वडपलनी मुरुगन मंदिर

कभी कभी अचानक कहीं जा पहुँचने का संयोग बनता है| उस दिन भी यही हुआ| देर शाम तय हुआ कि वडपलनी में कामकाज की सिलसिले में पहुँचने से पहले मुरुगन मंदिर भी पहुंचा जाए| उत्तर भारतीय हिन्दू मंदिरों के आसपास रहने वाली गंदगी, भीड़भाड़ और पंडा पुजारी की रेलमपेल मेरे शृद्धा भाव को छू-मन्तर कर देती है| मगर दक्षिण भारत में मंदिर अक्सर साफ़ सुथरे रहते हैं| एक बात और भी है ध्यान देने की, दक्षिण भारत में बहुत सारे मंदिर सरकारी नियंत्रण में हैं| वडपलनी मुरुगन मंदिर भी सरकारी विभाग द्वारा नियंत्रित मंदिर है| इन सरकार नियंत्रित मंदिरों को देखकर मुझे हमेशा लगता है कि सरकारी तंत्र के अकुशल और प्रभावहीन प्रबंधन की बात सही नहीं है और जान बूझकर पैदा की गई है|

सुबह सुबह मंदिर पहुँचे| कोई हो- हल्ला नहीं था| वैसे भी यह किसी त्यौहार वाला दिन नहीं था| प्रसाद खरीदने की कोई इच्छा नहीं थी| आखिर घर लौटने में दिन थे| दो फूल मालाएं खरीदी गई| सड़क किनारे बैठे उस फूल वाले ने बात टूटी फूटी हिंदी में की मगर दाम तमिल में बताये| मैंने सौ रुपये का नोट दिया तो वो टूटे पैसे लेने चला गया| पंद्रह रुपये में दो बढ़िया फूलमालाएं|

किसी दुकानदार ने आवाज नहीं लगाई| कोई पंडा पुजारी नहीं आया| किसी ने भगवान से अपने सीधे सम्बन्ध का दावा नहीं किया| भीड़ नहीं थी| पहले से बताए गए हिसाब से हम चुपचाप टिकट काउंटर की तरफ़ बढ़ गए| दस का नोट बढाया और दो टिकट प्राप्त कीं| मुख्य मंदिर की तरफ पहुँचते ही पता लगा यह अर्चना की टिकट है, स्पेशल दर्शन का नहीं| स्पेशल दर्शन के लिए बीस रुपये का टिकट था| पहले अर्चना के लिए लाइन में लग गए| यहाँ वास्तव में कोई लाइन नहीं थी| अंतिम छोर तक पहुँचते ही, पुजारी आया| हमारी पूजा सामिग्री लेकर गर्भगृह में अन्दर चला गया| हम देखते रहे| देवता से अधिक मेरा ध्यान पुजारी पर था| मगर उसने वापिस आने से पूर्व पूरे विधि विधान संपन्न किये| ऐसा नहीं कि दूर से ही चढ़ावे की फूलमाला देव-मूर्ति की तरफ उछाल कर वापिस आ गया हो| वापिस आकर उसने आचमन का जल और माला के आधे फूल हमें दे दिए, वही हमारा प्रसाद था| हम कोई खाद्य पदार्थ तो प्रसाद के लिए लेकर आये नहीं थे|

हमने कोई देव-दर्शन तो किये नहीं थे| सारा ध्यान तो पुजारी पर था| दोबारा काउंटर पर जाकर स्पेशल दर्शन का टिकट लिया| इस लाइन में हम बिल्कुल अकेले थे| पूरा पांच मिनट सबसे बढ़िया लगने वाली जगह पर खड़े हुए अपने मन, भाषा और विचार के अनुसार मन ही मन पूजा संपन्न की| कोई पुजारी हमें रोकने टोकने समझाने बुझाने लूटने खसोटने नहीं आया| जिस पुजारी ने हमारी पूजा करवाई थी, वह भी दूर से मुस्करा कर अपने काम में लग चुका था|

इसके बाद हमने प्रांगण में मौजूद अन्य मंदिरों का दर्शन किया| ऐसे ही एक मंदिर के पुजारी ने हमारे प्रसाद के फूल और टीके के लिए दी गई भस्म को बाकायदा कागज में बांध दिया| कोई शब्द नहीं बोला सुना गया| धन्यवाद और उसके स्वीकार के रूप में नमस्कार ही रहा|

जूते मंदिर के बाहर दरवाजे के के ओर असुरक्षित रखे थे, मगर सुरक्षित ही मिले| पास की एक दुकान से स्थानीय चाय नाश्ता किया| नाम आदि नहीं पता| सारा कार्य-व्यवहार संकेतों में चलता रहा| दालवडा, प्याज आदि का पकौड़ा, एक समौसे जैसा कुछ और अलग अंदाज की एक चाय| दो लोगों में सौ रुपये भी खर्च न हुए| एक चाय में मधुमक्खी गिरने पर उस के स्थान पर दूसरी चाय भी बिना कुछ कहे सुने मिल गई|

चलते चलते बता दें यह मंदिर तमिल फ़िल्म इंडस्ट्री में बहुत प्रसिद्ध है| चेन्नई के बहुत सारे विवाह कार्य यहीं संपन्न होते हैं| तमिलनाडू हिन्दू धार्मिक विभाग द्वारा मंदिर की आधिकारिक वेबसाइट भी बनाई गई है| जहाँ सभी जानकारियां उपलब्ध हैं| मैंने यह वेबसाइट बाद में देखी|

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चेन्नै की एक सुबह ईश्वर (मेरे वरिष्ठ और मित्र) से मिलने जाते समय देव का बुलावा आया। पहले पाँच रुपये के टिकट से दूरदर्शन हुए तो आदेश हुआ पास आओ तो बीस का टिकट लिया। छोटी से बात कही गई, साथ के साथ सुन ली गई। मुरुगन से पिछले दस साल में पहली मुलाकात थी। दक्षिण भारतीय मंदिरों में उत्तर भारत के मंदिरों के मुकाबले अधिक सफाई है और पैसे भी रसीद के साथ लिए जाते है। पुजारियों ने खुद बुला कर आशीर्वचन कहे और न धन मांगा न दिया गया, और बाद में किसी पुजारी ने आँख न ततेरी। सिर्फ़ दो पुष्पमालाओं से पूजा सम्पन्न हुई। खाद्य का प्रसाद ने चढ़ा, न पाया। बाहर आकर स्थानीय चाय नाश्ता हुआ और मन के साथ तन भी संतुष्ट हुआ। #chennai #murugan #vadapalani

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हमारा ताज़ा खाना

हम भारतियों को ताज़ा खाने का बड़ा शौक होता है| ताजी हरी सब्जियां और फल हमें निहायत पसंद होते हैं| ताज़ा खाने की तो जिद इतनी कि बासोड़े का त्यौहार भी बहुत से परिवारों में ताज़ा पकवान और मिठाइयों के साथ मनाया जाता है| ताज़ा पानी का शौक इतना कि दोपहर की कड़ी धूप में भी कूएं और चापाकल से दो बाल्टी पानी निकलने के बाद ताज़ा पानी पीने और उसमे नहाने का शौक हमने पूरा ख़ूब पूरा किया है|

मेरे पिता जी तो ताज़ा सब्जियों के इतने शौकीन हैं कि कुछ दिन पहले तक हर रोज मंडी जाकर सब्जियां खरीदना उनका प्रिय शगल था| हमारा तो पता ही पूछ लीजिये, पते में ही सब्जी मंडी लिखा आता है| हमारे फ्रिज में जरूरत से दो गुनी मात्रा में ताज़ा सब्जियाँ मिल जातीं थीं जिन्हें उनकी माताजी दो एक दिन के बाद पास पडौस में भिजवा देतीं और घरेलू नौकरों के घर में भी जाती रहतीं| जिन लोगों के पास समय नहीं होता वो लोग हफ्ते भर की ताजी हरी सब्जियां एक बार में ही फ्रिज में लाकर सजा देते हैं| मेरी ससुराल में भी तो रोजाना ताजी सब्ज़ी आत्ती है| क्या मजाल कि कोई बासी सब्जी चौके के अन्दर चली जाए| जब भी ये नाचीज दामाद ससुराल पहुँचता है तो उसके स्वागत में पकी पकाई ताजी सब्जियां हफ्ते दो हफ्ते से जीजा की दीवानी साली की तरह फ्रिज की आरामगाह में इन्तजार करती नज़र आतीं हैं| अगर इसे आप गप्प समझना चाहें तो समझें मगर कहानी हर घर में यही है|

हिन्दुस्तानी फ्रिज वो जादुई मशीन है जिसमें रखा खाना बासा नहीं होता| बहुत सी ताजी चीज़े हमारे फ्रिज में अपनी सेहतमंदी तारीख़ के हफ्ते दो हफ्ते बाद तक भी मिल जाती है| हमारा बस चले तो खुद तरोताजा रहने के लिए फ्रिज में बैठ जाएँ| शायद ज्यादातर भारतीय इसी मानसिकता के चलते अपने वातानुकूलन को बर्फ की मानिंद ठंडा रखते हैं| अब हमारे टीवी को देख लीजिये सभी की सभी प्रेमिका पात्र हर समय ताज़ा नजर आतीं है|

अब यह कहानी छोड़िये, पुराना किस्सा बताते हैं| उस ज़माने में न फ्रिज था न कोल्ड स्टोरेज| खाना पकता, खाया जाता और गौ माता, बैल मामा, कुत्ते चाचा, चींटी चाची, भैसिया मौसी, कौए बाबा की भेंट चढ़ाया जाता| और नहीं तो मंदिर के पेटू पण्डित जी के थाली किसी न किसी शगुन-अपशगुन के नाम पर निकाल दी जाती| कुछ नहीं तो पड़ोस की चटोरी चाची को कैसा बना है पूछने के लिए भेज दी जाती| वो ये जानते हुए भी उन्हें कोई ब्लोग नहीं लिखना बल्कि बचा ख़ुचा निपटाना है, उसे प्रेम से खा कर तारीफ़ का तरन्नुम गा देतीं| न कीटाणु, न विषाणु, न बासापन, न महक न पेटदर्द; रिश्तों की मिठास बरक़रार| जो चौके में बनता था दिन छिपने तक निपटा दिया जाता| पक्का खाना कहे जाने वाले पकवानों के अलावा एक रात गुजरने के बाद शायद कुछ भीं न खाया जाता| अब तो कच्चा खाना कोई जानता नहीं, बिना पकाई सलाद और सब्जियों की कच्चा खाना समझ लिया जाता है|*

अब देखिये, बासे का राज है| बसोड़े के अलावा शायद ही कोई दिन जाता हो कि कुछ न कुछ बासा न खाया जाता हो| तुर्रा यह कि भोजन की बर्बादी न करने का नाम दिया जाता है, भले ही बिजली और पेट बर्बाद होता रहे| नाप तौलकर बनाने में तो हिसाब गड़बड़ा जाता है|

इससे पहले कि मेरा लिखा आपको बासा लगने लगे, कुछ ताज़ा ताज़ा तारीफ करते जाइये|

*खाना मतलब जो रसोई में पक चुका  हो, बाकि तो फल सलाद सब्जियां है, खाना नहीं|

दक्षिण भारतीय खाना – दिल्ली बनाम चेन्नई

दिल्ली में बहुत से लोगों को लगता है चेन्नई में या तो लोगों को दक्षिण भारतीय खाना बनाना नहीं आता या उनको गलत भोजनालय ले जाया गया| कारण है गलत मसालों का प्रयोग|

दिल्ली में रहकर बिना छुरी कांटे दक्षिण भारतीय खाने की बात सोचना कठिन है| चेन्नई मैं छुरा कांटा तो क्या चम्मच भी कोई शायद ही प्रयोग करता हो| हर भोजनालय में चम्मच मांगते है वेटर समझ जाता है कि बाबू बिहारी (हिंदी भाषी) है| वैसे ज्यादातर वेटर बिहार, उड़ीसा, और बंगाल से मालूम होते हैं|

मुख्य बात तो यह कि दिल्ली में मिलने वाला दक्षिण भारतीय खाना कम से कम दक्षिण भारत का खाना तो नहीं कहा जाना चाहिए| एक महीना चेन्नई और हफ्ते भर त्रिवेंद्रम रहने के बाद मुझे तो कम से कम यही लगता है| मुझे ऐसा लगता है कि किसी गुमनाम उत्तर भारतीय ने अपना धंधा चमकाने के लिए दिमागी घोड़े दौड़ा कर दक्षिण भारतीय खाने पर किताब लिख मारी हो और दिल्ली के बाकि लोग उसे पढ़कर खाना बनाने में लगे हैं| भला बताइए कोई रोज रोज अरहर में सरसों का तड़का डालकर सांभर बनाता अहि क्या? मगर ऐसा दिल्ली में संभव है| चेन्नई आने से पहले मुझे पता न था कि मूंग दाल से भी सांभर बन सकती है| दिल्ली और चेन्नई के सांभर मसलों के बीच तो विन्ध्याचल का पूरा पठार दीवार बनकर खड़ा है| मसाला डोसा ऐसा मामला भी चेन्नई में कम दिखाई देता है| दिल्ली में पायसम तो शायद खीर की सगी बहन लगती है, मगर यहाँ तो खीर और पायसम में मामा – फूफी का रिश्ता लगता है|

दोनों जगह नारियल चटनी का स्वाद बदल जाता है| इसमें नारियल के ताज़ा होने का भी योगदान होगा|

मुझे याद है कि दिल्ली में एक मित्र ने बोला था मुझे चेन्नई में लोगों को ठीक से दक्षिण भारतीय खाना बनाना नहीं आता|

जैसा कि मैं पिछली पोस्ट में लिख चुका हूँ, खाने पर स्थानीय रंग हमेशा चढ़ता ही है| दिल्ली शहर में आलू टिक्की बर्गर, पनीर – टिक्का पिज़्ज़ा और तड़का चौमिन यूँ ही तो नहीं बिकते|

चेन्नई में उत्तर भारतीय खाना

लगभग दस साल पहले की बात है| हम पांडिचेरी और चेन्नई से लौटे थे कि एक मित्र मिलने चले आये| पहले तो उनकी चिंता थी कि हमने हफ्ते भर रोज उत्तर भारतीय खाना कैसे ढूंढा| हमने कहा कि हम हमेशा स्थानीय खाना ही पसंद करते हैं| इसपर उन्होंने कहा कि केले के पत्ते पर खाने की बात ही निराली है और दूसरी बातों की तरफ रुख किया| काश में बता पाता कि चेन्नई में उत्तर भारतीय खाना भी केले के पत्ते पर मिल जाता है|

इस बार, एक महीने के चेन्नई प्रवास में खाने को लेकर कई नए अनुभव हुए| उनमें से एक था चेन्नई के एल्दम्स रोड पर उत्तर भारतीय खाना| उस शाम में उत्तर भारतीय खाने की बहुत इच्छा थी| उसी एल्द्म्स रोड पर पंजाबी रसोई का खाना मुझे बहुत नहीं भाया था| मुझे सोचना पड़ रहा था कि क्या वो वाकई पंजाबी खाना है|

बहुत दिन दक्षिण भारतीय खाना खाने के बाद, अपने घर ब्रज का खाना दिख जाये तो क्या बात हो| मैंने जैसे ही भोजनालय में प्रवेश किया अलीगढ़ के आसपास बोली जाने वाली ब्रज मिश्रित हिंदी सुनाई दी| पकवान सूची देखे बिना ही खाना यहीं खाया जाए का अटल निर्णय लिया गया| घरेलू खाने की उम्मीद में भूख दोगुनी हो चुकी थी| भोजन में क्या क्या है दिखने से बढ़िया था, थाली मंगा ली जाए| तो पेश – ए – खिदमत है थाली| यह थाली उसके बाद कई शाम गाँव – घर और देश की याद का परदेश में सहारा बनी|

तीन रोटी, एक बड़ा कटोरा चावल, पापड़, दाल अरहर, आलू शोरबा, बूंदी रायता, और बेंगन आलू टमाटर| थाली में तीन रोटियां, किसी भी उत्तर भारतीय के लिए दुःख का सबब है| ब्रज क्षेत्र में तीन रोटियां एक साथ प्रायः मृत्यु उपरांत होने वाले संस्कार में परोसी जाती हैं| केले के गोल कटे पत्ते पर एक बड़ा कटोरा चावल और चावल एक ऊपर मैदा का जीरा वाला पापड़| परोसने का ख़ालिस दक्षिण भारतीय तरीका| एक बड़ा कटोरा उबला चावल रात एक खाने में खाना ब्रज में कभी न हो| दाल अरहर में हींग जीरा और सरसों के तेल का तड़का तो न था, नारियल तेल तला प्याज टमाटर भले ही रहा हो| आलू शोरबा का भी यही हाल था – न सरसों का तेल न देशी घी| बूंदी रायता ठीक था, मगर ब्रज के स्वाद के हिसाब से कम खट्टा, कम तीखा| सूखी सब्जी रोज बदल जाती थी इसलिए उस पर कोई टिपण्णी नहीं करूंगा| इस थाली को मैं पांच में से पूरे चार अंक दूंगा|

कुछ भी सही यह खाना उत्तर भारतीय खाना न सिर्फ आसपास रहने वाले उत्तर भारतियों बल्कि दक्षिण भारतीय लोगों में भी पसंद किया जा रहा था| उत्तर भारतीय खाने के शोकीन थाली तो खैर नहीं लेते थे मगर यहाँ के खाने और चाट-पकौड़ी की ठीक ठाक मांग थी| खाने डिलीवर करने वाली कम्पनियों के कारिंदे लगातार आवाजाही करते रहते हैं|

केरल साद्य

भारतीय संस्कृति भोजन को भजन से समकक्ष रखकर उसपर विचार, शोध विकास करती रही है| जब तक सभी आवश्यक तत्त्व शरीर में न जाएँ, भोजन पूर्ण नहीं| यही विचार थाली की अवधारणा को जन्म देता है| किसी भी खाते –पीते भारतीय परिवार में पांच भोज्य से कम मानकर थाली के बारे में नहीं सोचा जाता| छप्पनभोग की अवधारणा हमारी उत्तर भारतीय भोजन संस्कृति का एक चरम है| अगर थाली में तीन या तीन से कम भोज्य हैं तो इसे भोजन नहीं कहा जा सकता| भले ही मात्रा में कम कम लिए जाएँ पर कई प्रकार के भोज्य हों और उनको प्रेम से सस्वाद ग्रहण किया जाये|

केरल का साद्य भारतीय भोजन संस्कृति का प्रमुख प्रतीक है, जिसे प्रचार और प्रसार की आवश्यकता है| अपनी तिरुअनंतपुरम यात्रा के दौरान साद्य का आस्वादन मेरी प्राथमिकताओं में था|

साद्य मुख्यतः त्यौहार का भोजन है| इसका सम्बन्ध ओणम के त्यौहार से है| समय और धन समृद्धि के साथ अधिकतर पकवान त्यौहार और संस्कार समारोह से निकल कर दैनिक जीवन में आ चुके हैं| खासकर बड़े भोजनालय उन्हें साल भर परोसते हैं| साद्य को केले के पत्ते पर परोसने की परंपरा है परन्तु कोई भी भोजन केले के पत्ते पर परोसे जाने से साद्य नहीं बन जाता|

जिस सम्मलेन में भाग लेने के लिये केरल आया हूँ, वहां भी पहले दिन साद्य परोसा गया था| स्वाद लेकर खाने के बाद भी पूरा आनंद न आ पाया| बहुत से मित्र अपने उत्तर भारतीय, पूर्व भारतीय और पश्चिम भारतीय स्वाद से न उबर पाने के कारण इसका आनंद न ले पा रहे थे न अन्य मित्रों को लेने दे पा रहे थे| इसलिए ठीक से और शांति से साद्य का आनंद लेने की इच्छा बनी रही|

मेरे स्थानीय मित्र … … इस मामले में मेरा साथ देने के लिए तैयार थे| बातचीत से समझ आया की सम्पूर्ण साद्य घर में तैयार करने के लिए सोचना व्यवहारिक नहीं है| पांच लोगों के परिवार द्वारा सात आठ लोगों के लिए दो दर्जन भोज्य बनाना कि वो बेकार भी न जाएँ, चुनौती होती| अरुणमूल नौका दौड़ के दौरान वल्ला साद्य के दौरान ६४ से अधिक भोज्य परोसे जाते हैं|

विभिन्न विकल्पों के बाद मदर वेज प्लाज़ा का नाम तय पाया गया| यह भोजनालय उन गिने चुने स्थानों में था जहाँ साल भर साद्य उपलब्ध है| दोपहर के भोजन में ही साद्य उपलब्ध था| यहाँ आस्वादी जनों की अच्छी संख्या है| हम समय से पहले कूपन लेकर मेज पर जमा हैं| कूपन में परोसे जाने वाले सभी भोज्यों के नाम दिए हुए हैं| मैं उन्हें समझने और याद करने की कोशिश कर रहा हूँ| उप्पेरी, वट्टल, पापड़म, पषम, परिप्पूवड़ा, इंची, नारंग, मंगा, नेलिक्का, चार तरह की किचड़ी, तारण, अवियल, कूत्तूकरी, पर्रिपू, सांभर, पुल्शेरी, रसम, मोरू, बोली, सेमिया, अदा पायसम, और चंपा| इनमें से गिनी चुनी चीजों के बारे में ही मुझे पता है|

केले के पत्ते बिछाए जा रहे हैं| इनका भी एक सलीका है| उन्हें ध्यान रखना है कि बाद में भोजन करने और परोसने वालों को दिक्कत न हो| अब भोज्य पदार्थ आने लगे हैं| वेटर को पता है, हमें नाम नहीं पता इसलिए वह नाम बताता जाता है और हम भूलते जाते हैं| नए व्यक्ति के लिए सभी नाम और स्वाद याद रखना दुष्कर कार्य है| हर भोज्य को पत्ते पर नियत स्थान पर परोसना साद्य की निमावली में है|

मेरा मेजबान परोसे गए पदार्थों के बारे में और उन्हें खाने के सही तरीके के बारे में बताता जा रहा है| मैं उसके निर्देशों को मान रहा हूँ| भोजन का आस्वादन करना स्वादिष्ट भोजन बनाने से बड़ी नहीं तो कम बात भी शायद नहीं है|

मेजबान जानता है, मेरा पेट भर चुका है परन्तु मन नहीं| ‘दोबारा आयंगे तब भी लेकर आऊंगा’| मैं प्रसन्न हूँ|

मैं उसे नहीं बताता कि पिछली शाम मैं इस रेस्टोरंट में बिता चुका हूँ| मगर शाम को साद्य नहीं मिलता| कल शाम यहाँ शेजवान मसाला डोसा और काजू डोसा खा चूका हूँ| कई तरह का पारंपरिक और अनुसंधानित डोसा यहाँ मिल रहा है| शायद एक महीने का पूरा इंतजाम है| मुझे दोबारा आना होगा|

पीना मना है!!

भोजन से ठीक पहले या बाद में पानी न पीने की सलाह हमें दांत निकलने के साथ मिलनी शुरू होती है और दांत टूटने तक मिलती रहती है| हम सब अंधविश्वास की तरह इसे मानते हैं| हर अंधविश्वास की तरह इस सलाह के भी वैज्ञानिक होने का विश्वास किया जाता है| पढ़े लिखे डॉक्टर, भोजन विशेषज्ञ, रसोइये, पाक कला विश्लेषक और पाचन तंत्र सम्बन्धी वैज्ञानिक भी इस सलाह के वैज्ञानिक होने पर सहमत नजर आते हैं| मगर मुझे यह किसी चिकित्सा-विज्ञानी द्वारा अपने किसी रोगी से किया गया मजाक लगता है| ठीक उसी तरह कि भोजन का ग्रास ३२ बार चबाना चाहिए – चाहे छोटा कौर लिया हो या बड़ा|

भोजन से पहले या बाद में पानी न पीने का मुख्य तर्क है कि जठराग्नि मंद पड़ जाती है| या कहें तो पाचकरस पतले हो जाते हैं जिस कारण से भोजन नहीं पच पाता|

अगर यह सत्य है तो हम सबको केवल रूखा-सूखा खाना खाना चाहिए| खाने का समय भी ऐसा हो की आमाशय में पानी न हो| रसीली दाल और सब्जी भी पाचक रसों को पतला कर देगी| जठराग्नि पर गुनगुना पानी डालें या ठंडा उसे बुझना ही चाहिए| या गरम पानी डालने से वो पेट में पेट्रोल का काम करेगा|

सोचिये जिस प्रकार खाना पकाते समय पानी की मात्रा कम ज्यादा की जाती है, और जिस प्रकार आँच को तेज और धीमा किया जाता है – आमाशय में भी उस प्रकार की कुछ व्यवस्था होनी चाहिए| फुल्का खाएं तो धीमी जठराग्नि और पूड़ी खाएं तो तेज|

जो विद्वान भोजन के पहले या बाद में पानी पीने की मना करते हैं वो अक्सर भोजन के बीच में ख़ूब पानी पीने की सलाह देते हैं| क्या वह पानी पानी नहीं रहता?

विद्वान बताते हैं कि पाचक रस में अम्ल होते हैं| ऐसा कहते समय यह विद्वान शराब का सेवन करते हुए भोजन की तैयारी कर रहे होते हैं| शायद ही कोई बताता है कि शराब जैसे क्षारीय पदार्थ के कारण पाचक रस कमजोर हो जायेंगे और खाना पचने में कठिनाई होगी| शराब पीने वाले मित्र अक्सर पाचन सम्बन्धी शिकायतें नहीं करते| इसके अलावा, शराब में उड़ेले गए पानी और बर्फ से उनका पाचन कभी कमजोर नहीं पड़ता|

यह स्वछायाचित्र

अपनी स्मृतियों को संजोकर रखना और उन्हें विस्मृत करने का प्रयास करना मानव जीवन के दो प्रमुख संघर्ष हैं| स्मृति का महत्त्व इस बात से है कि पुरातन विधियों को भी स्मृति का नाम दिया गया है – मनु स्मृति,  याज्ञवल्क्य स्मृति| यह स्मृतियों को संजोने और उनसे सीखने का प्रयास ही तो है कि जीवनी लेखन विश्व साहित्य की प्रमुख विधा है और पाठकों के बीच लोकप्रिय भी है| यह आपकी स्मृतियाँ ही तो हैं जो आपको नश्वर जीवन को अमृत्व प्रदान कर सकतीं हैं| और अपनी स्मृति को अमरत्व देने का प्रयास रहा हैं – आत्मकथा| आत्मकथाएं भले ही आपको अमरत्व प्रदान न कर पातीं हो, इसे लिखते और बार बार पढ़ते हुए आपकी अपनी स्मृतियों को कई बार जी जाते हैं|

चित्रकारों से अपने चित्र बनवाने की इच्छा भी इसी कड़ी का का अगला पड़ाव है| छायाचित्रों के आने के चित्र बनवाने का कार्य सस्ता, सुगम और सुगढ़ हो गया| और आज अपनी स्मृतियों को विस्मृत होने से बचाने का एक प्रयास है – स्वछायाचित्र यानि सेल्फी| आज तलाश उत्कर्ष स्वछायाचित्र की – परफेक्ट सेल्फी की है|

प्रायः स्वछायाचित्र पर्यटन, विशिष्ट भेंट- मिलन, विशिष्ट भोज और एकान्तिक प्रहसन के रूप में लिए जाते हैं| इन में से अधिकतर का सम्बन्ध छायाचित्रों की विधागत बारीकियों से नहीं होता – भले ही उनका संपादन आदि बाद में किया जाए| मुझे लगता हैं विधागत बारीकियों का अपना महत्व है| परन्तु  सबसे महत्वपूर्ण है वह कथा जिसे हम स्वछायाचित्र के माध्यम से कहना चाहते हैं| क्या वह कथा हम कह पाए – क्या वह कथा दर्शक की जिज्ञासा में प्रश्न के रूप में उठ पाई| क्या उसे हम स्वयं स्मृति में संजो पाए| यदि स्वछायाचित्र का आत्मकथ्य जीवंत न हुआ तो तकनीकि रूप से उत्कर्ष स्वछायाचित्र भी प्राणहीन हो जाता है| प्राणहीन स्वछायाचित्रों से हम सब के उपकरण भरे पड़े हैं|

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उस दिन हम महाराष्ट्र सदन गए थे| प्रान्तों के भवन और सदन दिल्ली में अपने प्रान्त के भोजन, भाषा, संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हैं| जिस समय आपके लिए भोजन तैयार हो रहा हो तब बच्चों के लिए प्रतीक्षा का कठिन समय होता है| महाराष्ट्र सदन में घुमाने और समझाने के लिए बहुत कुछ है| सावित्री बाई फुले की मूर्ति एक प्रेरक है| भारत में स्त्री शिक्षा में उनका योगदान कोई नकार नहीं सकता| यह चित्र विस्मृत स्मृति है उन पुरानी महिला ऋषि-मुनियों की, जिन्होंने वेद ऋचाओं की रचना भी की और उस मूर्खता की कि स्त्री शिक्षा को धर्म के नाम पर नकार दिया गया| अपनी बिटिया के साथ जब में यह चित्र ले रहा था तो मुझे लगा सावित्री बाई फुले जीवंत होकर मुस्करा रहीं थीं| यह #स्वछायाचित्र प्रेरणा है उज्जवल भविष्य के लिए| #selfie #maharashtrasadan

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उस दिन हम महाराष्ट्र सदन गए थे| प्रान्तों के भवन और सदन दिल्ली में अपने प्रान्त के भोजन, भाषा, संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हैं| जिस समय आपके लिए भोजन तैयार हो रहा हो तब बच्चों के लिए प्रतीक्षा का कठिन समय होता है| महाराष्ट्र सदन में घुमाने और समझाने के लिए बहुत कुछ है| सावित्री बाई फुले की मूर्ति एक प्रेरक है| भारत में स्त्री शिक्षा में उनका योगदान कोई नकार नहीं सकता| यह चित्र विस्मृत स्मृति है उन पुरानी महिला ऋषि-मुनियों की, जिन्होंने वेद ऋचाओं की रचना भी की और उस मूर्खता की कि स्त्री शिक्षा को धर्म के नाम पर नकार दिया गया| अपनी बिटिया के साथ जब में यह चित्र ले रहा था तो मुझे लगा सावित्री बाई फुले जीवंत होकर मुस्करा रहीं थीं| यह स्वछायाचित्र प्रेरणा है उज्जवल भविष्य के लिए|

तकनीकि रूप से जब मुझे इस चित्र में एक और बड़े फ्रेम की तलाश थी जो आस पास की कथा, गौरव, वास्तुकला, नक्काशी को कुछ और दिखा पाता| यह एक बढ़िया स्वछायाचित्र अनुभव  Selfie experience होता और बढ़िया Selfie camera मेरे पास होता|

 

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