करोना कर्फ्यू दिवस


करोना का विषाणु और उस से अधिक उसका अग्रदूत भय हमारे साथ है| स्तिथि नियंत्रण में बताई जाती है, इस बात से सब धीरज धरे हुए हैं|

शीतला माता के पूजन का समय बीत गया है| किसी को याद नहीं कब शीतला माता आईं और गईं| कुछ बूढ़ी औरतों ने उन्हें भोग लगाया और कुछ भोग उन्होंने किए| संख्या बढ़ गई है| “रंज लीडर को बहुत है मगर आराम के साथ”|

अचानक भाषण कैसे लिखा जाए? समय तो चाहिए| जनसंपर्क विशेष अधिकारी ने समय माँगा तो सारे हाकिम ने हौले से साँस ली| चलो आठ पहर, चौबीस घंटा, साठ घड़ी का वक़्त मिला| सबने धीरज धरा|

घंटा बजा| सरकार ने भाषण दिया| अमीरों ने साजोसामान अपने गोदाम में भरे और गरीबों ने हिम्मतोहौसला अपनी अपनी गाँठ में बांध लिए| जनता ने ताली बजाई| शीतला माता मुस्कुराई, विषाणु ने धीरज धरा|

ऋतुराज ने भी धीरज धरा हुआ है| ऋतुराज बसंत ठिठका हुआ सा है| देर से आया इस बार| जाने का सोचता था रुक गया| विषाणु का डर है| मगर ऋतुराज की उपस्तिथि मात्र से माहौल में एक रूमानियत है|

भय और रूमानियत का पुराना रिश्ता है|

सुहानी सी सुबह है| इतना नीला आसमान – शायद वर्षों बाद देखा| हर हृदय निर्लिप्त है| न काम न भ्रमण न मौज मस्ती – केवल पस्ती| आलस्य भी नहीं| नेति नेति कह वेद पुकारा| उस से पहले कुछ नहीं भी नहीं था| मृत्यु प्रथम सत्य है|

साँसों में वायु प्रदूषण प्रदूषण का कोई अहसास नहीं| कहीं कोई ध्वनि प्रदूषण नहीं| आसपास ही नहीं दूर से भी परिंदों की आवाज़े आ रहीं है| आरती और अजान के बाद से कुछ नहीं सुनाई दिया| दूर रेलवे स्टेशन से आती आवाज भी दम तोड़ चुकी है| आज स्वतः ध्यान देर तक लगा|

दुनिया अपने अपने घरों में सिमट गई है| सड़कों पर शांति पसरी है और माथे पर अनागत चिंता की लकीरें| छः दूर घर से रोते बच्चे की आवाज भी स्पष्ट सुनाई देने लगी है| परिंदे अनजान आशंका के गीत गा रहे हैं| उन्हें नहीं पता शहरी सा दिखाई देने वाला मूर्ख इंसान कहाँ छिप गया है| गली के कुत्ते भी नहीं भौंक रहे| कोई सूखी रोटी फैंकने भी नहीं निकल रहा| आवारा गायें अपने भक्तों की राह जोहते हुए उदास बैठीं हैं|

लगता नहीं कोई टेलीविज़न भी देख रहा हो| जो बाहर झांक भी रहा है तो पड़ौस में आशंका की लहर दौड़ जा रही है| गुनगुनी धूप और हल्कापन लिए हुए मध्यम हवा – आनंद नहीं आध्याम का आभास दे रही है|

जिन्होंने घरों में जीवन भर का खाद्य भर लिया था, उन्हें भूख नहीं लग रही| भूखों को भोजन का पता नहीं|

दोपहर होते होते सड़क एकदम वीरान होने लगी है| बच्चे नियंत्रण में हैं| जनता कर्फ्यू के समर्थन में घुमने वाले भी शायद थक गए हैं|

पांच बजने को हैं| जनता धन्यवाद ज्ञापन की तैयारी कर रही हैं| धर्म के नाम पर वोट देने वालों के लिए विषाणु मर चुका है| ढोल मंजीरे ताशे और आधुनिक वाद्य सजने लगे हैं| पहले पांच मिनट के धन्यवाद ज्ञापन के बाद फूहड़ नाच गाना शुरू ही हुआ है कि समाचार आने लगे – सरकार वह सब कर रही है जो सरकार के आलोचक सरकार से चाहते थे| मूर्खता पर लगाम लग गई है| जितनी तेजी से नाच गाना शुरू हुआ उतनी तेजी से ख़त्म भी| मगर फिर भी कुछ नाच और नारे लग रहे हैं – मोदी है तो मुमकिन है| मोदी जी शायद सर पटकने के लिए दीवार खोज रहे हैं|

दिन शांति से ढल रहा है| शाम चुपके से उतर रही है| पर इस वक़्त पक्षी शांत हैं वो दिन भर के सन्नाटे के बाद अचानक हुए शोर शराबे से घबराये हुए हैं| झींगुर और क्षुद्र कीटों का गान सुनाई दे रहा है|

जनता कल की रोजी रोटी का हिसाब बना रही है| गरीब सोचता है कि पढ़े लिखे अमीर मालिक लोग हवाई जहाज से बीमारी लादकर क्यों ले आये| अमीर हिसाब लगा रहे हैं – इलाज कहाँ खरीदेंगे|

ट्रेन, मेट्रो , बस, दफ्तर बंद हैं| बकवास चालू है|

टहलने वाली शामें


शाम जब बसंती होने लगें और यह शाम दिल्ली को शाम नहीं हो तो टहलना बनता है|

गुजरा ज़माना था एक, जब हर शाम टहलने निकल जाते थे| उस शामों में धुंध नहीं थी, न धूआँ था| हलवाई की भट्टी के बराबर से गुजरने पर भी इतना धूआँ आँखों में नहीं चुभता था, जितना इन दिनों दिल्ली की किसी वीरान सड़क पर राह गुजरते आँखों में चुभ जाता है| न वाहनों की चिल्ल-पों थी न गाड़ियों से निकलने वाला कहने को प्रदुषण मुक्त धूआँ| गलियों में आती हवा सीधे खेतों जंगलों की ताजगी लाती थी|

उन दिनों घर घर टेलिविज़न नहीं होते थे और लोग मोहल्ले पड़ोस में और मोहल्ले पड़ोस के साथ घूमना पसंद करते थे| भले ही उन दिनों कान, सिर और गले में लटका लिए जाने वाले हैडफ़ोन आम नहीं थे मगर गली कूचों से कोई दीवाना ट्रांजिस्टर पर विविध भारती बजाते हुए गुज़र जाता| अगर वो नामुराद वाकई गली की किसी लड़की का पुराना आशिक होता तो लड़की को मुहब्बत और पास पड़ोस को जूतम-पैजार की टीस सी उठा करती|

घर से निकलते ही पान की तलब होती और दो नुक्कड़ बाद पनवाड़ी की दूकान से दो पत्ती तम्बाकू पान का छोटा बीड़ा मूँह में दबा लिया जाता| अगर घरवाली थोड़ा प्यार उमड़ता तो चुपचाप घर खानदान के लिए एक आध पान के हिसाब से पान बंधवा लिए जाते| शाम थोड़ा और सुरमई हो जाती| लाली होठों से होकर दिल और फिर जिन्दगी तक फल फूल फ़ैल जाती|

पान की दुकानें टहलने वालों का एकलौता ठिकाना नहीं थीं| मिठास भरे लोग अक्सर मिठाई की दुकान पर दौना दो दौना रबड़ी बंधवाने के शौक भी रखा करते| मगर रबड़ी का असली मजा मिट्टी के सकोरों में था|

चौक पर मिलने वाले कढ़ाई वाले मलाईदार दूध का लुफ्त उठाते लौटते| अब वो ढूध कहाँ? चौड़ी कढ़ाई में मेवा मखाने केसर बादाम के साथ घंटा दो घंटा उबलने के बाद ये दूध आजकल की मेवाखीर को टक्कर देता| ढूध पचाना कोई आसान काम तो नहीं था| सुबह उठकर पचास दण्ड पेलने और सौ बैठक लगाने के बाद मांसपेशियां क्या रोम भी राम राम करने लगते|

अक्सर लोग अपने साथ नक्काशीदार मूठ के बैंत ले जाते| गली के कुत्ते उन बैंतों को देखकर भौंकते थे या आवारा घूमते आदमी को, इसका पता शायद किसी को नहीं था| मगर बैंत शान दिखाने का तरीका था और रुतबे की पहचान थी|

मगर टहलने जाना भी कोई किसी ऐरे गैरे का काम नहीं था| अगर टहलने वाले के पीछे एक अर्दली भी टहल करता हो तो मजा कुछ था शान कुछ और|

दिवाली अब भी मनती है


वर्षा उपरांत स्वच्छ गगन में झिलमिलाते असंख्य तारक तारिकाएँ रात्रि को गगन विहार को निकलतीं| लगता सप्तपाताल से लेकर सप्तस्वर्ग तक असंख्य आकाश-गंगाएं कलकल बह रहीं हों| दूर अन्तरिक्ष तक बहती इन आकाशगंगाओं में हजारों देव, देवेश्वर, देवादिराज, सहायक देव, उपदेव, वनदेव, ग्रामदेव आदि विचरण करते| देवियों देवेश्वरियों, सहायक देवियों, वनदेवियों, उपदेवियों, ग्रामदेवियों की मनोहर छटा होती| आकाश मानों ईश्वर का जगमगाता प्रतिबिम्ब हो| प्रतिबिम्बों अधिष्ठाता देव रात्रिपति चन्द्र को ईर्ष्या होती| कांतिहीन चंन्द्र अमावस की उस रात अपनी माँ की शरण चला जाता है| धरती पर कहीं छिप जाता है| उस रचे अनन्त षड्यंत्र इन आकाशगंगाओं की निर्झर बहने से रोकना चाहते हैं|

अहो! वर्षा उपरांत की यह अमावस रात!! देखी है क्या किसी दूर जंगल पहाड़ी के माथे बैठ कर| लहराता हुआ महासागर उससे ईर्ष्या करता है| उस के झिलमिल निर्झर प्रकाश में वनकुल की बूढ़ी स्त्रियाँ सुई में धागा पिरोती हैं| प्रकाश की किरणें नहीं प्रकाश का झरना है| प्रकृति की लहलहाता हुआ आँचल है| वर्षा उपरांत अमावस की रात यह रात अपने नेत्रों से देखी है!!

अकेला चन्द्र ही तो नहीं जो अनंत आकाशगंगाओं से ईर्ष्या करता है| सृष्टि विजय का स्वप्न है, मानव|

प्रकृति का दासत्व उसका उत्सव है| कोई आम उत्सव नहीं यह| स्वर्ग के देवों को भी प्रतीक्षा रहती है| मानव अनन्त आकाश गंगाओं से टकरा जाता है| धरती पर असंख्य दीप झिलमिला उठते हैं| आकाशगंगाओं में विचरण करते असंख्य देव, देवियाँ, देवेश्वर, देवेश्वारियां, देवादिराज, देवाधिदेवी, सहायक देव-देवियाँ, उपदेव-देवियाँ, वनदेव – देवियाँ, ग्रामदेव-देवियाँ घुटनों के बल बैठ जाते हैं| आकाशगंगा के किनारों से यह असंख्य देव देवियाँ पृथ्वी पर ताका करते हैं| अहा! यह दीपोत्सव है, यह दिवाली है| हर वर्ष हर वर्षा दीप बढ़ते जाते हैं| घी – तेल के दिया-बाती अपना संसार सृजते हैं| असंख्य देव भौचक रहते हैं| असंख्य देवियाँ किलकारियां भरती हैं| कौन किसको सराहे| कौन किसकी प्रशश्ति गाये| कौन किस का गुणगान करे| कौन किस की संगीत साधे|

अब देवता विचरण नहीं करते| अब देवियों की छटा नहीं दिखती| अब देव खांसते हैं| अब देवियाँ चकित नहीं होतीं| अब आकाश ईश्वर का प्रतिबिम्ब नहीं होता| चन्द्र अमावस में मलिन नहीं होता| चन्द्र पूर्णिमा को मैला रहता है| चन्द्र चांदनी नहीं बिखेरता| इस चांदनी का चकोर मोल नहीं लगता| इस चांदनी में मिलावट है| इस चांदनी में शीतलता नहीं है|

मिठाइयाँ अब भी बनती है| पूड़ियाँ अब भी छनती हैं| बच्चे अब भी चहकते हैं| कपड़े अब भी महकते हैं| दीवारें अब भी चमकतीं हैं| प्रेमी अब भी बहकते हैं| दीपोत्सव अब भी होता है| दिवाली अब भी मनती है| आकाश में कालिख छाई है| हवाओं में जहर पलता है| दिग्दिगंत कोलाहल है| काल का शंख अब बजता है| ये मानव का अट्टाहास है| यह बारूद धमाका है| यह बारूद पटाखा है| यह बारूद का गुलशन है| यह बारूद की खेती है| यह बारूद का मन दीवाना है|

यह बारूद का उत्सव है| यहाँ दीपक किसने जाना है? यहाँ गंगा किसने देखी हैं? चाँद किसे अब पाना है? यहाँ खुद को किसने जाना?

यहाँ दमा का दम भी घुटता है| हर नाक पर यहाँ अब कपड़ा है|