सुरारस


यूँ तो यह अपने अपने स्वाद की बात है, पर मुझे सुरा खासकर व्हिस्की – कभी सुरीली न लगी| स्वाद रसिक होने के नाते किसी स्वाद की निंदा न करूंगा, मगर इस स्वाद का दीवाना न बन सका|

सही बात तो यह कि मुझे सुरा के सही रसिक भी अधिक न मिले| अधिकतर लोग जो महफ़िल ज़माने के लिए पीते हैं या पीने के लिए महफ़िल जमाते हैं| उनमें अधिकतर ब्रांड के नाम में अधिक दिलचस्पी होती हैं| कार-ओ-बार संस्कृति तो मेरी समझ से ही बाहर है|

जिन सुरा रसिकों से मिला, उनमें प्रायः सुरा और स्वाद के प्रति जो गंभीरता होती हैं, वह मुझे सुरारसविहीन के लिए दर्शन शास्त्र के गंभीर पाठ जैसी हो जाती हैं|

पीने को लेकर भारत में अजीब सा दोगलापन है| कोई पीने वाले को पसंद नहीं करता – पीना सब चाहते हैं| जो नहीं पीता प्रायः हीनभाव में जीता है और न पीने का अजब-गजब दंभ भरता है|

चाय काफी को लेकर भी गजब गाँधीवादी मिलते हैं| चाय कॉफ़ी को नशा तुल्य कहकर हेय बताने की परंपरा का लंबा सनकी इतिहास हैं| गर्वित माता-पिता इस बात का दंभ भरते मिलते हैं कि उनके बच्चों ने जिन्दगी में चाय को हाथ तक नहीं लगाया| कुछेक चाय के औषधीय गुणों के हवाले से हारी – बीमारी चाय पीने की मनुहार करने का हवाला भी देते हैं|

कॉलेज में चार चाय चढ़ा जाने वाले के एक मित्र तो अपने घर पर पानी के लिए भी ठीक से नहीं पूछते थे| इसी प्रकार एक चायविरोधी परिवार की एक मित्र मात्र वोडका के सहारे प्यास बुझातीं थीं|

वयस्क होने के बाद और गजब देखे| मुझे जिन मित्र, सम्बन्धी, नाते-रिश्तेदारों ने सुरा-स्वाद-विहीन होने के लिए लगभग-लताड़ा हैं, लगभग वह सभी घोषित मात्र-जल-पीवक हैं| उधर कुछ छिपे रुस्तम हर महफ़िल में इस बात का इन्तजार करते हैं कि कोई उन पर दबाब बनाये कि उन्हें मजबूरन पीनी पड़े|

मेरे एक जिंदादिल मित्र दावतों के लिए मशहूर रहें हैं| उनकी महफ़िल में देर तक पीने पिलाने का मनुहार चलता था| पिलाते भी दिल खोल कर थे| एक बार उनके यहाँ जाने का अवसर मिला| जब महफ़िल पूरी तरह जम गई तो पाया कि मात्र मेज़बान ही हैं जो सुरासेवन नहीं कर रहे| जिन महफ़िलों में किसी को भी न पीने के लेकर वार्तालाप से बाहर रखा जाये, वो अक्सर खोखली लगती हैं| मात्र गिलास पकड़कर महफ़िल का हिस्सा बनते लोग, दरवाजे की दहलीज पर उपस्तिथि दर्ज करते हैं| सुरा सेवन करें या न करें, खुद से ईमानदारी तो जरूरी हैं|

https://wp.me/p1xb9g-Ds

भोजन- आत्मा हेतु भोग


पुरानी कहावत है: भोजन भजन एकांत में करने चाहिए| मगर महाभोजों, दावतों और लंगरों का सिलसिला भी चलता है| घर का एकांत हो या महाभोज की धूमधाम, भोजन करने की अपनी परम्परा और पद्यति भारत में रही है| भोजन और भजन को एक ही सूक्त में यूँ ही पिरो देना सहज नहीं| इस तरह की बात गंभीर चिंतन माँगती है|

जिस प्रकार भजन से पूर्व और पश्चात एक पूरी निष्ठावान प्रक्रिया है – भोजन बनाने और करने की अपनी प्रक्रिया है|

बिस्मिल्ला के बिना भोजन करने से शैतान साथ में भोजन करता है| अगर आप भोजन के लिए ईश्वर को, देवी अन्नपूर्णा को धन्यवाद न दें तो भोजन आपके शरीर में तत्त्व उत्पन्न नहीं करता|

खाद्य को पीने और पेय को खाने के बारे में भी सलाह मिलती है| खाद्य तब तक चबाना है, जब तक पीने योग्य महीन न हो जाए, पेय इतनी देर मुंह में रखें जितनी देर खाद्य चबाने में लगते है| चबाये, लार आदि पाचक रस मिल सकें| आप भोजन का स्वाद देर ले सकें|

मैं ठीक से न चबाने की आदत का शिकार रहा हूँ| पर जब भी ध्यान देता हूँ तो पाता हूँ कि स्वाद पेट से नहीं जीभ से ही लिया जाता हैं| एक मिनिट में दो लड्डू खाने के मुकाबले दो मिनिट तक एक ही लड्डू चबाने खाने में अधिक स्वाद और तृप्ति है| ठीक से स्वाद लेकर चबाना एकांत में संभव है| पारंपरिक भोजों, दावतों, भण्डारों और लंगरों कि भी एक प्रक्रिया है| भोजन के दौरान कब और कितनी बात करनी हैं, सब परम्परा में है| भोजन की प्रशंसा और भोजन बनाने, परोसने वालों का धन्यवाद होना है| प्रेम से भोजन परोसना और पैसे के लिए परोसना भी अलग दिखाई देता है| आप पैसा कम या अधिक लें मगर कितना श्रेष्ट भोजन पकाएँ, प्रेम से खाने खिलाने वाला न हो तो किसी को तृप्ति नहीं आती|

भोजन पकाने के लिए भी यंत्र, मन्त्र तंत्र का विधान है| कब कच्ची रसोई चलानी है कब पक्की रसोई रखनी है| पक्का खाना रोज न बनाने खाने का नियम है तो कुछ रिश्तों नातों में पक्का भोजन खिलाना नियम है| पक्का रसोई यानि तला- भुना भोजन| उबला भोजन कच्ची रसोई है|

भोजन का सांस्कृतिक महत्त्व आकर्षित करता है| फसल बोते समय पक्षियों और मित्र कीट आदि का आवाहन होता रहा है| भोजन बनाने के दौरान गाय, कौवा, कुत्ता, आदि की रोटियां निकली जाती रहीं हैं| बचे हुए भोजन को लघु कीटों, कुत्तों, गायों, और यहाँ तक कि ख़राब होने पर सूअर के सामने परोसने के भी क़ायदे अमल में लाए जाते रहे हैं| भोजन को इन सब कीट और पशुओं के सामने फैंकना या पटकना नहीं होता, यह भोजन का अनादर है|

ऐसे में भोजन खाद्य को उदरस्थ करने का नाम नहीं है| यह भजन है| अपनी आत्मा को भोग लगाना भोजन का उदेश्य है| आत्मतृप्ति भोजन का उद्देश्य| श्रेष्ठ भोजन की प्रशंसा का उद्गार ही है: आज भोजन से आत्मा तृप्त हो गई|

अचार और चटनी


भारत के हर घर और भोजनालय में अचार चटनी होते हैं| अलग अलग तरह के अचार खाने का चलन है| इसी प्रकार तरह तरह की चटनियाँ खाई जाती हैं – या कहें कि चाट पकौड़ी की पत्तलों के सहारे चाटी जाती हैं|

प्रायः इन्हें भोजन का स्वाद बढ़ाने के लिए प्रयोग किया जाता है| मगर भोजन अगर स्वादिष्ट बना तो भी अचार चटनी का महत्त्व कम नहीं होता| लगता है कि हमें लत है अचार चटनी खाने की|

अचार चटनी से भोजन में कैलोरी नहीं बढ़ती, परन्तु तत्त्व बढ़ जाते हैं| अगर आप अचार चटनी लेने से मना करें तो कई जड़ी बूटियों तथा अन्य सीमित मात्रा अवयवों के वंचित हो जाते हैं|

अगर चटनी न हो तो आप हरा धनिया, पोदीना, करीपत्ता, कमरख, अदरक, आदि अनेक तत्वों का समुचित उपयोग नहीं कर पाएं| इनकी सूची बहुत लम्बी हो सकती हैं अगर हम देश के हर घर में बनने वाली चटनियों का संग्रह करें जैसे मेरे घर में आप को करेले की चटनी मिल जाएगी| भांग की चटनी इसके सीमित प्रयोग से होने वाले लाभ प्रदान कर सकती है| इमली उत्तर भारत में चटनी के रूप में ही भोजन की थाली तक पहुँचती है तो कच्चा आम दक्षिण भारत में अचार के रूप में| कई प्रकार की मिर्च आदि चटनियों में ही खाने योग्य हो पाते हैं|

इसी प्रकार से बहुत सी मिर्च, करोंदे, लभेड़े, आम, अचार के रूप में ही खाए जा पाते हैं| तो बहुत से तत्त्व आदि अचार में प्रयोग होने के कारण खाए जाते हैं जैसे मैथी, कलोंजी, राई आदि| हींग वाला का तड़का मुझे बहुत प्रिय नहीं मगर हींग का अचार दिलखुश लगता है| बहुत से चटनियाँ है जो भुला दी गई हैं जैसे मैथीदाना की चटनी बेड़मी या कचौड़ी के साथ जानदार रहती है|

जिन घरों में बच्चों या बूढ़ों के कारण मिर्च आदि का प्रयोग मुख्य भोजन में नहीं होता, वहाँ अचार, चटनी और तड़के मिर्च के सीमित उपभोग की सुविधा प्रदान करते हैं| पुरानी दिल्ली का एक भोजनालय लौकी का अचार परोसता है तो आंवला अचार छोले भठूरे को रंगत देता है| शहर अलीगढ़ में मुर्गे का अचार भी मिलता है| तो चींटियो और टिड्डियों के अचार चटनी भी भारत भूमि में प्राप्त होते हैं|

अचार खाने से आप बेमौसम की सब्ज़ियों के पोषण को आप तक पहुँचाता है| आप आम तौर पर अनुपयोगी कूड़ा समझे जाने वाले भागों को भी अचार के रूप में प्रयोग कर सकते हैं जैसे फूलगोबी के डंठल| गाजर और कांजी का पानी वाला अचार होली पर भंग और ठंडाई से कहीं ज्यादा चलन में है|

आप के घर में कौन से अचार या चटनियाँ प्रयोग होते हैं?

नए ब्लॉग पोस्ट की अद्यतन सूचना के लिए t.me/gahrana पर जाएँ या ईमेल अनुसरण करें:

Enter your email address to subscribe to this blog and receive notifications of new posts by email.