दिवाली अब भी मनती है

वर्षा उपरांत स्वच्छ गगन में झिलमिलाते असंख्य तारक तारिकाएँ रात्रि को गगन विहार को निकलतीं| लगता सप्तपाताल से लेकर सप्तस्वर्ग तक असंख्य आकाश-गंगाएं कलकल बह रहीं हों| दूर अन्तरिक्ष तक बहती इन आकाशगंगाओं में हजारों देव, देवेश्वर, देवादिराज, सहायक देव, उपदेव, वनदेव, ग्रामदेव आदि विचरण करते| देवियों देवेश्वरियों, सहायक देवियों, वनदेवियों, उपदेवियों, ग्रामदेवियों की मनोहर छटा होती| आकाश मानों ईश्वर का जगमगाता प्रतिबिम्ब हो| प्रतिबिम्बों अधिष्ठाता देव रात्रिपति चन्द्र को ईर्ष्या होती| कांतिहीन चंन्द्र अमावस की उस रात अपनी माँ की शरण चला जाता है| धरती पर कहीं छिप जाता है| उस रचे अनन्त षड्यंत्र इन आकाशगंगाओं की निर्झर बहने से रोकना चाहते हैं|

अहो! वर्षा उपरांत की यह अमावस रात!! देखी है क्या किसी दूर जंगल पहाड़ी के माथे बैठ कर| लहराता हुआ महासागर उससे ईर्ष्या करता है| उस के झिलमिल निर्झर प्रकाश में वनकुल की बूढ़ी स्त्रियाँ सुई में धागा पिरोती हैं| प्रकाश की किरणें नहीं प्रकाश का झरना है| प्रकृति की लहलहाता हुआ आँचल है| वर्षा उपरांत अमावस की रात यह रात अपने नेत्रों से देखी है!!

अकेला चन्द्र ही तो नहीं जो अनंत आकाशगंगाओं से ईर्ष्या करता है| सृष्टि विजय का स्वप्न है, मानव|

प्रकृति का दासत्व उसका उत्सव है| कोई आम उत्सव नहीं यह| स्वर्ग के देवों को भी प्रतीक्षा रहती है| मानव अनन्त आकाश गंगाओं से टकरा जाता है| धरती पर असंख्य दीप झिलमिला उठते हैं| आकाशगंगाओं में विचरण करते असंख्य देव, देवियाँ, देवेश्वर, देवेश्वारियां, देवादिराज, देवाधिदेवी, सहायक देव-देवियाँ, उपदेव-देवियाँ, वनदेव – देवियाँ, ग्रामदेव-देवियाँ घुटनों के बल बैठ जाते हैं| आकाशगंगा के किनारों से यह असंख्य देव देवियाँ पृथ्वी पर ताका करते हैं| अहा! यह दीपोत्सव है, यह दिवाली है| हर वर्ष हर वर्षा दीप बढ़ते जाते हैं| घी – तेल के दिया-बाती अपना संसार सृजते हैं| असंख्य देव भौचक रहते हैं| असंख्य देवियाँ किलकारियां भरती हैं| कौन किसको सराहे| कौन किसकी प्रशश्ति गाये| कौन किस का गुणगान करे| कौन किस की संगीत साधे|

अब देवता विचरण नहीं करते| अब देवियों की छटा नहीं दिखती| अब देव खांसते हैं| अब देवियाँ चकित नहीं होतीं| अब आकाश ईश्वर का प्रतिबिम्ब नहीं होता| चन्द्र अमावस में मलिन नहीं होता| चन्द्र पूर्णिमा को मैला रहता है| चन्द्र चांदनी नहीं बिखेरता| इस चांदनी का चकोर मोल नहीं लगता| इस चांदनी में मिलावट है| इस चांदनी में शीतलता नहीं है|

मिठाइयाँ अब भी बनती है| पूड़ियाँ अब भी छनती हैं| बच्चे अब भी चहकते हैं| कपड़े अब भी महकते हैं| दीवारें अब भी चमकतीं हैं| प्रेमी अब भी बहकते हैं| दीपोत्सव अब भी होता है| दिवाली अब भी मनती है| आकाश में कालिख छाई है| हवाओं में जहर पलता है| दिग्दिगंत कोलाहल है| काल का शंख अब बजता है| ये मानव का अट्टाहास है| यह बारूद धमाका है| यह बारूद पटाखा है| यह बारूद का गुलशन है| यह बारूद की खेती है| यह बारूद का मन दीवाना है|

यह बारूद का उत्सव है| यहाँ दीपक किसने जाना है? यहाँ गंगा किसने देखी हैं? चाँद किसे अब पाना है? यहाँ खुद को किसने जाना?

यहाँ दमा का दम भी घुटता है| हर नाक पर यहाँ अब कपड़ा है|

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मनभावन कर्जा

देश का हर बड़ा बिल्डर बर्बादी के कगार पर खड़ा है| दिवालिया कानून उसके सर पर मंडरा रहा है|

किसी भी शहर के बाहर निकल जाओ, निर्माणाधीन मकानों की भरमार है| अगर सारे मकान किसी न किसी को रहने के लिए दे दिए जाएँ तो कोई बेघर न रहे| मगर न बेघरों के पास घर हैं, इन मकानों के पास मालिक| जिनके पास मकान हैं तो कई हैं|

सरकार दायीं हो या बायीं – देश में बेघरों को सस्ते कर्जे की रोज घोषणा होती है| मगर जिन्हें घर की जरूरत है उन्हें शायद कर्ज नहीं मिलता| चलो सरकार कहती है, लो भाई जिनके पास पहले से घर हैं – वही लोग दोबारा कर्ज ले लो और एक और मकान ले लो| क्या इससे बेघरों की समस्या कम होती है| ये दो चार घर कर्जे पर खरीदने वाले लोग तो शायद किराये पर भी घर नहीं उठाते| शायद ही इनमें से किसी ने किराये की आय दिखाकर आयकर भरा हो| तो भी इतना कर्ज देते रहने से किसी लाभ?

सरकारी महाजन को – बैंक को| बैंक ने बिल्डर को मोटा कर्जे दे रखा है| बैंक को पता है, ये अपना कर्ज नहीं चुकाएगा| पुराना गुण्डा मवाली और नया नया नेता है| बड़े मेनेजर का हमप्याला यार भी है|

अब बैंक किसी ऐसे को पकड़ता हैं जो आँख का अँधा और गाँठ का पूरा हो – या कम से कम इतना भोला हो कि घर की आड़ में गधा बनकर बैंक के लिए सोलह घंटे काम कर सके| उसे उसकी जरूरत और औकात से ज्यादा का घर खरीदवा दो| बिल्डर को जो पैसा मकान के बदले देना हो बैंक उसकी एंट्री घुमाकर बिल्डर का कर्जा कम थोड़ा कम कर देता है| अब आपकी मासिक किस्त भी बनी तीस साल या और ज्यादा – मूल कम ब्याज ज्यादा| अगर आप आठ रुपया सैकड़ा भी ब्याज देंगे तो चालीस साल में बैंक को एक लाख में मूलधन पर पक्का वाला सुरक्षित ढाई लाख ब्याज आदि मिल जायेगा| अगर आप इस मकान में रहते हैं तो तो भावनात्मक लगाव आपको इस मकान को खतरे में नहीं डालने देगा या फिर आप इस से बड़ा और महंगा मकान खरीदेंगे|

इसमें सबसे बड़ा लाभ है – बिल्डर का| जो मकान मांग आपूर्ति के आधार पर वास्तव में दस लाख का नहीं बिकना चाहिए, वो पच्चीस लाख में बिकता है| उसे अपना मकान बेचने पर कोई खर्चा नहीं करना पड़ता| यह काम अक्सर बैंक करता है| बिल्डर और सारे रियल एस्टेट उद्योग तो तो इस बात की चिंता नहीं करनी कि अगर उनके मकानों की कीमतें कम हो जाएँ तो क्या होगा? इस का नुक्सान तो बैंक को भुगतना है| मकानों की कीमतें गिरने पर लोग कर्जा उतारने में दिलचस्पी कम कर देंगे| उधर बिल्डर भी मकान न बिकने का हवाला देकर कर्जा नहीं चुकायेंगे|

कुल मिला कर अपनी जरूरत के आधार पर घर खरीदें आसन कर्जे के आधार पर नहीं|

आतंकित सरकारें

किसी भी देश में आतंकवाद को बढ़ावा तभी मिल सकता है जब उस देश की सरकारें और उन सरकारों को चुनने वाली जनता डरपोक हो| जब भी हम किसी व्यक्ति या संगठन को आतंकवादी कहते हैं वो उसका सीधा अर्थ है कि हम डरे हुए हैं|

डरना उस कायरता का परिचायक है| कोई भी बहादुर देश किसी व्यक्ति या संगठन को अपराधी या अपराधिक संगठन कहे, तो समझ आता हैं| नियम क़ानून तोड़ने वाला व्यक्ति अपराधी है|कोई भी व्यक्ति एक देश काल में अपराध हो सकता है किसी अन्य देश काल में नहीं| उदाहरण के लिए मानहानि पहले बहुत से देशों में अपराध माना जाता था, परन्तु अब अधिकांश देश इस अपराध नहीं मानते|

जब हम किसी व्यक्ति या संगठन के उचित या अनुचित किसी भी कार्य से डरते हैं और उस डर को स्वीकार करते हैं तो उसे आतंकवादी कहते हैं|हम आतंकवाद का अपनी आतंरिक शक्ति में सामना नहीं कर पाते| यही कारण हैं कि सुदूर यूरोप में हुए बम धमाके हमारे “बहादुर” भारतियों को सोशल मीडिया में सक्रिय कर देते हैं| दूसरी ओर हम अपने देश में होने वाले बलात्कार, हत्याओं, रोज रोज की सड़क दुर्घटनाओं और चिकित्सीय लापरवाही से नहीं डरते| हम किसी सड़क दुर्घटना या दंगों में मारे गए 10 लोग नहीं डराते वरन हम सुदूर देश में किसी बम धमाके से डर जाते हैं|हमें गुजरात, राजस्थान या मुंबई में पत्थर फैंकते और बस जलाते उपद्रवी लड़के आतंकवादी नहीं लगते बल्कि कश्मीर में बम फैंकते लड़के हमारी नींद उड़ा देते हैं|हमारा अपना चुना हुआ डर ही हमें अधिक डराता है|

आतंकवाद दरअसल आतंकवादियों से अधिक उन लोगों का हथियार है जो इससे पैदा होने वाले डर से लाभान्वित होते हैं या डरने में जिन्हें प्रसन्नता मिलती हैं| दुनिया के दर्जन भर देश तबाह करने के बाद भी अमेरिका दुनिया का सबसे आतंकित मुल्क हैं – उसकी डरी हुई बहादुरी आतंकवाद के मुकाबले कहीं इंसानों की हर साल जान ले लेती है| कश्मीर में जितने लोग हर साल कुल मिला कर अपराधी और आतंकवादी घटनाओं में मारे जाते हैं कम से कम उतने लोग राजधानी दिल्ली या मुंबई में अपराधी घटनाओं में मारे जाते हैं| मगर हम नहीं डरते|अपराध और अपराधी हमें नहीं डराते| अपराधों से लड़ने वाले पुलिसवालों को उतना बड़ा मैडल नहीं मिलता जितना किसी कथित आतंकवादी से लड़ने वाले पुलिसवाले को मिलता है|

आतंकवाद की एक खास बात है, दुनिया की कोई भी सरकार आतंकवाद के आगे घुटने नहीं टेकती| आतंकवाद से लड़ने की कसमें खाना दुनिया भर की राजनीति में रोजमर्रा का शगल है| मगर छोटे छोटे अपराधियों और गुंडों के समूह के आगे सरकारें जब तब घुटने टेकती रहती हैं| भारत देश में पिछले सौ सालों में बहुत सी किताबें, नाटक और फ़िल्में सिर्फ इसलिए प्रतिबंधित हो गई कि सरकारों को कानून व्यवस्था के लिए ख़तरा लगा| हम सब जानते हैं यह ख़तरा उन किताबों, नाटकों और फिल्मों से नहीं बल्कि उनका कथित तौर पर विरोध करने वालों से था| सरकारें उनसे लड़ने में असमर्थ थीं और इतनी डरी हुयीं थी कि उन्हें आतंकवादी या अपराधी कहने का भी साहस न जुटा सकीं| उनसे लड़ने की बात तो दूर की बात है, पिछले सौ सालों में बहुत से हलफनामे सरकारों ने अदालत में दिए हैं कि किताबें, नाटक या फ़िल्में क़ानून व्यवस्था बिगाड़ देंगी – मतलब इतना बिगाड़ देंगी कि सरकार संभाल न पायेगी|

उफ़!! पिछले सौ साल में कोई सरकार हलफनामों में यह न कहने की हिम्मत भी न जुटा सकी कि वो जिनसे डरी हुई है वो किताब, नाटक या फिल्म नहीं गुण्डा तत्व हैं|

 

 

 

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मोबाइल बैंकिंग और सुरक्षा

मेरा मोबाइल को लेकर रिकॉर्ड काफी ख़राब रहा है| पहला मोबाइल लेने के बाद पहले आठ साल में मुझे आठ मोबाइल खरीदने पड़े| मगर मुझे केवल दो मोबाइल ही सेवानिवृत्त करने का अवसर मिला, शेष मोबाइल किसी न किसी जेबकतरे या उसके ग्राहकों को सेवाएं देते रहे| बाद में बैंकों में मोबाइल पर सुविधाएँ देना शुरू किया और तरह तरह के एप्प बनने लगे| तथाकथित कैशलेस समय में सरकार आपको अनजाने ही सलाह दे रही है कि अपने सारे बैंक खाते अपने मोबाइल की एप्प में डालकर चलो|

मुझे उनके एप्प की सुरक्षा के बारे में कुछ नहीं कहना| पहला तो मुझे तकनीकि जानकारी नहीं| दूसरा अगर असुरक्षित भी हों तो भी उनके बारे में टिपण्णी करकर मैं मानहानि के मुक़दमे को दावत नहीं देना चाहता|

मगर मेरा मोबाइल कितना सुरक्षित है? कोई निवेश सलाहकार सलाह नहीं देता कि अपने सारे निवेश के जगह किये जाएँ तो क्या अपनी सारी जायदाद की चाभी अपने मोबाइल में रख देना उचित है|

मोबाइल का चोरी हो जाना दिल्ली जैसे शहर में इतनी आम बात है दिल्ली पुलिस उसकी उचित चोरी रिपोर्ट भी लिखना उचित नहीं समझती| मोबाइल आपका पुराना मोबाइल बेचने से ज्यादा पैसे कमाएगा या दुरूपयोग करकर?

मोबाइल सिम क्लोंनिंग तकनीकि तौर पर बच्चों का खेल है| मोबाइल सिम आपके मोबाइल की मास्टर चाभी है| मोबाइल सिम क्लोंनिंग के अलावा भी मोबाइल में सेंध लगाने के तरीके मौजूद हैं| बहुत सारे स्पाईवेयर मोजूद हैं, जिनमें से कुछ चाइल्ड प्रोटेक्शन के नाम पर खुले आम मिलते और प्रयोग होते हैं| साथ में मोबाइल मैलवेयर हैं हीं|  पर क्या यह घोषित शत्रु की वास्तविक शत्रु हैं?

हाल में एक छात्र समूह ने अपने एक साथी की बिना इच्छा मोबाइल छीन कर उसके मोबाइल एप्प का प्रयोग एक भोजनालय में कर दिया| लेकिन अगर सोचें तो यह चिंताजनक बात हैं| आपके कोई भी मित्र परिवारीजन आपके मोबाइल से कुछ भी खर्च कर सकते हैं – आपका लाड़ला या लाड़ली भी|

मुझे मोबाइल एप्प का विचार सिरे से ही इसलिए बेकार लगता हैं की यह अत्यंत सरल है| आपको या किसी गलत व्यक्ति की मोबाइल पर इसका प्रयोग करते में समय नहीं लगता| दूसरा किसी भी प्रकार के एकल प्रयोग कुंजीशब्द (OTP) भी उसी मोबाइल पर आते हैं|

मुझे जब भी प्रयोग करना होता हैं मोबाइल पर भी नेटबैंकिंग का प्रयोग करना हूँ| यह सुरक्षित समय लेती हैं और बहुत सारी जानकारी मोबाइल में जमा कर कर नहीं रखती| आपको हर जानकारी खुद से देनी होती है| मैं नेटबैंकिंग के लिए अक्सर ब्राउज़र कि सुरक्षा विंडो (इन्कोग्नितो या इनप्राइवेट विंडो) का प्रयोग करता हूँ| यह आपके सारे डाटा को कम से कम अपने यहाँ सुरक्षित नहीं रखती|

अवैध चाय

अवैध चाय – हंसने का मन करता है न? अवैध चाय!!

सच्चाई यह है कि भारत में हर कार्यालय, विद्यालय, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय, गली, कूचे, मार्ग, महामार्ग, हाट, बाजार, सिनेमाघर और माल में अवैध चाय मिलती है| अवैध चाय का अवैध धंधा पिछले पांच-छः साल से धड़ल्ले से चल रहा है| पिछले पांच-छः साल क्यों?

क्यों पिछले पाँच-छः साल से सरकार ने हर खाने पीने की चीज़ बेचने के लिए एक पंजीकरण जरूरी कर दिया है| कुछ मामलों में पंजीकरण नहीं, बल्कि अनुमति-पत्र (लाइसेंस) जरूरी है| बिना पंजीकरण या अनुमति-पत्र के बनाये गए पेय और खाने को अवैध कहा जायेगा| वैसे दवाइयों के मामलें में इस तरह की दवाओं को सामान्यतः नकली कहा जाता है| आपके खाने को फिलहाल नकली नहीं कहा जा रहा|

मामला इतना संगीन हैं कि आपके ऑफिस में लगी चाय-कॉफ़ी की मशीन भी “शायद” अवैध है| अगर आप पुरानी दिल्ली/लखनऊ/हैदराबाद/कोई भी और शहर के किसी पुराने प्रसिद्ध भोजनालय में खाना खाते हैं तो हो सकता हैं, आप अवैध खाना खा रहे हैं|

मामला यहाँ तक नहीं रुकता| क्योंकि हिन्दुस्तानी होने के नाते आप दावत तो हर साल करते ही हैं| नहीं जनाब, मैं दारू पार्टी की बात नहीं कर रहा, जिसके अवैध होने का हर पार्टी-बाज दारूबाज को पता है| मैं बात कर रहा हूँ, शुद्ध सात्विक भोज/दावतों की, जिन्हें आप विवाह-भोज और ब्रह्म-भोज कहते हैं| आप जो पुरानी जान पहचान वाला खानदानी हलवाई पकड़ लाते हैं खाना बनाने के लिए, वो अवैध है|

यह वो कानून नहीं है, जिसके चलते देश के ७४ बड़े बूचडखाने गाय का मांस विदेश में बेचकर देश के लिए जरूरी विदेशी मुद्रा लाते हैं|

तो, अब ये कौन सा कानून है? यह वही क़ानून हैं जिसमें भारी-भरकम कंपनी की विलायती सिवईयां यानि नूडल बंद होने पर देश के हर चाय-पान वाले ने तालियाँ बजायीं थीं| यह वह क़ानून हैं जिसकी असली नकली मुहर (संख्या) खाना-पीना बनाने के सब सामान के पैकेट से लेकर डिब्बाबंद चाय-कॉफ़ी-टॉफ़ी-बिस्कुट-पिज़्ज़ा-बर्गर पर लगी होती है| यह वही कानून हैं, जिसकी मुहर (संख्या) बड़े बड़े होटल और भोजनालय के बिल पर पाई जाती है| यह वही क़ानून हैं, जिस में पंजीकरण न होने के कारण छोटे मोटे बूचडखाने जो देश की जनता के लिये मांस पैदा करते हैं, वो बंद किये जा रहे हैं|

आज बूचड़खाने बंद होंगे, कल सलाद की दूकान| और जब चाय-पान की दुकान बंद होगी तो आप सोचेंगें.. रहने दीजिये, कुछ नहीं सोचेंगें|

गौमांस के विरोध के चलते, देश का सारा मांस बंद हो रहा हैं, कल रबड़ी-फलूदा बंद हो जाए तो क्या दिक्कत है|

इस पोस्ट का मकसद हंगामा खड़ा करना नहीं है| देश के हर छोटे बड़े व्यवसायी के पास मौका है कि अपनी दूकान, होटल, रेस्टोरंट, ढाबा, ठेल, तख़्त, या चूल्हे का स्थाई पता और अपना पहचान पत्र देकर अपना पंजीकरण कराये| इस से आगे मैं क्या सलाह दे सकता हूँ? आप समझदार हैं|

टिपण्णी – इस आलेख में कही गई बातें कानूनी सलाह या निष्कर्ष नहीं हैं वरन हल्के फुल्के ढ़ंग से बेहद जटिल क़ानून समझाने का प्रयास है| कृपया, उचित कानूनी सलाह अवश्य लें|

कार्ड भुगतान का खर्च

विमुद्रीकरण के बाद जन सामान्य को नगद भुगतान न करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है| पुरानी दिल्ली की एक दुकान पर भुगतान करने के लिए जब हमारे मित्र ने भुगतान करने के डेबिट कार्ड निकला तब दुकानदार ने कहा, साढ़े छः प्रतिशत अतिरिक्त देना होगा| ध्यान रहे मॉल में भुगतान करते समय इस प्रकार का अतिरिक्त भुगतान नहीं करना पड़ता| आइये, मुद्दे की पड़ताल करते हैं|

पुरानी दिल्ली के दूकानदार प्रायः कम सकल लाभ (gross profit) पर सामान बेचते हैं| उनके द्वारा कमाया जाने वाला सकल लाभ मॉल वालों के सकल लाभ से बहुत कम होता है| कम सकल लाभ कमाने के कारण, इनके पास अतिरिक्त खर्चों की गुंजायश बहुत कम होती है| इस लिए हर अतिरिक्त खर्चे को टाला जाता है| नगद भुगतान लेने के बाद यह लोग अपने  सारे खर्च नगद में करते हैं, घर में ले जाये जाने वाला शुद्ध लाभ भी नगद होता है और बैंक में केवल घरेलू बचत ही जमा की जाती है| इस प्रकार इन्हें नगदी प्रबंधन में समय और पैसा नहीं खर्च करना पड़ता|

जब किसी व्यापार प्रणाली को कार्ड से भुगतान लेना होता है तब उसे एक महंगी सुविधा अपने साथ जोड़नी होती है| इसमें कार्ड प्रदाता कंपनी, भुगतान प्रक्रिया कंपनी, इन्टरनेट सेवा कंपनी, बैंकिंग कंपनी सब उस व्यापार प्रक्रिया में जुड़ते हैं| अतिरिक्त खर्चे इस प्रकार हैं –

  • कार्ड धारक का वार्षिक शुल्क,
  • गेटवे चार्जेज – प्रायः कार्ड रीडर मशीन, उनका प्रबंधन, और बैंक आदि से मशीन का संपर्क एक महँगी प्रक्रिया है| कोई न कोई इस कीमत को अदा करता हैं और बाद में ग्राहक से वसूलता है|
  • हर भुगतान पर शुल्क – जो डेबिट कार्ड के मामले में आधा से डेढ़ प्रतिशत और क्रेडिट कार्ड के मामले में डेढ़ से तीन प्रतिशत तक होता है| सरकारी भुगतान जैसे स्टाम्प ड्यूटी, सरकार समर्थित सेवा जैसे रेलवे आरक्षण, आदि के मामले में भुगतान करने वाला इस कीमत को अदा करता है, जबकि मॉल आदि अपने लाभ में से इसे भुगतते हैं| ध्यान रहे कि मॉल के बड़े दुकानदारों के लिए नगदी का प्रबंधन भी उतना ही महंगा होता है| भुगतान प्रक्रिया भुगतान कर्ता, कंपनी कार्ड कंपनी, भुगतानकर्ता के बैंक, विक्रेता के बैंक और विक्रेता, आदि को जोड़ती है| इसका खर्च दूकानदार को, या कहें कि ग्राहक को ही देना होता है|
  • दोनों बैंक अपने अपने ग्राहक से बैंक चार्ज के नाम पर वसूली करतीं हैं| डेबिट कार्ड के मामले में यह चार्ज सीधे ही वसूला जा सकता है| क्रेडिट कार्ड के मामले में अगर आप समय पर पैसा नहीं दे पाते तो कंपनी को लाभ होता है| इस प्रकार की उधारी पर कंपनी 24 से 48 प्रतिशत तक बार्षिक ब्याज़ वसूलती है| इस प्रकार के लापरवाह ग्राहक कंपनी के लिए कीमती होते हैं, न कि समय पर पैसा लौटाने वाले|
  • इन सभी सेवा प्रदाताओं को संपर्क में लेन के लिए इन्टरनेट सेवा का प्रयोग होता है|

आपको ऐसे दुकानदार भी मिलेंगे जिनके पास कार्ड रीडर मशीन बंद पड़ी होंगी| कई बार छोटे दुकानदार डेबिट कार्ड या क्रेडिट कार्ड के इस प्रबंधन को अपने निकट के बड़े दुकानदार की मदद से अंजाम (आउटसोर्सिंग) देते हैं| यह बड़ा दुकानदार इस सुविधा के लिए कुछ रकम चार्ज करता है| यह चार्ज सामान्य चार्ज से लगभग ढाई – तीन गुना होता है| इसमें बड़े दुकानदार के सारे खर्चे और लाभ शामिल होते हैं| मूल रकम बड़े दुकानदार को सेवा मांगने वाले बड़े दुकानदार को देनी होती है| यह व्यापर की दुनिया में, तमाम सरकारी निमयों और वैट के बीच, जटिल और खर्चीली प्रकिर्या है|

इस प्रकार मुझे उस छोटे दुकानदार द्वारा डेबिट कार्ड के लिए साढ़े छः प्रतिशत मांगना गलत नहीं लगता|

पुनःश्च – मोबाइल वॉलेट में भी छिपी हुई कीमत होती है, जो फिलहाल आपके निजी आंकड़े के रूप में वसूली जा रही हैं|

पुनः पुनःश्च – नेशनल पेमेंट कारपोरेशन ऑफ़ इंडिया और आपके अपने बैंक द्वारा शुरू किया गया यूनिफाइड पेमेंट इंटरफ़ेस एक बेहतर विकल्प हो सकता है| अज्ञात कारणों से बैंक अपनी इस सुविधा का व्यापक प्रचार नहीं कर रहीं|

काले धन के सफ़ेदपोश स्रोत

सुनकर हँसी आती है, मगर काले धन के अधिकतर स्रोत सफ़ेदपोश हैं और समाज में अपनी इज्जत रखते हैं| काले धन की सरकारी और लोकप्रिय परिभाषा में जमीन आसमान का अंतर है| जनसामान्य में काले धन का अर्थ है भ्रष्टाचार यानि रिश्वत का पैसा| जनसामान्य की अवधारणा में सरकारी घोटाले का अर्थ भी सिर्फ रिश्वत होता है| काले धन की सरकारी परिभाषा बहुत व्यापक है इसमें वह सभी धन आता है जिसका हिसाब किताब सरकार के पास न हो| भले ही सरकारें मानें या नहीं; ऐसा धन जिसका हिसाब किताब सरकार के बस में न हो, वो भी काला धन मान लिया जाता है|

इस पोस्ट में इसपर विस्तार से चर्चा करेंगे|

काला धन

सरकार जिस धन को अघोषित धन कहती है उसका सामान्य अनुवाद काला धन किया जाता है|

काला धन वास्तव में वह धन है जिसका हिसाब किताब सरकार को न दिया गया हो और हिसाब किताब देने की कानूनी जरूरत न होने पर जिसका हिसाब किताब सरकार ने न लगाया हो| इसमें शामिल धन इस प्रकार होता है (पढ़ते समय सफ़ेदपोश स्रोतों की पहचान आप खुद कर पाएंगे| कृपया धनात्मक और ऋणात्मक चिन्ह पर भी ध्यान देते रहें|) –

+ भ्रष्टाचार/रिश्वत, जिसे हम सब जानते हैं| परन्तु रिश्वत या उपहार लेने के ऐसे तरीके भी विकसित हुए हैं, जिसमें रिश्वत का धन सफ़ेद रहता है| जैसे कोई भ्रष्ट अधिकारी की पत्नी/बेटी को सलाहकार के रूप में वेतन या कीमत दे| भ्रष्टाचार के बड़े हिस्से में सरकारी क्षेत्र शामिल नहीं होता मगर यह छोटा सरकारी हिस्सा आम जनता को बेहद परेशान करता है| निजी क्षेत्र में खरीदफरोख्त के लाभ में हिस्सेदारी का व्यापक चलन है, मगर… भगवान मूंह न खुलवाए| निजी स्कूल, निजी चिकित्सालय, बिजली कम्पनियां, आदि समय समय पर जनता के साथ कालेधन वाला लेनदेन करने ले लिए चर्चा में आते हैं|

– घोटाला, बोफोर्स घोटाले में कथित रूप से खाया गया कमीशन भ्रष्टाचार की श्रेणी में है| टूजी घोटाले में अधिक दाम की चीज स्पेक्ट्रम को कम दाम पर बेचने का आरोप है, ऐसा करना गलत परन्तु कालाधन नहीं पैदा करता| हाँ, ऐसा करने के लिए रिश्वत दिए जाने में भ्रष्टाचारजन्य कालाधन पैदा होगा|

+ गोलगप्पा, जी हाँ स्ट्रीट फ़ूड या ढ़ाबे कालेधन का सबसे बड़ा स्रोत है| यहाँ होने वाली आय आयकर के लिए रिपोर्ट नहीं होती| अगर कोई स्टाल केवल हर दिन १०० प्लेट मात्र बीस रुपये प्लेट की दर से मात्र गोलगप्पे बेचती है तो भी आयकर की सीमा में आने लायक धन प्राप्त कर लेती है| परन्तु यह धन काले धन में बदल जाता है|

– बड़े भोजनालय जिनमें आपको बिल मिलता है वहां पर दिया गया नगद धन बहुत बार कालाधन होता है, मगर यहाँ खर्च होने के बाद यह कालाधन सफ़ेद हो सकता है, बशर्ते यह भोजनालय सरकार को ठीक से सभी कर दे| इस क्षेत्र में अगर मगर बहुत है|

+ किराना आदि दुकान, कोई भी दुकान जहाँ आप बिल नहीं लेते देते काला धन पैदा करती है| भले ही दुकानदार कुछ भी कहे, कर चोरी के कारण यह कालाधन पैदा करती हैं| मजे की बात है, यह व्यापारी वर्ग भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज उठाने वाला प्रमुख तबका है| यह लोग अपनी कर चोरी को कठिन प्रक्रियाओं के हवाले से जायज बताते रहे हैं| बिक्रीकर से जीएसटी का वर्तमान सफ़र इन सभी लोगों द्वारा पैदा किये जाने वाले कालेधन को ख़त्म करने का कठिन प्रयास है| प्रक्रिया का सरलीकरण कहीं अधिक सुरक्षित समाधान हो सकता था और जीएसटी की प्रस्तावित कठिन प्रणाली अभी रोड़ा बनी रहेगी| अगर आपने बिल नहीं लिया है, बैंक भुगतान नहीं किया है, तो काला धन यहाँ पैदा होता है|

+ दहेज़, जी हाँ, दहेज़ भारत में काले धन के प्रमुख सोत में से एक है| जब भी दहेज़ में नगद धनराशि स्वीकार की जाती है तब काले धन का उत्पादन होता है| सामान्य घरों में बहुत सारा नगद धन भ्रष्टाचार से नहीं दहेज़ से आता है| दहेज़ में बेटी के नाम की पासबुक, फिक्स्ड डिपाजिट आदि कालेधन को भी रोकते हैं और बेटी का भविष्य भी बचाते हैं|

+ घरेलू बचत, यह सोचना हास्यास्पद लगता है परन्तु नगद बचतें अल्प मात्रा में ही सही मगर काले धन को जन्म देती हैं| जब हम इन बचतों को बैंक में नहीं जमा करते तो दो खतरे रहते हैं – पहला, मुद्रास्फीति इस नगद धन को क्रयशक्ति कम कर देती है| दूसरा, लम्बी अवधि के बाद आज इस प्रकार की बचत को आयकर विभाग को समझा पाना मुश्किल और महंगा कार्य है|

+ मकान किराया, जब इस वर्ष सरकार ने आयकर सम्बंधित आंकड़े प्रकाशित किये थे| उन्हें देखकर प्रहले दृष्टि में प्रतीत होता था कि यह देश में किराये से आय की संख्या न होकर देश भर में किराये पर उठाये गए मकानों की संख्या है| जी हाँ, अगर किराया आयकर रिटर्न में न दिखाया जाए तो काला धन है| आप हाउस रेंट अलाउंस और किराये से आय के आंकड़े देखकर हँसी नहीं रोक पाएंगे|

+रियल एस्टेट, जब भी आप मकान खरीदें तब अधिकतर विक्रेता आयकर और क्रेता स्टाम्प ड्यूटी बचने के लिए कम कर कर मूल्य लिखाते हैं और काले धन पैदा होता है| कई मामलों में क्रेता बैंक लोन लेने के लिए पूरा मूल्य चुकाना चाहें तो विक्रेता कर-राशि की अतिरिक्त मांग करते हैं| रियल एस्टेट काला धन खपाने का सबसे प्रचलित तरीका है| रियल एस्टेट में काले धन का दुष्प्रभाव दिल्ली के आसपास खाली पड़े आवासीय इकाइयों के रूप में दिखता है जिसे कोई अब नहीं खरीद पा रहा है|

– सोना – चांदी, काले धन का अधिकतम निवेश कालाधन माना जाता है| सोने ने दाउद इब्राहीम से लेकर सर्राफ़ा सरताजों की जिन्दगी चमकदार काली करने में मदद की है| इनमें से आज कोई देशद्रोही और कोई देशप्रेमी कहलाता है, मगर बड़ी मात्रा में धन काला है| काली सम्पत्ति की खरीद फरोख्त काला धन पैदा करती है|

+ अवैध धंधे, वैश्यावृत्ति, ड्रग; जब धंधा अवैध है तब कमाई कानून को कैसे दिखाई जाए? कुछ लोग एक हिस्सा बैंक में डालते हैं मगर बड़ा हिस्सा काला रहता है|

– शराब; कुछ भी कहिये, कितनी घृणा करें| शराब काले को सफ़ेद करती है| अधिकतर इसकी खरीद काले धन से होती है| मेहनत की कमाई स्वाद के दीवाने ही बरबाद करते हैं, बाकि लोग काला पैसा दुकान पर देते हैं| जो बिक्री के बाद अकाउंट में जाने के कारण सफ़ेद हो जाता है|

+ विदेशों से तस्करी; इस प्रकार के तस्करों से भारत घृणा करता है| सीमाशुल्क की चोरी से लाया गया माल बिक्रीकर और आयकर वालों को कौन बताएगा? पैसे के लेनदेन में अन्तराष्ट्रीय हवाला का प्रयोग होता है|

+ करखानों से तस्करी (कच्चे का काम); यह सफ़ेदपोश तस्करी है| इज्जत का नाम है – कच्चा काम| इसमें उत्पादशुल्क, बिक्रीकर, आयकर सब बच जाते हैं| लेनदेन में सफेदपोश हवाला की सेवाएं ली जातीं है|

  • उपरोक्त दोनों तस्करियों में अन्तराष्ट्रीय हवाला और सफेदपोश हवाला में वही अंतर है जो पाकिस्तान सरकार अफगानी तालिबान और पाकिस्तानी तालिबान में बताती है|

+ सरकारी शिक्षकों की निजी कोचिंग; हम शिक्षकों का सम्मान करते हैं इसलिए इस मुद्दे को रहने देते हैं|

+ सरकारी डॉक्टर, सरकारी वकील की निजी सेवाएं; यह लोग परे पेशेवर भाई हैं इसलिए यहाँ भी माफ़ किया जाये|

+ कृषि आय; यह से सरकारी सफ़ेद गाय| क्या कहें, बालीवुड वाले लम्बू मोटू सब तो किसान भाई हैं| वैसे मामला यह है कि कृषि अर्थव्यवस्था नगद आधारित है, इस कारण गांव – देहात के अन्य कार्य भी नगद आधारित होते हैं| नगद की इस कृषि अर्थव्यवस्था को नगद की काली अर्थव्यवस्था से जुड़ने में जरा सहूलियत होती है| अगर यह सरकारी आयकर व्यवस्था से जुड़ने के प्रयास करे तो किसान भाई का गैर – कृषि आयकर दोगुना या तीन गुना हो जाता है|

क्या कुछ छूट गया? हो सकता है| भारतीय शादी – ब्याह, चुनाव, और होली – दिवाली – ईद काले धन के सबसे बड़े उत्सव हैं| ईमानदार लोग यहाँ सोच समझ कर तंग हाथ पैसा खर्च करते हैं, कई बार होश में बिक्रीकर बचा जाते हैं|