नया भला भोर

“नया भला भोर होगा कल”

सुना और चुप रहा

प्रदूषण भरे दिन के

प्रथम प्रहर का मतिमंद सूर्य||१||

 

अँधेरी सांय संध्या,

धूमिल अंधरे में

गहराती रही,

दिन

आशावान रहा

अब कोई अँधेरी रात न होगी||२||

 

सोचता हूँ मुस्करा दूँ

गहन अँधेरे में,

अँधेरा तो देखेगा

मेरी हिमाकत||३||

 

अरी जलेबी

अरी जलेबी गोल मटोल

घूमा घामी पोलम पोल

चाशनी तेरी झोलम झोल

रंग तेरा लालम घोल|

तेरी मौसी इमरती माई

फिर भी तू हमको भाई

इमरती हमने सूखी पाई

तेरे संग में दूध मलाई|

दूध मलाई राबड़ी भाई

देख के हमने दौड़ लगाईं

कड़ी कुरकुरी बड़की माई

मरी मुलायम हमने पाई|

ठण्डी मंडी तुझको खाऊँ

दही जामन उसमें पाऊँ

ठण्डी गर्मी क़स्बा गाऊँ

दूगनम दून मैं खा जाऊँ||

– – ऐश्वर्य मोहन गहराना

 

 

 

बेवफ़ा

मेरी बेवफ़ा ने मुझे छोड़ा न था, दिल तोड़ा न था|

मेरी जिन्दगी से रूह निकाली न थी|

मेरी जिन्दगी में न जलजले आये, न सूखी आँखों में सैलाब, न बिवाई फटे पाँवों तले धरती फटी|

जिन्दगी यूँ ही सी घिसटती सी थी, नीरस, बंजर, लम्बी ख़ुश्क सड़क बिना मंज़िल चलती चली जाती हो|

उस के बिना कल दो हजार एक सौ सतासीवीं यूं ही सी उदास शाम थी|

कहवाखाने के उस दूर धुंधले कोने में उसका शौहर कड़वे घूँट पीता था|

काँगड़ा की उस कड़क चाय की चुस्की के आख़िरी घूँट पर ख़याल आया|

इश्क़ मेरे दिल से रिस रिस के तेरे हुज़ूर में सज़दे करता है, मिरे महबूब!

मेरे माशूक किस कहर से बचाया था तूने मुझे|

वो रात गुजरी थी

वो रात गुजरी थी खड़ामा खड़ामा
किसी चोर पुराने की तरह गुपचुप,
उम्मीद में लौ ए चराग़ शमा ए सुब
दिल बैठे बैठे जाता रहा जाता रहा।

चुपचुप चीखते चटखते तलवे तले
जमीन थी भी कुछ बोझिल बोझिल
उम्मीद के लम्बे साये से डरता हुआ
हौसला हमसाया बैठा रहा बैठा रहा।

दूर सितारे की गर्मी से भरमता हुआ
धड़कन भर धड़कते हुए धधकता रहा
नाउम्मीदियों में रात कुछ बाकी रही
यूँ गुजर रही जागता रहा जागता रहा।

आज की रात सोने दो

मैं तुमसे कहता हूँ

फिर की बातें फिर ही करना,

क्या पता, कल सुबह काली हो,

क्या पता, कल की सुबह काली हो|

आज की रात सोने दो||

 

नींद की क्यारी में

सपनों के बीज बोने दो,

क्या पता, उन्नीदी बंजर हो,

क्या पता, समय की गोद सूनी हो|

आज की रात सोने दो||

 

बिखरा हुआ सपना मेरा,

नींद में तो खिलने दो|

क्या पता, आँखों में मंदी हो,

क्या पता, आँखों पर हदबंदी हो,

आज की रात सोने दो||

 

कल की झूठी आशा में,

ये मंजर धुंधला न खोने दो|

क्या पता, कल घोर निराशा हो,

क्या पता, कल उन्नत आशा हो,

आज की रात सोने दो||

 

 

मुर्दा ख़यालात

तड़पते हुए पीले पन्नों पर उबलती सुर्ख़ स्याही का दरिया न बाँध;

सुन, मेरे मुर्दा ख़यालात में गुलज़ार का आना जाना हो जायेगा|

 

नीले रंग का समंदर को यूँ आसमां में न उलीच उँगलियों से;

सुन, सलमा सितारों सी साड़ी पहन के निकली मरना हो जायेगा|

 

बिना बहर की ग़ज़ल सी जिन्दगी में रेख्ता की रौनक़ न देख;

सुन, मरे दिल के इक झगड़े में फिर इश्क़ का रगड़ा हो जायेगा|

 

अगले जनम में हमारी मुलाकातों के झूठे वादे न कर इस कदर;

सुन, तेरी इबादतों में मेरे मरने का बेजार अफ़साना हो जायगा|

 

इंसान की तरह खोखले इस आसमान में सुराख़ की बातें न कर;

सुन, पत्थर उछाल तो तपाकर खूब जरा कि आफ़ताब हो जायेगा|

हे राम!!

हे राम!

याद होगा तुम्हें

छू जाना उस पत्थर का, पथराई अहिल्या का,

मुझे भी याद है – तुम्हारा अधूरा काम||

कभी कभी मौका मिलने पर,

धिक्कारते तो होगे तुम, अपनी अंतरात्मा को||

सहज साहस न हुआ तुम्हें,

लतिया देते इंद्र को, गौतम को,

गरिया देते कुत्सित समाज को,

उदहारण न बन सके तुम||

हे राम!!

तीन अंगुलियाँ मेरी ओर उठीं हैं,

और इंगिता तुम्हारी ओर||