मैं और मिच्छामि दुक्कडम्

सभी के जीवन में कष्ट, कठिनाई, दुःख, क्रोध, घृणा, अवसाद आते हैं| उनके आवृत्ति और अन्तराल भिन्न हो सकते हैं| मेरे और आपके जीवन में भी आये हैं| सबको अपने दुःख प्यारे होते हैं| मैं और आप – हम सब उनके साथ जीते हैं| मैं क्या जानूं, दुःख क्यों आये| जब सोचता हूँ, तो हर दुःख के पीछे कोई न कोई मिल जाता है – पड़ौसी, मित्र-शत्रु, नाते-रिश्तेदार, सगे-सम्बन्धी, देश-विदेश, नेता-अभिनेता, अपराधी-आतंकवादी| कई बार किसी संत-महात्मा, धर्म-गुरु या प्रेरक वक्ता को पढ़ता-सुनता हूँ, लगता हैं – दुःख का कारण तो मैं ही हूँ| ध्यान के प्रारंभ में लगता हैं – मैं स्वयं दुःख हूँ| मैं दुःखी नहीं हूँ – स्वयं दुःख हूँ| मैं दुःख हूँ – अपने पर भी क्रोध आता हैं|

उन दुःखों को कितना याद करूं, जो भुलाये नहीं जाते| मैं दुःख नहीं भूलता| दुःख हमारी वास्तविकता होते हैं – भोगा हुआ यथार्थ|

प्रकृति और परिस्तिथि तो कठिन बनीं हीं रहतीं हैं| जीवन में कोई न कोई हमें कष्ट देता रहता है| कुछ मित्र-नातेदार तो बड़े ही प्रेम से कष्ट दे देते हैं| घृणा आती हैं उनसे और उनकी कष्टकारी प्रकृति से| ईश्वर भी कष्ट देता है| ईश्वर के पास तो कष्ट देने के अनोखे कारण है – भक्ति करवाना और परीक्षा लेना| मैं ईश्वर पर भी क्रोधित होता रहा हूँ| मैं किसी को अब मुझे दुःख देने का मौका नहीं देता| मैं अब क्रोध नहीं करता| पड़ौसी, मित्र-शत्रु, नाते-रिश्तेदार, सगे-सम्बन्धी, और ईश्वर को मेरे क्रोध से कोई फर्क नहीं पड़ता| तनाव और अवसाद तो मुझे होता है, मुझे हुआ था|

एक सज्जन मिले थे, उन्हें नहीं जानता| उन्होंने कहा था, क्रोध दान कर दे| मैंने कहा, क्रोध वस्तु है क्या? उन्होंने कहा, हाँ| किसे दूं दान? उन्होंने पास पड़े पत्थर की ओर इशारा किया| वो पत्थर अब कभी कभी तीव्र क्रोध करता होगा|

मगर फिर भी, अवसाद भी हुआ| अवसाद, समाज इसे पागलपन की तरह देखता है| मगर मुझे पता था, क्या करना है| मेडिकल कॉलेज में प्रोफ़ेसर ने कहा, यहाँ आये तो तो पागल कैसे हो सकते हो? दवा दे सकता हूँ| मगर दवा नहीं दूंगा, इलाज करूँगा| छोटी मोटी मगर गंभीर बातें हैं, यहाँ नहीं बताऊंगा| लोग गंभीर चीजों को घरेलू नुस्खा बना लेते हैं| बहरहाल मुझे लाभ हुआ|

अब मैं क्रोध नहीं करता| क्रोध दान कर दिया तो उसे कैसे प्रयोग करूं| कभी कभी खीज आती है और क्षोभ भी होता है| दो एक साल में क्रोध आता है, तो मैं उसे पल दो पल में वापिस कर देता हूँ| कई बार गलत लोगों को, गलत बात तो तीव्रता और गंभीरता से गलत कहता हूँ, तो क्रोध पास आ जाता हैं| मैं क्रोध का निरादर नहीं करता, क्षमा मांग लेता हूँ – मिच्छामि दुक्कडम्|

खामेमी सव्व जीवे, (khāmemi savva jīve)
सव्वे जीवा खमंतु मे, (savve jīvā khamaṃtu me)
मित्ती मे सव्व भुएसु, (mittī me savva-bhūesu)
वेंर मज्झं न केणई, (veraṃ majjha na keṇa:i)

मिच्छामी दुक्कडम (micchāmi dukkaḍaṃ)

सब जीवों को मै क्षमा करता हूं, सब जीव मुझे क्षमा करे सब जीवो से मेरा मैत्री भाव रहे, किसी से वैर-भाव नही रहे| मैं जीवों से ही नहीं निर्जीव, मृत, साकार, निराकार, सापेक्ष, निरपेक्ष, भावना और विकार सबसे क्षमा मांगता हूँ|

मैं दिन नहीं देखता, जब मन आता है, स्वयं से क्षमा मांग लेता हूँ, क्षमा कर देता हूँ, | अपने कष्ट, कठिनाई, दुःख, क्रोध, घृणा, अवसाद के लिए मैं स्वयं को क्षमा कर देता हूँ| अगर मैं इन्हें ग्रहण नहीं करता तो यह मुझ तक नहीं आते|

मैं पड़ौसी, मित्र-शत्रु, नाते-रिश्तेदार, सगे-सम्बन्धी, और ईश्वर को, दिन नहीं देखता, क्षमा कर देता हूँ सबसे मन ही मन क्षमा मांग लेता हूँ| जैन नहीं हूँ, धार्मिक, आस्तिक, आसक्त और शायद निरासक्त भी नहीं हूँ| मगर संवत्सरी अवश्य मना लेता हूँ| भाद्प्रद माह की शुक्ल पक्ष चतुर्थी से प्रारंभ पर्युषण पर्व का अंतिम दिन – संवत्सरी| दसलाक्षाना का अंतिम दिन संवत्सरी| यह ही है क्षमावाणी का दिन| क्षमावाणी का यह दिन भारतीयता का जीवंत प्रमाण है|

पर्युषण पर्व के दौरान शाकाहार और जबरन शाकाहार का आजकल अधिक जोर हैं| मैं जीव-हत्या करने वाले मांसाहारी और कड़की खीरा कच्चा चबा जाने वाले शाकाहारी सबसे क्षमा मांग लेता हूँ|

मुझे संवत्सरी/क्षमावाणी आकर्षित करता है| भारतीय जैन ग्रंथों में, दिवाली और महावीर जयंती से अधिक महत्वपूर्ण जैन त्यौहार| अधिकतर भारतियों की तरह मुझे भी खान-पान से ही त्यौहार समझ आते हैं| परन्तु, मुझे यह त्यौहार भोजन से नहीं वचन से शक्ति देता है| मुझे दुःख, क्रोध, घृणा, तनाव और अवसाद से मुक्ति देता है| इस वर्ष २६ अगस्त २०१७ को क्षमावाणी है| [i]

अक्रोध और क्षमा ही तो भारतीय संस्कृति का मूल है| जुगाड़ और चलता है जैसी भारतीय भावनाओं के पीछे भी कहीं न कहीं यह ही है| ऐसा नहीं, हम भारतीय गलत को गलत नहीं मानते समझते और कहते| मगर अक्रोध और क्षमा को अधिकतर अपने साथ रखते हैं| अक्रोध और क्षमा हमारी जड़ों में इतना गहरा है कि हम इसे कई बार स्वप्रद्दत (for granted) मान लेते हैं| गुण दोष होते रहते हैं| फिर भी, समग्र रूप में, मैं आज जितना भी सफल हूँ, उसमें अक्रोध और क्षमा का बड़ा योगदान है|

ऐसा नहीं है कि अक्रोध और क्षमा पर केवल भारतियों का अधिकार हैं| बहुत से अन्य लोग भारतियों सोच से अधिक भारतीय हो सकते हैं| हो सकता है, मानवता हमारी सोच से परे जाकर भारतीयता को अपना ले| भारतीय आदर-सत्कार, भोजन, योग, मनोरंजन, बोलीवुड, अक्रोध और क्षमा विश्व अपना रहा है|

मिच्छामी दुक्कडम|

[i] एक गैर भारतीय विदेशी संस्था इसी तर्ज पर सन १९९४ से अंतर्राष्ट्रीय क्षमा दिवस मनाती है| http://www.ceca.cc/global_forgiveness_day/

काके – दी- हट्टी, फ़तेहपुरी

काके – दी – हट्टी को जब आप बाहर से देखते हैं तो समझ नहीं आता कि आखिर क्यों इस साधारण से स्थान का नाम हर दिल्ली की हर ट्रेवल गाइड और फ़ूड गाइड में है| दुकान पुरानी सी है और लगता है कि अपने स्थापना सन १९४२ में भी इसमें बैठने की खास जगह नहीं रही होगी| इसमें बैठने की जगह हो न हो, यह जगह खास तो है और हर खाने वाले के दिल्ली दिल में खास जगह बना लेती है| पहली बार जब गया तो अजीब से सवाल से उमड़ रहे थे| पुराने दुकान की पुरानी डाट की छत से लटके पुराने पंखे, पुराने तंदूर से निकलती नान की महक, आप की साँसों से होते हुए पेट में पुकारने लगती है|

आप मेनू देखते है तो धुआंधार शब्द बार बार दिखता है – धुआंधार नान, धुआंधार लच्छा परांठा, धुआंधार पनीर मख्खन मसाला| यूँ है तो यह लज़ीज, मगर आपको चेतावनी देता हूँ – न खाएं| अगर खाते हैं तो छोड़ नहीं पाएंगे और हफ्तेभर तन-मन-धन से याद करेंगें|

यह परिवार और दोस्ती में प्रेम बढ़ाने वाला भोजनालय है – यहाँ एक नान में से “हम दो – हमारे दो” खा लेते हैं, कोई मनाही नहीं| आप पहले एक नान मंगा लें, लुफ्त उठायें और बाद में जरूरत के मुताबिक दूसरा – तीसरा मंगा सकते हैं| जब आप यहाँ कोई भारी-भरकम आर्डर देते हैं तो वेटर बेहद शीघ्र-शांत सलीके से आपको ये सलाह देंगें|

मेरे बेटे को यहाँ की लस्सी और रायता पसंद है, साथ में आलू प्याज  नान| उसके लिए यहाँ कुछ और मंगाने का मतलब नहीं| मैं यहाँ के नान का मुलाज़िम हुआ जाता हूँ, किसी सब्जी- दाल की न पूछिए|

दाल और सब्जी ज्यादातर कम मसालेदार और उम्दा हैं, मगर नान का ज़ायका आपके दिल में जो घर करता है, तो बाकि चीज़ो के लिए जगह नहीं| अमृतसरी थाली भी बहुत पसंद की जाती है| यह शाकाहारी भोजनालय है, जिसके पुराने बोर्ड पर “शुद्ध वैष्णव” लिखा हुआ है| अलबत्ता, प्याज लहसुन मिल जाता है| सलाद में बिना मांगे ढेर से प्याज मिलती है|

यह जगह है, पुरानी दिल्ली की फ़तेहपुरी मस्जिद के पास| आप खारी बावली से बेहद उम्दा मेवे – मखानों की ख़रीददारी करने के बाद यहाँ आयें| आप दुकान में बाहर ढेर ग्राहक खड़े पाएंगे और दो बड़े तंदूर| परिवार वाले ग्राहक दूसरी मंजिल (first floor) पर बिठाये जाते हैं और उनके लिए अलग तंदूर वहां लगा है| तीनों तंदूर पर लगातार काम होता रहता है|

स्थान: काले – दी – हट्टी, निकट फ़तेहपुरी, चांदनी चौक, पुरानी दिल्ली,

भोजन: शाकाहारी

खास: नान, धुआंधार नान,

पांच: साढ़े चार

देहरादून शताब्दी

रेलगाड़ियाँ घुमक्कड़ों की पहली पसंद हुआ करतीं हैं| मितव्ययता, समय-प्रबंधन, सुरक्षा और आराम, का सही संतुलन रेलगाड़ियाँ प्रदान करतीं हैं| अगर यात्रा दिन की है तो भारतीय रेलगाड़ियों में शताब्दी गाड़ियाँ बेहतर मानीं जा सकतीं हैं| नई दिल्ली देहरादून शताब्दी मुझे कई कारणों से पसंद है| यह आने और जाने दोनों बार सही समय पर पहाड़ों और वादियों में होती है| यह डीजल इंजन से चलने वाली महत्वपूर्ण गाड़ियों में से एक है|

अगर आप जाड़ों की सुबह नई दिल्ली देहरादून शताब्दी में बैठे हैं तो आपको पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लहलहाते सरसों के पीले खेत में उगते हुए सूर्य के दर्शन होते हैं| बड़े बड़े हरे भरे खेत यहाँ की विशेषता हैं| वैसे जब दिल्ली में कड़ाके की ठण्ड हो तो आप हाथ को हाथ ने सुझाई दे, ऐसे घने कोहरे का आनंद भी के सकते हैं| जाड़ों में यह रेलगाड़ी आपको पहाड़ों की रानी मसूरी के बर्फ भरे पहाड़ों तक पहुँचने का माध्यम हो सकती है|

यह ट्रेन गन्ने के खेतों, गुड़ बनाने के लघु-उद्योगिक इकाइयों, बड़ी चीनी मीलों के पास से गुजरती है| कई बार आप इस गंध का आनंद लेते हैं तो कभी कभी आपको यह बहुत अच्छी नहीं लगती|

आते जाते देहरादून शताब्दी इंजन के दिशा परिवर्तन के लिए सहारनपुर में आधे घंटे रूकती है| मुझे यह आकर्षक लगता है| बच्चे इसे देखकर रेलगाड़ियों के बारे में बहुत कुछ समझ बूझते हैं और पहुत प्रश्न करते हैं| बहुत सी ट्रेन अपने इंजन की दिशा परिवर्तन के लिए रुकतीं हैं परन्तु यह कम लम्बी गाड़ी हैं इसलिए बच्चे इंजन का निकलना और लगना दोनों देखने चाव से कर सकते हैं| साथ ही प्लेटफ़ॉर्म पर भीड़ भी कम होती है|

इसके बाद यह ट्रेन एक भारत के महत्वपूर्ण शैक्षिक शहर रूड़की और महत्वपूर्ण धार्मिक शहर हरिद्वार में रूकती है| हरिद्वार से गुजरते हुए यह थोड़े समय के लिए आपको धार्मिक बना देती है| इस रेलगाड़ी की अधिकतर सवारियां हरिद्वार से चढ़ती उतरतीं हैं|

हरिद्वार के बाद यह गाड़ी राजाजी राष्ट्रीय उद्यान (राजाजी नेशनल पार्क) से होकर गुजरती है| यहाँ इसकी गति अपेक्षागत धीमी रहती है| यह एक बाघ आरक्षित (टाइगर रिज़र्व) क्षेत्र है| रेलगाड़ी में बैठकर बाघ और अन्य जंगली जानवर देखना तो मुश्किल है, मगर आप यहाँ प्राकृतिक सौन्दर्य को निहार सकते हैं| शाम को जब रेलगाड़ी देहरादून से नई दिल्ली के लिए लौटती है तब यहाँ का सौन्दर्य देखते बनता है| इस रेलगाड़ी में लौटते हुए हरिद्वार से पहले का यह समय बहुत शांत होता हैं| यह उचित समय हैं, जब सूर्यास्त के समय आप शांत रहकर खिड़की के बाहर मोहक सौंदर्य का आनंद लेते हैं| कई बार लगता है खिड़कियाँ छोटी पड़तीं हैं|राजाजी राष्ट्रीय उद्यान से गुजरते हुए यह गाड़ी एकल ट्रैक होती है, अर्थात आने -जाने के लिए एक ही ट्रैक से गाड़ियाँ गुजरतीं हैं| कुछेक स्थान पर पहाड़ काटने से बनी दीवार आपकी खिड़की से  हाथ भर ही दूर होती है| बहरहाल, दूसरी रेल लाइन का काम चल रहा है|

मार्च के पहले सप्ताह की शाम, देहरादून से लौटते हुए जब मैं अपने दोनों ओर संध्याकालीन सौंदर्य को निहार रहा हूँ, अधिकांश यात्री देहरादून और मसूरी की अपनी थकान उतारना चाहते हैं| मैं शांतिपूर्वक चाय की चुस्कियों के साथ सुरमई शाम का आनंद लेता हूँ| हरि के द्वार पहुँचने से पहले प्रकृति के मायावी सौन्दर्य का आनंद अलौकिक है|

ऊँचे कंक्रीट

कंक्रीट की ऊँचाई अनंत आकाश की ऊँचाई के समक्ष वामनकद होती है| अहसास कराती है – हे मानव! अभी तुम बौने हो| ऊँचे कंक्रीट, हरे भरे जीवंत जंगल की तरह स्व-स्फूर्त नहीं उग आते हैं| इनकी रचना नहीं की जाती, निर्माण होता हैं| रचनात्मकता की कमी पर्याय है इनका| कंक्रीट में प्राण-प्रतिष्ठा नहीं होती, कंक्रीट मुर्दा बना रहता है| ऊँचे कंक्रीट में बने घर जीवंत जाते हैं मगर कंक्रीट निर्लिप्त बना रहता है, किसी उदासीन पठार की तरह|

ऊँचे कंक्रीट जीवन के फैलाव और जीवन्तता के विस्तार से दूर होते हैं| कच्ची झोंपड़ी की जीवटता कंक्रीट में नहीं होती| ऊँचे कंक्रीट गर्व और गौरव की ऊँचाई का प्रतीक होते हैं, यह गर्व और गौरव घमंड की बानगी रखता है फलदार पेड़ों की तरह विनम्रता की नहीं इनमें|

कई बार लगता है इन ऊँचे कंक्रीट के निर्माता जिस तरह इनके आस पास लैंडस्केपिंग करते हैं, उस तरह इन पर भी वालस्केपिंग करते तो शायद यह जीवंत हो उठते|

मगर ऊँचे कंक्रीट घमंडी होते है, कलाकृति नहीं| काश, इन्हें निर्माता नहीं कलाकार सृजते|

ग्रैंड चोला का महास्मरण

आईटीसी ग्रैंड चोला में रुके हुए समय हो गया, परन्तु उसकी याद आज भी ताजा है| भारतीय कंपनी सचिव संस्थान (ICSI) के राष्ट्रीय महाधिवेशन का आयोजन उस वर्ष चेन्नई के आईटीसी ग्रैंड चोला में था| तय हुआ वहीँ रुका जाए| चेक इन के समय समझ गया, यह अब तक के सभी अनुभवों से बेहतर हो सकता है| हमारे हाथ में किसी ताले की चाबी नहीं थी, बल्कि स्मार्ट कार्ड था| लिफ्ट में प्रवेश से लेकर विभिन्न तलों और सुविधाओं तक पहुँचने तक सब नियंत्रित था| आप चाहकर भी गलत तल पर नहीं जा सकते थे| अपने कमरे में पहुँचते ही प्रसन्नता का अहसास हुआ| कमरे का अपना प्रभामंडल आपको आकर्षित, प्रभावित, प्रफुल्लित, विश्रांत करने के लिए पर्याप्त था| श्रमसाध्य यात्रा के बाद बेहतरीन गद्दे आपको पुकारते ही हैं|

कमरा पूरी तरह स्मार्ट डिवाइस  के साथ जुड़ा हुआ था| द्वार के नेत्र-छिद्र से लेकर कमरे के तापमान तक सब आपके अपने नियंत्रण में था| आप अपने आप में छोटी सी दुनिया के शहंशाह नहीं वरन छोटे मोटे ईश्वर थे| परिचारक सभ्रांत तौर तरीके से बड़ी से लेकर मामूली बातों को समझा गया था| अतिथि के लिये सम्मान किसी भी होटल के लिए आवश्यक होता है परन्तु परिचारक का खुद अपने लिए सम्मान सबसे बेहतर बात होती है|

हमारा नाश्ता बेहद हल्का, स्वादिष्ट और सबसे बड़ी बात, हमारे इच्छित समय पर कमरे में था| इसके बाद के सभी भोजन अधिवेशन के साथ ही थे| देशभर से आये हजारों अतिथियों के अनुरूप सभी स्वाद का ध्यान रखा गया था| भोजन के मामले में मुझे चयन की बेहद कठिनाई हुई| हर प्रकार का बेहतरीन भारतीय भोजन उपलब्ध था|

स्नानागार जीवन का दो प्रतिशत समय लेता है मगर शेष अट्ठानवे प्रतिशत समय की गुणवत्ता तय करता है| बाथटब से लेकर अन्य सभी सुविधाएँ आपको अपने विशिष्ठ होने की अनुभूति करातीं थीं| मेरे लिए यह ईश्वर और अपने आपसे बात करने का बेहतरीन समय था| मेरे कई मित्रों ने स्पा और तरणताल की सुविधाओं का भी बेहतरीन आनंद लिया|

हम प्रोफेशनल लोगों की यात्रायें होटलों की सुख सुविधाओं का आनंद लेने के लिए नहीं होतीं, मगर यदि चुपके से बेहतरीन सुख आपके आप आ जाए तो सोने पर सुहागा जरूर होता है| मुख्य अधिवेशन में भाग लेते हुए भी आप समय निकाल कर आप संबंधों का तानाबाना बुनने में लगे होते हैं| ग्रैंड चोला की ग्रैंड लॉबी इसके लिए बेहतरीन सुविधा प्रदान करती थी| अगर आप गंभीर मुद्दों से ऊबकर चुपचाप अपने आप से बात करने बाहर आते तो आपको अपने आप में खोने देने की पूरी सुविधा थी| स्टाफ किसी भी प्रकार की सहायता के लिए उपलब्ध था|

अधिवेशन के अंतिम दिन अतिथियों को पहले से सूचित करने पर बिना शुल्क चेक आउट समय के बाद भी कुछ समय रुकने की सुविधा दी गई| मैंने इस अतिरक्ति समय में आधा घंटे के नींद ली थी| यह मेरे लिए स्मृति संजोने का समय था, जो आज भी ताजा हैं|

तकनीकि के माध्यम से आप दुनिया को नियंत्रित कर सकते हैं परन्तु आपसी सम्मान और समझ से आप सब कुछ स्वचालित कर सकते हैं|

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ॐकारेश्वर – ममलेश्वर

मध्यप्रदेश का खंडवा जिला पवित्र नदी नर्मदा का विशिष्ट कृपापात्र है| नर्मदा किनारे ॐकारेश्वर ज्योतिर्लिंग इसी जिले में पड़ता है| हनुमंतिया से लौटते हुए अचानक ॐकारेश्वर में स्तिथ मध्यप्रदेश पर्यटन के नर्मदा रिसोर्ट में रुकने का कार्यक्रम बना| नर्मदा रिसोर्ट के प्रभारी श्री नितिन कटारे हमें तुरंत ही साग्रह ॐकारेश्वर मंदिर ले गए| शयन आरती शुरू हो चुकी थी| हमारे पूरे प्रयास के बाद भी हमें आरती देखने को नहीं मिली, आरती जरूर ले पाए| आरती करना, आरती देखना और आरती लेना तीनों एक ही मूल घटना के अलग अलग परिणाम है जो पल भर की देरी के कारण बदल जाते हैं| जब हम पहुंचे तब आरती का अंतिम पद गाया जा रहा था| जिस समय हम यहाँ पहुंचे तब शयन आरती हो चुकी थी|

Royal bed of Lord of Lords – bedtime fun – #Chausar #madhyapradeshtourism #madhyapradesh #mptourism

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भगवान् शिव उज्जैन के महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर से यहाँ रात्रि विश्राम के लिए पधार चुके थे| उनका शयनकक्ष तैयार था| उनके बैठने और सोने के स्थान पर चौपड़ बिछी हुई थी, जिससे भगवान् सोने से पहले परिवार के साथ क्रीड़ा का आनंद ले सकें| सुबह ब्रह्ममुहूर्त में भगवान् पुनः प्रस्थान कर जायेंगे| सृष्टि चलाना विकट कार्य है| मैं मन ही मन भगवान् की अनुपस्तिथि पुनः में आने का वचन देता हूँ| आरती लेने के बाद मस्तक पर चन्दन का त्रिपुण्ड धारण कर कर वापिस हो लेता हूँ|

पर्यटन निगम के प्रयास से मुख्य पुरोहित ने हमसे वार्तालाप किया| ॐकारेश्वर मंदिर वास्तव में नर्मदा नदी के बीच मान्धाता नाम के द्वीप पर स्तिथ है| इस द्वीप पर राजा मान्धाता और उनके पुत्रों द्वारा तपस्या की कथा मिलती है| उनकी तपस्या के कारण भगवान् शिव यहाँ ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रगट हुए|

Mamleshwar – twin temple of omkareshwar ममलेश्वर – ओम्कारेश्वर ज्योतिर्लिंग @mptourism

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भोजन के बाद मध्यरात्रि तक हम उस शांत नगर में भ्रमण करते रहे| प्रातः मैं पुनः ॐकारेश्वर ज्योतिर्लिंग का दर्शन करता हूँ| भगवान् के प्रस्थान के बाद सूना सूना सा है| लगता नहीं कुछ विशेष है| लोग उसी प्रकार पूजा अर्पण कर रहे है जैसे किसी सामान्य मंदिर में होती प्रतीत होती है| अब ममलेश्वर जाना है| ममलेश्वर मुख्यभूमि पर है| बिना ममलेश्वर दर्शन ॐकारेश्वर दर्शन पूरे नहीं होते| यह प्राचीन मंदिर है| कुछ लोगों की मान्यता है कि यह मूल ज्योतिर्लिंग है तो अन्य के अनुसार दोनों ही मूल हैं| इसका प्राचीन स्थापत्य मुझे अन्य ज्योतिर्लिंग मंदिरों का स्मरण दिलाता है| पण्डे – पंडितों का दक्षिणा के लिए संपर्क करते हैं| तभी मुझे एक तख़्त पर हजार के लगभग मिट्टी के छोटे छोटे शिवलिंग दिखते हैं| मैं उनमें से एक पंडित को बुलाकर उनकी कथा पूछता हूँ| यह कथा सुनाने के बीस रूपये से उनकी बोनी तो हो गई मगर उसके मुख पर बेरोजगारी की चिंता बरकरार है|

हमें अब इंदौर के लिए निकलना है|

 

हनुवंतिया जल महोत्सव

फरवरी 2016 में हुए प्रथम  हनुवंतिया जल महोत्सव के बारे में सुनकर वहां जाने की तीव्र इच्छा थी | मेरी उत्सुकता का अनुमान पिछले ब्लॉग पोस्ट से लग ही जाता है| द्वितीय जल महोत्सव 15 दिसंबर से प्रारंभ हुआ| हम 16 दिसंबर को इन्दोर से टैक्सी द्वारा ढाई – तीन घंटे की यात्रा कर कर हनुवंतिया पहुंचे| निजी क्षेत्र की भागीदारी के साथ मध्य प्रदेश पर्यटन विकास निगम ने तम्बुओं (स्विस टेंट) का पूरा गाँव बसा रखा था| आधुनिक प्रकाश व्यवस्था वाले वातानुकूलित तम्बू में आधुनिक दैनिन्दिक सुविधाएँ थीं| सुख सुविधा अनुभव आराम को देखते हुए तबुओं के इन किरायों को अधिक नहीं कहा जा सकता|

क्योंकि हम सूर्यास्त से कुछ पहले ही पहुंचे थे, वहां पर चल रही अधिक गतिविधियों में भाग नहीं ले सके| नियमानुसार यह गतिविधियाँ सूर्योदय से सूर्यास्त के बीच ही हो सकतीं हैं| यहाँ गतिविधियों में जल – क्रीड़ा, साहसिक खेल, आइलैंड कैम्पिंग, हॉट एयर बलून, पेरा सेलिंग, पेरा स्पोर्ट्स, पेरा मोटर्स, स्टार गेजिंग, वाटर स्कीइंग, जेट स्कीइंग, वाटर जार्बिंग, बर्मा ब्रिज, बर्ड वाचिंग, ट्रैकिंग, ट्रीजर हंट, नाईट कैम्पिंग आदि  बहुत कुछ शामिल है|

#sunset at Hanumantiya #jalmahotsav 16th December 2016

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इंदिरा सागर बांध 950 वर्ग किलोमीटर से भी ज्यादा बड़ा है| यह क्षेत्रफल की दृष्टि से सिंगापूर जैसे देश से बड़ा है| समुद्र जैसे विशाल इंदिरा सागर बांध के किनारे टहलना, साइकिल चलाना और चाँदनी रात में लहरों को निहारना अपने आप में अच्छा अनुभव था| निगम की ओर से सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन तो था ही| आगंतुकों के लिए काफी बड़े भोजनालय का भी प्रबंध किया गया है|

सुबह जल्दी उठकर मैंने योग – ध्यान का नियम पूरा किया| निगम की ओर से योगाचार्य के मार्गदर्शन का लाभ यहाँ लोगों के लिए उपलब्ध है| हवा सुबह से असमान्य रूप से तेज बताई जा रही थी| फिर भी पैरा – ग्लाइडिंग और पैरा – मोटरिंग का आनंद लिया गया| बाद में तेज हवा और तेज लहरों के चलते बहुत से गतिविधियाँ स्थगित कर दीं गईं| मौसम का आप कुछ निश्चित नहीं कह सकते परन्तु इसके बदलते रुख से आनन्द में वृद्धि ही होती है| अगले दिन सभी गतिविधियाँ सामान्य रूप से हो  रहीं थीं, परन्तु मेरे पास उनके लिए समय नहीं था|

दूसरा जल महोत्सव पूरे एक माह चलेगा| अगर आप जल महोत्सव की भीड़ से इतर जाना चाहें तो यहाँ पर्यटन निगम की ओर से स्थाई व्यवस्था है| हाउसबोट का काम अपने अंतिम चरण में था| उनका निरिक्षण करने के बाद उनमें रुकने की इच्छा जाग्रत हुई|

खंडवा रेलवे स्टेशन से हनुवंतिया 50 किलोमीटर है और इन्दोर हवाई अड्डे से यह 150 किलोमीटर है|

नीलाभ जल वाला हनुवंतिया आपको बुला रहा है|