सन्नाटा

सन्नाटा शब्द से तो आप परिचित हैं| ध्वनि प्रदुषण के इस युग में सन्नाटा आप को डराता भी  होगा| परन्तु ब्रजमंडल में सन्नाटा अपनी अलग शान रखता है| कोई अच्छी दावत नहीं जो सन्नाटे के बिना पूर्ण हो सके| जड़ों के कटते हुए कुछ लोग जरूर दावतों में अजब गजब सा रायता रखने लगे हैं| परन्तु, हमारे यहाँ नाश्ता तो सन्नाटे के बिना आज भी पूरा नहीं होता| मैंने हाल में अलीगढ़ की कचौड़ी के ऊपर लिखी पोस्ट में सन्नाटे का जिक्र किया है|

सन्नाटा विश्व का पहला ऊर्जाहीन (low calories) प्रोबोइटिक पेय है, जिसमें आपके मस्तिष्क को शून्य स्तिथिप्रज्ञ में पहुँचाने की विकत क्षमता है| बेहतरीन सन्नाटा आपके दिमाग को सुन्न करता हैं, सभी नकारात्मक विचारों को दिन भर के लिए एवं सकारात्मक विचारों को थोड़ी देर के लिए दूर करता है और आँख कान जैसी इन्द्रियों को थोड़ी देर ले लिए अंधकार और असीम शांति में भेज देता है| बेहतरीन सन्नाटा आपको पौष मास की अमावस की गहरी काली रात में घने जंगल में प्राप्त होने वाली अनंत शांति का अहसास कराता है|

महत्वपूर्ण बात यह है कि सन्नाटा प्रोबोइटिक दही से बनता है| भगवान् कृष्ण के ब्रजमंडल में दही और प्रोबोइटिक दही क्या कमी| सन्नाटे की विधि से पहले संक्षेप में प्रोबोइटिक दही की विधि बता देता हूँ|

प्रोबोइटिक दही विधि

अच्छे से उबलाकर ठंडा किया गया गाय का दूध लें| अगर गाय का दूध न हो तो वसा-रहित कोई भी दूध ले लें| पहले सामान्य ढंग के दही जमाने  रख दें| जब दही खट्टा होने लगे तो उसे चार घंटे फ्रिज में रख दे|

यदि आपको सन्नाटा बनना है तो दही को बेहद खट्टा होने दे परन्तु ध्यान दे की ख़राब होने से पहले चार पांच घंटे फ्रिज में रहे|

सन्नाटा विधि

अब अच्छा खट्टा प्रोबोइटिक दही लें| कम से कम चार गुना पानी मिला ले| बेहद अच्छे से उसे चला ले जैसे सामान्य रायता चलाते है| स्वाद-अनुसार आप जितना नमक डालना चाहते हैं उससे बस थोडा सा ही ज्यादा नमक डालें| अब कुटी या पीसी पीला मिर्च (लाल काली नहीं) अपने स्वाद अनुसार डाल लें| फ्रिज में रख दें| ठंडा ठंडा पिए|

नोट –  में बेहद खट्टे मठ्ठे का प्रयोग करते हैं| जिसमें बिलकुल मख्खन न बचा हो|

अगर रायता फैलाना हो, तो नीचे कमेंट लिखकर रायतापसंद होने का सबूत दें|

मणिराम हरिराम का चीला

जब भी अलीगढ़ जाना होता है तो ट्रेन से उतरने के बाद चीला खाना मेरा पसंदीदा शगल है| बचपन में चीला मेरे लिए अचरज था, क्योंकि मेरे सभी साथी अंडे वाला चीला पसंद करते थे, बल्कि कहें तो उसके दीवाने थे| घर पर माँ बेसन के चीले बनती थी जो इतने शानदार नहीं लगते थे कि उनके लिए दीवाना हुआ जाये| बाद में जब “स्ट्रीट फ़ूड” के लिए स्वाद विकसित हुआ तो उसे समझने के दौरान बेसन, मूंग दाल और अंडे का चीला और उनका अंतर समझ में आया|

बहुत से लोग चीले को उत्तर भारत का डोसा मानते हैं| मगर चीला चटनी के साथ खाने की चीज है| बेसन (साथ में कभी कभी रवा/सूजी भी) का चीला खाने में पतला मगर पेट में थोड़ा भारी होता है| अंडे का चीला मूल रूप से मूंग दाल का ही चीला है, मगर उसमें अंडा फैंट कर डाला जाता है|

अलीगढ़ में बेसन और अंडे के चीले में कटा हुआ उबला आलू, प्याज आदि भरकर थोड़ा सेका जाता है और बाद में इस तरह ग्यारह बारह टुकड़े कर दिए जाते हैं, जैसे भुर्जी बनाना चाह रहे हों| यह चीला सिकते समय देखने वाले को मसाला डोसा लगता है तो परोसे जाते समय आलू चाट जैसा| इसके उप्पर चटनी डालकर चम्मच से खाते हैं| (वैसे कुछ अलीगढ़ी लोग आमलेट चीले की भी मांग करते हैं)

मूंग की दाल का चीला, चीलों की दुनिया का बादशाह है| मूंग की दाल के चीलों में भी मुझे पहले अलीगढ़ में राजू का चीला पसंद था तो आज मनीराम – हरीराम का चीला|

सुदामापुरी क्रासिंग (अब सुदामापुरी पुल के नीचे) दो भाई अपनी अपनी ठेलों के एक साथ मिलकर खड़ी करते हैं, जिससे भाइयों का प्यार दीखता है| पहली ठेल पर मूंग दाल और दूसरी ठेल पर अंडे का चीला|

मेरी पसंद मूंग दाल का चीला|

आज अंडे का चीला बनाने वाला भाई बीमार है, मेरी दो मूंग दाल चीले की इच्छा रखी है| खुराक से हिसाब से दो चीले पांच रोटी के बराबर का मामला है| पांच चीले पहले हैं – मुझे बताया जाता है| मुझे छटवां और नवां चीला दिया जायेगा| अब हम गप्पे मारेंगे या बीस मिनिट टहल सकते हैं|

पीसी हुई मूंग की दाल को कटोरी भरकर लिया जाता है| और तवे पर फुर्ती से फैलाया जाता है, डोसे की तरह पतला नहीं करते, थोड़ा मोटा रहता है| बात चलती है, चीले को फ़ैलाने का समय और चक्कर दोनों एकदम पक्के हैं, कम या ज्यादा में वो मजा नहीं रहता| जो लोग फ़ैलाने को आसान बनाने के लिए दाल में पानी डालते हैं, वो अपने चीले और यश दोनों में पानी डाल लेते हैं|

जिस समय यह सिक रहा होता है, उसी समय इस पर अदरक, प्याज, मिर्च लगा कर हाथ से थपथपा और दुलार देते हैं| इसके बाद सीधे इसके ऊपर ही पनीर को कद्दूकस कर कर उसकी परत बनाते हैं| पहले से पनीर को घिसकर नहीं रखा जाता| इससे एक समान पर्त बनती है| वह इस को फिर से हाथ से थपथाकर दुलार देता है| यही दुलार तो चीले में जान डालता है| इसके बाद ५० ग्राम मक्कन की टिकिया सिकते हुए चीले के नीचे सरकी जाती है|

दो मिनिट के बाद चीला थोड़ी देर के लिए पलट दिया जाता है| यह भूख को जगा लेने का समय है| चीले के ठीक आठ बराबर हिस्से होते हैं, जी हैं पूरे सात कट| चीला आपकी थाली में परोसा जाता है| आपके सामने खट्टी (हरी) और मीठी (सौंठ) चटनी हैं|

मगर मैं पुराना ग्राहक हूँ| मैं शिकायत करता हूँ| अगर चटनी ग्राहक को अपने हाथ से लेनी पड़े तो वो प्यार मोहब्बत वाला स्वाद नहीं आता|

खाने की हर चीज कला और विज्ञान से भले ही बनती हो, जबतक दुलार न हो वो खाना बन सकती है, स्वाद नहीं| बेसन और अंडे के चीले अगर चम्मच से चाट की तरह खाए जाते हैं तो मूंग दाल चीला हाथ से खाने में स्वाद देता हैं| अगर मूंग दाल चीले के आठ की जगह बारह हिस्से हो तो बेहतर हो, मगर कहीं स्वाद न बदल जाए|

और इस प्यार और दुलार भरे एक चीले का मूल्य 60 रुपये| समय शाम दिन छिपने के बाद| अलीगढ़ की सुदामापुरी रेलवे फाटक (अब पुल)|

पुनः – किसी ज़माने में सुदामापुरी फाटक को खूनी फाटक कहते थे, मगर अब कुछ साल से पुल बन गया है|

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सभी छायाचित्र: ऐश्वर्य मोहन गहराना