विश्व-बंदी २० मई


उपशीर्षक –  ज़रा हलके गाड़ी हांको

क्या यह संभव है कि आज के करोना काल को ध्यान रखकर पाँच सौ साल पहले लिखा गया कोई पद बिलकुल सटीक बैठता हो?

क्या यह संभव है कि कबीर आज के स्तिथि को पूरी तरह  ध्यान में रखकर धीरज धैर्य रखने की सलाह दे दें?

परन्तु हम कालजयी रचनाओं की बात करते हैं तो ऐसा हो सकता है|

ज़रा हल्के गाड़ी हांको, मेरे राम गाड़ी वाले…

अर्थव्यवस्था और स्वास्थ्य दोनों को संभलकर चलाने का पूरा सुस्पष्ट सन्देश है|

गाड़ी अटकी रेत में, और मजल पड़ी है दूर…

वह हमारी वर्तमान स्तिथि को पूरी तरह से जानते और लम्बे संघर्ष के बारे में आगाह करते हैं|

कबीर जानते हैं कि वर्तमान असफलता का क्या कारण है:

देस देस का वैद बुलाया, लाया जड़ी और बूटी;

वा जड़ी बूटी तेरे काम न आईजद राम के घर से छूटी, रे भईया

मैं हैरान हूँ यह देख कर कि कबीर मृत देहों के साथ सगे सम्बन्धियों और बाल-बच्चों द्वारा किये जा रहे व्यवहार को पाँच सौ वर्ष पहले स्पष्ट वर्णित करते हैं:

चार जना मिल मतो उठायो, बांधी काठ की घोड़ी

लेजा के मरघट पे रखिया, फूंक दीन्ही जैसे होली, रे भईया

मैं जानता हूँ कि यह सिर्फ़ एक संयोग है| परन्तु उनका न तो वर्णन गलत है, न सलाह| पूरा पद आपके पढ़ने के लिए नीचे दे रहा हूँ|

सुप्रसिद्ध गायिका रश्मि अगरवाल ने इसे बहुत सच्चे और अच्छे से अपने गायन में ढाला है:

 

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विश्व-बंदी १९ मई


उपशीर्षक –  दूरियाँ दो गज रहें

बुतों बुर्कों पर आह वाले, वाह वाले, नकाब लगाए बैठें हैं,

सूरत पर उनकी मुस्कान आती हैं, नहीं आती, ख़ुदा जाने|

जिन्हें शिकवे हैं शिकायत है मुहब्बत है, हमसे दूर रहते हैं,

दुआ सलाम दूर की भली लगती हैं, गलबहियाँ ख़ुदा जाने|

जाहिर है छिपकर चार छत आया चाँद, चाँदनी छिपती रही,

ये दूरियाँ नजदीकियाँ रगड़े वो इश्क़ मुहब्बत के ख़ुदा जाने|

जो नजदीकियाँ घटाते हैं बढ़ाते हैं, अक्सर दोस्त नहीं लगते,

हम खुद से दूर रहते हैं इतना, रिश्ते-नातेदारियाँ ख़ुदा जाने|

महकते दरख़्त चन्दन के बहकते हैं, भुजंग गले नहीं लगते,

गेंदा, गुलाब, जूही माला में नहीं लगते, गुलोगजरा ख़ुदा जाने|

दूरियाँ दो गज रहें, नजदीकियाँ चार कोस, इश्किया रवायत है,

बात करते हैं इशारों से अशआरों से, तेरी नैनबतियाँ ख़ुदा जाने|

 

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हम देखेंगे: फ़ैज़ अहमद फ़ैज़


पहले प्रस्तुत है मूल रचना का हिंदी भावानुवाद जिसे श्री विपुल नागर ने किया है:

 

हम देखेंगे

निश्चित है कि हम भी देखेंगे
वो दिन कि जिसका वचन मिला है
जो वेदों में लिख रखा है

जब अत्याचार का हिमालय भी
रुई की तरह उड़ जाएगा
हम प्रजाजनों के कदमों तले
जब पृथ्वी धड़ धड़ धड़केगी
और शासक के सर के ऊपर
जब बिजली कड़ कड़ कड़केगी
जब स्वर्गलोक सी पृथ्वी से
सब असुर संहारे जाएँगे
हम दिल के सच्चे और वंचित
गद्दी पर बिठाए जाएँगे
सब मुकुट उछाले जाएँगे
सिंहासन तोड़े जाएँगे
बस नाम रहेगा ईश्वर का
जो सगुण भी है और निर्गुण भी
जो कर्ता भी है साक्षी भी
उठेगा “शिवोऽहम्” का नारा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो

और राज करेगा ब्रह्म-पुरुष
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो

हम देखेंगे!

मूल उर्दू रचना देवनागरी लिपि में: 

हम देखेंगे

लाज़िम है कि हम भी देखेंगे

वो दिन कि जिस का वादा है

जो लौह-ए-अज़ल में लिख्खा है

जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गिराँ

रूई की तरह उड़ जाएँगे

हम महकूमों के पाँव-तले

जब धरती धड़-धड़ धड़केगी

और अहल-ए-हकम के सर-ऊपर

जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी

जब अर्ज़-ए-ख़ुदा के काबे से

सब बुत उठवाए जाएँगे

हम अहल-ए-सफ़ा मरदूद-ए-हरम

मसनद पे बिठाए जाएँगे

सब ताज उछाले जाएँगे

सब तख़्त गिराए जाएँगे

बस नाम रहेगा अल्लाह का

जो ग़ाएब भी है हाज़िर भी

जो मंज़र भी है नाज़िर भी

उट्ठेगा अनल-हक़ का नारा

जो मैं भी हूँ और तुम भी हो

और राज करेगी ख़ल्क़-ए-ख़ुदा

जो मैं भी हूँ और तुम भी हो|

क्या इस रचना का विरोध उचित है?