वह मर चुका है, पर बोलता है

पुरानी इमारतें अगर खंडहर न हो रहीं हों तो आबादी को पुकारतीं हैं| उनके आसपास आबादी जमा हो जाती है और साथ में अपनी गंदगी और प्रदूषण भी लाती है| जहाँ कहीं भी ईसाईयों की आबादी कम है, वहां चर्च आम तौर पर शांत हैं| इस चर्च का नाम तो है ही “जंगल में संत जॉन”| अपनी स्थापना के डेढ़ सौ साल पूरे होने के बाद यह चर्च आज भी जंगल में ही कहा जा सकता है| यह पुराना चर्च देश के सबसे बड़े भूकम्पों में से एक देख चुका है| पास पड़ोस में बीस हजार इंसानी मौत और भारी माली नुक्सान| चर्च नष्ट होने से बचा रहा मगर नुक्सान झेलना पड़ा|

नीचे एक तरफ देवदार का घना जंगल है तो दूसरी तरफ़ पहाड़ी और फोर्बिसगंज की हल्की फुल्की आबादी| पर्यटकों की गाड़ियाँ आ जा रहीं है| जिन्हें जल्दी है वो पैदल निकल जाते हैं| एकांतर एकल मार्ग का नियम लागू है|

भीड़ तो है सड़क पर मगर उसे चर्च से लेना देना नहीं| चर्च के दरवाजे की ओर शायद ही कोई देखता है| जो देखते हैं उन्हें चर्च से ज्यादा इसके अहाते में बनीं पुरानी कब्रें दिखाई देतीं हैं| मुझे चर्च की पुरानी इमारत पुकारती है| समय की मार दिखाई देती है| देखने से मालूम होता है, अभी देश का सबसे ताकतवर इंसान यहाँ आता रहा होगा| मैं चर्च की ओर उतर जाता हूँ| पुराने पेड़ बातें करते हैं, कब्रें मुस्कुरातीं हैं|

हमारें मुल्क में ज्यादातर बड़े बाग़ बगीचे कब्रों, मकबरों और छतरियों के साथ बने हैं| चर्च का यह अहाता कोई बगीचा या बाग़ जैसा नहीं कहा जा सकता| बेतरतीब का छोटा जंगल है| लगता नहीं कोई ज्यादा ख्याल रखा जाता है| मैं कब्रों के पत्थरों पर लिखी इबारतें पढ़ता जाता हूँ| कब्रों में लेटे लोग लगता है अक्सर आपस में बातचीत करते हैं| जैसा अक्सर होता है, माहौल उदास सा है| मैं चर्च के अन्दर जाता हूँ, अजब शांति का कुछ समय बिता कर बाहर आ जाता हूँ| चर्च के अहाते में बायीं ओर

एल्गिन के आठवें और किन्कार्दीन के बारहवें अर्ल जेम्स ब्रूस की कब्र है| जेम्स ब्रूस साहब सन १८६२ से १८६३ के बीच बीस महीने तक भारत के वाइसराय रहे|

अंगेजों से हम भारतियों का माई-बाप गुलामी का नाता है| अक्सर हम उन की इज्ज़त करते हैं| हम उन्हें आज भी अपने से ऊपर रखते हैं| शायद ही कभी उन्हें उस तरह गालियाँ देते हैं, जिस तरह किसी और शासक को दे लेते हैं| हर शासक में कुछ न कुछ अच्छाई बुराई होती है| पर अंग्रेज पहले शासक थे, जिनका मकसद देश को गुलाम बनाना था और लूटकर यहाँ का पैसा अपने मुल्क ले जाना था| वो न लूटकर लौटने का इरादा रखते थे न यहाँ रहकर यहीं का होकर शासन करने का|

एक शानदार शांत भव्यता के साथ खड़ा जेम्स ब्रूस का यह स्मारक मुझसे कहता है – हमने सब कुछ सही गलत किया तुम्हारे साथ| मंदिर और मस्जिद नहीं तोड़े| यही कूटनीति तुम्हे आज भी हमारा गुलाम रखती है|

उसने मुझसे कहा, आते रहना| कभी कभी मिलकर बातें करेंगे| मैंने कहा, आधी दुनिया पर राज करने वाले तुम, आज इस नीरवता में अकेले हो| वह मुस्कुराया, मैं अक्सर यहाँ हिमालय से गले मिलता हूँ| अगर कोई इसरायली सिपाही इधर से निकलता है, तो उसके साथ कॉफ़ी पीता हूँ|

स्मारक पर लिखा गया है – “वह मर चुका है, पर बोलता है”|

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पानी की पहली लड़ाई

धौलाधार के ऊँचे पहाड़ों पर दूर एक प्राचीन मंदिर मिलता है| कहानियाँ बताती हैं कि कोई प्राचीन जनजातियों के राजाओं की लड़ाई हुई थी यहाँ| दोनों राजा मरने लगे| दोनों के एक दूसरे का दर्द समझ आया| एक दूसरे की प्रजा का दर्द समझ आया| मरते मरते समझौता हुआ| एक युद्ध स्मारक बना| यह युद्ध स्मारक अगर आज उसी रूप में होता तो शायद दुनिया का सबसे प्राचीन जल-युद्ध का स्मारक होता| जैसा होता है – स्मारक समय के साथ पूजास्थल बन गया और धीरे धीरे चार हजार साल बाद और अब से पांच हजार साल पहले मंदिर| यहाँ आज पंचमुखी शिवलिंग मंदिर है| अब यह गोरखा रेजिमेंट का अधिष्ठाता मंदिर है|

आज यह शिव मंदिर – एक कहानी और भी कहता है – भूकम्प की| धरती काँप उठी थी| मंदिर नष्ट हो गया| दूर एक चर्च बचा रहा| हिमालय के धौलाधार पहाड़ों के वीराने में लगभग बीस हजार लोग मारे गए| मंदिर दोबारा बनाया गया| उस भूकंप की चर्चा फिर कभी|

तब थार रेगिस्तान रेगिस्तान न था, नखलिस्तान भी न था, हरा भरा था| रेगिस्तान में अजयमेरु का पर्वत था| वही अजयमेरू जहाँ पुष्कर की झील है| अरावली की इन पहाड़ियों पर मौर्य काल से पहले एक बड़े राज्य के संकेत मिलते हैं जिसका स्थापत्य सिन्धु सभ्यता से मेल खाता है| यही एक भाग्सू राक्षस का राज्य था| सुनी सुनाई कहानियों के विपरीत यह राक्षस जनता का बहुत ध्यान रखता था| पर ग्लोबल वार्मिंग तब भी थी| हरा भरा अजयमेरू राज्य सूखे का सामना कर रहा था| राजा भाग्सू राक्षस ने पानी की ख़ोज की और हिमालय पर धौलाधार के पहाड़ों पर के झरने से पानी लाने का इंतजाम किया|

कथा के हिसाब से राजा भाग्सू राक्षस कमंडल में सारा पानी भरा और अपने राज्य चल दिया| स्थानीय राजा नाग डल को चिंता हुई| अगर पानी इस तरह चोरी होने लगा तो उसके राज्य में पानी का अकाल पड़ जायेगा| उसके राज्य में बर्फ़ तो बहुत थी मगर पानी?? ठण्डे हिमालय पर आप बर्फ नहीं पी सकते|

युद्ध शुरू हुआ| स्थानीय भूगोल ने स्थानीय राजा नाग डल की मदद की| राक्षस हारने लगा| उसने समझौते की गुहार लगाई| दोनों राजाओं ने पानी का मर्म, पानी की जरूरत और आपसी चिंताएं समझीं और संधिपत्र हस्ताक्षरित हुआ| यह सब आज से ९१३० साल पहले द्वापरयुग के मध्यकाल में हुआ|

इस युद्ध का स्थल आज दोनों महान राजाओं भाग्सू राक्षस और नाग दल के नाम पर भागसूनाग कहलाता है| हिमाचल में धर्मशाला के पास जो नाग डल झील है, वह इसी युद्ध या समझौते से अस्तित्व में आई| अजयमेरू तक भी पानी पहुंचा| कोई पुष्टि नहीं, मगर पुष्कर झील की याद हो आई| हो सकता है, नाग डल और पुष्कर प्राचीन बांध रहे हों, जिनके स्रोत नष्ट होते रहे और ताल रह गए|

अपनी प्रजा को प्रेम करने वाले दोनों महान राजाओं के राज्य, उनके वंश, उनकी जाति, उनके धर्म आज नहीं हैं| उस महान जल संधि का नाम भी विस्मृत ही है| इस वर्ष उस युद्ध का कारक भाग्सू नाग झरना मुझे सूखता मिला|

उनका युद्ध स्मारक आज गोरखा रायफल के अधिष्ठाता देवता के रूप में विद्यमान है| ५१२६ साल पहले राजा धर्मचंद के राज्य में यहाँ शिव मंदिर की स्थापना हुई| भागसूनाग मंदिर का नाम बिगाड़कर भागसुनाथ लिखा बोला जा रहा है| कल संभव है भाग्यसुधारनाथ भी हो जाए|

जब भी जाएँ कांगड़ा, धर्मशाला, मैक्लोडगंज, भाग्सूनाग जाएँ, मंदिर के बाहर लगे पत्थर पर लिखे इतिहास को बार बार पढ़े| उसके बाद भाग्सुनाग झरने में घटते हुए पानी को देखें| बचे खुचे ठन्डे पानी में हाथपैर डालते समय सोचें; आज इस स्थान से थोड़ा दूर शिमला में सरकार पानी नाप तौल कर दे रही है|

मेरी जानकारी में भाग्सूनाग का युद्ध जल के लिए पहला युद्ध है| आज यह मिथक है, कल इतिहास था|

कहते हैं अगला विश्वयुद्ध पानी के लिए होगा| भारत पाकिस्तान और भारत चीन पहले ही पानी की बात पर अधिक कहासुनी कर ने लगे हैं|

यदि आपको लगता है, बच्चों का भविष्य बचाना है, इस मिथिकीय कहानी को इष्ट मित्रों से साँझा करें शेयर करें|

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यह स्वछायाचित्र

अपनी स्मृतियों को संजोकर रखना और उन्हें विस्मृत करने का प्रयास करना मानव जीवन के दो प्रमुख संघर्ष हैं| स्मृति का महत्त्व इस बात से है कि पुरातन विधियों को भी स्मृति का नाम दिया गया है – मनु स्मृति,  याज्ञवल्क्य स्मृति| यह स्मृतियों को संजोने और उनसे सीखने का प्रयास ही तो है कि जीवनी लेखन विश्व साहित्य की प्रमुख विधा है और पाठकों के बीच लोकप्रिय भी है| यह आपकी स्मृतियाँ ही तो हैं जो आपको नश्वर जीवन को अमृत्व प्रदान कर सकतीं हैं| और अपनी स्मृति को अमरत्व देने का प्रयास रहा हैं – आत्मकथा| आत्मकथाएं भले ही आपको अमरत्व प्रदान न कर पातीं हो, इसे लिखते और बार बार पढ़ते हुए आपकी अपनी स्मृतियों को कई बार जी जाते हैं|

चित्रकारों से अपने चित्र बनवाने की इच्छा भी इसी कड़ी का का अगला पड़ाव है| छायाचित्रों के आने के चित्र बनवाने का कार्य सस्ता, सुगम और सुगढ़ हो गया| और आज अपनी स्मृतियों को विस्मृत होने से बचाने का एक प्रयास है – स्वछायाचित्र यानि सेल्फी| आज तलाश उत्कर्ष स्वछायाचित्र की – परफेक्ट सेल्फी की है|

प्रायः स्वछायाचित्र पर्यटन, विशिष्ट भेंट- मिलन, विशिष्ट भोज और एकान्तिक प्रहसन के रूप में लिए जाते हैं| इन में से अधिकतर का सम्बन्ध छायाचित्रों की विधागत बारीकियों से नहीं होता – भले ही उनका संपादन आदि बाद में किया जाए| मुझे लगता हैं विधागत बारीकियों का अपना महत्व है| परन्तु  सबसे महत्वपूर्ण है वह कथा जिसे हम स्वछायाचित्र के माध्यम से कहना चाहते हैं| क्या वह कथा हम कह पाए – क्या वह कथा दर्शक की जिज्ञासा में प्रश्न के रूप में उठ पाई| क्या उसे हम स्वयं स्मृति में संजो पाए| यदि स्वछायाचित्र का आत्मकथ्य जीवंत न हुआ तो तकनीकि रूप से उत्कर्ष स्वछायाचित्र भी प्राणहीन हो जाता है| प्राणहीन स्वछायाचित्रों से हम सब के उपकरण भरे पड़े हैं|

उस दिन हम महाराष्ट्र सदन गए थे| प्रान्तों के भवन और सदन दिल्ली में अपने प्रान्त के भोजन, भाषा, संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हैं| जिस समय आपके लिए भोजन तैयार हो रहा हो तब बच्चों के लिए प्रतीक्षा का कठिन समय होता है| महाराष्ट्र सदन में घुमाने और समझाने के लिए बहुत कुछ है| सावित्री बाई फुले की मूर्ति एक प्रेरक है| भारत में स्त्री शिक्षा में उनका योगदान कोई नकार नहीं सकता| यह चित्र विस्मृत स्मृति है उन पुरानी महिला ऋषि-मुनियों की, जिन्होंने वेद ऋचाओं की रचना भी की और उस मूर्खता की कि स्त्री शिक्षा को धर्म के नाम पर नकार दिया गया| अपनी बिटिया के साथ जब में यह चित्र ले रहा था तो मुझे लगा सावित्री बाई फुले जीवंत होकर मुस्करा रहीं थीं| यह #स्वछायाचित्र प्रेरणा है उज्जवल भविष्य के लिए| #selfie #maharashtrasadan

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उस दिन हम महाराष्ट्र सदन गए थे| प्रान्तों के भवन और सदन दिल्ली में अपने प्रान्त के भोजन, भाषा, संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हैं| जिस समय आपके लिए भोजन तैयार हो रहा हो तब बच्चों के लिए प्रतीक्षा का कठिन समय होता है| महाराष्ट्र सदन में घुमाने और समझाने के लिए बहुत कुछ है| सावित्री बाई फुले की मूर्ति एक प्रेरक है| भारत में स्त्री शिक्षा में उनका योगदान कोई नकार नहीं सकता| यह चित्र विस्मृत स्मृति है उन पुरानी महिला ऋषि-मुनियों की, जिन्होंने वेद ऋचाओं की रचना भी की और उस मूर्खता की कि स्त्री शिक्षा को धर्म के नाम पर नकार दिया गया| अपनी बिटिया के साथ जब में यह चित्र ले रहा था तो मुझे लगा सावित्री बाई फुले जीवंत होकर मुस्करा रहीं थीं| यह स्वछायाचित्र प्रेरणा है उज्जवल भविष्य के लिए|

तकनीकि रूप से जब मुझे इस चित्र में एक और बड़े फ्रेम की तलाश थी जो आस पास की कथा, गौरव, वास्तुकला, नक्काशी को कुछ और दिखा पाता| यह एक बढ़िया स्वछायाचित्र अनुभव  Selfie experience होता और बढ़िया Selfie camera मेरे पास होता|

 

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कोवलम तट

जब अनजान लोग किसी अनजान जगह तलाश में जाते हैं तो कुछ पक्का पता नहीं चलता कि उसी जगह पहुंचे जहाँ जाना था या कुछ नई ख़ोज हुई| कोवलम तट पर हमारी यात्रा भी कुछ इस तरह ही थी| अपने वयस्त कार्यक्रम के दौरान कुछ घंटे चुराए गए और दोस्तों का एक समूह बिना किसी शोध – ख़ोज के टैक्सी में सवार होकर चल पड़ा| कष़ाकूटम से हमें ले जाने वाला टैक्सी चालक हिंदी और अंग्रेजी लगभग न के बराबर समझता था| हम कोवलम में उसके अनुसार मुख्य स्थान जुमा मस्जिद के पास तट पर उतारे गए| कोवलम के प्रसिद्ध तटों से अलग हम आम देशी जनता से भरे तट पर थे| कुछ स्थानीय लोग तफरीह कर रहे थे और बाकि मछली पकड़ने में व्यस्त थे|

तट पर भीड़ बहुत थी| होटल लीला (halcyon castle)और जुमा मस्जिद के उत्तर में ऊँची चट्टानों और लहरों की आँख मिचौनी के बीच हम चट्टानों के निकट जा विराजे| इन चट्टानों के लिए लिखा हुआ था कि संभल कर चढ़ें| यह भारी भरकम पत्थर थे जिनपर तेज लहरें आकर अपना जोर अजमाती थीं| यहाँ शांति थी| चट्टानों के दूसरी ओर एक रिसोर्ट में का समुद्र तट था जिसमें विदेशी सैलानियों की बहुसंख्या थी|

चट्टानों की तरफ शुरुआत में वहां एक छोटी मोटी संरचना थी, जिसे झंडियाँ लगा कर किसी साधारण दरगाह का रूप दिया गया था| मैं और मेरे दो मित्र सुन्दर नजारों के लिए अपनी किस्मत अजमाने इन चट्टानों पर चढ़े और यह अच्छा काम हमने किया| एक तो छोटी मोटी मगर कठिन चढ़ाई का लुफ्त मिला, दूसरा वहां समुद्र की लहरें और आवाज तेज थी| पत्थरों से टकराती लहरें तेज उठतीं गिरतीं थीं| हम यहाँ बैठ गए और दूर तक समुन्दर उछालें लेता था| छिपता हुआ सूरज रंग और नज़ारे बदल रहा था| इसे लिखा नहीं जा सकता| मैंने अपने घर फ़ोन कर कर पिता, पत्नी और बेटे को सीधा प्रसारण कर डाला| मेरा बेटा चट्टानों पर मेरे चढ़ने उतरने का कौशल देख खुश था| शायद यह ग्रोव तट कहलाता है|

उसके दक्षिण में विश्व प्रसिद्ध लाइटहाउस तट और हवा तट हैं| केरल पर्यटन का समुद्र तट रिसोर्ट उत्तर में शोभायमान है|

 

हिंदी में विनम्रता

Please, remove your shoes outside.

इस अंग्रेजी वाक्य का सही हिंदी अनुवाद क्या है?

  1. कृपया, अपने जूते बाहर उतार|
  2. अपने जूते बाहर उतारें|
  3. अपने जूते बाहर उतारिये|
  4. अपने जूते बाहर उतारियेगा|
  5. अपने जूते बाहर उतारने की कृपा करें|
  6. भगवान् के लिए अपने जूते बाहर उतार लीजिये|
  7. जूते बाहर उतार ले|
  8. जूते बाहर उतार ले, प्लीज|

हम हिन्दुस्तानियों पर अक्सर रूखा होने का इल्जाम लगता है| कहते हैं, हमारे यहाँ Please या Sorry जैसे निहायत ही जरूरी शब्द नहीं होते|

अक्सर हम तमाम बातों की तरह बिना सोचे मान भी लेते हैं| अब ऊपर लिखे वाक्यों को देखें|

हमारे क्रिया शब्दों में सभ्यता और विनम्रता का समावेश आसानी से हो जाता है तो रूखेपन का भी| हम प्लीज जैसे शब्दों के साथ भी रूखे हो सकते हैं और बिना प्लीज के भी विनम्र| आइये ऊपर दिए अनुवादों को दोबारा देखें|

  1. कृपया, अपने जूते बाहर उतार| यह एक शाब्दिक अनुवाद है और किसी भी लहजे से गलत नहीं हैं| मगर हिन्दुस्तानी सभ्यता के दायरे में यह गलत हैं क्योकि “उतार” में अपना रूखापन है जो प्लीज क्या प्लीज के चाचा भी दूर नहीं कर सकते|
  2. अपने जूते बाहर उतारें| यहाँ प्लीज के बगैर ही आदर हैं, विनम्रता है| क्या यहाँ प्लीज के छोंके के जरूरत है? इसके अंग्रेजी अनुवाद में आपको प्लीज लगाना पड़ेगा|
  3. अपने जूते बाहर उतारिये| क्या कहिये? ये तो आप जानते हैं कि इसमें पहले वाले विकल्प से अधिक विनम्रता है| अब इनती विनम्रता का अंगेजी में अनुवाद तो करें| आपको शारीरिक भाषा (gesture) का सहारा लेना पड़ेगा, शब्द शायद न मिलें|
  4. अपने जूते बाहर उतारियेगा| हम तो लखनऊ का मजाक उड़ाते रहेंगे| यहाँ आपको अंग्रेजी और शारीरिक भाषा कम पड़ जायेंगे| उचित अनुवाद करते समय कमरदर्द का ध्यान रखियेगा|
  5. अपने जूते बाहर उतारने की कृपा करें| क्या लगता है यह उचित वाक्य है| इसमें अपना हल्का रूखापन है| आपका संबोधित व्यक्ति को अभिमानग्रस्त या उचित ध्यान न देने वाला समझ रहे हैं और कृपा का आग्रह कर रहे हैं| यदि यह व्यक्ति आपके दर्जे से काफी बड़ा नहीं है तो यह वाक्य अनुचित होगा|
  6. कृपया, अपने जूते बाहर उतार लीजिये| लगता है न, कोई पत्नी अपने पति के हल्का डांट रही है|
  7. जूते बाहर उतार ले| यह तो आप अक्सर अपने बच्चों, छोटों और मित्रों को बोलते ही है| सामान तो है ही नहीं|
  8. जूते बाहर उतार ले/लें, प्लीज| यह विनम्रता है या खिसियानी प्रार्थना| हिंदी लहजे के हिसाब से तो खीज ही है|

वैसे आप कितनी बार विकल्प दो तीन और चार में कृपया का तड़का लगाते हैं?

मगध की सामान्य बोगी

उन दिनों मगध[1] पटना से नई दिल्ली के बीच नियत समय से थोड़ा बहुत आगे पीछे ही चला करती थी| मगध ही वह ट्रेन है जिसमें मैंने अपने ट्रेन यात्रा जीवन की किशोर अवस्था बिताई है| उन दिनों मगध सुबह सवा नौ और दस बजे के बीच अलीगढ़ पहुँचती और यात्रियों के जनता खाना[2] खरीदने के बाद प्रस्थान करती थी| उन दिनों में नया नया रंगरूट था तो रेलयात्रा के तौर –तरीके नहीं पता थे, इसलिए  नियम कायदे से ही चलता था| मेरे पास दूसरे दर्जे का पास था जिसके कारण मैं मगध में बिना सुपर[3] लिए नहीं बैठ सकता था| मैं रोज लाइन में लगकर सुपर लेता और प्लेटफ़ॉर्म पर पढाई करते हुए मगध का इन्तजार करता| प्लेटफ़ॉर्म पर मेरे पास ही एक मोटी हरयाणवी भिखारिन बैठती और बीचबीच में अपनी कर्कश आवाज में मुझे ध्यान से पढ़ने की हिदायत देती| मैं और वो भिखारिन एक साथ एक बागी में मगर अलग अलग दरवाजों से चढ़ा करते|

पहले दो हफ्ते मैं जनरल बोगी में दिल्ली तक खड़ा होकर गया मगर धीरे धीरे मैंने लम्बी यात्रा के थके हारे बिहारी मजदूरों को दबाब डालकर थोड़ा सरकने के लिए कहना सीख लिया|  मगर फिर भी कभी कभी वो लोग सख्तजान निकल जाते| जब भी मैं भिखारिन को खड़ा मिलता वो मुझे और आसपास बैठे लोगों को कोसती और जगह करा देती| वो हर किसी से दस रुपये वसूलती[4] और न देने वाले की मर्दानगी को कच्चा चबा डालने की धमकी देती| प्रतिवादी जो कुछ कहती वो शायद खुद भी कभी ट्रेन के बाहर कभी न दुहराती| गर्मियों में मैं एक बोतल में फ्रिज का ठंडा पानी लेकर चलता| उसने मुझ से दो बोतल लेकर आने के लिए कहा| बाद में जब भी वो मुझसे पानी मांगती लोग पहले तो मुझे दया-दृष्टि से देखते मगर डरकर तुरंत जगह दे दिया करते|

एक बात मुझे अपनी बहन को किसी काम से दिल्ली ले जाना था| मुझे भिखारिन की फुलफॉर्म का पता था इसलिए मैंने प्लेटफ़ॉर्म पर ही बता दिया कि बहन साथ है| उसदिन उसने कम से कम पांच सौ रुपये कम की वसूली की| उस दिन मैंने उसमे किसी भी पारवारिक व्यक्ति का रूप देखा| उसने हमसे पढ़ने लिखने के बारे में गंभीरता से बात की| उसे इलाहबाद से लेकर दिल्ली तक की सब यूनिवर्सिटी और उनके कोर्स पता थे| उसने बहन से कहा कि उसे अधिवक्ता बनकर टैक्सेशन में प्रक्टिस करनी चाहिए|

बाद में मेरा मगध से जाना कम हो गया| मैंने उसे सोनीपत के रेलवे स्टेशन और नए शहर में देखा, मगर उसने मुँह फेरकर पहचानने से मना कर दिया| शायद वहीँ कहीं उसका घर था|

[1] कृपया इसे मगध एक्सप्रेस न पढ़े| इन दिनों यह राजिन्द्रनगर पटना से नई दिल्ली के बीच चलती है और केवल चलती है|

[2] इस विषय पर पुरानी पोस्ट पढ़े – https://gahrana.com/2017/07/29/indian-railway-peoples-food/

[3] यह सुपर सुपरफास्ट अधिभार टिकेट का प्रचलित नाम है, जो जो सामान्य गति की ट्रेन टिकेट या मासिक टिकेट पर यात्रा करते समय सुपरफ़ास्ट ट्रेन में बैठने के काबिल बनाता है|

[4] यह सन २००४ की बात रही होगी|

रोशनआरा बाग़

यह बाग़ अपनी पहली मालकिन और संस्थापक मुग़ल शहजादी रोशन – आरा के नाम पर भले ही भुला दिया जाए, मगर दक्षिण एशिया के क्रिकेट का रवायती जन्म इसी बाग़ में हुआ था| जब मैं रोशनआरा बाग़ में था, तब भी इसकी बारादरी के चारों ओर बनीं नहरों और कुण्डों में इतिहास और विरासत से लापरवाह बच्चे क्रिकेट खेलते थे|

रोशन- आरा बाग शाहजहानाबाद की बसावट के दौर की यादगार है जो शाहजहानाबाद के बाहर मुग़ल शहजादी रोशन-आरा ने बनबाया था| इस बाग़ में बनी हुई बारादरी पुरानी दिल्ली के शानदार दिनों में यह बाग़ मुग़ल स्थापत्य का नमूना है| दिल्ली के सभी पुराने शहरों से दूर जब शाहजहानाबाद बसाया जा रहा था तब दिल्ली में कई सारे बाग़ बनाये गए| पुराने शहरों के आस पास बाग़ बनाये जाने की रवायत बहुत पुरानी है जो आजतक फार्महाउस की थोड़ा विकृत शक्ल में मौजूद है| उन पुराने बाग़ों में आज नई दिल्ली के तमाम नामचीन मोहल्ले आबाद है|

रोशनआरा बाग़ की बारादरी में हर बारादरी की तरह ही बारह द्वार हैं – चारों दिशाओं में तीन तीन| बारादरी की दीवारों पर पुरानी चित्रकारी खस्ताहाल सही, मगर मौजूद हैं| यहाँ मौजूद चित्रकारी में आपको सजावटी कला के दर्शन होते हैं| चित्रकारी में मौजूद फूल, पेड़ों और पत्तियों से आप किसी खास पेड़ या पौधे को नहीं पकड़ सकते| सीधे सपाट खम्बों की जगह कटावदार खम्बे लगे हुए हैं और उनपर सजावट हुई है| देखने में यह बारादरी एक मंजिला मालूम होती है मगर इसके चारों कोनों पर मौजूद कमरे दोमंजिला हैं| बारादरी के चारों तरह पानी का कुंड है जो आजकल के हिसाब से स्विमिंग पूल का नक्श देता है| साथ ही बारादरी तक आती हुई चार पुरानी नहरों के निशान आज भी मौजूद हैं| यह उस दौर में प्रचलित बाग़ बनाने की चारबाग़ प्रणाली का सुबूत है|

इस बारादरी में कभी शाही खानदान सैरसपाटे के लिए रुकता था| आज शाहजादी रोशनआरा बारादरी के बीचोंबीच दो गज कच्ची जमीन में सोती है| यूँ पूरी बारादरी के ऊपर लाल पत्थर की मजबूत छत है, मगर शाहजादी रोशनआरा खुले आसमान के नीचे है, क्योंकि वो ऐसे ही सोना चाहती हैं|

दिल्ली की तमाम पुरानी इमारतों की तरह यहाँ भी पुरातत्व विभाग का बोर्ड मौजूद है जो पुरातत्व विभाग के होने की कुछ सम्भावना बयान करता है| चारों ओर का बाग़ उत्तर दिल्ली नगर निगम ली लापरवाही के हवाले है| आसपास वालों को राहत है कि सुबह की चहलकदमी के लिए कोई जगह तो है| इससे आगे परवाह किसे है?