सुरा

विश्वबंदी २९ मई – सुरा 

सोमरस यानि शराब यानि अल्कोहल यानि आसव को अधिकतर एशियाई लोग गंभीरता से नहीं देते| हम एशियाई तो खैर किसी बात पर गंभीर नहीं हैं, हमें लगता है कि बस शांति के नशे में जिन्दगी बिताओ और यमराज के घर जाओ या किसी क़ब्र में लम्बा वाला आराम करो| गंभीरता तो सुरा सेवन से ही आती है| कभी ईमानदारी से लिखा जाए तो यूरोप के विकास में सुरा के योगदान को नकारा नहीं जा सकेगा| प्राचीन भारत के स्वर्णयुग में भी सुरा का महत्व दृष्टिगोचर होता है| अम्बेडकर जी ने रामराज्य की सफलता के पीछे सुरा के महत्त्व को पहचाना था पर विस्तार से उन्हें चर्चा नहीं करने दी गई| सुरा-विरोधियों को लगता है कि सुरा सेवन की बात एक गलत आरोप है जबकि यह तो वास्तव में गुणवत्ता है|

जिस प्रकार से सुरा आम मानव को आपस में जोड़ती है उसी प्रकार सुरा-विरोध धार्मिक कट्टरपंथी समुदायों को जोड़ता है – हिटलर से लेकर गाँधी तक सभी कट्टरपंथी मनुष्य, मुस्लिम से लेकर वैष्णव से लेकर जैन तक सभी कट्टरपंथी पंथ सुरा विरोध से जुड़े हुए है| कुल मिलाकर सभी असुर समुदायों में सुरा के प्रति घृणा का भाव रहता है| भारत में भी इसके प्रति अच्छी भावना का न होना लम्बे कट्टरपंथी दुष्प्रचार का परिणाम है| भारत के कट्टर पूंजीवादी गुजरात और कट्टर श्रमवादी बिहार में सुरा पर प्रतिबन्ध है|

करोनाकाल न होता तो मैं भी सुराविरोध के दुष्प्रचार में फंसा रहता और इसके आर्थिक-सामाजिक-शारीरिक-धार्मिक-आध्यात्मिक महत्त्व को नहीं पहचान पाता| मुझे लगता है कि मैंने अमरत्व के मूल को नहीं पहचाना| जल्दी ही मैं भारतीय सुरापंथ के प्रमुख ग्रन्थ मधुशाला का पाठ-मनन-चिंतन करूंगा|

करोनाकाल में सुरा के बारे में जो ज्ञान मुझे प्राप्त हुआ – इस प्रकार है;

  • सुरा राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का मूल स्रोत व् संरक्षक है|
  • सुरा सेवन से कई कठिन विषाणु खासकर करोना दम तोड़ता है|
  • शरीर को साफ़ रखने के लिए विशिष्ठ प्रकार सुरा का शरीर पर छिडकाव और मर्दन करना होता है|
  • शैव व् शाक्त पूजा-हवन में सुरा का विशेष महत्त्व और धार्मिक लाभ है|
  • ध्यान- साधना से पहले योगीजन यदि अल्पमात्रा में सुरा सेवन करें तो ध्यान- साधना सरलता व् तरलता से संपन्न होती है|
  • काम साधना के लिए भी योग साधना जिंतनी अल्पमात्रा में सुरा सेवन करने की व्यवस्था मान्य है|
  • दुर्जन सुरा का अतिसेवन करकर अपनी योगसाधन और कामसाधना को नष्ट कर लेते हैं और समाज में सुरा विरोध का अंधआन्दोलन खड़ा करते हैं|
  • अति सदा वर्जनीय हैं| इस आलेख पर भी अतिगंभीर न हों|

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विश्व-बंदी २५ मई – फ़ीकी ईद

ईद कैसी, ईद ईद न रही| उत्साह नहीं था| कम से कम मेरे लिए| देश क्या दुनिया में एक ही चर्चा| क्या सिवईयाँ क्या फेनी क्या कोई पकवान क्या नाश्ते क्या मुलाक़ातें क्या मिलनी? इस बार तो कुछ रस्म अदायगी के लिए भी नहीं किया| बस कुछ फ़ोन हुए कुछ आए कुछ गए|

न होली पर गले मिले थे न ईद पर| कोई संस्कृति की दुहाई देने वाला भी न रहा – जो रहे वो क्रोध का भाजन बन रहे हैं| कोई और समय होता तो गले मिलने से इंकार करने वाला पागल कहलाता| दूर का दुआ-सलाम प्रणाम-नमस्ते ही रह गया| चलिए गले मिलें न मिलें दिल तो मिलें| मगर हर मिलने वाला भी करोना विषाणु दिखाई देता है| बस इतना भर हुआ कि लोगों की छुट्टी रही| शायद सबने टीवी या मोबाइल पर आँख गड़ाई और काल का क़त्ल किया|

हिन्दू मुसलमान सब सहमत दिखे – जिन्दगी शुरू की जाए| कोई नहीं पूछना चाहता कितने जीते हैं कितने मरते हैं, कितने अस्पताल भरे कितने खाली| मुंबई में मरीज प्रतीक्षा सूची में स्थान बना रहे हैं – मरीज क्या चिकित्सक चिकित्सा करते करते प्रतीक्षा सूची में अपना नाम ऊपर बढ़ने की प्रतीक्षा कर रहे हैं| देश और दिल्ली की हालत क्या है किसी को नहीं समझ आता| बीमार हो चुके लोगों का आँकड़ा डेढ़ लाख के पार पहुँचने वाला है| मीडिया और सरकार गणित खेल रही है| मगर बहुत से लोग हैं जो इस आँकड़े से बाहर रहना चाहते हैं या छूट गए हैं| सरकारी तौर पर खासकर जिनमें कि बीमारी मिल रही है पर कोई लक्षण नहीं मिल रहा|

आज छुट्टी थी, मगर जो लोग सुबह ग़ाज़ियाबाद से दिल्ली आये या गए शायद शाम को न लौट पाएं – सीमा फिर नाकाबंद हो चुकी है| घर से निकलें तो लौटेंगे या नहीं कोई पक्का नहीं जानता| नौकरानी को बुलाया जाए या न बुलाया जाए नहीं पता| न बुलाएँ तो न उसका काम चले न हमारा|

पीछे मंदिर में लोग इस समय शाम की आरती कर रहे हैं| मुझे मंदिर के घंटे हों या मस्जिद की अज़ान मुझे इस से अधिक बेमानी कभी नहीं लगे थे| मगर उनके अस्तित्व और प्रयोजन से मेरा इंकार भी तो नहीं है|

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विश्व-बंदी २८ अप्रैल

उपशीर्षक – करोना काल का भोजन उत्सव

ग़लतफ़हमी है कि धर्म भारतियों को जोड़ता और लड़ाता है| हमारी पहली शिकायत दूसरों से भोजन को लेकर होती है| इसी तरह भोजन हमें जोड़ता भी है| करोना काल में भारतीयों को भोजन सर्वाधिक जोड़ रहा है| यहाँ तक कि रोज़ेदार भी भोजन और पाक-विधियों पर चर्चा में मशगूल हैं| पारिवारिक समूहों से लेकर मित्रों के समूह तक पाक विधियों की चर्चा है|

मैं परिवार में भोजन रसिक के रूप में जाना जाता हूँ, परन्तु इस समय देखता हूँ कि जिन्हें बैंगन पुलाव और बैगन बिरियानी का अंतर नहीं पता वह भी उबला-बैंगन बिरियानी और भुना-बैंगन बिरियानी के अंतर पर चिंतन कर रहे हैं| जिसे देखिये नई विधियाँ खोज रहा है और पारिवारिक और निजी स्वाद के अनुसार|

अभी पिछले सप्ताह परवल की चटनी बनाई थी तो मित्रों, सम्बन्धियों और रिश्तेदारों ने उसके तीन अलग अलग परिवर्धित संस्करण बनाकर उनके चित्र प्रस्तुत कर दिए| मैं गलत हो सकता हूँ, मगर स्वाद के हिसाब से लॉक डाउन के पहले ७-१० दिन साधारण घरेलू खाने के रहे, उसके बाद नए नाश्तों ने ७-१० दिन रसोई सजाई| उसके बाद भारतीय रसोइयों में दोपहर और शाम के पकवानों की धूम मची – मुगलई, पंजाबी, कायस्थ, लखनवी, बंगाली, उड़िया, गुजरती, मराठी, बिहारी, आन्ध्र, उडुपी, चेत्तिनाड, केरल, आदि अलग अलग पाक परम्पराओं को खोजा और समझा गया है| मगर गूगल बाबा जरूर सही जानकारी दे पाएंगे| अगर कोई सही दिशा निर्देशक जनता को सर्व-भारतीय पाक विधियों के बारे में बताने लगे तो राष्ट्रीय एकता को मजबूत होने में एक अधिक समय नहीं लगे| अब हम मिठाइयों की और बढ़ रहे हैं| मैं अगले महीने इटालियन, मेक्सिकन, थाई, जापानी आदि पाक-विधियों के भारत में प्रयोग की सम्भावना से इंकार नहीं कर सकता|

भोजन प्रेमी भारतीयों के लिए सबसे बड़ी कठिनाई पाक सामिग्री की कम उपलब्धता है तो सबसे बड़ा प्रेरक भी यही है – उपलब्ध सामिग्री के नए नवेले प्रयोग, नए स्वाद, नया आपसी रिश्ता|

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खस्ता कचौड़ी की अर्थव्यवस्था

प्रधान जी ने पहले ही पहचान लिया था कि मजेदार खस्ता बनेगा| बोले, खूब तलो, सब मिलकर तलो| नादान समझ न पाए| जब अर्थव्यवस्था के हालत खस्ता हों (या होने वाली हो) तो खस्ता तलने में ही भलाई है| मैं मजाक नहीं कर रहा  हूँ| अभी हाल में अलीगढ़ में कचौड़ी तलने पर सरकारी छापा पड़ा और सालाना बिक्री का आंकड़ा गरमागरम खस्ता निकला – पूरे साठ लाख सालाना|

मुझे अलीगढ़ी कचौड़ियों से प्रेम है| एक समय था, जब मेरी, मेरी पढाई की और देश की हालत ख़राब थे और देश का मण्डल कमण्डल हो रहा था| तब मैंने बहुत सारी चीज़े बनाना सीखा था| उस समय मेरी समझ यह विकसित हुई थी कि कपड़ा और खाना दो धंधे धड़ाकू आदमी के लिए और वकालत और वैद्यकी पढ़ाकू आदमी के लिए बहुत बढ़िया है| यह बात अलग है कि मुझे अब लगता है पहले दो धंधों में पढ़ाकू और दूसरे दो धंधों में धड़ाकू अधिक सफल हैं|

चाट पकौड़ी वाले भोजन में लागत के मुकाबले बाजार मूल्य अधिक होता है| देखा जाए तो जब तक आपको ग्राहक को बिठाने पर खर्च न करना हो तो लाभ पक्का और पका पकाया है| किसी भी ठीक ठाक चलती दूकान पर पहुँचें तो पाएंगे कि हर पांच मिनिट में उसके पास एक ग्राहक होता है और अगर हर ग्राहक औसतन पचास रुपये का माल उठाता है तो साल भर में इक्कीस लाख रुपये का धंधा हो जाता है| दाम अगर आधे हों तो ग्राहकी चार गुना बढ़ जाती है परन्तु बढ़ी हुई ग्राहकी को सँभालने में दिक्कत रहती है| अगर आपका माल सामान्य से अच्छा है तो आप की बिक्री को कुछ ही दिनों में दोगुना होने से कोई नहीं रोक सकता| इस प्रकार चाट पकौड़ी के बाजार में पचास साठ का धंधा होना एक सामान्य बात है|

आप दिल्ली या किसी भी शहर के किसी भी मोहल्ले के किसी भी चाट पकौड़ी वाले को लें तो पाएंगे कि जिस “भैया” से आप तू तड़ाक करते रहे हैं वह शायद आपके बॉस से अधिक कमाता है| यहाँ तक कि आपके ऑफिस के बाहर बैठा चाय वाला भी आपकी कंपनी खरीद सकता है| शायद आपको मेड इन हेवन –  सीजन वन का प्लम्बर याद हो जिसने वेडिंग प्लानिंग कंपनी में मोटा निवेश किया हुआ था| प्लम्बर का पता नहीं मगर दिल्ली शहर के कई बड़े चाट पकौड़ी वाले देश के महत्वपूर्ण निवेशक हैं| यह सब जीवन की मध्यवर्गीय खस्ता सच्चाई है|

कुछ नया खस्ता बनाइये, पकाइए, खिलाइए|

अरी जलेबी

अरी जलेबी गोल मटोल

घूमा घामी पोलम पोल

चाशनी तेरी झोलम झोल

रंग तेरा लालम घोल|

तेरी मौसी इमरती माई

फिर भी तू हमको भाई

इमरती हमने सूखी पाई

तेरे संग में दूध मलाई|

दूध मलाई राबड़ी भाई

देख के हमने दौड़ लगाईं

कड़ी कुरकुरी बड़की माई

मरी मुलायम हमने पाई|

ठण्डी मंडी तुझको खाऊँ

दही जामन उसमें पाऊँ

ठण्डी गर्मी क़स्बा गाऊँ

दूगनम दून मैं खा जाऊँ||

– – ऐश्वर्य मोहन गहराना

 

 

 

होली में भरें रंग

जब कोई पटाखों के बहिष्कार की बात करे और होली पर पानी की बर्बादी की बात करे, तो सारे हिंदुस्तान का सोशल मीडिया अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए पगला जाता है| कुछ तो गली गलौज की अपनी दबी छिपी दादलाई संस्कृति का प्रदर्शन करने लगते हैं|

मगर हमारी दिवाली में दिये और होली में रंग गायब होते जा रहे हैं| बहुत से त्यौहार अब उस जोश खरोश से नहीं मनाये जाते जो पहले दिखाई देता था, तो कुछ ऐशोआराम (रोजीरोटी का रोना न रोयें) कमाने के दबाब में गायब हो रहे हैं| समय के साथ कुछ परिवर्तन आते हैं, परन्तु उन परिवर्तनों के पीछे हमारी कंजूसी, लालच, दिखावा और उदासीनता नहीं होने चाहिए|

दिवाली पर पटाखों पर प्रतिबन्ध के विरोध में पिछली दिवाली इतना हल्ला हुआ कि लक्ष्मी पूजन और दिए आदि जैसे मूल तत्व हम भूल गए| मैं दिवाली पर दिवाली पर जूए, वायु प्रदुषण, ध्वनि प्रदूषण, और प्रकाश प्रदूषण का विरोधी हूँ| प्रसन्नता की बात है कि रंगोली, लक्ष्मी पूजन, मिठाइयाँ, दिये (और मोमबत्ती), मधुर संगीत, आदि मूल तत्व वायु प्रदुषण, ध्वनि प्रदूषण, और प्रकाश प्रदूषण नहीं फैलाते| पटाखों और बिजली के अनावश्यक प्रकाश की तरह यह सब हमारी जेब पर भारी भी पड़ते|

यही हाल होली का है| पानी की बर्बादी पर हमें क्रोध हैं| पानी की बर्बादी क्या है? मुझे सबसे अधिक क्रोध तब आता है जब मुझे बच्चे पिचकारियों में पतला रंग और फिर बिना रंग का पानी फैंकते दिखाई देते हैं| अच्छा हो की इस पानी में रंग की मात्रा कम से कम इतनी हो कि जिसके कपड़ों पर पड़े उसपर अपना रंग छोड़ें| इस से कम पानी में भी अच्छा असर और प्रसन्नता मिलेगी| टेसू आदि पारंपरिक रंग का प्रयोग करें| इसमें महंगा या अजीब क्या हैं?

होली मेरा पसंदीदा त्यौहार हैं| पिचकारी लिए बच्चे देखकर मैं रुक जाता हूँ और बच्चों से रंग डालने का आग्रह करता हूँ| अधिकतर निराश होता हूँ| बच्चों को भी अपना फ़ीका रंग छोड़ने में निराशा होती है|

दुःख यह है कि जो माँ बाप दिवाली के पटाखों पर हजारों खर्च करते हैं, हजारों की पिचकारी दिलाते हैं, वो होली पर दस पचास रुपये का रंग दिलाने में दिवालिया जैसा बर्ताव करते हैं|

मेरे लिए उड़ता हुआ गुलाल और रंग गीले रंग से अधिक बड़ी समस्या है, क्योंकी यह सांस में जाकर कई  दिन तक परेशान करता हैं| गीले रंग से मुझे दिक्कत तो होती है, परन्तु चाय कॉफ़ी पीने से इसमें जल्दी आराम आ जाता है| हर व्यक्ति को गीले और सूखे रंग में से चुनाव करने की सुविधा रहनी चाहिए| बच्चों के पास गीले रंग हो मगर सूखे रंग गुलाल भी उनकी पहुँच में हों, जिस से हर किसी के साथ वो प्रेमपूर्ण होली खेल सकें|

हाँ, कांजी बड़े, गुजिया, पापड़, वरक, नमकीन आदि पर भी ठीक ठाक खर्च करें| हफ्ते भर पहले से हफ्ते भर बाद तक नाश्ते की थाली में त्यौहार रहना चाहिए| व्यायाम और श्रम कम करने की अपनी आदत का दण्ड त्यौहार और स्वादेंद्रिय को न दें|

गाजर का हलवा

अगर आप पकवान विधियाँ पढ़ने के शौक़ीन हैं तो गाजर का हलवा सबसे सरल पकवानों में से एक हैं| अधिकतर विधियाँ कद्दूकस की गई गाजर में मावा (खोया) और चीनी मिलकर आंच पर चढ़ाने की सामान्य प्रक्रिया से शुरू होती हैं और मेवा मखाने की सजावट पर ख़त्म हो जाती हैं| मेरे जैसे स्वाद लोभी लोगों के लिए यह विधियाँ कूड़ा – करकट से आगे नहीं बढ़ पातीं|

गाजर का हलवा बनाना जितना सरल है, गाजर का अच्छा हलवा बनाना उतना कठिन और समय लेने वाला काम है| कोई भी हलवा बनाने समय यह ध्यान रखने की बात है कि हलवा मूँह में जितना जल्दी घुल जाए उतना बढ़िया| दूसरा हलवा चबाने में कम से कम श्रम की आवश्यकता हो| गाजर हलवे का लक्ष्य यह हो कि न दांत को चबाने में कष्ट हो न आंत को पचाने का कष्ट हो, स्वाद और ताकत पूरी आये|

गाजर का हलवा अधिकतर सस्ती गाजर के इन्तजार में टलते रहने वाला काम है| गाजर के हलवे के लिए अधिकतर पकाऊ और मोटी गाजर का प्रयोग किया जाता है| मगर इससे हलवे के स्वाद में कमी आती है| कच्ची मीठी ताजा गाजरें सबसे बेहतर हलवा तैयार करती हैं|

दूसरा, खोये का प्रयोग हो सके तो न करें| दूध का प्रयोग दो तरह से फ़ायदेमंद हैं| पहला आपको खोये की गुणवत्ता पर कोई संदेह नहीं करना पड़ेगा| दूसरा, यह दूध गाजर के साथ उबलने में गाजर के कण कण में जाकर उसे बेहतरीन स्वाद प्रदान करेगा|

गाजर को अलग से उबालना भी उसके स्वाद को कमतर करता है| गाजर को हमेशा दूध के साथ ही उबालें| अगर खोये का प्रयोग कर रहे हैं तो खोये के साथ उबालें| खोया अगर लेना है तो कोशिश करने की कम से कम थोडा बहुत दूध गाजर के साध प्रारंभ से ही डालकर चलें| खोया या मावा, केवल आपके समय की बचत करता हैं| इससे स्वाद में कमी ही आती है, कोई बढ़ोतरी नहीं होती|

एक किलो गाजर के साथ दो किलो दूध अगर लेकर चलते हैं तो बेहतर है| जिन्हें खोया डालना है वह एक किलो दूध के लिए २५० ग्राम खोया के सकते हैं| हो सके तो शुद्ध समृद्ध दूध का प्रयोग करें| आधे अधूरे दूध के प्रयोग से आधा अधूरा स्वाद ही आना है| यही बात खोया की गुणवत्ता पर भी लागू होती है|

किसी भी भोज्य या पकवान के बारे में एक बात पूरी तरह तय है| आप उसे जल्दीबाजी में नहीं बना सकते| अगर आप प्रेशर कुकर में हलवा बनाना चाहते है, तो उस तरह के स्वाद के लिए तैयार रहे| माइक्रोवेब ओवन में बने हलवा का अलग स्वाद होगा| मैं यह नहीं कहता कि यह स्वाद अच्छे नहीं है| मगर हर पकवान का अपना एक शास्त्रीय स्वाद होता है| उस शास्त्रीय स्वाद की अपनी अलग ही बात होती है|

गाजर के हलवे का आनंद कढ़ाई में धीमी धीमी आँच पर इसे बनने देने में है| ठण्डा मौसम और धीमी आंच बेहतरीन गाजर हलवा का सब से पुख्ता वादा है| सही आंच का कोई भौतिक मापदंड नहीं हो सकता क्योंकि जाड़े के मौसम का तापमान और रसोई में हवा का उचित बहाव भी इसमें अपना योगदान रखता है| आँच इतनी धीमी हो कि गाजर या दूध कढ़ाई के तले से न लग जाए| किसी भी तरह का जलना या जलने की गंध जैसा कुछ न हो| साथ ही यह आँच इतनी तेज भी हो कि पर्याप्त मात्रा में वाष्पीकरण होता रहे| बेहतर है कि आप हर दस पांच मिनिट में करछल को कढ़ाई के तले तक इधर से उधर चला लें| सामिग्री की उलटते पलटते रहें| साथ थी साथ आंच को अपने मन के हिसाब से हल्का या बहुत हल्का करते रहें – बोरियत नहीं होगी|

चीनी या मीठा डालने का भी अपना समय और मात्रा है| चीनी अगर अपने पसंदीदा स्वाद से हल्का सा कम रखेंगे तो हलवे का शानदार स्वाद ले पायेंगे| वरना हम सब लोग, रोज ही किसी न किसी मिठाई में चीनी का स्वाद लेते ही रहते हैं| कहना यह कि हलवे का स्वाद बना रहे, चीनी का स्वाद उस के सर पर न चढ़ जाए| मैं आजकल सफ़ेद चीनी के मुकाबले भूरी चीनी लेना पसंद करता हूँ| इसका स्वाद हलवे में चार चाँद लगा देता हैं|

कई बार हम हलवा पूरी तरह पकने का इन्तजार करते हैं फिर मीठा डालते हैं| इससे हलवा में मीठा स्वाद आने की जगह हलवे के चाशनी में पग जाने का स्वाद आने लगता है| हलवे के रस के पूरी तरह सूखने से ठीक ठाक पहले मीठा डाल दें| अधिक पहले मीठा डालने में स्वाद पर अधिक अंतर भले ही न आये, करछल चलाने में श्रम थोड़ा अधिक हो जाता है| अतः ऐसा न करें| हर पकवान और रिश्ते को पकने का उचित समय चाहिए होता है|

इलायची और अन्य मेवा अधपके हलवे में डालने से अधिक स्वाद और खुशबू पैदा करते हैं| हो सके हल्की भुनी इलायची का प्रयोग करें| मेवे हल्के हल्के तले हुए हों| किशमिश न डालें – अगर जबरदस्ती डालें तो कंधारी किशमिश का स्वाद ठीक रहेगा|

बहुत बार हम मेवे को अपनी और अपने हलवे की समृद्धि के दृष्टिकोण से डालते हैं| मेवा हलवे के स्वाद में कोई वास्तविक वृद्धि नहीं करता| मेवा वाला हलवा हमें मानसिक संतुष्टि देता है – स्वादेंद्रिय की संतुष्टि नहीं| मेवा मखाने का यह स्वाद हम अलग से भी ले सकते हैं|

गाजर का हलवा हो या कोई अन्य पकवान बार बार गरम होने से उसका स्वाद बदलता रहता है| बार बार गर्म होने से पकवान अपना बेहतरीन स्वाद खो देते हैं| गाजर का हलवा अगर बढ़िया बना है तो ठंडा भी बहुत बढ़िया लगता है|

एक प्रश्न बार बार आता है.. गाजर हलवे में घी कौन सा हो? अगर आपने भैंस का शुद्ध सम्पूर्ण प्राकृतिक दूध प्रयोग किया है तो इस प्रश्न का कोई अर्थ नहीं| अन्य स्तिथि में गाजर हलवे को आँच से उतारते समय जी भरकर देशी घी का तड़का लगा दें|

पान का बीड़ा

“जिन्हें पान खाने खिलाने की तमीज़ नहीं वो क्या जिन्दगी जियेंगे?” अक्सर कहते|

तब पान का जलवा था| मान का एक पान काफी था| रसास्वादन का शब्द पान का मान रखता है| मजाल क्या कोई दांत पान की कुतर भी जाए| जिन्हें पान चबाने की आदत होती है वो अक्सर ज़ाहिल होते हैं| इंसान की तहजीब, रुतबा, खानदान और तासीर का पता उसके पान खाने के तौर तरीके से लगता है|

पनवाड़ी उन्हें दूर से देखता तो उनका पान लगाना शुरू कर देता| बीच बीच में दो चार दस पान और लग जाते, मगर उनका पान ख़ूब वक़्त लेता| जब तक कत्था चूना अपना रंग एकसार न कर लेते, घोटा चलता रहता| वक़्त होता, जान पहचान, काम बेकाम, चेले – चंटारे उन्हें सलाम ठोंकने आते| एक दूसरे के नाम दुआ पढ़ते| नेहरू से लेकर मर्लिन मुनरो तक बहार होती| पनवाड़ी न  रुकता, घोटा चलता रहता| घड़ी आध घड़ी के बाद पनवाड़ी कहता, रंग मस्त आ रहा है, जजमान| एक उड़ती नज़र पान को चूमती हुई निकल जाती| कहते – पान को भावज बनाना है क्या, बस करो| इधर पान का नुस्खा आगे बढ़ता, उधर देश की ग़रीबी हटती और टाटा बिड़ला भीख मांगने ठंडी सड़क निकल जाते| दूसरी घड़ी बीतते बीतते उमराव जान की याद आती कि छप्पन छुरी  चलती| पूछा तो कभी नहीं मगर कहते है कत्था चूना घोटते हुए पनवाड़ी पान पर सरस्वती यंत्र बनाता|

पान का बीड़ा भक्तिभाव से ग्रहण करते| मन्त्रजाप भी करते होंगे| इसके साथ नगर परिक्रमा का काम शुरू होता| आप भले ही उसे क़स्बा कहें, मगर मील भर पदयात्रा उनका नियम था| कारवां में लोग आते जाते, अलग होते जाते| मंथर गति से कदमताल मिलते जाते| हूँ हाँ करते सबकी बात सुनते जाते| सरकारी ओहदेदार भी इसी क्रम में मेलजोल करते| शायद ही कभी कुछ बोलते| जिनके काम होने होते, चुपचाप हो जाते| कभी कभार कुछ बोलते तो अगले दिन सुबह शहर भर में चर्चा रहता| सोने से पहले मूँह से निचुड़ा हुआ पान कलई के पीकदान में संभाल कर रख देते| दांत का निशान न रहता मगर रस भी तो न रहता|

सुबह समय पूजा पाठ भोजन भजन करते बीतता, शेष विद्यालय में पढ़ाने लिखाने और पीटने चिल्लाने में| गला दर्द करता और थक कर बुरी तरह बैठ जाता| दोपहर घर पहुँच कर चाय चबैना के बाद अपने कुतुबखाने में बैठकर पानदान उठाते| पंडिताइन दोपहर में पुरानी फ़िल्मों के इश्किया गाने सुनती हुई यह पान लगाया करतीं| जिस दिन विविध भारती पर सुरैया के गाने बजते पान में सुर आ जाते| नूरजहाँ का नूर उन्हें बहुत भाता था| जब कभी सही गाना गुनगुनाने लगते, पंडिताइन फूले न समातीं|

पान खाना कला है| जितना देर मूँह में रहे, रस देता रहे| जब तक पत्ता ख़ुद न घुल जाए, उसे न छेड़ते| जिस पान पर कत्था चूना घोटने में घड़ी दो घड़ी लगती हो उसे भोगने में क्या छः घड़ी न लगें? पान मूँह में घुलता रहता| किताबें दिल में उतरती रहतीं| कभी कभी रात बेरात कविता कहानी बन कर पान कागज़ पर उतर जाता| कभी कभी रात होती, सुबह न होती|

पान का दौर चलता रहा, चलते चलते चला गया| इंस्टेंट कॉफ़ी का दौर आया| दो मिनट मैगी आई| तुरंत तैयार खाना आया| चालीसा पढ़ने वाले चार चक्कर अगरबत्ती घुमाकर भगवान को बहलाने लगे|  जिन्दगी जीने की फुर्सत किसे, सलीका किसे? हिंदुस्तान की तहजीब और तासीर किसे? किसे फुर्सत इश्क़ करे, बातें बनाये, घोटा करे, घूँट घूँट जिन्दगी के मज़े करे? किसे फुर्सत जिया करे??

परांठे

हिन्दुस्तानी खाने में बड़ा चक्कर है| फुलका, रोटी, चपाती, परांठा, नान में फ़र्क करना भी बड़ा मुश्किल है|

तवा परांठा और तंदूरी रोटी खाने के बाद तंदूरी परांठा हलक से नीचे उतारने में दिल्लत होती है| आखिर तंदूरी परांठा परांठा कैसे हो सकता है भरवाँ तंदूरी रोटी होना चाहिए| परांठे का भी गजब चक्कर है, तवा परांठा और कढ़ाई परांठा समझने में भी मशक्कत है| कढ़ाई परांठा को नासमझ डीप फ्राई परांठा कहते है| समझदार कहते हैं कि तवा गहरा है उसे कढ़ाई मत कहो| दिल्ली की गली परांठे वाली में तो खुलकर कढ़ाई में परांठा तला जाता है| इस बात में दो राय नहीं की तवा और कढ़ाई के बीच इतने संकर संस्कार हुए हैं कि कौन क्या है पता नहीं चलता| उधर इन संकर संस्कार के जो भी तकनीकि नाम रहे हैं वो आज के अधकचरे ज्ञान में नदारद हो गये हैं| हिन्दुस्तानी अंग्रेजों के लिए हर सब्जी गोर्द और हर बर्तन पैन है|

पहली बार तंदूरी परांठा खाने के बाद घंटों सोचना पड़ा कि यह परांठा क्यों है| मुझे लगा कि भरवाँ रोटी बोलना ठीक है|

परांठे के पहला उपक्रम है कि उसमें कुछ भरा हुआ हो भले ही एक बूंद देशी घी| अगर परांठे में परत नहीं है तो परांठा नहीं है| आप भरवाँ रोटी और परांठे में पहला अंतर उसकी परतों से कर सकते हैं| परांठा अगर तवे पर न पचाया (हल्का भूनना या पकाना) जाए तो यह कचौड़ी हो जाता है| परांठे को अंत में तवे पर, गहरे तवे पर या पसंद के हिसाब से कम गहरी कढ़ाई में तला जाता है| यह प्रक्रिया उसे पूरा परांठा बनाती है| दो अलग अलग प्रक्रियाओं में पकना ही परांठे को परांठा बनाता है|

 

वडपलनी मुरुगन मंदिर

कभी कभी अचानक कहीं जा पहुँचने का संयोग बनता है| उस दिन भी यही हुआ| देर शाम तय हुआ कि वडपलनी में कामकाज की सिलसिले में पहुँचने से पहले मुरुगन मंदिर भी पहुंचा जाए| उत्तर भारतीय हिन्दू मंदिरों के आसपास रहने वाली गंदगी, भीड़भाड़ और पंडा पुजारी की रेलमपेल मेरे शृद्धा भाव को छू-मन्तर कर देती है| मगर दक्षिण भारत में मंदिर अक्सर साफ़ सुथरे रहते हैं| एक बात और भी है ध्यान देने की, दक्षिण भारत में बहुत सारे मंदिर सरकारी नियंत्रण में हैं| वडपलनी मुरुगन मंदिर भी सरकारी विभाग द्वारा नियंत्रित मंदिर है| इन सरकार नियंत्रित मंदिरों को देखकर मुझे हमेशा लगता है कि सरकारी तंत्र के अकुशल और प्रभावहीन प्रबंधन की बात सही नहीं है और जान बूझकर पैदा की गई है|

सुबह सुबह मंदिर पहुँचे| कोई हो- हल्ला नहीं था| वैसे भी यह किसी त्यौहार वाला दिन नहीं था| प्रसाद खरीदने की कोई इच्छा नहीं थी| आखिर घर लौटने में दिन थे| दो फूल मालाएं खरीदी गई| सड़क किनारे बैठे उस फूल वाले ने बात टूटी फूटी हिंदी में की मगर दाम तमिल में बताये| मैंने सौ रुपये का नोट दिया तो वो टूटे पैसे लेने चला गया| पंद्रह रुपये में दो बढ़िया फूलमालाएं|

किसी दुकानदार ने आवाज नहीं लगाई| कोई पंडा पुजारी नहीं आया| किसी ने भगवान से अपने सीधे सम्बन्ध का दावा नहीं किया| भीड़ नहीं थी| पहले से बताए गए हिसाब से हम चुपचाप टिकट काउंटर की तरफ़ बढ़ गए| दस का नोट बढाया और दो टिकट प्राप्त कीं| मुख्य मंदिर की तरफ पहुँचते ही पता लगा यह अर्चना की टिकट है, स्पेशल दर्शन का नहीं| स्पेशल दर्शन के लिए बीस रुपये का टिकट था| पहले अर्चना के लिए लाइन में लग गए| यहाँ वास्तव में कोई लाइन नहीं थी| अंतिम छोर तक पहुँचते ही, पुजारी आया| हमारी पूजा सामिग्री लेकर गर्भगृह में अन्दर चला गया| हम देखते रहे| देवता से अधिक मेरा ध्यान पुजारी पर था| मगर उसने वापिस आने से पूर्व पूरे विधि विधान संपन्न किये| ऐसा नहीं कि दूर से ही चढ़ावे की फूलमाला देव-मूर्ति की तरफ उछाल कर वापिस आ गया हो| वापिस आकर उसने आचमन का जल और माला के आधे फूल हमें दे दिए, वही हमारा प्रसाद था| हम कोई खाद्य पदार्थ तो प्रसाद के लिए लेकर आये नहीं थे|

हमने कोई देव-दर्शन तो किये नहीं थे| सारा ध्यान तो पुजारी पर था| दोबारा काउंटर पर जाकर स्पेशल दर्शन का टिकट लिया| इस लाइन में हम बिल्कुल अकेले थे| पूरा पांच मिनट सबसे बढ़िया लगने वाली जगह पर खड़े हुए अपने मन, भाषा और विचार के अनुसार मन ही मन पूजा संपन्न की| कोई पुजारी हमें रोकने टोकने समझाने बुझाने लूटने खसोटने नहीं आया| जिस पुजारी ने हमारी पूजा करवाई थी, वह भी दूर से मुस्करा कर अपने काम में लग चुका था|

इसके बाद हमने प्रांगण में मौजूद अन्य मंदिरों का दर्शन किया| ऐसे ही एक मंदिर के पुजारी ने हमारे प्रसाद के फूल और टीके के लिए दी गई भस्म को बाकायदा कागज में बांध दिया| कोई शब्द नहीं बोला सुना गया| धन्यवाद और उसके स्वीकार के रूप में नमस्कार ही रहा|

जूते मंदिर के बाहर दरवाजे के के ओर असुरक्षित रखे थे, मगर सुरक्षित ही मिले| पास की एक दुकान से स्थानीय चाय नाश्ता किया| नाम आदि नहीं पता| सारा कार्य-व्यवहार संकेतों में चलता रहा| दालवडा, प्याज आदि का पकौड़ा, एक समौसे जैसा कुछ और अलग अंदाज की एक चाय| दो लोगों में सौ रुपये भी खर्च न हुए| एक चाय में मधुमक्खी गिरने पर उस के स्थान पर दूसरी चाय भी बिना कुछ कहे सुने मिल गई|

चलते चलते बता दें यह मंदिर तमिल फ़िल्म इंडस्ट्री में बहुत प्रसिद्ध है| चेन्नई के बहुत सारे विवाह कार्य यहीं संपन्न होते हैं| तमिलनाडू हिन्दू धार्मिक विभाग द्वारा मंदिर की आधिकारिक वेबसाइट भी बनाई गई है| जहाँ सभी जानकारियां उपलब्ध हैं| मैंने यह वेबसाइट बाद में देखी|

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चेन्नै की एक सुबह ईश्वर (मेरे वरिष्ठ और मित्र) से मिलने जाते समय देव का बुलावा आया। पहले पाँच रुपये के टिकट से दूरदर्शन हुए तो आदेश हुआ पास आओ तो बीस का टिकट लिया। छोटी से बात कही गई, साथ के साथ सुन ली गई। मुरुगन से पिछले दस साल में पहली मुलाकात थी। दक्षिण भारतीय मंदिरों में उत्तर भारत के मंदिरों के मुकाबले अधिक सफाई है और पैसे भी रसीद के साथ लिए जाते है। पुजारियों ने खुद बुला कर आशीर्वचन कहे और न धन मांगा न दिया गया, और बाद में किसी पुजारी ने आँख न ततेरी। सिर्फ़ दो पुष्पमालाओं से पूजा सम्पन्न हुई। खाद्य का प्रसाद ने चढ़ा, न पाया। बाहर आकर स्थानीय चाय नाश्ता हुआ और मन के साथ तन भी संतुष्ट हुआ। #chennai #murugan #vadapalani

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हमारा ताज़ा खाना

हम भारतियों को ताज़ा खाने का बड़ा शौक होता है| ताजी हरी सब्जियां और फल हमें निहायत पसंद होते हैं| ताज़ा खाने की तो जिद इतनी कि बासोड़े का त्यौहार भी बहुत से परिवारों में ताज़ा पकवान और मिठाइयों के साथ मनाया जाता है| ताज़ा पानी का शौक इतना कि दोपहर की कड़ी धूप में भी कूएं और चापाकल से दो बाल्टी पानी निकलने के बाद ताज़ा पानी पीने और उसमे नहाने का शौक हमने पूरा ख़ूब पूरा किया है|

मेरे पिता जी तो ताज़ा सब्जियों के इतने शौकीन हैं कि कुछ दिन पहले तक हर रोज मंडी जाकर सब्जियां खरीदना उनका प्रिय शगल था| हमारा तो पता ही पूछ लीजिये, पते में ही सब्जी मंडी लिखा आता है| हमारे फ्रिज में जरूरत से दो गुनी मात्रा में ताज़ा सब्जियाँ मिल जातीं थीं जिन्हें उनकी माताजी दो एक दिन के बाद पास पडौस में भिजवा देतीं और घरेलू नौकरों के घर में भी जाती रहतीं| जिन लोगों के पास समय नहीं होता वो लोग हफ्ते भर की ताजी हरी सब्जियां एक बार में ही फ्रिज में लाकर सजा देते हैं| मेरी ससुराल में भी तो रोजाना ताजी सब्ज़ी आत्ती है| क्या मजाल कि कोई बासी सब्जी चौके के अन्दर चली जाए| जब भी ये नाचीज दामाद ससुराल पहुँचता है तो उसके स्वागत में पकी पकाई ताजी सब्जियां हफ्ते दो हफ्ते से जीजा की दीवानी साली की तरह फ्रिज की आरामगाह में इन्तजार करती नज़र आतीं हैं| अगर इसे आप गप्प समझना चाहें तो समझें मगर कहानी हर घर में यही है|

हिन्दुस्तानी फ्रिज वो जादुई मशीन है जिसमें रखा खाना बासा नहीं होता| बहुत सी ताजी चीज़े हमारे फ्रिज में अपनी सेहतमंदी तारीख़ के हफ्ते दो हफ्ते बाद तक भी मिल जाती है| हमारा बस चले तो खुद तरोताजा रहने के लिए फ्रिज में बैठ जाएँ| शायद ज्यादातर भारतीय इसी मानसिकता के चलते अपने वातानुकूलन को बर्फ की मानिंद ठंडा रखते हैं| अब हमारे टीवी को देख लीजिये सभी की सभी प्रेमिका पात्र हर समय ताज़ा नजर आतीं है|

अब यह कहानी छोड़िये, पुराना किस्सा बताते हैं| उस ज़माने में न फ्रिज था न कोल्ड स्टोरेज| खाना पकता, खाया जाता और गौ माता, बैल मामा, कुत्ते चाचा, चींटी चाची, भैसिया मौसी, कौए बाबा की भेंट चढ़ाया जाता| और नहीं तो मंदिर के पेटू पण्डित जी के थाली किसी न किसी शगुन-अपशगुन के नाम पर निकाल दी जाती| कुछ नहीं तो पड़ोस की चटोरी चाची को कैसा बना है पूछने के लिए भेज दी जाती| वो ये जानते हुए भी उन्हें कोई ब्लोग नहीं लिखना बल्कि बचा ख़ुचा निपटाना है, उसे प्रेम से खा कर तारीफ़ का तरन्नुम गा देतीं| न कीटाणु, न विषाणु, न बासापन, न महक न पेटदर्द; रिश्तों की मिठास बरक़रार| जो चौके में बनता था दिन छिपने तक निपटा दिया जाता| पक्का खाना कहे जाने वाले पकवानों के अलावा एक रात गुजरने के बाद शायद कुछ भीं न खाया जाता| अब तो कच्चा खाना कोई जानता नहीं, बिना पकाई सलाद और सब्जियों की कच्चा खाना समझ लिया जाता है|*

अब देखिये, बासे का राज है| बसोड़े के अलावा शायद ही कोई दिन जाता हो कि कुछ न कुछ बासा न खाया जाता हो| तुर्रा यह कि भोजन की बर्बादी न करने का नाम दिया जाता है, भले ही बिजली और पेट बर्बाद होता रहे| नाप तौलकर बनाने में तो हिसाब गड़बड़ा जाता है|

इससे पहले कि मेरा लिखा आपको बासा लगने लगे, कुछ ताज़ा ताज़ा तारीफ करते जाइये|

*खाना मतलब जो रसोई में पक चुका  हो, बाकि तो फल सलाद सब्जियां है, खाना नहीं|

दक्षिण भारतीय खाना – दिल्ली बनाम चेन्नई

दिल्ली में बहुत से लोगों को लगता है चेन्नई में या तो लोगों को दक्षिण भारतीय खाना बनाना नहीं आता या उनको गलत भोजनालय ले जाया गया| कारण है गलत मसालों का प्रयोग|

दिल्ली में रहकर बिना छुरी कांटे दक्षिण भारतीय खाने की बात सोचना कठिन है| चेन्नई मैं छुरा कांटा तो क्या चम्मच भी कोई शायद ही प्रयोग करता हो| हर भोजनालय में चम्मच मांगते है वेटर समझ जाता है कि बाबू बिहारी (हिंदी भाषी) है| वैसे ज्यादातर वेटर बिहार, उड़ीसा, और बंगाल से मालूम होते हैं|

मुख्य बात तो यह कि दिल्ली में मिलने वाला दक्षिण भारतीय खाना कम से कम दक्षिण भारत का खाना तो नहीं कहा जाना चाहिए| एक महीना चेन्नई और हफ्ते भर त्रिवेंद्रम रहने के बाद मुझे तो कम से कम यही लगता है| मुझे ऐसा लगता है कि किसी गुमनाम उत्तर भारतीय ने अपना धंधा चमकाने के लिए दिमागी घोड़े दौड़ा कर दक्षिण भारतीय खाने पर किताब लिख मारी हो और दिल्ली के बाकि लोग उसे पढ़कर खाना बनाने में लगे हैं| भला बताइए कोई रोज रोज अरहर में सरसों का तड़का डालकर सांभर बनाता अहि क्या? मगर ऐसा दिल्ली में संभव है| चेन्नई आने से पहले मुझे पता न था कि मूंग दाल से भी सांभर बन सकती है| दिल्ली और चेन्नई के सांभर मसलों के बीच तो विन्ध्याचल का पूरा पठार दीवार बनकर खड़ा है| मसाला डोसा ऐसा मामला भी चेन्नई में कम दिखाई देता है| दिल्ली में पायसम तो शायद खीर की सगी बहन लगती है, मगर यहाँ तो खीर और पायसम में मामा – फूफी का रिश्ता लगता है|

दोनों जगह नारियल चटनी का स्वाद बदल जाता है| इसमें नारियल के ताज़ा होने का भी योगदान होगा|

मुझे याद है कि दिल्ली में एक मित्र ने बोला था मुझे चेन्नई में लोगों को ठीक से दक्षिण भारतीय खाना बनाना नहीं आता|

जैसा कि मैं पिछली पोस्ट में लिख चुका हूँ, खाने पर स्थानीय रंग हमेशा चढ़ता ही है| दिल्ली शहर में आलू टिक्की बर्गर, पनीर – टिक्का पिज़्ज़ा और तड़का चौमिन यूँ ही तो नहीं बिकते|

चेन्नई में उत्तर भारतीय खाना

लगभग दस साल पहले की बात है| हम पांडिचेरी और चेन्नई से लौटे थे कि एक मित्र मिलने चले आये| पहले तो उनकी चिंता थी कि हमने हफ्ते भर रोज उत्तर भारतीय खाना कैसे ढूंढा| हमने कहा कि हम हमेशा स्थानीय खाना ही पसंद करते हैं| इसपर उन्होंने कहा कि केले के पत्ते पर खाने की बात ही निराली है और दूसरी बातों की तरफ रुख किया| काश में बता पाता कि चेन्नई में उत्तर भारतीय खाना भी केले के पत्ते पर मिल जाता है|

इस बार, एक महीने के चेन्नई प्रवास में खाने को लेकर कई नए अनुभव हुए| उनमें से एक था चेन्नई के एल्दम्स रोड पर उत्तर भारतीय खाना| उस शाम में उत्तर भारतीय खाने की बहुत इच्छा थी| उसी एल्द्म्स रोड पर पंजाबी रसोई का खाना मुझे बहुत नहीं भाया था| मुझे सोचना पड़ रहा था कि क्या वो वाकई पंजाबी खाना है|

बहुत दिन दक्षिण भारतीय खाना खाने के बाद, अपने घर ब्रज का खाना दिख जाये तो क्या बात हो| मैंने जैसे ही भोजनालय में प्रवेश किया अलीगढ़ के आसपास बोली जाने वाली ब्रज मिश्रित हिंदी सुनाई दी| पकवान सूची देखे बिना ही खाना यहीं खाया जाए का अटल निर्णय लिया गया| घरेलू खाने की उम्मीद में भूख दोगुनी हो चुकी थी| भोजन में क्या क्या है दिखने से बढ़िया था, थाली मंगा ली जाए| तो पेश – ए – खिदमत है थाली| यह थाली उसके बाद कई शाम गाँव – घर और देश की याद का परदेश में सहारा बनी|

तीन रोटी, एक बड़ा कटोरा चावल, पापड़, दाल अरहर, आलू शोरबा, बूंदी रायता, और बेंगन आलू टमाटर| थाली में तीन रोटियां, किसी भी उत्तर भारतीय के लिए दुःख का सबब है| ब्रज क्षेत्र में तीन रोटियां एक साथ प्रायः मृत्यु उपरांत होने वाले संस्कार में परोसी जाती हैं| केले के गोल कटे पत्ते पर एक बड़ा कटोरा चावल और चावल एक ऊपर मैदा का जीरा वाला पापड़| परोसने का ख़ालिस दक्षिण भारतीय तरीका| एक बड़ा कटोरा उबला चावल रात एक खाने में खाना ब्रज में कभी न हो| दाल अरहर में हींग जीरा और सरसों के तेल का तड़का तो न था, नारियल तेल तला प्याज टमाटर भले ही रहा हो| आलू शोरबा का भी यही हाल था – न सरसों का तेल न देशी घी| बूंदी रायता ठीक था, मगर ब्रज के स्वाद के हिसाब से कम खट्टा, कम तीखा| सूखी सब्जी रोज बदल जाती थी इसलिए उस पर कोई टिपण्णी नहीं करूंगा| इस थाली को मैं पांच में से पूरे चार अंक दूंगा|

कुछ भी सही यह खाना उत्तर भारतीय खाना न सिर्फ आसपास रहने वाले उत्तर भारतियों बल्कि दक्षिण भारतीय लोगों में भी पसंद किया जा रहा था| उत्तर भारतीय खाने के शोकीन थाली तो खैर नहीं लेते थे मगर यहाँ के खाने और चाट-पकौड़ी की ठीक ठाक मांग थी| खाने डिलीवर करने वाली कम्पनियों के कारिंदे लगातार आवाजाही करते रहते हैं|

केरल साद्य

भारतीय संस्कृति भोजन को भजन से समकक्ष रखकर उसपर विचार, शोध विकास करती रही है| जब तक सभी आवश्यक तत्त्व शरीर में न जाएँ, भोजन पूर्ण नहीं| यही विचार थाली की अवधारणा को जन्म देता है| किसी भी खाते –पीते भारतीय परिवार में पांच भोज्य से कम मानकर थाली के बारे में नहीं सोचा जाता| छप्पनभोग की अवधारणा हमारी उत्तर भारतीय भोजन संस्कृति का एक चरम है| अगर थाली में तीन या तीन से कम भोज्य हैं तो इसे भोजन नहीं कहा जा सकता| भले ही मात्रा में कम कम लिए जाएँ पर कई प्रकार के भोज्य हों और उनको प्रेम से सस्वाद ग्रहण किया जाये|

केरल का साद्य भारतीय भोजन संस्कृति का प्रमुख प्रतीक है, जिसे प्रचार और प्रसार की आवश्यकता है| अपनी तिरुअनंतपुरम यात्रा के दौरान साद्य का आस्वादन मेरी प्राथमिकताओं में था|

साद्य मुख्यतः त्यौहार का भोजन है| इसका सम्बन्ध ओणम के त्यौहार से है| समय और धन समृद्धि के साथ अधिकतर पकवान त्यौहार और संस्कार समारोह से निकल कर दैनिक जीवन में आ चुके हैं| खासकर बड़े भोजनालय उन्हें साल भर परोसते हैं| साद्य को केले के पत्ते पर परोसने की परंपरा है परन्तु कोई भी भोजन केले के पत्ते पर परोसे जाने से साद्य नहीं बन जाता|

जिस सम्मलेन में भाग लेने के लिये केरल आया हूँ, वहां भी पहले दिन साद्य परोसा गया था| स्वाद लेकर खाने के बाद भी पूरा आनंद न आ पाया| बहुत से मित्र अपने उत्तर भारतीय, पूर्व भारतीय और पश्चिम भारतीय स्वाद से न उबर पाने के कारण इसका आनंद न ले पा रहे थे न अन्य मित्रों को लेने दे पा रहे थे| इसलिए ठीक से और शांति से साद्य का आनंद लेने की इच्छा बनी रही|

मेरे स्थानीय मित्र … … इस मामले में मेरा साथ देने के लिए तैयार थे| बातचीत से समझ आया की सम्पूर्ण साद्य घर में तैयार करने के लिए सोचना व्यवहारिक नहीं है| पांच लोगों के परिवार द्वारा सात आठ लोगों के लिए दो दर्जन भोज्य बनाना कि वो बेकार भी न जाएँ, चुनौती होती| अरुणमूल नौका दौड़ के दौरान वल्ला साद्य के दौरान ६४ से अधिक भोज्य परोसे जाते हैं|

विभिन्न विकल्पों के बाद मदर वेज प्लाज़ा का नाम तय पाया गया| यह भोजनालय उन गिने चुने स्थानों में था जहाँ साल भर साद्य उपलब्ध है| दोपहर के भोजन में ही साद्य उपलब्ध था| यहाँ आस्वादी जनों की अच्छी संख्या है| हम समय से पहले कूपन लेकर मेज पर जमा हैं| कूपन में परोसे जाने वाले सभी भोज्यों के नाम दिए हुए हैं| मैं उन्हें समझने और याद करने की कोशिश कर रहा हूँ| उप्पेरी, वट्टल, पापड़म, पषम, परिप्पूवड़ा, इंची, नारंग, मंगा, नेलिक्का, चार तरह की किचड़ी, तारण, अवियल, कूत्तूकरी, पर्रिपू, सांभर, पुल्शेरी, रसम, मोरू, बोली, सेमिया, अदा पायसम, और चंपा| इनमें से गिनी चुनी चीजों के बारे में ही मुझे पता है|

केले के पत्ते बिछाए जा रहे हैं| इनका भी एक सलीका है| उन्हें ध्यान रखना है कि बाद में भोजन करने और परोसने वालों को दिक्कत न हो| अब भोज्य पदार्थ आने लगे हैं| वेटर को पता है, हमें नाम नहीं पता इसलिए वह नाम बताता जाता है और हम भूलते जाते हैं| नए व्यक्ति के लिए सभी नाम और स्वाद याद रखना दुष्कर कार्य है| हर भोज्य को पत्ते पर नियत स्थान पर परोसना साद्य की निमावली में है|

मेरा मेजबान परोसे गए पदार्थों के बारे में और उन्हें खाने के सही तरीके के बारे में बताता जा रहा है| मैं उसके निर्देशों को मान रहा हूँ| भोजन का आस्वादन करना स्वादिष्ट भोजन बनाने से बड़ी नहीं तो कम बात भी शायद नहीं है|

मेजबान जानता है, मेरा पेट भर चुका है परन्तु मन नहीं| ‘दोबारा आयंगे तब भी लेकर आऊंगा’| मैं प्रसन्न हूँ|

मैं उसे नहीं बताता कि पिछली शाम मैं इस रेस्टोरंट में बिता चुका हूँ| मगर शाम को साद्य नहीं मिलता| कल शाम यहाँ शेजवान मसाला डोसा और काजू डोसा खा चूका हूँ| कई तरह का पारंपरिक और अनुसंधानित डोसा यहाँ मिल रहा है| शायद एक महीने का पूरा इंतजाम है| मुझे दोबारा आना होगा|

पीना मना है!!

भोजन से ठीक पहले या बाद में पानी न पीने की सलाह हमें दांत निकलने के साथ मिलनी शुरू होती है और दांत टूटने तक मिलती रहती है| हम सब अंधविश्वास की तरह इसे मानते हैं| हर अंधविश्वास की तरह इस सलाह के भी वैज्ञानिक होने का विश्वास किया जाता है| पढ़े लिखे डॉक्टर, भोजन विशेषज्ञ, रसोइये, पाक कला विश्लेषक और पाचन तंत्र सम्बन्धी वैज्ञानिक भी इस सलाह के वैज्ञानिक होने पर सहमत नजर आते हैं| मगर मुझे यह किसी चिकित्सा-विज्ञानी द्वारा अपने किसी रोगी से किया गया मजाक लगता है| ठीक उसी तरह कि भोजन का ग्रास ३२ बार चबाना चाहिए – चाहे छोटा कौर लिया हो या बड़ा|

भोजन से पहले या बाद में पानी न पीने का मुख्य तर्क है कि जठराग्नि मंद पड़ जाती है| या कहें तो पाचकरस पतले हो जाते हैं जिस कारण से भोजन नहीं पच पाता|

अगर यह सत्य है तो हम सबको केवल रूखा-सूखा खाना खाना चाहिए| खाने का समय भी ऐसा हो की आमाशय में पानी न हो| रसीली दाल और सब्जी भी पाचक रसों को पतला कर देगी| जठराग्नि पर गुनगुना पानी डालें या ठंडा उसे बुझना ही चाहिए| या गरम पानी डालने से वो पेट में पेट्रोल का काम करेगा|

सोचिये जिस प्रकार खाना पकाते समय पानी की मात्रा कम ज्यादा की जाती है, और जिस प्रकार आँच को तेज और धीमा किया जाता है – आमाशय में भी उस प्रकार की कुछ व्यवस्था होनी चाहिए| फुल्का खाएं तो धीमी जठराग्नि और पूड़ी खाएं तो तेज|

जो विद्वान भोजन के पहले या बाद में पानी पीने की मना करते हैं वो अक्सर भोजन के बीच में ख़ूब पानी पीने की सलाह देते हैं| क्या वह पानी पानी नहीं रहता?

विद्वान बताते हैं कि पाचक रस में अम्ल होते हैं| ऐसा कहते समय यह विद्वान शराब का सेवन करते हुए भोजन की तैयारी कर रहे होते हैं| शायद ही कोई बताता है कि शराब जैसे क्षारीय पदार्थ के कारण पाचक रस कमजोर हो जायेंगे और खाना पचने में कठिनाई होगी| शराब पीने वाले मित्र अक्सर पाचन सम्बन्धी शिकायतें नहीं करते| इसके अलावा, शराब में उड़ेले गए पानी और बर्फ से उनका पाचन कभी कमजोर नहीं पड़ता|

यह स्वछायाचित्र

अपनी स्मृतियों को संजोकर रखना और उन्हें विस्मृत करने का प्रयास करना मानव जीवन के दो प्रमुख संघर्ष हैं| स्मृति का महत्त्व इस बात से है कि पुरातन विधियों को भी स्मृति का नाम दिया गया है – मनु स्मृति,  याज्ञवल्क्य स्मृति| यह स्मृतियों को संजोने और उनसे सीखने का प्रयास ही तो है कि जीवनी लेखन विश्व साहित्य की प्रमुख विधा है और पाठकों के बीच लोकप्रिय भी है| यह आपकी स्मृतियाँ ही तो हैं जो आपको नश्वर जीवन को अमृत्व प्रदान कर सकतीं हैं| और अपनी स्मृति को अमरत्व देने का प्रयास रहा हैं – आत्मकथा| आत्मकथाएं भले ही आपको अमरत्व प्रदान न कर पातीं हो, इसे लिखते और बार बार पढ़ते हुए आपकी अपनी स्मृतियों को कई बार जी जाते हैं|

चित्रकारों से अपने चित्र बनवाने की इच्छा भी इसी कड़ी का का अगला पड़ाव है| छायाचित्रों के आने के चित्र बनवाने का कार्य सस्ता, सुगम और सुगढ़ हो गया| और आज अपनी स्मृतियों को विस्मृत होने से बचाने का एक प्रयास है – स्वछायाचित्र यानि सेल्फी| आज तलाश उत्कर्ष स्वछायाचित्र की – परफेक्ट सेल्फी की है|

प्रायः स्वछायाचित्र पर्यटन, विशिष्ट भेंट- मिलन, विशिष्ट भोज और एकान्तिक प्रहसन के रूप में लिए जाते हैं| इन में से अधिकतर का सम्बन्ध छायाचित्रों की विधागत बारीकियों से नहीं होता – भले ही उनका संपादन आदि बाद में किया जाए| मुझे लगता हैं विधागत बारीकियों का अपना महत्व है| परन्तु  सबसे महत्वपूर्ण है वह कथा जिसे हम स्वछायाचित्र के माध्यम से कहना चाहते हैं| क्या वह कथा हम कह पाए – क्या वह कथा दर्शक की जिज्ञासा में प्रश्न के रूप में उठ पाई| क्या उसे हम स्वयं स्मृति में संजो पाए| यदि स्वछायाचित्र का आत्मकथ्य जीवंत न हुआ तो तकनीकि रूप से उत्कर्ष स्वछायाचित्र भी प्राणहीन हो जाता है| प्राणहीन स्वछायाचित्रों से हम सब के उपकरण भरे पड़े हैं|

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उस दिन हम महाराष्ट्र सदन गए थे| प्रान्तों के भवन और सदन दिल्ली में अपने प्रान्त के भोजन, भाषा, संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हैं| जिस समय आपके लिए भोजन तैयार हो रहा हो तब बच्चों के लिए प्रतीक्षा का कठिन समय होता है| महाराष्ट्र सदन में घुमाने और समझाने के लिए बहुत कुछ है| सावित्री बाई फुले की मूर्ति एक प्रेरक है| भारत में स्त्री शिक्षा में उनका योगदान कोई नकार नहीं सकता| यह चित्र विस्मृत स्मृति है उन पुरानी महिला ऋषि-मुनियों की, जिन्होंने वेद ऋचाओं की रचना भी की और उस मूर्खता की कि स्त्री शिक्षा को धर्म के नाम पर नकार दिया गया| अपनी बिटिया के साथ जब में यह चित्र ले रहा था तो मुझे लगा सावित्री बाई फुले जीवंत होकर मुस्करा रहीं थीं| यह #स्वछायाचित्र प्रेरणा है उज्जवल भविष्य के लिए| #selfie #maharashtrasadan

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उस दिन हम महाराष्ट्र सदन गए थे| प्रान्तों के भवन और सदन दिल्ली में अपने प्रान्त के भोजन, भाषा, संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हैं| जिस समय आपके लिए भोजन तैयार हो रहा हो तब बच्चों के लिए प्रतीक्षा का कठिन समय होता है| महाराष्ट्र सदन में घुमाने और समझाने के लिए बहुत कुछ है| सावित्री बाई फुले की मूर्ति एक प्रेरक है| भारत में स्त्री शिक्षा में उनका योगदान कोई नकार नहीं सकता| यह चित्र विस्मृत स्मृति है उन पुरानी महिला ऋषि-मुनियों की, जिन्होंने वेद ऋचाओं की रचना भी की और उस मूर्खता की कि स्त्री शिक्षा को धर्म के नाम पर नकार दिया गया| अपनी बिटिया के साथ जब में यह चित्र ले रहा था तो मुझे लगा सावित्री बाई फुले जीवंत होकर मुस्करा रहीं थीं| यह स्वछायाचित्र प्रेरणा है उज्जवल भविष्य के लिए|

तकनीकि रूप से जब मुझे इस चित्र में एक और बड़े फ्रेम की तलाश थी जो आस पास की कथा, गौरव, वास्तुकला, नक्काशी को कुछ और दिखा पाता| यह एक बढ़िया स्वछायाचित्र अनुभव  Selfie experience होता और बढ़िया Selfie camera मेरे पास होता|

 

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पानी रखिये…

 

 

रहिमन पानी राखिये,

बिन पानी सब सून।

पानी गये न ऊबरे,

मोती, मानुष, चून॥

सोलहवीं सदी में महाकवि अब्दुल रहीम ख़ानख़ाना ने जब यह दोहा कहा था, शायद सोचा भी न होगा कि इसके मायने विशेष होने की जगह साधारण हो जायेंगे और वह साधारण मायने अतिविशेष माने जायेंगे| इस दोहे में पानी शब्द का कोई भी अर्थ शाब्दिक नहीं है|[i] परन्तु तब से लगभग पांच सौ वर्ष के बाद पानी (water) का शाब्दिक अर्थ बहुत महत्वपूर्ण हो चुका है|

पानी अर्थात जल के बिना मोती, मनुष्य और आटा (यानि खाद्य पदार्थ) अपना अस्तित्व नहीं बचाए रख सकते| पानी को बचाए रखिये| बिना पानी दुनिया बंजर उजाड़ हो जाएगी| लगता है रहीमदास इक्कीसवीं सदी की इस आशंका की चेतावनी दे रहे हैं|

पानी कैसे बचे? इसके कई उपाय सुझाये जा रहे हैं| उनमें से बहुत से सुझाव अपनाये भी जा रहे हैं| दशक – दो दशक पहले तक पानी की साफ़ बनाये रखने पर जोर था| आजकल पानी बचाने पर सारा ध्यान है| अब पानी की कमी पहली दुश्वारी है, पानी को साफ़ रखना बाद की बात है|

किस काम में और किस उत्पाद में पानी कितना बर्बाद हो रहा है, यह आँका जा रहा है| औद्योगिक जगत इस समस्या पर कितना गंभीर है कोई नहीं जानता| शायद विकास और रोजगार की मांग देश और दुनिया की हर सरकार पर हावी है| ऐसे में पानी बचाने के ज़िम्मा साधारण घर-गृहस्थी पर ही है| पानी का पहला संकट घर में झेलना ही होगा –- वह भी अचानक दिन के पहले पल में|

पुराने समय में जब कूएं से पानी निकालना होता था तो सोच समझ कर खर्च होता था| पांच लीटर पानी की जरूरत हो तब दस लीटर पानी खर्च करने का अर्थ था दुगनी मेहनत, दुगना समय| मशीनी युग में पानी बर्बाद करने से पहले हम कम ही सोचते हैं| बटन दबाकर पानी पा जाने वाले हम लोग नहीं जानते पानी का वो महत्व; जो घर से दूर किसी ताल-पोखर से पानी वाली बूढ़ी माँ जानती है|

क्या यह जरूरी है कि एक बाल्टी पानी से नहाने की जगह दस बाल्टी पानी बाथटब में बर्बाद की जाएँ? यह नहीं कहता में कि आप कभी भी बाथटब का प्रयोग न करें, मगर उसे सीमित किया जा सकता है| ऐसे बहुत से उदहारण हो सकते हैं| नहाना, कपड़ा धोना, हाथ-मूँह धोना, खाना बनाना और खाना-पीना सब काम में पानी की जरूरत है|

जब भी मेहमान आते हैं, तो चाय-पानी पूछना हमारी पहली सांस्कृतिक ज़िम्मेदारी होती है| शायद ही हम कभी आधे ग्लास पानी से उनका स्वागत करते हों| अगर मेहमान पानी को ग्रहण करने से मना कर दें, तो यह मेजबान के अपमान के तौर पर देखा जाता रहा है| इसीलिए आजकल मेहमान पानी की जरूरत न होने पर पहले ही बोल देते हैं| मगर शायद ही मेहमान के सामने लाये गए पानी का कुछ प्रयोग होता हो| यह पानी फैंक दिया जाता है|

आजकल दावतों, सभाओं, समाजों, जलसे, मजलिसों और शादी – ब्याह में पानी की बोतल देने का चलन बढ़ रहा है| अधिकतर मेहमान अपनी जरूरत जितना पानी पीकर बोतल या बचा पानी फैंक देते हैं| अगर यह झूठा पानी न भी फैंका जाए तब भी कोई और उसे नहीं पीयेगा| घरों में भी अक्सर हम पूरा ग्लास पानी लेते हैं| ग्लास में बचा हुआ पानी बर्बाद हो जाता है| पानी की यह सब बर्बादी भी रोकी जा सकती है – save water|

कटिंगपानी #CuttingPaani इसका उपाय हो सकता है| हम भारतीय लोग जरूरत न होने पर पूरी चाय नहीं लेते| कटिंगचाय से हमारा काम चल जाता है| यह उदहारण पानी के लिए भी अजमाया जा सकता है| जब जरूरत न हो तो ग्लास में पूरा पानी लिया ही क्यों जाए? अगर पूरा पानी लिया गया है, तो क्या जरूरत से ज्यादा होने पर उसे किसी और काम में प्रयोग नहीं कर सकते? बचे हुए पानी का प्रयोग बाद में पीने के अलावा भी पौधों को पानी देने, झाड़ू-पोंछा करने, और पालतू जानवरों को पिलाने के लिए किया जा सकता है| हमारे भारतीय परिवारों में झूठा पानी पौधों या पालतू जानवरों को नहीं दिया जाता| इसलिए कोशिश करें कि यह अतिरिक्त पानी झूठा होने से पहले ही अगल निकाल दिया जाए|

आइये पानी बचाने की शपथ लें| अगर आप अभी भी सोच रहे हैं तो यह तीन वीडियो भी देखते चलें|

[i] इस दोहे में पानी का पहला अर्थ सच्चे मोती की चमक, दूसरा मनुष्य की विनम्रता और तीसरा रोटी बनाने के लिए गूंथे गए आटे की लोच से है| उचित चमक, उचित विनम्रता और उचित लोच के बिना इमोटी, मनुष्य और आटे का कोई प्रयोग नहीं है|

होली का संस्कृतितत्त्व

होली को जब भी रंगों का त्यौहार कहा जाता है, हम धर्म की बात नहीं, बल्कि संस्कृति की बात कर रहे होते हैं| होली, जैसा कि नाम से मालूम होता है – बुआ होलिका के दहन और भतीजे प्रहलाद के बच जाने का उत्सव है| यह होली की धार्मिक कथा है| रंगोत्सव के रूप में कृष्ण और राधा की होली का वर्णन अवश्य मिलता है| राधा कृष्ण और गोप-गोपियों की यह होली, धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि उस समय की सांस्कृतिक सूचना और उसके सांस्कृतिक अनुसरण की परंपरा मात्र है| यही कारण है, कृष्ण को गीता के कृष्ण के रूप में देखने वाले भक्त प्रायः मथुरा-वृन्दावन-बरसाना-नंदगाँव के कृष्ण को जानने समझने में विचलित रहते हैं| होली के राधा कृष्ण मानव मात्र के राधा कृष्ण हैं|

आज होली, धार्मिक अनुष्ठान नहीं, जनपरम्परा से मनाया जाने वाला त्यौहार है| जनमानस के लिए होलिकादहन का दिन पञ्चांग में दर्ज प्रविष्ठी मात्र है| त्यौहार का मूल और पूजा का मुख्य दिन होने के बाद भी, न छुट्टी की मांग है, न पूजा का विशेष आग्रह| होलिकादहन दहन का मुहूर्त प्रायः अखबारों की रद्दी का वजन बढ़ाता है| धार्मिक रूप से होली का उप-त्यौहार होने पर भी धूल का दिन बड़ी होली के नाम से सर्वमान्य है| इस बड़ी होली को लेकर ही सारी छुट्टियाँ, सारे तामझाम, कथा किवदंतियां हैं| यह सांस्कृतिक पर्व है, जो तकनीकि रूप से फिलोरा दौज (फाल्गुन शुक्ल द्वितीया से लेकर रंग पंचमी (चैत्र कृष्ण पंचमी) तक जाता है| यदि आप भोजन सम्बन्धी परंपरा पर ध्यान देंगे तो वरक, पापड़, बड़ियाँ, मंगोड़ी, कांजी, बड़े, गोलगप्पे की तैयारियां काफी पहले से शुरू हो जाती हैं|

यह पर्व है, धर्म हाशिये पर है और संस्कृति मुख्यधारा में| यह पर्व है जो आस्तिक नास्तिक हर्ष-उल्लास से मना सकते हैं|

साहित्य के उत्सव

साहित्यक समारोहों के प्रति जनता प्रायः निर्लिप्त भाव रखती रही है| साहित्य समारोह भी प्रायः आलोचकों, समालोचकों, पुरस्कार प्रदाताओं के वो परिपाटी बने रहे जिनमें आम जनता आम की गुठली की तरह निष्प्रयोज्य होती है| अपने इस संभ्रांत रवैये के कारण हाल के वर्षों में साहित्य समारोह हाशिये पर चले गए हैं और उत्सवों, जश्नों और फेस्टिवल ने ले ली है| उत्तर भारत में ठण्ड के आते ही शादियों के साथ साथ साहित्य और सांस्कृतिक उत्सवों का मौसम भी शुरू हो जाता है|

यह उत्सव, भारत के तीज त्योहारों की तरह समाज के हर वर्ग के लिए कुछ न कुछ समेटे रखते हैं| यहाँ साहित्य और उपसाहित्यिक गतिविधियाँ होती हैं| गंभीर साहित्य चर्चा को अक्सर मुख्य पंडाल अलग स्थान मिलता है| जिन समारोह में गंभीर साहित्य मुख्य पंडाल में होता हैं, वहां भीड़ प्रायः वहां नहीं होती| भले ही साहित्यकार इस प्रकार की स्तिथि को साहित्य विरोधी मानते हैं परन्तु भीड़ साहित्य से बहुत दूर नहीं होती| आप भीड़ से हमेशा गंभीर साहित्य से जोड़े हुए नहीं रख सकते| लोकप्रिय पंडाल प्रायः फिल्मकारों, पत्रकारों, से भरे महसूस होते हैं क्योंकि मीडिया में इनकी खबरें देने और पढ़ने वाले बहुत होते हैं| लोकप्रिय पंडाल में गायन, वादन और नृत्य का समां बंधा रहता हैं जिसमें फिल्म भी एक विधा है| नाटकीय प्रस्तुतियां – कथा पाठन, नृत्य नाटिकाएं, आदि होती हैं मगर प्रायः रंगमंच इन उत्सवों का भाग नहीं होता|

मेरी समझ में भोजन संस्कृति को जानने समझने का उचित माध्यम हैं और आजकल अधिकतर उत्सव इस पहलू पर ध्यान दे रहे हैं| सांस्कृतिक पहलू के अलावा भी भोजन दो प्रकार से महत्वपूर्ण हैं, एक तो उत्सव में जुटी हुई भीड़ को उत्सव से दूर न जाने देने के लिए उनका पेट भरे रखना होता है दूसरा लाभ में मामूली सी हिस्सेदारी से उत्सव का खर्च भी कुछ हद तक पूरा जा सकता है| आम जनता के लिए तरह तरह के खाने और जायके तक एक ही स्थान पर पहुँच भी बड़ी बात है|

किताबें किसी भी साहित्य उत्सव का केंद्र होती हैं| जहाँ साहित्य किताबों के बिना बेमानी है| साहित्य उत्सव आम जनता साहित्यिक किताबों से जुड़ने का पुस्तक मेलों के मुकाबले अधिक उचित अवसर प्रदान करते हैं| यहाँ लोग सीधे सीधे किताबों से जुड़ते हैं, उनके बारे में हुई चर्चा से प्रभावित होते हैं और उन्हें साहित्य के परिदृश्य में देख समझ पाते हैं| हाल में साहित्येतर सांस्कृतिक गतिविधियों और भोजन के अलावा साहित्येतर सांस्कृतिक सामिग्री को भी इन उत्सवों में जगह मिलने लगी है| यह बाजार का साहित्य उत्सवों पर अतिक्रमण नहीं है वरन एक दुसरे से लाभ उठाने का प्रयास है|

इन उत्सवों में साहित्यिक संभ्रांतों का स्वांत सुखी वर्चस्व जरूर समाप्त हुआ है, मगर यह समाज के उच्च मध्यवर्ग का अपनी जड़ों से आज भी जुड़े होने का भ्रम कायम करने का माध्यम भी हैं| जश्न – ए अदब और जश्न – ए – रेख्ता जैसे उर्दू भाषी उत्सवों में भीड़ भडाका जनता की भाषा आश्चर्यजनक रूप से अंग्रेजी है| लोग उर्दू के नजाकत और नफासत की बातें उर्दू में नहीं बल्कि बनावटी अमरीकी लहज़े की अंग्रेजी में करते हैं| ग़ालिब का ज़िक्र करते समय उनके शेरोशायरी का ग्लेमर जेहन में उछालें मारता है, की ग़ालिब को लेकर उनकी समझ|

जिस उत्सव में जितने कार्यक्रम समानांतर चलते हों, वह उतना बड़ा उत्सव है| मगर लोगों के जमावड़े को बुलाना, उसे जमाये रखना, जिमाये रखना, और ज़ज्बा बनाये रखना अपने आप में बड़ी बात है|

चा बार, कनॉट प्लेस

परिचित पूछते हैं कि क्या कभी कभी चाय पीने वाले को भी चाय के लिए पसंदीदा जगह ढूढ़नी पड़ती है| मुझे लगता है, चाय बेहतर हो तब ही उसका असली मजा है| चा बार, चाय के लिए दिल्ली में मेरी पसंदीदा जगह में से एक है|

जब मैं पहली बार गया था तब ऑक्सफ़ोर्ड बुक स्टोर और चा बार स्टेटमेंट्स हाउस में हुआ करते थे| उन दिनों सर्विस में गजब की ट्रेडमार्क सुस्ती थी| आपके आर्डर करने के बाद भी वेटर दो चार बार पूछ जाता था कि कितनी और देर बार चाय लानी है| मकसद था आपको वहां बैठ कर आराम से पढ़ने लिखने देना| यह बात इसे चाय पीने वालों के साथ साथ पढ़ाकू और लिख्खाड़ लोगों का बेहद पसंदीदा बनती थी| स्टेटमेंट हाउस से चा बार बंद होने तक मैं लगभग हर महीने वहां गया|  मैंने इसके भारी भरकम मेनू में से बहुत सी चाय पी डालीं थीं – विश्रांति, हिबिस्कस, अश्वगंधा, नीलगिरी, इंडियन हर्बल और न जाने क्या क्या| कुल मिलकर सत्तर –अस्सी चाय तो हैं हीं| सबमें अपना अलग स्वाद है| ट्रक ड्राईवर चाय तो खैर सबसे पहले पी थी, उसका फ़ोटो भी सोशल मीडिया पर डाला था|

चा बार के दोबारा खुलने के बाद मैं पहले ही हफ्ते में यहाँ पहुंचा| नए स्थान पर चा बार और ऑक्सफ़ोर्ड बुक स्टोर दोनों का माहौल पहले से ऊर्जावान था| व्यंजन-सूची पहले से बेहतर प्रतीत होती थी| असल में सेवा पहले के मुकाबले बेहतर थी| शायद अब चा बार को सहायक इकाई की जगह एक लाभ-इकाई के रूप में स्थापित किया गया है| जहाँ पहले चा बार शांत माहौल का पर्याय था अब यहाँ एक ऊष्मा है| लोग मिलने, चाय पीने, बातें करने आते हैं| पुराने ज़माने की तरह, अब शांति से बैठकर आप दो चार पुस्तक पढने के लिए नहीं यहाँ नहीं बैठते| बैठकर पढने का विकल्प ऑक्सफ़ोर्ड बुक स्टोर अब भी देता है| आज कल ऑक्सफ़ोर्ड बुक स्टोर और चा बार सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए जाना जाता है|

चलिए चाय की बात की जाए| शायद यह दिल्ली के किसी और भोजनालय, कैफ़े या बार से अधिक तरह की चाय उपलब्ध करता है| बेहतरीन है कि आपको चाय के बारे में सधे हुए सटीक शब्दों में व्यंजन-सूची से जानकारी मिलती है| व्यंजन सूची काफी बड़ी है और आपको बहुत परिश्रम पड़ता हैं  अपने मन, माहौल, मकसद के मिलान करती चाय पीने के लिए| मसलन अगर आप यहाँ से निकल कर डांस-फ्लोर पर उतरने वाले हैं तो अंतर मौन जैसी गंभीर शांत चाय पीने का कोई अर्थ नहीं| अगर आप गंभीरता से व्यंजन सूची पढ़ते और चाय की चुस्की भरते हैं तब यह अविस्मरणीय अनुभव प्राप्त करते हैं| पुरानी कहावत हैं, पेय बहुत धीरे धीरे घूँट घूँट कर कर गंभीरता से पीना चाहिए| बेहतर चाय का आनंद आपको आपको आनंद प्रदान करता है|

स्थान: चा बार, ऑक्सफ़ोर्ड बुक स्टोर, कनाट प्लेस, नई दिल्ली,

भोजन: मुख्यतः शाकाहारी

खास: चाय,

पांच: साढ़े चार

भारतीय रेलवे जनता खाना

बचपन में जब भी लम्बी दूरी की यात्रा पर जाना होता – पूड़ी, आलू टमाटर की सूखी सब्जी, आम, मिर्च या नीबू का आचार और सलाद के नाम पर हरी मिर्च या प्याज हमेशा साथ होती| पता नहीं क्यों यूँ लगता था कि सफ़र के दौरान इस खाने का स्वाद कुछ अलग ही बढ़ जाता है| प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव के आर्थिक सुधार और छठे वेतन आयोग की सिफ़ारिशें देश में कुछ ख़ुशहाली लायीं और पुरानी ख़ुशियाँ छिनने लगीं| भारतीय रेल की पेंट्री और रेलवे प्लेटफ़ॉर्म का महंगा खाना खरीदने के पैसे लोगों के पास आ गए| कहिये कि संदूक का वजन कम करने के चक्कर में जेब का वजन भी भारी पड़ने लगा और हल्का किया जाने लगा|

भारतीय रेल नेटवर्क में मिलने वाले सभी खानों में स्वाद, मूल्य और उपलब्धता की दृष्टि से अगर किसी खाने का चुनाव करना हो तो जनता खाना उत्तम विकल्प हो सकता है| जिन दिनों मैंने जनता खाने का पैकेट पहली बार खरीदा तब यह सात या दस रुपये का था| आज भी यह पंद्रह या बीस रूपये में आ जाता है| जिन दिनों मैं अलीगढ़ – दिल्ली रोजाना यात्रा करने लगा, उन दिनों मुझे जनता खाने से प्रेम हुआ|  मुझे घर जल्दी छोड़ना होता था, अतः लगभग रोज जनता खाना खरीदता था|

भारतीय रेल का जनता खाना भारतीय खाद्य आदतों का परिचायक है| थोड़ा अच्छी तरह सिकी हुई पुड़ी, मिर्च वाली आलू टमाटर की सूखी सब्जी, मिर्च| पैकेट का आधिकारिक वजन लगभग डेढ़ सौ ग्राम – सात पूड़ी के साथ| साथ में मिलने वाली हरी मिर्च जिस प्रकार इन पैकेट के बाहर झांकती है, उसका भी अलग आकर्षण है| आम बाजारू आलू सब्जी से अलग इसमें तेल बहुत कम है और चूता तो लगभग नहीं ही है| गाढ़ी आलू सब्जी में पानी रिसने का भी प्रश्न नहीं अतः इसके पैकेट को लोग गोद में रखकर कहते खाते हुए भी मिल जायेंगे|

जनता खाना लालू प्रसाद यादव के रेलमंत्री काल की धरोहर है| आप लालू प्रसाद यादव को राजनीतिक और निजी कारणों से नकारने का प्रयास कर सकते हैं, परन्तु उनके समय का कुशल रेल प्रबंधन का बिना शक सराहनीय रहा है| भारतीय रेल में खाना बेचना सरकार के लिए भले ही सरल हो मगर देश भर में इस काम में लगे छोटे विक्रेताओं के लिए परिवार के जीवन – मरण का प्रश्न है| एक विक्रेता एक मिनिट में चार से अधिक ग्राहक को सेवा नहीं दे पाता| एक स्टेशन पर दो मिनिट से कम देर रुकने वाली ट्रेन में जनता खाने के ग्राहक प्रायः कम ही होते हैं| ऐसे में संघर्ष बढ़ जाता है| ट्रेन समय से दो-एक घंटा देर से चल रही हो, पांच मिनिट या अधिक रूकती हो और निम्न मध्यवर्ग की सवारियों का बाहुल्य हो –  यह हर छोटे विक्रेता के जीवन यापन के लिए आवश्यक है| इन आदर्श परिस्तिथियों में एक ट्रेन से एक विक्रेता पांच मिनिट में बीस पैकेट बेचकर चालीस रुपये बनाने की उम्मीद कर सकता है|

एक दिन अचानक मैंने जनता खाना लेना बंद कर दिया| अलीगढ़ जंक्शन के चार नंबर प्लेटफ़ॉर्म पर मगध एक्सप्रेस आना चाहती थी| सिंग्नल और अनाउंसमेंट हो चुका था| एक भूखा पेट वेंडर दो नंबर प्लेटफ़ॉर्म से लाइन पर कूदकर तीन नंबर प्लेटफ़ॉर्म पर जा चढ़ा और चार पांच जनता खाना डिब्बे लाइन पर ठीक वहां जा गिरे जहाँ नहीं गिरने चाहिए थे| ऐसे की किसी दिन को देखकर भारतीय रेलवे को बायो-टॉयलेट का विचार आया होगा| चार डिब्बे को छोड़ने का अर्थ अगले एक घंटे की कमाई गवां देना था| वेंडर वापिस पलटा, गिरे हुए डिब्बे संभाले और भागकर चार नंबर पर रूकती हुई मगध एक्सप्रेस के अनारक्षित डिब्बे के अन्दर गरम खाना – गरम खाना चिल्ला रहा था| भाषण मत दीजिये – अपने नामचीन विदेशी भोजनालय का दो दिन बासा खाना खाते हुए नीचे दिए हुए चित्र को देखिये और लालू प्रसाद के समाजवाद और नरेन्द्र मोदी के पूंजीवाद पर बहस करते रहिए| [i] [ii] [iii] [iv] [v] [vi] [vii]

[i] http://hindi.webdunia.com/national-hindi-news/%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%B2%E0%A4%B5%E0%A5%87-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BE-%E0%A4%8F%E0%A4%95-%E0%A4%B9%E0%A5%80-%E0%A4%B8%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%B9-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%9F-107042100105_1.htm

[ii] https://www.bhaskar.com/news/CHH-RAI-HMU-MAT-latest-raipur-news-042003-2972594-NOR.html

[iii] http://paisa.khabarindiatv.com/article/tag/janta-khana/

[iv] http://www.amarujala.com/uttar-pradesh/ghaziabad/janta-food-eat-carefully

[v] http://naidunia.jagran.com/madhya-pradesh/ratlam-railway-naptoll-janata-khana-1019510

[vi] http://indianexpress.com/article/trending/this-is-serious/dead-lizard-found-in-veg-biryani-on-train-tweeple-hit-out-at-indian-railways-4767682/

[vii] http://www.financialexpress.com/economy/cag-report-calls-railway-food-unfit-for-humans-10-steps-indian-railways-says-it-is-taking-to-ensure-quality/776532/

शिव मिष्ठान भंडार, फ़तेहपुरी, चांदनी चौक

अगर पुरानी दिल्ली में सुबह सुबह बेहतरीन उत्तर भारतीय शाकाहारी नाश्ते का दिल करे तो शिव मिष्ठान भंडार का नाम सबसे पहले जुबान पर आता है| दिल्ली के बाहर आज भी जलेबी और हलवा नाश्ते का हिस्सा है| दूध जलेबी, दही-जलेबी, हलवा-पूड़ी, पोहा जलेबी, यह सब नाश्ते हैं| अगर आपको सुबह सुबह मीठे नाश्ते का मन करे तो भी यह जगह आपके लिए है|

दुकान कई बड़ी ब्रांड वाली दुकानों के साथ है, मगर उनसे ज्यादा भीड़ यहाँ पर है| नाश्ते की ज्यदातर दुकानों से अलग यहाँ बैठने का पूरा इंतजाम है क्योकि यह दिन भर खाने के लिए उपलब्ध है| मगर ध्यान दें, यहाँ का प्रसिद्ध नागौरी-हलवा नाश्ते में खाए जाने की चीज़ है और सुबह बनता है| यह जगह देर तक सोने वाले आलसियों के लिए नहीं है| नागौरी-हलवा सुबह दस बजे तक ख़त्म हो जाता हैं|

नागौरी हलवा में दो अलग अलग चीजें है| पहला नागौरी – यह एक तरह की पूड़ी है| यह साधारण पूड़ी और बेड़मी पूड़ी से एकदम अलग है| इसके साथ है – आलू सब्जी या छोले, जो शायद उन लोगों के लिए है जिन्हें हलवे से पूड़ी खाना गले नहीं उतरता| मगर असली चीज़ है हलवा| नागौरी को आप सब्जी या हलवे, जिस से मन करे खा सकते हैं| मैं सलाह दूंगा, हलवे के साथ जरूर खाएं|

जो लेट लतीफ़ लोग नागौरी-हलवा नहीं खा पाते या नहीं खाना चाहते, उनके लिए बेड़मी पूड़ी सब्जी बेहतरीन है| पूड़ी ठीक से सेंकना अपने आप में एक कला है| यहाँ आपको एकदम सही सिकी पूड़ी मिलती है|  मसाला बहुत हल्का है| इस कारण आलू सब्जी का अपना स्वाद निखर कर आता है| छोले – भठूरे, कचौड़ी, समौसा भी बेतरीन हैं|

जलेबी, इमारती, गुलाब जामुन, सूजी हलवा, मूंग दाल हलवा, और मालपूआ बेहतरीन हैं| गर्मियों में अगर जाएँ तो यहाँ की शानदार लस्सी का स्वाद लेना न भूलें|

सौ से अधिक साल पुरानी इस दुकान में देश के बड़े बड़े लोग अलग अलग समय में आ चुके हैं|

स्थान: शिव मिष्ठान भंडार, फ़तेहपुरी, हौज़ क़ाज़ी, चावड़ी बाज़ार, पुरानी दिल्ली,

भोजन: शाकाहारी

खास: नागौरी-हलवा, पूड़ी-सब्जी,

पांच: साढ़े-चार

सन्नाटा

सन्नाटा शब्द से तो आप परिचित हैं| ध्वनि प्रदुषण के इस युग में सन्नाटा आप को डराता भी  होगा| परन्तु ब्रजमंडल में सन्नाटा अपनी अलग शान रखता है| कोई अच्छी दावत नहीं जो सन्नाटे के बिना पूर्ण हो सके| जड़ों के कटते हुए कुछ लोग जरूर दावतों में अजब गजब सा रायता रखने लगे हैं| परन्तु, हमारे यहाँ नाश्ता तो सन्नाटे के बिना आज भी पूरा नहीं होता| मैंने हाल में अलीगढ़ की कचौड़ी के ऊपर लिखी पोस्ट में सन्नाटे का जिक्र किया है|

सन्नाटा विश्व का पहला ऊर्जाहीन (low calories) प्रोबोइटिक पेय है, जिसमें आपके मस्तिष्क को शून्य स्तिथिप्रज्ञ में पहुँचाने की विकत क्षमता है| बेहतरीन सन्नाटा आपके दिमाग को सुन्न करता हैं, सभी नकारात्मक विचारों को दिन भर के लिए एवं सकारात्मक विचारों को थोड़ी देर के लिए दूर करता है और आँख कान जैसी इन्द्रियों को थोड़ी देर ले लिए अंधकार और असीम शांति में भेज देता है| बेहतरीन सन्नाटा आपको पौष मास की अमावस की गहरी काली रात में घने जंगल में प्राप्त होने वाली अनंत शांति का अहसास कराता है|

महत्वपूर्ण बात यह है कि सन्नाटा प्रोबोइटिक दही से बनता है| भगवान् कृष्ण के ब्रजमंडल में दही और प्रोबोइटिक दही क्या कमी| सन्नाटे की विधि से पहले संक्षेप में प्रोबोइटिक दही की विधि बता देता हूँ|

प्रोबोइटिक दही विधि

अच्छे से उबलाकर ठंडा किया गया गाय का दूध लें| अगर गाय का दूध न हो तो वसा-रहित कोई भी दूध ले लें| पहले सामान्य ढंग के दही जमाने  रख दें| जब दही खट्टा होने लगे तो उसे चार घंटे फ्रिज में रख दे|

यदि आपको सन्नाटा बनना है तो दही को बेहद खट्टा होने दे परन्तु ध्यान दे की ख़राब होने से पहले चार पांच घंटे फ्रिज में रहे|

सन्नाटा विधि

अब अच्छा खट्टा प्रोबोइटिक दही लें| कम से कम चार गुना पानी मिला ले| बेहद अच्छे से उसे चला ले जैसे सामान्य रायता चलाते है| स्वाद-अनुसार आप जितना नमक डालना चाहते हैं उससे बस थोडा सा ही ज्यादा नमक डालें| अब कुटी या पीसी पीला मिर्च (लाल काली नहीं) अपने स्वाद अनुसार डाल लें| फ्रिज में रख दें| ठंडा ठंडा पिए|

नोट –  में बेहद खट्टे मठ्ठे का प्रयोग करते हैं| जिसमें बिलकुल मख्खन न बचा हो|

अगर रायता फैलाना हो, तो नीचे कमेंट लिखकर रायतापसंद होने का सबूत दें|

चिदंबरम’स न्यू मद्रास होटल, खन्ना मार्किट

जब से मैं लोदी रोड इलाके में रहने आया हूँ, यह मेरा पसंदीदा भोजनालय है| दिल्ली शहर के कई बड़े नामी दक्षिण भारतीय भोजनालय, मेरी राय में, स्वाद में इसके मुकाबले नहीं ठहरते| हर महीने मैं एक बार यहाँ से कुछ न कुछ गृह वितरण पर मंगाया जाता है| भोजन घर मंगाने का हमें थोड़ा नुक्सान है| एक तो वेलकम ड्रिंक रसम नहीं मिलता और दूसरा तीन चटनी की जगह एक से काम चलाना पड़ता है|

यहाँ पहुँचते ही आपको गर्मागर्म शानदार रसम पीने के लिए मिलती है| जब तक आपका मुख्य व्यंजन  आये, आप रसम के घूँट भर सकते हैं| रसम पीने से न सिर्फ भूख बढ़ती है, वरन पाचन क्षमता भी बढ़ती है| रक्तचाप वाले रसम न लें, यहाँ रसम में हल्का नमक ज्यादा रहता है| रसम पर भोजन की बात समाप्त क्या, शुरू भी नहीं हुई है| यहाँ सुबह के नाश्ते से रात के भोजन का इंतजाम है|

यहाँ सबसे बेहतरीन दही-बड़ा| यहाँ का दही-बड़ा दिल्ली की किसी भी चाट-पकौड़ी की दुकान से बेहतर है| निश्चित ही बड़ा, उत्तर भारतीय बड़े से भिन्न है| मगर सिर्फ इसलिए की यह बड़ा भिन्न है, मैं इसकी तारीफ नहीं कर रहा हूँ, वरन इसका स्वाद लाजबाब है| यहाँ की एकमात्र मिठाई केसरी-बात (सूज़ी-हलवा) बेहतरीन है| यहाँ केसरी-बात दिल्ली या उत्तर भारत में मिलने वाले सूजी-हलवे से थोड़ा अलग तरीके से बनता है| यहाँ नाश्ते में पोंगल मेरा प्रिय है| मसाला इडली का स्वाद भी बेहतर है|

खाने की बात करें तो रवा डोसा, मैसूर डोसा मसाला, नीलगिरी उत्तप्पम पसंद आते हैं| यहाँ आकर कहने वालों के लिए तीन तरह की चटनी है – नारियल, टमाटर और कड़ी-पत्ता| लेकिन आपको यहाँ मिलता है एक और पकवान – रागी डोसा, जो गर्म-गर्म खाने में आपको अलग और शानदार स्वाद देता है| रागी दक्षिण भारत में उगने वाला पोष्टिक अन्न है| रागी डोसा ठंडा होने पर उतना अच्छा नहीं लगता, इसलिए गप्पे मारते हुए खाने के लिए नहीं है| चिदंबरम रवा स्पेशल मसाला डोसा स्वाद पसंद लोगों के लिए है| यहाँ घर पर कुछ भी नहीं मंगाया जा सकता, कुछ चीजें यहाँ आकर ही खानी होतीं है|

यहाँ की थाली एक बार जरूर खानी चाहिए| दो सब्जी, चावल, निम्बू चावल, सांभर, रसम, दो पूड़ी, दही, केसरी-बात, पापड़, आचार के साथ यह कई लोगों के लिए खुराक से अधिक हो जाती है| मगर इसकी खास बात है, दक्षिण भारतीय तरीके से बनीं सब्जियां| थ्री –इन –वन डोसा और उत्तपम भी पसंद किये जाते हैं|

सन 1930 में दक्षिण भारतीय सरकारी अधिकारीयों को ध्यान में रख कर खोला गया यह भोजनालय 1950 से इस स्थान पर है| यह नई दिल्ली के सरकारी कार्यालयों में बहुत लोकप्रिय है| इस भोजनालय के बाहर दक्षिण भारतीय नमकीन भी मिलता है| जो निश्चित ही उत्तर भारतीय नमकीन से अलग स्वाद देता है|

स्थान: चिदंबरम’स न्यू मद्रास होटल, खन्ना मार्किट, लोदी रोड, नई दिल्ली,
भोजन: शाकाहारी
खास: दही-बड़ा, डोसा, पोंगल, रागी डोसा,
पांच: चार

शिब्बो की कचौड़ी, अलीगढ़

शिब्बो ने आठ साल की उम्र में सन 1951 में कचौड़ी बेचना शुरू किया – आज से छियासठ साल पहले| उनके बेटे ने रणजी खेला, उनका पौत्र ऑफलाइन-ऑनलाइन कचौड़ी बेचता है| दुकान का नाम जय शिव कचौड़ी भण्डार और वेबसाइट का नाम शिब्बोजी है| होते रहिये| हम अलीगढ़ वालों के लिए वो शिब्बो और उनकी दुकान की गद्दी पर बैठने वाला हर व्यक्ति शिब्बो|

शिब्बो – अलीगढ़ी कचौड़ी की पहचान है| अलीगढ़ी कचौड़ी आम कचौड़ी की तरह मुलायम और फूली हुई नहीं होती, वरन कड़क, भुरभुरी और चपटी होती हैं| अधिकतर इनके गोलाकार में भी कमी निकाली जा सकती है| अलीगढ़ वाले इतने सख्त आटे से कचौड़ी बनाते हैं कि इसका गोल होना मुश्किल और कटा-फटा होना आसान है| कचौड़ी के अन्दर कचौड़ी का मसाला इतना कम कि कई बार मालूम भी नहीं पड़ता| अलीगढ़ में अधिकतर कचौड़ी वाले आटे में ही मसाला मिला देते हैं| लेकिन शिब्बो का अपना अलग मानक है| आम अलीगढ़ी कचौड़ी से यह थोड़ा अलग और बेहतरीन है|

शिब्बो की कचौड़ी की महत्वपूर्ण बात है – देशी घी, कड़क कचौड़ी की भुरभुरी पपड़ी और चपटापन|

आम अलीगढ़ी कचौड़ी की तरह शिब्बो की कचौड़ी भी आलू की मसालेदार सब्जी के साथ मिलती है| लोहे की कढ़ाही में हींग और तेज गरम मसाले में बनी सब्जी अपनी श्यामल रंगत और तीखे स्वाद से अलग पहचान रखती है| इसे हम कचौड़ी वाली सब्जी कहते हैं| यह सब्जी आम आलू सब्जी की तरह पतली या रसेदार नहीं होती| यह काफी गाढ़ी होती है| कई बार लोग इसमें रस बनाने के लिए सन्नाटा (अलीगढ़ी रायता) मिलाते हैं| सब्जी और सन्नाटे के मिश्रण स्वाद को और अलग ऊँचाई पर पहुंचा देता है| सभी बड़ी कचौड़ी वालों की तरह शिब्बो के यहाँ भी हल्के और तेज मसाले की सब्जी मौजूद है| हल्के मसाले का अर्थ यह नहीं की सब्जी पूरी तरह हल्की हो जाए| भाई अपनी मसालेदार इज्जत का ध्यान पूरा रखा जाता है|

कचौड़ी- सब्जी के साथ में है – सन्नाटा| सन्नाटा – यानि बहुत खट्टे दही का पतला रायता| इसकी शोभा है पीला मिर्च| यदाकदा बूंदी भी मिलाई जाती है| जितना ज्यादा खट्टा दही और जितना ज्यादा पतला सन्नाटा हो, उतना ही स्वाद आता है| बेहतरीन रायते को पीकर आपके कान भले ही लाल पीले हों, मगर हम इसे सुपाच्य मानते हैं| और मिर्च को छोड़ दें तो यह है भी सुपाच्य, मगर मिर्च न होने पर दही के बर्तन की इस धोवन को कौन पीना चाहेगा?

अलीगढ़ी कचौड़ी अलीगढ़ में हर मोड़ पर मिल जाती है| मगर शिब्बो की बात अलग है| शिब्बो की दुकान अब पहले से ज्यादा बड़ी हो गई है| बैठकर खाने का प्रबंध हुआ है| पूड़ी सब्जी, लड्डू, हलवा और जलेबी भी बेहद स्वादिष्ट मिलती है|

स्थान: शिब्बो की कचौड़ी, जय शिव कचौड़ी भण्डार, बड़ा बाजार, अलीगढ़

भोजन: शाकाहारी

खास: अलीगढ़ी कचौड़ी, आलू सब्जी, सन्नाटा, जलेबी,

पांच: साढ़े चार

खौलते हुए बुलबुले

कचनार से कच्चे और कमसिन

नाजुक से कच्चे कोयले की

धीमे धीमे दहकती हुई

भुनी सुर्ख पंच्तात्त्विय अग्नि पर

होलिका सी डरी सहमी सिमटी

सिकुड़ी से बैठी हुई उस शर्मीली

सिल्बर[1] की सुन्दर सुडौल भगौनी

में नरक के कडुए काले कड़ाहों

में तपते हुए बसंत के भरमाये

घमंडी कडुए तेल[2] की मानिंद

खौलते हुए उस शुद्ध पंच्तात्त्विय

उपचारित निर्मल निर्लज्ज जल[3]

में जबरन जबरदस्त उबलते हुए

उस मासूम हल्के मुलायम निमिषवय

वायु के बुलबुले को देखा है कभी|

 

वो उबला हुआ बुलबुला

एक पल में हवा हुआ जाता है

और छोड़ जाता है अपने पीछे

हजारों मासूम कुलबुलाती सी

किल्लेदार ख्वाहिशे के

निमिषवय बुलबुले और

उन निमिषवय बुलबुलों की

हजारो कुबुलाती ख्वाहिशें

उबलते बुलबुलों की मानिंद

जिनमें मैंने डालें हैं रंगत के

दाने आसाम के चायबागानों

चुनवाकर से मंगवाए हुए|

 

मैं उन उबलती हुई हजारों करोड़ों

मासूम कुलबुलाती सी किल्लेदार

ख्वाहिशों का ख़ुदा हूँ खराब जो

इक ख़ूबसूरत रात के बाद की

अलसाई सुरमई सुबह से पहले

ब्रह्ममुहूर्त में खौलते पानी में

उबलते ख्वाहिशमंद बुलबुलों पर

धीर वीर क्षीर समंदर के बनाये

निहायत नमकीन नमक के

सोंधे स्वाद को छिड़कता हूँ|

 

मैं खौलते पानी में उबलते हुए

उन निमिषवय बुलबुलों की

उस तड़पती हुई कराह पर

आह कर उठता हूँ अक्सर

और बुरक देता हूँ चुटकीभर

मीठी शिरीन शक्कर के

घनाकार वजनी दमदार दाने|

 

वो खौलते हुए बुलबुले

हिन्दुस्तान के आमजनता

की मानिंद चुप हो जाते हैं

मीठी शीरीन शक्कर के

धोखे में उन्हें अहसास नहीं होता

वो अब भी खौलते पानी में

गर्मागर्म उबाले जा रहे हैं|

 

और उनके उबलते हुए कंटीले

नाजुक घावों से रिसते हुए दर्द

पर करहाते हुए नीबू के रस की

दो चार अम्लीय बूंदे छोड़ देता हूँ|

 

वो मासूम सावन की बरसात की

हरियल यादों में सहम जाते हैं

वो जानते हैं अब कुछ न होगा

मगर मिनमिनाने लगते हैं

मिन्नतें मजाकिया मजेदार|

 

मैं मजाहिया मुस्कान के साथ

उतार लेता हूँ उस नामुराद

होलिका सी डरी सहमी सिमटी

सिकुड़ी से बैठी हुई उस शर्मीली

सिल्बर की सुन्दर सुडौल भगौनी

जो पलभर में तपती आग में

भुनकर सुरमई हुई जाती है|

 

खुर्जा से खरीद हुई उस

संगमरमरी चीनी मिट्टी के

रंगदार सजावटी सुन्दर शाही

चाय की प्याली में उड़ेली हुई

उस खौलती चाय को सुड़ककर

पीते हुए सोचता हूँ क्यों न

नामुराद भाई ऐश अलीगढ़ी

दिल्ली के पीर ख्वाजा की

दरगाह के बाहर चौराहे पर

नीली छतरी वाले गुम्बद के

छोटे चारबाग़ में बैठकर

मकबरा हुंमायूं को देखते हुए

खुद अपनी मल्लिका मोहब्बत

की उस रोहानी याद में एक

रोमानी सी गजल की जाए|

 

[1] हंडोलियम को देहात सिल्बर कहते हैं इसमें सिल्वर से धोखा न खाएं|

[2] सरसों का तेल

[3] आपका प्यारा आरओ वाटर

अशोक चाट भंडार, चावड़ी बाज़ार

मैं अक्सर चावड़ी बाज़ार मेट्रो स्टेशन के गेट नंबर ३ का प्रयोग नहीं करता| वरना सौ की पत्ती का खर्चा पक्का है| फिर भी यह बात अलग है कि मैं जब भी चावड़ी बाज़ार जाता हूँ तो यहाँ अक्सर पहुँच ही जाता हूँ| यह हौज़ काज़ी चौक है और यहीं है अशोक चाट भंडार|

मेरा यहाँ से भावनात्मक लगाव है| दर-असल मेरे नानाजी चाट पकौड़ी के इतने शौक़ीन थे कि खुद से बनाना सीखा था उन्होंने| उनके हाथ का बनाया कलमी-बड़ा मैंने एक ही बार खाया था बचपन में कभी, आज तक वो बेहतरीन कलमी बड़ा भुलाये नहीं भूला| तो अशोक चाट भंडार की ख़ासियत यह है कि कलमी – बड़ा बनाने वाली इस से बेहतर दुकान, या कहिये इस के अलावा कोई और दुकान मैं नहीं जानता| वैसे हिन्दू अख़बार में इस दुकान से बेहतर दुकान बताने के लिए सालों पहले एक पूरी कथा छापी थी| खाने वाले दोनों जगह खाकर बहस को जिन्दा रखे हुए हैं| उस दूसरी दुकान के बारे में बात फिर कभी|

यहाँ का मेनू कोई बहुत बड़ा नहीं है, चाट-पकौड़ी की दुकानों का होता भी नहीं| मगर यहाँ स्वाद खास है और चाट तो स्वाद पर ही बिकती है| यहाँ खास बात है भारत की देशी रतालू यहाँ चाट में प्रयोग होता है| विदेश से आया आलू तो खैर है ही|

मेरी पहली पसंदीदा चाट है यहाँ – कलमी-बड़ा| यह दरदरी पीसी गई चना दाल से बनता है और इसीलिए इसे बनाना कठिन काम है| सका अपना कुरकुरा स्वाद मुंह में घुलता हुआ इसे हर-दिल-अज़ीज़ बनता है| बेहतरीन दही, अध्-उबले रतालू और हलके मसाले इसे यादगार स्वाद देते हैं| मैं आपको सलाह दूंगा, अपनी पसंद से दही- चटनी कम ज्यादा कराने की जगह दुकानदार पर छोड़ दीजिये| उसे हमसे बेहतर पता है|

इसके बाद कचौड़ी चाट का मजा लिया जा सकता है| ऐसा नहीं कि यहाँ कचौड़ी सामान्य कचौड़ी से अलग है, अलग है उसका परोसना| सब जगह कचौड़ी सब्जी या चटनी के साथ मिलती है और प्रायः नाश्ते का अहसास देती हैं| बाकि जगह से अलग यहाँ कचौड़ी नाश्ता नहीं वरन चाट है और दही, चटनी, मसाले के साथ मिलती है|

और हम हिन्दुस्तानियों की सबसे बड़ी साझा कमजोरियों में से एक यहाँ है – गोल-गप्पा, जिसके पानी पर दुनिया का हर पानी – पानी भरता है| यहाँ गोलगप्पे का पानी काफी मसालेदार है और आपकी हिन्दुस्तानी जीभ के लिए यह पूरी तरह सकूं देने वाला है|

आते रहेंगे इस सत्तर साल पुरानी दुकान में|

स्थान: अशोक चाट भंडार, हौज़ क़ाज़ी, चावड़ी बाज़ार, पुरानी दिल्ली,

भोजन: शाकाहारी

खास: कलमी-बड़ा, कचौड़ी चाट, गोल-गप्पे,

पांच: पांच

गोविंदा का छप्पन भोग

प्राचीन भारत में व्यवसायी धार्मिक हुआ करते थे आजकल धर्म व्यवसायिक हो गए हैं| लम्बे समय से कुछ धर्म-सम्प्रदाय मात्र अपने अनुयायियों के लिए उत्पाद बनाते और बेचते रहे हैं| इससे इनके आश्रम, मठ, मंदिर, मस्जिद के खर्चे निकल जाते थे| महंगे प्रसाद और ऊँचे चंदे देने के बाद मिलने वाले भोजन पर चर्चा करना अब बेमानी लगने लगा है| आज कुछ मठाधीश, यहाँ तक कि सन्यासी, बाक़ायदा व्यवसायों के निदेशक मंडलों में हैं या उन्हें बाहर नियंत्रित कर रहे हैं|

गोविंदा की थाली, छप्पन भोग आदि के बारे में सुनकर भी यही सब विचार आए| गोविंदा, हिन्दू वैष्णव कृष्ण भक्ति धारा के इस्कॉन संगठन (अंतर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ) द्वारा संचालित भोजनालय श्रृंखला है| यह भोजनालय और इसके सहायक जलपानगृह और मिष्ठान भंडार प्रायः इनके मंदिर प्रांगण में होते हैं| दिल्ली स्तिथ इस्कॉन मंदिर में हर माह के अंतिम रविवार छप्पन भोजन उत्सव का आयोजन होता है|

आज भारतीय भोजन में लगातार प्याज लहसुन का प्रयोग बढ़ रहा है| पिछली पीढ़ी तक जिन परिवारों में प्याज लहसुन प्रयोग होता था उनको आज बिना प्याज लहसुन के खाना बनाना पहेली लगता है| (कहावत है, नया मुल्ला प्याज ज्यादा खाता है|) दिल्ली में तो खैर पंजाबी, मुगलाई, ईरानी, और कायस्थ खाने का जबरदस्त प्रभाव है| ऐसे में यह गोविंदा भोजनालय बिना प्याज लहसुन के बने राजसिक भोजन का बढ़िया विकल्प है|

इस अप्रेल महीन के अंतिम रविवार मैंने छप्पन भोग का भोग लगाने का इरादा किया| मन मैं भावना थी, प्रसाद के छप्पन प्रकार के भोजन मिलेंगे| यहाँ की व्यंजन सूची में लगभग वही सब व्यंजन है जिन्हें आप दिल्ली में किसी भी सामान्यतः अच्छे भोजनालय में पाएंगे|

छप्पन भोज के दिन यहाँ बुफे है| पहुँचने पर सबसे पहले स्नेक्स लेने का आग्रह हुआ पकौड़ा, कचौड़ी- आलू सब्जी, पाव-भाजी, पापड़ी चाट, गोलगप्पे| बाद में कई सलाद, दक्षिण भारतीय, उत्तर भारतीय, चाइनीज भोजन  और मिठाइयाँ| मसालों का संतुलित से थोड़ा ही अधिक प्रयोग बाजार में मिलने वाले आम पकवानों से थोड़ा हल्का बनाता है| इसमें कोई शक नहीं कि भोजन मांस मछली प्याज लहसुन से मुक्त होने के कारण तामसिक नहीं है| आलू, जैसे कंद की उपस्तिथि के कारण इसे जैन भोजन भी नहीं कहा जा सकता| मसालों की व्यापकता के कारण सात्विकता के पैमाने पर खरा नहीं उतरता, शुद्ध भारतीय राजसिक भोजन|

बुफे सिस्टम में पकवानों के अधिक विकल्प हमेशा आपको ललचाते हैं| नियंत्रण रखना अपने आप में योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः का भाव उत्त्पन्न करता है|

स्थान: गोविंदा भोजनालय, इस्कान मंदिर, दिल्ली,

भोजन: शाकाहारी

खास: छप्पनभोग

पांच: साढ़े तीन

ऊर्जावान भोजन

भोजन भी विचित्र है| पृथ्वी पर प्रचुर भोजन होने के बाद भी एक तिहाई विश्व भोजन के अल्पता और एक तिहाई भोजन की अधिकता के बीमार और मृत होते हैं| न जाने क्यों? अति सर्वदा वर्जित ही है| भोजन के सन्दर्भ में किसी प्रकार भी अति इसे विष बनाती है|

भोजन वाली भूख तीन प्रकार की होती है –

  1. पेट द्वारा भोजन ग्रहण करने की भूख,
  2. ज्ञानेन्द्रियों द्वारा रसास्वादन की भूख, और
  3. अहम् द्वारा करते रहने की भूख|

मुझे लगता है, यह जितने अखाड़े, जिम, योग केंद्र मोटापा कम कराने के लिए खुलें हैं, यह मुख्यतः अहम् के भूखों और अल्पतः ज्ञानेन्द्रिय के भूखों के लिए खुले हैं| इनके चलते, विश्व भर के किसी भी भोजनालय और भोजन से मुझे कोई कष्ट नहीं|

पेट कितना कितना ग्रहण करता है? गणना के अनुसार औसतन 280 ग्राम – लगभग छप्पन ग्रास| शायद छप्पन भोग का अभिप्राय भी यही हो| संभव है, भक्त अपने आराध्य को हर ग्रास में अलग अलग प्रकार के स्वाद, अलग रस अलग पकवान का भोग लगाने की इच्छा रखते हों| यह थोडा कम ज्यादा हो सकता है| आजकल कैलोरी नापकर खाने का चलन है| ऊर्जा-हीन और ओजहीन खाने में संसाधन की बर्बादी होती है| क्यों न आवश्यकता की सीमा में रहकर ऊर्जावान ओजवान भोजन करें और संसाधन बचाएं| कुछ लोग चाट-पकौड़ी (street-food) तो कुछ देश विदेश या कुछ सात्विक – तामसिक, शाकाहार-मांसाहार और कैलोरी के चक्कर में पड़े रहते है| मेरा मानना है प्रथमतः भोजन हर रस, हर स्वाद से युक्त और ऊर्जावान होना चाहिए और दूसरा आवश्यकता से अधिक नहीं| यह स्वतः अनुभूत कह रहा हूँ| भारतीय धार्मिक परंपरा में छप्पन भोग का विचार यह दर्शाने के सफल है कि अल्प मात्रा में भोजन भी ज्ञानेन्द्रियों को, रसना को, जिव्हा को तृप्त कर सकता है|

अब रहा अहम्, अहम् की संतुष्टि नहीं हो सकती| मैं ऐसे दैत्यों को जानता हूँ पैसा वसूल करने के लिए खाते हैं, खाने को पचाने के लिए दवा खाते हैं और पचाए हुए को जलाने के लिए कसरत-मशक्कत करते हैं| यह लोग अगर आवश्यकता की सीमा में खाएं तो भोजन सामिग्री के साथ साथ समय का सदुपयोग कर पायें| भोजन की आवश्यकता न होने पर ऊर्जाहीन भोजन ग्रहण करना भी अनुचित है|

2017 05 26 दे० हिंदुस्तान

दे० हिंदुस्तान में यह पोस्ट – २६ मई २०१७

देनिक हिंदुस्तान में यह पोस्ट यहाँ छपा है|

कतीर (गोंद कतीर)

गर्मियों के प्रमुख देशी खाद्यों में से एक है कतीर या गोंद कतीर| इसके नाम में गोंद शब्द आने से हिंदी कम समझने वाले हिन्दीभाषी भी इसे चिपचिपी चीज समझ लेते हैं| ऐसा नहीं है| दरअसल गोंद शब्द किसी भी रेसिन (resin) के लिए प्रयोग होता है न कि किसी चिपकने वाले पदार्थ के लिए| यह पश्चिम भारत में पाए जाने वाले पेड़ कतीर (Moronobea coccinea) से प्राप्त होता है|

गाँव देहात और छोटे शहरों के पुराने घरों में इसका प्रयोग आज भी आम है| हमारे घर में यह हर गर्मी में होता रहा है| यह हलके पीले धूसर रंग के दानों/ टुकड़ों में बाजार में मिलता है| हमारे अलीगढ़ में यह सभी पुराने पंसारियों के यहाँ मिल जाता है| बल्कि कई बार तो पंसारी पुराने ग्राहकों को खुद ही बाँध देते थे| पता था कि सही चीज दी है तो पैसे तो आ ही जायेंगे| आजकल अपने अंग्रेजी नाम से यह ऑनलाइन शोपिंग में मिल जाता है|

एक चम्मच कतीर (एक मोटा दाना/टुकड़ा) को एक ग्लास पानी में डालने के बाद रात भर रख दिया जाता| अगले दिन सुबह तक यह फूल कर दानेदार जैली में बदल जाता| ज्यादा पानी में डालने पर यह लगभग घुल जाता है और केवल पीने के काम आ पाता है| इसलिए पानी तो ठीक रखा जाना चाहिए| इसकी दानेदार जैली में शरबत, मीठा, रबड़ी, आइसक्रीम, कुल्फ़ी, ठन्डे दूध, पतली ठंडी खीर आदि डालकर खा लिया जाता| घरों में हम बच्चे इसे बेहतर स्वाद और रंग पाने के लिए तरह तरह के शर्बतों के डाल कर रख देते थे| आजकल इसे बच्चों को जैली कहकर दे सकते हैं|

मैंने इसमें अधिकतर चीनी और शरबत के साथ ही मिलाया है| परन्तु वैद्य इसे मिश्री के साथ प्रयोग करने की सलाह देते हैं| इसे आइसक्रीम और रबड़ी के साथ भी खाया जा सकता है| यह प्रोटीन और फोलिक एसिड का प्रमुख स्रोत है|

इसकी तासीर ठंडी मानी जाती है| यह आपको गर्मी के प्रकोप से बचाता है| थकान, कमजोरी, गर्मी की वजह से चक्कर आना, उल्टी और माइग्रेन में कतीर काफी फायदेमंद होता है| ठन्डे मौसम में वैद्य इसके प्रयोग को उचित नहीं मानते| इसे मैंने ध्यान योग के दौरान होने वाली गर्मी और खुश्की के लिए भी प्रयोग करते हैं|

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गोंद कतीर

फ़ोटो क्रेडिट – किरण साव्हने

 

 

काके – दी- हट्टी, फ़तेहपुरी

काके – दी – हट्टी को जब आप बाहर से देखते हैं तो समझ नहीं आता कि आखिर क्यों इस साधारण से स्थान का नाम हर दिल्ली की हर ट्रेवल गाइड और फ़ूड गाइड में है| दुकान पुरानी सी है और लगता है कि अपने स्थापना सन १९४२ में भी इसमें बैठने की खास जगह नहीं रही होगी| इसमें बैठने की जगह हो न हो, यह जगह खास तो है और हर खाने वाले के दिल्ली दिल में खास जगह बना लेती है| पहली बार जब गया तो अजीब से सवाल से उमड़ रहे थे| पुराने दुकान की पुरानी डाट की छत से लटके पुराने पंखे, पुराने तंदूर से निकलती नान की महक, आप की साँसों से होते हुए पेट में पुकारने लगती है|

आप मेनू देखते है तो धुआंधार शब्द बार बार दिखता है – धुआंधार नान, धुआंधार लच्छा परांठा, धुआंधार पनीर मख्खन मसाला| यूँ है तो यह लज़ीज, मगर आपको चेतावनी देता हूँ – न खाएं| अगर खाते हैं तो छोड़ नहीं पाएंगे और हफ्तेभर तन-मन-धन से याद करेंगें|

यह परिवार और दोस्ती में प्रेम बढ़ाने वाला भोजनालय है – यहाँ एक नान में से “हम दो – हमारे दो” खा लेते हैं, कोई मनाही नहीं| आप पहले एक नान मंगा लें, लुफ्त उठायें और बाद में जरूरत के मुताबिक दूसरा – तीसरा मंगा सकते हैं| जब आप यहाँ कोई भारी-भरकम आर्डर देते हैं तो वेटर बेहद शीघ्र-शांत सलीके से आपको ये सलाह देंगें|

मेरे बेटे को यहाँ की लस्सी और रायता पसंद है, साथ में आलू प्याज  नान| उसके लिए यहाँ कुछ और मंगाने का मतलब नहीं| मैं यहाँ के नान का मुलाज़िम हुआ जाता हूँ, किसी सब्जी- दाल की न पूछिए|

दाल और सब्जी ज्यादातर कम मसालेदार और उम्दा हैं, मगर नान का ज़ायका आपके दिल में जो घर करता है, तो बाकि चीज़ो के लिए जगह नहीं| अमृतसरी थाली भी बहुत पसंद की जाती है| यह शाकाहारी भोजनालय है, जिसके पुराने बोर्ड पर “शुद्ध वैष्णव” लिखा हुआ है| अलबत्ता, प्याज लहसुन मिल जाता है| सलाद में बिना मांगे ढेर से प्याज मिलती है|

यह जगह है, पुरानी दिल्ली की फ़तेहपुरी मस्जिद के पास| आप खारी बावली से बेहद उम्दा मेवे – मखानों की ख़रीददारी करने के बाद यहाँ आयें| आप दुकान में बाहर ढेर ग्राहक खड़े पाएंगे और दो बड़े तंदूर| परिवार वाले ग्राहक दूसरी मंजिल (first floor) पर बिठाये जाते हैं और उनके लिए अलग तंदूर वहां लगा है| तीनों तंदूर पर लगातार काम होता रहता है|

स्थान: काले – दी – हट्टी, निकट फ़तेहपुरी, चांदनी चौक, पुरानी दिल्ली,

भोजन: शाकाहारी

खास: नान, धुआंधार नान,

पांच: साढ़े चार

अवैध चाय

अवैध चाय – हंसने का मन करता है न? अवैध चाय!!

सच्चाई यह है कि भारत में हर कार्यालय, विद्यालय, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय, गली, कूचे, मार्ग, महामार्ग, हाट, बाजार, सिनेमाघर और माल में अवैध चाय मिलती है| अवैध चाय का अवैध धंधा पिछले पांच-छः साल से धड़ल्ले से चल रहा है| पिछले पांच-छः साल क्यों?

क्यों पिछले पाँच-छः साल से सरकार ने हर खाने पीने की चीज़ बेचने के लिए एक पंजीकरण जरूरी कर दिया है| कुछ मामलों में पंजीकरण नहीं, बल्कि अनुमति-पत्र (लाइसेंस) जरूरी है| बिना पंजीकरण या अनुमति-पत्र के बनाये गए पेय और खाने को अवैध कहा जायेगा| वैसे दवाइयों के मामलें में इस तरह की दवाओं को सामान्यतः नकली कहा जाता है| आपके खाने को फिलहाल नकली नहीं कहा जा रहा|

मामला इतना संगीन हैं कि आपके ऑफिस में लगी चाय-कॉफ़ी की मशीन भी “शायद” अवैध है| अगर आप पुरानी दिल्ली/लखनऊ/हैदराबाद/कोई भी और शहर के किसी पुराने प्रसिद्ध भोजनालय में खाना खाते हैं तो हो सकता हैं, आप अवैध खाना खा रहे हैं|

मामला यहाँ तक नहीं रुकता| क्योंकि हिन्दुस्तानी होने के नाते आप दावत तो हर साल करते ही हैं| नहीं जनाब, मैं दारू पार्टी की बात नहीं कर रहा, जिसके अवैध होने का हर पार्टी-बाज दारूबाज को पता है| मैं बात कर रहा हूँ, शुद्ध सात्विक भोज/दावतों की, जिन्हें आप विवाह-भोज और ब्रह्म-भोज कहते हैं| आप जो पुरानी जान पहचान वाला खानदानी हलवाई पकड़ लाते हैं खाना बनाने के लिए, वो अवैध है|

यह वो कानून नहीं है, जिसके चलते देश के ७४ बड़े बूचडखाने गाय का मांस विदेश में बेचकर देश के लिए जरूरी विदेशी मुद्रा लाते हैं|

तो, अब ये कौन सा कानून है? यह वही क़ानून हैं जिसमें भारी-भरकम कंपनी की विलायती सिवईयां यानि नूडल बंद होने पर देश के हर चाय-पान वाले ने तालियाँ बजायीं थीं| यह वह क़ानून हैं जिसकी असली नकली मुहर (संख्या) खाना-पीना बनाने के सब सामान के पैकेट से लेकर डिब्बाबंद चाय-कॉफ़ी-टॉफ़ी-बिस्कुट-पिज़्ज़ा-बर्गर पर लगी होती है| यह वही कानून हैं, जिसकी मुहर (संख्या) बड़े बड़े होटल और भोजनालय के बिल पर पाई जाती है| यह वही क़ानून हैं, जिस में पंजीकरण न होने के कारण छोटे मोटे बूचडखाने जो देश की जनता के लिये मांस पैदा करते हैं, वो बंद किये जा रहे हैं|

आज बूचड़खाने बंद होंगे, कल सलाद की दूकान| और जब चाय-पान की दुकान बंद होगी तो आप सोचेंगें.. रहने दीजिये, कुछ नहीं सोचेंगें|

गौमांस के विरोध के चलते, देश का सारा मांस बंद हो रहा हैं, कल रबड़ी-फलूदा बंद हो जाए तो क्या दिक्कत है|

इस पोस्ट का मकसद हंगामा खड़ा करना नहीं है| देश के हर छोटे बड़े व्यवसायी के पास मौका है कि अपनी दूकान, होटल, रेस्टोरंट, ढाबा, ठेल, तख़्त, या चूल्हे का स्थाई पता और अपना पहचान पत्र देकर अपना पंजीकरण कराये| इस से आगे मैं क्या सलाह दे सकता हूँ? आप समझदार हैं|

टिपण्णी – इस आलेख में कही गई बातें कानूनी सलाह या निष्कर्ष नहीं हैं वरन हल्के फुल्के ढ़ंग से बेहद जटिल क़ानून समझाने का प्रयास है| कृपया, उचित कानूनी सलाह अवश्य लें|

ख्वाब स्वादिष्ट घुमक्कड़ी के…

हर किसी के सपने एक जैसे नहीं होते| हर किसी की अलग दुनिया, अलग जन्नत होती है| पहले को पुरानी पथरीली इमारतों में जन्नत दिखती है तो दूसरे को कश्मीर की वादियों में, तीसरे को पुड्डुचेरी के समुद्रतट पर, चौथे को जेसलमेर के रेट के टीलों में, पांचवे को अलीगढ़ के गिलहराज (हनुमानजी) मंदिर की आरती में, छठे को पंचसितारा होटल के आलिशान स्नानागार में, सातवें को कुचिपुड़ी नृत्य की भाव-भंगिमाओं में, आठवें को लावणी गायन में तो नवें को गोलगप्पे के पानी में…

जी हाँ, वो नवां मैं हूँ, जिसे गोलगप्पे के पानी में जन्नत दिखती है, जिसे छोटी छोटी बातों में जन्नत दिखती है.. छोटी छोटी खुशियों में जीवन दिखता है, छोटे छोटे दोहों में महाकाव्य  दिखते हैं| | मुझे जन्नत दिखती है.. छोटे पुराने शहरों में मौजूद खाने पीने की छोटी दुकान में, जंगलों में ताड़ी पीकर गाये जाते भील – भिलाला लोकगीत में, नहर किनारे की ठण्डी हवा में, पिलखुन की घनी छाँव में, साइकिल से पुराने शहर की सड़क छानने में|

भारतीय संस्कृति करोड़ों जीवंत संस्कृतियों का समुच्चय, समन्वय और संगति है| अगर आप बड़े की तलाश में दिल्ली का लालकिला, गोवा के समुद्रतट, संजीव कपूर का खाना, एवरेस्ट की चोटियों में ही जन्नत ढूंढते हैं तो आप गलत शायद न हो मगर आप आधारभूत संस्कृति को नजरअंदाज कर देते हैं जो आपके आसपास हर गली नुक्कड़ पर बिखरी पड़ी है|

बिना शक गोलगप्पे इस देश की साँझा संस्कृति हैं मगर गोलगप्पे का पानी या उसमें प्रयोग होने वाली “भरत” देश की साँझा संस्कृति नहीं है| देश के हर शहर के गोलगप्पे अलग स्वाद रखते हैं| गोलगप्पे में अलग अलग तरह की भरत प्रयोग होती है|

महानगरों के लोग सूजी के गोलगप्पे पसंद करते हैं तो सामान्य शहरों में आटे के गोलगप्पे पसंद किये जाते हैं| अलीराजपुर में एक भील ने मुझे मैदा के गोलगप्पे खिलाये| अलीगढ़ में आपको होली के आसपास हरे रंग में आटे और सूजी के गोलगप्पे मिलेंगे, जिनमें भांग का हल्का प्रयोग रहता है|

आगरा अलीगढ़ में गोलगप्पे के पानी में हींग की जबरदस्त प्रयोग होता है| दिल्ली में जलजीरा को खट्टे – मीठे दो चार स्वादों में कम मसालों के साथ प्रयोग किया जाता है| पुरानी दिल्ली में गोलगप्पे का पानी तेज मसालों का स्वाद रखता है| अलग अलग शहरों में धनिये पोदीने की चटनी का पानी अलग ठंडा स्वाद देता है तो इमली का पानी आपकी जीभ पर मीठी खटास छोड़ता है| हर शहर के पानी और खासकर गोलगप्पे के पानी में स्वाद अलग होता है| गोलगप्पे के पानी शहर शहर रंग और रंगत बदलता है| होस्टल के दिनों में बीयर, वाइन, वोडका, नारियल पानी, आदि के साथ गोलगप्पे खाना एक शगल है जिसे आप स्वीकृति अभी नहीं मिली है| ज्यादातर जगह गोलगप्पे का पानी ठंडा रखा जाता है मगर आपको कुछ जगह पर गुनगुना पानी भी मिल जाता है| हल्की गुनगुनी रसम के साथ गोलगप्पा निखर कर आता है|

कहीं गोलगप्पे में उबला आलू भरा जाता है तो कहीं मटर के छोले, कहीं चना मसाला, कहीं केले का गूदा, कहीं बूंदी| उत्तर भारत में प्रायः यह सब ठंडा रहता है और कई बार बर्फ में ठंडा किया जाता है| हैदराबाद में मुझे गोलगप्पे में गर्म गर्म छोले खाने को मिले| कई बार मसाला गोलगप्पे, भरवाँ गोलगप्पे और गोलगप्पा चाट में पानी का प्रयोग नहीं होता और उनमे अलग अलग प्रकार की भरत और चटनियों का प्रयोग होता है| कई बार यह छोटी छोटी राज कचौड़ी का रूप भी ले लेते हैं मगर ज्यादातर इसमें बहुत प्रकार के परिष्कृत तरीकों का प्रयोग और दुकान पर उपलब्ध सामिग्री का प्रयोग होता है| मुझे एक बार गोलगप्पे में मूली की खुर्तल (सलाद) और हरी चटनी का खाने का मौका मिला|

जैसा कि मैंने पहले कहा, देश के हर शहर के गोलगप्पे खाना मेरा एक महत्वपूर्ण सपना है| मेरा सपना है जमीन में जन्नत ढूंढने का, मेरा सपना है, हर छोटे छोटे दिन में छोटी छोटी ख़ुशी ढूंढते जाने का, हर गली नुक्कड़ पर जन्नत जी लेने का|

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शाकाहारी – हाहाकारी

हमारे देश की शाकाहारी – हाहाकारी परंपरा में शाकाहार कम हाहाकार ज्यादा है| देश में अगर खाने को लेकर वर्गीकरण कर दिया जाए तो शायद लम्बी सूची तैयार हो जाएगी|

पूर्ण जैन, अर्ध जैन, शुद्ध शाकाहारी, लहसुन – प्याज शाकाहारी, लहसुन – प्याज अंडा आहारी, मांसाहारी, गौ-मांसाहारी, शूकर – मांसाहारी और न जाने क्या क्या| कुछ विद्वान कीटाहारी, मूषकाहारी, विशिष्टाहारी  आदि की बातें भी करते हैं|

इन सभी वर्गों में दोगले लोगों का भी अपना अलग वर्ग भी है| कुछ लोग घर पर शाकाहारी और बाहर मांसाहारी होते हैं| कुछ हफ्ते में तीन दिन सर्वभक्षी होते हैं मगर अन्य दिन शुद्ध वाले सात्विक शाकाहारी| कुछ केवल ईद वाले दिन प्रसाद समझ कर ग्रहण कर लेते हैं| आजकल फेसबुकिया जात वाले  कुछ लोग केवल बकर ईद वाले दिन शाकाहारी रहते हैं मगर अगले दिन…|

अब यह मत पूछिए कि मेरा आहार पुराण क्यों चल रहा है|

अभी एक यात्रा के दौरान मित्र मिले| उन्हें बताया गया था कि मैं शुद्ध शाकाहारी हूँ और अंडा – दूध का सेवन नहीं करता| सौभाग्य से हम एक लम्बी दूरी की बस में सहयात्री थे, जिस निर्जन स्थान पर बस रोकी गई वहां अंडा और चाय के अलावा कुछ खाने के लिए नहीं था| मेरी पत्नी जी ने मेरे लिए भी आमलेट बोल दिया, मगर बेचारे हमारे (हाहाकार – ग्रस्त) मांसाहारी मित्र अपनी शुद्ध शाकाहारी पत्नी के हाहाकार में विदेशी ब्राण्ड का वरक (चिप्स) चबा कर काम चला रहे थे| मुझ “शाकाहारी” के सहारे उन्होंने अपनी पत्नी को समझा बुझा कर आमलेट की अनुमति प्राप्त की| मगर मुझसे बार बार हकीकत में आने का आग्रह करते रहे| मैंने उन्हें बताया कि दूध चिकित्सक ने बंद किया है और अंडा स्वभाव बस नहीं खाता| मेरी पत्नी द्वारा आमलेट खाने के बाद भी उन्हें लगता रहा कि या तो मैं पत्नी के दबाब में शाकाहारी हूँ या हम दोनों ही डरपोक हैं|

मजे की बात यह रही की उस शाम जब हम कई लोग मिलकर साथ खा रहे थे तो अपनी मांसाहारी थाली लेकर आ पहुंचे| उनकी पत्नी बिफर गयीं, सब “अच्छे लोगों” के बीच “जंगली खाना” खाना लेकर क्यों आ गए| उन्होंने हम सबकी थालियों की ओर कसकर निगाह डाली, और बात बढ़ने से पहले वो सरक लिए| अगले शाम चुपके से मेरे पास आये और साथ टहलने चलने का आग्रह हुआ| जैसे ही अंडे का ठेला दिखा बोले चलो, एक एक आमलेट हो जाए; मेरी हालत हँस हँस कर ख़राब हो गई|

मैंने बोला, भाई आप खाइए, स्वाद से खाइए, मन से खाइए, मन में अपराधबोध मत पालिए, दूसरे का बहाना मत देखिये, सुखी रहेंगे|

बोले आप वाकई नहीं खाते| मैंने कहा; वाकई खाने न खाने का पता नहीं, मगर जीभ पर स्वाद नहीं चढ़ा है|

बोले मेरी पत्नी को मत बताना, कि मैं आमलेट खा रहा हूँ| मैं मुस्करा कर रह गया|

मणिराम हरिराम का चीला

जब भी अलीगढ़ जाना होता है तो ट्रेन से उतरने के बाद चीला खाना मेरा पसंदीदा शगल है| बचपन में चीला मेरे लिए अचरज था, क्योंकि मेरे सभी साथी अंडे वाला चीला पसंद करते थे, बल्कि कहें तो उसके दीवाने थे| घर पर माँ बेसन के चीले बनती थी जो इतने शानदार नहीं लगते थे कि उनके लिए दीवाना हुआ जाये| बाद में जब “स्ट्रीट फ़ूड” के लिए स्वाद विकसित हुआ तो उसे समझने के दौरान बेसन, मूंग दाल और अंडे का चीला और उनका अंतर समझ में आया|

बहुत से लोग चीले को उत्तर भारत का डोसा मानते हैं| मगर चीला चटनी के साथ खाने की चीज है| बेसन (साथ में कभी कभी रवा/सूजी भी) का चीला खाने में पतला मगर पेट में थोड़ा भारी होता है| अंडे का चीला मूल रूप से मूंग दाल का ही चीला है, मगर उसमें अंडा फैंट कर डाला जाता है|

अलीगढ़ में बेसन और अंडे के चीले में कटा हुआ उबला आलू, प्याज आदि भरकर थोड़ा सेका जाता है और बाद में इस तरह ग्यारह बारह टुकड़े कर दिए जाते हैं, जैसे भुर्जी बनाना चाह रहे हों| यह चीला सिकते समय देखने वाले को मसाला डोसा लगता है तो परोसे जाते समय आलू चाट जैसा| इसके उप्पर चटनी डालकर चम्मच से खाते हैं| (वैसे कुछ अलीगढ़ी लोग आमलेट चीले की भी मांग करते हैं)

मूंग की दाल का चीला, चीलों की दुनिया का बादशाह है| मूंग की दाल के चीलों में भी मुझे पहले अलीगढ़ में राजू का चीला पसंद था तो आज मनीराम – हरीराम का चीला|

सुदामापुरी क्रासिंग (अब सुदामापुरी पुल के नीचे) दो भाई अपनी अपनी ठेलों के एक साथ मिलकर खड़ी करते हैं, जिससे भाइयों का प्यार दीखता है| पहली ठेल पर मूंग दाल और दूसरी ठेल पर अंडे का चीला|

मेरी पसंद मूंग दाल का चीला|

आज अंडे का चीला बनाने वाला भाई बीमार है, मेरी दो मूंग दाल चीले की इच्छा रखी है| खुराक से हिसाब से दो चीले पांच रोटी के बराबर का मामला है| पांच चीले पहले हैं – मुझे बताया जाता है| मुझे छटवां और नवां चीला दिया जायेगा| अब हम गप्पे मारेंगे या बीस मिनिट टहल सकते हैं|

पीसी हुई मूंग की दाल को कटोरी भरकर लिया जाता है| और तवे पर फुर्ती से फैलाया जाता है, डोसे की तरह पतला नहीं करते, थोड़ा मोटा रहता है| बात चलती है, चीले को फ़ैलाने का समय और चक्कर दोनों एकदम पक्के हैं, कम या ज्यादा में वो मजा नहीं रहता| जो लोग फ़ैलाने को आसान बनाने के लिए दाल में पानी डालते हैं, वो अपने चीले और यश दोनों में पानी डाल लेते हैं|

जिस समय यह सिक रहा होता है, उसी समय इस पर अदरक, प्याज, मिर्च लगा कर हाथ से थपथपा और दुलार देते हैं| इसके बाद सीधे इसके ऊपर ही पनीर को कद्दूकस कर कर उसकी परत बनाते हैं| पहले से पनीर को घिसकर नहीं रखा जाता| इससे एक समान पर्त बनती है| वह इस को फिर से हाथ से थपथाकर दुलार देता है| यही दुलार तो चीले में जान डालता है| इसके बाद ५० ग्राम मक्कन की टिकिया सिकते हुए चीले के नीचे सरकी जाती है|

दो मिनिट के बाद चीला थोड़ी देर के लिए पलट दिया जाता है| यह भूख को जगा लेने का समय है| चीले के ठीक आठ बराबर हिस्से होते हैं, जी हैं पूरे सात कट| चीला आपकी थाली में परोसा जाता है| आपके सामने खट्टी (हरी) और मीठी (सौंठ) चटनी हैं|

मगर मैं पुराना ग्राहक हूँ| मैं शिकायत करता हूँ| अगर चटनी ग्राहक को अपने हाथ से लेनी पड़े तो वो प्यार मोहब्बत वाला स्वाद नहीं आता|

खाने की हर चीज कला और विज्ञान से भले ही बनती हो, जबतक दुलार न हो वो खाना बन सकती है, स्वाद नहीं| बेसन और अंडे के चीले अगर चम्मच से चाट की तरह खाए जाते हैं तो मूंग दाल चीला हाथ से खाने में स्वाद देता हैं| अगर मूंग दाल चीले के आठ की जगह बारह हिस्से हो तो बेहतर हो, मगर कहीं स्वाद न बदल जाए|

और इस प्यार और दुलार भरे एक चीले का मूल्य 60 रुपये| समय शाम दिन छिपने के बाद| अलीगढ़ की सुदामापुरी रेलवे फाटक (अब पुल)|

पुनः – किसी ज़माने में सुदामापुरी फाटक को खूनी फाटक कहते थे, मगर अब कुछ साल से पुल बन गया है|

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सभी छायाचित्र: ऐश्वर्य मोहन गहराना

हँसते इश्कियाते मुस्कुराते

मुद्दा तो यही है न, इश्क़ और हँसी पर लिखना है| वो भी अपने “बैटर हाफ” वाला इश्क़; यानि, वो इश्क़ जो होता है तो कोई बताता नहीं, नहीं होता तो सब बताते हैं| तो भाई, बैटर हाफ के साथ, इश्क़ की ईमानदार बात उन्हीं दिनों सो सकती है जब वो वास्तव में बैटर हाफ न हों|

दरअसल, बात उन दिनों की है जब न इश्क़ था, न इश्क़ की बातें, न शादी थी, न बेग़म| घर वाले जान के पीछे पड़े थे| और सारे नाते रिश्तेदार सब साजिश में शमिल थे| कहा गया, मिल लो, बाद में चाहो तो मना कर देना|

लाला की नौकरी में छुट्टी मिलना भी बोनस मिलने की तरह होता है| दोनों तरफ से कहा गया, हम आते हैं किसी इतवार| जिस शहर में मैं नौकरी करता था वहाँ, रहने का ठिकाना सब गड़बड़ था| तो मुलाकत के लिए कॉफ़ी हाउस तय हुआ| साथ में बता दिया गया कि लड़की हमारी चाय कॉफ़ी तक नहीं पीती, तो उसके लिए पानी, दूध या जूस का इंतज़ाम किया जाये| पहली बार कोई आ रहा था मुझे से मिलने और वो भी शिकार फांसने; उस पर खातिरदारी के भी नखरे उठाने थे|

दुआ – सलाम हाय – हेलो के बाद आप बैठिये आप बैठिये हुआ| मेजबानी करने की जिम्मेदारी मेरी थी| सेल्फ सर्विस कॉफ़ी हाउस में मैं सबके लिए पानी और कॉफ़ी लाकर रखने लगा| मेरी होने वाली सासू माँ अपनी बिटिया जी के चाय-कॉफ़ी तक को हाथ न लगाने के किस्से बता बता कर माहौल बनाने की कोशिश कर रहीं थी| मेरे पिताजी डर कर बैठे थे कि कहीं ये लड़की शादी के बाद घर में चाय – कॉफ़ी  पीना भी न बंद करा दे| सबके लिए कॉफ़ी लाते लाते मुझे डर लगा कि कहीं घर में नुक्सानदेय काली – पीली बोतलें न आने लगें| सर्विस काउंटर पर सेल्स गर्ल ने चुहल की, सर, शादी के बाद तो आपको बराबर के ठेके वाला ड्रिंक ही पीना पड़ा करेगा|

जब में होने वाली पत्नी जी के लिए मौसमी का ताजा जूस लेकर सर्विस काउंटर से वापिस मुड़ा, तो मेरे पिताजी मुस्करा रहे थे, ससुर साहब कॉफ़ी हाउस का मीनू उल्टा ही पढ़ रहे थे, उनका भाई मोबाइल में स्नेक खेल रहा था, मेरी बहन अपनी होने वाली भाभीजी को अजीब से देख रही थी| सासू माँ, अपनी साड़ी के पल्लू से वो कॉफ़ी साफ कर रहीं थी जो अभी तक नहीं गिरी थी|

मेरी सीट हाथ से जा चुकी थी, मेरी पसंदीदा कॉफ़ी हाथ से जा चुकी थी| उस दिन इश्क़ तो हुआ, समय की नज़ाकत देखकर हँसी बाद के लिए टाल दी गई|

मेरी सासू माँ आज भी कायम है कि उनकी बेटी चाय – कॉफ़ी नहीं पीती| ससुर साहब को लगता है शादी के बाद लड़कियों में कुछ परिवर्तन हो जाता है| पत्नी के ससुराल वाले जब तब इस किस्से को लेकर हम दौनों पर हँसते हैं|

मैं रोज पत्नी के लिए भी कभी कभी चाय – कॉफ़ी बनाता हूँ और मुस्कराहट के साथ सर्वे करता हूँ| पत्नी जी आज भी मेरे साथ हँस हँस कर दावा रखतीं हैं कि वो चाय कॉफ़ी नहीं पीतीं|

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देशी नाश्ता

आज कहाँ नाश्ता होता है| एक वक़्त था जब हम सुबह का नाश्ता और शाम का नाश्ता दोनों करते थे| किसी परिचित, अपरिचित और सदा – उपस्तिथ को बिना “चाय” – नाश्ता वापस नहीं जाने दिया जाता था| नाश्ता उत्तर भारतीय जनमानस के दैनिक जन जीवन की एक महत्वपूर्ण घटना होती है| अगर किसी घर में जाकर आपको चाय – नाश्ता न मिले तो लोग उस घर में आर्थिक और सामाजिक स्टार के अनुसार उसे असभ्य, घमंडी, असामाजिक, गरीब, खस्ताहाल, गंवार, और ऐसा ही कुछ कहते थे| कई भारतीय शहरों में अगर आप किसी के घर जाएं और मेजबान को यह वक्त न दें कि वो आपको नाश्ता करा सके तो आपकी हाजिरी नहीं लगाई जाती है| कई बार मिलने का समय लेते हुए कहते है “बहुत कम देर के लिए आ पाएंगे, नाश्ते का समय नहीं दे पाएंगे, अभी से माफ़ कर दीजियेगा”| अगर यह जरूरी सभ्यता न दिखाई जाए तो आपके शिष्टाचार पर प्रश्न लगना लाजमी है|

यहाँ दिल्ली जैसे महानगरों में तो चाय – नाश्ता का मतलब चाय ही होता है मगर बाकी भारत में “चाय” की जगह पानी, शरबत, दूध, छाछ, लस्सी, कॉफ़ी, आदि आदि पेय हो सकते हैं मगर नाश्ता, हमेशा नाश्ता ही होता है|  आजकल नाश्ता भारी भरकर होने लगा है जैसे परांठा, पूरी, कचौरी, सेंडविच आदि| यह सब ब्रेकफास्ट तो हो सकता है कि जल्दी जल्दी किया और काम पर निकल पड़े; राम जाने दिनभर एक निवाला नसीब हो न हो|

देशी भारतीय नाश्ता हमेशा “चना – चबैना” ही रहा है| देशी नाश्ता जब मन करे तब किया जा सकता है| भुना चना, मूंगफली, भुनी मटर, मक्का के फूले, मुरमुरा, खील, कौमरी, और न जाने क्या क्या| आज भी आप इलाहाबाद की किसी भी सड़क पर इसका एकदम ताजा लुफ्त उठा सकते है| और घरों में तो यह अमूमन रहता ही है| यह देशी नाश्ता वसामुक्त (नो-फैट) होता है साथ ही प्रोटीन और फाइबर से पूरी तरह से भरा हुआ| यानि सोलह आना देशी ताकत, पूरी तंदरुस्ती| फिर भी अफ़सोस है कि हम अपने देश की इन अच्छी बातों को भूलते रहे है|

आज भूमंडलीकरण (ग्लोबलाइजेशन) का दौर है| देशी विदेशी कंपनी जब देश में आ रहीं है तो अपने देश की ख़राब और अच्छी बातें अगर ला रहीं है तो हमारे देश की भी भूली बिसरी ख़राब और अच्छी बातें अपना भी रहीं हैं| एक साम्य उत्पन्न हो रहा है| अभी एक बहुराष्ट्रीय कंपनी का फेसबुकिया परिचय पढ़ रहा था:

More than 100 years ago, W.K. Kellogg saw the promise in a single grain. Standing true to this promise, Kellogg brings you ‘Anaaj ka Nashta’ made from the choicest Indian wheat, corn and rice for a breakfast that is as Indian as you are.

यह परिचय अपने आप में बहुत कुछ कह जाता है| जब में इस पेज को देख रहा था तो पाया कि कई तरह के प्रयोग, कुछ नए कुछ पुराने, आजकल खाने को लेकर हो रहे हैं| एक प्रयोग देख कर तुक गया, जिसने मुझे लाई के लड्डू, मुरमुरे के लड्डू, और ऐसे ही कई पुराने भारतीय नाश्तों का स्मरण करा दिया|

इसे नाम दिया गया है “मूवी वाला नाश्ता: कॉर्नफ्लेक्स पॉपकॉर्न क्लस्टर”, शायद उन्हें पता है कि युवा भारत आजकल मूवी देखते समय ही इस तरह के प्रयोग कर पाता है| इसमें कॉर्नफ्लेक्स, पॉपकॉर्न, मेवा – मखाने, शक्कर, मख्खन, शहद, आदि का प्रयोग है| इसे हम शायद कहीं घूमते, टहलते हुए भी खा सकते है| अगर आपको देखकर और सुनकर ही खाने का लुफ्त उठाना है तो यह स्थान भी अच्छा है|

च्यवनप्राश

भारतीय घरों में आलू, प्याज, मिर्च और चाय – चीनी – दूध के बाद च्यवनप्राश शायद सबसे ज्यादा जरूरी खाद्य है| अगर जाड़े का मौसम है और घर में बच्चे हैं तो हो नहीं सकता कि आप इसे न पायें| च्यवनप्राश का घर में होना ठीक ऐसे ही है जैसे घर में किसी अनुभवी बुजुर्ग का होना| यह दादी नानी का अजमाया हुआ नुस्खा है और वैद्यों की पसंदीदा अनुभूत औषधि, भारतीय घरों में घर का वैद्य|

इसमें क्या क्या औषधीय गुण हैं यह सब बाद की बात है, हमारे उत्तर भारतीय घरों में दो साल का बच्चा भी भरोसा करता है कि च्यवनप्राश खा लिया तो उसको दादी नानी का दुलार मिल गया; बीमारी से लड़ने की ताकत मिल गयी, कडकडाती ठण्ड से बचाव हो गया; और ठण्ड भरी शाम में भी घर से बाहर खेलने की अनुमति लगभग मिल ही गई|

कई बार तो शायद च्यवनप्राश से भरा चम्मच देखना ही बच्चे को हल्के सर्दी – जुखाम से मानसिक रहत दे देता है| एक चम्मच च्यवनप्राश खाकर सौठ वाले गुड से गुनगुना दूध – बचपन का पुराना नुस्खा|

मैंने कभी नहीं जाना कि च्यवनप्राश में क्या क्या पड़ता है मगर सदियों के इस भारतीय आयुर्वेदिक नुस्खे पर शायद किसी भी अत्याधुनिक औषधि से अधिक भरोसा रखता हूँ|

च्यवनपप्राश का स्वाद कम पसंद करने वाले बच्चे भी इसे चुपचाप खा लेते हैं| वैसे आजकल तो इसमें भी कई तरह के फ्लेवर्ड च्यवनप्राश बाजार में उपलब्ध हैं| मगर चयवनप्राश का अपना सदियों पुराना स्वाद हमेशा ही मुझे आकर्षित करता है| मेरे बचपन में, जब कभी मुझे फ्लेवर्ड मिल्क का मन करता था तो दूध में च्यवनप्राश भी एक विकल्प हुआ करता था जिसका स्वाद तो शायद मुझे बहुत पसंद नहीं था मगर मुझे यह आश्वस्ति रहती थे कि अब यह मेरे लिए फायदे का सौदा है|

मेरी माँ अक्सर पास पड़ौस की गर्भवती स्त्रियों और नई माताओं को भी जाड़े के दिनों में दिन में दो बार च्यवनप्राश खाने की सलाह देतीं थीं| उनका विचार था कि यह च्यवनप्राश हर हाल में गर्भस्थ और नवजात शिशु के खून में जरूर पहुंचेगा और लाभ पहुंचाएगा| च्यवनप्राश से जुड़े कई नुस्खे आपको देश भर के गाँव देहात में मिल जायेंगे| जैसे गुनगुने पानी से च्यवनप्राश ले लेने से सर्दी के दिनों का चढ़ता बुखार चढ़ना रुक जाता हैं| इसके साथ कई किद्वंती जुड़ी मिल जायेंगीं| कभी कभी आप पाएँगे कि कैसे मौसम से जुड़ी कई बीमारियों में मरीज च्यवनप्राश के खास विधि से सेवन करने पर ठीक हो जाता है| इनमें से बहुत सी सकारत्मक सोच और विश्वास के चलते आये मानसिक परिवर्तन से जुड़ी हो सकतीं है|

एक बाटी जरूर बताना चाहूँगा| कई बार जाड़ों में ठण्ड के कारण हम बच्चे खाना खाने से पहले और बाद में हाथ धोने से बचते थे| हमारा तर्क होता था, च्यवनप्राश खा लिया, अब बीमारी नहीं होगी| मेरे पिता हमेशा कहते, च्यवनप्राश अन्दर से रक्षा करेगा और हाथ धोना बाहर से|

च्यवनप्राश सिखाता है कि आप अगर अपने स्वास्थ्य पर ध्यान देते रहेंगे तो आप अपने जीवन के सबसे जरूरी व्यक्ति अपने आप और अपने परिवार को न सिर्फ बिमारियों से मुक्त रख पाएंगे, वरन चिंता मुक्त होकर और जरूरी कामों में ध्यान दे सकेंगे| हमारी संस्कृति बीमार होकर ठीक होने में विश्वास नहीं रखती वरन अपने शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को लगातार बढ़ा कर बीमारियों से मुक्त रहने के विचार में निवेश करती है| च्यवनप्राश भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग है जो हमें हमेशा से सिखाती है, इलाज से बचाव में समझदारी है और स्वास्थ्य में निवेश जीवन की सबसे बड़ी पूँजी है|

टिपण्णी: यह पोस्ट डाबर च्यवनप्राश के सहयोग से इंडीब्लॉगर द्वारा आयोजित कार्यक्रम ले लिए लिखी गई है|

चटकारा चटनी

नानाजी को जब भी याद करते हैं तो पुदीने की चटनी जरूर याद आती हैं| नानाजी, सिल – बटना, पुदीना, और हाथ से पीसी जाती हुई चटनी की महक|

एक एक कर कर पत्तियां चुनी जातीं, मुलायम डंठल सहेजे जाते, धोये जाते| ताजा महकते पुदीने की महक घर में ताजगी भर देती| उतने ही चाव से साफ़ शुद्ध हरी मिर्चें डंठल तोड़ कर रखीं जातीं| घर का सुखाया पिसाया ताजा आमचूर| पड़ोसियों को भी पता चलता था| चटनी बन रही है, पुदीने की चटनी|

बिजली की मशीनें किसी काम की नहीं होतीं, ये चटनी पीसती नहीं, काट काट कर पुदीने और मिर्च का दम निकाल देती हैं\ उसमें लेस नहीं आती, रेशा नहीं रहता|

बड़ी वाली सिल धो पौंछ कर रखी जाती| उसके बाद करीने से चटनी पिसना शुरू होता| पहले हरी मिर्च को अधिक मात्र में रखा जाता सिल पर, उसके बाद पुदीने की मात्रा| सेर भर पोदीने में पाव भर मिर्च और लगभग पाव भर से थोड़ी कम आमचूर| तीनों चीजें साथ साथ पीसी जातीं, जी हाँ आमचूर, कितना भी बारीक़ क्यूँ न पिसा हुआ हो उसे दोबारा पिसना होता, वरना वो चटनी की आत्मा में नहीं उतरता|

पिसती हुई चटनी में नानाजी, उसकी लेस, रेशा, गाढ़ापन सब पर निगाह रखते| मजाल है की चटनी से पानी अलग होकर बहने लगे|

घर में मौजूद उनकी बहु बेटियाँ, सोचती रहतीं, पिताजी जब चटनी पीस कर उठें तो क्या बना कर दिया जाये कि वो चटनी का आनंद ले सकें| नानाजी आँगन में चटनी पीसते तो घर की सभी महिलाएं रसोई में कुछ बनानें का जुगत कर रही होतीं; पकौड़े, कचौड़ी, आलू – टिक्की, आलू – परांठे, कुछ भी|

नानाजी चटनी में भगवान् खोजते थे, या चटनी खाने वालों में; पता नहीं| चटनी पीसते में पूरी श्रृद्धा और विश्वास होता था| जब नानाजी चटनी पीस कर उठते तो हम उन्हें हाथ नहीं धोने देते| उन्हें हाथ भी चाट कर साफ़ कर दिए जाते| एक बार, पिताजी ने उन्हें चटनी वाले हाथ चाटने की इच्छा प्रगट कर दी तो वो ख़ुशी से रो पड़े| दामाद अगर इतनी बात कह दे तो..  ..आँसू तो आने ही थे|

चटनी हमेशा पूरी श्रृद्धा और आदर के साथ घर में मौजूद सबसे सुन्दर बर्तन में रखी जाती| काँच की ख़ूबसूरत पारदर्शी प्यालियों में परोसी जाती| बोरोसिल का यह वाला बाउल उसमें हरी भरी पुदीने की चटनी| चटनी का स्वाद चटनी चखने से पहले ही दिल में उतरना चाहिए| चटनी का रंग आँखों में बस जाना चाहिए और उसकी गंध नाक में| गहरा हरा रंग, लेसदार गाढ़ापन, पुदीने की ताजगी भरी और मिर्च की तीखी गंध|

अगर चटनी को देख कर और सूंघ कर मूँह में पानी न आये तो उसका चटनी होना बेकार है| चटनी है तो चाट है; चटनी है तो चटकारे हैं; चटनी है तो आप उँगलियाँ चाट चाट कर खा सकते हैं| पकौड़े, परांठे, कचौड़ी, टिक्की, समौसे, सब बहाना है; उन्हें तो पेट में जाकर तेल फैलाना है| असल तो चटनी है, रंग है, गंध है, स्वाद है स्पर्श है, जिसे आँखों में, नाक में और जीभ में बस जाना है|

आईये चटनी का आनंद लीजिये; कोई भी बहाना, किसी भी बहाने… चटनी परोसिये| प्यार, इज्जत, श्रृद्धा, विश्वास के साथ|

इस आलेख को http://www.myborosil.com/ के सहयोग से http://www.indiblogger.in/ द्वारा आयोजित प्रतियोगिता के लिए लिखा गया है|

चिड़चिड़ा आंत्र संलक्षण और लैक्टोज असहिष्णुता

मैंने जन्म से लेकर लगभग बीस साल तक डट कर दूध दही और उनसे बनी हर तरह की चीज का सेवन किया है| मगर अचानक, मेरे पेट में दर्द शुरू हो गया| कई डॉक्टर, होमियोपैथ, वैद्य, हकीम, पण्डे पुजारी बेकार हो गए मगर दर्द था कि भूत की तरह जब मन करे मुझे जकड़ लेता था| सभी दवा, चूरन, चटनी, एक ही बात पर केन्द्रित थीं; पेट में कब्ज| पेट में कब्ज हम भारतीयों और हमारे चिकित्सकों की प्रिय बीमारी है|

आखिरकार, अलीगढ़ मेडिकल कॉलेज में यह तो तय हुआ मुझे चिड़चिड़ा आंत्र संलक्षण (irritable bowel syndrome) है| कहा गया लाइलाज बीमारी है| खान पान पर ध्यान न दिया तो ईश्वर साथ में शतरंज खेलने के लिए बुला लेगा| कम मिर्च मसाला खाने वाले एक शुद्ध शाकाहारी के लिए परहेज की बात सुनना बहुत दुःखद बात है| ऐसी बीमारियाँ तो खाने वाले मुल्लों को होनी चाहिए या पीने वाले ईसाईयों को| चित्रगुप्त जी के वंशज ब्राह्मणों से भी श्रेष्ठ कुलश्रेष्ठ कायस्थ को कैसे होगई? मगर पुनर्जन्म और पिछले जन्म के कर्म भी तो कुछ करते हैं| हलके फुल्के मजाक के बाद भी प्रोफ़ेसर साहब ने लम्बे परहेज की बात नहीं की| छोटी सी लिस्ट थी, जिसमें पहचान करनी थी कि क्या क्या नुकसान कर रहा है| एक महीने में सही से पहचान हो पाई:

१.      दूध (उस समय तक मेरे बहुत प्रिय था),

२.      कोल्ड ड्रिंक, (जो इस जांच के लिए पहली बार पी थी)

३.      मिर्च, मसाले, हींग, (ज्यादा मात्र होने पर ही दिक्कत करते हैं)

मसाले घर में कम खाए जाते है तो बहुत दिक्कत नहीं हुई| कोल्ड ड्रिंक मैं पीता नहीं था, बाद में समाज में भी इनका चलन बढ़ गया है और पहला तर्क होता है की ये कोई शराब थोड़े ही है| लोग रंग और ब्रांड का भी हवाला देते हैं, मगर मुझे एक ग्लास भी बहुत नुकसान करती है और लगभग मार डालती है| देशी शर्बत बहुत अच्छा विकल्प हैं मगर लोग उस विकल्प को सामने नहीं रखते| कुछ दिनों से जूस का जरूर चलन हुआ है क्योकि वो डब्बा बंद आने लगा है| मुझे उस देख कर रहत होती है| बताता चलूँ कि चिकित्सक ने कहा बियर नुकसान नहीं करेगी मगर किसी और अल्कोहल को हाथ मत लगाना| बियर नुकसान तो शायद नहीं करती मगर उसे देखते ही लोग शराब पिलाने के लिए लड़ मरते हैं| इसलिए तौबा तौबा| कोला की मना होना और बियर की अनुमति होना भी बहुतों को रस नहीं आता|

मगर दूध!!!

उत्तर भारत में जन्म लेने के कारण मुझे लगता है कि “लैक्टोज़ इनटॉलेरेंस” देश में सबसे अधिक पोलिटिकल करेक्ट शब्द है| अगर गलती से आपने कह दिया कि दूध से दिक्कत है या एलर्जी है तो आ बैल मुझे मार की कहावत आ भैंस मुझे मार बनकर आपके ऊपर टूट पड़ेगी| इस देश में दूध निंदा उतना ही बड़ा पाप है जितना पाकिस्तान में ईश निंदा|

डॉक्टर पागल होगा|

गाय का दूध लो|

ठंडा दूध नुकसान नहीं करता|

दूध में बादाम उबाल कर लो!

दूध छुआरा तो हर चीज की राम बाण दवा है|

दूध में बराबर का पानी डालकर इतना उबालो की आधा रह जाये फिर पीओ, मगर पीओ जरूर|

ये दूध नहीं बर्फी है मालिक|

जिसको भी पता लगता है, काटने दौड़ता है|

आज दस साल हो गए| पेट तभी परेशान करता है जब जीभ ज्यादा चल जाती है या शादी ब्याह में दूसरों का मन रखने के लिए एक कौर, बस केवल कौर खा लिया जाता है|

भारत में ब्रह्मा विष्णू महेश की तर्ज पर तीन प्रिय पेय हैं; बेबी ड्रिंक, कोल्ड ड्रिंक, हार्ड ड्रिंक| हर जगह इनके भक्त हैं|

मैं पानी पानी करता भागता रहता हूँ|

 

पुश्तेनी गाँव की यात्रा

शहर में पले बढ़े बाबू साहब लोग गाँव – देहात के बारे में इस तरह बात करते हैं जैसे किसी जंगल की बात कर रहे हों| हम एक अनपढ़, असभ्य, अविकसित, लोक की कल्पना करते हैं जिसमें घासफूस खाने वाले जानवर आदमखोर आदमियों के साथ रहते है|

गाँव का एक अलग लोक होता है| परन्तु हमारी कल्पनाशीलता उस कच्चे माल से बनती है जिसे गाँव से आने वाले लोग अनजाने में ही हमें दे जाते हैं| बड़ी बड़ी ऊँची इमारतें, कंक्रीट की सड़कें, फ्लाईओवर, ब्लीच और क्रीम से नहाये हुए चिकने चुपड़े चहरे उन्हें शहर में परीलोक का आभास देते हैं| भौचक ग्रामीण अक्सर उन बातों और चीजों के बारे में बताते हैं जो शायद उनके पास नहीं होतीं हैं|

जब तक शहरी लोग गाँव नहीं जाते तब तक हमें उन बातों और चीजों का अहसास नहीं होता जो शहर में नहीं बचीं है|

अक्सर हम शहर की भागदौड़, भीड़, अकेलेपन और बनावट को दुत्कारना चाहते है और यह चीजें गाँव से लौटें पर खटकने लगतीं है|

लगभग पंद्रह वर्ष पहले मैं उस गाँव में गया था जहाँ आजादी के समय पुरखों की जमींदारी हुआ करती थी| गाँव में कुल जमा सत्तर घर थे, शायद चालीस से भी कम घरों में खेतीबाड़ी का काम होता था| दस घरों के लोग सरकारी नौकरी और मास्टरी की नौकरी में थे| बाकी के घरों में अन्य काम थे, जिन्हें हम प्रायः छोटा मोटा काम कहते हैं|

गाँव में एक चीज बहुत थी; प्रेम| हमारे गाँव में घुसते ही हमारे आने की खबर सारे गाँव को लग चुकी थी| सोशल नेटवर्क आज के फेसबुक और ट्विटर से तगड़ा था| जिन लोगों को हमारे उस गाँव से रिश्ते के बारे में नहीं पता था वो शर्मिंदा होकर किस्से सुन रहे थे और गाँव में हमारे परिवार के पुराने निशान पहचान रहे थे| हम गाँव के बीचों बीच के बड़े घेर में बैठे थे और किसी एक घर के मेहमान नहीं थे| हर घर में कुछ न कुछ हमारे लिए पक रहा था| जो लोग हमारे पुराने पडोसी थे उनमे खींचा तान थी कि कों हमने दोपहर का भोजन कराएगा| हमने नाश्ते का तो इतना ही पता है की हमने खाया कम बिगाड़ा ज्यादा; मगर दोपहर खाना हमने तीन घरों में खाया|

लेकिन सबसे मजेदार बात थी पानी!!

जी हाँ, हमें गाँव का पानी बहुत पसंद आया उसमें एक खारी – मीठा सा स्वाद था| हम उस पानी को पीकर तृप्त हो जाना चाहते थे| जब बहुत पी चुके तो हमने उस पानी की तारीफ करनी शुरू कर दी| मगर जो लड़की हमें पानी पिलाने पर लगी हुई थी वो हँसते हँसते लोट पॉट ही गयी, “शहर वाले तो बहुत सीधे होते हैं, खारे भारी पानी में चीनी मिला कर पिलाया जा रहा है|”

आज की शहरी भाषा में कहें तो “एक्स्ट्रा रिच मिनरल वाटर”!!

 

नीबू की चाय

नीबू की चाय से उठती भाप

की उस भीनी भीनी सी गंध में

अरे तुम ही तो हो!!

 

साँसों की सरगम में घुलकर

मेरे फेफड़ों में उतरते हुए

मेरी रक्त शिराओं में बहती

मेरे हर विचार का असल

अरे तुम ही तो हो!!

 

नीबू की चाय के हर घूँट में

खट्टे मीठे से नमकीन स्वाद में

अरे तुम ही तो हो!!

 

मेरे होठों पर गुलाबी मिठास

मेरी जीभ के नमकीन अहसास

रोम रोम का कांपता कम्पन

रगों में दौड़ती गुनगुनी धुप

अरे तुम ही तो हो!!

 

चाय की छोटी सी प्याली में

ठहरे समंदर की शांत लहरों में

अरे तुम ही तो हो!!

 

मेरी धड़कनों की धुँधली सी ध्वनि

माथे पर उँगलियों की छुवन सी

स्पर्श के सरगम से संगीत तक

ठंडे भारी पल में गर्माहट सी

अरे तुम ही तो हो!!

नीबू की चाय से उठती भाप

की उस भीनी भीनी सी गंध में

अरे तुम ही तो हो!!