खस्ता कचौड़ी की अर्थव्यवस्था

प्रधान जी ने पहले ही पहचान लिया था कि मजेदार खस्ता बनेगा| बोले, खूब तलो, सब मिलकर तलो| नादान समझ न पाए| जब अर्थव्यवस्था के हालत खस्ता हों (या होने वाली हो) तो खस्ता तलने में ही भलाई है| मैं मजाक नहीं कर रहा  हूँ| अभी हाल में अलीगढ़ में कचौड़ी तलने पर सरकारी छापा पड़ा और सालाना बिक्री का आंकड़ा गरमागरम खस्ता निकला – पूरे साठ लाख सालाना|

मुझे अलीगढ़ी कचौड़ियों से प्रेम है| एक समय था, जब मेरी, मेरी पढाई की और देश की हालत ख़राब थे और देश का मण्डल कमण्डल हो रहा था| तब मैंने बहुत सारी चीज़े बनाना सीखा था| उस समय मेरी समझ यह विकसित हुई थी कि कपड़ा और खाना दो धंधे धड़ाकू आदमी के लिए और वकालत और वैद्यकी पढ़ाकू आदमी के लिए बहुत बढ़िया है| यह बात अलग है कि मुझे अब लगता है पहले दो धंधों में पढ़ाकू और दूसरे दो धंधों में धड़ाकू अधिक सफल हैं|

चाट पकौड़ी वाले भोजन में लागत के मुकाबले बाजार मूल्य अधिक होता है| देखा जाए तो जब तक आपको ग्राहक को बिठाने पर खर्च न करना हो तो लाभ पक्का और पका पकाया है| किसी भी ठीक ठाक चलती दूकान पर पहुँचें तो पाएंगे कि हर पांच मिनिट में उसके पास एक ग्राहक होता है और अगर हर ग्राहक औसतन पचास रुपये का माल उठाता है तो साल भर में इक्कीस लाख रुपये का धंधा हो जाता है| दाम अगर आधे हों तो ग्राहकी चार गुना बढ़ जाती है परन्तु बढ़ी हुई ग्राहकी को सँभालने में दिक्कत रहती है| अगर आपका माल सामान्य से अच्छा है तो आप की बिक्री को कुछ ही दिनों में दोगुना होने से कोई नहीं रोक सकता| इस प्रकार चाट पकौड़ी के बाजार में पचास साठ का धंधा होना एक सामान्य बात है|

आप दिल्ली या किसी भी शहर के किसी भी मोहल्ले के किसी भी चाट पकौड़ी वाले को लें तो पाएंगे कि जिस “भैया” से आप तू तड़ाक करते रहे हैं वह शायद आपके बॉस से अधिक कमाता है| यहाँ तक कि आपके ऑफिस के बाहर बैठा चाय वाला भी आपकी कंपनी खरीद सकता है| शायद आपको मेड इन हेवन –  सीजन वन का प्लम्बर याद हो जिसने वेडिंग प्लानिंग कंपनी में मोटा निवेश किया हुआ था| प्लम्बर का पता नहीं मगर दिल्ली शहर के कई बड़े चाट पकौड़ी वाले देश के महत्वपूर्ण निवेशक हैं| यह सब जीवन की मध्यवर्गीय खस्ता सच्चाई है|

कुछ नया खस्ता बनाइये, पकाइए, खिलाइए|

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अरी जलेबी

अरी जलेबी गोल मटोल

घूमा घामी पोलम पोल

चाशनी तेरी झोलम झोल

रंग तेरा लालम घोल|

तेरी मौसी इमरती माई

फिर भी तू हमको भाई

इमरती हमने सूखी पाई

तेरे संग में दूध मलाई|

दूध मलाई राबड़ी भाई

देख के हमने दौड़ लगाईं

कड़ी कुरकुरी बड़की माई

मरी मुलायम हमने पाई|

ठण्डी मंडी तुझको खाऊँ

दही जामन उसमें पाऊँ

ठण्डी गर्मी क़स्बा गाऊँ

दूगनम दून मैं खा जाऊँ||

– – ऐश्वर्य मोहन गहराना

 

 

 

होली में भरें रंग

जब कोई पटाखों के बहिष्कार की बात करे और होली पर पानी की बर्बादी की बात करे, तो सारे हिंदुस्तान का सोशल मीडिया अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए पगला जाता है| कुछ तो गली गलौज की अपनी दबी छिपी दादलाई संस्कृति का प्रदर्शन करने लगते हैं|

मगर हमारी दिवाली में दिये और होली में रंग गायब होते जा रहे हैं| बहुत से त्यौहार अब उस जोश खरोश से नहीं मनाये जाते जो पहले दिखाई देता था, तो कुछ ऐशोआराम (रोजीरोटी का रोना न रोयें) कमाने के दबाब में गायब हो रहे हैं| समय के साथ कुछ परिवर्तन आते हैं, परन्तु उन परिवर्तनों के पीछे हमारी कंजूसी, लालच, दिखावा और उदासीनता नहीं होने चाहिए|

दिवाली पर पटाखों पर प्रतिबन्ध के विरोध में पिछली दिवाली इतना हल्ला हुआ कि लक्ष्मी पूजन और दिए आदि जैसे मूल तत्व हम भूल गए| मैं दिवाली पर दिवाली पर जूए, वायु प्रदुषण, ध्वनि प्रदूषण, और प्रकाश प्रदूषण का विरोधी हूँ| प्रसन्नता की बात है कि रंगोली, लक्ष्मी पूजन, मिठाइयाँ, दिये (और मोमबत्ती), मधुर संगीत, आदि मूल तत्व वायु प्रदुषण, ध्वनि प्रदूषण, और प्रकाश प्रदूषण नहीं फैलाते| पटाखों और बिजली के अनावश्यक प्रकाश की तरह यह सब हमारी जेब पर भारी भी पड़ते|

यही हाल होली का है| पानी की बर्बादी पर हमें क्रोध हैं| पानी की बर्बादी क्या है? मुझे सबसे अधिक क्रोध तब आता है जब मुझे बच्चे पिचकारियों में पतला रंग और फिर बिना रंग का पानी फैंकते दिखाई देते हैं| अच्छा हो की इस पानी में रंग की मात्रा कम से कम इतनी हो कि जिसके कपड़ों पर पड़े उसपर अपना रंग छोड़ें| इस से कम पानी में भी अच्छा असर और प्रसन्नता मिलेगी| टेसू आदि पारंपरिक रंग का प्रयोग करें| इसमें महंगा या अजीब क्या हैं?

होली मेरा पसंदीदा त्यौहार हैं| पिचकारी लिए बच्चे देखकर मैं रुक जाता हूँ और बच्चों से रंग डालने का आग्रह करता हूँ| अधिकतर निराश होता हूँ| बच्चों को भी अपना फ़ीका रंग छोड़ने में निराशा होती है|

दुःख यह है कि जो माँ बाप दिवाली के पटाखों पर हजारों खर्च करते हैं, हजारों की पिचकारी दिलाते हैं, वो होली पर दस पचास रुपये का रंग दिलाने में दिवालिया जैसा बर्ताव करते हैं|

मेरे लिए उड़ता हुआ गुलाल और रंग गीले रंग से अधिक बड़ी समस्या है, क्योंकी यह सांस में जाकर कई  दिन तक परेशान करता हैं| गीले रंग से मुझे दिक्कत तो होती है, परन्तु चाय कॉफ़ी पीने से इसमें जल्दी आराम आ जाता है| हर व्यक्ति को गीले और सूखे रंग में से चुनाव करने की सुविधा रहनी चाहिए| बच्चों के पास गीले रंग हो मगर सूखे रंग गुलाल भी उनकी पहुँच में हों, जिस से हर किसी के साथ वो प्रेमपूर्ण होली खेल सकें|

हाँ, कांजी बड़े, गुजिया, पापड़, वरक, नमकीन आदि पर भी ठीक ठाक खर्च करें| हफ्ते भर पहले से हफ्ते भर बाद तक नाश्ते की थाली में त्यौहार रहना चाहिए| व्यायाम और श्रम कम करने की अपनी आदत का दण्ड त्यौहार और स्वादेंद्रिय को न दें|

गाजर का हलवा

अगर आप पकवान विधियाँ पढ़ने के शौक़ीन हैं तो गाजर का हलवा सबसे सरल पकवानों में से एक हैं| अधिकतर विधियाँ कद्दूकस की गई गाजर में मावा (खोया) और चीनी मिलकर आंच पर चढ़ाने की सामान्य प्रक्रिया से शुरू होती हैं और मेवा मखाने की सजावट पर ख़त्म हो जाती हैं| मेरे जैसे स्वाद लोभी लोगों के लिए यह विधियाँ कूड़ा – करकट से आगे नहीं बढ़ पातीं|

गाजर का हलवा बनाना जितना सरल है, गाजर का अच्छा हलवा बनाना उतना कठिन और समय लेने वाला काम है| कोई भी हलवा बनाने समय यह ध्यान रखने की बात है कि हलवा मूँह में जितना जल्दी घुल जाए उतना बढ़िया| दूसरा हलवा चबाने में कम से कम श्रम की आवश्यकता हो| गाजर हलवे का लक्ष्य यह हो कि न दांत को चबाने में कष्ट हो न आंत को पचाने का कष्ट हो, स्वाद और ताकत पूरी आये|

गाजर का हलवा अधिकतर सस्ती गाजर के इन्तजार में टलते रहने वाला काम है| गाजर के हलवे के लिए अधिकतर पकाऊ और मोटी गाजर का प्रयोग किया जाता है| मगर इससे हलवे के स्वाद में कमी आती है| कच्ची मीठी ताजा गाजरें सबसे बेहतर हलवा तैयार करती हैं|

दूसरा, खोये का प्रयोग हो सके तो न करें| दूध का प्रयोग दो तरह से फ़ायदेमंद हैं| पहला आपको खोये की गुणवत्ता पर कोई संदेह नहीं करना पड़ेगा| दूसरा, यह दूध गाजर के साथ उबलने में गाजर के कण कण में जाकर उसे बेहतरीन स्वाद प्रदान करेगा|

गाजर को अलग से उबालना भी उसके स्वाद को कमतर करता है| गाजर को हमेशा दूध के साथ ही उबालें| अगर खोये का प्रयोग कर रहे हैं तो खोये के साथ उबालें| खोया अगर लेना है तो कोशिश करने की कम से कम थोडा बहुत दूध गाजर के साध प्रारंभ से ही डालकर चलें| खोया या मावा, केवल आपके समय की बचत करता हैं| इससे स्वाद में कमी ही आती है, कोई बढ़ोतरी नहीं होती|

एक किलो गाजर के साथ दो किलो दूध अगर लेकर चलते हैं तो बेहतर है| जिन्हें खोया डालना है वह एक किलो दूध के लिए २५० ग्राम खोया के सकते हैं| हो सके तो शुद्ध समृद्ध दूध का प्रयोग करें| आधे अधूरे दूध के प्रयोग से आधा अधूरा स्वाद ही आना है| यही बात खोया की गुणवत्ता पर भी लागू होती है|

किसी भी भोज्य या पकवान के बारे में एक बात पूरी तरह तय है| आप उसे जल्दीबाजी में नहीं बना सकते| अगर आप प्रेशर कुकर में हलवा बनाना चाहते है, तो उस तरह के स्वाद के लिए तैयार रहे| माइक्रोवेब ओवन में बने हलवा का अलग स्वाद होगा| मैं यह नहीं कहता कि यह स्वाद अच्छे नहीं है| मगर हर पकवान का अपना एक शास्त्रीय स्वाद होता है| उस शास्त्रीय स्वाद की अपनी अलग ही बात होती है|

गाजर के हलवे का आनंद कढ़ाई में धीमी धीमी आँच पर इसे बनने देने में है| ठण्डा मौसम और धीमी आंच बेहतरीन गाजर हलवा का सब से पुख्ता वादा है| सही आंच का कोई भौतिक मापदंड नहीं हो सकता क्योंकि जाड़े के मौसम का तापमान और रसोई में हवा का उचित बहाव भी इसमें अपना योगदान रखता है| आँच इतनी धीमी हो कि गाजर या दूध कढ़ाई के तले से न लग जाए| किसी भी तरह का जलना या जलने की गंध जैसा कुछ न हो| साथ ही यह आँच इतनी तेज भी हो कि पर्याप्त मात्रा में वाष्पीकरण होता रहे| बेहतर है कि आप हर दस पांच मिनिट में करछल को कढ़ाई के तले तक इधर से उधर चला लें| सामिग्री की उलटते पलटते रहें| साथ थी साथ आंच को अपने मन के हिसाब से हल्का या बहुत हल्का करते रहें – बोरियत नहीं होगी|

चीनी या मीठा डालने का भी अपना समय और मात्रा है| चीनी अगर अपने पसंदीदा स्वाद से हल्का सा कम रखेंगे तो हलवे का शानदार स्वाद ले पायेंगे| वरना हम सब लोग, रोज ही किसी न किसी मिठाई में चीनी का स्वाद लेते ही रहते हैं| कहना यह कि हलवे का स्वाद बना रहे, चीनी का स्वाद उस के सर पर न चढ़ जाए| मैं आजकल सफ़ेद चीनी के मुकाबले भूरी चीनी लेना पसंद करता हूँ| इसका स्वाद हलवे में चार चाँद लगा देता हैं|

कई बार हम हलवा पूरी तरह पकने का इन्तजार करते हैं फिर मीठा डालते हैं| इससे हलवा में मीठा स्वाद आने की जगह हलवे के चाशनी में पग जाने का स्वाद आने लगता है| हलवे के रस के पूरी तरह सूखने से ठीक ठाक पहले मीठा डाल दें| अधिक पहले मीठा डालने में स्वाद पर अधिक अंतर भले ही न आये, करछल चलाने में श्रम थोड़ा अधिक हो जाता है| अतः ऐसा न करें| हर पकवान और रिश्ते को पकने का उचित समय चाहिए होता है|

इलायची और अन्य मेवा अधपके हलवे में डालने से अधिक स्वाद और खुशबू पैदा करते हैं| हो सके हल्की भुनी इलायची का प्रयोग करें| मेवे हल्के हल्के तले हुए हों| किशमिश न डालें – अगर जबरदस्ती डालें तो कंधारी किशमिश का स्वाद ठीक रहेगा|

बहुत बार हम मेवे को अपनी और अपने हलवे की समृद्धि के दृष्टिकोण से डालते हैं| मेवा हलवे के स्वाद में कोई वास्तविक वृद्धि नहीं करता| मेवा वाला हलवा हमें मानसिक संतुष्टि देता है – स्वादेंद्रिय की संतुष्टि नहीं| मेवा मखाने का यह स्वाद हम अलग से भी ले सकते हैं|

गाजर का हलवा हो या कोई अन्य पकवान बार बार गरम होने से उसका स्वाद बदलता रहता है| बार बार गर्म होने से पकवान अपना बेहतरीन स्वाद खो देते हैं| गाजर का हलवा अगर बढ़िया बना है तो ठंडा भी बहुत बढ़िया लगता है|

एक प्रश्न बार बार आता है.. गाजर हलवे में घी कौन सा हो? अगर आपने भैंस का शुद्ध सम्पूर्ण प्राकृतिक दूध प्रयोग किया है तो इस प्रश्न का कोई अर्थ नहीं| अन्य स्तिथि में गाजर हलवे को आँच से उतारते समय जी भरकर देशी घी का तड़का लगा दें|

पान का बीड़ा

“जिन्हें पान खाने खिलाने की तमीज़ नहीं वो क्या जिन्दगी जियेंगे?” अक्सर कहते|

तब पान का जलवा था| मान का एक पान काफी था| रसास्वादन का शब्द पान का मान रखता है| मजाल क्या कोई दांत पान की कुतर भी जाए| जिन्हें पान चबाने की आदत होती है वो अक्सर ज़ाहिल होते हैं| इंसान की तहजीब, रुतबा, खानदान और तासीर का पता उसके पान खाने के तौर तरीके से लगता है|

पनवाड़ी उन्हें दूर से देखता तो उनका पान लगाना शुरू कर देता| बीच बीच में दो चार दस पान और लग जाते, मगर उनका पान ख़ूब वक़्त लेता| जब तक कत्था चूना अपना रंग एकसार न कर लेते, घोटा चलता रहता| वक़्त होता, जान पहचान, काम बेकाम, चेले – चंटारे उन्हें सलाम ठोंकने आते| एक दूसरे के नाम दुआ पढ़ते| नेहरू से लेकर मर्लिन मुनरो तक बहार होती| पनवाड़ी न  रुकता, घोटा चलता रहता| घड़ी आध घड़ी के बाद पनवाड़ी कहता, रंग मस्त आ रहा है, जजमान| एक उड़ती नज़र पान को चूमती हुई निकल जाती| कहते – पान को भावज बनाना है क्या, बस करो| इधर पान का नुस्खा आगे बढ़ता, उधर देश की ग़रीबी हटती और टाटा बिड़ला भीख मांगने ठंडी सड़क निकल जाते| दूसरी घड़ी बीतते बीतते उमराव जान की याद आती कि छप्पन छुरी  चलती| पूछा तो कभी नहीं मगर कहते है कत्था चूना घोटते हुए पनवाड़ी पान पर सरस्वती यंत्र बनाता|

पान का बीड़ा भक्तिभाव से ग्रहण करते| मन्त्रजाप भी करते होंगे| इसके साथ नगर परिक्रमा का काम शुरू होता| आप भले ही उसे क़स्बा कहें, मगर मील भर पदयात्रा उनका नियम था| कारवां में लोग आते जाते, अलग होते जाते| मंथर गति से कदमताल मिलते जाते| हूँ हाँ करते सबकी बात सुनते जाते| सरकारी ओहदेदार भी इसी क्रम में मेलजोल करते| शायद ही कभी कुछ बोलते| जिनके काम होने होते, चुपचाप हो जाते| कभी कभार कुछ बोलते तो अगले दिन सुबह शहर भर में चर्चा रहता| सोने से पहले मूँह से निचुड़ा हुआ पान कलई के पीकदान में संभाल कर रख देते| दांत का निशान न रहता मगर रस भी तो न रहता|

सुबह समय पूजा पाठ भोजन भजन करते बीतता, शेष विद्यालय में पढ़ाने लिखाने और पीटने चिल्लाने में| गला दर्द करता और थक कर बुरी तरह बैठ जाता| दोपहर घर पहुँच कर चाय चबैना के बाद अपने कुतुबखाने में बैठकर पानदान उठाते| पंडिताइन दोपहर में पुरानी फ़िल्मों के इश्किया गाने सुनती हुई यह पान लगाया करतीं| जिस दिन विविध भारती पर सुरैया के गाने बजते पान में सुर आ जाते| नूरजहाँ का नूर उन्हें बहुत भाता था| जब कभी सही गाना गुनगुनाने लगते, पंडिताइन फूले न समातीं|

पान खाना कला है| जितना देर मूँह में रहे, रस देता रहे| जब तक पत्ता ख़ुद न घुल जाए, उसे न छेड़ते| जिस पान पर कत्था चूना घोटने में घड़ी दो घड़ी लगती हो उसे भोगने में क्या छः घड़ी न लगें? पान मूँह में घुलता रहता| किताबें दिल में उतरती रहतीं| कभी कभी रात बेरात कविता कहानी बन कर पान कागज़ पर उतर जाता| कभी कभी रात होती, सुबह न होती|

पान का दौर चलता रहा, चलते चलते चला गया| इंस्टेंट कॉफ़ी का दौर आया| दो मिनट मैगी आई| तुरंत तैयार खाना आया| चालीसा पढ़ने वाले चार चक्कर अगरबत्ती घुमाकर भगवान को बहलाने लगे|  जिन्दगी जीने की फुर्सत किसे, सलीका किसे? हिंदुस्तान की तहजीब और तासीर किसे? किसे फुर्सत इश्क़ करे, बातें बनाये, घोटा करे, घूँट घूँट जिन्दगी के मज़े करे? किसे फुर्सत जिया करे??

परांठे

हिन्दुस्तानी खाने में बड़ा चक्कर है| फुलका, रोटी, चपाती, परांठा, नान में फ़र्क करना भी बड़ा मुश्किल है|

तवा परांठा और तंदूरी रोटी खाने के बाद तंदूरी परांठा हलक से नीचे उतारने में दिल्लत होती है| आखिर तंदूरी परांठा परांठा कैसे हो सकता है भरवाँ तंदूरी रोटी होना चाहिए| परांठे का भी गजब चक्कर है, तवा परांठा और कढ़ाई परांठा समझने में भी मशक्कत है| कढ़ाई परांठा को नासमझ डीप फ्राई परांठा कहते है| समझदार कहते हैं कि तवा गहरा है उसे कढ़ाई मत कहो| दिल्ली की गली परांठे वाली में तो खुलकर कढ़ाई में परांठा तला जाता है| इस बात में दो राय नहीं की तवा और कढ़ाई के बीच इतने संकर संस्कार हुए हैं कि कौन क्या है पता नहीं चलता| उधर इन संकर संस्कार के जो भी तकनीकि नाम रहे हैं वो आज के अधकचरे ज्ञान में नदारद हो गये हैं| हिन्दुस्तानी अंग्रेजों के लिए हर सब्जी गोर्द और हर बर्तन पैन है|

पहली बार तंदूरी परांठा खाने के बाद घंटों सोचना पड़ा कि यह परांठा क्यों है| मुझे लगा कि भरवाँ रोटी बोलना ठीक है|

परांठे के पहला उपक्रम है कि उसमें कुछ भरा हुआ हो भले ही एक बूंद देशी घी| अगर परांठे में परत नहीं है तो परांठा नहीं है| आप भरवाँ रोटी और परांठे में पहला अंतर उसकी परतों से कर सकते हैं| परांठा अगर तवे पर न पचाया (हल्का भूनना या पकाना) जाए तो यह कचौड़ी हो जाता है| परांठे को अंत में तवे पर, गहरे तवे पर या पसंद के हिसाब से कम गहरी कढ़ाई में तला जाता है| यह प्रक्रिया उसे पूरा परांठा बनाती है| दो अलग अलग प्रक्रियाओं में पकना ही परांठे को परांठा बनाता है|

 

वडपलनी मुरुगन मंदिर

कभी कभी अचानक कहीं जा पहुँचने का संयोग बनता है| उस दिन भी यही हुआ| देर शाम तय हुआ कि वडपलनी में कामकाज की सिलसिले में पहुँचने से पहले मुरुगन मंदिर भी पहुंचा जाए| उत्तर भारतीय हिन्दू मंदिरों के आसपास रहने वाली गंदगी, भीड़भाड़ और पंडा पुजारी की रेलमपेल मेरे शृद्धा भाव को छू-मन्तर कर देती है| मगर दक्षिण भारत में मंदिर अक्सर साफ़ सुथरे रहते हैं| एक बात और भी है ध्यान देने की, दक्षिण भारत में बहुत सारे मंदिर सरकारी नियंत्रण में हैं| वडपलनी मुरुगन मंदिर भी सरकारी विभाग द्वारा नियंत्रित मंदिर है| इन सरकार नियंत्रित मंदिरों को देखकर मुझे हमेशा लगता है कि सरकारी तंत्र के अकुशल और प्रभावहीन प्रबंधन की बात सही नहीं है और जान बूझकर पैदा की गई है|

सुबह सुबह मंदिर पहुँचे| कोई हो- हल्ला नहीं था| वैसे भी यह किसी त्यौहार वाला दिन नहीं था| प्रसाद खरीदने की कोई इच्छा नहीं थी| आखिर घर लौटने में दिन थे| दो फूल मालाएं खरीदी गई| सड़क किनारे बैठे उस फूल वाले ने बात टूटी फूटी हिंदी में की मगर दाम तमिल में बताये| मैंने सौ रुपये का नोट दिया तो वो टूटे पैसे लेने चला गया| पंद्रह रुपये में दो बढ़िया फूलमालाएं|

किसी दुकानदार ने आवाज नहीं लगाई| कोई पंडा पुजारी नहीं आया| किसी ने भगवान से अपने सीधे सम्बन्ध का दावा नहीं किया| भीड़ नहीं थी| पहले से बताए गए हिसाब से हम चुपचाप टिकट काउंटर की तरफ़ बढ़ गए| दस का नोट बढाया और दो टिकट प्राप्त कीं| मुख्य मंदिर की तरफ पहुँचते ही पता लगा यह अर्चना की टिकट है, स्पेशल दर्शन का नहीं| स्पेशल दर्शन के लिए बीस रुपये का टिकट था| पहले अर्चना के लिए लाइन में लग गए| यहाँ वास्तव में कोई लाइन नहीं थी| अंतिम छोर तक पहुँचते ही, पुजारी आया| हमारी पूजा सामिग्री लेकर गर्भगृह में अन्दर चला गया| हम देखते रहे| देवता से अधिक मेरा ध्यान पुजारी पर था| मगर उसने वापिस आने से पूर्व पूरे विधि विधान संपन्न किये| ऐसा नहीं कि दूर से ही चढ़ावे की फूलमाला देव-मूर्ति की तरफ उछाल कर वापिस आ गया हो| वापिस आकर उसने आचमन का जल और माला के आधे फूल हमें दे दिए, वही हमारा प्रसाद था| हम कोई खाद्य पदार्थ तो प्रसाद के लिए लेकर आये नहीं थे|

हमने कोई देव-दर्शन तो किये नहीं थे| सारा ध्यान तो पुजारी पर था| दोबारा काउंटर पर जाकर स्पेशल दर्शन का टिकट लिया| इस लाइन में हम बिल्कुल अकेले थे| पूरा पांच मिनट सबसे बढ़िया लगने वाली जगह पर खड़े हुए अपने मन, भाषा और विचार के अनुसार मन ही मन पूजा संपन्न की| कोई पुजारी हमें रोकने टोकने समझाने बुझाने लूटने खसोटने नहीं आया| जिस पुजारी ने हमारी पूजा करवाई थी, वह भी दूर से मुस्करा कर अपने काम में लग चुका था|

इसके बाद हमने प्रांगण में मौजूद अन्य मंदिरों का दर्शन किया| ऐसे ही एक मंदिर के पुजारी ने हमारे प्रसाद के फूल और टीके के लिए दी गई भस्म को बाकायदा कागज में बांध दिया| कोई शब्द नहीं बोला सुना गया| धन्यवाद और उसके स्वीकार के रूप में नमस्कार ही रहा|

जूते मंदिर के बाहर दरवाजे के के ओर असुरक्षित रखे थे, मगर सुरक्षित ही मिले| पास की एक दुकान से स्थानीय चाय नाश्ता किया| नाम आदि नहीं पता| सारा कार्य-व्यवहार संकेतों में चलता रहा| दालवडा, प्याज आदि का पकौड़ा, एक समौसे जैसा कुछ और अलग अंदाज की एक चाय| दो लोगों में सौ रुपये भी खर्च न हुए| एक चाय में मधुमक्खी गिरने पर उस के स्थान पर दूसरी चाय भी बिना कुछ कहे सुने मिल गई|

चलते चलते बता दें यह मंदिर तमिल फ़िल्म इंडस्ट्री में बहुत प्रसिद्ध है| चेन्नई के बहुत सारे विवाह कार्य यहीं संपन्न होते हैं| तमिलनाडू हिन्दू धार्मिक विभाग द्वारा मंदिर की आधिकारिक वेबसाइट भी बनाई गई है| जहाँ सभी जानकारियां उपलब्ध हैं| मैंने यह वेबसाइट बाद में देखी|

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चेन्नै की एक सुबह ईश्वर (मेरे वरिष्ठ और मित्र) से मिलने जाते समय देव का बुलावा आया। पहले पाँच रुपये के टिकट से दूरदर्शन हुए तो आदेश हुआ पास आओ तो बीस का टिकट लिया। छोटी से बात कही गई, साथ के साथ सुन ली गई। मुरुगन से पिछले दस साल में पहली मुलाकात थी। दक्षिण भारतीय मंदिरों में उत्तर भारत के मंदिरों के मुकाबले अधिक सफाई है और पैसे भी रसीद के साथ लिए जाते है। पुजारियों ने खुद बुला कर आशीर्वचन कहे और न धन मांगा न दिया गया, और बाद में किसी पुजारी ने आँख न ततेरी। सिर्फ़ दो पुष्पमालाओं से पूजा सम्पन्न हुई। खाद्य का प्रसाद ने चढ़ा, न पाया। बाहर आकर स्थानीय चाय नाश्ता हुआ और मन के साथ तन भी संतुष्ट हुआ। #chennai #murugan #vadapalani

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