वडपलनी मुरुगन मंदिर

कभी कभी अचानक कहीं जा पहुँचने का संयोग बनता है| उस दिन भी यही हुआ| देर शाम तय हुआ कि वडपलनी में कामकाज की सिलसिले में पहुँचने से पहले मुरुगन मंदिर भी पहुंचा जाए| उत्तर भारतीय हिन्दू मंदिरों के आसपास रहने वाली गंदगी, भीड़भाड़ और पंडा पुजारी की रेलमपेल मेरे शृद्धा भाव को छू-मन्तर कर देती है| मगर दक्षिण भारत में मंदिर अक्सर साफ़ सुथरे रहते हैं| एक बात और भी है ध्यान देने की, दक्षिण भारत में बहुत सारे मंदिर सरकारी नियंत्रण में हैं| वडपलनी मुरुगन मंदिर भी सरकारी विभाग द्वारा नियंत्रित मंदिर है| इन सरकार नियंत्रित मंदिरों को देखकर मुझे हमेशा लगता है कि सरकारी तंत्र के अकुशल और प्रभावहीन प्रबंधन की बात सही नहीं है और जान बूझकर पैदा की गई है|

सुबह सुबह मंदिर पहुँचे| कोई हो- हल्ला नहीं था| वैसे भी यह किसी त्यौहार वाला दिन नहीं था| प्रसाद खरीदने की कोई इच्छा नहीं थी| आखिर घर लौटने में दिन थे| दो फूल मालाएं खरीदी गई| सड़क किनारे बैठे उस फूल वाले ने बात टूटी फूटी हिंदी में की मगर दाम तमिल में बताये| मैंने सौ रुपये का नोट दिया तो वो टूटे पैसे लेने चला गया| पंद्रह रुपये में दो बढ़िया फूलमालाएं|

किसी दुकानदार ने आवाज नहीं लगाई| कोई पंडा पुजारी नहीं आया| किसी ने भगवान से अपने सीधे सम्बन्ध का दावा नहीं किया| भीड़ नहीं थी| पहले से बताए गए हिसाब से हम चुपचाप टिकट काउंटर की तरफ़ बढ़ गए| दस का नोट बढाया और दो टिकट प्राप्त कीं| मुख्य मंदिर की तरफ पहुँचते ही पता लगा यह अर्चना की टिकट है, स्पेशल दर्शन का नहीं| स्पेशल दर्शन के लिए बीस रुपये का टिकट था| पहले अर्चना के लिए लाइन में लग गए| यहाँ वास्तव में कोई लाइन नहीं थी| अंतिम छोर तक पहुँचते ही, पुजारी आया| हमारी पूजा सामिग्री लेकर गर्भगृह में अन्दर चला गया| हम देखते रहे| देवता से अधिक मेरा ध्यान पुजारी पर था| मगर उसने वापिस आने से पूर्व पूरे विधि विधान संपन्न किये| ऐसा नहीं कि दूर से ही चढ़ावे की फूलमाला देव-मूर्ति की तरफ उछाल कर वापिस आ गया हो| वापिस आकर उसने आचमन का जल और माला के आधे फूल हमें दे दिए, वही हमारा प्रसाद था| हम कोई खाद्य पदार्थ तो प्रसाद के लिए लेकर आये नहीं थे|

हमने कोई देव-दर्शन तो किये नहीं थे| सारा ध्यान तो पुजारी पर था| दोबारा काउंटर पर जाकर स्पेशल दर्शन का टिकट लिया| इस लाइन में हम बिल्कुल अकेले थे| पूरा पांच मिनट सबसे बढ़िया लगने वाली जगह पर खड़े हुए अपने मन, भाषा और विचार के अनुसार मन ही मन पूजा संपन्न की| कोई पुजारी हमें रोकने टोकने समझाने बुझाने लूटने खसोटने नहीं आया| जिस पुजारी ने हमारी पूजा करवाई थी, वह भी दूर से मुस्करा कर अपने काम में लग चुका था|

इसके बाद हमने प्रांगण में मौजूद अन्य मंदिरों का दर्शन किया| ऐसे ही एक मंदिर के पुजारी ने हमारे प्रसाद के फूल और टीके के लिए दी गई भस्म को बाकायदा कागज में बांध दिया| कोई शब्द नहीं बोला सुना गया| धन्यवाद और उसके स्वीकार के रूप में नमस्कार ही रहा|

जूते मंदिर के बाहर दरवाजे के के ओर असुरक्षित रखे थे, मगर सुरक्षित ही मिले| पास की एक दुकान से स्थानीय चाय नाश्ता किया| नाम आदि नहीं पता| सारा कार्य-व्यवहार संकेतों में चलता रहा| दालवडा, प्याज आदि का पकौड़ा, एक समौसे जैसा कुछ और अलग अंदाज की एक चाय| दो लोगों में सौ रुपये भी खर्च न हुए| एक चाय में मधुमक्खी गिरने पर उस के स्थान पर दूसरी चाय भी बिना कुछ कहे सुने मिल गई|

चलते चलते बता दें यह मंदिर तमिल फ़िल्म इंडस्ट्री में बहुत प्रसिद्ध है| चेन्नई के बहुत सारे विवाह कार्य यहीं संपन्न होते हैं| तमिलनाडू हिन्दू धार्मिक विभाग द्वारा मंदिर की आधिकारिक वेबसाइट भी बनाई गई है| जहाँ सभी जानकारियां उपलब्ध हैं| मैंने यह वेबसाइट बाद में देखी|

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चेन्नै की एक सुबह ईश्वर (मेरे वरिष्ठ और मित्र) से मिलने जाते समय देव का बुलावा आया। पहले पाँच रुपये के टिकट से दूरदर्शन हुए तो आदेश हुआ पास आओ तो बीस का टिकट लिया। छोटी से बात कही गई, साथ के साथ सुन ली गई। मुरुगन से पिछले दस साल में पहली मुलाकात थी। दक्षिण भारतीय मंदिरों में उत्तर भारत के मंदिरों के मुकाबले अधिक सफाई है और पैसे भी रसीद के साथ लिए जाते है। पुजारियों ने खुद बुला कर आशीर्वचन कहे और न धन मांगा न दिया गया, और बाद में किसी पुजारी ने आँख न ततेरी। सिर्फ़ दो पुष्पमालाओं से पूजा सम्पन्न हुई। खाद्य का प्रसाद ने चढ़ा, न पाया। बाहर आकर स्थानीय चाय नाश्ता हुआ और मन के साथ तन भी संतुष्ट हुआ। #chennai #murugan #vadapalani

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उड़न गाथा

हवाई यात्रा का बेहतरीन पहलू है समय की बचत और बेकार पहलू है समय की बर्बादी।

पहली पहली उड़ान से यह बात समझ आ गई थी। आप सोलह घंटे की रेलयात्रा को घटा कर दो घंटे की हवाई यात्रा में बदल सकते है। लेकिन समय की बचत कितनी हुई, यह सीधा गणित नहीं होता। आप चौदह घंटे नहीं बचाते।

आपका प्रस्थान बिन्दु जो अक्सर आपका घर होता है से लेकर गन्तव्य बिन्दु तक का समय और आराम का विश्लेषण करना होता है। उदाहरण के लिए दिल्ली से मुम्बई की उड़ान दो घण्टे की है। आपको एयरपोर्ट पर किसी भी हालत में एक घण्टा पहले पहुँचना होता है वरना आपको उड़ान में बैठने की अनुमति नहीं मिल पाएगी। रास्ते के ट्रैफिक और किसी भी असंभावना के लिए भी समय का थोड़ा ख़्याल रखना होता है। इसी लिए ज्यादातर लोग दो घण्टे पहले हवाई अड्डे पर पहुंचते हैं। नई दिल्ली हवाई अड्डे के टर्मिनल तीन जैसे बड़े टर्मिनल पर आपको डिपार्चर गेट तक पहुंचने में भी थोड़ा बहुत समय लगता है।

इस प्रकार सुबह साढ़े सात बजे की उड़ान पकड़ने के लिए आपकी घर से ढाई तीन घंटे पहले निकलना सुनिश्चित करना होता है। यानि आपको देर से देर पाँच बजे घर छोड़ना होगा। पाँच बजे घर से निकलने के लिए आपको एक या दो घण्टे पहले उठना होता है, यह समय इस पर निर्भर है कि कितने लोगों के तैयार होना है। बच्चों को इतनी सुबह जगाना भी आजकल टेढ़ी खीर है।

एक अकेले इंसान को भी अगर हवाई यात्रा करनी है लगभग तीन घंटे पहले जागना होता है। यानि साढ़े सात की उड़ान के लिए चार बजे के आसपास। अगर सुबह नींद से परेशान नहीं होना चाहते तो छः घण्टे पहले सोना भी सुनिश्चित करें।

इसी तरह विमान से उतरने के बात सामान पट्टी से सामान लेने में भी पंद्रह से तीस मिनिट का समय लग जाता है। इसके बाद वाहन अपना हो या किराये का, आप दस पंद्रह मिनट लगते हैं।

इस तरह आपको दो घण्टे की उड़ान के लिए वास्तव में छः घण्टे का समय लगाना होता है। यदि यह उड़ान सुबह सबेरे की है तो रात भर नींद का तो न पूछिये। करवट बदल बदल रात बात जाती है। यदि यह उड़ान दोपहर की है तो दिन न यहाँ का रहता है न वहाँ का।

रेल यात्रा मुझे सुविधाजनक लगती है क्योंकि रेल आपको यात्रा के दौरान सोने का एक अच्छा अवसर प्रदान करती है।

बादल

मौसम अजब है या गजब है!!

तुमको पता है क्या? क्या सोचना है तुम्हारा? अंदर बेचैनी है या बेक़रारी? कुछ कहा भी नहीं जा सकता। कह सकना आसान नहीं होता। महसूस कर रहा हूँ। तुम्हें भी महसूस हो रहा होगा न?

तुम्हारी चुप्पी वाचाल है, बहुत। कहती तो बहुत है, सुनती है या नहीं! नहीं जानता मैं।

सुबह से फुहार पड़ रही है। फ़ुहार पड़ना मौसम का जादू है। अल सुबह की फ़ुहार, भोर से पहले की फ़ुहार, अग्नि का रूप है या जल का? किसी कवि के लिए कहना मुश्किल। वैज्ञानिकों के पास दिमाग़ नहीं होता, कलपुर्जा होता है। उन से क्या पूछना?

जब घर से निकला था, लोदियों के बाग़ से आती कुछ एक पंछियों की पुकार बताती थी कि प्रेम का समय है, मिलन की बेला है, सृष्टि के सृजन का, जीवन के नव कलेवर का मुहूर्त हुआ जाता है। दिन निकलने ही तो वाला है और दिल्ली सोई हुई है अभी।

लगता था डोली को कुशल कहार लिए जाते हों। मन पुकार था, कार की खिड़कियाँ खुली रखने के लिए। मन पर काबू रखना अच्छी बात नहीं, है न! बाहर झाँकता रहा।

जब आप सड़क पर धीरे धीरे धीर धरे चलना चाहते है, भीड़ नहीं होती। हवाई अड्डे तक के दर्जन भर किलोमीटर मिलीमीटर में बदल जाते हैं। मन कह रहा था न मुझ से – दूरी को लंबाई में नापना पश्चिम वालों की मूर्खता है और वक़्त में नापना पूर्व वालों की।

हवाई अड्डे पर कितनी उदासी होती है। लगता है रोबोट हैं सब। सॉरी, प्लीज् एक्सक्यूज़ थैंक्स जैसे बेमानी शब्द हवा में तैरते हैं जैसे तोते बोलते हैं। याद आती थी बहुत, हवाओं की।

हवा में उठने के बाद कितना अलग हो जाता है सब। ऊपर और नीचे फोहे और फाहे तैर रहे थे। उन के बीच हम टँगे हुए। काले सफेद में भी प्रकृति कितना रच देती है। काले सफेद में भी कितनी रंगतें हैं। इनमें कितने सारे रंग भी तो हैं, रंगतें तो अनगिनत महसूस होती हैं। पता है न तुम को, तुम्हारी हर साँस में अलग खुशबू होती है। क्या तुम्हें पता होगा? तुम्हें क्या पता होगा?

दिल्ली से चेन्नई तक बादलों की अनगिनत रंगतें देखता था, रंग उमड़ घुमड़ आते थे। मन फ़ुहार बन कर बरस रहा था, बरसों की यादें आतीं थी। जब माघों में पानी बरसा करता था। जब सावन में बहारें आतीं थीं। जब मन में मल्हारें आतीं थीं।

सीट बेल्ट को हर पल बाँधना पड़ता था। सुरबाला को डर था शायद मैं उड़ न जाऊँ। या शायद वह भी उड़ रही होगी, कौन जाने? उसके चेहरे को बनावट के कई लेप ढके हुए था। अच्छा भी था। मैं बादलों को पढ़ना चाहता था।

वो शब्द बन कर उड़ते थे, ग़ज़ल बन कर बहते थे, गीत बनकर गुनगुनाते थे, हवा बन कर गुदगुदाते थे, बहार बन कर आते थे, अजनबी बन कर जाते थे, याद बन कर बस जाते थे, सपने बन कर छिप जाते थे, नींद बनकर विलीन हो जाते थे। बादल पर बहारें बहती थी, कागों की कहानी कहती थी, कोयल की वाणी रहती थी, रागों की रवानी होती थी।

जहाज के अंदर आकाशवाणी होती थी, मौसम का हाल ख़राब है। मैं सोचता था, उन्हें मेरे और तुम्हारे मन का पता कैसे चल जा रहा है?

काश, तुम साथ होते तो बादल छूने निकल जाता। तुम साथ ही तो थे, बादल छू रहा था मैं।

वह मर चुका है, पर बोलता है

पुरानी इमारतें अगर खंडहर न हो रहीं हों तो आबादी को पुकारतीं हैं| उनके आसपास आबादी जमा हो जाती है और साथ में अपनी गंदगी और प्रदूषण भी लाती है| जहाँ कहीं भी ईसाईयों की आबादी कम है, वहां चर्च आम तौर पर शांत हैं| इस चर्च का नाम तो है ही “जंगल में संत जॉन”| अपनी स्थापना के डेढ़ सौ साल पूरे होने के बाद यह चर्च आज भी जंगल में ही कहा जा सकता है| यह पुराना चर्च देश के सबसे बड़े भूकम्पों में से एक देख चुका है| पास पड़ोस में बीस हजार इंसानी मौत और भारी माली नुक्सान| चर्च नष्ट होने से बचा रहा मगर नुक्सान झेलना पड़ा|

नीचे एक तरफ देवदार का घना जंगल है तो दूसरी तरफ़ पहाड़ी और फोर्बिसगंज की हल्की फुल्की आबादी| पर्यटकों की गाड़ियाँ आ जा रहीं है| जिन्हें जल्दी है वो पैदल निकल जाते हैं| एकांतर एकल मार्ग का नियम लागू है|

भीड़ तो है सड़क पर मगर उसे चर्च से लेना देना नहीं| चर्च के दरवाजे की ओर शायद ही कोई देखता है| जो देखते हैं उन्हें चर्च से ज्यादा इसके अहाते में बनीं पुरानी कब्रें दिखाई देतीं हैं| मुझे चर्च की पुरानी इमारत पुकारती है| समय की मार दिखाई देती है| देखने से मालूम होता है, अभी देश का सबसे ताकतवर इंसान यहाँ आता रहा होगा| मैं चर्च की ओर उतर जाता हूँ| पुराने पेड़ बातें करते हैं, कब्रें मुस्कुरातीं हैं|

हमारें मुल्क में ज्यादातर बड़े बाग़ बगीचे कब्रों, मकबरों और छतरियों के साथ बने हैं| चर्च का यह अहाता कोई बगीचा या बाग़ जैसा नहीं कहा जा सकता| बेतरतीब का छोटा जंगल है| लगता नहीं कोई ज्यादा ख्याल रखा जाता है| मैं कब्रों के पत्थरों पर लिखी इबारतें पढ़ता जाता हूँ| कब्रों में लेटे लोग लगता है अक्सर आपस में बातचीत करते हैं| जैसा अक्सर होता है, माहौल उदास सा है| मैं चर्च के अन्दर जाता हूँ, अजब शांति का कुछ समय बिता कर बाहर आ जाता हूँ| चर्च के अहाते में बायीं ओर

एल्गिन के आठवें और किन्कार्दीन के बारहवें अर्ल जेम्स ब्रूस की कब्र है| जेम्स ब्रूस साहब सन १८६२ से १८६३ के बीच बीस महीने तक भारत के वाइसराय रहे|

अंगेजों से हम भारतियों का माई-बाप गुलामी का नाता है| अक्सर हम उन की इज्ज़त करते हैं| हम उन्हें आज भी अपने से ऊपर रखते हैं| शायद ही कभी उन्हें उस तरह गालियाँ देते हैं, जिस तरह किसी और शासक को दे लेते हैं| हर शासक में कुछ न कुछ अच्छाई बुराई होती है| पर अंग्रेज पहले शासक थे, जिनका मकसद देश को गुलाम बनाना था और लूटकर यहाँ का पैसा अपने मुल्क ले जाना था| वो न लूटकर लौटने का इरादा रखते थे न यहाँ रहकर यहीं का होकर शासन करने का|

एक शानदार शांत भव्यता के साथ खड़ा जेम्स ब्रूस का यह स्मारक मुझसे कहता है – हमने सब कुछ सही गलत किया तुम्हारे साथ| मंदिर और मस्जिद नहीं तोड़े| यही कूटनीति तुम्हे आज भी हमारा गुलाम रखती है|

उसने मुझसे कहा, आते रहना| कभी कभी मिलकर बातें करेंगे| मैंने कहा, आधी दुनिया पर राज करने वाले तुम, आज इस नीरवता में अकेले हो| वह मुस्कुराया, मैं अक्सर यहाँ हिमालय से गले मिलता हूँ| अगर कोई इसरायली सिपाही इधर से निकलता है, तो उसके साथ कॉफ़ी पीता हूँ|

स्मारक पर लिखा गया है – “वह मर चुका है, पर बोलता है”|

पानी की पहली लड़ाई

धौलाधार के ऊँचे पहाड़ों पर दूर एक प्राचीन मंदिर मिलता है| कहानियाँ बताती हैं कि कोई प्राचीन जनजातियों के राजाओं की लड़ाई हुई थी यहाँ| दोनों राजा मरने लगे| दोनों के एक दूसरे का दर्द समझ आया| एक दूसरे की प्रजा का दर्द समझ आया| मरते मरते समझौता हुआ| एक युद्ध स्मारक बना| यह युद्ध स्मारक अगर आज उसी रूप में होता तो शायद दुनिया का सबसे प्राचीन जल-युद्ध का स्मारक होता| जैसा होता है – स्मारक समय के साथ पूजास्थल बन गया और धीरे धीरे चार हजार साल बाद और अब से पांच हजार साल पहले मंदिर| यहाँ आज पंचमुखी शिवलिंग मंदिर है| अब यह गोरखा रेजिमेंट का अधिष्ठाता मंदिर है|

आज यह शिव मंदिर – एक कहानी और भी कहता है – भूकम्प की| धरती काँप उठी थी| मंदिर नष्ट हो गया| दूर एक चर्च बचा रहा| हिमालय के धौलाधार पहाड़ों के वीराने में लगभग बीस हजार लोग मारे गए| मंदिर दोबारा बनाया गया| उस भूकंप की चर्चा फिर कभी|

तब थार रेगिस्तान रेगिस्तान न था, नखलिस्तान भी न था, हरा भरा था| रेगिस्तान में अजयमेरु का पर्वत था| वही अजयमेरू जहाँ पुष्कर की झील है| अरावली की इन पहाड़ियों पर मौर्य काल से पहले एक बड़े राज्य के संकेत मिलते हैं जिसका स्थापत्य सिन्धु सभ्यता से मेल खाता है| यही एक भाग्सू राक्षस का राज्य था| सुनी सुनाई कहानियों के विपरीत यह राक्षस जनता का बहुत ध्यान रखता था| पर ग्लोबल वार्मिंग तब भी थी| हरा भरा अजयमेरू राज्य सूखे का सामना कर रहा था| राजा भाग्सू राक्षस ने पानी की ख़ोज की और हिमालय पर धौलाधार के पहाड़ों पर के झरने से पानी लाने का इंतजाम किया|

कथा के हिसाब से राजा भाग्सू राक्षस कमंडल में सारा पानी भरा और अपने राज्य चल दिया| स्थानीय राजा नाग डल को चिंता हुई| अगर पानी इस तरह चोरी होने लगा तो उसके राज्य में पानी का अकाल पड़ जायेगा| उसके राज्य में बर्फ़ तो बहुत थी मगर पानी?? ठण्डे हिमालय पर आप बर्फ नहीं पी सकते|

युद्ध शुरू हुआ| स्थानीय भूगोल ने स्थानीय राजा नाग डल की मदद की| राक्षस हारने लगा| उसने समझौते की गुहार लगाई| दोनों राजाओं ने पानी का मर्म, पानी की जरूरत और आपसी चिंताएं समझीं और संधिपत्र हस्ताक्षरित हुआ| यह सब आज से ९१३० साल पहले द्वापरयुग के मध्यकाल में हुआ|

इस युद्ध का स्थल आज दोनों महान राजाओं भाग्सू राक्षस और नाग दल के नाम पर भागसूनाग कहलाता है| हिमाचल में धर्मशाला के पास जो नाग डल झील है, वह इसी युद्ध या समझौते से अस्तित्व में आई| अजयमेरू तक भी पानी पहुंचा| कोई पुष्टि नहीं, मगर पुष्कर झील की याद हो आई| हो सकता है, नाग डल और पुष्कर प्राचीन बांध रहे हों, जिनके स्रोत नष्ट होते रहे और ताल रह गए|

अपनी प्रजा को प्रेम करने वाले दोनों महान राजाओं के राज्य, उनके वंश, उनकी जाति, उनके धर्म आज नहीं हैं| उस महान जल संधि का नाम भी विस्मृत ही है| इस वर्ष उस युद्ध का कारक भाग्सू नाग झरना मुझे सूखता मिला|

उनका युद्ध स्मारक आज गोरखा रायफल के अधिष्ठाता देवता के रूप में विद्यमान है| ५१२६ साल पहले राजा धर्मचंद के राज्य में यहाँ शिव मंदिर की स्थापना हुई| भागसूनाग मंदिर का नाम बिगाड़कर भागसुनाथ लिखा बोला जा रहा है| कल संभव है भाग्यसुधारनाथ भी हो जाए|

जब भी जाएँ कांगड़ा, धर्मशाला, मैक्लोडगंज, भाग्सूनाग जाएँ, मंदिर के बाहर लगे पत्थर पर लिखे इतिहास को बार बार पढ़े| उसके बाद भाग्सुनाग झरने में घटते हुए पानी को देखें| बचे खुचे ठन्डे पानी में हाथपैर डालते समय सोचें; आज इस स्थान से थोड़ा दूर शिमला में सरकार पानी नाप तौल कर दे रही है|

मेरी जानकारी में भाग्सूनाग का युद्ध जल के लिए पहला युद्ध है| आज यह मिथक है, कल इतिहास था|

कहते हैं अगला विश्वयुद्ध पानी के लिए होगा| भारत पाकिस्तान और भारत चीन पहले ही पानी की बात पर अधिक कहासुनी कर ने लगे हैं|

यदि आपको लगता है, बच्चों का भविष्य बचाना है, इस मिथिकीय कहानी को इष्ट मित्रों से साँझा करें शेयर करें|

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यह स्वछायाचित्र

अपनी स्मृतियों को संजोकर रखना और उन्हें विस्मृत करने का प्रयास करना मानव जीवन के दो प्रमुख संघर्ष हैं| स्मृति का महत्त्व इस बात से है कि पुरातन विधियों को भी स्मृति का नाम दिया गया है – मनु स्मृति,  याज्ञवल्क्य स्मृति| यह स्मृतियों को संजोने और उनसे सीखने का प्रयास ही तो है कि जीवनी लेखन विश्व साहित्य की प्रमुख विधा है और पाठकों के बीच लोकप्रिय भी है| यह आपकी स्मृतियाँ ही तो हैं जो आपको नश्वर जीवन को अमृत्व प्रदान कर सकतीं हैं| और अपनी स्मृति को अमरत्व देने का प्रयास रहा हैं – आत्मकथा| आत्मकथाएं भले ही आपको अमरत्व प्रदान न कर पातीं हो, इसे लिखते और बार बार पढ़ते हुए आपकी अपनी स्मृतियों को कई बार जी जाते हैं|

चित्रकारों से अपने चित्र बनवाने की इच्छा भी इसी कड़ी का का अगला पड़ाव है| छायाचित्रों के आने के चित्र बनवाने का कार्य सस्ता, सुगम और सुगढ़ हो गया| और आज अपनी स्मृतियों को विस्मृत होने से बचाने का एक प्रयास है – स्वछायाचित्र यानि सेल्फी| आज तलाश उत्कर्ष स्वछायाचित्र की – परफेक्ट सेल्फी की है|

प्रायः स्वछायाचित्र पर्यटन, विशिष्ट भेंट- मिलन, विशिष्ट भोज और एकान्तिक प्रहसन के रूप में लिए जाते हैं| इन में से अधिकतर का सम्बन्ध छायाचित्रों की विधागत बारीकियों से नहीं होता – भले ही उनका संपादन आदि बाद में किया जाए| मुझे लगता हैं विधागत बारीकियों का अपना महत्व है| परन्तु  सबसे महत्वपूर्ण है वह कथा जिसे हम स्वछायाचित्र के माध्यम से कहना चाहते हैं| क्या वह कथा हम कह पाए – क्या वह कथा दर्शक की जिज्ञासा में प्रश्न के रूप में उठ पाई| क्या उसे हम स्वयं स्मृति में संजो पाए| यदि स्वछायाचित्र का आत्मकथ्य जीवंत न हुआ तो तकनीकि रूप से उत्कर्ष स्वछायाचित्र भी प्राणहीन हो जाता है| प्राणहीन स्वछायाचित्रों से हम सब के उपकरण भरे पड़े हैं|

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उस दिन हम महाराष्ट्र सदन गए थे| प्रान्तों के भवन और सदन दिल्ली में अपने प्रान्त के भोजन, भाषा, संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हैं| जिस समय आपके लिए भोजन तैयार हो रहा हो तब बच्चों के लिए प्रतीक्षा का कठिन समय होता है| महाराष्ट्र सदन में घुमाने और समझाने के लिए बहुत कुछ है| सावित्री बाई फुले की मूर्ति एक प्रेरक है| भारत में स्त्री शिक्षा में उनका योगदान कोई नकार नहीं सकता| यह चित्र विस्मृत स्मृति है उन पुरानी महिला ऋषि-मुनियों की, जिन्होंने वेद ऋचाओं की रचना भी की और उस मूर्खता की कि स्त्री शिक्षा को धर्म के नाम पर नकार दिया गया| अपनी बिटिया के साथ जब में यह चित्र ले रहा था तो मुझे लगा सावित्री बाई फुले जीवंत होकर मुस्करा रहीं थीं| यह #स्वछायाचित्र प्रेरणा है उज्जवल भविष्य के लिए| #selfie #maharashtrasadan

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उस दिन हम महाराष्ट्र सदन गए थे| प्रान्तों के भवन और सदन दिल्ली में अपने प्रान्त के भोजन, भाषा, संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हैं| जिस समय आपके लिए भोजन तैयार हो रहा हो तब बच्चों के लिए प्रतीक्षा का कठिन समय होता है| महाराष्ट्र सदन में घुमाने और समझाने के लिए बहुत कुछ है| सावित्री बाई फुले की मूर्ति एक प्रेरक है| भारत में स्त्री शिक्षा में उनका योगदान कोई नकार नहीं सकता| यह चित्र विस्मृत स्मृति है उन पुरानी महिला ऋषि-मुनियों की, जिन्होंने वेद ऋचाओं की रचना भी की और उस मूर्खता की कि स्त्री शिक्षा को धर्म के नाम पर नकार दिया गया| अपनी बिटिया के साथ जब में यह चित्र ले रहा था तो मुझे लगा सावित्री बाई फुले जीवंत होकर मुस्करा रहीं थीं| यह स्वछायाचित्र प्रेरणा है उज्जवल भविष्य के लिए|

तकनीकि रूप से जब मुझे इस चित्र में एक और बड़े फ्रेम की तलाश थी जो आस पास की कथा, गौरव, वास्तुकला, नक्काशी को कुछ और दिखा पाता| यह एक बढ़िया स्वछायाचित्र अनुभव  Selfie experience होता और बढ़िया Selfie camera मेरे पास होता|

 

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कोवलम तट

जब अनजान लोग किसी अनजान जगह तलाश में जाते हैं तो कुछ पक्का पता नहीं चलता कि उसी जगह पहुंचे जहाँ जाना था या कुछ नई ख़ोज हुई| कोवलम तट पर हमारी यात्रा भी कुछ इस तरह ही थी| अपने वयस्त कार्यक्रम के दौरान कुछ घंटे चुराए गए और दोस्तों का एक समूह बिना किसी शोध – ख़ोज के टैक्सी में सवार होकर चल पड़ा| कष़ाकूटम से हमें ले जाने वाला टैक्सी चालक हिंदी और अंग्रेजी लगभग न के बराबर समझता था| हम कोवलम में उसके अनुसार मुख्य स्थान जुमा मस्जिद के पास तट पर उतारे गए| कोवलम के प्रसिद्ध तटों से अलग हम आम देशी जनता से भरे तट पर थे| कुछ स्थानीय लोग तफरीह कर रहे थे और बाकि मछली पकड़ने में व्यस्त थे|

तट पर भीड़ बहुत थी| होटल लीला (halcyon castle)और जुमा मस्जिद के उत्तर में ऊँची चट्टानों और लहरों की आँख मिचौनी के बीच हम चट्टानों के निकट जा विराजे| इन चट्टानों के लिए लिखा हुआ था कि संभल कर चढ़ें| यह भारी भरकम पत्थर थे जिनपर तेज लहरें आकर अपना जोर अजमाती थीं| यहाँ शांति थी| चट्टानों के दूसरी ओर एक रिसोर्ट में का समुद्र तट था जिसमें विदेशी सैलानियों की बहुसंख्या थी|

चट्टानों की तरफ शुरुआत में वहां एक छोटी मोटी संरचना थी, जिसे झंडियाँ लगा कर किसी साधारण दरगाह का रूप दिया गया था| मैं और मेरे दो मित्र सुन्दर नजारों के लिए अपनी किस्मत अजमाने इन चट्टानों पर चढ़े और यह अच्छा काम हमने किया| एक तो छोटी मोटी मगर कठिन चढ़ाई का लुफ्त मिला, दूसरा वहां समुद्र की लहरें और आवाज तेज थी| पत्थरों से टकराती लहरें तेज उठतीं गिरतीं थीं| हम यहाँ बैठ गए और दूर तक समुन्दर उछालें लेता था| छिपता हुआ सूरज रंग और नज़ारे बदल रहा था| इसे लिखा नहीं जा सकता| मैंने अपने घर फ़ोन कर कर पिता, पत्नी और बेटे को सीधा प्रसारण कर डाला| मेरा बेटा चट्टानों पर मेरे चढ़ने उतरने का कौशल देख खुश था| शायद यह ग्रोव तट कहलाता है|

उसके दक्षिण में विश्व प्रसिद्ध लाइटहाउस तट और हवा तट हैं| केरल पर्यटन का समुद्र तट रिसोर्ट उत्तर में शोभायमान है|