स्वाद श्रेष्ठता का दम्भ


मुझे इडली खाते देखते मजदूर विस्मित थे| उनके लिए कढ़ी कचौड़ी, आलू सब्ज़ी कचौड़ी, चटनी कचौड़ी आदि तो समझने वाली बात थी| यह कचौड़ी जैसी सफ़ेद चीज जिसमें कुछ भी भरा हुआ न था, सब्ज़ी मिली दाल के साथ खाना एक स्वादेन्द्रिक परिभ्रमण था| उन्हें संतोष होता कि भरवां इडली का परिचय चावल के आटे की कचौड़ी कहकर दिया जाता, पर भरवां भी तो नहीं थी| उस समय तक तो मैं खुद भरवां इडली, मसाला इडली, तली इडली और भुनी इडली जैसे पाककला पराक्रमों से अनिभिज्ञ था| खैर उस दिन, सभी का स्थिर निश्चिय था कि यह इडली नामक पदार्थ केवल कभी कभार खाया जा सकता है और इस से रोज पेट भरना असंभव है| 

हमारे पश्चिम उत्तर प्रदेश में भाप से बनने वाले गिने चुने कुछ ही पकवान उन दिनों तक बनते थे| वह सब भी आम भोजन संस्कृति का भाग न होकर कायस्थों के शौकीन मिज़ाज के नाम चढ़े थे|
उस दिन दिन ढले तक मजदूरों का प्रश्न-प्रतिप्र्श्न यही था कि कोई बिना रोटी खाये रात को नींद किस प्रकार ले सकता है| 

हमारे उत्तर भारतीय जाड़ों की शाम दही चावल खाकर ठंड पकड़ बीमार होते रहे हैं, दक्षिण भारतीय गेहूँ की गर्मी से उत्पन्न रोग का इलाज़ कराने के लिए मजबूर रहे हैं| (गेहूँ चावल के मामले में पूर्व पश्चिम कहना शायद अधिक उचित होगा|)

मुगलई, अवधी, कायस्थ, रामपुरी, पंजाबी, मारवाड़ी, सिंधी, गुजराती आदि पाककला को गर्व रहा है कि उनकी कढ़ी और शोरबा विश्व विजय करता रहा है| दक्षिण भारतीय अपने इडली डोसे, पंजाबी छोला भटूरा, बिहारी लिट्टी चोखा, मारवाड़ी दाल बाटी, मालवीय पोहा जलेबी, मराठी पाव भाजी के विश्व और भारत विजय पर गर्वित हैं| सबको भरोसा है कि उनके पकवान में ही वास्तविक दम है और शेष सिर्फ स्वाद ग्रंथि के संतुष्टि के लिए भक्षित होते हैं|

आज वैश्वीकरण युग में भोजन श्रेष्ठता का हमारा दंभ असफल चुनौती पा रहा है| हम चायनीज़, कॉन्टिनेन्टल, जापानी, थाई, तिब्बती, नेपाली, ईरानी, और न जाने किस किस पाककलाओं के विश्वविजेता पकवानों का कबाड़ा प्रसन्नता पूर्वक करते हुए देवी अन्नपूर्णा की आराधना कर रहे हैं| विचारना पड़ता है कि देवी इन्हें प्रसाद के रूप में स्वीकारतीं होंगी या बलि के रूप में| 

इन सब पाककला पराक्रमों के बाद भी हमारा दम्भ स्थिर है – हमारा स्वाद बेहद बढ़िया दूसरे सब स्वादेन्द्रिक परिभ्रमण| 

अपने आस्वादिक स्वभाव के कारण में भारत भर के सभी शाकाहारी भोजनों का आस्वादन प्रसन्नता पूर्वक करता रहा हूँ| परंतु स्वाद श्रेष्ठता की मेरी ग्रंथि हाल में बुरी तरह चोटिल हुई|

हाल में हमारे घर की राम रसोई के लिए नए पाक शास्त्री की नियुक्ति की गई| यह महोदय तमिल नाडू के मदुरई के आस पास के मूल निवासी हैं| उन्हें विविध देशी विदेशी पकवान व्यवसायिक (घरेलू नहीं) तरीके से बनाने का समुचित अनुभव है| स्वभावतः अपने मूल भोजन को वह बेहतर तरीके से बनाते हैं और हम सब भी दिल खोल कर खाते हैं| 

इस दिन मेरा मुँह खुला का खुला रह गया जब उन्हों ने कहा, दक्षिण भारतियों के उत्तर में आने से कम से कम उत्तर भारतियों को को कुछ तो ढंग का खाना खाने के लिए मिल रहा है वरना तो कूड़ा कबाड़ा खाते रहते हैं|

इस आकस्मिक सांस्कृतिक हमले से थोड़ा संभालने के बाद मैंने सोचा, भोजन संस्कृति में व्यापक आदान प्रदान के बाद भी श्रेष्ठता का दम्भ हम सब में बना हुआ है| शायद यही मूल स्वादों को भी बचा रखेगा| वरना सरसों के तेल की तड़का सांभर और मूँगफली तेल के छोले भटूरे गंभीर त्रासदी रहे हैं| चेन्नई के अल्डमस रोड पर मथुरा मूल के ब्रजवासी भोजनलय का सांस्कृतिक सम्मिश्रण बनाम प्रदूषण वाला उत्तर भारतीय भोजन अभी तक जीभ पर बना हुआ है| 

फिलहाल हमारी राम रसोई में सरसों, नारियल, मूँगफली के तेल और सूरजमुखी तेल-नामी तत्त्व देशी घी के साथ कंधा मिला रहा है| आशा है कि हम सभी लोग अपनी भोजन संस्कृति में सांस्कृतिक शुद्धता और सांस्कृतिक सम्मिश्रण दोनों का प्रसन्नता पूर्वक आनंद ले पाएँ|

स्वाद श्रेष्ठता का दम्भ&rdquo पर एक विचार;

कृपया, अपने बहुमूल्य विचार यहाँ अवश्य लिखें...

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.