लम्बा चौड़ा कराधान दायरा

संभावित अमीर और नए अमीर अक्सर यह मांग करते हैं कि सरकार करों के नाम पर उन्हें न लूटे और कराधान का दायरा बड़ा कर कर अधिक लोगों से करवसूल करे| मुझे अक्सर उनकी मांग के भोलेपन पर दया नहीं, तरस आता है| अक्सर यह लोग इस प्रकार का बर्ताव करते हैं कि मानो देश में कोई साम्यवादी या समाजवादी व्यवस्था उन्हें उनकी मेहनत और अमीरी के लिए परेशान कर रही है| दुनिया के हर पूंजीवादी देश में पूंजीपतियों पर अधिक कर हैं| अमेरिकी कांग्रेस तो और बढ़ाने पर विचार भी कर रही है| आखिर कराधान का दायरा बढ़ाने से इन लोगों की मुराद क्या है? क्या सरकार गरीबों से कर लेना शुरू करे? क्या गरीब कर नहीं देते?

वास्तविकता यह है कि गरीब कुल प्रतिशत में अमीरों के मुकाबले अधिक कर देते हैं| यह बाद नए वस्तु एवं सेवा कर अधिनियम के बाद बहुत अधिक विश्वास के साथ कही जा सकती है| भारत में दो प्रकार के कर लगते हैं:

  • प्रत्यक्ष कर यानि आयकर और
  • अप्रत्यक्ष कर यानि वस्तु एवं सेवा कर|

फिलहाल आयकर का दायरा बढ़ाने के दो तरीके हैं:

  • गरीबों से आयकर लेना;
  • अधिक लोगों को रोजगार देकर वर्तमान कर सीमा में लेकर आना;
  • वर्तमान कर सीमा के अन्दर के लोगों की कर चोरी पकड़ना|

गरीबों से कर लेना सरल तो हैं परन्तु एक गरीब की आयकर विवरणी को भरवाने और देखने मात्र में आयकर विभाग के कम से कम हजार रुपए खर्च होंगे| इतना ही पैसा कोई भी उनकी आयकर विवरणी भरने का भी लेगा| क्या आपको लगता हैं कि जिसका कर पांच हजार से कम हो उस की आयकर विवरणी भरवाने का कोई फायदा है| यही कारण है कि सरकार पांच लाख तक की आय वालों को आयकर विवरणी भरने से छूट देनी चाहिए| जिससे सरकार को फालतू खर्च न उठाना पड़े| परन्तु सरकार ऐसा नहीं कर पाती| बल्कि फालतू कर विवरणी को पढ़ने के लिए अब महंगी तकनीक का सहारा लिया जा रहा है|

सोचें क्यों? साथ ही यह भी सोचें कि इस प्रकार सरकार से आप कितना पैसा कर प्रशासन के मद में फालतू खर्च करवा रहे हैं|

पिछले बीस साल में सरकार और निजी क्षेत्र सबको खर्च कम करने की लत पड़ चुकी है| इसलिए नौकरियां नहीं दी जा रहीं| मगर क्या सोचा है कि हर नया नौकर अपनी नई आय खर्च करेगा तो हर साल में अपनी आय का लगभग २८% प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर से रूप में मिलाकर सरकार को सीधे और लगभग ५०% दूसरों के माध्यम से लौटा देगा| मैं उन नौकरियों की बात कर रहा हूँ जिन्हें पैदा नहीं करना वरन भरना मात्र है| नई नौकरियों में जरूर कुछ अधिक खर्च होगा|

कर चोरी पर मुझे कुछ नहीं कहना| मुझे लगता है कि यही लोग हैं जो कराधान के दायरा लेकर रोते रहते हैं और अक्सर खुद तस्करों की श्रेणी में आते हैं|

(विशेष टिपण्णी: तस्कर अप्रत्यक्ष कर के चोर को कहते हैं, प्रत्यक्ष कर के चोर के लिए करचोर जैसे सम्मानित शब्द का विधान किया गया है|)

अगर अप्रत्यक्ष कर की बात की जाए तो हाल में देश के सबसे सुलभ और सबसे सस्ते बिस्कुट की बिक्री में कमी की बात सामने आई| कहा गया नोटबंदी और अप्रत्यक्ष कर के कारण लोग इसे नहीं खरीद पा रहे| जबाब में कहा जाता है कि उस बिस्कुट पर कर नया तो नहीं है| चीनी या मसाले सब पर कर लगता है| इतना ही है कि अब नमक सत्याग्रह नहीं हो सकता क्योंकि उसकर घरेलू नमक पर इस समय शून्य की दर से लगता है|

जब भी आप कराधान के दायरे की बात करें सोचें कि कौन है जो कर के दायरे में नहीं है?

चलते चलते इतना जरूर कहूँगा, किसी भी समझदार अमीर की कार पर कोई कर नहीं लगता| क्या वास्तव में उसपर कर लगता है?

#गहरानाज्ञान #तीसराशनिचर

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३७१ और नगालैंड

पिछले सप्ताह अपने आलेख ३७० से आगे में मैंने लिखा था, जन भावना से इतर नगालैंड सबसे गंभीर मुद्दा है| मोदी जी ने सरकार बनाते ही इस मुद्दे पर ध्यान दिया था जिसपर जनता (खासकर भक्त प्रजाति) ने कोई विशेष ध्यान नहीं दिया था|

पूर्वोत्तर भारत के बारे में शेष भारत की जानकारी अत्यल्प रही है| पूर्वोतर को समझने का सरल तरीका अनिल यादव की यात्रा पुस्तक वह भी कोई देस है महाराज हो सकता है| परन्तु यह पुस्तक आज का मेरा विषय नहीं है|

जिस समय भारत एक देश, एक संविधान, एक विधान, एक निशान, एक पतान जैसी बातों में उलझा रहता है, नगालैण्ड से अलगाववादियों द्वारा अपना अनधिकृत झंडा फहराए जाने की ख़बरें भारतीय मुख्यधारा मीडिया में हाशिए पर भी अपनी जगह नहीं बना पातीं| नगालैंड से आने वाली ख़बरों का हाशिए पर रहना शायद कई कारणों से है| शेष भारत को इस्लामिक कश्मीर में अधिक दिलचस्पी है, इसाई नगालैंड से उन्हें अधिक फर्क नहीं पड़ता| जिस समय हम कश्मीर पर उलझे रहते हैं, हम भूल जाते हैं नगालैंड का नाम Unrepresented Nations and Peoples Organization (UNPO) जैसे खतरनाक संगठन में सन १९९३ से मौजूद है| कश्मीर इस संस्था का सदस्य नहीं रहा| यह संस्था UNPO उन भौगोलिक इकाइयों का संगठन हैं जिनके भविष्य में स्वतंत्र राष्ट्र होने के बारे में अन्तराष्ट्रीय प्रयास जारी हैं| आर्मीनिया, पूर्वी तिमूर, एस्टोनिया, लात्विया, जॉर्जिया, पलाऊ, इस संस्था से निकलकर आज सयुंक्त राष्ट्र संघ के सदस्य बन चुके हैं|

३ अगस्त २०१५ में भारत सरकार ने UNPO में नगालैंड का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठन नेशनलिस्ट सोशलिस्ट कौंसिल ऑफ़ नागालैंड के साथ नई दिल्ली में शांति समझौता किया था| इस समझौते के विवरण किसी भी पक्ष ने जनता के समक्ष नहीं रखे हैं| २०१७ से माना जाता है कि दोनों पक्ष निर्णय के निकट हैं|

वर्तमान मुख्यमंत्री २००३ से २०१३ तक कांग्रेस और २०१८ से अब तक भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़कर मुख्यमंत्री हैं| मुख्यंत्री द्वारा  केंद्र (मोदी) सरकार के नागरिकता (संशोधन) विधेयक का विरोध किया जाना पिछले साल ख़बरों में रहा था| मुख्यमंत्री का विचार था यह कानून संविधान के अनुच्छेद ३७१ के अनुरूप नहीं हैं| कोई भी मुख्यंत्री अपने राज्य को मिले विशेषाधिकारों को बनाये रखने की बात करेगा| परन्तु भारत की जनता के लिए समझने की बात यह है कि अनुच्छेद ३७० के आगे भी राष्ट्रहित, एकता और अनेकता मौजूद है| अनुच्छेद ३७१ के अनुसार नगालैंड को निम्नलिखित विशेषधिकार प्राप्त हैं –

  • धार्मिक और सामाजिक गतिविधियां;
  • नगा संप्रदाय के कानून;
  • नगा कानूनों के आधार पर नागरिक और आपराधिक मामलों में न्याय; और
  • जमीन का स्वामित्व और खरीद-फरोख्त

मेरा आग्रह यही है कि जन-उन्माद के हटकर सोच समझ कर बातें की जाएँ| भारत्त की अनेकता इसकी शक्ति है| जनमत और जनप्रिय नेतृत्व को उन्माद के आधार पर निर्णय लेने के लिए न उकसाया जाए| राष्ट्र के हितों की समझपूर्वक रक्षा की जानी चाहिए|

३७० से आगे

राजनीतिक, कूटनीतिक और रणनीतिक निर्णयों में सही गलत के फ़ैसले संविधान तय नहीं करता| सही गलत का निर्णय इतिहास तय करता हैं और इतिहास इतिहासकरों से अधिक समर्थकों और जनकवियों पर आश्रित होता है| आप जो निर्णय आज सही माना जाए वह पांच हजार वर्ष बाद गलत माना जा सकता है|

भावनात्मक समर्थन या विरोध से हटकर कोई तय नहीं कर सकता कि कौरव और पांडवों में नीतिगत रूप से सही उत्तराधिकारी कौन था| कुरुवंश अगली तीन पीढ़ियों में समाप्त हो गया| रावण द्वारा अपनी बहन के अपमान का बदला लेने के निर्णय पर कोई प्रश्नचिन्ह नहीं हैं परन्तु प्रश्न यह है कि क्या उसने कठिन शत्रु से शत्रुता करनी चाहिए थी और क्या उसने सही तरीका अपनाया| आज इन प्रश्नों पर विचार का कोई लाभ नहीं|

कश्मीर पर अनुच्छेद ३७० का बना रहना या चले जाना इसी प्रकार का प्रश्न है जिसका उत्तर इतिहास देगा| अनुच्छेद ३७० का पक्ष विपक्ष उसके होने न होने के लाभ हानि पर आज केवल भावनात्मक उत्तर देता हैं| संविधान में इस प्रकार के अन्य अनुच्छेद सरलता से मौजूद हैं| जन भावना से इतर नगालैंड सबसे गंभीर मुद्दा है| मोदी जी ने सरकार बनाते ही इस मुद्दे पर ध्यान दिया था जिसपर जनता (खासकर भक्त प्रजाति) ने कोई विशेष ध्यान नहीं दिया था|

कश्मीर मात्र छद्म मुद्दा रहा है| एक रजवाड़े की महत्वाकांक्षा और जनभावनाओं पर उसका अनिर्णय कश्मीर की कुल कहानी हैं जिसमें दो बड़े देश स्थानीय जनता की भावनाओं के बारे में आज तक असमंजस और भय में रहे हैं| वर्ना हैदराबाद, गोवा सेन्य कार्यवाही और जूनागढ़ जनमत के साथ भारत में विलयित हुए हैं और उनकी जनता आज मानती हैं कि उनका भारत विलय उचित रहा है|

इस समय पक्ष विपक्ष के प्रश्न इस बात पर आधारित हैं कि क्या भारत की केन्द्रीय सरकार और शेष भारत की जनता कश्मीर की जनता के साथ भावनात्मक एकता बना पायेगी? खासकर तब जब अनुच्छेद ३७० को निष्प्रभावी बनाते समय केंद्र सरकार ने अतिशय तिकड़म का प्रयोग करते हुए कश्मीर की सशंकित जनता के मन में अधिक अविश्वास पैदा कर दिया हैं| अब इस कदम को सफल बनाने का सारा दारोमदार अब भारत की जनता पर है|

दुर्भाग्य से भारत की जनता का राष्ट्रीय एकता के प्रश्न पर अच्छा प्रदर्शन नहीं रहा है| सामाजिक माध्यमों में जिस प्रकार के असभ्य और अनुपयुक्त सन्देश एक हफ्ते में डाले गए उनसे भारतीय एकता पर मोदी सरकार के प्रयासों को उनके भक्तों की ओर से ही धक्का लगा है| यदि मोदी सरकार और भाजपा कार्यकर्त्ता “भक्त प्रजाति” के समर्थकों पर जल्द काबू नहीं करते तो यह वर्ग सरकार के लिए दूरगामी कठिनाई पैदा कर सकता है|

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अनुपालन के खिलाफ दुष्प्रचार

राजनीति को भारत में दुष्प्रचार का एक गंदा खेल माना जाता है और जनता ने इसे जीवन की वास्तविकता के रूप में स्वीकार कर लिया है। दुर्भाग्य से, कुछ भारतीय पेशेवरों ने अनुपालन और अनुपालन पेशेवरों के खिलाफ दुष्प्रचार करना प्रारंभ किया है| मीडिया की भूमिका भी प्रश्नचिन्हों में घिरने लगी है। यह स्पष्ट है कि भारतीय मीडिया प्रकाशन करने से पहले कोई शोध नहीं करता है और तथ्यों को सत्यापित भी नहीं करता है। 12 जून 2019 को डेक्कन क्रॉनिकल द्वारा प्रकाशित और कुछ अन्य पत्रों द्वारा नक़ल कर छापे गए गए दुष्प्रचार का “वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण से फर्मों के लिए ई-फॉर्म 22 ए को माफ करने का आग्रह” शीर्षक से प्रकाशित किया गया था।

ऐसा लगता है कि एक चार्टर्ड अकाउंटेंट ने फॉर्म आईएनसी – 22 ए, जिसे लोकप्रिय रूप से प्रपत्र सक्रिय (फॉर्म एक्टिव) कहा जाता है, में दिये गए एक जाँच बिंदु के विरुद्ध पांच पृष्ठ का एक लम्बा ज्ञापन प्रस्तुत किया है। कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय द्वारा अच्छी तरह से तैयार किए गए इस प्रपत्र सक्रिय (फॉर्म एक्टिव) का उद्देश्य किसी कंपनी की अनुपालन स्थिति की जांच करना है। पूर्णतः अनुपालित कंपनी के मामले में कंपनी के पंजीकृत कार्यालय के अक्षांश देशान्तर (जियो टैगिंग) को छोड़कर यह प्रपत्र सक्रिय (फॉर्म एक्टिव) लगभग स्वतः भर जाता है। हमने प्रपत्र सक्रिय के बारे में पहले भी विस्तार से चर्चा की है| उसके बाद फॉर्म भरने का समय बढ़ाये जाने के समय; हमने किसी भी पेशे या अनुपालन शासन का को विरोध किये बिना एक व्यावहारिक समस्या के समाधान के लिए एक उचित तरीके पर भी चर्चा की थी। हालांकि, इस फॉर्म को भरने की तारीख को कुछ कठिनाई के आधार पर एक बार फिर से बढ़ाये जाने (आज 15 जून 2019 से आगे) की आवश्यकता हो सकती है, लेकिन उपरोक्त दुष्प्रचार प्रचार में उल्लेखित कुछ भी निश्चित जमीन आधार पर नहीं है।

कुछ महीनों पहले, कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय ने लगभग 5 लाख कंपनियों का नाम कम्पनी पंजी से हटा दिया था| इन कंपनियों ने अपने वार्षिक खातों और वार्षिक रिटर्न तीन या अधिक वित्तीय वर्षों से पंजीकरण कार्यालय में नहीं किये थे। दिलचस्प बात यह है कि कंपनी प्रवर्तकों, शेयरधारकों, निदेशकों, लेखा परीक्षकों, देनदारों और लेनदारों सहित इन कंपनियों के 0.01% हितधारकों ने भी इसपर कभी कोई आपत्ति भी नहीं जताई| केवल मुट्ठी भर हितधारकों ने ही अपनी कंपनियों के पुनर्जीवन के लिए राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण का दरवाजा खटखटाया। यह समझा जाता है कि पंजी से हटाई गईं आधे से अधिक कंपनियों के हितधारकों ने कुछ विशेष उद्देश्यों के लिए इन कंपनियों का उपयोग किया या यूँ कहें कि दुरुपयोग किया| वास्तव में इन कंपनियों को दुरुपयोग के बाद यूं ही छोड़ दिया गया था। इन कंपनियों में, जहां कॉर्पोरेट संरचना का दुरुपयोग किया गया था, उन्हें सही मायनों में शेल कंपनियां कहा जा सकता है। बाकी बंद की गई कंपनियां या तो उचित व्यवसाय योजना के बिना काम शुरू करने वाले निर्दोष प्रमोटरों से संबंधित हैं या उनके प्रमोटर अब जीवित नहीं हैं या कारोबार करने के बाद सेवानिवृत्त हो चुके हैं जिन्होंने अपनी कंपनियों को बंद किए बिना कारोबार को बंद कर दिया है।

हालाँकि, भारत में वर्तमान में संदिग्ध अनुपालन वाली भारतीय कंपनियों के बीच प्रपत्र सक्रिय (फॉर्म एक्टिव) का शुरू से ही दबा छिपा विरोध रहा है। यह भारत में एक कठोर वास्तविकता है कि कुछ हितधारक और कंपनियां व्यापार करने की कठिनाई के बहाने बुनियादी कानूनों का पालन नहीं करना चाहती हैं। सभी आलोचनाओं के बावजूद, भारत ने कंपनी अधिनियम, 2013 आने से बाद से कॉर्पोरेट अनुपालन पर ध्यान केंद्रित करते हुए भी सरल व्यापार इंगिता में श्रेष्ठता की और कदम बढ़ाये हैं| वर्तमान में, प्रपत्र सक्रिय (फॉर्म एक्टिव) के खिलाफ चल रही आलोचना उन कुछ हितधारकों की निराशा का प्रतिबिम्ब है जो कॉर्पोरेट संरचना का दुरुपयोग कर रहे हैं। सरकार के पास इस तरह के दुरूपयोग के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने और “नई शेल कंपनियों के बनने” पर यथासमय निगाह रखने का यह सही समय है। प्रपत्र सक्रिय (फॉर्म एक्टिव) ऐसी प्रभावी और यथासमय जाँचों में से एक है।

पूर्ण कालिक कंपनी सचिव की नियुक्ति

पूर्ण कालिक कंपनी सचिव की नियुक्ति दो दशक से अधिक समय से एक महत्त्वपूर्ण अनुपालन आवश्यकता है। कंपनी में नियुक्त कंपनी सचिव कंपनी के अनुपालन की स्थिति पर यथासमय निगाह रखते हैं और प्रबंधन को कानून का पालन करने के लिए यथासमय सलाह देते हैं। पूर्ण कालिक कंपनी सचिव गैर-अनुपालन से कंपनियों, उनके प्रमोटर और प्रबंधन को आगाह करते हैं। हालाँकि, एक कर्मचारी के रूप में वह गैर-अनुपालन को रोकने में असमर्थ हो सकते है, लेकिन वह निश्चित रूप से किसी भी नियोजित गैर-अनुपालन पर लाल झंडी जरूर दिखाते हैं| हालाँकि, लाल झंडी उठाने की उनकी भूमिका का इस्तेमाल कुछ विशेष हितधारकों द्वारा एक नकारात्मक पेशे के रूप में किया जाता है, जो उनके दुष्प्रचार के हिसाब से व्यवसाय और “व्यावसायिक लाभ” में बाधा डालते हैं। क्या फुटबॉल मैच में रेड कार्ड दिखाने वाले रैफरी को नकारात्मक व्यक्ति कहा जा सकता है? या कि वह खिलाड़ियों को सुचारू रूप से सुरक्षित और प्रसन्नता पूर्वक खेलने में मदद करने वाला सकारात्मक व्यक्ति को है?

पूर्ण कालिक कंपनी सचिव की नियुक्ति पूरी तरह से कानून की भावना का अनुपालन है और इससे अधिक ईमानदार व्यवसाय के लिए यथासमय कानूनी मदद और अनजाने में होने वाले उल्लंघन से खुद को बचाएं रखने का जरिया है। विवेकपूर्ण प्रबंधन वाली कई कंपनियां कानूनी आवश्यकता न होने पर भी या तो स्वेच्छा से कंपनी सचिव को नियुक्त करती हैं या यथासमय मदद पाने के लिए अभ्यासरत कंपनी सचिव की सेवाएं लेती हैं।

संख्या की कमी

आमतौर पर यह दावा किया जाता है कि सक्रिय कंपनियों की कुल संख्या लगभग 10 लाख है लेकिन उपलब्ध कंपनी सचिव संख्या मात्र 50 हजार ही हैं। हालांकि, सभी कंपनियों को एक पूर्णकालिक कंपनी सचिव को नियुक्त करने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन केवल पाँच करोड़ या उस से अधिक भुगतान पूंजी वाली कंपनियों को ही पूर्ण कालिक कंपनी सचिव रखने की कानूनी आवश्यकता होती है। यह दावा किया जाता है कि 90 हजार कंपनियों के लिए मात्र 45 हजार कंपनी सचिवों की उपलब्धता है| परन्तु आजकल दुर्भाग्य से आधे से अधिक कंपनी सचिव बेरोजगार या अर्धबेरोजगार हैं| यह लोग अपने वृद्ध माता-पिता और परेशान परिवारीजनों के सामने अपना चेहरा बचाने के लिए अभ्यास प्रमाण पत्र ले लेते हैं और व्यवसायिक संघर्ष में जुट जाते हैं। वर्तमान में किये जा रहे दुष्प्रचार के अनुसार उपलब्ध ४५ हजार कंपनी सचिवों में से 20 हजार पहले से ही कार्यरत हैं। हमारे पास लगभग 2 हज़ार के ऐसे कंपनी सचिव हो सकते हैं जो सफलतापूर्ण व्यावसायिक अभ्यास कर रहे हैं। शेष 23 हजार कंपनी सचिवों के बारे में क्या सूचना है? वह किसी लाभकारी कार्य के न होने कसे कारण जीवनयापन के लिए संघर्षरत हैं| जब तक ये सभी कंपनी सचिव उचित रूप से कार्यरत नहीं हो जाते, तब तक यह दावा नहीं किया जा सकता है कि कंपनी सचिवों की मांग और उपलब्धता में बहुत बड़ा अंतर है। पहले उपलब्धता को तो उचित उपयोग में आने दें।

प्रवासन का मुद्दा

यह दावा किया जाता है कि कंपनी सचिव विभिन्न कारणों से छोटे शहरों में जाने को तैयार नहीं हैं। यह कोई बढ़िया तर्क नहीं है। क्या छोटे शहरों में कॉरपोरेट कार्यालय या पंजीकृत कार्यालय वाली कंपनियों के साथ अन्य पेशेवर काम नहीं कर रहे हैं? मुद्दा हितधारकों की कंपनी सचिव की नियुक्ति के लिए अनिच्छा का है और इसलिए वे कंपनी सचिव को उचित पारिश्रमिक की पेशकश नहीं कर रहे हैं।

बजट की कमी

वर्तमान दुष्प्रचार में दावा किया कि कंपनी सचिव की नियुक्ति छोटी कंपनियों के बजट में नहीं समाती।यदि संस्थापकों ने अपने व्यवसाय के लिए एक निश्चित संगठनात्मक रूप का विकल्प चुना है तो उन्हें उस संगठनात्मक संरचना से जुड़े कानून का पालन करने की आवश्यकता होती है। क्या संस्थापकों को पिछले तीन दशकों से कंपनी सचिवों की नियुक्ति के आवश्यकता के बारे में पता नहीं है? क्या पांच करोड़ रुपये की चुकता पूंजी वाली कंपनी एक कम बजट की कंपनी है? ऐसा तभी होना चाहिए जब कि कंपनी ने अनुचित वित्तीय सलाह और योजना के आधार पर उच्च भुगतान पूंजी का चयन किया हो। ऐसी कंपनियां कानूनी रूप से अनुमत मार्ग का उपयोग करके अपनी भुगतान पूंजी को कम करने के लिए स्वतंत्र हैं। लेकिन वित्त सलाहकार इस तरह से सलाह क्यों देगा क्यों कि भुगतान पूंजी बढ़ाने के लिए पहली वाली सलाह बिना उचित कसौटी के दी थी।

सरकार को उच्चतर भुगतान पूंजी कंपनियों पर निगाह रखनी चाहिए क्योंकि गैर अनुपातिक उच्च भुगतान पूंजी का उपयोग अधिकतम बैंक ऋण प्राप्त करने के लिए किया जाता है| ऐसे ऋण बाद में समस्यापूर्ण परिसंपत्तियों में बदल जाते हैं।

अन्य नियुक्तियाँ

कंपनी सचिव का अनुपालन अधिकारी रूप में विरोध प्रपत्र सक्रिय (फॉर्म एक्टिव) को ठीक से देखे बिना लक्षित प्रचार के तहत किया जा रहा है| मुख्य वित्तीय अधिकारी, मुख्य कार्यकारी अधिकारी, प्रबंध निदेशक जैसे अन्य प्रमुख प्रबंधकीय कर्मियों की नियुक्ति न होने की स्थिति में भी फॉर्म अनुपालन सम्बन्धी त्रुटियां इंगित करता है| इन अन्य पदों पर नियुक्त किए जाने वाले व्यक्तियों की बहुत अधिक आपूर्ति हो सकती है क्योंकि इन पदों के लिए कोई विशिष्ट योग्यता निर्धारित नहीं है। यह एक विशेष कारण से है – कंपनी सचिव को यथासमय बेहतर अनुपालन में मदद करनी होती है और उसे अतियोग्य होने की आवश्यकता होती है।

निष्कर्ष

इस समय सरकार को हस्तक्षेप बनाये रखना चाहिए ताकि कंपनियों को अपने रोजगार में भले ही जबरन पर बेहतर प्रशिक्षित और जानकार पेशेवर बनाने में मदद मिल सके। सभी उपलब्ध योग्य कंपनी सचिवों की नियुक्ति हो जाने के बाद भी, सरकार को कंपनी सचिव नियुक्त करने की आवश्यकता को कम नहीं करना चाहिए, बल्कि छोटी कंपनियों के लिए योग्यता मानदंड में ढील देने की यह अनुमति दी जा सकती है कि, जो प्रशिक्षित कंपनी सचिव की निगरानी के अधीन एक अर्ध योग्य कंपनी सचिव की नियुक्ति की जा सके। यह निगरानीकर्ता प्रशिक्षित कंपनी सचिव होल्डिंग या सहायक या संबंधित कंपनी में सेवातर हो सकता है। कुछ मामलों में ऐसी निगरानी अभ्यासरत कंपनी सचिव को दी जा सकती है, लेकिन प्रत्येक अभ्यासरत कंपनी सचिव को 20 से अधिक कंपनियों के लिए नहीं यह जिम्मेदारी नहीं दी जाये।

जब सरकार शैशवावस्था में होती है तो कंपनियों के मस्तिष्क में कंप्लायंस डालने के लिए सरकार से आग्रह किया जाता है अन्यथा हम शेल कंपनियों को जारी रखेंगे।

व्यवहार में एक कंपनी सचिव होने के नाते, मैं कह सकता हूं कि रोजगार में कंपनी सचिव वास्तविक समय अनुपालन सलाहकार के साथ मदद करते हैं। निवारण हमेशा इलाज से बेहतर है। सरकार अनुपालन के अभाव में अन्य पाँच लाख शेल कंपनियों को बनना वहन नहीं कर सकती है।

एक थैले वाला मुकदमा

विज्ञापन का सबसे बेहतर तरीका है – समाचार में छा जाना| अभी हाल में जूता कंपनी बाटा पर एक थैले के लिए हुआ मुकदमा बाटा के लिए इसी प्रकार का समाचार साबित हो रहा है| सामान के साथ थैला देने के लिए दाम वसूलने का काम पहली बार नहीं हुआ| दिल्ली में मदर डेरी भी बिना पैसे वसूले आपको थैला नहीं देती| इसी प्रकार के अन्य और भी संस्थान हैं| मगर इन सभी मामलों में ग्राहक के पास यह थैला खरीदने या न खरीदने का विकल्प रहता है| अगर वह अपने हाथ में अपना खरीदा हुआ सामान ले जाना चाहे तो उसकी मर्जी पर निर्भर करता है| दुर्भाग्य से आजकल ग्राहक मुफ्त के थैले को अपना अधिकार समझते हैं| कई बार ऐसा भी होता है कि कुछ ग्राहक थैला न देने पर भद्दी भाषा का प्रयोग करते हैं| मुफ्त के यह थैले प्रायः घर और बाहर कूड़े का एक प्रमुख कारण बन रहे हैं| इन दिनों कूड़ादान और कूड़ाघरों में सबसे अधिक कूड़ा थैलों और अन्य बारदाने (पैकिंग मटेरियल) का ही है|

दिनेश प्रसाद रतूरी बनाम बाटा इंडिया लिमिटेड मजेदार मुकदमा है| जहाँ तक मुझे लगता है, इस फैसले पर जल्दी ही अपील होनी चाहिए| इस प्रकार यह लम्बे समय तक बाटा को खबर में रख सकता है|

ग्राहक ने शिकायत की है कि बिना बताए या पूछे थैला उन्हें बेचा गया| मामला साधारण था| ग्राहक थैले की यह बिक्री स्वीकार करने से मना कर सकता था और जूता या जूते का डिब्बा साथ ले जा सकता था| उस पर थैला ले जाने की कोई जबरदस्ती नहीं होनी चाहिए थी| क्योंकि थैला बेचने का कोई करार नहीं हुआ, कोई बात नहीं हुई तो यह बिक्री तुरंत निरस्त करने योग्य थी| निर्णय में लिखे गए तथ्य यह नहीं बताते कि ग्राहक ने थैले की यह बिक्री रद्द करने का प्रयास किया या नहीं किया| क्या ग्राहक मात्र मुफ्त थैले की मांग करता रहा और बाद में बिक्री स्वीकार कर कर वहां से चल दिया? जी, उसने थैले को स्वीकार किया मगर उसका मानना था कि मुफ्त थैला उसका अधिकार था, खासकर जब कि उस थैले पर कंपनी का लोगो ब्रांड आदि लगे हुए थे|

इस मुक़दमे में यह दावा किया गया है कि दुकानदार मुफ्त में ग्राहकों को थैला देने के लिए बाध्य है| मुझे यह दावा बिल्कुल गलत लगता है| इस समय बाटा को छोड़कर किसी भी अन्य दुकानदार के लिए मेरी तत्काल सलाह है कि तुरंत अपनी दूकान में सूचना लिखवा दें – थैला घर से लायें या खरीदें, मुफ्त नहीं मिलेगा|

दूसरी बात ग्राहक का कहना है कि इस थैले पर विज्ञापन लिखा हुआ है और उस थैले को दे कर बाटा कंपनी उनसे बिना पारिश्रमिक दिए विज्ञापन करवा रही थी| अब आपकी कार, फ्रिज, टेलिविज़न, चश्मे, कमीज कुरता सब पर कोई न कोई ब्रांड या लोगो लगा हुआ है| क्या यह विज्ञापन है, या आपके घर की ब्रांड वैल्यू? आप सब अब स्वीकार कर लें कि आप बेगारी की माडलिंग और विज्ञापन सेवा कर रहे हैं| वास्तव में होता उल्टा है, हम उस ब्रांड को घर लाने और दुनिया को दिखाने में गर्व कर रहे होते हैं| विक्रेता हमें यहीं गर्व बेचता है और उसके दाम वसूलता है|

बाटा का दावा है कि उसने पर्यावरण हित का ध्यान रखकर यह थैला बेचा| यह अपने आप में बचकाना बचाव था|

अगर पर्यावरण हित का ध्यान था तो ग्राहक को बार बार प्रयोग करने वाला थैला बेचना चाहिए था या उपहार में देना चाहिए था| सबसे बेहतर था कि कंपनी अपने ग्राहकों पर अपने घर से मजबूत कपड़े का बार बार प्रयोग हो सकने वाला थैला लाने के लिए दबाव बनाती|

वास्तव में यह गलत बचाव बाटा के विरुद्ध जाता है| ऐसा लगता है कि वह गलत और जबरन बिक्री को जायज ठहराने का कमजोर प्रयास कर रही है| इस गलत बचाव से यह महसूस होता है कि यह थैले की गलत तरीके से की गई बिक्री का मामला बनता है| इस प्रकार के बचाव से उसने इस थैले की जबरन बिक्री स्वीकार कर ली| अगर आप गलत तरीक से बिक्री करते हैं तो यह कानूनन गलत है|

होना यह चाहिए था कि कंपनी कहती कि वह पर्यावरण हित में ग्राहकों को अपने घर से बार बार प्रयोग हो सकते वाला थैला लाने के लिए प्रोत्साहित करती है और विशेष मामलों में ग्राहक की मांग पर उन्हें थैला बेचती है| क्योंकि यह ग्राहक अपने साथ अपना थैला नहीं लाया था, इसलिए यह थैला उसने खुद खरीदा| थैले पर कंपनी का कोई भी विज्ञापन इस थैले को सस्ता रखने का प्रयास है और कागज का अधिक बेहतर उपयोग भी है|

दुर्भाग्य से इस मुक़दमे के फ़ैसले में विक्रेता को अपने सभी ग्राहकों को आगे से मुफ्त में थैले देने का आदेश दिया गया है| वास्तव में यह अपने आप में गलत होगा| कम्पनी यह थैले अपने लाभ में से नहीं देगी वरन अपनी लागत में वह इसे जोड़ेंगे और जूतों के दाम बढ़ जायंगे| हो सकता है, ३९९ रूपए का जूता आधिकारिक रूप से ४०२ रुपए का हो जाए| एक साथ दो जोड़ी जूते खरीदने ओर ग्राहक को ८०१ रूपए की जगह ८०४ रुपए खर्च करने पड़े|

साथ ही इस निर्णय से हमेशा अपना थैला लेकर चलने वले जागरूक पर्यावरण प्रेमी ग्राहकों को हताशा होगी|

तुरंत आवश्यकता है कि जागरूक कंपनियां अपने ग्राहकों की कपड़े के मजबूत थैले साथ लाने के लिए प्रेरित करें| पोलीथिन, प्लास्टिक, कागज़ और महीन कपड़े के कमज़ोर एकल प्रयोग थैलों को देना तुरन और पूरी कड़ाई से बंद करें| अपने साथ थैला न लाने वाले ग्राहकों को पच्चीस पचास रुपये का मजबूत खादी का थैला खरीदने का विकल्प दें|

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चिकित्सा सेवा सुधार

यह लेख पिछले लेख स्वास्थ्य बीमा बनाम स्वास्थ्य सेवा की आगे की कड़ी है|

दुनिया भर में स्वास्थ्य सेवाएँ देना एक बेहद महंगा कार्य है| उस से भी अधिक महंगा है किसी भी बड़ी बीमारी के लिए मूलभूत ढांचा खड़ा करना| एक समय था कि सरकारें ही इस प्रकार के बड़े खर्चे वहां करने की स्तिथि में थीं| आज दुनिया भर में गरीबी कम हुई है और व्यवसायिक स्वास्थ्य दे पाना संभव हुआ है| मगर, आज भी बेहद बड़ी बीमारिओं के लिए व्यावसायिक तौर पर स्वास्थय सेवाएं दे पाना कठिन है| यह बड़े और महंगे खर्च वाले चिकित्सालय बेहद बड़े शहरों में ही उपलब्ध हो पा रहे हैं| दूसरी तरफ अच्छे अस्पतालों में इलाज कराने की चाह के चलते छोटे शहरों और गाँवों के अस्पतालों में मरीजों की कमी है| मरीजों की इस कमी के चलते अच्छे इन अस्पतालों के लिए अच्छे चिकित्सक ला पाना कठिन होता जा रहा है| इस समस्या से निपटने के लिए सरकारों को छोटे और बेहद बड़े अस्पातालों और इलाजों में निवेश करने की आवश्यकता है|

बीमा मरीज को इलाज सस्ता या मुफ्त दे सकता था, मगर इलाज नहीं दे सकता| इलाज उपलब्ध करने का काम सरकार का है, चाहे यह पूंजीवादी सरकार हो या साम्यवादी| निजी क्षेत्र को साथ लेकर चलना उचित है, परन्तु स्वास्थय सेवाओं की निजी क्षेत्र ही पर छोड़ देना उचित नहीं जान पड़ता| बीमा सम्बन्धी कोई भी सरकारी योजना आज केवल निजी चिकित्सालयों के दम पर सफल नहीं हो सकती|  उदाहरण के लिए आज तक निजी क्षेत्र एम्स जैसे एक भी संस्थान को खड़ा नहीं कर पाया है| टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल, मुंबई जैसे एक दो उदहारण को छोड़ दें तो निजी क्षेत्र का पूरा लक्ष्य स्वास्थ्य सेवाओं का व्यवसायिक दोहन तक ही सिमटा हुआ है|

मेरा सुझाव यह है कि

  • राज्य सरकारें (स्वास्थ्य राज्य का संवैधानिक विषय है) स्वास्थ्य सेवा की उपसेवा के रूप में बीमा पूल तैयार करें और उस से इक्कठा होने वाले धन से स्वास्थय सेवाए प्रदान करे|
  • हर नागरिक को इस सरकारी बीमा पूल से सरकारी और निजी चिकित्सालयों में चिकित्सा सुविधा मिले|
  • सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं का पूरा मूल्य लिया जाये और चिकत्सकों को भी सरकारी बीमा पूल से व्यवसायिक सेवामूल्य दिया जाए|
  • निजी क्षेत्र को चिकित्सा अनुसन्धान जैसे क्षेत्रों में आने के लिए प्रेरित किया जाए और उसका व्यवसायिक उपयोग करने की अनुमति हो|
  • दवाओं और अन्य उत्पादों पर मूल्य नियंत्रण हो परन्तु इतना नहीं कि यह क्षेत्र लाभ का सौदा नहीं रहे|
  • चिकित्सा उत्पाद क्षेत्र में आपसी प्रतिस्पर्था को बढ़ावा दिया जाये|

स्वास्थ्य बीमा बनाम स्वास्थ्य सेवा

बीमा, पूँजीवाद का सर्वाधिक साम्यवादी उत्पाद है| इसमें पूँजीवाद की लम्पटता और साम्यवाद की अनुत्पादकता का दुर्भाग्यपूर्ण सम्मिश्रण है|

बीमा का सीमित प्रयोग सफलता की कुंजी है| उदारहण के लिए केवल शुरूआती जीवन में लिया गया सावधि जीवन बीमा आपके परिवार को आर्थिक सुरक्षा देता है| अन्य जीवन बीमा उत्पाद बीमा कंपनी को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करते हैं|

मैं जिन बीमा उत्पादों का समर्थक हूँ उनमे स्वास्थ्य बीमा शामिल है| परन्तु कबीर दास जी बीमा के बारे में ही कह गए हैं: अति का भला न चुपड़ना| यहाँ हम केवल स्वास्थ्य बीमा की बात करेंगे|

पहली बात यह है कि इस बात का ख्याल रखा जाए कि बीमार न पड़ा जाए| उस तरह न सोचा जाये जिस तरह हम दिल्लीवाले वायु प्रदूषण सम्बन्धी बीमारियों के बारे में कभी कभी सोच लेते हैं – बीमा के खर्चे पर इलाज कराएँगे| ध्यान रखें चिकित्सा, शल्य चिकित्सा और दवाओं के दुष्प्रभाव आपको ही झेलने होंगे – बीमा कंपनी को नहीं| अच्छे पर्यावरण के लिए सरकार, साम्यवाद और पूँजीवाद से लड़िये– यह बहुत बड़ा बीमा है|

दूसरी बात, स्वास्थ्य बीमा केवल इस बात का आश्वासन है कि अगर आप कोई स्वास्थ्य सेवा लेंगे तो उसका खर्च बीमा कंपनी उठाएगी| यह बात तो हम सभी जानते हैं कि अधिकतर बीमा कंपनी बड़ी और खर्चीली बीमारियों को सामान्य स्वास्थ्य बीमा से बाहर रखतीं हैं| इस बीमारियों के लिए आपको अलग से बीमा लेना होत्ता है या फिर रामभरोसे बैठना होता है| अगर फिर भी बीमारी हो जाती है तब आपकी बचत खर्च होने लगती है| बीमा चाहे निजी हो या सरकारी, इस बात का ध्यान रखें|

तीसरी बात, अगर आप दुनिया की सारी बीमारियाँ अपने बीमा में शामिल करवा भी लेते हैं तो बीमा कंपनी इस बात की कोई गारंटी नहीं दे सकती कि किसी बीमारी का इलाज आपके देश में या फिर इस दुनिया में कहीं भी है| इस बारे में सोचने की गंभीर आवश्यकता है|

क्या हमारे पास स्वास्थ्य सेवा का मूलभूत ढाँचा है?