विश्व-बंदी २० मई

उपशीर्षक –  ज़रा हलके गाड़ी हांको

क्या यह संभव है कि आज के करोना काल को ध्यान रखकर पाँच सौ साल पहले लिखा गया कोई पद बिलकुल सटीक बैठता हो?

क्या यह संभव है कि कबीर आज के स्तिथि को पूरी तरह  ध्यान में रखकर धीरज धैर्य रखने की सलाह दे दें?

परन्तु हम कालजयी रचनाओं की बात करते हैं तो ऐसा हो सकता है|

ज़रा हल्के गाड़ी हांको, मेरे राम गाड़ी वाले…

अर्थव्यवस्था और स्वास्थ्य दोनों को संभलकर चलाने का पूरा सुस्पष्ट सन्देश है|

गाड़ी अटकी रेत में, और मजल पड़ी है दूर…

वह हमारी वर्तमान स्तिथि को पूरी तरह से जानते और लम्बे संघर्ष के बारे में आगाह करते हैं|

कबीर जानते हैं कि वर्तमान असफलता का क्या कारण है:

देस देस का वैद बुलाया, लाया जड़ी और बूटी;

वा जड़ी बूटी तेरे काम न आईजद राम के घर से छूटी, रे भईया

मैं हैरान हूँ यह देख कर कि कबीर मृत देहों के साथ सगे सम्बन्धियों और बाल-बच्चों द्वारा किये जा रहे व्यवहार को पाँच सौ वर्ष पहले स्पष्ट वर्णित करते हैं:

चार जना मिल मतो उठायो, बांधी काठ की घोड़ी

लेजा के मरघट पे रखिया, फूंक दीन्ही जैसे होली, रे भईया

मैं जानता हूँ कि यह सिर्फ़ एक संयोग है| परन्तु उनका न तो वर्णन गलत है, न सलाह| पूरा पद आपके पढ़ने के लिए नीचे दे रहा हूँ|

सुप्रसिद्ध गायिका रश्मि अगरवाल ने इसे बहुत सच्चे और अच्छे से अपने गायन में ढाला है:

 

Enter your email address to follow this blog and receive notifications of new posts by email.

 

 

विश्व-बंदी १९ मई

उपशीर्षक –  दूरियाँ दो गज रहें

बुतों बुर्कों पर आह वाले, वाह वाले, नकाब लगाए बैठें हैं,

सूरत पर उनकी मुस्कान आती हैं, नहीं आती, ख़ुदा जाने|

जिन्हें शिकवे हैं शिकायत है मुहब्बत है, हमसे दूर रहते हैं,

दुआ सलाम दूर की भली लगती हैं, गलबहियाँ ख़ुदा जाने|

जाहिर है छिपकर चार छत आया चाँद, चाँदनी छिपती रही,

ये दूरियाँ नजदीकियाँ रगड़े वो इश्क़ मुहब्बत के ख़ुदा जाने|

जो नजदीकियाँ घटाते हैं बढ़ाते हैं, अक्सर दोस्त नहीं लगते,

हम खुद से दूर रहते हैं इतना, रिश्ते-नातेदारियाँ ख़ुदा जाने|

महकते दरख़्त चन्दन के बहकते हैं, भुजंग गले नहीं लगते,

गेंदा, गुलाब, जूही माला में नहीं लगते, गुलोगजरा ख़ुदा जाने|

दूरियाँ दो गज रहें, नजदीकियाँ चार कोस, इश्किया रवायत है,

बात करते हैं इशारों से अशआरों से, तेरी नैनबतियाँ ख़ुदा जाने|

 

Enter your email address to follow this blog and receive notifications of new posts by email.

हम देखेंगे: फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

पहले प्रस्तुत है मूल रचना का हिंदी भावानुवाद जिसे श्री विपुल नागर ने किया है:

 

हम देखेंगे

निश्चित है कि हम भी देखेंगे
वो दिन कि जिसका वचन मिला है
जो वेदों में लिख रखा है

जब अत्याचार का हिमालय भी
रुई की तरह उड़ जाएगा
हम प्रजाजनों के कदमों तले
जब पृथ्वी धड़ धड़ धड़केगी
और शासक के सर के ऊपर
जब बिजली कड़ कड़ कड़केगी
जब स्वर्गलोक सी पृथ्वी से
सब असुर संहारे जाएँगे
हम दिल के सच्चे और वंचित
गद्दी पर बिठाए जाएँगे
सब मुकुट उछाले जाएँगे
सिंहासन तोड़े जाएँगे
बस नाम रहेगा ईश्वर का
जो सगुण भी है और निर्गुण भी
जो कर्ता भी है साक्षी भी
उठेगा “शिवोऽहम्” का नारा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो

और राज करेगा ब्रह्म-पुरुष
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो

हम देखेंगे!

मूल उर्दू रचना देवनागरी लिपि में: 

हम देखेंगे

लाज़िम है कि हम भी देखेंगे

वो दिन कि जिस का वादा है

जो लौह-ए-अज़ल में लिख्खा है

जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गिराँ

रूई की तरह उड़ जाएँगे

हम महकूमों के पाँव-तले

जब धरती धड़-धड़ धड़केगी

और अहल-ए-हकम के सर-ऊपर

जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी

जब अर्ज़-ए-ख़ुदा के काबे से

सब बुत उठवाए जाएँगे

हम अहल-ए-सफ़ा मरदूद-ए-हरम

मसनद पे बिठाए जाएँगे

सब ताज उछाले जाएँगे

सब तख़्त गिराए जाएँगे

बस नाम रहेगा अल्लाह का

जो ग़ाएब भी है हाज़िर भी

जो मंज़र भी है नाज़िर भी

उट्ठेगा अनल-हक़ का नारा

जो मैं भी हूँ और तुम भी हो

और राज करेगी ख़ल्क़-ए-ख़ुदा

जो मैं भी हूँ और तुम भी हो|

क्या इस रचना का विरोध उचित है?

धृतराष्ट्र के पुत्र

||एक||

धृतराष्ट्र के सौ पुत्र!

मैं हजारों देखता हूँ,

दृष्टि दिगन्त दुःख है,

गान्धारी पीड़ा धारता हूँ||

||दो||

राज्य प्रासाद के प्रांगण में

चौपड़ नहीं बिछती सदा,

शत-पञ्च के बहुमत से

कौरव विजयी होते रहे||

||तीन||

जो सत्य के साथ हों,

पांच गाँव माँगें सदा,

हस्तिनापुर की जय हो,

पाण्डव करें पुकार,

एकलव्य क्या कहे

क्या धर्म आधार||

 

-ऐश्वर्य मोहन गहराना

नया भला भोर

“नया भला भोर होगा कल”

सुना और चुप रहा

प्रदूषण भरे दिन के

प्रथम प्रहर का मतिमंद सूर्य||१||

 

अँधेरी सांय संध्या,

धूमिल अंधरे में

गहराती रही,

दिन

आशावान रहा

अब कोई अँधेरी रात न होगी||२||

 

सोचता हूँ मुस्करा दूँ

गहन अँधेरे में,

अँधेरा तो देखेगा

मेरी हिमाकत||३||

 

अरी जलेबी

अरी जलेबी गोल मटोल

घूमा घामी पोलम पोल

चाशनी तेरी झोलम झोल

रंग तेरा लालम घोल|

तेरी मौसी इमरती माई

फिर भी तू हमको भाई

इमरती हमने सूखी पाई

तेरे संग में दूध मलाई|

दूध मलाई राबड़ी भाई

देख के हमने दौड़ लगाईं

कड़ी कुरकुरी बड़की माई

मरी मुलायम हमने पाई|

ठण्डी मंडी तुझको खाऊँ

दही जामन उसमें पाऊँ

ठण्डी गर्मी क़स्बा गाऊँ

दूगनम दून मैं खा जाऊँ||

– – ऐश्वर्य मोहन गहराना

 

 

 

बेवफ़ा

मेरी बेवफ़ा ने मुझे छोड़ा न था, दिल तोड़ा न था|

मेरी जिन्दगी से रूह निकाली न थी|

मेरी जिन्दगी में न जलजले आये, न सूखी आँखों में सैलाब, न बिवाई फटे पाँवों तले धरती फटी|

जिन्दगी यूँ ही सी घिसटती सी थी, नीरस, बंजर, लम्बी ख़ुश्क सड़क बिना मंज़िल चलती चली जाती हो|

उस के बिना कल दो हजार एक सौ सतासीवीं यूं ही सी उदास शाम थी|

कहवाखाने के उस दूर धुंधले कोने में उसका शौहर कड़वे घूँट पीता था|

काँगड़ा की उस कड़क चाय की चुस्की के आख़िरी घूँट पर ख़याल आया|

इश्क़ मेरे दिल से रिस रिस के तेरे हुज़ूर में सज़दे करता है, मिरे महबूब!

मेरे माशूक किस कहर से बचाया था तूने मुझे|

वो रात गुजरी थी

वो रात गुजरी थी खड़ामा खड़ामा
किसी चोर पुराने की तरह गुपचुप,
उम्मीद में लौ ए चराग़ शमा ए सुब
दिल बैठे बैठे जाता रहा जाता रहा।

चुपचुप चीखते चटखते तलवे तले
जमीन थी भी कुछ बोझिल बोझिल
उम्मीद के लम्बे साये से डरता हुआ
हौसला हमसाया बैठा रहा बैठा रहा।

दूर सितारे की गर्मी से भरमता हुआ
धड़कन भर धड़कते हुए धधकता रहा
नाउम्मीदियों में रात कुछ बाकी रही
यूँ गुजर रही जागता रहा जागता रहा।

आज की रात सोने दो

मैं तुमसे कहता हूँ

फिर की बातें फिर ही करना,

क्या पता, कल सुबह काली हो,

क्या पता, कल की सुबह काली हो|

आज की रात सोने दो||

 

नींद की क्यारी में

सपनों के बीज बोने दो,

क्या पता, उन्नीदी बंजर हो,

क्या पता, समय की गोद सूनी हो|

आज की रात सोने दो||

 

बिखरा हुआ सपना मेरा,

नींद में तो खिलने दो|

क्या पता, आँखों में मंदी हो,

क्या पता, आँखों पर हदबंदी हो,

आज की रात सोने दो||

 

कल की झूठी आशा में,

ये मंजर धुंधला न खोने दो|

क्या पता, कल घोर निराशा हो,

क्या पता, कल उन्नत आशा हो,

आज की रात सोने दो||

 

 

मुर्दा ख़यालात

तड़पते हुए पीले पन्नों पर उबलती सुर्ख़ स्याही का दरिया न बाँध;

सुन, मेरे मुर्दा ख़यालात में गुलज़ार का आना जाना हो जायेगा|

 

नीले रंग का समंदर को यूँ आसमां में न उलीच उँगलियों से;

सुन, सलमा सितारों सी साड़ी पहन के निकली मरना हो जायेगा|

 

बिना बहर की ग़ज़ल सी जिन्दगी में रेख्ता की रौनक़ न देख;

सुन, मरे दिल के इक झगड़े में फिर इश्क़ का रगड़ा हो जायेगा|

 

अगले जनम में हमारी मुलाकातों के झूठे वादे न कर इस कदर;

सुन, तेरी इबादतों में मेरे मरने का बेजार अफ़साना हो जायगा|

 

इंसान की तरह खोखले इस आसमान में सुराख़ की बातें न कर;

सुन, पत्थर उछाल तो तपाकर खूब जरा कि आफ़ताब हो जायेगा|

हे राम!!

हे राम!

याद होगा तुम्हें

छू जाना उस पत्थर का, पथराई अहिल्या का,

मुझे भी याद है – तुम्हारा अधूरा काम||

कभी कभी मौका मिलने पर,

धिक्कारते तो होगे तुम, अपनी अंतरात्मा को||

सहज साहस न हुआ तुम्हें,

लतिया देते इंद्र को, गौतम को,

गरिया देते कुत्सित समाज को,

उदहारण न बन सके तुम||

हे राम!!

तीन अंगुलियाँ मेरी ओर उठीं हैं,

और इंगिता तुम्हारी ओर||

 

जिंदगी

जब तुम चली गई 

जिंदगी से

हसीं ख्वाब देखता हूँ।

एक दिन आओगी

और पूछोगी तुम।

क्या हम जानते हैं 

एक दुसरे को।

मुस्कुरा जाऊंगा मैं

कह दूंगा नहीं।

और तुम 

सकूं की सांस लेकर।

गुम जाओगी

मेरी यादों में।

दोबारा।।

हिंदी स्वर

से अनार, से आम
पढ़ले बेटा, आएगा काम।

से इमली, से ईख,
मम्मी देती, हमको सीख।

से उल्लू, से ऊन,
ज्ञान बढ़े दो गुणा दून।

ऋषि ज्ञान का दान,
कृषि बिना न होवे खान।

से एकम, की ऐनक,
आंख बिन न रंग रौनक।

ओखली, से औरत,
जोर से बोलो सुनले छत।

अं से अंग, अः पर अतः,
स्वर में जोड़े छः भई छः।

 

खौलते हुए बुलबुले

कचनार से कच्चे और कमसिन

नाजुक से कच्चे कोयले की

धीमे धीमे दहकती हुई

भुनी सुर्ख पंच्तात्त्विय अग्नि पर

होलिका सी डरी सहमी सिमटी

सिकुड़ी से बैठी हुई उस शर्मीली

सिल्बर[1] की सुन्दर सुडौल भगौनी

में नरक के कडुए काले कड़ाहों

में तपते हुए बसंत के भरमाये

घमंडी कडुए तेल[2] की मानिंद

खौलते हुए उस शुद्ध पंच्तात्त्विय

उपचारित निर्मल निर्लज्ज जल[3]

में जबरन जबरदस्त उबलते हुए

उस मासूम हल्के मुलायम निमिषवय

वायु के बुलबुले को देखा है कभी|

 

वो उबला हुआ बुलबुला

एक पल में हवा हुआ जाता है

और छोड़ जाता है अपने पीछे

हजारों मासूम कुलबुलाती सी

किल्लेदार ख्वाहिशे के

निमिषवय बुलबुले और

उन निमिषवय बुलबुलों की

हजारो कुबुलाती ख्वाहिशें

उबलते बुलबुलों की मानिंद

जिनमें मैंने डालें हैं रंगत के

दाने आसाम के चायबागानों

चुनवाकर से मंगवाए हुए|

 

मैं उन उबलती हुई हजारों करोड़ों

मासूम कुलबुलाती सी किल्लेदार

ख्वाहिशों का ख़ुदा हूँ खराब जो

इक ख़ूबसूरत रात के बाद की

अलसाई सुरमई सुबह से पहले

ब्रह्ममुहूर्त में खौलते पानी में

उबलते ख्वाहिशमंद बुलबुलों पर

धीर वीर क्षीर समंदर के बनाये

निहायत नमकीन नमक के

सोंधे स्वाद को छिड़कता हूँ|

 

मैं खौलते पानी में उबलते हुए

उन निमिषवय बुलबुलों की

उस तड़पती हुई कराह पर

आह कर उठता हूँ अक्सर

और बुरक देता हूँ चुटकीभर

मीठी शिरीन शक्कर के

घनाकार वजनी दमदार दाने|

 

वो खौलते हुए बुलबुले

हिन्दुस्तान के आमजनता

की मानिंद चुप हो जाते हैं

मीठी शीरीन शक्कर के

धोखे में उन्हें अहसास नहीं होता

वो अब भी खौलते पानी में

गर्मागर्म उबाले जा रहे हैं|

 

और उनके उबलते हुए कंटीले

नाजुक घावों से रिसते हुए दर्द

पर करहाते हुए नीबू के रस की

दो चार अम्लीय बूंदे छोड़ देता हूँ|

 

वो मासूम सावन की बरसात की

हरियल यादों में सहम जाते हैं

वो जानते हैं अब कुछ न होगा

मगर मिनमिनाने लगते हैं

मिन्नतें मजाकिया मजेदार|

 

मैं मजाहिया मुस्कान के साथ

उतार लेता हूँ उस नामुराद

होलिका सी डरी सहमी सिमटी

सिकुड़ी से बैठी हुई उस शर्मीली

सिल्बर की सुन्दर सुडौल भगौनी

जो पलभर में तपती आग में

भुनकर सुरमई हुई जाती है|

 

खुर्जा से खरीद हुई उस

संगमरमरी चीनी मिट्टी के

रंगदार सजावटी सुन्दर शाही

चाय की प्याली में उड़ेली हुई

उस खौलती चाय को सुड़ककर

पीते हुए सोचता हूँ क्यों न

नामुराद भाई ऐश अलीगढ़ी

दिल्ली के पीर ख्वाजा की

दरगाह के बाहर चौराहे पर

नीली छतरी वाले गुम्बद के

छोटे चारबाग़ में बैठकर

मकबरा हुंमायूं को देखते हुए

खुद अपनी मल्लिका मोहब्बत

की उस रोहानी याद में एक

रोमानी सी गजल की जाए|

 

[1] हंडोलियम को देहात सिल्बर कहते हैं इसमें सिल्वर से धोखा न खाएं|

[2] सरसों का तेल

[3] आपका प्यारा आरओ वाटर

तू जो कह दे, उसे जुबां में हंसकर अपनी दे दूँ,

ये मौसम गुनगुना है, हवाओं में खुशबू है|

फ़िजाओं में घुला है, नशा तेरे होने का – साथी||

 

पत्थर भी गुनगुनाते हैं, गीत भौरों की जुबां में,

कौवे भी गाते हैं, मुहब्बत के मुस्कुराते तराने|

तेरी ही आवाज़ में, मैं आवाज आज देता हूँ,

गुमशुम सी हंसती है, हस्ती मेरे, मेरे होने की||

 

जिन्दगी में तरन्नुम है, तरानों में रस्मी रवानी है,

बचपन की बचकानी बातें, आज मेरी जवानी हैं|

अमावास की रातों में, अब पूनम की चाँदनी है,

तेरी दरियादिली में, मेरी मस्त जिन्दादिली है||

 

तू जो कह दे, उसे जुबां में हंसकर अपनी दे दूँ,

तेरे परचम की अदा पर, निछावर रंग मेरे दिल के|

मेरा हमसफ़र तू, मेरा सरमाया तू, तू ख़ुदा है,

आगोश में तेरे आने को, मेरा सिर यूँ झुका है||

 

दिवाली

बहुत दिन हुए

दिवाली हुए

चलो

किसी गैर मुल्क का

दिवाला पीटा जाए

कुछ तलवार दिमागों को

जंग लगाया जाए

मोर्चा सजाएं

जवान दहलीजों पर|

बहुत दिन हुए,

हथियारों की

दलाली खाए||

भारतीय प्रेमी के हृदय से

तुम्हारे हर न के लिए

मेरा प्रतिशोध होगा

चिर अनंत तक झूल जाना

पौरुष के भग्नावशेष के साथ |

क्योंकि टूटा पुरुष भारतीय

निराशा के क्षीरसागर से

निकलता हुआ तिमिर है |

और तुम असमर्पित!

गलबहियां डालना

नागवेणी बनकर |

मेरी माँ ने भी कदाचित

न नहीं कहा था निश्चित

मुझे धारण करने से पहले|

चिकुनगुनिया की रात

गुनिया की माई के चिकुन और गुनिया,

बचपन की सोनचिरैया जैसा चिकुनगुनिया,

बढ़ई की गुनिया सा चिकना चिकुनगुनिया|

तेरे प्यार की टूटन की तरह टूटता तन बदन,

पोर पोर से दर्द – दर्द से रिसता हुआ गगन,

मेरे अंतर उतरती प्यार की पहली पहली चुभन,

हौले हौले चुभती तेरी साँसों की बहकी पवन|

 

गुनिया की माई के चिकुन और गुनिया,

बचपन की सोनचिरैया जैसा चिकुनगुनिया,

बढ़ई की गुनिया सा चिकना चिकुनगुनिया|

तंदूर की तलहटी में भुनता तंदूरी चिकन,

छिटक छिटक जाता चरमराता अंतर्मन,

इश्क़ की कड़ाही के जलते तेल में तलते

आखिरी उम्मीद का चढ़ता इश्क़न बुखार|

 

गुनिया की माई के चिकुन और गुनिया,

बचपन की सोनचिरैया जैसा चिकुनगुनिया,

बढ़ई की गुनिया सा चिकना चिकुनगुनिया|

चौपड़ की बिसात पर शकुनि का पासा,

धृतराष्ट्र की धूर्तसभा में विदुर की भाषा,

अंधे भीष्म का जोशीला सांस्कृतिक प्रलाप,

अस्पताल में दम तोडती मरीज की मुनिया|

 

गुनिया की माई के चिकुन और गुनिया,

बचपन की सोनचिरैया जैसा चिकुनगुनिया,

बढ़ई की गुनिया सा चिकना चिकुनगुनिया|

बन्दूक की नौक पर||

दिल जीत लूँगा

दुनिया के सारे हत्थे निहत्थे मूर्ख बर्बर पापियों के

बन्दूक की नौक पर||

हर सुबह लाऊड स्पीकरों से सर्वव्यापी के कान फोड़कर

बता दूंगा जता दूंगा अपनी भक्ति

सर्वशक्तिमान को बचा लूँगा मैं शैतानी फंदों से

दुनिया के तमाम दरिंदों से, जो नहीं पूजते उसे,

या पूजते हैं उसे किसी और नाम से,

या चुपचाप रहकर उसे अपना काम करने देते हैं|

दिल जीत लूँगा

दुनिया के सारे हत्थे निहत्थे मूर्ख बर्बर पापियों के

बन्दूक की नौक पर||

 

दुनिया की हर रसोई में जाकर कच्चा चबा जाऊंगा

जो गाय खाता है जो सूअर खाता है

जो घोड़ा खाता है जो घास खाता है

जो खाता है जो खाता है जो खाता है जो खाता है जो खाता है

चबा जाऊंगा उसका ज़िगर दिमाग कलेजा खून के थक्के

थूक दूंगा इंसानियत उसकी नीली पीली धूसर लाल लाश पर|

दिल जीत लूँगा

दुनिया के सारे हत्थे निहत्थे मूर्ख बर्बर पापियों के

बन्दूक की नौक पर||

 

फौड़ दूंगा उन घबराई सहमी आँखों को

जो नहीं देखेंगी वासना में छिपे मेरे प्रेम की ऊँचाई

फंसाना चाहती है मुझे अपने प्रेम जाल की गुलामी में

चीर दूंगा टांगों से छाती तक मखमली खूबसूरत बदन

जो मेरे मर्द को नहीं पहचान पायेगा मेरी मर्जी के वक्त

दिल जीत लूँगा

दुनिया के सारे हत्थे निहत्थे मूर्ख बर्बर पापियों के

बन्दूक की नौक पर||

आज की रात

आदमी रोता है

चुपचाप अकेले

अपनी परछाइयों के तले

दूर तक गूँजतीं

झींगुरों की आवाज के सहारे||

 

रात उतनी लम्बी

तो होती ही है

आप गिन लेते हैं

आसमान के सारे तारे

तमाम प्रदूषण के बाद भी||

 

मेरे पेट में

रह रह कर

मरोड़ उठता है

लगता है कभी

खा ली है

ईमानदारी की कमाई||

 

रात को सोते सोते

उठ जाता हूँ आज भी

सपने में दिखाई देता है

जब कभी

अपना चेहरा||

डरपोक  सर्वशक्तिमान

पूजाघर में बंद डरपोक
सर्वशक्तिमान!!

कब कर मारते रहोगे,
जिन्हें यकीं नहीं तुम पर|

मुझसे मत कहो,
खुद पर यकीं करो|

बचा लो खुद को
अपने बचाव-दल से||

That poor unsecured God
always kills,
God! save yourself,
from your defenders.

 

तीन हाइकू

वक़्त ठहर जाता

अरमां यूँ ही पिघलते रहते

इश्क़ के अक्ल होने तक||

 

जुनूं था दीवाने को

तेरी मुहब्बत का इश्क़ और

इश्क़ का इबादत होना||

 

दिल चुभता सुबह सुबह

फंस गया पंक्षी चहकत चहकत

पानी की गरारी में||

 

कोशिश की है आज हाइकू लिखने की| मन की बात छुपाने के लिए और छुपाने से जायदा कहने के लिए सही माध्यम लग रहा है|

 

अच्छी लड़की

[१]

ओढ़ाती है दुपट्टा

रत्ती भर इज्जत को

पानी से पर्दा रखती है

बंद गुसलखाने में

डर डर कर नहाती है

अच्छी लड़की|

[२]

फब्तियां और फितरे

डराते नहीं हैं मगर

शरीर की कैद में

दम तोड़ देती है इज्जत

चुप रहती है

अच्छी लड़की|

[३]

सड़क किनारे मूतते मर्द

माँ बहन पड़ोसन

रण्डीखाने में ढूंढते हैं

जिसे नहीं पाते वहाँ

चस्पा देते है तमगा –

अच्छी लड़की|

अम्मी ये डार्विन झूठ बोलता है..

अम्मी ये डार्विन झूठ बोलता है..

कहता है हम जानवर से इंसान बने है!!

इसने कभी जानवर देखे भी हैं?

अम्मी ये डार्विन झूठ बोलता है..

क्या सुना है हिरण ने

किसी हिरण के बच्चे को सींग भी मारा हो?

अम्मी ये डार्विन झूठ बोलता है..

क्या सुना है शेर ने कभी मारी हो भेड़

अपनी भूख से ज्यादा ?

अम्मी ये डार्विन झूठ बोलता है..

क्या कभी देखा है किसी भेड़िये को

भेड़िये के बच्चे मारते हुए?

अम्मी ये डार्विन झूठ बोलता है..

क्या सुना है कभी

मच्छर को मच्छर का खून पीते हुए?

अम्मी ये डार्विन झूठ बोलता है..

अम्मी ये डार्विन झूठ बोलता है..

मैं

मैं, मैं रहूँ|

 

मुझे में मैं न हो|

 

मैं मैं न सोचूँ,

मैं मैं न कहूँ,

मैं मैं न करूँ|

 

मैं मैं, मैं और मैं

हम हो जाएँ|

 

हम इतना मिलें

एक हो जाएँ|

 

हम मैं हो जाएँ||

 

पुराना जूता

जल्दी है मुझे

दौड़ जीतने की|

जल्दबाजी में मैंने छोड़ दिया है

जूते पहन कर आना|

 

बदहवाश सा दौड़ रहा है

वक़्त मेरे आगे|

मेरे सीने में जलता बारूद

उसे रुकने नहीं देता|

 

पहाड़ से ऊपर उठते हुए

रुक जाना है मुझे,

बारीक सी कंकड़ी

मेरे पैर में चुभी है|

 

मन का आक्रोश

उदास है

सहमा हुआ क्रोध

मुस्कुराता है|

 

मेरा वो पुराना जूता

कहाँ है

जिसका जिक्र करना

छोड़ दिया है मैंने|

भगवान् के घर

बिना बुलाये तो ऐश्वर्य भगवान् के घर भी नहीं जाता, मगर भगवान् बुला न ले, इस डर से कोने में दुबक जाता है|

बिना बुलाये तो ऐश्वर्य भगवान् के घर भी नहीं जाता, मगर बिना बुलाये मंदिर मस्जिद रोज जाता है और प्रार्थना करता है भगवान् बुला मत लेना|

बिना बुलाये तो ऐश्वर्य भगवान् के घर भी नहीं जाता, मगर भूल जाता है भगवान् का घर तो उसके दिल में है; ऐश्वर्य बिना बुलाये अपने दिल में भी नहीं जाता,  कभी नहीं||

बिना बुलाये तो ऐश्वर्य भगवान् के घर भी नहीं जाता, मगर उसे सच में यह पता नहीं भगवान् है कौन? है, है भी, या नहीं है|

वादे

वादे टूटने से पहले

भुला दिया जाता है

उन्हें याद दिलाया जाना

उन पर सवाल करना,

वादे तोड़ने दिए जाते हैं||

काला जादू

 

काले काले बादल

काली घटाएँ

बरसात को दोपहर का घना घनघोर काला अँधेरा

बरसात में उलझे सुलझे लम्बे काले बाल

बारिश की धुली धुली सी लम्बी काली सड़कें

काली लम्बी कार में लम्बा सफ़र…

कजरारी काली आँखों वाली सांवली सलौनी सजनी…

बरसात की इस काली काली रातमें…

आधुनिक बड़ा काला कैमरा

वो सफ़ेद काली तस्वीरें

उफ़.. तेरी वो कमीनी काली याद

बरसात बरसती है या काला जादू

 

This contest is a part of #WhatTheBlack activity at BlogAdda.com

स्वर्ण लंका

 

एक समय की बात..

मृत्यु लोक का एक नगर..

इंद्र के स्वप्न सरीखा..

 

सोने की सड़क.. सड़क पर सोना..

सोने के स्तम्भ..        सोने के स्तूप..

सोने के शस्त्र..  सोने के शास्त्र..

सोने की समृद्धि..        समृद्धि का सोना..

सोने का सूर्य..          और चन्द्र..

 

नभ वायु जल आकाश सब सोना..

राज मुकुट सोना…       पददलित पायदान सोना..

 

स्वप्न भी सोना..        श्वास भी सोना..

रुदन, क्रदन, हास्य सोना सोना सोना…

सुख दुःख, प्रेम प्रतीति, श्रृद्धा सुमन, रिश्ते नाते, मित्र शत्रु सब सोना…

 

सब सुखी, सब मस्त, सब पस्त, सब प्रसन्न, सब सन्न, सब आसन्न, सब श्रेष्ठ…

सोना तो कुंदन है…      कसौटी है…

जिधर स्वर्ण; उधर धर्म, मर्म, कर्म, शर्म.. उधर हवा गर्म… ह्रदय नर्म….

 

जलते थे, जलाती थी..    जल से घिरी लंका जला दी गयी..

 

विकट वनवासी वानर..    वानर ने जला दी..

नासमझ वानर…       भालू, रीछ, जंगल वाला वानर….

 

न हाथ लगाया..         न मन, न मस्तिष्क…

लंका ने वानर की पूँछ में आग दे दी.. आग लगा दी.. आग लग गयी…

वानर उछलता रहा.. कूदता रहा.. भागता रहा…

आनंद आग में बदल गया.. आनंद नहीं फैला.. आग फैल गयी….

 

लंका भष्म हो गयी..    

अहंकार, अहंकार नहीं… चाटुकार नहीं 

रावण विद्वान.. रावण ज्ञान.. रावण महान… रावण लोक पति.. रावण विश्वरूप,

रावण विकास.. रावण समृद्धि.. रावण सोना.. रावण समस्त सृष्टि.. 

रावण सुन्दर.. रावण शिव सुन्दर.. रावण सत्यम् शिवम् सुन्दरम्

 

लंका राख.. लंका चिता.. लंका चिता की राख.. लंका अस्थि कलश…

लंका लंका लंका लंका लंका लंका लंका लंका स्वर्ण लंका…

स्वर्ण लंका..                         स्वर्ण लंका..

ट्रॉफी, टॉफी और लड़कियाँ

 

लड़कियाँ ट्रोफ़ियां होतीं हैं

शानदार रंगबिरंगी सजावटी|

 

जीत ली जातीं हैं;

प्रेम से, मुहब्बत से,

जंग से, रंग से,

पैसे से, परम्परा से,

जोर से, जमीन से,

चटपटी मीठी बातों से|

 

दांव चढ़ जाती है;

प्रेम की, परंपरा की,

परिवार की, पैसे की,

दान की, दहेज़ की,

मायके की, सुख की,

दुहाई की, दुःख की|

 

सजाई जातीं है;

अगल में, बगल में,

सगाई में, ससुराल में,

बैठक में, बिस्तर में,

चौके में, चूल्हे में,

सजावट में, समारोह में|

 

लडकियाँ टोफियाँ होतीं हैं

शानदार रंगबिरंगी सजावटी|

 

बाँट दी जातीं है;

पुरुषों में, पत्थरों में,

प्रसाद में, पुरुस्कार में,

महलों में, मंदिरों में,

रिश्ते में, नाते में,

कोठिओं में, कोठों में|

 

चूस लीं जातीं हैं;

गंध में, सुगंध में,

रंग में, बिरंग में,

संवाद में, स्वाद में,

प्रकाश में, अंधकार में,

मन में, मंदिर में|

 

लड़कियाँ

ट्रॉफी होतीं है, टॉफी होतीं हैं|

 

लड़कियाँ

नहीं जानतीं जिन्दा होना|

 

लड़कियाँ

जानतीं है लड़कियाँ होना|

 

हर पल मेरी बातें

 

हर पल

मेरी बातें करता|

 

सुबह शाम

मोबाइल मचलता|

 

जागना, सोना, खाना, पीना,

बिन मेरे न जीना|

 

चल दीं, पहुँचीं,

हर जगह पर क्यों होती हो,

बारिश धूप में क्यों रोती हो|

 

चिंता, हर दम हर पल,

नींद उड़ा बैठा है|

 

सुबह छोड़ना दफ्तर तक,

लेने आना रोज,

हरपल उसकी आँखें

करती मुझको खोज|

 

न चिंता खुद के खाने की

न अपने दफ्तर जाने की|

 

कितना ही अच्छा है,

कितना ही भोला है,

कितना प्यार भरा है,

कितना ध्यान धरा है||

 

न पूछो उसकी बातें,

सोचती हूँ,

क्या होगा जब पाऊँगी,

उसने जीवन में सिर्फ प्यार करा है,

मुझको पाने की खातिर,

सोंप सका क्या मुझको,

अपने जीवन की थाती?

 

क्या माता की आशा,

क्या पिता का तप,

क्या भाई के बल,

क्या बहन का स्नेह,

कुछ मान रख पाया है?

 

पढ़ न सके तुम मेरी खातिर,

कर न सके तुम मेरी खातिर,

उन्नति के पथ की बातें?

 

प्रेम की पोथी बांची थी जब,

ज्ञान की पोथी क्यों छोड़ी?

करते थे आने जाने का क्रम,

कर न सके तुम थोड़ा श्रम?

 

मैं प्रेम तुम्हारा हूँ,

जीवन का धिक्कार नहीं,

जो उन्नति को रोके,

वो सच्चा प्यार नहीं||

 

सर फोड़ दिया

ख़ुशी का कतरा

मिला एक पल

देर से मिलने का शिकवा

न मिलने की शिकायत

भूल जाने का झगड़ा

सर फोड़ दिया साले का

अरे वही

ख़ुशी का कतरा

सर फोड़ दिया साले का

सुलझी बात उलझी बात||

सीधी बात

सुलझी बात

रेशम सी फिसलती बात

तेरी ज़ुल्फ़ को सुलझाते

उलझ गयी

बन गयी

उलझी बात|

सुलझी बात

उलझी बात||

इन्द्रप्रस्थ का राजतिलक

 

बार बार.. हर युग में.. युद्ध होते हैं| अधर्म के सहारे, धर्म युद्ध लड़ें जाते हैं|

प्रत्येक मानव को देवराज इंद्र का आसन चाहिए| निर्विवाद, अपराजेय आसन.. भोग, विलास और अप्सराएं|

इन्द्रासन तक पहुँचने का मार्ग, इन्द्रप्रस्थ होकर जाता है| इन्द्रप्रस्थ का राजमुकुट भी तो स्वर्ण आभासित पुरुस्कार है|

अहा! पुरस्कार के लिए प्रतियोगिताएं रचीं जातीं हैं|

ओह!! प्रतियोगितायें नहीं; युद्ध, गृहयुद्ध, महायुद्ध, धर्मयुद्ध, रचे जाते हैं| युद्ध तो योद्धा का खेल है, जिसे रचा, खेला और लड़ा जाता है|

पल बदलता है, काल बदलता है, युग बदल जाते हैं| प्रतियोगी बदलते हैं, प्रतिभागी बदलते हैं, योद्धा बदल जाते हैं| मानव बदल जाता है…| अरे..!! मानव तो कभी नहीं बदलता… |

अरे भाई! इंद्रप्रस्थ की सत्ता.., प्रजा की प्रसन्नता का संधान नहीं है| ये तो चौसर की बिसात है, चतुरंग का चतुर चक्रव्यूह है|

सत्ता के हर चरण में दाँव पर दाँव लगाये जाते है| चारण, चाटुकार.., मित्र, मंत्री.., माया, मदिरा और मूर्ख सजाये जाते हैं| माता, बहन, पुत्री, पत्नी, स्व – स्त्री, पर – स्त्री, भेंट चढ़ाये जाते हैं|

सत्ता में भाई नहीं होता; पिता, पितामह, पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र, नहीं होते| सत्ता के शिखर की सीढियाँ प्राणविहीन नश्वर शरीरों से बनायी जातीं हैं| सत्ता की पताकाएं मृत – आत्माएँ लहरातीं हैं|

नर बलियों से ही तो सत्ता के देव प्रसन्न होते हैं|

सत्ता का सारथि ही योद्धा का एकमात्र मित्र, सखा, भाई, पिता, गुरु, देव, हृदय और आत्मा होता है| उस सारथि का हर कथन, वेद – गीता, गीत – संगीत, स्वर – स्वाहा होता है; उन्ही से तो सत्ता के महाकाव्य रचे, गढ़े, पढ़े, कहे, सुने, समझे जाते हैं|

हाय!! हाय!! आज तो घोर कलियुग है| न राजा, न राजतन्त्र.., न राजगुरु, न राजमाता.., न राजमहल, न रनिवास.., न रानी, न पटरानी.., न राजकवि, न राज दरबार.., न ही राजगायक, न राजनर्तकी|

अहा! हा हा!! राजा कभी नहीं मरा करते| इस भूलोक पर राजा ही तो देव का साक्षात अवतार है| अवतार हर युग में आते हैं| राजा, सम्राट, शहंशाह, सुल्तान, गवर्नर जनरल, लाट साहब, मंत्री, प्रधानमंत्री| असंख्य – अनंत अवतार|

अवतारी पुरुषों का पुरुषार्थ.., अवतारी स्त्रियों की आभा…, बात ही कुछ और है| सत्ता उनकी रखैल रहती है|

दंगे – फसाद, खून – खराबे, गृहयुद्ध – विद्रोह, आतंकवाद – नक्सलवाद, चाकू – बल्लम – भाले, बम – धमाके, वैश्या  – बलात्कार… अरे बस नाम ही तो बदले हैं|

सत्ता के शास्त्र में, त्रेता, द्वापर, कलियुग… सब एक हैं|

उन्माद का शंखनाद है… रुदन का संगीत है|

इन्द्रप्रस्थ के राजतिलक में आज भी नरमुण्ड हैं.. नर बलि है.. नग्न नृत्य है…||

नरमुण्ड हैं.. नर बलि है.. नग्न नृत्य है…||

नीबू की चाय

नीबू की चाय से उठती भाप

की उस भीनी भीनी सी गंध में

अरे तुम ही तो हो!!

 

साँसों की सरगम में घुलकर

मेरे फेफड़ों में उतरते हुए

मेरी रक्त शिराओं में बहती

मेरे हर विचार का असल

अरे तुम ही तो हो!!

 

नीबू की चाय के हर घूँट में

खट्टे मीठे से नमकीन स्वाद में

अरे तुम ही तो हो!!

 

मेरे होठों पर गुलाबी मिठास

मेरी जीभ के नमकीन अहसास

रोम रोम का कांपता कम्पन

रगों में दौड़ती गुनगुनी धुप

अरे तुम ही तो हो!!

 

चाय की छोटी सी प्याली में

ठहरे समंदर की शांत लहरों में

अरे तुम ही तो हो!!

 

मेरी धड़कनों की धुँधली सी ध्वनि

माथे पर उँगलियों की छुवन सी

स्पर्श के सरगम से संगीत तक

ठंडे भारी पल में गर्माहट सी

अरे तुम ही तो हो!!

नीबू की चाय से उठती भाप

की उस भीनी भीनी सी गंध में

अरे तुम ही तो हो!!

बीच पिछाड़ी में

बाजारू रद्दी से

चीन्हते बीनते

ख़बरों का कलेवा

उबली मरीली फीकी चाय

फूकते सुङगते

अटक गयी है,

कसैले मूँह में;

चूतियापे के चड्डू

और बेस्वाद चिल्लपों|

 

मर गयी खेत मजदूर की औलाद

चाटकर सरकारी परोसे की थाली|

अलापकर सत्ता का रण्डी रोना

हैदराबाद हॉउस की बिरयानी

डकार गए हाकिम के बाप|

नये ब्रह्मास्त्र की खरीद के

डर के मारे मूत गयी

फौजी की माँ बहन|

देश के जवान सांडो ने

सड़क पर ठोंक दी

मस्त जवान छोरी|

चार साल की लड़की की

छोटी फलारिया देख कर

हो गया देश की इज्जत का

मासिक धर्म|

चिकने कागजों में हुई

दलालों की दावत

चर्चा में चमक गया

चड्डी पर लिया गया चुम्मा|

 

देश की तड़पती जवानी ने

खाए दुनियादार बाप के जूत

चुपचाप बैठ के लगाली 

बीच पिछाड़ी में सुन्न की सुई||

 

 

लिए कटोरा हाथ … स्कूल चले हम…|

स्कूल चले हम
लिए कटोरा हाथ
स्कूल चले हम|
 
                        स्कूल चले हम
                        लिए कटोरा हाथ
                        स्कूल चले हम||
 
हाड़ तोड़ते बाप
कमर तोड़ती मैया 
स्कूल चले हम|
 
बाप के हाथ लकीरें 
माँ की आँख आंसू
स्कूल चले हम|
 
                        स्कूल चले हम
                        लिए कटोरा हाथ
                        स्कूल चले हम||
 
लिए कटोरा हाथ.. स्कूल चले हम..

लिए कटोरा हाथ.. स्कूल चले हम..

पेट बाँध कर सोये 
पेट पकड़ कर जागे 
स्कूल चले हम|
 
दाल भात का सपना 
थाली में हो अपना 
स्कूल चले हम|
 
                        स्कूल चले हम
                        लिए कटोरा हाथ
                        स्कूल चले हम||
 
साहब जी का नोट 
नेता जी का वोट 
स्कूल चले हम|
 
भूख हमारी जात
नंग हमारी पात 
स्कूल चले हम|
 
                        स्कूल चले हम
                        लिए कटोरा हाथ
                        स्कूल चले हम||
 
कखगघ से क्या लेना 
जोड़ घटाव लेकर भागे 
स्कूल चले हम|
 
मास्टर पूछें जात 
बड़के मारें लात 
स्कूल चले हम|
 
                        स्कूल चले हम
                        लिए कटोरा हाथ
                        स्कूल चले हम||
 
देश दरिद्दर क्या जानें 
ईश्वर अल्लाह क्या मानें 
स्कूल चले हम|
 
पोखर पतली दाल 
कंकड़ चुभता भात
स्कूल चले हम|
 
                        स्कूल चले हम
                        लिए कटोरा हाथ
                        स्कूल चले हम||
 
साहब बाबू डटकर खाते 
जिम जाकर कमर घटाते 
स्कूल चले हम|
 
माँ बोलीं डटकर खाना 
भूखे लौट न आना 
स्कूल चले हम|
 
                        स्कूल चले हम
                        लिए कटोरा हाथ
                        स्कूल चले हम||
 

बेटा मिग उड़ाता था!

 

बेटा मिग उड़ाता था![i]

 

हँसती थी माँ,
गाती थी माँ,
बचपन में जब,
बेटा जहाज उड़ाता था|

 

गाती थी माँ,
गोदी में लेकर,
सपनों की लोरी,
बेटा सोने जाता था|

 

रचती थी माँ,
चौके में जाकर,
भोजन थाली,
बेटा पढ़ने जाता था|

 

डरती थी माँ,
अनहोनी बातों से,
नन्हे हाथों में जब,
बेटा बन्दूक उठता था|

 

उठाती थी माँ,
मिठाई के दौनों से,
आसमां सर पर,
बेटा अव्वल आता था|

 

रोती थी माँ,
भूली बिसरी यादों से,
अनहोनी आहों से,
बेटा चुप करता था|[ii]

 

सुख सांझे थे,
दुःख सांझे थे,
माँ के सपनों के गुल्ले,
बेटा बुनकर लाता था|

 

शिखर कुलश्रेष्ठ  चित्र आभार सहित http://indiatoday.intoday.in/story/iafs-mig-21-bison-crashes-in-uttarlai-in-rajasthan-pilot-killed/1/291418.html

शिखर कुलश्रेष्ठ
चित्र आभार सहित http://indiatoday.intoday.in/story/iafs-mig-21-bison-crashes-in-uttarlai-in-rajasthan-pilot-killed/1/291418.html

मुस्काती थी माँ,
संतोष में पल में,
दिनभर मेहनत की,
बेटा खबर सुनाता था|

 

उड़ती थी माँ,
गाती थी माँ,
बच्ची थी माँ,
बेटा मिग उड़ाता था|

 

क्या करती माँ?
क्या करती माँ!!
हाय रे हाय,
बेटा मिग उड़ाता था!!!

 

क्या करती माँ?
क्या करती माँ!!
हाय रे हाय,
बेटा मिग उड़ाता था!!!


[i] फ्लाइट लेफ्टिनेंट शिखर कुलश्रेष्ठ को समर्पित, जिन्हें सोमवार १५ जुलाई २०१३ को मिग दुर्घटना ने हमसे छीन लिया|

[ii] शिखर में काफी समय पहले अपने पिता को खो दिया था|

शब्दहीन संवाद मेरे

शब्दहीन संवाद मेरे
जाने कितने सार्थक हैं
जाने कितने कारगर हैं
जाने कितने नाटकीय हैं?
 
परन्तु हैं अवश्य
कुछ न कुछ|
 
सुनता है कोई
आँखों से, ह्रदय से,
पर कैसे, कितना
जाने किस अर्थ में?
 
उनकी सरलता और गूढता के मध्य
संघर्ष रत ह्रदय के साथ,
साथ साथ नहीं चल पाता
मैं सदा मष्तिष्क के|
 
या मष्तिष्क पिछड़ता है
ह्रदय के इस दौर में|
 
शब्द हीन संकेत कहता हूँ
शब्द परक संकेत करता हूँ,
कंगाली के गीले आते सी
दुविधा बढ़ जाती है|
 
दूरियों के इस ओर मेरा साकार
दूरियों के उस ओर निराकार
कोई समझ नहीं पाता कुछ
सही, सटीक, सार्थक|
 
जो कि मैं समझाना चाहता हूँ
दूरियों के इस पार से|
 
क्योकि मेरे संवाद
शब्दहीन होते हैं बेशक
संकेत हीन नहीं रह पाते
हीनता के चंगुल में|
 
मेरा ह्रदय और मष्तिष्क
ढूंढता हैं क्रिया – प्रतिक्रिया
सुसमय, सटीक, सम्पूर्ण,
प्रतिक्रियाएँ सदा नहीं आतीं|
 
तपता रहता है ह्रदय
टीपता सा उस पार|
 
दूरियों के उस पार का
धुंधला सा प्रकाश बिंदु
निराशा मुक्त रखता है
आभायुक्त रखते हुए|
 
मुझे आशा है निरंतर
यह क्षितिज का सूर्य है
शिशु – बाल से यौवन तक
विस्तार पायेगा, उठते हुए|
 
ह्रदय में टिमटिमाता है भय
यह दिशा पश्चिम न हो|
 
संवाद प्रेषित करता हूँ निरंतर
शब्द हीन, यदा-कदा संकेत हीन
बेखबर इस भय से, कहीं
अन्धकार में न पाया जाऊं||
 
ऐश्वर्य मोहन गहराना
(यह कविता अप्रेल 1994 में लिखी थी, उस समय नव युवक के
 मन में उमड़ती प्रेम की व्यथा, दिमाग में घुमती ईश्वर की सम्भावना,
 जीवन की नितांत अनिश्चितता की कथा कहीं थी शायद मैंने|
उस समय जो टिप्पणी लिखी थी, प्रस्तुत है:
 “यह कविता किसी भी वाक्य में मेरी
 मेरी बात का एक वाक्य भी पूर्णता से
 नहीं कह पाती| परन्तु लिखने के बाद मुझे 
 निश्चिंतता है, मैं भाव व्यक्त कर सका|
 भले ही उस से नहीं, उन से नहीं जिनसे
 व्यक्त करना चाहता हूँ|”)

हम क्यों तड़पते हैं!!


हम क्यों तड़पते हैं!!
दूर छोर पर रहते,
किसी अनजान के लिए|
अपना अस्तित्व,
अपनी चेतना,
समाहित करने के लिए||
 
क्यों खो देते हैं,
अपना आप,
अपना स्व,
अपना स्वाभिमान|
निरे दंभ के बाद भी,
चारण बन जाते हैं,
किसी के||
 
अपनी प्रोढ़ता को
क्यों बचपन में बदलते हैं|
दूसरों को हम
अपने लिए
दौड़ाते दौड़ाते,
खुद,
टहलने लगते हैं;
प्रतिपल, प्रतिक्षण,
आस पास, आजू बाजू|
 
अपना स्थापित सा
परिचय
क्यों भुला देते हैं,
मिटने मिटाने जैसा|
 
नए क्षितिज की ओर
नए परिचय का
अन्वेषण,
क्यों करते हैं|
 
क्यों मिट जाती हैं,
हमारी;
आशाएं, आकांक्षाएं, अभिलाषाएं|
समुद्री रेत के महलों की तरह
आती जाती लहरों पर
सवार होने के लिए|
 
हमारा ह्रदय!
हमारा अपना ह्रदय,
क्यों भर जाता है,
ज्वार से,
उन समुद्री दुष्चरित
आती जाती लहरों से|
 
हमारी अपनी लक्ष्मण रेखाएं,
क्यों राख हो जाती हैं
हमारे अपने स्पर्श से|
 
जलतरंग
हमारे ह्रदय की
जलतरंग!
क्यों बदल जाती है
शहनाई में|
 
शहनाई जो
बधाई की होती है
सुख की होती है
दुःख की होती है
सन्नाटे की होती है|
 
अपने ही हाथों
हम अपना क्यों
नृशंस संहार करते हैं|
आखिरकार;
आखिर क्यों
हम प्यार करते हैं?
 
ऐश्वर्य मोहन गहराना

(मूल कविता अब से १९ वर्ष पूर्व अप्रेल 1994 में लिखीं गयीं थी, उन्हें अब पुनः व्यवस्थित कर कर
प्रस्तुत कर रहा हूँ| आशा हैं, प्राचीनता का अनुभव नहीं देगी|
मेरे बचपन के साथी मुझे उस समय प्रोढ़ कहते थे और आज बहुत से लोग मुझ में बचपन खोज लेते हैं,
ऐसे ही किसी प्रसंग में इस कविता की याद हो आई|
इसकी कुछ पक्तियां बार बार मेरे दिल को छू रही हैं: “अपनी प्रोढ़ता को, क्यों बचपन में बदलते हैं”
शायद उस समय भी सत्य थीं और आज भी हैं| मित्र बताएँगे|)

प्रातः का पुनर्निर्माण

      (प्रातः का प्रथम पल)  
वो सुबह सुबह की अंगड़ाई,
       सुस्ताई, अलसाई, मदराई|
वो जगती, उन्नीदी आँखे,
       तू गीत, भ्रमर की गाई||

            वो अधसुलझे, उलझे बाल,
                   तेरा छितरा, बिखरा हाल|
            वो फूटे टूटे कंघी के दान्ते,
                   सौ मकड़ी का मकड़-जाल||

                        वो रूकती जीवन की नैया,
                               बेबस, बेसबब, बेअदब, बदहाल|
                        वो रूठा हास, परिहास, उल्लास
                               छूटा, सच्चा-झूठा, प्रातःकाल||

                              (पुनर्निर्माण के उपरान्त)
                        ओह! निखरी खिलती हंसतीं तुम,
                               चिड़िया चहकी, कूकी कोयल|
                        सद्य स्नाता, सुमुस्काती नारी,
                               पुलकित, वायु नभ जल थल||

                  वो रेशम की लहराती साडी,
                         सुलझे सुगढ़ सलोने बाल|
                  उल्लसित, अहलादित, बाला,
                         लहराती मृगनयनी सी चाल||

            हास, परिहास, उल्लास, विलास,
                   भरपूर जवानी जीता जीवन|
            इस धरा की अखंड स्वामिनी,
                   तुमने जीता मेरा तन्मय मन||
(मेरी इस कविता के प्रथम भाग में सुबह – सुबह घर में प्रेयसी के उलझे सुलझे रूप को 
देख कर उत्पन्न निराशा का वर्णन है| उनके उलझे बालों में ही जिन्दगी उलझ सी गयी है|
दूसरे भाग में नहाने के बाद तरोताजा हुई प्रेयसी का जिक्र है| संवरे सुलझे बाल जीवन को नयी प्रेरणा दे रहे हैं|
 कुछ पाठक कह सकते है कि क्या पुरुष के अलसाये
 रूप को देख कर प्रेयसी को निराशा नहीं होती होगी? हाँ, मैं सहमत हूँ|
इसलिए सभी लोग रोज नहायें सिर से पैर तक भली प्रकार, ठीक से|
 बताता चलूँ कि इस कविता की प्रेरणा मुझे इस चलचित्र से मिली है|)
…
First part of my Hindi poem, explain dull feeling prevalent in early morning life.
In second part, life is refreshed after proper bath, hair wash and hair style.
Here is a rough near – translation in English:
 
(the first moment of weaning)
Those stretch-out in the morning,
                 dull, indolence, intoxicating|
Those awakened, Quasi sleepy eyes,
                 you a song, sung by black beetle||1||
That half-stylish, elusive hair, 
                 thy sparse, scattered state|
That bursting broken comb,
                 Mesh of thousands Spider||2||
That stopped fairy of life,
                 helpless, unprovoked, savage, impoverished|
That lost laughter, humour, Joy,
                 that missed black and white morning||3||
 
(After re-freshening)
Oh! Blossom perfect cheering you,
                 like many singing birds and cuckoos|
Recently bathed, smiling lady,
                 blithe air, water, land, sky||1||
That flowing silk dress,
                 systematic, beautiful hair|
Amusing, happy, young lady,
                 wavy moves like reindeer ||2||
Laugh, humour, joy, luxury,
                 winning all my young life|
Lady of this entire universe,
                 you won my lascivious mind||3||

गायत्री मन्त्र (हिंदी)

ॐ भू भुव स्व|

वह ग्राह्य सवित्देव|

होवें शुद्ध प्रकाशित|

सुहेतु मम सद्बुद्धि ||

(गायत्री मन्त्र का यह मान्त्रिक अर्थ मैंने विक्रम संवत २०५० आषाढ़ शुक्ल पक्ष ७ दिन शनिवार को किया था| मूल संस्कृत मन्त्र की ही तरह इस पद्य की रचना में सावित्री छंद का प्रयोग करने का प्रयास किया है| मुझे संस्कृत नहीं आती अतः मैंने उस समय उपलब्ध हिंदी अनुवाद का सहारा लिया है|)

 

ॐ भूर्भुवः॒ स्वः ।

तत्स॑वितुर्वरे॑ण्यं ।

भ॒र्गो॑ दे॒वस्य॑ धीमहि। ।

धियो॒ यो नः॑ प्रचो॒दया॑त्॥

सुनसान सड़क पर

सुनसान सड़क पर

देर शाम

टहलते हुए

गुनगुना रहा था

कोई पुराना प्रेम गीत

.

लाठी लहराते

सामने से आते

सिपाही ने

दूर से

कान के

पास कुछ पीछे

ललचाती लम्पट तीखी

नजर से

किया कुछ

बलात्कार सा

.

अचानक

अचानक

सहमी मरियल सी

श्याम वर्ण किशोरी ने

पीछे से कसकर

कंधे पर

पकड़ा

कान में

शब्द से आये

बचा लीजिये

निगल जायेगा

हाथ थाम लिए

दिल थम गया

.

मोड़ से

गुजर कर

सांसे ली गयीं

लड़की झुकी

मेरी ओर

आँखे नम थीं

चेहरा रक्तहीन

.

अचानक

अचानक

हाथ उठा

उसके बांये

स्तन पर

यंत्रवत जड़ दिए

अपने हस्ताक्षर

.

राहत थी

आँखों में

हल्की पड़ती चमक

ने जैसे कहा हो

शुक्रिया श्रीमान

अस्मिता बख्श दी

.

अचानक

अचानक

पौरुष ने कहा

कलंक

निरे नपुंसक

.

अचानक

अचानक

रात को

आँख खुल गयी

चढ़ा हुआ था

तकिये पर

.

.

(कवि हूँ या नहीं हूँ| कविता करने का न वादा है, न दावा है| चित्र यद्यपि मेरा नहीं हैं मगर इस चित्र को भी कृपया “शब्द समूह” के साथ या बाद अवश्य पढ़े|)

मिटी न मन की खार – (कुण्डलिया)

 

एक शहीद पैदा किये,

एक दुश्मन दिए मार|

दंगम दंगम बहुत हुई,

मिटी न मन की खार|| दोहा १||

 

मिटी न मन की खार,

दर्पण भी दुश्मन भावे|

दर्प दंभ की पीर,

अहिंसा किसे सुहावे|| रोला||

 

दुनिया दीन सब राखे,

सब झगड़ा व्यापार|

मार काट बहुत बिताई,

अमन के दिन चार|| दोहा २||

 

उपरोक्त कुण्डलिया छंद की रचना के कुछ छिपे हुए उद्देश्य हैं| उन्हें जानने के लिए इसके छंद नियमावली पर एक निगाह डालनी होगी|

दोहा + रोला + दोहा = कुण्डलिया|

ये रचना प्रक्रिया रसोई घर में सेंडविच बनाने की प्रक्रिया से बिलकुल मिलती जुलती है|

यह रचना समर्पित है कश्मीर के लिए| कश्मीर जो आज कुण्डलिया बन गया है; भारत पाकिस्तान के बीच, भारत की सत्ता और विपक्ष के बीच, पकिस्तान के सत्ता विपक्ष के बीच, हिन्दू और मुसलमान के बीच, हमारी खून की प्यास के बीच| कुण्डलिया की एक और खासियत है, पहले दोहे का अंतिम चरण, रोले का पहला चरण होता है| यहाँ पर मैं इसे आज के सन्दर्भ में घिसे पिटे तर्क – कुतर्क के बार बार दोहराव के रूम में देखता हूँ| अगली विशेष बात जो ध्यान देने योग्य है, वह है कुण्डलिया का पहला और अंतिम शब्द एक ही होता है| जैसे जीवन में बातचीत में ही झगडे शुरू होते है और घूम फिर कर बात चीत से ही समाप्त करने पड़ते हैं|

एक दूसरा कारण इस कुण्डलिया को लिखने का और भी रहा है| अफजल गुरु की फांसी| कई खबरें आतीं हैं, जिनसे लगता है कि उसे पूरी तरह न्याय नहीं मिला और देश की जनता के आक्रोश को शांत करने और असली दोषियों तक न पहुँच पाने के सत्ताधारियों की निराशा ने उसे येन केन प्रकारेण दोषी ठहरा दिया| साथ ही मैं किसी भी दशा में फांसी की सजा को न्याय के विरुद्ध मानता हूँ| फांसी दोषी को मार तो देती है पर न तो उसे पूरी सजा देती है, न पीड़ित को पूरा न्याय| युद्ध, छद्म युद्ध, गृह युद्ध, महा युद्ध आदि के मामलों में तो यह दुसरे पक्ष के लिए शहादत का उदाहरण तक बना देती है| यह कुण्डलिया इसी प्रसंग में लिखा गया है|

क्या तुम पुरुष विश्ममित्र??

परिहास हास, विनय अनुनय,
गायन वादन, नृत्य अभिनय|

हे तपस्वी तेजोमय व्यवहारी,
मेनका बारम्बार हार कर हारी||१||

किया न तुमने सम्मान सत्कार,
दिया न नासिका कर्तन उपहार|

क्रोध काम संसार लोभ मोह,
किस किस का किया विछोह||२||

तुच्छ नीच स्त्री अधर्म,

देव लोक का वैश्या कर्म|

इन्द्र दूती सर्वनाश तुम्हारी,
विश्वामित्र इन्द्र[i] पर भारी||३||

स्त्री पड़ी तपस्या पर भारी,
मान श्रम परिश्रम सब संहारी|

छोड़ तपस्या तप पदवी भारी,
विश्वामित्र मुनि बने संसारी||४||

मेनका विश्वामित्र

मेनका विश्वामित्र

यह स्त्री भी क्या प्रेम पात्र,
ताडन तोडन, मरण वज्रपात|

प्रेमपाश में पड़े पुरुष मात्र,
कर न सके तुम घात आघात||५||

कपट कूट, धोखा षड़यंत्र,
देवलोक दिव्य यन्त्र मन्त्र|

इन्द्राचार छोड़ भूल मेनका,
भूली हाल मन का तन का||६||

नव जीवन ने ली अंगड़ाई,
पुत्री शकुंतला घर में आई|

कटु जीवन की कटु सच्चाई,
माता पिता का संग न पाई||७||

क्या जीवन सन्देश तुम्हारा,
पुरुषीय अहंकार सब हारा|

स्त्री वैश्या भोग निमित्त,
परन्तु लगाया तुमने चित्त||८||

काम पीड़ा का व्याधि अतिरोग,
विषद बल वासना बलात्कार|

विश्वास श्रृद्धा स्त्री जीवन सार,
आमोद प्रमोद आहार विहार||९||

कर न सके एक बलात्कार,
तुमने चुना कौन सा चित्र?
नव भारत का प्रश्न एक,
क्या तुम पुरुष विश्ममित्र||१०||

(कुछ दिन पहले मैंने पौरुष का वीर्यपात लेख लिखा था, आज लोग रावण ही हो जांये तो भी बहुत कुछ सुधर सकता है|  लोगों ने रावण का चरित्र हनन तो कर लिया पर आशय नहीं समझा| अभी हाल में बलात्कार क्यों में इन्द्र का जिक्र कुछ लोगों को क्रुद्ध कर गया, मगर वो तथ्य मैंने पैदा नहीं किया; बड़े बड़े ग्रंथों में लिखा है| देश भर में बहुत सारा मंथन चिंतन हो रहा हैं और मैं भी अलग नहीं हो पाता हूँ| मैंने ब्रह्मचर्य का मुद्दा कई बार उठाया हैं, ब्रह्मचर्य का अर्थ पौरुषहीन या प्रेमहीन हो जाना नहीं हैं| जिस देश काल में लोग प्रेम, कामुक प्रेम, प्रेम वासना और बलात्कार में अंतर नहीं कर पा रहे हों, वहाँ सिर खपाना कहाँ तक उचित है?)

रेखाचित्र http://vintagesketches.blogspot.in/2009/09/menaka-vishwamitra.html से लिया गया है|


[i]  सामान्यतः इन्द्र का तात्पर्य देवराज इन्द्र से ही है परन्तु शरीर की समस्त इन्द्रियों से स्वामी मन अथवा हृदय को भी इन्द्र कहा गया हैं| यहाँ पर दोनों अर्थ उचित हैं परन्तु मेरा इस स्थान पर इन्द्र शब्द का प्रयोग मन के लिए है| प्रसंगवश, बता दूँ कि कुछ लोग कामेन्द्रिय को भी इन्द्र के रूप में निरुपित करते हैं|

कुछ भूल तो है मेरी…

 

महीनों पहले

लंबी सड़क के बीच

दरख्तों के सहारे

चलते चलते

तुमने कहा था

भूल जाओगे एक दिन

.

.

.

याद आते हो आज भी

साँसों में सपनों में

गलीचों में पायदानों में

रोटी के टुकड़ों में

चाय की भाप में

.

.

.

तुम आज भी

हर शाम कहते हो

भूल गया हूँ मैं तुम्हें

हर रात गुजर जाती है

मेरे शर्मिंदा होने में

.

.

.

हर सुबह याद आता है

तुम्हें भूल चूका हूँ मैं

.

.

.

कुछ भूल तो है मेरी…

 

ऐश्वर्य मोहन गहराना

(१८ जनवरी २०१३ – सुबह

जागने से कुछ पहले

अचानक मन उदास सा था

करवटें बदलते बदलते

तुम्हारी याद में)