साहित्य के उत्सव

साहित्यक समारोहों के प्रति जनता प्रायः निर्लिप्त भाव रखती रही है| साहित्य समारोह भी प्रायः आलोचकों, समालोचकों, पुरस्कार प्रदाताओं के वो परिपाटी बने रहे जिनमें आम जनता आम की गुठली की तरह निष्प्रयोज्य होती है| अपने इस संभ्रांत रवैये के कारण हाल के वर्षों में साहित्य समारोह हाशिये पर चले गए हैं और उत्सवों, जश्नों और फेस्टिवल ने ले ली है| उत्तर भारत में ठण्ड के आते ही शादियों के साथ साथ साहित्य और सांस्कृतिक उत्सवों का मौसम भी शुरू हो जाता है|

यह उत्सव, भारत के तीज त्योहारों की तरह समाज के हर वर्ग के लिए कुछ न कुछ समेटे रखते हैं| यहाँ साहित्य और उपसाहित्यिक गतिविधियाँ होती हैं| गंभीर साहित्य चर्चा को अक्सर मुख्य पंडाल अलग स्थान मिलता है| जिन समारोह में गंभीर साहित्य मुख्य पंडाल में होता हैं, वहां भीड़ प्रायः वहां नहीं होती| भले ही साहित्यकार इस प्रकार की स्तिथि को साहित्य विरोधी मानते हैं परन्तु भीड़ साहित्य से बहुत दूर नहीं होती| आप भीड़ से हमेशा गंभीर साहित्य से जोड़े हुए नहीं रख सकते| लोकप्रिय पंडाल प्रायः फिल्मकारों, पत्रकारों, से भरे महसूस होते हैं क्योंकि मीडिया में इनकी खबरें देने और पढ़ने वाले बहुत होते हैं| लोकप्रिय पंडाल में गायन, वादन और नृत्य का समां बंधा रहता हैं जिसमें फिल्म भी एक विधा है| नाटकीय प्रस्तुतियां – कथा पाठन, नृत्य नाटिकाएं, आदि होती हैं मगर प्रायः रंगमंच इन उत्सवों का भाग नहीं होता|

मेरी समझ में भोजन संस्कृति को जानने समझने का उचित माध्यम हैं और आजकल अधिकतर उत्सव इस पहलू पर ध्यान दे रहे हैं| सांस्कृतिक पहलू के अलावा भी भोजन दो प्रकार से महत्वपूर्ण हैं, एक तो उत्सव में जुटी हुई भीड़ को उत्सव से दूर न जाने देने के लिए उनका पेट भरे रखना होता है दूसरा लाभ में मामूली सी हिस्सेदारी से उत्सव का खर्च भी कुछ हद तक पूरा जा सकता है| आम जनता के लिए तरह तरह के खाने और जायके तक एक ही स्थान पर पहुँच भी बड़ी बात है|

किताबें किसी भी साहित्य उत्सव का केंद्र होती हैं| जहाँ साहित्य किताबों के बिना बेमानी है| साहित्य उत्सव आम जनता साहित्यिक किताबों से जुड़ने का पुस्तक मेलों के मुकाबले अधिक उचित अवसर प्रदान करते हैं| यहाँ लोग सीधे सीधे किताबों से जुड़ते हैं, उनके बारे में हुई चर्चा से प्रभावित होते हैं और उन्हें साहित्य के परिदृश्य में देख समझ पाते हैं| हाल में साहित्येतर सांस्कृतिक गतिविधियों और भोजन के अलावा साहित्येतर सांस्कृतिक सामिग्री को भी इन उत्सवों में जगह मिलने लगी है| यह बाजार का साहित्य उत्सवों पर अतिक्रमण नहीं है वरन एक दुसरे से लाभ उठाने का प्रयास है|

इन उत्सवों में साहित्यिक संभ्रांतों का स्वांत सुखी वर्चस्व जरूर समाप्त हुआ है, मगर यह समाज के उच्च मध्यवर्ग का अपनी जड़ों से आज भी जुड़े होने का भ्रम कायम करने का माध्यम भी हैं| जश्न – ए अदब और जश्न – ए – रेख्ता जैसे उर्दू भाषी उत्सवों में भीड़ भडाका जनता की भाषा आश्चर्यजनक रूप से अंग्रेजी है| लोग उर्दू के नजाकत और नफासत की बातें उर्दू में नहीं बल्कि बनावटी अमरीकी लहज़े की अंग्रेजी में करते हैं| ग़ालिब का ज़िक्र करते समय उनके शेरोशायरी का ग्लेमर जेहन में उछालें मारता है, की ग़ालिब को लेकर उनकी समझ|

जिस उत्सव में जितने कार्यक्रम समानांतर चलते हों, वह उतना बड़ा उत्सव है| मगर लोगों के जमावड़े को बुलाना, उसे जमाये रखना, जिमाये रखना, और ज़ज्बा बनाये रखना अपने आप में बड़ी बात है|

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चा बार, कनॉट प्लेस

परिचित पूछते हैं कि क्या कभी कभी चाय पीने वाले को भी चाय के लिए पसंदीदा जगह ढूढ़नी पड़ती है| मुझे लगता है, चाय बेहतर हो तब ही उसका असली मजा है| चा बार, चाय के लिए दिल्ली में मेरी पसंदीदा जगह में से एक है|

जब मैं पहली बार गया था तब ऑक्सफ़ोर्ड बुक स्टोर और चा बार स्टेटमेंट्स हाउस में हुआ करते थे| उन दिनों सर्विस में गजब की ट्रेडमार्क सुस्ती थी| आपके आर्डर करने के बाद भी वेटर दो चार बार पूछ जाता था कि कितनी और देर बार चाय लानी है| मकसद था आपको वहां बैठ कर आराम से पढ़ने लिखने देना| यह बात इसे चाय पीने वालों के साथ साथ पढ़ाकू और लिख्खाड़ लोगों का बेहद पसंदीदा बनती थी| स्टेटमेंट हाउस से चा बार बंद होने तक मैं लगभग हर महीने वहां गया|  मैंने इसके भारी भरकम मेनू में से बहुत सी चाय पी डालीं थीं – विश्रांति, हिबिस्कस, अश्वगंधा, नीलगिरी, इंडियन हर्बल और न जाने क्या क्या| कुल मिलकर सत्तर –अस्सी चाय तो हैं हीं| सबमें अपना अलग स्वाद है| ट्रक ड्राईवर चाय तो खैर सबसे पहले पी थी, उसका फ़ोटो भी सोशल मीडिया पर डाला था|

चा बार के दोबारा खुलने के बाद मैं पहले ही हफ्ते में यहाँ पहुंचा| नए स्थान पर चा बार और ऑक्सफ़ोर्ड बुक स्टोर दोनों का माहौल पहले से ऊर्जावान था| व्यंजन-सूची पहले से बेहतर प्रतीत होती थी| असल में सेवा पहले के मुकाबले बेहतर थी| शायद अब चा बार को सहायक इकाई की जगह एक लाभ-इकाई के रूप में स्थापित किया गया है| जहाँ पहले चा बार शांत माहौल का पर्याय था अब यहाँ एक ऊष्मा है| लोग मिलने, चाय पीने, बातें करने आते हैं| पुराने ज़माने की तरह, अब शांति से बैठकर आप दो चार पुस्तक पढने के लिए नहीं यहाँ नहीं बैठते| बैठकर पढने का विकल्प ऑक्सफ़ोर्ड बुक स्टोर अब भी देता है| आज कल ऑक्सफ़ोर्ड बुक स्टोर और चा बार सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए जाना जाता है|

#Tea #ChaBar #OxfordBookStore #_soidelhi

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चलिए चाय की बात की जाए| शायद यह दिल्ली के किसी और भोजनालय, कैफ़े या बार से अधिक तरह की चाय उपलब्ध करता है| बेहतरीन है कि आपको चाय के बारे में सधे हुए सटीक शब्दों में व्यंजन-सूची से जानकारी मिलती है| व्यंजन सूची काफी बड़ी है और आपको बहुत परिश्रम पड़ता हैं  अपने मन, माहौल, मकसद के मिलान करती चाय पीने के लिए| मसलन अगर आप यहाँ से निकल कर डांस-फ्लोर पर उतरने वाले हैं तो अंतर मौन जैसी गंभीर शांत चाय पीने का कोई अर्थ नहीं| अगर आप गंभीरता से व्यंजन सूची पढ़ते और चाय की चुस्की भरते हैं तब यह अविस्मरणीय अनुभव प्राप्त करते हैं| पुरानी कहावत हैं, पेय बहुत धीरे धीरे घूँट घूँट कर कर गंभीरता से पीना चाहिए| बेहतर चाय का आनंद आपको आपको आनंद प्रदान करता है|

स्थान: चा बार, ऑक्सफ़ोर्ड बुक स्टोर, कनाट प्लेस, नई दिल्ली,

भोजन: मुख्यतः शाकाहारी

खास: चाय,

पांच: साढ़े चार

भारतीय रेलवे जनता खाना

बचपन में जब भी लम्बी दूरी की यात्रा पर जाना होता – पूड़ी, आलू टमाटर की सूखी सब्जी, आम, मिर्च या नीबू का आचार और सलाद के नाम पर हरी मिर्च या प्याज हमेशा साथ होती| पता नहीं क्यों यूँ लगता था कि सफ़र के दौरान इस खाने का स्वाद कुछ अलग ही बढ़ जाता है| प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव के आर्थिक सुधार और छठे वेतन आयोग की सिफ़ारिशें देश में कुछ ख़ुशहाली लायीं और पुरानी ख़ुशियाँ छिनने लगीं| भारतीय रेल की पेंट्री और रेलवे प्लेटफ़ॉर्म का महंगा खाना खरीदने के पैसे लोगों के पास आ गए| कहिये कि संदूक का वजन कम करने के चक्कर में जेब का वजन भी भारी पड़ने लगा और हल्का किया जाने लगा|

भारतीय रेल नेटवर्क में मिलने वाले सभी खानों में स्वाद, मूल्य और उपलब्धता की दृष्टि से अगर किसी खाने का चुनाव करना हो तो जनता खाना उत्तम विकल्प हो सकता है| जिन दिनों मैंने जनता खाने का पैकेट पहली बार खरीदा तब यह सात या दस रुपये का था| आज भी यह पंद्रह या बीस रूपये में आ जाता है| जिन दिनों मैं अलीगढ़ – दिल्ली रोजाना यात्रा करने लगा, उन दिनों मुझे जनता खाने से प्रेम हुआ|  मुझे घर जल्दी छोड़ना होता था, अतः लगभग रोज जनता खाना खरीदता था|

भारतीय रेल का जनता खाना भारतीय खाद्य आदतों का परिचायक है| थोड़ा अच्छी तरह सिकी हुई पुड़ी, मिर्च वाली आलू टमाटर की सूखी सब्जी, मिर्च| पैकेट का आधिकारिक वजन लगभग डेढ़ सौ ग्राम – सात पूड़ी के साथ| साथ में मिलने वाली हरी मिर्च जिस प्रकार इन पैकेट के बाहर झांकती है, उसका भी अलग आकर्षण है| आम बाजारू आलू सब्जी से अलग इसमें तेल बहुत कम है और चूता तो लगभग नहीं ही है| गाढ़ी आलू सब्जी में पानी रिसने का भी प्रश्न नहीं अतः इसके पैकेट को लोग गोद में रखकर कहते खाते हुए भी मिल जायेंगे|

जनता खाना लालू प्रसाद यादव के रेलमंत्री काल की धरोहर है| आप लालू प्रसाद यादव को राजनीतिक और निजी कारणों से नकारने का प्रयास कर सकते हैं, परन्तु उनके समय का कुशल रेल प्रबंधन का बिना शक सराहनीय रहा है| भारतीय रेल में खाना बेचना सरकार के लिए भले ही सरल हो मगर देश भर में इस काम में लगे छोटे विक्रेताओं के लिए परिवार के जीवन – मरण का प्रश्न है| एक विक्रेता एक मिनिट में चार से अधिक ग्राहक को सेवा नहीं दे पाता| एक स्टेशन पर दो मिनिट से कम देर रुकने वाली ट्रेन में जनता खाने के ग्राहक प्रायः कम ही होते हैं| ऐसे में संघर्ष बढ़ जाता है| ट्रेन समय से दो-एक घंटा देर से चल रही हो, पांच मिनिट या अधिक रूकती हो और निम्न मध्यवर्ग की सवारियों का बाहुल्य हो –  यह हर छोटे विक्रेता के जीवन यापन के लिए आवश्यक है| इन आदर्श परिस्तिथियों में एक ट्रेन से एक विक्रेता पांच मिनिट में बीस पैकेट बेचकर चालीस रुपये बनाने की उम्मीद कर सकता है|

एक दिन अचानक मैंने जनता खाना लेना बंद कर दिया| अलीगढ़ जंक्शन के चार नंबर प्लेटफ़ॉर्म पर मगध एक्सप्रेस आना चाहती थी| सिंग्नल और अनाउंसमेंट हो चुका था| एक भूखा पेट वेंडर दो नंबर प्लेटफ़ॉर्म से लाइन पर कूदकर तीन नंबर प्लेटफ़ॉर्म पर जा चढ़ा और चार पांच जनता खाना डिब्बे लाइन पर ठीक वहां जा गिरे जहाँ नहीं गिरने चाहिए थे| ऐसे की किसी दिन को देखकर भारतीय रेलवे को बायो-टॉयलेट का विचार आया होगा| चार डिब्बे को छोड़ने का अर्थ अगले एक घंटे की कमाई गवां देना था| वेंडर वापिस पलटा, गिरे हुए डिब्बे संभाले और भागकर चार नंबर पर रूकती हुई मगध एक्सप्रेस के अनारक्षित डिब्बे के अन्दर गरम खाना – गरम खाना चिल्ला रहा था| भाषण मत दीजिये – अपने नामचीन विदेशी भोजनालय का दो दिन बासा खाना खाते हुए नीचे दिए हुए चित्र को देखिये और लालू प्रसाद के समाजवाद और नरेन्द्र मोदी के पूंजीवाद पर बहस करते रहिए| [i] [ii] [iii] [iv] [v] [vi] [vii]

[i] http://hindi.webdunia.com/national-hindi-news/%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%B2%E0%A4%B5%E0%A5%87-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BE-%E0%A4%8F%E0%A4%95-%E0%A4%B9%E0%A5%80-%E0%A4%B8%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%B9-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%9F-107042100105_1.htm

[ii] https://www.bhaskar.com/news/CHH-RAI-HMU-MAT-latest-raipur-news-042003-2972594-NOR.html

[iii] http://paisa.khabarindiatv.com/article/tag/janta-khana/

[iv] http://www.amarujala.com/uttar-pradesh/ghaziabad/janta-food-eat-carefully

[v] http://naidunia.jagran.com/madhya-pradesh/ratlam-railway-naptoll-janata-khana-1019510

[vi] http://indianexpress.com/article/trending/this-is-serious/dead-lizard-found-in-veg-biryani-on-train-tweeple-hit-out-at-indian-railways-4767682/

[vii] http://www.financialexpress.com/economy/cag-report-calls-railway-food-unfit-for-humans-10-steps-indian-railways-says-it-is-taking-to-ensure-quality/776532/

शिव मिष्ठान भंडार, फ़तेहपुरी, चांदनी चौक

अगर पुरानी दिल्ली में सुबह सुबह बेहतरीन उत्तर भारतीय शाकाहारी नाश्ते का दिल करे तो शिव मिष्ठान भंडार का नाम सबसे पहले जुबान पर आता है| दिल्ली के बाहर आज भी जलेबी और हलवा नाश्ते का हिस्सा है| दूध जलेबी, दही-जलेबी, हलवा-पूड़ी, पोहा जलेबी, यह सब नाश्ते हैं| अगर आपको सुबह सुबह मीठे नाश्ते का मन करे तो भी यह जगह आपके लिए है|

दुकान कई बड़ी ब्रांड वाली दुकानों के साथ है, मगर उनसे ज्यादा भीड़ यहाँ पर है| नाश्ते की ज्यदातर दुकानों से अलग यहाँ बैठने का पूरा इंतजाम है क्योकि यह दिन भर खाने के लिए उपलब्ध है| मगर ध्यान दें, यहाँ का प्रसिद्ध नागौरी-हलवा नाश्ते में खाए जाने की चीज़ है और सुबह बनता है| यह जगह देर तक सोने वाले आलसियों के लिए नहीं है| नागौरी-हलवा सुबह दस बजे तक ख़त्म हो जाता हैं|

नागौरी हलवा में दो अलग अलग चीजें है| पहला नागौरी – यह एक तरह की पूड़ी है| यह साधारण पूड़ी और बेड़मी पूड़ी से एकदम अलग है| इसके साथ है – आलू सब्जी या छोले, जो शायद उन लोगों के लिए है जिन्हें हलवे से पूड़ी खाना गले नहीं उतरता| मगर असली चीज़ है हलवा| नागौरी को आप सब्जी या हलवे, जिस से मन करे खा सकते हैं| मैं सलाह दूंगा, हलवे के साथ जरूर खाएं|

जो लेट लतीफ़ लोग नागौरी-हलवा नहीं खा पाते या नहीं खाना चाहते, उनके लिए बेड़मी पूड़ी सब्जी बेहतरीन है| पूड़ी ठीक से सेंकना अपने आप में एक कला है| यहाँ आपको एकदम सही सिकी पूड़ी मिलती है|  मसाला बहुत हल्का है| इस कारण आलू सब्जी का अपना स्वाद निखर कर आता है| छोले – भठूरे, कचौड़ी, समौसा भी बेतरीन हैं|

जलेबी, इमारती, गुलाब जामुन, सूजी हलवा, मूंग दाल हलवा, और मालपूआ बेहतरीन हैं| गर्मियों में अगर जाएँ तो यहाँ की शानदार लस्सी का स्वाद लेना न भूलें|

सौ से अधिक साल पुरानी इस दुकान में देश के बड़े बड़े लोग अलग अलग समय में आ चुके हैं|

स्थान: शिव मिष्ठान भंडार, फ़तेहपुरी, हौज़ क़ाज़ी, चावड़ी बाज़ार, पुरानी दिल्ली,

भोजन: शाकाहारी

खास: नागौरी-हलवा, पूड़ी-सब्जी,

पांच: साढ़े-चार

सन्नाटा

सन्नाटा शब्द से तो आप परिचित हैं| ध्वनि प्रदुषण के इस युग में सन्नाटा आप को डराता भी  होगा| परन्तु ब्रजमंडल में सन्नाटा अपनी अलग शान रखता है| कोई अच्छी दावत नहीं जो सन्नाटे के बिना पूर्ण हो सके| जड़ों के कटते हुए कुछ लोग जरूर दावतों में अजब गजब सा रायता रखने लगे हैं| परन्तु, हमारे यहाँ नाश्ता तो सन्नाटे के बिना आज भी पूरा नहीं होता| मैंने हाल में अलीगढ़ की कचौड़ी के ऊपर लिखी पोस्ट में सन्नाटे का जिक्र किया है|

सन्नाटा विश्व का पहला ऊर्जाहीन (low calories) प्रोबोइटिक पेय है, जिसमें आपके मस्तिष्क को शून्य स्तिथिप्रज्ञ में पहुँचाने की विकत क्षमता है| बेहतरीन सन्नाटा आपके दिमाग को सुन्न करता हैं, सभी नकारात्मक विचारों को दिन भर के लिए एवं सकारात्मक विचारों को थोड़ी देर के लिए दूर करता है और आँख कान जैसी इन्द्रियों को थोड़ी देर ले लिए अंधकार और असीम शांति में भेज देता है| बेहतरीन सन्नाटा आपको पौष मास की अमावस की गहरी काली रात में घने जंगल में प्राप्त होने वाली अनंत शांति का अहसास कराता है|

महत्वपूर्ण बात यह है कि सन्नाटा प्रोबोइटिक दही से बनता है| भगवान् कृष्ण के ब्रजमंडल में दही और प्रोबोइटिक दही क्या कमी| सन्नाटे की विधि से पहले संक्षेप में प्रोबोइटिक दही की विधि बता देता हूँ|

प्रोबोइटिक दही विधि

अच्छे से उबलाकर ठंडा किया गया गाय का दूध लें| अगर गाय का दूध न हो तो वसा-रहित कोई भी दूध ले लें| पहले सामान्य ढंग के दही जमाने  रख दें| जब दही खट्टा होने लगे तो उसे चार घंटे फ्रिज में रख दे|

यदि आपको सन्नाटा बनना है तो दही को बेहद खट्टा होने दे परन्तु ध्यान दे की ख़राब होने से पहले चार पांच घंटे फ्रिज में रहे|

सन्नाटा विधि

अब अच्छा खट्टा प्रोबोइटिक दही लें| कम से कम चार गुना पानी मिला ले| बेहद अच्छे से उसे चला ले जैसे सामान्य रायता चलाते है| स्वाद-अनुसार आप जितना नमक डालना चाहते हैं उससे बस थोडा सा ही ज्यादा नमक डालें| अब कुटी या पीसी पीला मिर्च (लाल काली नहीं) अपने स्वाद अनुसार डाल लें| फ्रिज में रख दें| ठंडा ठंडा पिए|

नोट –  में बेहद खट्टे मठ्ठे का प्रयोग करते हैं| जिसमें बिलकुल मख्खन न बचा हो|

अगर रायता फैलाना हो, तो नीचे कमेंट लिखकर रायतापसंद होने का सबूत दें|

चिदंबरम’स न्यू मद्रास होटल, खन्ना मार्किट

जब से मैं लोदी रोड इलाके में रहने आया हूँ, यह मेरा पसंदीदा भोजनालय है| दिल्ली शहर के कई बड़े नामी दक्षिण भारतीय भोजनालय, मेरी राय में, स्वाद में इसके मुकाबले नहीं ठहरते| हर महीने मैं एक बार यहाँ से कुछ न कुछ गृह वितरण पर मंगाया जाता है| भोजन घर मंगाने का हमें थोड़ा नुक्सान है| एक तो वेलकम ड्रिंक रसम नहीं मिलता और दूसरा तीन चटनी की जगह एक से काम चलाना पड़ता है|

यहाँ पहुँचते ही आपको गर्मागर्म शानदार रसम पीने के लिए मिलती है| जब तक आपका मुख्य व्यंजन  आये, आप रसम के घूँट भर सकते हैं| रसम पीने से न सिर्फ भूख बढ़ती है, वरन पाचन क्षमता भी बढ़ती है| रक्तचाप वाले रसम न लें, यहाँ रसम में हल्का नमक ज्यादा रहता है| रसम पर भोजन की बात समाप्त क्या, शुरू भी नहीं हुई है| यहाँ सुबह के नाश्ते से रात के भोजन का इंतजाम है|

यहाँ सबसे बेहतरीन दही-बड़ा| यहाँ का दही-बड़ा दिल्ली की किसी भी चाट-पकौड़ी की दुकान से बेहतर है| निश्चित ही बड़ा, उत्तर भारतीय बड़े से भिन्न है| मगर सिर्फ इसलिए की यह बड़ा भिन्न है, मैं इसकी तारीफ नहीं कर रहा हूँ, वरन इसका स्वाद लाजबाब है| यहाँ की एकमात्र मिठाई केसरी-बात (सूज़ी-हलवा) बेहतरीन है| यहाँ केसरी-बात दिल्ली या उत्तर भारत में मिलने वाले सूजी-हलवे से थोड़ा अलग तरीके से बनता है| यहाँ नाश्ते में पोंगल मेरा प्रिय है| मसाला इडली का स्वाद भी बेहतर है|

खाने की बात करें तो रवा डोसा, मैसूर डोसा मसाला, नीलगिरी उत्तप्पम पसंद आते हैं| यहाँ आकर कहने वालों के लिए तीन तरह की चटनी है – नारियल, टमाटर और कड़ी-पत्ता| लेकिन आपको यहाँ मिलता है एक और पकवान – रागी डोसा, जो गर्म-गर्म खाने में आपको अलग और शानदार स्वाद देता है| रागी दक्षिण भारत में उगने वाला पोष्टिक अन्न है| रागी डोसा ठंडा होने पर उतना अच्छा नहीं लगता, इसलिए गप्पे मारते हुए खाने के लिए नहीं है| चिदंबरम रवा स्पेशल मसाला डोसा स्वाद पसंद लोगों के लिए है| यहाँ घर पर कुछ भी नहीं मंगाया जा सकता, कुछ चीजें यहाँ आकर ही खानी होतीं है|

यहाँ की थाली एक बार जरूर खानी चाहिए| दो सब्जी, चावल, निम्बू चावल, सांभर, रसम, दो पूड़ी, दही, केसरी-बात, पापड़, आचार के साथ यह कई लोगों के लिए खुराक से अधिक हो जाती है| मगर इसकी खास बात है, दक्षिण भारतीय तरीके से बनीं सब्जियां| थ्री –इन –वन डोसा और उत्तपम भी पसंद किये जाते हैं|

सन 1930 में दक्षिण भारतीय सरकारी अधिकारीयों को ध्यान में रख कर खोला गया यह भोजनालय 1950 से इस स्थान पर है| यह नई दिल्ली के सरकारी कार्यालयों में बहुत लोकप्रिय है| इस भोजनालय के बाहर दक्षिण भारतीय नमकीन भी मिलता है| जो निश्चित ही उत्तर भारतीय नमकीन से अलग स्वाद देता है|

स्थान: चिदंबरम’स न्यू मद्रास होटल, खन्ना मार्किट, लोदी रोड, नई दिल्ली,
भोजन: शाकाहारी
खास: दही-बड़ा, डोसा, पोंगल, रागी डोसा,
पांच: चार

शिब्बो की कचौड़ी, अलीगढ़

शिब्बो ने आठ साल की उम्र में सन 1951 में कचौड़ी बेचना शुरू किया – आज से छियासठ साल पहले| उनके बेटे ने रणजी खेला, उनका पौत्र ऑफलाइन-ऑनलाइन कचौड़ी बेचता है| दुकान का नाम जय शिव कचौड़ी भण्डार और वेबसाइट का नाम शिब्बोजी है| होते रहिये| हम अलीगढ़ वालों के लिए वो शिब्बो और उनकी दुकान की गद्दी पर बैठने वाला हर व्यक्ति शिब्बो|

शिब्बो – अलीगढ़ी कचौड़ी की पहचान है| अलीगढ़ी कचौड़ी आम कचौड़ी की तरह मुलायम और फूली हुई नहीं होती, वरन कड़क, भुरभुरी और चपटी होती हैं| अधिकतर इनके गोलाकार में भी कमी निकाली जा सकती है| अलीगढ़ वाले इतने सख्त आटे से कचौड़ी बनाते हैं कि इसका गोल होना मुश्किल और कटा-फटा होना आसान है| कचौड़ी के अन्दर कचौड़ी का मसाला इतना कम कि कई बार मालूम भी नहीं पड़ता| अलीगढ़ में अधिकतर कचौड़ी वाले आटे में ही मसाला मिला देते हैं| लेकिन शिब्बो का अपना अलग मानक है| आम अलीगढ़ी कचौड़ी से यह थोड़ा अलग और बेहतरीन है|

शिब्बो की कचौड़ी की महत्वपूर्ण बात है – देशी घी, कड़क कचौड़ी की भुरभुरी पपड़ी और चपटापन|

आम अलीगढ़ी कचौड़ी की तरह शिब्बो की कचौड़ी भी आलू की मसालेदार सब्जी के साथ मिलती है| लोहे की कढ़ाही में हींग और तेज गरम मसाले में बनी सब्जी अपनी श्यामल रंगत और तीखे स्वाद से अलग पहचान रखती है| इसे हम कचौड़ी वाली सब्जी कहते हैं| यह सब्जी आम आलू सब्जी की तरह पतली या रसेदार नहीं होती| यह काफी गाढ़ी होती है| कई बार लोग इसमें रस बनाने के लिए सन्नाटा (अलीगढ़ी रायता) मिलाते हैं| सब्जी और सन्नाटे के मिश्रण स्वाद को और अलग ऊँचाई पर पहुंचा देता है| सभी बड़ी कचौड़ी वालों की तरह शिब्बो के यहाँ भी हल्के और तेज मसाले की सब्जी मौजूद है| हल्के मसाले का अर्थ यह नहीं की सब्जी पूरी तरह हल्की हो जाए| भाई अपनी मसालेदार इज्जत का ध्यान पूरा रखा जाता है|

कचौड़ी- सब्जी के साथ में है – सन्नाटा| सन्नाटा – यानि बहुत खट्टे दही का पतला रायता| इसकी शोभा है पीला मिर्च| यदाकदा बूंदी भी मिलाई जाती है| जितना ज्यादा खट्टा दही और जितना ज्यादा पतला सन्नाटा हो, उतना ही स्वाद आता है| बेहतरीन रायते को पीकर आपके कान भले ही लाल पीले हों, मगर हम इसे सुपाच्य मानते हैं| और मिर्च को छोड़ दें तो यह है भी सुपाच्य, मगर मिर्च न होने पर दही के बर्तन की इस धोवन को कौन पीना चाहेगा?

अलीगढ़ी कचौड़ी अलीगढ़ में हर मोड़ पर मिल जाती है| मगर शिब्बो की बात अलग है| शिब्बो की दुकान अब पहले से ज्यादा बड़ी हो गई है| बैठकर खाने का प्रबंध हुआ है| पूड़ी सब्जी, लड्डू, हलवा और जलेबी भी बेहद स्वादिष्ट मिलती है|

स्थान: शिब्बो की कचौड़ी, जय शिव कचौड़ी भण्डार, बड़ा बाजार, अलीगढ़

भोजन: शाकाहारी

खास: अलीगढ़ी कचौड़ी, आलू सब्जी, सन्नाटा, जलेबी,

पांच: साढ़े चार