामा पहनाने की तैयारी में है| यह समिति और उसकी सिफारिशें भी इसी दिशा में एक कदम के रूप में देखी जा रहीं है|

समिति ने कंपनी कानून के लगभग सभी पहलुओं पर अपनी ठोस राय रखी है| परन्तु, आश्चर्यजनक रूप से कंपनियों द्वारा राजनितिक दलों को चंदा दिए जाने के विषय में सिफारिश देने से एक प्रकार से मना करते हुए व्यापक सलाह मशविरे की जरूरत बताई है| वैसे समिति ने विधि – आयोग की हालिया सिफारिशों पर अपनी बैठक में चर्चा करने की बात स्वीकार की है| एक उच्च स्तरीय समिति द्वारा व्यापक चर्चा के बाद भी किसी प्रकार की टिपण्णी से बचना कई कठिन संकेत देता है|

The Committee felt that a wider consultation with industry chambers, political parties and other stakeholders should be taken up by the Ministry before taking a final decision on changes recommended in the 255th Report.

  • कंपनी कानून समिति के शब्द

यह कदम भारतीय व्यवसाईयों, नौकरशाहों और पेशेवरों द्वारा राजनितिक दलों से टकराव न लेते हुए खुद को बचा कर रखने की ओर संकेत देता है| इस विचार हीनता को समझने के लिए हमें विधि आयोग की मूल सिफारिश को समझना होगा|

विधि आयोग ने पानी २५५ वीं रिपोर्ट में चुनाव सुधारों पर चर्चा की है| क्योंकि कंपनियों द्वारा राजनीतिक दलों को दिया जाने वाला चंदा चुनावों में भी खर्च होता है, विधि आयोग की यह रिपोर्ट इस चंदे के विषय में विस्तार से चर्चा करती है|

भारत में राजनीतिक दल सरकारी कंपनियों और विदेशी कंपनियों को छोड़कर किसी ऐसी कंपनी से चंदा ले सकते हैं जिसको बने हुए तीन से अधिक वर्ष हो चुके हों| यह अलग बात है कि हाल में दो प्रमुखतम राजनीतिक दलों को उच्च न्यायालय द्वारा विदेशी कंपनियों से चंदा लेने का दोषी माना गया था, उस विषय पर अलग से कार्यवाही चल रही है| गुपचुप ख़बरों के हिसाब से, दोनों दलों की राजनीतिक प्रतिद्वंदता इस मुद्दे पर मित्रता बनकर उभर रही है|

भारतीय कंपनियां के द्वारा राजनीतिक चंदा देने निर्णय इस समय कंपनी के निदेशक मंडल के द्वारा लिया जाना होता है| कंपनी के शेयरहोल्डर को, जो कि कंपनी के सामूहिक रूप से मालिक होते हैं और कंपनी के लाभ – हानि को झेलते हैं, इस बाबत बोलने या निर्णय लेने का कोई अधिकार नहीं है| यह बात निवेशकों के हितों के विपरीत जाती है, और भारतीय निवेशकों में जागरूकता की कमी को भी दर्शाती है| वर्तमान व्यवस्था में प्रमोटरों और निदेशकों (प्रायः पूंजीपति) द्वारा राजनीतिक चंदा देने के निर्णय का अधिकार विश्वभर में स्वीकृत कॉर्पोरेट गवर्नेंस के सिद्धांत के भी विरुद्ध है|

विधि आयोग ने इन सब बातों पर विचार करते हुए अपनी २५५ वीं रिपोर्ट में सिफारिश की है कि राजनीतिक चंदा देने का निर्णय कंपनी की वार्षिक आम सभा में शेयर धारकों द्वारा लिया जाना चाहिए| यह बहुत ही महत्वपूर्ण कदम होगा| यदि यह सिफारिश मान ली जाती है तो राजनीतिक चंदे का प्रस्ताव, कंपनी की वार्षिक आम सभा में विशेष कार्य के रूप में शामिल होगा और कंपनी प्रबंधन को राजनीतिक चंदा प्रस्ताव के सम्बन्ध अर्थात समर्थन में “व्याख्यात्मक विवरण” या स्पष्टीकरण देना होगा| समझा जा सकता है कि इस से कंपनी प्रबंधन को सम्बंधित राजनीतिक दल या दलों से बहुत कुछ जानकारी लेनी होगी| इस से भारतीय प्रजातंत्र में क्रन्तिकारी पारदर्शिता और जबाबदेही आयेगी| निश्चित रूप से राजनीतिक दल और निदेशक मंडलों पर कब्ज़ा रखने वाले पूँजीपति इस से बचना चाहेंगे|

हालांकि निवेशकों के लिए मात्र राजनीतिक चंदा देने का निर्णय लेने का अधिकार ही इस कानून का अकेला पहलू नहीं है, वरन निवेशकों और निवेश की सुरक्षा के लिए साथ में कुछ और उपायों की भी जरूरत है| किसी भी कंपनी की राजनीतिक चंदा देने से पहले कुछ खास शर्तों को भी पूरा करना चाहिए:

  • चंदा देने का प्रस्ताव करने वाली कंपनी को अपने निवेशकों को कम से कम पिछले तीन वर्षों में लाभांश दिया होना चाहिए|
  • कंपनी द्वारा अपनी आर्थिक देनदारियों में किसी प्रकार की चूक नहीं होनी चाहिए| कम से कम जनता द्वारा दी जमाराशियों पर ब्याज, मूल धन का बकाया, लाभांश देय, बैंक बकाया और सरकारी टैक्स आदि का समय पर नियमित भुगतान किया गया होना चाहिए|
  • कंपनी द्वारा पिछले वर्षों के बैलेंस शीट और वार्षिक रिटर्न रजिस्ट्रार कार्यालय में समय पर दाखिल किये होने चाहिए|
  • कंपनी के निदेशकों, प्रबंधन, प्रमोटरों आदि के राजनीतिक सम्बन्धों, जैसे सदस्यता, पद, आदि की जानकारी को निदेशक मंडल और निवेशकों के समक्ष बताया जाना चाहिए| यदि इनमें से कोई भी अगर किसी निर्वाचित पद पर रहा हो उसका भी विवरण होना चाहिए|
  • यदि चंदा देने वाली कंपनी के निदेशकों, प्रबंधन, प्रमोटरों आदि में से कोई अगले तीन वर्षों में चुनाव लड़ने की मंशा रखता हो तो उसे कंपनी की चुनाव में नामांकन से पहले उस कंपनी की आम सभा से पूर्वानुमति लेनी चाहिए|
  • चंदा लेने के इच्छुक राजनीतिक दलों द्वारा पिछले 6 वर्षों में जारी किये गए घोषणापत्र और अपनी उन घोषणाओं पर कार्यवाही रिपोर्ट भी निदेशक मंडल और वार्षिक आम सभा के समक्ष रखी जानी चाहिए|
  • गैर भारतीय निदेशकों और निवेशकों को राजनीतिक चंदे के विषय पर होने मतदान में भाग लेने की अनुमति नहीं होनी चाहिए|

यह सभी मुद्दे विधि द्वारा मानक के तौर माने जाने चाहिए, अथवा कम से कम कॉर्पोरेट गवर्नेंस की बड़ी बड़ी बातें करने वाली कंपनियों को उन्हें स्वयं ही अपने यहाँ लागू करना चाहिए| राजनीतिक दलों को कंपनियों द्वारा चंदा देने के विषय पर राजनीतिक इच्छा शक्ति से अधिक निवेशक जागरूकता और विमर्श की जरूरत है| प्रायः निवेशक कंपनी द्वारा दिये गए राजनीतिक चंदे को सामान्य व्यवसायिक निर्णय मानकर, उसपर प्रश्न नहीं उठाते|  समय बदल रहा है, यदि आम निवेशक के हितों की रक्षा नहीं की जाएगी, पारदर्शिता नहीं आयेगी तो देश में निवेश के प्रति सकारात्मक माहौल कैसे बनेगा|

विचारों की भीड़–ताल और न्याय का समूह-साधन

बीतते हुए वर्ष के बारे में बात करते हुए हम उन घटनाओं का जिक्र करते हैं, जो हमारे मन में कहीं  न कहीं रीत जातीं हैं; एक कसक सी छोड़ जातीं हैं|

बीतता हुआ वर्ष अपने सन्दर्भों और प्रसंगों के साथ समय के एक वर्ष से अक्सर बड़ा होता है| इन अर्थों में इस वर्ष की शुरुआत कई महीनों पहले हुई थी| इस वर्ष में हमें एक शब्द बहुत सुना, क्राउड – सोर्सिंग (crowd – sourcing); जिसका अर्थ मैं समूह–साधन चाहूँगा|

इस वर्ष बहुत बातें समूह–साधन के माध्यम से इस वर्ष में विकसित हुईं; सामाजिक माध्यम (social media), समाचार, सरकार, शासन, लोकतंत्र, विचार, विमर्श, वेदना, वित्त, विधि और न्याय|

समूह–साधन का सर्वाधिक स्वीकृत प्रयोग वित्त यानि पैसे की व्यवस्था करने के लिए हो रहा है| साधारण रूप से इसके लिए हम सामाजिक माध्यम का प्रयोग कर कर परचित – अर्ध्परिचित – अपरचित लोगों से धन की मदद मांगते हैं| यह धन किसी अच्छे कार्य या विचार आदि के लिए हो सकता है| कुछ वेबसाइटों पर इसके लिए समुचित जानकारी, वयवस्था और विचार उपलब्ध हैं| मगर इस वर्ष वित्त से कहीं अधिक समूह–साधन का प्रयोग विचार के लिए हो रहा है|

विचार के सन्दर्भ में समूह–साधन हमेशा से समाज का हिस्सा रहा है| चौपालें, पान की दुकानें, दावतें, चंदा, और सत्संग समूह–साधन का सीमित मगर स्वीकृत माध्यम रहे हैं| मगर इस वर्ष में समूह–साधन को व्यापक तकनीकि विस्तार मिला| सूचना प्रद्योगिकी द्वारा प्रदत्त सामाजिक माध्यम निश्चित ही इस का सबसे बड़ा कारक रहे हैं|

पिछले कुछ समय से सामाजिक मध्यम जन चेतना का प्रसार प्रचार करने में अहम् भूमिका निभा रहे हैं| बहुत से विचार विमर्श सामाजिक माध्यमों के माध्यमों से सेमिनार हॉल, जनसभाओं, नुक्कड़ सभाओं, नुक्कड़ से आगे बढ़ कर तेजी से अधिक लोगों तक पहुँच पा रहे थे| इस से द्विपक्षीय संवाद की प्रबल संभावनाएं बनीं| विद्वानों को जनसाधारण तक सीधे विचार रखने का मौका मिला तो अल्पज्ञानियों को विद्वानों के समक्ष अपनी अज्ञानता का विष्फोट करने का समान अवसर दिया गया|

पिछले आम चुनावों में सामाजिक माध्यमों ने जन – समूह को एक साथ जोड़कर देश में एक राजनीतिक तौर पर वैचारिक माहौल पैदा करने में सफलता प्राप्त की थी| उसके बाद दिल्ली और बिहार चुनावों में सामाजिक माध्यमों का प्रयोग अन्य राजनीतिक दलों ने कुशलता पूर्वक किया और इसकी व्यापक चर्चा भी हुई| इस से देश में निश्चित ही सामाजिक माध्यम के प्रति जानकारी, जागरूकता, रूचि और प्रयोग में वृद्धि हुई| राजनीतिक रूप से माना जा सकता है कि अगले आम चुनाव तक सामाजिक माध्यमों में वही वैचारिक साम्य आ जायेगा जो धरातल (grass –root) पर पहले ही बन चुका था| प्रचार का बहुमुखी, बहिर्मुखी और आक्रमक होना सामाजिक मध्यम में सफलता की कुंजी के रूप में देखा जा सकता है|  चुनावों में जब विचार द्विपक्षीय सामाजिक संवाद के रूप में सामाजिक माध्यमों को प्रचारित और प्रसारित किया गया तो शायद यह सोचा भी नहीं गया था कि यह दिपक्षीय संवाद सामाजिक बेतालों (social media trolls) से आगे बढ़ कर एक भीड़–ताल (crowd – cry) बन जायेगा|

इस वर्ष, सामाजिक माध्यमों ने वैचारिक समूह-साधन के रूप में अपना विकास करने में व्यापक सफलता प्राप्त की है| हाल के भ्रष्टाचार विरोधी अन्ना – आन्दोलन और दिल्ली बलात्कार काण्ड के समय टेलीविजन ने प्रचार प्रसार में व्यापक भूमिका निभाते हुए प्रिंट और रेडियो को काफी हद तक पीछे छोड़ दिया था| इस वर्ष के अंतिम क्षणों में हम देख रहे हैं कि समूह-साधन देश में वैचारिक क्रांति या वैचारिक अव्यवस्था ला रहा है| हाल में हमने बहुत से मामलों में विचारों, कुविचारों, प्रचार, दुष्प्रचार, तर्कों और कुतर्कों को रणनीतिक रूप से समूह- साधित किया गया|

इस वर्ष के बिहार चुनावों में सामाजिक मीडिया में वह दल छाया रहा जिसका धरातल पर कोई आधार नहीं था| गाय हत्या के विरोध में तर्कों और कुतर्कों का ऐसा समां बंधा कि किसी को भी गाय का हत्यारा बना कर पेश करना और उसकी भीड़ द्वारा हत्या करा देना आसन हो गया| हम सब जानते हैं कि देश में बहुसंख्यजन शाकाहारी नहीं हैं और शाकाहार की सबकी अपनी परिभाषाएं है, परन्तु समूह – साधन के माध्यम से सामजिक माध्यमों में देश की छवि “शुद्ध सात्विक जैन शाकाहारी राष्ट्र” की बनाई गई|

देश की न्याय प्रणाली के ऊपर सामाजिक माध्यमों ने इस वर्ष मजबूत हमले किये| कई आरोपियों को सामूहिक पसन्द – नापसंद के आधार पर दोषी और निर्दोष साबित किया गया| संजय दत्त दोषी साबित होने के बाद भी पैरोल का आनंद आसानी से उठाते रहे| आमिर खान और शाहरुख़ खान अपने विचार रखने के लिए उस भीड़ द्वारा दोषी करार दिए गए, जिसे न विचार समझने की क्षमता थी, न विमर्श का माद्दा था, न न्याय प्रणाली में विश्वास था, सारा विचार – विमर्श – न्याय और दंड प्रक्रिया सामाजिक माध्यम के भीड़–ताल के हवाले कर दी गयी| पुलिस, अधिवक्ताओं और अभियोक्ताओं से प्रश्न पूछने के स्थान पर सलमान खान को दोषी घोषित न करने के लिए उच्च न्यायालय को भीड़- ताल के कठघरे में खड़ा कर दिया गया|

इस वर्ष में भीड़ ने यह तय किया कि कौन ज्ञानवान, बुद्धिमान, तार्किक, दार्शिनिक, विचारक, कलाकार, लेखक, कवि, संगीतकार, अभिनेता आदि कितना मूर्ख और मंदबुद्धि है| भीड़-तंत्र ने किसी पक्ष को सुने समझे जांचे-परखे बिना निर्णय दिए और न्याय को निर्दयता से समूह-साधन के हवाले कर दिया गया| अवार्ड वापसी के मसले पर देश में सर्वोत्तम विद्वानों को, मात्र मतभेद के आधार पर, शत्रु देश भेजने की व्यवस्था की गई|

वर्ष के अंत समय में हमने देश की सरकार, संसद, लोकतंत्र और राजनीति को भीड़ –ताल के समक्ष घुटने टेकते देखा| अपनी सजा काट चुके एक बाल अपराधी को सिर्फ़ भीड़ – ताल के दबाब में जबरन जेल में बंद रखने के प्रयासों से विश्व में भारत की उस छवि को हानि पहुंची| भीड़ – ताल से समक्ष आत्मसमर्पण करते हुए सरकार और संसद ने बाल न्याय संबंधी कानून में आनन् फानन में ऐसे बदलाव किये जिस से देश की न्याय प्रणाली और विश्व में भारत की न्यायप्रिय छवि को धक्का लगा|

दुर्भाग्य से यह वर्ष, सामाजिक माध्यमों के भीड़ – तंत्र द्वारा न्याय का समूह – साधन करने के लिए जाना जायेगा| इस वर्ष भारत, प्राचीन शास्त्रार्थ व्यवस्था और विचार – विमर्श के विपरीत कट्टरता और विचारशून्यता की ओर कदम बढ़ाता रहा| बीतता हुआ यह वर्ष सुकरात को भीड़ से सहमत न होने के कारण जहर दिए जाने की पुनरावृत्ति का वर्ष है|

I’m sharing my #TalesOf2015 with BlogAdda.

चुप न बैठो…

चुप न बैठो… कोई आवाज उठाओ…

चुप रहना, चुपचाप सहना, हिंसा को बढ़ावा देना है और यौन हिंसा सिर्फ तन को ही नहीं मन को भी पीड़ा पहुंचाती है| यौन हिंसा समाज की गतिशीलता और जिन्दादिली को नुकसान पहुँचाने वाला सबसे बड़ा कारण है| इसलिए हमें, सब स्त्री और पुरुषों को इसके विरुद्ध आवाज उठानी चाहिए|

मुख्यतः कॉर्पोरेट क़ानून के क्षेत्र में काम करने के कारण मुझे कंपनियों के कार्यरत महिलाओं के प्रति यौन हिंसा संबंधी कानून के बारे में कई बार काम करना पड़ता है| इसलिए मैं कंपनियों में कार्यरत महिलाओं के लिए के लिए उपलब्ध कानून के बारे में बात करूँगा| कार्यक्षेत्र में महिलाओं का यौन शोषण (रोकथाम, निषेध, निवारण) अधिनियम २०१३ इस विषय पर प्रमुख कानून है|

कंपनी की यौन हिंसा संबंधी जिम्मेदारी

  • काम के लिए सुरक्षित परिवेश जो कि कार्यरत व्यक्ति को संपर्क ले आने वाले व्यक्तियों से सुरक्षा प्रदान करता हो;
  • कानूनी जानकारी और यौन हिंसा की शिकायत के लिए “आन्तरिक शिकायत समिति” के गठन की जानकारी देना;
  • समय समय पर जागरूकता कार्यक्रम आदि करना;
  • आन्तरिक शिकायत समिति और स्थानीय शिकायत समिति को जाँच के लिए सभी सुविधाएँ उपलब्ध करना;
  • प्रतिवादी और गवाहों के आन्तरिक शिकायत समिति और स्थानीय शिकायत समिति के समक्ष उपस्तिथि सुनिश्चित करना;
  • आन्तरिक शिकायत समिति और स्थानीय समिति को जाँच के लिए आवश्यक सूचनाएं उपलब्ध करना;
  • यदि महिला चाहे तो भारतीय दंड संहिता या किसी और कानून के अंतर्गत शिकायत दर्ज करने में उस को आवश्यक सहायता उपलब्ध करना;
  • भारतीय दंड संहिता या किसी और कानून के अंतर्गत पुलिस या अदालत में दोषी के विरुद्ध प्रारंभिक कार्यवाही करना;
  • यौन शोषण को अपने सेवा नियमों के अंतर्गत दोष मानना; और
  • आन्तरिक शिकायत समिति की रिपोर्ट के समय पर आना निगरानी पूर्वक सुनिश्चित करना| [धारा १९]

यह कानून समान रूप से प्रत्येक नियोक्ता पर लागू होता है|

आन्तरिक शिकायत समिति

प्रत्येक कंपनी एक आन्तरिक शिकायत समिति का गठन करेगी| यह समिति कंपनी के प्रत्येक कार्यस्थल के लिए अलग अलग होगी| [धारा ४]

पीड़ित महिला यौन उत्पीडन की शिकायत अपने कार्यस्थल पर गठित आन्तरिक शिकायत समिति के समक्ष शिकायत कर सकती है| शिकायत घटना के दिन से तीन महीने के भीतर होनी चाहिए| यदि इस तरह की घटना बार बार या कई बार हुई है तो अंतिम घटना के तीन माह के भीतर यह शिकायत होनी चाहिए| वैसे तो शिकायत लिखित में होनी चाहिए, मगर किसी कारण लिखित में न की जा सकती हो तो समिति इसे लिखित में दर्ज करने में महिला की मदद करेगी| समिति को अधिकार है कि यदि परिस्तिथिवश महिला अगर यह शिकायत तीन माह में न करा पाई हो तो उसे तीन महीने के बाद भी दर्ज कर सकते हैं| महिला की शारीरिक या मानसिक अक्षमता, मृत्यु आदि की स्तिथि में उसके कानूनी उत्तराधिकारी शिकायत कर सकते हैं| [धारा 9]

इस आन्तरिक शिकायत समिति को जाँच करने के लिए दीवानी अदालत के कुछ अधिकार भी दिए गए हैं| समिति जाँच के सम्बन्ध में किसी व्यक्ति को बुला सकती हैं और किसी दस्तावेज को प्रस्तुत करने के लिए कह सकती है| समिति को अपनी जाँच शिकायत प्राप्त हों के ९० दिन में पूर्ण करनी होती है| [धारा ११]

समिति जाँच के दौरान महिला की प्रार्थना पर उसके तबादले या सामान्य से अधिक छुट्टियों के लिए आदेश दे सकती हैं| [धारा १२]

आन्तरिक जाँच समिति आरोपी को दोषी पाने की स्तिथि में आदेश दे सकती है कि:

  • सेवा नियम के हिसाब से इसे दोष मान कर कार्यवाही की जाये; या
  • वेतन या मजदूरी में से रकम काटकर पीड़ित को दी जाये|

सालाना रिपोर्ट

कंपनी की आन्तरिक शिकायत समिति प्रत्येक साल एक सालाना रिपोर्ट बनाकर कंपनी और जिला अधिकारी को देगी जो इस रिपोर्ट को प्रदेश सरकार को भेजेगा|

कंपनी का निदेशक मंडल अपनी सालाना रिपोर्ट में कैलेंडर वर्ष में प्राप्त शिकायतों और उनके निपटारे का विवरण देगा| [धारा २२ को धारा २(ग)(दो) के साथ पढने पर]

अंत में

यदि कोई कंपनी या अन्य नियोक्ता अपनी सालाना रिपोर्ट में इस प्रकार की कोई सूचना नहीं देता तो वहां पर न केवल महिलाओं वरन सम्मानित पुरुषों को भी कार्य करने से बचना चाहिए|

“I’m writing this blog post to support Amnesty International’s#KnowYourRights campaign at BlogAdda. You can also contribute to the cause by donating or spreading the word.”

इस दिसंबर – दिल्ली और चेन्नई

प्रकृति एक निर्दय न्यायाधीश है| वो गलतियाँ करने वालों को ही नहीं गलतियाँ करने सहने वालों को भी सजा देती है| चेन्नई में हालत की ख़बरें भी हमारे राष्ट्रीय मीडिया में कदम फूंक फूंक कर आ रहीं है| दिल्ली की हवा में हमनें खुद जहर घोल दिया है और बनिस्बत कि सरकार पर हम दबाब बनायें कि पब्लिक ट्रांसपोर्ट और सामुदायिक यातायात को सुधारा जाएँ हम और हमारी सरकार बचकानी बातों में लगे हैं| दिल्ली और चेन्नई में किसका दुःख ज्यादा है कहना कठिन है; चेन्नई में दुःख सामूहिक और प्रत्यक्ष है जबकि दिल्ली में वो एकल और अप्रत्यक्ष है|

tangytuesday Tangy Tuesday Picks – December 22, 2015

दिल्ली और चेन्नई इस दिसंबर पर्यावरण के साथ मानवीय खिलवाड़ की सजा भुगत रहे है|

 

हम इस दुनिया को अपने लिए जन्नत बनाने का सपना लेकर एक ऐसा स्वप्नलोक रच रहे हैं जो दुनिया को एक चमकीला सुन्दर नरक बना रहा है| भोजन, पानी, हवा और सुरक्षित रिहायश का मूलभूत  सुविधाएँ अब विलासिता के उस चरम पर पहुँचीं है जहाँ वो एक नशा, एक लत, एक फरेब, एक नरक बन जातीं हैं|

क्या हजारों करोड़ के घर में तमाम अत्याधुनिक सुविधाओं में हम रात को उस नींद से अच्छी नींद ले पाते है, जो हजारों –  लाखों साल पहले हमारे आदिवासी पूर्वज लेते होंगे? क्या हम उस प्राकृतिक भोजन से अधिक स्वादिष्ट  – स्वास्थ्यकर भोजन कर पा रहें हैं जो हजारों –  लाखों साल पहले हमारे आदिवासी पूर्वज करते होंगे? क्या हम उस हवा से बेहतर हवा में सांस ले पा रहें हैं जिसमें हजारों –  लाखों साल पहले हमारे आदिवासी पूर्वज लेते होंगे? क्या प्रकृति के क्रोध से हमारे घर उन हजारों लाखों साल पुराने घरों के मुकाबले सुरक्षित हुयें हैं?

सभी प्रश्नों का उत्तर नकारात्मक है| हमारा अत्याधुनिक अँधा विकास सिर्फ मन को समझाने की मानसिक विलासिता है; इसका कोई भौतिक आनंद  – सुख – भोग – विलास भी वास्तव में नहीं है| हम किस विकास के लिए दौड़ रहें हैं; हम किस विकास को आलोचकों से बचाना चाहते हैं|

संसार का एक ही सत्य है: जिन्दगी भर तमाम विकसित भौतिक और मानसिक भोग – विलासों के बाद भी मानव उन आदिम सुखों की ओर भागने के किये भागता है जिन्हें वो नकारना चाहता है: तन और मन की तृप्ति और शान्ति; ॐ शान्ति|

क्या दिल्ली में कारें अपने अधिकांश जीवन बैलगाड़ियों की रफ़्तार से नहीं चलतीं? क्या रफ़्तार हमने बढाई है हमारे विकास ने?

पर्युषण में फल, क्रिसमस में वाइन

सभी धर्मों का आदर किया जाना चाहिए| इसके लिए निजी विश्वास, मान्यता, शौक और लत से भी उठा जाना चाहिए|

शाकाहारी होने के नाते मुझे निजी रूप से इस बात से कोई कष्ट नहीं है कि मांसाहार को पर किसी त्यौहार के नाम पर प्रतिबन्ध लगाया गया है| मगर एक नागरिक होने के नाते मुझे हर किसी के धर्म, आचार, विचार, व्यक्तित्व, आदर, शौक, स्वाद, भोजन आदि की स्वंत्रतता के हित में बोलना चाहिए|

जब भी मेरे मांसाहारी रिश्तेदार मुझे मांसाहार के लिए दबाब डालते है, जब भी मेरे पियक्कड़ मित्र मदिरापान के लिए दबाब डालते है, जब भी मेरे सिनेमा प्रेमी मित्र मुझ पर सिनेमा देखने का दबाब डालते हैं – मुझे कष्ट होता है|

जब भी मेरे रिश्तेदार मुझे स्ट्रीट फ़ूड खाने से रोकते हैं, मेरे मित्र साहित्य पढने से रोकते हैं, मेरे सहयोगी हिंदी बोलने पर टोकते हैं, हितैषी साधारण कपड़े पहने से रोकते है – मुझे कष्ट होता है|

हमें कष्ट होता है जब हमें हमारे हिसाब से जीने के लिए नहीं मिलता| प्रकृति ने हर प्राणी, हर शरीर, हर आत्मा, हर मन, हर सोच को अलग बनाया है| तो हम प्रकृति में हस्तक्षेप नहीं कर सकते| कष्ट होता है|

  • यदि किसी जीव को कष्ट होता है, क्या यह उचित है?
  • यही मेरे कारण किसी और को कष्ट होता है तो यह मेरी हिंसा है|
  • यदि मुझे कष्ट होने से भी किसी को प्रसन्नता होती है तो यह मेरा परोपकार है|
  • यदि मुझे कष्ट न हो इसलिए मैं किसी को प्रसन्न नहीं होने देना चाहता तो यह भी हिंसा है|
  • क्या मांसाहार पर प्रतिबन्ध, मांसाहारी समुदाय के विरुद्ध हिंसा नहीं है?

सिंह और हिरण के जीवन संघर्ष में सिंह प्रकृति से हिंसक है| हिरण कष्ट के साथ मर जायेगा |

हम सिंह और हिरण के जीवन संघर्ष में जब भी हिरण को बचाने की बात करते हैं, तो हम अति हिंसक है, क्योकि उस सिंह के प्रति भी हिंसा कर लेते है जो प्रकृति से ही हिंसक है| हिरण के बचने से सिंह निश्चित ही कष्ट से मर जायेगा|

(कु)तर्क दिया जाता है कि सिंह प्रकृति से मांसाहारी है, मानव नहीं| परन्तु प्रकृति में हमें मांसाहारी मानव  बहुतायत में मिलते हैं और शाकाहारी अपवाद में {भारत जैसे कथित शाकाहारी देश में शाकाहारी मात्र 30% प्रतिशत हैं}| जो भी हो, हम किसी के मन को आहत क्यों करें, क्यों कष्ट दें, क्यों उसके प्रति हिंसा करें??

*** २***

अभी जो प्रतिबन्ध आदि भोजन पर लग रहें है; यह आगे प्रतिक्रिया नहीं देंगे क्या?

अगर पर्युषण पर सभी एक मत के अनुसार सभी भारतीय शाकाहारी रहेंगे तो क्रिसमस पर सभी भारतीय प्रसाद में वाइन क्यों न पीयें? क्यों न दुर्गा पूजा पर सभी बलि का प्रसाद लें? क्यों न ईद पर सभी क़ुरबानी का प्रसाद आदर पूर्वक लें|

भारत हैं, बहुत से धर्म ने ३६५ दिन के एक वर्ष में हम ५०० उत्सव मनाते हैं? क्यों न सभी के भावनाओं का आदर कर कर सभी भारतीय लोग अपनी निजी धर्म, आस्था, विश्वास, मान्यता, शौक और लत से ऊपर उठकर क़ानूनी बंधन के साथ सभी धर्मों का पालन करें? क्यों न हम शाकाहार के उत्सव पर  जबरन शाकाहार और मांसाहार के उत्सव पर जबरन मांसाहार करें?

जिनसे नहीं हो पाएगा वो, दूसरों पर जबरन अपनी खाद्य मान्यताएं न थोपें| शाकाहारी हिंसा न करें|

गदर्भ न्याय

भारतीय पुलिस को के बार आतंकवाद के आरोपी गीदड़  पकड़ने के आदेश मिले| पुलिस वाले बस इतना ही जानती थी कि गीदड़  कोई जानवर होता है| साल भर कुर्सी तोड़ने के बाद भी उन्हें गीदड़  नहीं मिला| एक दिन थाने के सामने घास चरता हुआ गधा मिल गया| तो उसे गीदड़  बना कर पकड़ लिया|

लात घूसे और लाठियां खाते खाते गधे को पता चला कि इन पुलिसियों को गीदड़  चाहिए| तो मार से बचने के लिए उसने खुद का गीदड़  होना कबूल कर लिया| अपराध में अपने शामिल होने के बारे में एक कहानी सुना दी|

सरकारी वकील ने अदालत को बताया हुजूर जानवरों के बारे में लिखी सबसे बड़ी किताब में लिखा है गीदड़  के सींग नहीं होते और पूँछ होती है| जो कि आरोपी के है| तो अदालत ने गधे को गीदड़  करार दे दिया|

इस बीच मंत्रीजी ने लालदीवार से गीदड़  पकड़ने वाले पुलिसियों को पुरुस्कार घोषित कर दिया| उधर अगले दिन वकील सफाई ने दलील दी कि आरोपी के खुर है, जो गीदड़  के नहीं होते| तो मंत्रीसेवकों ने उनको देशद्रोहियों का साथी बताना शुरू कर दिया| देश भर में अपराध पीड़ितों के लिए न्याय की मांग जोर पकड़ गई|

अदालत ने देश की भावना का सम्मान किया और गधे को गधा मानते हुए खुर न होने  की असमानता परन्तु अन्य समानता के आधार पर गीदड़  का भाई और उस के अपराध स्वीकार करने के आधार पर उसको अपराधी घोषित कर दिया|

मोमबत्तीवालों ने बड़ेदरवाजे जाकर मोमबत्ती जलाईं| मंत्रीजी ने पुलिसियों का मोरल डाउन करने के आरोप में मोमबत्ती वालो ने पीछे कुत्ते छोड़ दिए| और पटाखे वालों ने पटाखे फोड़े|

कहानी चलती रही| कहानी चलती रही| कहानी चलती रही| … कहानी यूँ ही चलती रही|

मंत्री जी की कुर्सी सालों साल बैठे रहने से चरमराने लगी| बढई ने बताया कुर्सी ठीक करने के लिए गीदड़  का खून लगेगा| पुलिस ने बताया, हमारे कब्जे में तो गीदड़  का भाई गधा है|

आनन फानन में मंत्री जी, अदालत, पुलिस, मोमबत्ती और पटाखे हरकत में आये|

****

अख़बार ने लिखा “नरक में जा गधे|” गीदड़  ख़ुश हुआ| मोमबत्ती और पटाखे बिके| मंत्री जी ने बिरयानी खाई| पुलिस का मोरल आसमां से चिपक गया| कुछ गधों को कुछ यकीन आया|

बाद में एक किताब आई….

क़ानून पर आम भारतीय नजरिया

क़ानून के हाथ लम्बे होते हों या न हों उसका डंडा बहुत लम्बा, मजबूत, कंटीला और कठोर होना चाहिए, जिस से कि पडौसी का सिर एक बार में फूट जाये| आज डंडे का जमाना नहीं है तो आप रिवाल्वर या रायफल कर लीजिये| मगर यह एक आम भारतीय नजरिया है|

दूसरा फ़लसफा खास भारतीय यह है कि क़ानून एक भैंस है जिसे कोई भी अपनी लाठी से हांक सकता है बशर्ते उसकी लाठी उस चौकी, थाने, जिले या सूबे में सब पर भारी होनी चाहिए| इस फ़लसफ़े का दूसरा तर्जुमा है, क़ानून एक ऐसी रांड है जिसे कोई भी अपनी रखैल बना कर उसका मजा मार सकता है|[i]

तीसरा और सबसे खास भारतीय क़ानूनी फ़लसफा ये है कि अगर क़ानून की बात हो तो उसमें अपना सिर नहीं अड़ाना चाहिए| इसलिए हम भारतीय ऊपर लिखे सभी फ़लसफ़ों को दिल से लगाकर रखते है और तब तक ज़ुबान पर नहीं लाते| इसीलिए भारतीय पडौसी का सिर और अपना पिछवाड़ा फूटने तक चुप रहते है और हाकिमों के तलवों ने सिर छिपाए रखते हैं|

अब साहब अगर इन सादा सरल फ़लसफ़ों को समझने में कोई दिक्क़त तो तो कुछ वाकये सुनते हैं, जो कुछ दूर पास का ताल्लुक इन फ़लसफ़ों से रखते हैं| क़ानूनन आपको को बता दे कि सभी वाकयात एकदम बेहूदा और वाहियात हैं और उनका किसी सच से कोई ताल्लुक नहीं है| अगर आपको सच लगें तो ऊपर लिखा तीसरा फ़लसफ़ा दोबारा पढ़ें|

जब क़ानून किसी किसी कुर्ता- पायजामा को जूते पहना रहा हो या कुर्ता – पायजामा क़ानून के जूते बजा रहा हो तो आपके पास दूसरा फ़लसफ़ा पढने का वक़्त नहीं है| आप अगर शरीफ़ हैं तो चुपचाप घर जाकर बच्चों को कबीरदास का “सांच बराबर तप नहीं” वाला दोहा सुनाएँ| अगर आप झाड़ पौंछ शरीफ़ हैं तो कुर्ता – पायजामे का रंग देखें| अगर आपका और उसका रंग एक है तो भारत माता की जय बोलें और अगर रंग अलग है तो उसका फ़ोटो और फोटोशॉप सामाजिक क्रांति के लिए प्रयोग कर दें|

अगर क़ानून किसी अदालत में गोल गोल घूम रहा है तो दूसरा फ़लसफ़ा जेहन में आता है| अदालतें लाठी वालों का पिकनिक स्पॉट हैं जहाँ क़ानून की भैंस हर कोई दुहता है|

सूट बूट हिंदुस्तान में सबसे ताकतवर होता है| सूट बूट का दिमाग उतना ही वातानुकूलित रहता है जितना उसके फार्महाउस का अय्याशखाना| यह हमेशा तफ़रीह के सीरियस मूड में रहता है और क़ानून खुद-ब-खुद इसकी बाँहों में| क़ानून इसके भाव – भंगिमा को खूब पहचानता हैं और हमेशा एक खास तरह में मूड में रहता है| अब, दूसरा फ़लसफ़ा का दोबारा न पढ़े|

अब बात आती है इस पूरी बकवास से मतलब क्या निकल रहा है| हमारे मुल्क में जो बात सबको पता हो, उसे बताना बकवास ही तो है| रे भाई, बताया था न, अगर क़ानून की बात हो तो उसमें अपना सिर नहीं अड़ाना चाहिए|

बाकि जो मतलब जो बकबास है वो अगली बार बताई जाएगी| तब तक क़ानून से बचकर रहें| सलामत रहें और हमेशा की तरह ऑफिस में सूट – बूट और सोशल मीडिया पर कुर्ता – पायजामा के सामने नतमस्तक रहे| अपने ईश्वर और ईमान को औक़ात में बनाये रखें|

[i] सुसंस्कृत अनुवाद:- “भारत की सर्वमान्य नगरवधु विधि, समस्त योग्यजन के लिए प्रसन्नताकारक होती है|”

गुनाहों का दैत्य

पता नहीं क्या कारण रहा कि कई सालों से मैं धर्मवीर भारती का लोकप्रिय उपन्यास “गुनाहों का देवता” पूरा नहीं पढ़ पाया| एक कारण शायद रहा कि जब भी मैं इसे पढ़ना या पुनः पढ़ना शुरू करता, अपने को सुकोमल भावनाओं के भंवर में पाता| मगर इसका फायदा यह भी है कि अब जब गुनाहों का देवता पूरी तरह ख़त्म करने का दृढ निश्चय किया तो माहौल अलग था|

भारत सरकार ने पिछले दिनों पति द्वारा पत्नी के साथ जबरन यौन सम्बन्ध बनाने के कृत्य  को अपराध की श्रेणी में लाने से मना कर दिया| राष्ट्र के सभी प्रबुद्ध जन इसे अपराध की श्रेणी में लाने की मांग कर रहे है मगर देश में पुरुषवाद उसी तरह हावी है जिस प्रकार महिला आंदोलनों पर महिलावाद| क़ानून के दुरूपयोग, व्यावहारिक कठिनाइयाँ, एकतरफ़ा अपराध, और परंपरा के नाम पर घिनौने अपराध को प्रश्रय देने का जो प्रयास हाल में हुआ उतना तो शायद भारत में कभी नहीं हुआ हो|

ऐसे समय में गुनाहों के देवता का पाठ मुझे उस पड़ाव पर ले गया जहाँ शायद में अन्यथा नहीं पहुँच पाता| यह कालजई उपन्यास सालों पहले लिखी गई मध्यवर्गीय जीवन की एक पवित्र प्रेम कथा है| इसमें आदर्श का दामन थामने वाले पात्र घुटन का जीवन जीने हुए अपने जमीर को मारते और खुद मरने लगते है| प्रेम वास्तविकता की वेदी पर बलि हो जाता है| मगर यह उपन्यास वैवाहिक बलात्कार को हाशिये से उठाकर कथानक के मध्य में लेकर आता है|

“हाथों में चूड़े अब भी थे, पाँव में बिछिया और माँग में सिन्दूर – चेहरा बहुत पीला पड़ गया था सुधा का; चेहरे की हड्डियाँ निकल आयीं थीं और आँखों की रौशनी भी मैली पड़ गयी थी| वह जाने क्यों कमजोर भी हो गयी थी|”

यह तो वर्णन की शुरुवात है| भारती जी उपन्यास को लिखते समय वैवाहिक बलात्कार पर नहीं लिख रहे है इसलिए बहुत साधारण और तटस्थ वर्णन मिलता है मगर स्तिथि कि गंभीरता को समझा जा सकता है| यह उपन्यास उस लेखक ने लिखा है जो गहराई और गंभीरता से लिखता है मगर ग्राफ़िक डिटेल्स में नहीं जाता|

“हाँ सब यही समझते हैं, लेकिन जो तकलीफ है व मैं जानतीं हूँ या बिनती जानती है|” सुधा ने गहरी साँस लेकर कहा – “वहाँ आदमी भी बने रहने का अधिकार नहीं|”

एक भारतीय लड़की और कितना कह सकती है| शायद उसे दब कर बोलना ही सिखाया गया है| अगर वो बोलती भी है तो उसे क्या जबाब मिलता है वह और भी निंदनीय है|

“और जहाँ तक मेरा ख्याल है वैवाहिक जीवन के प्रथम चरण में ही यह नशा रहता है फिर किसको यह सूझता है| आओ, चलो चाय पीयें|”

मुझे इस बात की प्रसन्नता हो रही है कि इस बात में “मेरा ख्याल है” जोड़ा गया है| आज कल के सामाजिक धीर-वीर तो सीधे फ़तवा ही दे देते हैं| मगर ख्याल हक़ीकत नहीं होते| हक़ीकत कुछ और होती है| स्तिथि की भयाभयता का बयान करना कई बार बहुत कठिन होता है|

“मैं क्या करूँ, मेरा अंग – अंग मुझी पर व्यंग कर रहा है, आँखों की नींद ख़तम है| पाँवों में इतना तीखा दर्द है कि कुछ कह नहीं सकती| उठते बैठते चक्कर आने लगा है| कभी – कभी बदन काँपने लगता है| आज वह बरेली गए हैं तो लगता है मैं आदमी हूँ|”

वैसे तो उपरोक्त वर्णन पढ़ने में बहुत कुछ कहता है मगर हमारा पुरुषवाद “मार लेने”, “फाड़ देने” और “ऐसी – तैसी करने” की मर्दवादी परंपरा से बंधा होने के कारण इस वर्णन में मात्र पुरुष की मर्दानगी का गौरव ही देख सकता है| लेकिन एक बहुत महत्वपूर्ण टिपण्णी इस उपन्यास में सुधा करती है| यह टिपण्णी हिन्दू धर्म की आड़ लेकर देश भर में इस कृत्य को बढ़ावा देने वालों के मूंह पर तमाचा है|

“हिन्दू – गृह तो एक ऐसा जेल होता है जहाँ कैदी को उपवास करके प्राण त्यागने की भी इजाजत नहीं रहती, अगर धर्म का बहाना न हो|”

हमारे सामाजिक धीर – वीर कह सकते है कि अलां और फलां के बारे में कुछ क्यों नहीं कहा| उत्तर सिर्फ इतना है कि पात्र हिन्दू है और अपने धर्म के बारे में ही तो बोल सकते हैं| अगर किसी को इस से संतोष नहीं होता तो उनसे विनती है कि सरकार ने हिन्दू धर्म की आड़ लेकर ही तो इस कृत्य को अपराध घोषित करने से मना किया है| क्या हम सरकार से कहेंगे कि हिन्दू धर्म की आड़ लेकर ग़लत कार्यों को बढ़ावा न दें?

उपन्यास में इस बात की भी बानगी मिलती है कि इंसान जब इंसानियत से गिरना शुरू करता है तो कितना गिरता चला जाता है| सुधा का गर्भपात हो गया है| बचने की उम्मीद नहीं है| बार बार बेहोशी आ रही है| इसी क्रम में उसके मूंह से निकलता है|

“अब क्या चाहिए? इतना कहा, तुमसे हाथ जोड़ा, मेरी क्या हालत है? लेकिन तुम्हे क्या? जाओ यहाँ से वरना मैं अभी सर पटक दूँगी…”

पता नहीं वैवाहिक बलात्कार इस उपन्यास के केंद्र में क्यूँ नहीं दिखाई पड़ता| मुझे एक बार लगा कि भारती जी एक बहुत ही बड़ी टिपण्णी इस उपन्यास के माध्यम से वैवाहिक बलात्कार पर करना चाहते होंगे मगर उस समय उन्हें यह बात सामाजिक और राजनितिक रूप से समय से सदियों पहले की बात लगी होगी| अगर “गुनाहों का देवता” “गुनाहों के दैत्य” को केंद्र में रख कर लिखा गया होता तो शायद प्रतिबंधित पुस्तकों की सूची में कहीं पड़ा होता| उन्हें मंटो और चुगताई की तरह कोसा जाता| मगर यह उपन्यास बताता है कि वैवाहिक बलात्कार की बात भारत में कोई आयातित बात नहीं है| बार बार उठती रही है और तब तक उठेगी, उठती रहेगी  जब तक यह अपने अंजाम तक नहीं पहुँचती|

 

बदनामी बंद है

बदनामी बंद है

 

 

बदनामी बंद है|
जो भी कुछ कहा सुना गया, सुना गया है कि बदनामी है|
किसी को नहीं पता किसने क्या कहा, किसने क्या सुना|
सबको पता है, खलनायक ने क्या कहा, अपराधी ने क्या कहा, बलात्कारी ने क्या कहा|
हमें नहीं सुनना है कि बलात्कारी के अलावा किसी और ने क्या कहा, क्या समझा, क्या सोचा|
देश के ऊपर अपनी बदनामी देखने पर प्रतिबन्ध है, हम नहीं देखना चाहते|
दुनिया जहाँ सब देखें, “कैसे है हम”, या मर्जी हो तो न देखे|
हम वैसे नहीं है जैसा वो खलनायक, अपराधी है, बलात्कारी है|
मगर हम अपनी तरफदारी नहीं कर सकते|
हमें नहीं पता; हमें बदनाम किया गया है या नहीं|

नहीं पूछना मुझे सवाल किसने किसको जेल में घुसने दिया|
नहीं पूछना मुझे सवाल टीवी यूट्यूब पर कौन देख रहा है|
नहीं पूछना मुझे यह सवाल वह सवाल|

बंद है, प्रतिबन्ध है| बदनामी बंद है|

 

 

1

 

हमारी सोलर लालटेन

 

लगभग पंद्रह साल पहले की बात है| अलीगढ़ शहर के बाहरी इलाके में पिताजी ने अपना मकान शुरू कराया था| जब नींव तक काम पहुँचा तो बिजलीघर के चक्कर भी लगने शुरू हो गए| पिताजी की व्यस्तता के कारण भागदौड़ मेरे ऊपर पद गई| सब- स्टेशन से लेकर विभाग के जिला कार्यालय तक के रास्ते, वहाँ के फूल –पत्ती, पान के निशान और सिगरेट के धुँए तक से पहचान हो गई| मगर तीन महीने की भागदौड़ के बाद भी नतीजा शून्य का शून्य; जिस ओवरसियर या जूनियर इंजीनियर साहब को काम करवाना था वो बहुत व्यस्त रहा करते थे| उधर घर पर छत भी पूरी होने लगी थी| पड़ोसियों से उधार ली गईं बिजली से काम चलाया जा रहा था| कुछ लोगों ने कटिया प्रबंधन की सलाह दी; ये दोनों ही कार्य क़ानूनन गलत हैं|

जैसे जैसे मकान का काम पूरा होता जा रहा था, हमें इस मकान में रहने की जल्दी होने लगी| बिजली का प्रबंध नहीं था और पिताजी कटिया प्रबंधन के विरुद्ध थे| उस समय दो घटनाएँ एक साथ हुईं| एक तो मुझे एक चपरासी ने बताया कि जूनियर इंजीनियर साहब पान और सिगरेट का शौक है तो अगर उन्हें पान खिलाओ तो उस दौरान बात हो सकती है| दूसरा, पापा को सोलर लालटेन के बारे में पता लगा| उत्तर प्रदेश सरकार ग्रामीण इलाकों में उस पर सब्सिडी दे रही थी| भाग्यवश हमारा नया घर ग्राम पंचायत के अधीन था| जो भी माँग रहा था उसे सब्सिडी पर सोलर लालटेन मिल रहीं थीं या कहें कि जानकारी होने पर जो सोलर लालटेन माँग रहा था केवल उसे ही सोलर लालटेन मिल रही थी; हमें भी मिल गए| कुल जमा तीन या चार हजार रुपये में| ये बात अलग है कि मुझे कभी भी नहीं लगा की उसकी वास्तविक कीमत उस से ज्यादा होगी|

पहला काम हुआ की सोलर लालटेन के भरोसे हमने नए घर में प्रवेश किया| गर्मीं में भी नया घर ठंडा था और दिन में चार्ज हुई लालटेन आधी रात तक आराम से काम करती थी| दूसरा हमने जूनियर इंजीनियर साहब को तम्बाकू का बढ़िया पान खिलाने के लिए ले चलने में सफलता प्राप्त कर ली| पान खिलाकर हम बेचैन से चुप थे और जूनियर इंजीनियर साहब पान में मगन| थोड़ी देर बाद बोले; कब चलना हैं? हमने कहा, जब समय हो| बोले; जल्दी नहीं है, मई का महीना है| जल्दी तो है मगर आप कब समय दे पाएंगे| बोले; हमारा क्या; ब्राह्मण आदमी हैं, जब खीर पूरी खिलाओगे चल पड़ेंगे| हमने कहा कल चलिए| बोले; खीर पूरी का इंतजाम हो जायेगा| हमने कहा; हाँ| बोले; ठीक है, कल आते हैं|

अगले दिन हमने जूनियर इंजीनियर साहब साहब को भोजन पर बुलाया| मगर समस्या हफ्ते भर तक जस के तस बनी रही| एक दिन पूछने पर बोले; भोजन तो ठीक है मगर दान दक्षिणा भी तो होनी चाहिए थी| मैं चुप रहा तो बोले तुम कटिया डालते हो| मेरे मना करने धमकाने लगे| अगर पकड़े गए तो जेल भेजेंगे| सारी शराफ़त की बत्ती बना देंगे| जब बहुत हो गया तो हमने भी बोल दिया, अगर हफ्ते भर में नहीं पकड़ पाए हमारी कटिया तो अगले रोज हमारी बिजली लगवा देना| अकड़ और क्रोध में साहब सबके सामने वादा कर बैठे| सातवें दिन रात दस बजे दरवाजा खटका| सोलर लालटेन को इंजीनियर साहब के दर्शन हुए और बोले कल बिजली लगने के कागजात पूरे करवा लेना|

बिजली तो लगी मगर उस बिजली का झटका साहब को बड़ा तेज लगा था| पूरे छः महीने बिजली के बिल के हमें दर्शन नहीं हुए| नवम्बर में बिजली काटने का नोटिस था शायद पच्चीस हजार रुपये का| एक हफ्ते में बिजली कट गई| मगर हमारी सोलर लालटेन अब भी रात को काफी टाइम काट देती थी| इस समय हमें सोलर लालटेन का सहारा था|

पिताजी उसी समय नौकरी से फारिग हो लिए थे और वकालत का मन बना रहे थे| पहला नोटिस तैयार हुआ बिजली विभाग के खिलाफ| उपभोक्ता अदालत में मुकदमा लड़ा गया| कागज साफ़ थे, घरेलु कनेक्शन पर कमर्शिअल का बिल दिया गया था| जो कागज थे, सभी कागज सरकारी थे| एक पक्ष खुद सरकार थी और दूसरा हालिया रिटायर्ड सरकारी अधिकारी| पहले ही दिन बिजली के  वकील को बहुत सुननी पड़ी| वकील साहब अदालत के बाद अपने साथ पिताजी को एग्जीक्यूटिव इंजीनियर के कार्यालय ले गए| पिताजी को जूनियर इंजीनियर के ऑफिस जाकर इंतजार करने के लिए बोला गया|

बुड्ढे मुर्गे तो थका हारा आये हुए देख कर वहाँ सारा स्टाफ़ मुस्कुरा रहा था| जूनियर इंजीनियर साहब ने खुद उठ कर मजाकिया अंदाज में पानी का गिलास बढ़ाया| बोले; अदालत में क्या तोप तीर मार आये साहब| आप के बस का नहीं है ये रोग और न ही बिजली लगवाना| तभी एग्जीक्यूटिव इंजीनियर अपनी जीप से उतरा और बिजली के वकील साहब भी| वकील साहब ने अपनी वो जिरह शुरू की कि सबके छक्के छूट गए, अब पिताजी उन्हें पानी पिला रहे थे|

थोड़ी देर बाद जूनियर इंजीनियर ने खुद सीढ़ी चढ़कर हमारी बिजली जोड़ी| सारा मोहल्ला और बिजली विभाग के अधिकारी मौजूद थे| दो हफ्ते बाद अदालत में विभाग ने बिजली जोड़ दिए जाने की सुचना दी तो भी अदालत को संतुष्टि नहीं हुई| हमें पिछला बिल नहीं देना था और साथ में इतना मुआवजा मिला कि हमें अगले कई महीने बिजली का बिल नहीं देना पड़ा| जूनियर इंजीनियर साहब को खर्चा कर कर अपना तबादला दूसरी जगह करवाना पड़ा|

सोलर लालटेन लगभग आठ साल तक ठीक चली और बिना नागा रोज पांच छः घंटे सौ वाट के बल्ब के बराबर रौशनी देती रही|

पुनश्च: पिताजी इस ड्राफ्ट को पढ़ कर कह रहे हैं, अब तो ठीक करा दे| बिजली के दाम भी बढ़ने वाले हैं|

निदेशक पहचान संख्या (Director Identification Number)

हाल में सुब्रमणियास्वामी ने प्रियंका गाँधी वाड्रा के विरुद्ध एक से अधिक DIN रखने के आरोप में शिकायत दर्ज की है| इसके बाद उन्होंने कारती चिदंबरम के विरुद्ध भी शिकायत दर्ज कराई| पहले यह चुनावी मामले लगते थे, परन्तु चुनावों के बाद भी DIN को लेकर उठा विवाद थम नहीं रहा है| सभी दल रोज नए लोगों पर DIN सम्बन्धी आरोप लगा रहे हैं|

हाल में दो मंत्रियों नितिन गडकरी और पियूष गोयल के ऊपर भी यही आरोप लगाये गए|

अभी ३१ मार्च २०१४ तक, एक से अधिक DIN रखना या उनके लिए प्रार्थना करने के लिए पांच हजार रुपये तक के दंड का प्रावधान था और अगर यह गलती ठीक नहीं की जा सकी तो पांच सौ रूपए प्रतिदिन के हिसाब से अतिरिक्त दंड लगता था| इस सजा को अब बढ़ा कर छः महीने की कैद और पचास हजार रुपये तक के जुर्माने के रूप में बढ़ा दिया गया है| साथ में अतिरिक्त दण्ड भी लगता हैं|

जब मैंने स्वयं इन आरोपों को जांचा तो पाया कि इस प्रकार के सभी DIN में कुछ समानता थी| आइये समझें|

पहले आवेदक द्वारा DIN के लिए ऑनलाइन प्रार्थनापत्र भरना पड़ता है, जिस से एक प्रोविजनल DIN मिलता है| इस प्रोविजनल DIN के साथ ही प्रार्थना पत्र को छापकर, सभी जरूरी कागजात लगाकर, पैसा जमा करने के सबूत के साथ जमा कराया जाता है| कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय का DIN विभाग इस DIN को अंतिम अनुमति देता हैं|

अनुभव के आधार पर मैं जानता हूँ कि स्वीकार होने वाले प्रार्थना पत्रों से अधिक अस्वीकार होने वाले प्रार्थना पत्र हैं| संलग्न कागजन में पिता के नाम का अंतर, वर्तनी सम्बन्धी गलती, या और भी कई अन्य कारण है जिनके कारण प्रोविजनल DIN नामंजूर होता है| यह सभी DIN मंत्रालय के पोर्टल MCA21 पर आवेदक के नाम पर दिखाई देते हैं| मगर अभी और भी कुछ जानना शेष है|

यदि आवेदक से फॉर्म भरते समय कोई गलती सूचना भर गयी, अथवा लिखने में कुछ गलती हो गयीं, तो भी प्रोविजनल  DIN दे दिया जाता है| कई बार आवेदक फॉर्म भरने के बाद आगे कार्यवाहीं नहीं करता, तो भी प्रोविजनल DIN दे दिया जाता है| आवेदक का प्रोविजनल DIN हर हाल में मंत्रालय के पोर्टल पर दिखाई देता है, तब भी जब अंतिम और मान्य DIN मिल जाये|

इसके कई परिणाम होते हैं:

१.       मंत्रालय पोर्टल् पर आवेदक के नाम से कई DIN दिखाई देते हैं;

२.       जल्दी मंत्रालय के पास प्रयोग किये जाने लायक DIN समाप्त हो जायेंगे|

मंत्रालय के एक उच्च अधिकारी ने अभी हाल में बताया कि पोर्टल पर एक से अधिक DIN दिखाई देना, किसी आवेदक को गलत साबित नहीं करता है|

कई विचार – विमर्शों के बाद मैंने पाया कि हमें कुछ बातों का ध्यान रखना होगा:

१.       एक PAN पर एक ही DIN मिल सकता हैं|

२.       एक से अधिक DIN किसी गलत तरीके से ही मिल सकते हैं जैसे फर्जी या एक से अधिक PAN|

३.       अगर कोई व्यक्ति एक से अधिक DIN प्रयोग कर रहा है तो यह उसकी गलती का सबूत है|

अपनी स्तिथि को साफ रखने के लिए हम, सूचना का अधिकार प्रयोग कर कर अपने DIN के बारे में सही स्तिथि को पता कर सकते हैं|

कॉर्पोरेट भारत के नाम पत्र

कॉर्पोरेट भारत के प्रिय हितधारक,

दुनिया के सबसे जीवंत कॉर्पोरेट समूह के रूप में आप हाल के समय में सत्यम, सहारा और सारधा जैसे अप्रिय उदाहरणों के बारे में जानते हीं हैं| इन घटनाओं से भारतीय संसद में भी चिंता के स्वर सुनाई पड़े हैं| कंपनी अधिनियम २०१३ के मूल सिद्धांतों में इन घटनाओं का प्रभाव महसूस किया जा सकता है| आज हमारे पास विश्व के कुछ सबसे अच्छे कॉर्पोरेट प्रशासन और सामाजिक जिम्मेदारी मानदण्ड हैं|

हमारा कानून कंपनियों को कुछ विशेष कानूनी सुरक्षा और लाभ प्रदान करता है| इसके बदले कंपनियों पर वित्तीय और गैर वित्तीय रिपोर्टिंग के माध्यम से नजर रखता है| कानून में वित्तीय रिपोर्टिंग के लिए संविधिक लेखा परीक्षा एवं गैर – वित्तीय रिपोर्टिंग के लिए सचिवीय दस्तावेज परीक्षा की व्यवस्था है जो कि एक कार्योत्तर सत्यापन हैं| इसके अलावा स-समय नियंत्रण की भी व्यवस्था है, जिसमें कानूनी रूप से पूरी तरह से जिम्मेदार पेशेवर पूर्णकालिक कंपनी सचिव की कंपनी में आवश्यक नियुक्ति शामिल है; जिस से न सिर्फ कंपनी पर कानूनी नियंत्रण रहे बल्कि कंपनी को सही समय पर कानूनी प्रकियाओं की अधिकतर जानकारी भी मिल सके| पिछले कई वर्षों में, इस बात की भी व्यवस्था रही है कि स्वतंत्र पेशेवर लोग कंपनी दाखिल किये जाने वाले प्रपत्रों और विवरणी (Forms and Returns) का पूर्व प्रमाणीकरण करें|  

कंपनी अधिनियम २०१३ बेहतर कंपनी प्रशासन का अधिदेश (mandate) देता है परन्तु बहुत सारी बातें सरकारी अधिकारियों द्वारा बनाये जाने वाले अधीनस्थ विधान के लिए छोड़ दी गयीं है| यह नौकरशाहों द्वारा मन मने नियम बनाये जाने से आपदा का कारण हो सकता है| दुर्भाग्य से, हमें इस नए कंपनी अधिनियम के लागू होने के प्रथम चरण में ही उस विपत्ति का सामना करना पड़ रहा है|

सबसे पहली बात; यह कानून कंपनियों में मुख्य प्रबंधकीय कर्मियों की नियुक्ति का अधिदेश देता है| पूर्णकालिक कंपनी सचिव पिछले काफी लम्बे समय से इस विशिष्ठ कर्मी समूह का हिस्सा रहा है| हाल में बनाये गए कंपनी नियमों में कंपनी कार्य मंत्रालय ने पूर्णकालिक कंपनी सचिव की आवश्यक नियुक्ति की निचली सीमा को बढ़ाकर दस करोड़ रूपए की चुकता पूंजी (paid – up capital) कर दिया है| साथ ही निजी कंपनियां (Private Companies) भले ही कितने ही बड़े आकर की हों, उन्हें इस नियुक्ति से छूट दे दी गयी है|

हाल के अनुभवों से पता चलता है कि दो करोड़ से अधिक की चुकता पूंजी वाली किसी भी कंपनी में, भले ही वो निजी कंपनी हो या सार्वजानिक; आम जनता के हित काफी जोखिम में रहते हैं| इस समय निजी कंपनियों को दी गयी छूट के जोखिम इस प्रकार हैं:

(१)   निजी कंपनियां जिस विशेष निजता का लाभ काफी समय से ले रहीं थीं, कंपनी अधिनियम २०१३ उसमें कटौती करता है, परन्तु मंत्रालय ने संसदीय अधिदेश के विरुद्ध जाते हुए कंपनी नियमों में उसे उलटने का प्रयास किया है|

(२)   अधिकतर निजी कंपनियां बहुराष्ट्रीय कंपनियां हैं| यह ध्यान देने वाली बात है कि इन विदेशी कंपनियों को भारतीय क़ानून को समझने और उन कंपनियों पर स–समय नियंत्रण रखने के लिए पूर्णकालिक कंपनी सचिव की आवश्यकता है|

दूसरी बात; भारतीय संसद ने कंपनी अधिनियम २०१३ में सचिवीय दस्तावेज परीक्षा का प्रावधान किया है| मंत्रालय ने इस संसदीय अधिदेश को हल्का करने का प्रयास किया है| मंत्रालय द्वारा बनाये गए नियम कहते हैं कि सचिवीय दस्तावेज परीक्षा केवल केवल सार्वजनिक कंपनियों में होगी जिनकी चुकता पूंजी पचास करोड़ रूपए अथवा कारोबार दो सौ करोड़ रुपये हो| न केवल इस सीमा से नीचे की कंपनियां बल्कि सभी निजी कंपनियां, भले ही वो कितनी भी बड़ी क्यूँ न हों, सचिवीय दस्तावेज परीक्षा के दायरे से से  बाहर कर दीं गयीं हैं|

इन दिनों सारे विश्व में यह माना जाता है कि गैर वित्तीय रिपोर्टिंग भी वित्तीय रिपोर्टिंग के बराबर ही महत्वपूर्ण है| ऐसे में सचिवीय दस्तावेज परीक्षा को क्यूँ जरूरी नहीं माना गया? दूसरी तरफ, वित्तीय रिपोर्टिंग के लिए संविधिक लेखा परीक्षा बिना किसी चुकता पूंजी, कारोबार और लाभ की सीमा के सभी कंपनियों में अनिवार्य है| यहाँ तक की बहुत सी कंपनियों में वित्तीय पहलुओं की आंतरिक लेखा परीक्षा भी जरूरी बना दी गयी है|

तीसरी बात; कंपनी कार्य मंत्रालय ने अपने ई-प्रशासन पहल के तहत स्वतंत्र पेशेवर द्वारा प्रपत्रों के पूर्व प्रमाणीकरण की शुरुवात की थी| इस पहल के तहत इन पूर्वप्रमाणीकृत प्रपत्रों को नौकरशाही के किसी भी हस्तक्षेप के बिना रिकॉर्ड पर ले लिया जाता है और उसे क्षणभर में आम जनता के लिए उपलब्ध करा दिया जाता है| इस पहल से मंत्रालय द्वारा कॉर्पोरेट भारत को दी जाने वाली सेवाओं में काफी सुधार हुआ था और नौकरशाही प्रक्रियाओं में कमी आई थी|

स्वतंत्र पेशेवरों द्वारा पूर्व –प्रमाणीकरण की आवश्यकता को हटाने के साथ इस सभी प्रपत्रों को नौकरशाही जाँच प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ेगा| इस से नौकरशाही की ‘विवेकशील” शक्तियों में वृद्धि होगी और मुस्तैदी में कमी आएगी| कंपनियों द्वारा अपलब्ध कराइ गयीं सूचनाएं जनता के लिए तुरंत उपलब्ध नहीं हो पाएंगी बल्कि उनमें कम से कम एक महीने का समय लगा करेगा| इस से कॉर्पोरेट सुशासन व्यवहार पारदर्शिता में बेहद कमी आएगी|

इस सन्देश के माध्यम से, मैं आप सभी से न केवल अपने व्यक्तिगत विचार साझा कर रहा हूँ बल्कि आप सभी से तुरंत ही सुधारात्मक उपायों के लिए मंत्रालय पर दबाब बनाने का आग्रह कर रहा हूँ|

आपका

ऐश्वर्य मोहन गहराना

पुनश्च: भारतीय कंपनी सचिव संस्थान द्वारा कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय को भेजे प्रतिवेदन में जिन कानूनी पहलुओं की चर्चा की गयी है उन्हें हम यहाँ , यहाँ और यहाँ  देख सकते हैं|

समर्पण और सतीत्व

भारतीय पुरुष सत्ता स्त्री को समर्पण का प्रतीक ही नहीं समर्पण को उसका परम पवन कर्तव्य मानती आई है| स्त्री के समर्पण का मुहावरा इस कदर पुरुष सत्ता के सर पर सवार है कि हमारे बलात्कारी भाई भी यह चाहते हैं उनकी शिकार पवन पावन स्त्री उसके सामने थोड़े बहुत विरोध के बाद अपने सतीत्व का समर्पण कर दे|

समर्पण का यह मुहावरा ब्रिटिश द्वारा थोपे गए भारतीय कानून में भी शामिल है जहाँ यह माना जाता है कि स्त्री को हर समय पति के सामने समर्पण किये रहना चाहिए| इस क़ानून के अनुसार पति की (कामेच्छा ही नहीं) वासना की पूर्ति को पत्नी द्वारा अपना ईश्वरीय कर्तव्य समझना चाहिए|

क्या यौन सम्बन्ध भारतीय परंपरा के अनुसार विवाह की आवश्यक शर्त या कर्तव्य हैं? यदि किसी भी धर्म की बात करें तो प्रजनन के लिए बनाये गए यौन संबंधों के अतिरिक्त अन्य सभी यौन सम्बन्ध छाए वो पत्नी के साथ बने हो या वैश्या के, पाप हैं| ऐसे में पत्नी का “यौन समर्पण” धर्म/ ईश्वरीय आदेश कैसे हो सकता है? बल्कि प्रजनन – इतर सभी संबंधों को रोकना पति – पत्नी का प्रथम कर्म होना चाहिए था|

प्रसंगवश कहता चलूँ; भारतीय परंपरा के अनुसार, विवाह यौन सम्बन्ध, शारीरिक सम्बन्ध और  मानसिक सम्बन्ध नहीं है अपितु जन्म जन्मान्तर का आत्मिक सम्बन्ध है| तो इसमें यौन समर्पण की बाध्यता का प्रश्न कहाँ से आ सकता है? यौन शुचिता और ब्रह्मचर्य के प्रश्न भी मात्र आत्मिक उन्नति के मार्ग को प्रशस्त करने के लिए ही आते हैं|

परन्तु यौन समर्पण की बाध्यता इस तरह भारतीय स्त्री मानस पर भी इस तरह से अंकित है कि उसे यौन क्रिया में एक समर्पित निष्क्रियता का प्रदर्शन करना होता है| यदि आप बात करें तो पाएंगे कि बहुत से पुरुष निजी क्षणों में स्त्री की सक्रियता, समर्पण के अनुरूप को सही नहीं मानते| उन्हें लगता है कि स्त्री समर्पण करने की जगह उनको भोगने का प्रयास कर रही है| समर्पण की यह मूर्खतापूर्ण इच्छा उनकी पुरुषसत्ता के अहम् को तो शांत कर देती है परन्तु वास्तव में उनके पुरुष की तृप्ति नहीं हो पाती|

यह पुरुष, पुरुषसत्ता के अहम् के साथ घर की “सभ्य सुशील समर्पित घरेलू” स्त्री को छोड़ कर बाहर की “फुलझड़ी – पटाखा” स्त्री को दबोचने में लग जाते हैं| जब भी यह “फुलझड़ी – पटाखा” स्त्री समर्पण नहीं करती तो पुरुषसत्ता बलात्कार के रूप में अपना घिनोना रूप दिखाती है| क्या यह कारण नहीं है कि सभ्य समर्पित पत्नियों के इस देश को सारा विश्व असभ्य बलात्कारियों का देश समझता हैं? क्यों काम–सूत्र का देश बलात्कारी-पुत्र का देश हो गया है?

पाप और अपराध

 

धर्म का लक्ष्य हमें मोक्ष की ओर ले जाना हैं| यदि हम ध्यान से समझें तो धर्म का अंतिम लक्ष्य सृष्टि के समस्त जीव; मानव, पशु, कीट, पादप, जीवाणु और विषाणु को मोक्ष दिला कर सृष्टि को समापन तक ले जाना है|

क्या राज्य का लक्ष्य मोक्ष है? नहीं; राज्य का मूल लक्ष्य समाज के सतत संचालन और सुरक्षा में निहित है|

राज्य वर्तमान में देखता है और धर्म भविष्य पर ध्यान रखता है| यही मूल अंतर राज्य को धर्म से अलग करता है| इसके विश्लेषण से आप पाते हैं कि यही अंतर पाप को अपराध से अलग करता है| पाप मोक्ष को रोकता है और अपराध सामाजिक सततता और सुरक्षा को|

राज्य के कानूनों में अनेक तत्व धर्म के नियमों से मेल रखते हैं| इसके कई कारण हैं: १.कुछ  नकारात्मक प्रक्रियाएँ दोनों प्रकार के लक्ष्य में बाधा डालतीं हैं; २. अधिकतर प्राचीन विधि – विशेषज्ञ धर्म गुरु भी रहे हैं; ३. अनेक व्यक्ति धर्म व् राज्य विरोधी कार्यों से सत्ता पाते रहे हैं और अपनी सामाजिक स्वीकृति के लिए राजा के ईश्वरीय प्रतिनिधि होने का सिद्धांत गढ़ते रहे हैं|

इन्ही कारणों से राज्य कानूनों में आज भी ऐसे तत्व विद्यमान हैं जिनका अपराध अथवा सामाजिक सततता और सुरक्षा से कोई लेना देना नहीं हैं| उदहारण के लिए: आत्महत्या; समलैंगिक सम्बन्ध; विवाह (धार्मिक प्रक्रिया); धार्मिक मान्यताओं का रक्षण; आदि|

साथ ही हम राज्य कानूनों में अनेक तत्व देखते हैं जिन्हें हम अनेक बार धर्म विरोधी समझते हैं| उदहारण के लिए: सती – प्रथा; देव – दासी; दहेज़; आरक्षण; धर्म परिवर्तन; पर्दा; खतना; आदि|

मेरे सामने प्रश्न है; अपराध क्या है?

मेरे विचार से अपराध एक ऐसा कृत्य, जिसके कारण किसी व्यक्ति को तन, मन और धन की ऐसी हानि पहुँचती हो, जिस के कारण से सामाजिक सततता और सुरक्षा में बाधा उत्पन्न होती हो अथवा हो सकती हो|

हम किसी भी ऐसे कृत्य को अपराध नहीं ठहरा सकते जिससे इस परिभाषा की दोनों शर्त पूरी न होतीं हों| “सहमतिपूर्ण समलैंगिक यौन सम्बन्ध” दोनों में से किसी भी शर्त को पूरा नहीं करते|

 

डायरेक्टर साहब

निवेशक जागरूकता श्रंखला ४

 

अभी हाल में मेरे पास कुछ ऐसे मामले आये जिनमे साधारण लोग कंपनी का डायरेक्टर बनने के लालच में पैसा गवां बैठे| यहाँ चालक लोगों में जल्दी तरक्की का रास्ता देखने वाले, पढ़े लिखे, नौजवानों को अपने जाल में फंसाया था|

 

Mr Ratan Tata with Dr Greg Gibbons and Dr Ben ...

Mr Ratan Tata with Dr Greg Gibbons and Dr Ben Wood WMG (Photo credit: wmgwarwick)

 

एक मामले में कुछ नए लोगों ने एक परिश्रमी, महत्वाकांक्षी युवक से मित्रता की| बाद में अपनी एक पुरानी कंपनी का काम सँभालने का ऑफर दिया वह भी पार्टनर, डायरेक्टर, और मुनाफे में हिस्सेदारी के साथ| इस यूवक ने कंपनी के शेयर में पन्दरह लाख का पैसा नगद में लगाया| कुछ दिनों में उसे मैनेजिंग डायरेक्टर बना दिया गया| पर दो महीने में ही कंपनी के प्रोमोटर लोग गायब हो गए| रजिस्ट्रार ऑफ़ कम्पनीज में शिकायत तो दर्ज कर दी गयी है| मगर कंपनी का ऑफिस तो इन मैनेजिंग डायरेक्टर साहब के घर पर ही था और प्रोमोटर के पते बदल गए हैं| जब तक सही पते नहीं मिल जाते, सरकारी कार्यवाही नहीं हो सकती| मगर मजे की बात यह है कि शिकायत का पता लगने के कई महीने बाद उन प्रोमोटर्स ने शिकायत करने वाले युवक से संपर्क कर कर  सौदेबाजी शुरू कर दी| इस सौदेबाजी में युवक को पंद्रह लाख में से केवल दस लाख का चेक दिया| मगर सुना है की वो चेक भी बाउंस हो गया है|

 

यह बहुत नुकसानदेय मामला है| अब दोबारा सौदे बजी हुई तो फिर इस युवक को कुछेक लाख का नुकसान हो जायेगा और अदालत के चक्कर में बहुत टाइम लगेगा|

 

एक दुसरे मामले में बेरोजगार युवक ने एक खोखा कंपनी में पैसे देकर जनरल मेनेजर की नौकरी कर ली| ये कंपनी कंसल्टेंसी का कम करने वाली थी| सारा दारोमदार इसी युवक पर था| कंपनी ने कुछ दिन तक उसी के पैसे में से उसे सैलरी दी मगर बाद ने वो लोग रफूचक्कर हो गए| अब इस युवक के पास लम्बी कानूनी कार्यवाही का न तो पैसा है न ही समय है| घर वालों ने भी उसको घर से लगभग बहार निकल रखा है|

 

दुर्भाग्य से दोनों ही मामलों में युवक पढ़े लिखे हैं| मेहनती और समझदार भी हैं| मगर थोड़ी और जागरूकता की जरुरत है|

 

हम सभी को लालच से बचना चाहिए| आप अपना पैसा लगा कर अपनी खुद की कंपनी में डायरेक्टर बनते है तो ठीक है| दुसरे की कंपनी में पैसा लगाकर उसमे डायरेक्टर बनना केवल मंझे हुए लोगों के लिए ही ठीक है| पूरी तरह से जांच पड़ताल कर लें|

 

 

 

नकली दोस्त

निवेशक जागरूकता श्रंखला ३ 

कहते है खराब या नकली दोस्तों से तो एक अच्छा दुश्मन बेहतर है| साथ ही सच्चाई यह है कि आज बिना मतलब के कोई दोस्ती भी नहीं करता|

सबकी बात ध्यान से सुनें, समझें, मगर अपना दिमाग जरूर लगाएं| अगर बात आपकी समझ के परे है तो उसे समझने की फालतू मेहनत न करें न ही दुसरे की बात पर बिना समझे भरोसा करें|

पुरानी कहावत है जिस गली जाना नहीं उसका रास्ता क्या पूछना|

दूसरी एक बात और है| अगर आधी बात समझ में आ जाये तो वो और खतरनाक होती है| हमें जोश तो पूरा आ जाता है, मगर होता क्या है, नुकसान| महाभारत में अभिमन्यु की कहानी तो सबने सुनी है| चक्रव्यूह की आधी जानकारी थी| जोश में जा पहुंचा चक्रव्यूह में| जान चली गयी| तो भाई किसी ऐसे चक्रव्यूह में अपना हाथ न डालें कि उस से बाहर आन एक रास्ता न पता हो|

हर कोई चक्रव्यूह के अन्दर जाने का रास्ता तो बता देता है, चक्रव्यूह से बाहर आने का नहीं|

कहीं ऐसा न हो कि जिन्दगी भर की जेल जैसा हो जाये; पहुँच तो गए, मगर अब निकलें कैसे|

अगर आपको नहीं पता कि जहां पैसा लगवाया जा रहा है, वहां से पैसा किस तरह से निकलेगा तो पैसा न डालें|

आप कहीं भी पैसा लगाते है तो वो आपके पैसे को अपने घर नहीं रखता, आगे किसी न किसी काम में लगाता है| चाहे वो पोस्ट ऑफिस हो, बैंक ही, बीमा हो, कोई कंपनी हो या और कोई हो| कोई घर से ब्याज नहीं देता, कोई घर से मुनाफा नहीं देता| इसलिए सब ये चाहते हैं कि आप बस पैसा लगा दें, मगर निकालें नहीं|

ये आपका काम है कि सारी जानकारी लें, सब कुछ अच्छे से समझ लें| पैसा लगेगा कैसे और निकलेगा कैसे| आखिर आपका पैसा है|

ये पैसे का मामला है, पैसे का| जब आज की दुनिया में पैसे के लिए भाई भाई नहीं रहता; तो अनजान या कोई दोस्त, रिश्तेदार भाई कैसे बन सकता है|

आपकी कमाई है, आपकी बचत है| दस बार सोचें, कहीं आपका कोई नुकसान न हो जाये| 

दोगुना पैसा

निवेशक जागरूकता श्रंखला २

 

क्या कोई पैसा दुगना कर सकता है? जादू से या किसी और तरह से?

मुझे तो आजतक कोई ऐसा इंसान या भगवान् नहीं मिला|

क्या रामायण में भगवान् राम में अपने लिए जादू से, तंत्र – मंत्र से कंद मूल फल या पैसा पैदा किया? कहते हैं वो तो भगवान् थे, अगर चाहते तो कर सकते थे| मगर उन्होंने नहीं किया| न ही भगवान् कृष्ण ने ऐसा किया| न ही किसी और ने| सृष्टि का नियम है मेहनत कर कर पैसा कमाना| अगर भगवान् भी धरती पर आते हैं तो मेहनत करते है, जैसे सारे इंसान करते हैं|

तो जादू से तो पैसा दुगना नहीं होता|

रही बात साल दो साल में दुगना पैसा कर देने वाले किसी धंधे की| अगर ऐसा कोई धंधा होता तो हम सभी वही धंधा कर रहे होते| दुनिया भर के राजे महाराजे सारा लड़ाई – झगड़ा छोड़ कर उसी धंधे में लग जाते| टाटा बिड़ला भी क्यों इतनी बड़ी मिल – कारखाने लगाते| इतने पढ़े लिखे लोग पागल हैं क्या जो दिन रात मेहनत करते चार पैसे कमाने के लिए|

लोग रोज नई नई स्कीम लेकर आ जाते हैं| इसमें पैसा लगाओ, उसमे लगाओ; घना मुनाफा है| मैं उनसे कहता हूँ; भाई अगर है तो जाओ पहले खुद लगा दो, अपने घर का सारा पैसा लगा लो, पडोसी से और दोस्तों से भी लेकर लगा तो जब अमीर हो जाओ तो आना| तब हम भी इस स्कीम में पैसा लगा देंगे| एक साहब ने कहा, कि ये मौका दुबारा नहीं आएगा; मैंने कहा हर साल कोई न कोई भला आदमी आ जाता है इन मौकों को लेकर; अभी तुम अपना भला करो|

सोचिये; कायदे के एक साल में ज्यादा से ज्यादा कितने कमाए जा सकते है| अगर माने तो एक साल में पैसे दोगुने तो हो सकते हैं, मगर साल भर उस पैसे के साथ मेहनत करने के बाद| जैसे किसी रिक्शा मालिक को लीजिये| एक नया रिक्शा बाजार में ५००० रुपए से भी कम में आ जाता है, अगर रिक्शा मालिक, रिक्शा चालक से ३० रुपए रोज किराया लेता है तो उसे पूरे साल में १०००० रूपये की कमाई होती है| मगर इस सब में किराया बसूलने और सरकारी भाग दौड़ की मेहनत भी करनी होती है, घर बैठ कर पैसे दोगुने नहीं होते| बिना मेहनत के नहीं हो सकते| [1]

 

बचत और महंगाई

निवेशक जागरूकता श्रंखला १

हम कमाते किस लिए हैं; खर्च करने के लिए| मगर हम सारी जिन्दगी कभी नहीं कमाते| जीवन के पहले बीस पच्चीस साल हम कमाने लायक नहीं होते और बाद के पंद्रह बीस साल कमाने लायक नहीं रहते|

कुछ खर्चे रोज होते है, कुछ हर महीने तो कुछ हर साल.. कुछ कब हो जाये पता ही नहीं चलता.. शादी – ब्याह, हारी – बीमारी|

हमारी कमाई और महंगाई लगभग थोडा आगे पीछे बढ़ते रहते है|

कहते हैं कि जितनी चादर हो उतने पैर पसारो| हम सबकी यही कोशिश होती है| ज्यादातर तो हमारी कमाई से जरूरी खर्च पूरे हो जाते हैं, मगर कई बार खर्चे हमारी कमाई से ज्यादा होते है| इसी तरह के खर्चों के लिए हमें बचत करनी होती है|

अगर हम पिछले साल १०,००० रूपये की बचत की पैसे घर में रख लिए तो आज भी हमारे घर में वो १०,००० रुपए पड़े है जो वक्त जरूरत काम आयेंगे| मगर पिछले साल १०,००० रुपए में ८.५० कुंतल गेंहू ख़रीदा जा सकता था मगर इस बार तो घर में रखे उन १०,००० रुपए से ७.५० कुंतल गेंहू ही आ पा रहा है|

यही है बचत और महंगाई का खेल जिसमे महंगाई हमें खेल खिलाती है|

पहली जरूरत तो यही है कि हम बचत को घर में न रखें; कुछ ऐसा करें की घर में रखा पैसा भी बढ़ता रहे|

मगर यहीं दिक्कत शुरू होती है, कई पीर – फ़कीर – गुरु – बाबा हैं जो पैसा दुगना या दस गुना कर देते है| उधर बहुत सारे लोग है जिनके पास पैसा बढ़ाने के नए नए बढाया तरीके है, जिसमे वो एक दिन हमारा सारा पैसा लेकर गायब हो जाते है| कहा जाता है, कंपनी भाग गई|

हमारी मेहनत की कमाई और उस से भी ज्यादा मेहनत से की गई बचत की दुश्मन ये महंगाई नहीं है, उस से भी बड़ा दुश्मन है हमारा लालच|

गिन लीजिये हर साल कितनी कंपनी लोगों का पैसा लेकर भाग जातीं है| और मजे की बात है हम लोग जो टाटा – बिडला, सरकारी बैंक – पोस्ट ऑफिस को दस रुपए भी आसानी से नहीं देते इन भागने वाली कंपनी को दे देते हैं|

कुत्ता काटा

कहते है कुत्ते इंसान के सबसे बड़े दोस्त होते है| खासकर उन इंसानों के जिन्हें दूसरे इन्सानों में कम दिलचस्पी होती है या जिन्हें इंसानों से दोस्ती करने में कोई दिक्कत होती है| लोग कुत्ता पलने में बड़ी मेहनत करते हैं|

कुत्ता पालने में एक बड़ी बात यह है कि बड़ा साहब होने का अहसास बना रहता है| कार्यालय में भले ही चपरासी पानी न लाकर देता हो, घर में भले ही बच्चे दुलत्ती झाड़ते हो; कुत्ता बाबू तो दम हिलाते हीं हैं|

रोज कुत्ते को बिस्कुट डालने से आपको एक बंधुआ मजदूर मिलता है जिसे आप अपनी मर्जी से दुलारते और दुत्कारते हैं|

मगर भूल जाते हैं कि उसकी रोटी और बिस्कुट से ऊपर भी कुछ जरूरत हैं|

उसकी चिकित्सकीय जरूरतें|

अभी हाल में मुझे एक पालतू कुत्ते ने काट लिया| कुत्ता अपनी मालकिन से संभाले नहीं संभल रहा था और उसने समझा कि मैं भी उसे सँभालने की कोशिश करने आया हूँ| काट लिया|

कुत्ता स्वामिनी को सांप सूंघ गया, पापा पापा करते हुए घर में घुस गयी और पिताजी अपनी भोली सी सूरत बनाये बाहर आ गए|

कहने लगे आप को इंजेक्शन नहीं लगेंगे, इस कुत्ते को लगेंगे| मैंने पूछा, अभी तक कभी लगवाए हैं कोई इंजेक्शन| भोले भंडारी ने जबाब दिया, कभी टाइम नहीं मिला, इस बार पक्का लगवाएंगे|

खैर, कुछ सहानुभूति रखने वालों की सलाह पर सफदरजंग अस्पताल के आपातकालीन विभाग में पहुँचा| अरे भाई, यहाँ तो कुत्ते काटे का अलग से चिकित्सक विराजमान है| शायद गंभीर मामला है| अरे ये क्या, जैसे ही हमने कहा कि कुत्ते ने काटा है तो उसने बाकी मरीज छोड़ कर हमें देखा|

जब इंजेक्शन का नंबर आया तो पता चला कि कुत्ते काटे वाले अपना अलग अस्तित्व रखते हैं और उनका तो शायद अपना अलग राज्य बन जाए| हर दस मिनिट में एक कुत्ता काटे का मरीज|

सफदरजंग अस्पताल में, रक्षाबंधन वाले दिन सुबह साढ़े नौ बजे कुत्ता काटे का इंजेक्शन लगवाने वाले कम से कम सौ लोग जमा थे और इस से ज्यादा आने वाले थे|

एक बहुत बड़ा वर्ग, पालतू कुत्तों का शिकार बना था| ज्यादातर कुत्ता मालिक, कुत्ते का चिकित्सीय विवरण नहीं देना चाहते थे| शायद कुत्तों का टीकाकरण नहीं कराया गया था| और एक मरीज ने तो कहा कि कुत्ते से ज्यादा कटखना तो कुत्ता मालिक और उसकी पत्नी थे|

सोचने की बात है, नयी दिल्ली महानगर पालिका वाले, सड़क पर घूमते गरीब, बेघर कुत्तों को तो पकड़ कर ले जाते हैं| और पालतू कुत्ते और उनके कटखने मालिक| देश के सारे राहगीर उनके रहमोकरम पर छोड़ दिए जाते हैं|

तुर्रा यह है कि हमारे एक बड़े भाई हैं, कुत्ता प्रेमी भी हैं; कहते हैं: “ कुत्ता काटने से डरने की कोई बात नहीं है, इलाज है उसका|”

हमने कहा, “भाई साहब! डरने की कोई बात नहीं है, आप दुसरे माले से कूद जाओ, हड्डी टूटने का इलाज है|” देखें कब कूदते हैं|

अरे भाई लोगो! अब कितना पढोगे!! अगर घर संसार, गली कूचे में आपने भी कोई कुत्ता पाला हो तो उसका टीकाकरण तो करवा लाओ| और उस काले, पीले और सफ़ेद कुत्ते का भी जिसे आपने कोई रोटी डाली हो या किसी मन्नत के लिए कुछ खिलाया पिलाया हो|

भारत की अबला नारी

 

भारत का समाज और क़ानून मात्र दो प्रकार की अबला नारियों की परिकल्पना करता है:

१.      नवविवाहिता स्त्री, विवाह के पहले ३-४ वर्ष से लेकर सात वर्ष तक (नवविवाहित अबला); और

२.      भारतीय परिधान पहनने और अपने पिता या भाई की ऊँगली पकड़ कर चलने वाली २४ वर्ष की आयु अविवाहिता स्त्री (अविवाहित अबला)|

जो भी स्त्री इस दोनों निमयों से बाहर है वह प्रायः समाज और कानून द्वारा कुलटा स्त्री मानीं जाती है| (ध्यान दें, भारत में सबला स्त्री का कोई प्रावधान नहीं है|)

और जब तक किसी भी स्त्री को कुलटा घोषित नहीं किया जाता उसे भाभीजी और माताजी जैसे शब्दों से पुकारा जा सकता है|
(पुनः ध्यान दें, बहनजी शब्द का प्रयोग उचित नहीं माना जाता है, अविवाहित स्त्रियों के लिए भी भाभीजी शब्द का धड़ल्ले प्रयोग किया जा सकता है|)

आईये; विस्तृत अध्ययन करते हैं:

नवविवाहित अबला:

नवविवाहिता अबला, सामाजिक समर्थन प्राप्त कानूनी अबला है, जिसे होने वाले किसी भी कष्ट के भारतीय समाज में आराजकता की उत्पत्ति होती है| इस श्रेणी में आने के लिए किसी भी स्त्री को नवविवाहित होना ही एक मात्र शर्त नहीं है| प्रेम- विवाह के नवविवाहित हुईं स्त्रियाँ, सामान्य नियम के अनुसार इस श्रेणी से बाहर ही रखीं जातीं हैं| गरीब और निम्न जाति की स्त्रियाँ भी, राजनितिक दबाब  का अभाव होने पर इस श्रेणी से बाहर मानीं जा सकतीं हैं| जिन स्त्रियों का विवाह, ३५ वर्ष की आयु के बाद हुआ हो, उन्हें इस श्रेणी में काफी संशय के साथ रखा जाता हैं|

सामाजिक नियम के अनुसार इस श्रेणी में स्त्री विवाह के बाद के पहले दो – चार वर्ष ही रहती है, परन्तु कानून के आधार पर यह अवधि विवाह के बाद के पहले सात वर्ष रहती है| उस समय सीमा के बाद कोई भी स्त्री अबला नहीं रह जाती|

अपवाद स्वरुप, अश्रुवती स्त्रियाँ अपने अबला काल को अधिक समय तक बना कर रख सकतीं हैं| सुन्दर, आकर्षक, समझदार, मिलनसार (अति – मिलनसार नहीं), होना उन अश्रुवती स्त्रियों के लिए अतिरिक्त लाभदायक हो सकता हैं|

हमारे भारतीय समाज और कानून में नन्द, सास, जेठानी, पड़ोसन और किसी भी अन्य स्त्री जिसका किसी भी प्रकार का सम्बन्ध ससुराल या पति से हो, नवविवाहिता अबला के लिए प्राण-घातक मानी जाती है|

दहेज़, सती, आत्महत्या, गर्भपात और घरेलू हिंसा आदि के लिए पति को दोषी माना जाए या न माना जाए, इन में से किसी न किसी स्त्री को ढूंढ कर अवश्य ही दोषी मान लिया जाता है|

इस प्रकार की अबला को पति नाम की चिड़िया और ससुराल नाम के चिड़ियाघर से सुरक्षा की विशेष आवश्कयता हमारे कानून में हमेशा से महसूस की है और आज भी कर रहा है| नए तलाक कानून इस  श्रंखला में एक और कड़ी हैं और हम ऐसी ही अनेकाने क्रांतिकारी कड़ियों की सम्भावना से रोमांचित हो उठते हैं| नव विवाहिता अबला की सुरक्षा के लिए कई प्रकार के कानून बनाये गए हैं, उनके उदहारण इस प्रकार से हैं[i]:

  1. The Dowry Prohibition Act, 1961 (28 of 1961) (Amended in 1986)
  2. The Commission of Sati (Prevention) Act, 1987 (3 of 1988)
  3. Protection of Women from Domestic Violence Act, 2005
    1. The Indian Christian Marriage Act, 1872 (15 of 1872)
    2. The Married Women’s Property Act, 1874 (3 of 1874)
    3. The Guardians and Wards Act,1890
    4. The Child Marriage Restraint Act, 1929 (19 of 1929)
    5. The Muslim Personal Law (Shariat) Application Act, 1937
    6. The Special Marriage Act, 1954
    7. The Protection of Civil Rights Act 1955 
    8. The Hindu Marriage Act, 1955 (28 of 1989)
    9. The Hindu Adoptions & Maintenance Act, 1956
    10. The Hindu Minority & Guardianship Act, 1956
    11. The Hindu Succession Act, 1956
    12. The Foreign Marriage Act, 1969 (33 of 1969)
    13. The Indian Divorce Act, 1969 (4 of 1969)
    14. The Muslim women Protection of Rights on Dowry Act 1986
    15. National Commission for Women Act, 1990 (20 of 1990)

यदि इन कानूनों के बारे में विस्तार से चर्चा बाद में कभी करेंगे|

अभी पहले अविवाहित अबला के बारे में बात करते हैं|

 

अविवाहित अबला:

यह प्रायः सामाजिक किस्म की अबला है, जिसके अबला होने के बारे में माना जाता है कि कानूनी विद्वानों में केवल किताबी सहमति है| अविवाहित अबला, वह अविवाहित स्त्री है जो गैर – भारतीय परिधान न पहनती हो, अपने पारिवारिक स्व – पुरुष जन ( और कभी कभी माता बहनों) के अतिरक्त किसी अन्य प्राणी के साथ न पाई जाती हो, शरीर से सर्वांग – स्वस्थ होने के बाद भी गूंगी, बहरी और अंधी हो और किसी भी पुरुष के द्वारा उसके अबला होने से अधिकारिक रूप से इनकार न किया गया हो|

सामान्यतः स्थानीय नियमों के अनुसार २० से २४ वर्ष की आयु पार करने के बाद किसी भी स्त्री को इस श्रेणी से निकला हुआ मान लिया जाता है|

इस श्रेणी में बने रहना हर स्त्री के लिए एक चुनौती है और विवाह की प्रथम शर्त है| अबलाओं के हितों की रक्षा के लिए एक रोजगार परक राष्ट्रीय आयोग भी है जिसका नाम आपको पता है|

 

अन्य विचार बिन्दु:

हर स्त्री को अबला श्रेणी के निकाले जाने का भय हमेशा बना रहता है| पहले किसी समय में हर स्त्री को अबला माना जाता था परन्तु अब ऐसा नहीं है| आज इस बाबत, कई वैधानिक सिद्धांत हैं|

पहला वैधानिक सिद्धांत है; “गरीब की लुगाई, गाँव की भौजाई|” इस सिद्धांत में गरीब का अर्थ किसी भी रूप में निम्न स्तरीय परिवार के होना है और लुगाई का अर्थ गरीब घर की किसी भी स्त्री से लिया जाता है| निम्नता को धर्म, जाति, क्षेत्र, आय, सम्पन्नता, राजनितिक अलोकप्रियता और भीड़ इक्कठा न कर पाने की क्षमता के रूप में देखा जा सकता है|

दूसरा वैधानिक सिद्धांत है, “भले घर की लड़कियां मूँह नहीं खोलतीं”| यदि कोई स्त्री अपने साथ हुई किसी भी छेड़छाड़, या यौन शोषण की शिकायत करती है तो उसे समाज अबला के दर्जे से बाहर कर देता है| यदि वह फिर भी कोई कोशिश करती है तो हमारा न्यायतंत्र ( न्यायलय और समाचार माध्यम दोनों ही) उसके साथ इतना विचार – विमर्श करता है कि उसे अपने सही श्रेणी का ज्ञान हो जाता है, भले ही यह ज्ञान मरणोपरांत ही क्यों न हो| इस सिद्धांत का एक विपरीत सिद्धांत भी है, “अति भले और बलशाली घरों की लडकियां जब भी मूँह खोलती है, सत्य और उचित ही बोलतीं हैं” परंतु इस सिद्धांत का प्रयोग अपवाद स्वरूप ही हो सकता है|

अंतिम निष्कर्ष:

एक स्त्री के अबला श्रेणी से बाहर कर दिए जाने से उसके लिए हर प्रकार की सामाजिक, वैधानिक और न्यायायिक सुरक्षा का अंत हो जाता है| परन्तु, अबला के साथ हल्की की भी ऊँच – नीच करने वाले का सात पुश्त, माँ – बहन, हड्डी – पसली और कुत्ते की जिन्दगी और मौत वाला हाल किया जा सकता है|

कुल मिला कर मौत के कूएँ में सांप – छछूंदर का खेल है और मदारी गोल महल में बीन बजा रहे हैं|

क्रिकेट: मनोरंजन में फिक्सिंग

 

 

इस देश में धर्म, भ्रष्टाचार और शराब की तरह ही लोंगो को क्रिकेट की लत हैं| बल्कि शायद क्रिकेट कहीं ज्यादा खतरनाक है| मुझे याद है कि बचपन में अगर कोई सहपाठी घर से पढाई पूरी करके नहीं जाता था और कहता था कि उसने कल फलां फलां क्रिकेट मैच की रिकॉर्डिंग देखी थी तो कई बार शिक्षक उस पर सख्ती नहीं दिखाते थे|

मैंने भी रेडिओ पर क्रिकेट कमेन्ट्री शायद अपने अक्षरज्ञान शुरू होने से पहले ही शुरू कर दी थी| जिस दिन क्रिकेट का मैच होता था तो मेरे पिता अपना ट्रांजिस्टर उस दिन अपने साथ चिपकाये रखते थे और वो उनके साथ कार्यालय भी जाता था| जब मैं थोडा बड़ा हुआ, तब मैंने मोहल्ले के लोगों से किस्से सुने कि किसी ज़माने में मोहल्ले का अकेला ट्रांजिस्टर मेरे पिता के पास ही था और बिजली गुल होने की दशा में हमारे घर में बैठक जमा करती थी| बाद में, जिन घरों में टीवी था वहां भी यही हाल था|

मुझे भी क्रिकेट की बीमारी बुरी तरह से थी और बाद में मुझे यह महसूस हुआ कि यह अफीम मेरे भविष्य को खराब कर देने के लिए काफी है| मेरे कई सहपाठी कहा करते थे बोर्ड परीक्षा तो हर साल आतीं है और क्रिकेट का विश्व कप  चार साल में एक बार| मेरा क्रिकेट से मोह भंग होने में सट्टेबाजी का कोई हाथ नहीं है वरन मेरे एक सहपाठी का हाथ है जो गणित और सांख्यकी की मदद और “सामान्य अनुभूति” से न सिर्फ मैच का सही भविष्य बताता था बल्कि एक मुख्य भारतीय बल्लेबाज का स्कोर में दहाई का अंक बिल्कुल सही बताता था| उसके साथ छः महीने रहकर मैंने क्रिकेट का नशा छोड़ दिया| दुर्भाग्य से मेरा वह मित्र क्रिकेट, गणित और अनुभूति की भेट चढ़ गया| पिछले पंद्रह वर्षों से मेरा उसके साथ संपर्क नहीं बल्कि मुझे उसका नाम भी नहीं याद|

जब क्रिकेट में सट्टेबाजी और फिक्सिंग के आरोप सामने आने लगे तब मुझे लगा की “क्रिकेट की सह्सेवाओं” ने मेरे मित्र के रूप में हीरा खो दिया|

मुझे या शायद किसी भी दर्शक को इस देश में क्रिकेट मैच की फिक्सिंग से कोई परेशानी नहीं है| जब तक आपको खुद मैच का परिणाम पहले से न पता हो तो क्रिकेट का हर मैच एक बढ़िया उपन्यास और फिल्म की तरह अंत तक मनोरंजन करता है| अगर फिल्म मनोरंजक हो तो किसे फर्क पड़ता है कि उसका प्लाट किसने कब कहाँ और क्यों लिखा था| हर गेंद का रोमांच बना रहना चाहिए| हर गेंद पर बल्ला वास्तविक तरीके से घूमना चाहिए|

अन्य खेलों के मुकाबले, क्रिकेट में हर खिलाडी के निजी विचारों और तकनीकि का अधिक स्थान है| क्रिकेट की एक टीम में कम से कम ११ सब – टीम खेल रही होतीं है| उनके अपने निजी लक्ष्य आसानी से निर्धारित किये जा सकते हैं| अगर मैच फिक्स न भी हो तो कोई  भी बढ़िया खिलाडी अपने दम पर अपनी निजी सब – टीम के लक्ष्य तक पहुँच सकता है| टीम में बने रहना और जनता की निगाह में चढ़े रहने से अधिक कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं है| आपने देखा होगा कि अधिकतर बल्लेबाज एक मैच में अपने कार्य – प्रदर्शन पर निर्भर रहने की जगह अपना औसत बनाये रखने में अधिक ध्यान देते हैं|

भारत पाकिस्तान के मैच तो हमेशा ही फिक्सिंग के लिए अपना एक स्थान बनाये रहे हैं| दक्षिण भारत की सामरिक समझ रखने का दावा करने वाला हर व्यक्ति मैच शुरू होने के हफ्ते भर पहले से ही उसका परिणाम घोषित कर ने  लगता है| इस तरह के व्यक्ति मैच इसलिए नहीं देखते कि खेल में क्या हो रहा है बल्कि इसलिए देखते हैं कि उनकी सामरिक समझ कितनी सही थी और दोनों टीम उन्हें दी गयी स्क्रिप्ट पर किस प्रकार खरी उतरीं|

हाँ! सट्टेबाजी पर नियंत्रण रखने की आवश्यकता है और यह उस पर प्रतिबन्ध लगाने से नहीं बल्कि अवैध सट्टेबाजी का उचित वैध विकल्प देने पर ही किया जा सकता है| किसी भी कार्य को खुले रूप में अवैध बनाये रखने का अर्थ है कि हम उसे कानूनी नियंत्रण से बाहर रखकर खुली छुट दे रहे हैं| अवैध अवैध सट्टेबाजी से कई बार लोग जरूरत से अधिक निवेश कर देते है और घर बार लुटा बैठते हैं| सबसे बड़ी बात यह है कि सरकार को राजस्व की बड़ी हनी होती है| जो पैसा कर के रूप में सरकारी खजाने में जाना चाहिए था वो नेता, पुलिस और माफिया के हाथ में बाँट जाता है|

मेरी इस साधारण सी बात को इस तरह से समझा जा सकता है कि जिन स्थानों पर शराब कानूनी  रूप से सहज उपलब्ध है वहां पर अवैध और/या नकली शराब का धंधा बेहद कम है, नशे की बुरे पहलू पर खुल कर बात होती है, नशा मुक्ति की तमाम व्यवस्था मौजूद है, सरकारी आय भी होती है|

..

रेलवे की साजिशाना लूट

 

 

जी हाँ| मैं यही कह रहा हूँ कि हमारी प्यारी “भारतीय रेल” हमें साजिश कर कर लूटती है| और मेरे पास ये कहने की पर्याप्त आंकड़े है, जो मैंने खुद रेलवे से सूचना के अधिकार का प्रयोग कर कर प्राप्त किये है| मैंने अपनी आँखों से इस लूट को देखा जिसका विस्तृत ब्यौरा आप यहाँ पढ़ सकते है|

आइये देखें, ये लूट किस प्रकार हो रही है| अपने अध्ययन के लिए मैंने अपने गृहनगर अलीगढ़ और दिल्ली के बीच की रेल सेवा को चुना|

मैंने रेलवे से दो अलग अलग प्रार्थना पत्र भेज कर पूछा:

१.       अलीगढ़ पर दिल्ली और नई दिल्ली जाने के लिए रुकने वाली सभी ट्रेनों में कुल मिला कर सामान्य अनारक्षित श्रेणी की कितनी यात्री क्षमता है? कृपया ई.ऍम.यु.,एक्सप्रेस, सुपरफास्ट, शताब्दी, सभी श्रेणियों का अलग अलग ब्यौरा दें|

२.       अलीगढ़ जंक्शन से दिल्ली जंक्शन और नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के लिए टिकटों की बिक्री का ब्योरा दें|

रेलवे ने अपने जबाबों में कहा:

१.       अलीगढ़ से दिल्ली और नई दिल्ली के लिए तीन ई.ऍम.यु. ट्रेन चलती हैं| जिनमे से एडी १ और एदी ३ दिल्ली और एअनडी – १ नई दिल्ली के लिए जाती हैं| इन में से पहली ट्रेन में १३ और अन्य दो में १५ डिब्बे रहते हैं| हर डिब्बे में ८० यात्रियों के बैठने की सुविधा है|

२.       टिकटों के बारे में उन्होंने मुझे एक चार्ट संलग्न कर कर भेजा| इन आंकड़ों का मैंने अध्ययन किया\

अनारक्षित डिब्बा

अनारक्षित डिब्बा

एक वर्ष में भारतीय रेल के पास अलीगढ़ से दिल्ली के बीच कुल ४३८,००० सीटें हैं| इन सीटों ४३८००० सीटों के बदले में रेलवे में २००९ – १० में ५२०५२२, २०१० – ११ में ५२७,५८९ और २०११ – १२ में ५५१०६२ टिकटों की बिक्री की| और इन सभी यात्रियों को या तो खड़े हो कर यात्रा करनी पड़ी या फिर उन्हें मजबूरी में आरक्षित डिब्बों में जाकर दूसरों की सीट पर बैठना पड़ा|

जब ये यात्री उन डिब्बों में पहुंचे तो रेलवे में अर्थ – दंड के नाम पर कमाई की या उसके कर्मचारियों में इन यात्रियों से अवैध वसूली की|

क्या रेलवे को उपलब्ध सीटों से अधिक सीटें बेचने का अधिकार है?

क्या रेलवे को सीट उपलब्ध न होने पर टिकट बेचते समय यात्री को इस बाबत सूचना नहीं देनी चाहिए थी?

क्या सीट न उपलब्ध होने की स्तिथि में यात्री के उपर अर्थ – दंड लगाया जाना चाहिए?

अगर इस तरह का अर्थ – दंड लगता है तो इसका पैसा रेलवे को मिलना चाहिए? क्या वह सहयात्री जो इस पीड़ित यात्री को अपनी सीट पर यात्रा करने देता है उसे इस रकम से कुछ हिस्सा नहीं मिलना चाहिए?

क्या कहते है आप? कृपया अपनी टिप्पणियों में लिखे!!

(हिंदी में अपने विचार लिखने में आपकी सहायता के लिए इस पृष्ट पर एक लिंक दिया गया है जहाँ से आप सम्बंधित सॉफ्टवेयर प्राप्त कर और अपने यन्त्र पर उतार सकते हैं|)

बलात्कार क्यों??

 

परिवार

* स्त्री ने अपनी पांच साल की बेटी को कहा; “अपने कपड़े ठीक कर कर बैठा कर, लड़कों की निगाह खराब हो जाती है|”

      बेटी कुछ नहीं समझी, डर गयी| बेटा समझा अगर मेरी निगाह खराब होने में लड़की का दोष होगा|

* स्त्री ने बेटे को बादाम दूध देकर बोला; “पी ले बेटा तुझे बड़े होकर मर्द बनना है|”

      बेटा मर्द बनने में लग गया|

* स्त्री ने स्कूल से बेटी से कहा; “बड़ी हो रही है कुछ शर्म लिहाज सीख ले| लड़कों का क्या? ये तो खुले सांड होते है|

एक इंसान को पता लगा कि उसकी असली जात खुले सांड है|

* पुरुष ने सड़क पर किसी नन्ही बच्ची को छेड़ते हुए बेटे को देख कर घर आकर स्त्री से कहा; “तुम्हारा बेटा अब बड़ा हो रहा है|” स्त्री हँस दी; “हाँ, अब उसकी शिकायतें आने लगीं है|

      बेटा बड़ा होनेलगा|

* पुरुष ने बेटी से कहा; तू उन लोगों की बातों पर ध्यान देगी तो वो ऐसा तो करेंगे ही|

* पुरुष में बेटी को बोला; “बेटा! तुम अपनी तरफ भी ध्यान दो, ताली एक हाथ से नहीं बजती|”

* स्त्री में पड़ोसन से कहा; “तुम्हारी बेटी कुछ कम है क्या? और ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती|”

* पुरुष में अपनी बेटी को घर में घुसते ही पीट दिया; “साली हरामजादी’ क्या कर कर आई थी कि पान की दूकान पर लड़के तुझ पर छींटे उछाल रहे थे|”

* स्त्री में लड़कियां छेडकर घर आए बेटे को बिना डांटे, खाने खाने को दे दिया|

* स्त्री ने बेटी से कहा; “सुन अगर किसी लड़के में तेरी तरफ देखा भी तो मैं तुझे दीवार में चिनवा दूंगी|”

      बेटी ने समझा नहीं समझा, “मर्द” बेटे ने जरूर समझ लिया|

 

देश और समाज

  • सभी लड़कियां तय की गयी वर्दी पहन कर आएँगी; लड़के ….. कोई बात नहीं|
  • लड़कियों को सभ्य कपड़े पहनने चाहिए, वर्ना लड़कों का ईमान खराब होता है|
  • जब उन गालियों को समाज में स्वीकृति होती है, जिनमें स्त्री, माँ बहन बेटी, के साथ बलात्कार की बात होती है|
  • जब स्त्री का अस्तित्व समाज में मात्र योनि और स्तन तक सिमटा दिया जाता है| अधिक दुर्भाग्य यह है कि कोई उन पवित्र अंगों को जन्मदाता और बचपन में दूध पिलाने वाले अंग के रूप में आदर नहीं देना चाहता|
  • जब अपने भाई या पुरुष-मित्र से साथ घुमती लड़की को कमेन्ट किया जाता है; “हमें भी देख लो हम में क्या कांटे लगे है” कोई भी इस कमेन्ट पर कुछ नहीं कहता|
  • जब पिता अपने बेटों को ये नहीं कहता कि मर्द होने का मतलब लड़की का दिल जीतना है, शरीर पर जोर दिखाना नहीं|
  • जब लड़कियों को पर्दा करना पड़ता है कि किसी की बुरी नजर न पड़े|
  • जब लड़कियां खुद को बाजार में बिकने वाली चीज बनाने लगती है|
  • जब देश में क़ानून नेता जी के घर की पहरेदारी करता है और आम जनता को रात में घर में छिप जाने के लिए कहा जाता है|
  • जब समाज बलात्कार को “लड़की कि इज्जत लूटना” कहता है| उन दरिंदों का “ईमान-इज्जत-इंसानियत” खोना नहीं|
  • जब अदालत में लड़की को अपने बलात्कार का गवाह बनना पड़ता है जबकि किसी मुर्दे को अपनी मौत की गवाही नहीं देती पड़ती|
  • जब देश में मुक़दमे दसियों साल तक अदालत में झूलते रहते है|
  • जब देश की आम जनता पुलिस को देश का सबसे बड़ा अपराधी संगठन मानती है और एक अदने से जेब कतरे से भी पंगा नहीं लेना चाहती क्योंकि वो पुलिस का सगा छोटा भाई है|
  • जब देश में कड़े क़ानून किताबों में शोभा बढ़ाते है और उनका पालन नहीं होता|
  • जब किसी के शक की बिना पर बलात्कारी को छोड़ा जाता है और उसी शक की बिना पर पीडिता को अपराधी मान लिया जाता है|
  • जब हम बलात्कार में पीड़ित और अपराधी का देश, धर्म, जाति, काम, देखते है|
  • जब हम अपनी सेना या अपने प्रिय जन द्वारा किये बलात्कार को देख सुन कर चुप रहते है या चुपचाप सहते हैं|
  • जब हम बलात्कारी और पीडिता की शादी करने के बारे में एक पल भी सोचते हैं|
  • जब हम बलात्कारी को देश के आम नागरिक जैसे सभी अधिकार देते है; जबकि किसी और दिवालिया या पागल को ऐसे अधिकार नहीं होते|


देश और देवता

 

  • जब “देवराज” इन्द्र तपस्वी गौतम की सती पत्नी अहिल्या का बलात्कार करते है; अहिल्या से दुश्मनी के लिए नहीं वरण गौतम से इर्ष्या के कारण; शायद कोई इन्द्र के इस कुकृत्य की निंदा नहीं करता|
  • जब अहिल्या के बलात्कार का शिकार हो जाने पर पति गौतम अहिल्या को श्राप देते है| जो श्राप अहिल्या को पत्थर बना सकता है वो इंद्र को नाली का कीड़ा क्यों नहीं बनाता|
  • जब राम अहिल्या को सम्मान देकर पत्थर से वापस स्त्री बनाते है और उन्ही राम का भक्त हम इस देश के वासी बलात्कार पीडिता को पत्थर बनाने में लगे रहते हैं|
  • देश में राम राज्य का सपना स्त्री को अहिल्या / शबरी जैसा आदर देने के लिए नहीं वरन स्त्री को सीता जैसा वनवास देने के लिए देखा जाता है|
  • जब हर साल रावण को जलाने वाला समाज/देश ये भूल जाता है की रावण ने राक्षस होकर भी अपहृत सीता के साथ कोई बलात्कार या छेड़खानी जैसी कोई घटिया हरकत नहीं की थी|

अंत में मैं कहना कहता हूँ; जब समाज में कोई भी गलत बात होती है तो मुझे भी देखना चाहिए क्या मैंने तो इस समाज में ये गलत बात होने में कोई योगदान नहीं दिया| कोई गलत बात कहकर, सहकर||

मैं आज खुद के होने पर शर्मिंदा हूँ||

 

 

 

विश्व-गाँव में स्थानीय कानूनों का विश्वव्यापी प्रभाव

 

जब भी हम किसी भी दूर देश के क़ानून की बात करते हैं तो हमारी निर्लिप्तता का स्तर काफी नासमझी भरा होता है| यह बात में खुद अपने अनुभव से कह रहा हूँ| मैंने कभी नहीं सोचा था कि सात समंदर पार किसी भारतीय के साथ ऐसा कुछ होगा जो उस देश को ही नहीं इस देश को भी झकझोर कर रख देगा| मगर यह भू-मण्डलीकरण का समय है| कानून व्यवस्था को अधिक समय तक राष्ट्रों निजता के साथ नहीं जोड़ा जा सकता| आज के विश्व-गाँव में सुदूर देश के कानून अगर मुझे नहीं तो मेरी आने वाली पीढ़ी को अवश्य प्रभावित कर सकते हैं| अभी इस विषय पर मैं कोई गंभीर विचार विमर्श करने की आवश्कता नहीं समझ पा रहा हूँ परन्तु इसे नज़रअंदाज़ भी नहीं किया जा सकता है|

सविता हलाप्पनावर की आयरलैंड में हुई मृत्यु इसी प्रकार के कुछेक उदाहरणों में से एक है| सविता की मृत्यु आयरलैंड के एक चिकित्सालय में चिकित्सकों द्वारा क़ानून के डर के कारण उचित चिकित्सीय सहायता न दिए जाने के कारण हो गयी थी| कहा जा रहा है कि सविता के गर्भ में स्थित भ्रूण किसी कारणवश नष्ट होने कि कगार पर था और खुद सविता कि जान को खतरा हो गया था, परन्तु चिकित्सकों के द्वारा उन्हें आयरलैंड के भ्रूण हत्या विरोधी कानून के चलते गर्भपात कराने की अनुमति नहीं दी गई| आयरलैंड में इस घटना की जांच जरी है|

इस घटना ने कई सारे प्रश्न खड़े किये जो धर्म का शासन – प्रशासन में अनुचित हस्तक्षेप, विश्व भर में धर्म – निरपेक्ष कानूनों की आवश्यकता, और स्थानीय क़ानून के विश्व्यापी प्रभाव आदि को दर्शाती है|

विश्व भर में जिस प्रकार से आयरिश कानूनों के बारे में चर्चा की गयी है उस से यह साफ़ है कि आज विश्व – गाँव अपने नए वृहद रूप में हमारे सामने है|

१.      एक देश का क़ानून विश्व के किसी भी नागरिक को प्रभावित कर सकता है, अतः स्थानीय क़ानून केवल स्थानीय मामला नहीं है|

२.      स्थानीय कानून बाहरी व्यक्तियों, पर्यटकों, निवेशकों, कामगारों और आमंत्रित प्रतिभाओं को प्रभावित करता है|

३.      स्थानीय कानूनों के गैर-स्थानीय प्रभाव विश्व – व्यापी प्रतिक्रिया को जन्म देते है और राष्ट्र कि छवि पर असर कर सकते हैं|

४.      विश्व- जनमत, स्थानीय जन – मानस को और स्थानीय जन मत, वैश्विक जन – मानस को प्रभावित कर सकता है|

५.      कानूनों को किसी भी प्रकार के धार्मिक प्रभाव से दूर रखा जाना चाहिए|

६.      किसी भी क़ानून को उसके उचित समय पर बना कर प्रभाव में ले आया जाना चाहिए|

७.      सभी कानून समय समय पर पुन्र्विचारित किये जाने चाहिए|

सविता का मामला इस समय का अकेला मामला नहीं है जहाँ पर हमें इस प्रकार के दूर देशीय प्रभाव दिखाई दे रहे हैं| एक अन्य मामले में हाल में ही पश्चिमी देश नार्वे में एक भारतीय दंपत्ति को गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें संतान से दूर रहना होगा क्योकि वो लोग बच्चे का जिस प्रकार से लालन-पालन कर रहे थे वह नार्वे के शिशु पालन स्तरों से काफी भिन्न था| इन मामलों में उन देशों के स्थानीय कानून तभी हम बहरी लोंगो को प्रभावित करते है जब हम उनके देश में जाते है| परन्तु हमेशा ऐसा नहीं होता| जब हम अपने देश में बैठे होते हैं, तब भी यह क़ानून हमें प्रभावित करते हैं| स्वित्ज़रलैंड का बैंक सम्बन्धी क़ानून सारे विश्व को प्रभावित करता है|

माना जाता रहा है कि स्विट्जरलेंड में बैंकों को दी गयी विशेष छूटें, विश्व  भर में भ्रष्टाचार फैलाने में मदद करती रही है| अमेरिकी संस्था सीआईए इसे काले धन को वैध बनाने सम्बन्धी गतिविधियों का केन्द्र बताती रही है| साथ ही आरोप है की, विश्व भर के आतंकी संगठन इस व्यवस्था को अपने हित साधने में प्रयोग करते रहे हैं| दरअसल, स्विस बैंक अपने ग्राहकों की सभी जानकारियां गोपनीय रखती हैं, और इस गोपनीयता का उलंघन करने की उन्हें कोई अनुमति नहीं है केवल नयायालय के आदेश पर ही इस प्रकार की जानकारी मुहैया कराइ जा सकती है| स्विस कानून विश्व भर में कर चोरी के मामले में भी सहयोग न करने के लिए बदनाम रहा है|

साथ है इस समय अमेरिका और ब्रिटेन के भ्रष्ट्राचार विरोधी कानूनों को इस प्रकार से बनाया गया है कि वो किसी में अमेरीकी और ब्रिटिश नागरिक या कंपनी या उनसे सम्बन्ध रखने वाले किसी भी व्यक्ति को विश्व में कहीं भी भ्रष्ट गतिविधियों में शामिल होने पर अपने देश में कानूनी कार्यवाही कर सकते हैं|

कुल मिला कर विश्व में आज किसी भी क़ानून को केवल अपने नागरिकों के लिए बनाये गए क़ानून के रूप में नहीं लिया जा सकता है| सभी देशों के क़ानून सारी मानवता को प्रभावित कर सकते हैं|

एक देश के रूप में हमें भी इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि हमारे क़ानून भी दूरगामी प्रभाव रख सकते है और उन्हें इस प्रकार का होना चाहिए कि नागरिक और गैर-नागरिक सभी उन्हें आसानी से समझ सकें और उनका दुरूपयोग न हो सके|

 

 

भारत में इस्लामिक बैंकिंग की संभावनाएँ

 

अब से लगभग चार वर्ष पूर्व वैटिकन ने पश्चिमी देशों के बैंकों से कहा था कि उन्हें इस्लामिक बैंकिंग के सिद्धांतों से आधार पर व्यवसाय करने के बारे में सोचना चाहिए| अभी कुछ दिन पूर्व भारतीय रिजर्व बैंक ने भारत सरकार से कहा है कि देश में इस्लामिक बैंकिग की अनुमति दी जानी चाहिए| ध्यान देने की बात है कि इस्लामिक बैंकिंग मुस्लिम कहे जाने वाले शासनों और देशों में भी बीसवीं शताब्दी में जाकर प्रचलित हुई है| रिजर्व बैंक के मुताबिक इस समय मौजूद भारतीय क़ानून देश में औपचारिक रूप से इस्लामिक बैंकिंग की इजाजत नहीं देते, परन्तु नॉन – बैंकिंग सेक्टर में इस प्रकार के कुछ संस्थान है जो इस्लामिक बैंकिंग के आधार पर सीमित रूप से कार्य कर रहे हैं|

इस बात में कोई शक नहीं है कि मानवता शताब्दियों से सूदखोरी के विरुद्ध रही है| कुरान पाक सूदखोरी सात बड़े पापों में गिनता है| सूद को आप मेहनत की कमाई की परिभाषा में नहीं ला सकते हैं| आप यदि जाति आधारित भारतीय समाज पर भी निगाह डालें तो पाएंगे की सूदखोरी का धंधा करने वाले समुदायों को समाज में अधिक सम्मान नहीं दिया जाता| अब प्रश्न उठता है कि बिना सूद बैंकिंग कैसी?

अगर आप बैंक के पास जाकर कहे कि आपको जर्मनी से एक करोड रुपये की कुछ मशीन खरीदनी है, और बैंक आपको मशीन खरीद कर दे दे और कहे कि आप कुल जमा सवा करोड रुपया अपनी पसंद की किस्तों में दे देना| जमानत के तौर पर दो करोड की जमीन रखने होगी|

अगर आप को एक करोड की जमीन अपना उपक्रम लगाने के लिए चाहिए और बैंक वो जमीन आप को खरीद कर प्रयोग करने के लिए दे दे.| आपको किस्तों में इतना पैसा बैंक को देना है जो आखिरी किस्त के दिन जमीन की पहले से अनुमानित कीमत के बराबर हो जाये|

अब अगर आप बैंक के पास जाए घर खरीदने का कर्जा लेने और बैंक कहे कि आपके द्वारा पसंद किया गया घर बैंक आपको खरीद कर किराये पर दे देगा और दस साल कुछ रकम माहवार किराये पर देने के बाद मकान आपका|

आपको कुछ धंधा करना है और बैंक आपकी कुल पूँजी लागत का ५० फीसदी आपको कर्जा दे और कहे कि आप जब तक जब तक मूल धन नहीं चूका देते, तब तक मुनाफे में २० फीसदी का हिस्सा देते रहे|

आप एक करोड के सोने के बदले बैंक से सवा करोड का उधार दे और कहे की आप दो साल के भीतर इस सोने को दो करोड में वापस खरीद सकते है|

बैंक आपके बचत खाते में जमा रकम के बदले हर साल ब्याज न देकर कुछ उपहार दे| बैंक आपके सावधि जमा के आधार पर आपको अपने कुल लाभ में से कुछ हिस्सेदारी दे|

बैंक आपको वेंचर कैपिटल मुहैया करा दे| आपके धंधे में प्रेफेरेंस शेयर खरीद ले| अगर दिमाग में विचारों का मंथन चले तो ऐसे कई और तरीके ओ सकते है जो इस्लामिक बैंकिंग के मूलभूत तरीकों से मेल खायेंगे|

मैं मानता हूँ कि पूरी तरह से आप इस्लामिक बैंकिंग के सिद्दांत पर सभी कार्य नहीं कर सकते परन्तु आप आज के सूदखोर बैंक के सिद्दांत पर भी पूँजीवाद नहीं चला पाए हैं| समाजवादी सिद्दांतों से ख़ारिज किये जाने के बीस वर्ष के भीतर ही पूंजीवाद के महारथी कई बैंक दिवालिया हो चुके है| आपको समय से साथ न सिर्फ नए वरन पुराने विचारों को भी बार बार अजमाना होगा|

इस्लामिक बैंकिंग एक ऐसा विचार है जो मुझे सदा ही आकर्षित करता रहा है और इसे मुझ सहित बहुत से लोग पूंजीवादी सिद्धांत के कमियों को दूर करने के प्रमुख प्रयास के रूप में देखते हैं| दुर्भाग्य से भारिबैं इस्लामिक बैंकिंग को मात्र वर्ग विशेष को बैंकिंग तंत्र से जोड़ने के एक साधन मात्र के रूप में देखती है| मैं विश्व भर के मुस्लिम – विरोधिओं और मुस्लिमों की भावनाओं का आदर करते हुए यह कहना चाहता हूँ कि जिस प्रकार योग, विज्ञान, वैदिक गणित, यूनानी चिकित्सा और आयुर्वैद किसी धर्म विशेष के विचार नहीं है बल्कि मानवीय धरोहर है उसी प्रकार इस्लामिक बैंकिंग किसी की बापौती न होकर मूलतः एक मानवीय विचार है और इसे सभी के द्वारा अपनाया जाना चाहिय|

खुदरा बाजार का खुला खेल

 

 

 

 

२१ सितम्बर २०१२ जारी किये गए प्रेस नोट के साथ अब भारत भर खुदरा बाजार के रास्ते सरकार ने अब विदेशी पूंजीपतियों के लिए खोल दिए गए है| विदेशी पूँजीपति १०० मिलियन अमेरिकी डालर भारत में भेज कर भारत में अपना खुदरा व्यापार प्रतिष्ठान खोल सकता है| इस प्रतिष्ठान में उसका हिस्सा ५१ फीसद का होगा| इसका मतलब होगा कि किसी न किसी भारतीय पूंजीपति व्यापारी को ९६ मिलियन अमरीकी डालर उसके साथ लगाने होंगे| इस तरह ये १९६ मिलियन का भरी भरकम हाथी होगा| इस पूरी पूँजी में से ५० मिलियन डालर सम्बंधित मूलभूत ढांचे पर लगाये जायेंगे| ये दूकाने केवल १० लाख से ज्यादा आबादी वाले शहरों में खोली जाएँगी| सरकार का कहना है कि सरकार कृषि उपज को खरीदने का पहला हक रखेगी| इसका मतलब ये है कि सरकारी खरीद का कोटा पूरा होने के बाद ये विदेशी खुदरा प्रतिष्ठान कृषि उपज खरीद सकते है| कूल खरीद का ३० फीसदी उन्हें छोटे और मझोले प्रतिष्ठान से खरीदना होगा| सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि इस खुदरा व्यापार में इंटरनेट पर की जाने वाली खुदरा बिक्री की अनुमति नहीं है| उसके लिए अलग नियम है|

अब देखते है क्या है इसके कानूनी और सामाजिक मायने:

खुदरा व्यापार को लेकर जो मूल आशंकायें छोटे खुदरा व्यापरियो से जुड़ी हुई है| लोगो को डर है कि इस से छोटे व्यापारी बेरोजगार हो जायंगे| खरीद से लेकर बिक्री तक कि नई तकनीकी और तौर तरीके कुछ न कुछ रोजगार तो शायद खत्म करें मगर साथ ही नयी तकनीकी नए तरह के रोजगार लाएगी जैसे कि कंप्यूटर और मोबाइल के आने से कुछ रोजगार खत्म हुए और कई नए शुरू हुए|

पहली बात हो यह है कि इनकी बिक्री कि दूकाने केवल बड़े शहर में खुलेंगी मगर इनको ये अनुमति दी गयी है कि ये अपनी खरीद कि दुकाने कहीं भी खोल सकते है| पहले खरीद की दूकान पर चलते है| यहाँ पर जो खरीद किसान से होनी है, वहाँ पर किसान और साधारण ग्राहक के बीच साधारणतः ३-४ बिचौलिए होते है, जो कि इन कॉर्पोरेट खुदरा व्यापारियों के यहाँ नहीं होते| ये लोग सीधे किसान और उत्पादक से माल खरीदते है| इस समय में रिलाइंस, मोर, बिग बाजार वगैरा कई कॉर्पोरेट खुदरा व्यापारी है| ये सभी अपना लाभ उठाने के लिए उत्पादक से सीधे ही बड़ी मात्र में माल खरीदते है और इस बड़ी मात्र उठाने के लिए ये लोग उन उत्पादकों में से भी बड़े उत्पादक और किसान के पास आते है| बिचौलियों (लोकप्रिय भाषा में थोक व्यापारी)के हिस्से जो लाभ बंट जाता था, वो अभी इन कॉर्पोरेट खुदरा व्यापारियों को पहुच जाता है| मेरी निजी मान्यता है कि इसका बड़ा हिस्सा इनके अपने लाभ खाते में जाता है न कि मूल उपभोक्ता को जाता है|  इस क्षेत्र में विदेशी निवेश आने से लाभ यह होगा कि कॉर्पोरेट खुदरा व्यापारियों में आपसी प्रतिस्पर्धा बाद जायेगी| वैसे अभी लगता यह है कि नए आने वाले विदेशी खुदरा व्यापारी या तो इन्ही पुराने देशी कॉर्पोरेट खुदरा व्यापार को खरीदेंगें अथवा इस समय चल रहे इनके थोक व्यापार खुदरा व्यापार में बदल दिए जायंगे| ये लोग अपने ब्रांड को बढ़ाने के लिए क्वालिटी पर ध्यान देंगे और इस तरह उत्पादकों को भी क्वालिटी पर ध्यान देना होगा| इस खेल में बड़े और मझोले उत्पादकों को अधिक लाभ होगा|

छोटे और सीमान्त किसान और अन्य उत्पादक विकास की इस दौड में एक बार फिर से बाहर ही छोड़ दिए गए है| छोटे किसान उत्पादक बिचोलियो (लोकप्रिय भाषा में थोक व्यापारी) के माध्यम से केवल ‘फुटकर” खुदरा व्यापरियो को ही माल बेच पाएंगे| जब कॉर्पोरेट खुदरा व्यापारी खरीद के समय मोल भाव कर सस्ते में माल खरीदेंगे तब सम्भावना है कि ये बिचौलिए अपने खरीद मूल्य और गिरा देंगे| मेरे विचार से उन लोंगो का ध्यान रखने के लिए अमूल जैसा एक नया सहकारी आन्दोलन खड़ा हो और सरकार तुरंत मंडी क़ानून और ऐसे ही अन्य कानूनों में भी सुधार करे| इस समय आवश्कता है कि देश भर में कोल्ड स्टोर खोलें जाएँ, जिनका अधिकतर प्रतिशत उत्तर प्रदेश के आगरा में ही स्तिथ है| सरकारी गल्ले (सरकारी वितरण प्रणाली) की पूरी व्यवस्था में सुधार किया जाये| देश भर में सामान की आवाजाही पर लगी रोकें हटाई जाएँ| एक बड़ी बात यह भी है कि देश भर में ट्रकों का आवागमन शहरी क्षेत्रों में दिन के समय लगभग प्रतिबंधित है, इस कारण परिवहन लागत बढ़ जाने से माल महँगा हो जाता है| देश भर में सरकार ने चुंगी तो काफी समय पहले समाप्त कर दी है, मगर कई तरह के टोल टैक्स, पुलिस की हफ्ता वसूली, गुण्डा टैक्स और नेतागर्दी मूल्यों को उपभोक्ता के लिए महँगा कर देती है और उत्पादक को माल दूर तक भेजने से रोकती है|

अब बिक्री की राह पर देखते है| कल्पना में एक तस्वीर उभर कर सामने आती है| एक बेहद बड़ी दूकान, तरह तरह का माल, बढ़िया मलट (पेकिंग), खुद चुनाव करने की आजादी, सुई से लेकर लंबी कार तक उसमें सजी हुई, आपको सहायता करने के लिए सजा धजा सहायक पलक पावडे बिछाकर तैयार| आप माल लीजिए, क्रेडिट कार्ड दिखाइए, माल आपकी गाड़ी में या फिर घर तक भी| मगर साहब, कहानी अभी शुरू हुई है| अभी तो पिछले दस पन्द्रह साल में हमारे भारतीय कॉर्पोरेट खुदरा व्यापारी बाजार पर पकड़ नहीं बना पाए| इनकी दुकाने विदेशी स्टाइल में सजी हुई है और आज तक बाजार पर पकड़ नहीं बनी है| सबसे बड़ी बात, हमारे यहाँ पानी हर कोस पर, बाणी दस कोस पर बदल जाती है| स्वाद तो क्या कहिये हर घर में अलग है| और ये स्वाद खाने, कपडे, रंग, ढंग सब में बदल जाता है| पूरे भारत को एक ढंग से माल नहीं बेचा जा सकता| अब या तो ये बड़े खुदरा वाले हमारा रंग ढंग बदल दें या हम इन्हें बदल ही देंगे| मगर यहाँ पर ध्यान रखने की बात है वो विज्ञापन और प्रचार दुष्प्रचार के हथियारों के साथ आयेंगे| हमारे आलू टिक्की को खराब बता कर आलू टिक्की बर्गर बेचने जैसा कुछ अभी होगा|

इस सबसे निबटने के लिए हमारे खुदरा व्यापारी से लेकर गली गली घूमने वाले फेरीवालों तक सबको धीरे धीरे बदलना होगा| बदलाब आ रहा है, पहले खुदरा व्यापारी कभी कभी आपसदारी में ही सामान आपके घर पहुचाते थे, आज लगभग हर खुदरा व्यापारी आपके घर सामन पहुँचाने की व्यवस्था रखता है| दिल्ली में तो कम से कम ठेले पर भी ज्यादा सफाई लगने लगी है| बोलचाल से ढंग बदल गए है| आज जब बिल मांगते है तो  ये बनिया भाई, भाषण नहीं सुनाते| बहुत से खुदरा व्यापारी आज टैक्स पैड माल बेचने का दावा करते है और बिल भी देते है| इस समय ये एक बेहद जरूरी बात है कि छोटे भारतीय उत्पादक/खुदरा व्यापारी अंपने ब्रांड विकसित करें और उन्हें देश व्यापी बनाने से पहले अपने मूल क्षेत्र में बेहद लगन के साथ प्रचारित करें| मैं अलीगढ शहर के अपने अनुभव से बता सकता हू कि लोग एकल ब्रांड की दुकानों को अधिक पसंद करते है; अलीगढ के अपने ब्रांड जलालीवाले, कुंजीलाल, ए-वन, बावा, आदि आज भी हल्दीराम का मुकाबला कर पा रहे है| मल्टी ब्रांड में आप अलीगढ में सहपऊ वालों का मुकाबला आसानी से नहीं कर सकते| आज इस तरह के स्थानीय ब्रांडों को अपना स्तर बनाये रखने पर और अधिक ध्यान देना होगा|

अगर हम ध्यान दें तो सर्वाधिक घाटे में हमारे आढ़ती और थोक व्यापारी रहेंगे| पूरी योजना उन्हें समाप्त कर देगी| भले ही राजनितिक लोग देशी खुदरा व्यापार के खात्मे की बात कर रहे है, मगर सच्चाई यह है कि राजनीति में बढ़ चढ कर हिस्सा लेने वाला यह तबका समाप्ति कि ओर है| इस समय नए आने वाले कॉर्पोरेट और विदेशी खुदरा व्यापारी इसी थोक व्यापार के हिस्से को खत्म कर कर अपना लाभ बनाने का प्रयास कर रहे है| मगर अभी देखना यह है कि कहीं हमारे गांव देहात के देशी खरीद बाजार की समझ न होने के कारण ये नए खुदरा व्यापारी भी कहीं इसी थोक व्यापारी तबके पर निर्भर न हो जाएँ|

यह सही समय है कि भारत का खुदरा अपने तरीके सुधार ले और बिचोलिये को खत्म करने के उपाय कर ले| चाहे यह सहकारी खरीद हो या लागत में कमी के उपाय| सरकार उनका साथ तभी दे पाएंगे जब कि वो सरकार के लिए आय का स्रोत हो और उनकी कर अदायगी कार्पोरेट खुदरा क्षेत्र से अधिक हो|

इस नए विचार से सबसे अधिक हानि बिचौलियों से भी अधिक उन गुमनाम लोगों को है जिनका काम अब एक बड़े स्तर पर मशीन करेंगी| पल्लेदार, रेहडी वाले और साधारण मजदूरों का एक बड़ा तबका अब और प्रकार के कार्यों के लिए रूख करेगा| मगर जो कुछ भी एक रात तो क्या एक साल में भी कुछ नहीं बदलेगा|

 

 

 

दूरसंचार उपभोक्ताओं के संरक्षण विनियम, 2012

हमारे देश के शौचालय से अधिक मोबाइल फोन है.

ब्लैकबेरी की हानि अपने कौमार्य की हानि से भी बड़ा मुद्दा है.

यह और अन्य मोबाइल संबंधित चुटकुले हमारे तेजी से बदलते जीवन शैली में मोबाइल के बढ़ते महत्व की बड़ी कहानी बताते है|

मोबाइल के बढ़ते प्रयोग

आधुनिक मोबाइल पोस्ट कार्ड (लघु संदेश), कलाई घड़ियों, मेज घड़ी (सुबह अलार्म), रेडियो, व्यक्तिगत कंप्यूटर, गणक (calculators), ई-किताब पाठक, कैलेंडर, निजी डायरी, नक्शे, स्कैनर, रिकार्डर, संगीत उपकरणों, कैमरा, वीडियो गेम और  कई अन्य उपकरणों और साधनों की जगह ले रहा है| ऑस्ट्रेलिया में एक ही विज्ञापन में उपयोगकर्ता अपनी प्रेमिका के मोबाइल में डालकर जेब में लेकर घूमते दिखाया गया है (मैंने इस विज्ञापन यौनाचार और नैतिकता की दृष्टि से गलत पाया)| परन्तु यह सभी, हमारे जीवन में इस मोबाइल के बढते महत्व को दर्शाता है|

हमारे मोबाइल पर अधिसंख्य सेवाएं मुफ्त है; परन्तु हम सभी को मोबाइल का मूल उपयोग कभी नहीं भूलना चाहिए| यह निसंदेह दूरसंचार है| दूरसंचार ऑपरेटर द्वारा प्रदान की गई सेवायें यह हमारी जेब के लिए सबसे अधिक लागत लेकर आती है| जाहिर है, जहाँ सेवाएं है वहाँ नियमित रूप से उपभोक्ता द्वारा इन सेवाओं से संबंधित शिकायतों भी हैं| भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण ने इन सेवाओं से संबंधित उपभोक्ताओं के हितों की सुरक्षा के लिए दूरसंचार उपभोक्ताओं के संरक्षण विनियम, 2012 को जारी किया हैं. यह विनियम सामान्य उपभोक्ता संरक्षण कानून के अलावा हैं|

यह विनियम मोबाइल कनेक्शन के  प्रारंभिक – किट और योजना वाउचर को स्पष्ट रूप से अलग करते हैं| प्रारंभिक अप किट केवल एक नया मोबाइल कनेक्शन सिम, एक मोबाइल संख्या और कुछ विवरण प्रदान करेंगे| प्रारंभिक किट के अतिरिक्त तीन प्रकार के वाउचर, अर्थात् – (क) योजना वाउचर, (ख) टॉप अप वाउचर और (ग) विशेष टैरिफ वाउचर होंगे| इन तीन वाउचर क्रमशः लाल, हरे और पीले रंग बैंड में होगा|

योजना वाउचर कोई भी मौद्रिक मूल्य उपलब्ध कराये बिना किसी एक विशेष टैरिफ योजना में एक उपभोक्ता सेवा में सम्लित करते है| टॉप – अप वाउचर भारतीय रुपए में व्यक्त एक मौद्रिक मूल्य को प्रदान करते है और इनकी कोई वैधता अवधि या अन्य उपयोग नहीं होगा| इनके अतिरिक्त एक विशेष टैरिफ वाउचर होगा, जो स्पष्ट रूप से योजना विशेष जिसपर यह लागू है तथा विशेष दर और इन दरों की वैधता अवधि आदि को इंगित करेगा|

किसी भी योजना के चालू होने और टॉप – अप वाउचर से प्रयोग होने पर प्रदाता द्वारा उपभोक्ता को एक एसएमएस भेजना होगा| योजना वाउचर को सक्रिय करते समय एसएमएस से इस वाउचर के योजना का शीर्षक बताया जायेगा| दूसरी ओर, टॉप – अप वाउचर के सक्रियण के पर भुगतान में ली गयी राशि, प्रकिया राशि, कर तथा उपलब्ध मौद्रिक राशि आदि की जानकारी देगा|

प्रत्येक कॉल के बाद एसएमएस के द्वारा कॉल अवधि, भुगतान राशि, बकाया राशि तथा विशिष्ट टेरिफ वाउचर के मामले में, प्रयुक्त मिनिट और बकाया मिनिट बताएगा| डाटा प्रयोग के मामले में, प्रत्येक सत्र के बाद एक एसएमएस प्रयोग किये गए डाटा, भुगतान राशि और बकाया राशि के बारे में बताएगा| किसी अन्य मूल्य वर्धक सेवा की स्तिथि में एसएम्एस भुगतान राशि, उसके काटे जाने का कारण, बकाया राशि और बकाया समय के बारे में जानकारी देगा|

उपभोक्ता अब रुपये 50/-  एक नाममात्र कीमत पर के अपने पिछले उपयोग के सभी विवरण की मांग कर सकते हैं| इसमें सभी कॉल का मद बार विवरण, एसएमएस की संख्या, भुगतान राशि, मूल्य वर्धक सेवाएं, प्रीमियम सेवाएँ, और रो़मिंग आदि का विवरण दिया जायेगा| ध्यान देने की बात यह है कि उपभोक्ता पिछले छः महीने का ही विवरण विवरण मांग सकते है|

टोल फ्री शॉर्ट कोड के प्रावधान करने से उपभोक्ता, एसएमएस के माध्यम से टैरिफ की योजना के बारे में जानकारी, उपलब्ध संतुलन और मूल्य वर्धित सेवाएं सक्रिय करने के आदि के लिए सक्षम होगा|

उपभोक्ता संरक्षण के लिए बढ़ते प्रयास
उपभोक्ता संरक्षण के लिए बढ़ते प्रयास

किसी प्रीमियम दर सेवाओं की सक्रियता से पहले, अंग्रेजी या क्षेत्रीय भाषा में बोलकर एक चेतावनी दी जायेगी|

इसके अलावा, उपभोक्ताओं की शिकायत निवारण के लिए, ट्राई ने दूरसंचार उपभोक्ताओं के शिकायत निवारण विनियम, 2012 भी जारी किए हैं| इसके अनुसार, हर सेवा प्रदाता को शिकायत के निवारण के लिए और सेवा अनुरोध के समाधान के लिए एक शिकायत केंद्र स्थापित करने की आवश्यकता है| सेवा प्रदाता के द्वारा ग्राहक सेवा के लिए एक मुफ्त नंबर दिया जाएगा| इसके अतिरिक्त अन्य जाकारी करने के लिए एक सामान्य जानकारी नंबर होगा जिसे शॉर्ट कोड से भी प्रयोग किया जा सकेगा| हर सेवा प्रदाता भी एक वेब आधारित शिकायत निगरानी प्रणाली की स्थापना करेगा|

हर शिकायत केंद्र में, डॉकेट संख्या हर शिकायत के लिए आवंटित किया जाएगा और यह एसएमएस के माध्यम से शिकायतकर्ता को भेजा जाएगा| कार्रवाई के पूरा होने पर भी शिकायतकर्ता को एसएमएस मिल जाएगा| शिकायतकर्ता को शिकायत केंद्र के खिलाफ एक अपीलीय प्राधिकारी को अपील करने का अधिकार दिया गया है|
हर सेवा प्रदाता एक नागरिक अधिकार पत्र तैयार करेगा|

विधायिका को विधेयक न दे कोई ! जनता रोई !!

गुरुवार प्रातः इकोनोमिक्स टाइम्स में खबर दी थी कि सरकार में भारतीय जनता पार्टी के दबाब में आकर कंपनी विधेयक २०११ को एक बार फिर से स्थायी समिति को भेज दिया गया है| कंपनी विधेयक सदन और समिति के बीच कई वर्षों से धक्के खा रहा है| आर्थिक सुधारों का जो बीड़ा पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव जी ने उठाया था वह इस समय खोखली राजनितिक अवसरवादिता के कारण दम तोड़ रहा है|  पिछले कई वर्षों से हम देख रहे है कि हमारी सरकार नए कंपनी क़ानून की बातें करतीं रहतीं है परन्तु उन्हें मूर्त रूप देने में असमर्थ रहती है| जब हम सरकार की बात करते है तब हम किसी दलगत सरकार की बात नहीं कर रहे वरन पिछले बीस वर्षों में सत्ताधारी सभी दलों की बात करते है; भले ही वह कांग्रेस, जनता दल, भाजपा, वामपंथी कोई भी हों| अफ़सोस की बात है कि संसद में बैठे लोग संसद के प्रमुख कार्य, विधि-निर्माण और कार्यपालिका नियंत्रण के स्थान पर शोरगुल, हल्लाबोल, कूदफांद आदि कार्यों में व्यस्त हैं| दुखद बात है कि हमारे राजनीतिज्ञ संसद को राजनितिक उठा पटक का अखाड़ा समझ रहे हैं और संसद के पवित्र गलियारा  सड़क की गन्दी राजनीति की चौपाल भर बन कर रहा गया है|

 

 

पिछले एक वर्ष से हम देख रहे है कि देश की जनता देश हित के एक क़ानून को बनबाने के लिए सड़क पर उतर आई है| आखिर क्यों?? पहले हमें कार्यपालिका के गलत आचरण, दु-शासन, क़ानून सम्मत अधिकारों के लिए ही सड़क पर आती थी और अधिकतर आंदोलन सत्ता की लड़ाई ही थे| परन्तु, हमारा दुर्भाग्य है कि जनतांत्रिक देश की जनता आज अपने को जनतंत्र और उसके मुख्य स्तंभ संसद और विधान सभाओं से कटा हुआ पाती है| कार्यपालिका का भ्रष्टाचार आज विधायिका का अभिन्न अंग बन गया है और खुले आम जनता कह रही है कि अब भ्रष्टाचार की लूट में भागीदार होने के लिए सत्ता का गलियारा जरूरी नहीं| सांसदों के संसद में व्यवहार को आज लूट में हिस्सेदारी की रस्साकशी के रूप ले देखा जा रहा है| यदि यह सब सत्य है तो देश और जनता दोनों का दुर्भाग्य है| परन्तु लगता है कि यह दुर्भाग्यपूर्ण परन्तु सत्य है; देश में विधायिकाएं विधि-कार्य के अतिरिक्त सभी कुछ कर रही हैं| कई महत्वपूर्ण विधेयक संसद में भूखी गरीब बाल विधवा की तरह मुँह लटकाए खड़े है और सरकार से लेकर उप-सरकार (विपक्ष बोलना गलत होगा) तक कोई उनकी सुध-बुध नहीं ले रहा है|

लोकनायक जय प्रकाश नारायण, नवनिर्माण आंदोलन, गुजरात, १९७४

क्या कारण हैं कि देश की विधायिका आज देश की कानूनी आवश्यकता को समझ में नाकाम सिद्ध हों रही है? संस्थान दर संस्थान, भ्रष्टाचार की मार से नष्ट हों रहे है, तकनीकि परिवर्तन जीवन में नए विकास लाकर नए संवर्धित कानूनों की मांग खड़ी कर रहे हैं, समय नयी चुनौती पैदा कर रहा है| परन्तु; हाँ, परन्तु; विधायिका खोखली राजनीति के घिनोने नग्न नृत्य का प्रतिपादन, निर्देशन और संपादन में अतिव्यस्त है| अब यह दूरदर्शिता की कमी मात्र रह गयी है या इच्छा-शक्ति का नितांत आभाव है| इस समय जनतांत्रिक विचारधारा के बड़े बड़े स्तंभ यह विचार करने पर मजबूर है कि क्या वह संसद और संसदीय प्रणाली में आस्था रखते है? हमारी आस्था संसद में भले ही बनी रही हों परन्तु निश्चित रूप से हमारे सांसदों में तो नहीं बची रह गयी है|

कंपनी विधेयक पिछले कई वर्षों से उठ गिर रहा है| पेंशन विधेयक अभी सोच विचार में डूबा है| भ्रष्टाचार उन्मूल्यन पर कोई उचित विचार नहीं है| गलत आचारण को उजागर करने वाले लोगो को सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं हों रही है| आम नागरिक रिश्वत देने पर मजबूर है और शिकायत करने पर शोषित और दण्डित हों रहा है| न्यायपालिका पर अत्याधिक दबाब है और आवश्यक कानूनी व्यवस्था नहीं बन पा रही है| दूसरी ओर यही सांसद दमनकारी क़ानून बिना किसे हील-हुज्जत बहस आदि के पारित कर देते हैं|

सड़क पर जनता, मुंबई, २१ अगस्त २०११ (The Hindu)

क्या हमारा देश सदन में की गयी नारेबाजी, कुछ-एक स्थगन प्रस्ताव, विधायिक कार्यों में रोजमर्रा की बाधा आदि के सहारे ही चलेगा?? क्या हम चुनाव के दौरान दिए गए कुछ गलत वोट के कारण चुने गए ऐसे सांसद पांच वर्ष तक झेलने के लिए अभिशप्त है?? क्या हम अपने निर्वाचित प्रतिनिधि को यह नहीं कह सकते कि वह फालतू के हल्ले-गुल्ले में न पड़े और कुछ काम-धाम कर ले? क्या हम अपने प्रतिनिधि से नहीं कह सकते कि वह आवश्यक क़ानून बनाएँ?

क्या संसदीय व्यवस्था निर्वाचित तानाशाही है? क्या संसदीय जनतंत्र दम तोड़ रहा है?? क्या प्रतिनिधिक जन तंत्र को भागीदारी जनतंत्र से बदलने पर यह संसद हमें मजबूर करने जा रही है???

 

 

बंद मुँह, कटी जुबान; फिर भी कड़वी मेरी तान|

 

क्या कहा जाए? जो कहना है ज़रा जल्दी कहना है, जल्दी जल्दी कहना है| बाद में क्या बोलेंगे जब होगा बंद मुँह, कटी जुबान|

पहले *** जनसंघी लोग लठ्ठ लेकर खड़े थे, उनकी सी न बोलो तो बोलने नहीं देते थे और खुद बहुत खूबी के साथ खूब बोलते थे| अब ये *** कांग्रेसी भी आ गए है मैदान में| नहीं नहीं दिशा-मैदान के लिए मैदान में नहीं आये मगर कर वही सब रहे है| *** टोपी वाले भी आधे भारत में रायफल लिए खड़े है| माफ कीजियेगा! इससे ज्यादा हम बोलेंगे नहीं वरना वो हमारे लिए बोल देंगे|

इन सब ** ** लोंगो की क्या कहे; पहले ये अपने निचले ** से ही *** फैलाते थे, मगर अब तो इनका मुखारविंद भी ** फैलाता है| कुछ *** लोंगो को महारत ही हासिल है उनके नाम *** **** **** **** *** अदि है| इन *** को अपने ** में कन्नौज की इत्र की गंध आती है और हमारे गुलाब जल में इन्हें अपने ** से भी अधिक बदबू आती है|

ये *** लोग खुद तो बहुत लिखते-बोलते है और इनता लिखते-बोलते है कि बस रामचरित वाले गोसाईं जी क्या और टीवी वाले गोसाईं जी भी क्या? मगर कुल मिला कर इन *** को कोई भी काम कि बात नहीं बोलनी| बाबासाहेब आंबेडकर इन ** को बोलने चालने के लिए संसद की पूरा आलिशान इमारत दे गए है मगर ये ** वहाँ पर अपनी ***** चिल्ल-पों करते है और कोई बात नहीं करते| वहाँ पर ये बस एक दूसरे की तरफ ऊँगली करते है और एक दूसरे * *** करते है| ये दोनों तीनों *** का अप्राकृतिक *** है जो खुले आम मेल मिलाप के साथ चल रहा है| अगर संसद चलेगी तो कुछ तो बोला जाएगा, बोलेंगे तो कुछ तो सच उगलेगा, सच उगलेगा तो बबाल मच जायेगा और इनके ** ** हो जायेगी| देश इनकी * *** एक कर देगा|

पहले तो जनता के हाथ बंधे थे और वो बूढी हो चली बाल विधवा की तरह सब कुछ सह रही थी| इन् ****** ने आजादी से लेकर आज तक जनता के साथ इनता ****** किया कि भारतीय दंड संहिता कि धारा 376  में इनके दी जा सकने वाली सजा का प्रावधान ही नहीं मिल सका| आज जब जनता कुछ बोलने की स्तिथि में आई तो ये बिलबिला गए है| पहले एक दो अखबारों में जनता की चिठ्ठी पत्री छप जाती थी और अगले दिन रद्दी हो जाती थी| अब कुछ लोग पढ़ लिख गए है और कुछ नए हथियार आ गए है| ट्विट्टर, फ़ेसबुक, ब्लॉग, एस एम् एस, पता नहीं क्या क्या| लोग हर तरह से अपना गुस्सा उतार है| अब लोगों को पता है कि हमारी बन्दूक इनकी तोप से कमजोर है, और लोग इन ** का ** ** नहीं ** सकते|

सीमान्त प्रदेश में कुछ बोला आये तो आतंकवादी; काले क़ानून उनके * *** करने के लिए|
आदि वासी कुछ बोलते है तो माओवादी; मार दो ** को|
जब शहरी युवा कुछ बोलें तो जेल दो *** और उनपर विदेशी हाथो में खेलने का इल्जाम लगा दो|
ये देश को लूट लें तो देश भक्त; आवाज उठाने वाले युवा पाकिस्तानी ***|
अन्ना को जेल और राजा को महल – दुमहले|

अब कलम की ताकत का नया पर्याय है इन्टरनेट| देखन में छोटो लगे, घाव करे गंभीर| हालात ये है कि घाव भी सीधे इन *** के **** पर हो रहा है और इनकी *** ** है| अब बिलबिलाई जनता ने नए साधनों का इस्तेमाल कर कर हल्ला मचाना शुरू किया तो इनको वहाँ पर सारी गंद दिखाई दे गयी| असलियत में इनकी **** गई है|मानते है कि कई बार लोग गुस्सा में इन *** की थोड़ा ज्यादा ही *** देते है मगर गुस्सा में किसको होश| मैं मानता हूँ कि लोंगो को गुस्सा शांत रखना चिहिये, मगर क्या करें पिछले पचास सालो में इन ** ने कुछ ढंग का पढ़ने लिखने ही नहीं दिया तो तमीज कहा से आती|

पहले इन *** के पाकिस्तानी भैया लोगो ने एक लंबी फेहरिश्त निकाल दी काफी शब्दों की| अगर मोबाइल पर उनमे से कुछ भी लिखा तो बस गए आप काम से| आपके चरित्र का पूरा चित्रण कर दिया जायेगा| हिंदी – उर्दू वाले *** *** * आप जानकारी बढ़ने की लिए पढ़े और पढाए http://www.spittoon.org/wp-content/uploads/2011/11/content-filtering-URDU-tsk-tsk-PTA-why-oh-why.-courtesy-of-shobz.pdf और अंग्रेज के *** पढ़े: http://www.spittoon.org/wp-content/uploads/2011/11/content-filtering-ENGLISH-made-me-LOL-courtesy-of-shobz.pdf | अगर आपको न अर्थ समझ आये http://www.urbandictionary.com/ पर सबके मायने दिए है, समझे और गलती न दुहरायें| हमें तो लगता है कि इन शब्दों पर सभी दक्षिण एशियाई सरकार लोग सहमत है इसलिए किसी भी जन मोर्चा पर इन शब्दों का प्रयोग कतई न करें|

हाँ! अब हमारे *** साहब को लगा कुछ तो बड़ा किया जाय, आखिर उनका *** किसी **** से छोटा थोड़े ही है| अब देखिये, ये विलायत के पढ़े लिखे *** लोग, अपने दफ्तर में विलायती बाबू लोग को बुला लिया और घर कि औरत का फोटो दिखा कर स्यापा कर डाला, बोला मेरे लोग आपकी वेबसाइट और फोरम पर हमारी *** की *** *** कर रहे है और उसका ***, उनका ***, उसकी *** कर रहे है| देखो मेरी तो *** कर कर रख दी है| इन *** सड़क छाप **** की जीभ काट दो, इनकी *** कर दो| इन ***** की पहचान मिटा दो अपने प्लेटफोर्म, फोरम, वेबसाइट पर से|

पहले ही आम जनता परेशान है, अपनी परशानी और भड़ास कैसे निकाले| बन्दूक उठाए या इस दुनिया से अपना संदूक उठाये| अब कलम पर भी जनता का जोर नहीं रहा| अगर कोई गलत बात हो रही है तो उस गलत बात करने वाले को पकड़ो न  सरकार, सबकी ***** क्यों करते हो; ****| अगर आपकी आदरणीय ***** की मानहानि होती है तो अदालत का दरवाजा देखो न, मेरे पीछे ******* कर क्यों पड़े हो| मानते है कि मुक़दमे में “मान हानि” से पहले “मान” को साबित करना पड़ेगा, तो करो न| अब आप विलायत में अपनी ****** *** क़ानून की उपाधि हासिल की है (अगर खरीदी हो तो माफ करें, मुझे हो सकता है की सही जानकारी न हो), आप कोई ***** थोड़े है|

वैसे भी आप क़ानून के *** है, जो चाहे वो क़ानून पैदा कर दें| आप अपने सुचना तकनीकी क़ानून को देख लीजिए| नियम उपनियम बनाए है, उन्हें देख लीजिए| मगर साहब-ए- आलम! आप इस मुल्क के सारे फोन टेप करते है, तो क्या आपको आतंकवादी, तस्कर और अपने और किसी भाई बंधू की कोई खास खबर मिल पाई? आप अपनी सरकार ठीक से चला पा रहे है, जो इस इंटरनेट को ठीक से चला लेंगे? क्या आप इस देश में रोज रोज जहर खा कर मर रहे किसान की कोई सुध बुध ले पा रहे है, जो इस देश के सभी इन्टरनेट उपयोग की निगरानी कर पायेंगे? आपकी सीमा को पार कर आतंकवादी इसे आ रहे है जैसे गली का कोई खुला सांड, क्या आप उन्हें रोक पा रहे है?

तो भैया! अभी तो हाथ जोड़ कर समझा रहे है कि ढंग से देश चला तो, फसबूक, ट्विट्टर को पढकर अपने काम के बारे में हो रहे असंतोष को समझो और उसे सुधारो| मैया की आरती से वोट नहीं मिलेगा, न ही भैया की पाँय लागी करने से|

भगवान की लाठी और जनता के वोट में आवाज नहीं होती मगर चोट बहुत लगती है| अपने सीधे और उलटे भाई लोग को भी बता देना|

बंद मुँह, कटी जुबान; फिर भी कड़वी मेरी तान|

 

 

चेक और बैंक ड्राफ्ट की वैधता समय सीमा

भारत में सामान्यतः सभी चेक और बैंक ड्राफ्ट की वैधता समय सीमा ६ महीने रही है| इसका तात्पर्य यह था कि कोई भी व्यक्ति विशेष किसी भी चेक और बैंक ड्राफ्ट का भुगतान उस पर डाली गयी दिनांक के छः माह के भीतर ही ले सकता था| इस अवधि के बाद, उसका भुगतान बैंक नहीं करता और हमें चेक लिखने वाले व्यक्ति से नया चेक लिखने का अनुरोध करना पड़ता है| इसी प्रकार प्रकार बैंक ड्राफ्ट को पुनः बनबाना या वैध करना पड़ता है|

इस सुविधा के कुछ लाभ थे:

१. आप ६ महीने में एक बार बैंक जाकर पिछले ६ महीने में प्राप्त सभी चेक का भुगतान प्राप्त कर सकते थे|

२. आप किसी व्यकि को एक चेक जमानत के तौर पर दे कर छः माह के लिए उधार ले सकते थे|

अब भारतीय रिज़र्व बैंक का कहना है कि उसकी सुचना के मुताबिक कुछ लोग इन चेक आदि को मुद्रा के रूप में प्रयोग कर रहे थे|

पहले चेक आदि की वैधता की अवधि शायद इसलिए अधिक रखी गई होगी क्योंकि अंतरराज्यीय व्यापार में इन मौद्रिक कागजातों को डाक द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजा जाता था और यह एक बेहद समय खर्च सेवा थी| मुझे लगता है कि पन्द्रह बीस वर्ष पहले तक, गोवाहाटी से गोवा तक डाक पहुँचने में पन्द्रह दिन का समय लगना तो सामान्य बात थी| इस कारण, चेक और बेंक ड्राफ्ट की वह वैधता समय सीमा उचित थी| उसके बाद धारक अपने बैंक में चेक जमा करता था और पुनः यह चेक अपने मूल स्थान थक की यात्रा करता था| जब चेक काटने वाले व्यक्ति का बैंक, उस व्यक्ति का खाता देखकर अनुमति देता था, तभी चेक धारक के खाता में धन राशि का हस्तांतरण होता था| इस कार्यवाही में उन दिनों दो तीन महीने लगने साधारण बात थी|

आज के समय में चेक का लेनदेन कोरियर सेवा या डाकघर की स्पीड पोस्ट सेवा के मार्फ़त होता है| सभी चेकों पर MICR (चुम्बकीय स्याही अंकन पहचान) अंकन होता है| जिसके कारण चेक को मशीन द्वारा ही निबटा लिया जाता है| साथ ही चेक छंटनी व्यवस्था [Cheque Truncation System (CTS) ] के आने से चेक के रूपचित्र के माद्यम से बैंक आपस में संवाद करने के उपरान्त चेक सम्बन्धी निपटान कर सकेंगे| इन सभी कारणों से चेक की वैधता समय सीमा घटा देना एक उचित निर्णय जान पड़ता है|

मार के टक्कर, रफूचक्कर

 

“मार के टक्कर, रफूचक्कर” सुनने में जरूर एक सामान्य सा जुमला है, परन्तु यह इस दुर्घटना के शिकार और उसके परिवार के लिए एक बड़ा दर्द है|

सड़क कानून के जानकार यह सलाह हमेशा देते रहते है कि किसी भी दुर्घटना में गलती करने वाले वाहन की पंजीकरण संख्या (Registration Number) जल्दी से कहीं लिख ली जानी चाहिए| ऐसा करना इसलिए जरूरी है कि इससे हमें मोटर वाहन दुर्घटना वाद न्यायाधिकरण (Motor Vehicle Accident Claim Tribunal) में अपनी बात ले जाने में काफी सरलता रहती है| हम न्यायाधिकरण को बता पाते है कि किस वाहन या किन किन वाहनों की गलती से यह दुर्घटना हुई और किन लोंगे के विरुद्ध यह वाद लाया जा रहा है| न्यायाधिकरण सम्बंधित वाहन की बीमाकर्ता कंपनी को राहत राशि देने का आदेश दे पायेगा|

अब यदि किसी वाद कर्ता पीड़ित को सम्बंधित वाहन का पंजीकरण संख्या नहीं मालूम हो तब क्या होगा| ऐसा प्रायः तभी होता है, जब सम्बंधित वाहन ““मार के टक्कर, रफूचक्कर” हो गया हो|  इस परिस्थिति में क़ानून पीड़ित व्यक्ति को बेसहारा नहीं छोड़ देता बल्कि पूरी सहायता करता है|

पीड़ित व्यक्ति या उसका प्रतिनिधि उप-क्षेत्राधिकारी या तहसीलदार को निर्धारित प्रपत्र पर इस सम्बन्ध में प्रार्थना पत्र दे सकता है| यह अधिकारी इस मामले की पूरी जाँच करेगा| इस जाँच में पुलिस में दायर की गई प्रथम सूचना रपट तथा चिकत्सीय जाँच रपट को ध्यान में रखा जाएगा| जाँच अधिकारी अपनी रपट जिला न्यायाधिकारी (डीएम)  जोकि claim settlement commissioner कहलाता है, को देगा| न्याधिकारी के आदेश पर सरकार पीड़ित व्यक्ति को मुआवजा राशि का भुगतान करेगी| यह मुआवजा राशि सभी सामान्य बीमा कंपनियों द्वारा जमा कराई गई धनराशि से बनाए गए हर्जाना (क्षतिपूर्ति) फंड से दी जाती है| इस प्रावधान में मृत्यु की स्तिथि में पच्चीस हजार रुपये और गंभीर चोट लगने पर साढ़े बारह हजार रुपये का प्रावधान है| इस मुआवजे के लिए क्षतिपूर्ति योजना १९८९ के खंड २० (१) के अंतर्गत आवेदन करना होता है|

 

सूचना का अधिकार

सूचना का अधिकार क़ानून जनता जनता को कोई नया अधिकार नहीं देता, अपितु सूचना पाने के अधिकार को प्रयोग करने का सही तरीका बताता है और जनसेवक (जिन्हें आम जनता सरकारी अधिकारी कहती है) के ऊपर यह जिम्मेदारी डालता है कि वह मांगी गयी जानकारी समुचित रूप से प्रदान करे|

सूचना का अधिकार 2005 प्रत्येक नागरिक को शक्ति प्रदान करता है कि वो:

  • सरकार से कुछ भी पूछे या कोई भी सूचना मांगे,
  • किसी भी सरकारी निर्णय की प्रति ले,
  • किसी भी सरकारी दस्तावेज का निरीक्षण करे,
  • किसी भी सरकारी कार्य का निरीक्षण करे,
  • किसी भी सरकारी कार्य के पदार्थों के नमूने ले|

सभी इकाइयां जो संविधान, या अन्य कानून या किसी सरकारी अधिसूचना के अधीन बनी हैं या सभी इकाइयां जिनमें गैर सरकारी संगठन शामिल हैं जो सरकार के हों, सरकार द्वारा नियंत्रित या वित्त- पोषित किये जाते हों| एक जन सूचना अधिकारी, सूचना देने से मना उन 11 विषयों के लिए कर सकता है जो सूचना का अधिकार अधिनियम के अनुच्छेद 8 में दिए गए हैं. इनमें विदेशी सरकारों से प्राप्त गोपनीय सूचना, देश की सुरक्षा, रणनीतिक, वैज्ञानिक या आर्थिक हितों की दृष्टि से हानिकारक सूचना, विधायिका के विशेषाधिकारों का उल्लंघन करने वाली सूचनाएं आदि. सूचना का अधिकार अधिनियम की दूसरी अनुसूची में उन 18 अभिकरणों की सूची दी गयी है जिन पर ये लागू नहीं होता| हालांकि उन्हें भी वो सूचनाएं देनी होंगी जो भ्रष्टाचार के आरोपों व मानवाधिकारों के उल्लंघन से सम्बंधित हो|

सूचना प्राप्ति के लिए हर विभाग एवं संस्था में जन सूचना अधिकारी का पद सृजित किया गया है| केंद्र सरकार के विभागों के मामलों में, 629 डाकघरों को उप जन सूचना अधिकारी बनाया गया है, अर्थात् आप इन डाकघरों में से किसी एक में जाकर सू. अ. पटल पर अपनी अर्जी व फीस जमा करा सकते हैं| वे आपको एक रसीद व आभार जारी करेंगे और यह उस डाकघर का उत्तरदायित्व है कि वो उसे उचित ज. सू. अ. के पास भेजे|

केंद्र सरकार के विभागों के लिए, सूचना प्राप्ति कि अर्जी का कोई प्रारूप नहीं है| आपको एक सादा कागज़ पर एक सामान्य अर्ज़ी की तरह ही अर्ज़ी देनी चाहिए| हालांकि कुछ राज्यों और कुछ मंत्रालयों व विभागों ने प्रारूप निर्धारित किये हैं| मैं सामान्यतः इस प्रारूप का प्रयोग करता हूँ:

१.      मेरा नाम:

२.      मेरा पता, संपर्क सूचनाएं

३.      मांगी गयी सूचना का विवरण:

  • विषय वस्तु
  • समयावधि जिससे सूचना सम्बंधित है
  • मेरे प्रश्न
  • सूचना प्राप्ति का तरीका, डाक/ इ-मेल/व्यक्तिगत

४.      क्या में गरीबी रेखा से नीचे हूँ?

५.      देय शुल्क का विवरण

 मैं सामन्यतः पोस्टल आर्डर या डिमांड ड्राफ्ट से शुल्क देता हूँ|