शिशुओं की ऑनलाइन पढ़ाई


इस सप्ताह चार साल की बेटी को पहली बार ऑनलाइन पढ़ाई करनी थी तो मुझे लगा, यह कैसे होगा? बच्ची बैठेगी कैसे? अपनी शिक्षिका को टेलिविज़न अभिनेत्री की तरह तो नहीं समझेगी? क्या आपसी समझ बन पाएगी? क्या अनुशासन बन पायेगा?

वह पिछले जनवरी तक छः महीने पढ़ने गई थी| उसके बाद हमने घर बदला और जब तक कहीं उसका दाखिला होता राष्ट्रीय तालाबंदी हो चुकी थी| lockdown| दाखिले की बकाया कार्यवाही इस साल पूरी की गई| इस पूरे साल उसने घर पर पढ़ने और अपने भाई को ऑनलाइन पढ़ते देखने में समय बिताया| इस पूरे साल उसने स्कूल जाने के साथ ऑनलाइन पढ़ाई करने के भी सपने देखे| उसने खेल खेल में करोना को रोज मारा और हम सबकी हिम्मत बनाये रखी|Online Education|

पहले दिन वह उतना ही उत्साहित थी, जितना आजकल के बच्चे बाहर घूमने जाने के लिए और पहले के बच्चे दावत में जाने के लिए होते थे|

बच्ची ने पहली रात सुबह छः बजे का अलार्म लगवाया था परन्तु हमने इसे चुपचाप सात बजे कर दिया था| बच्ची साढ़े छः बजे उठ बैठी थी|  उत्साह देखते ही बनता था| एक ऐसा समय जब बच्चों को किसी नए व्यक्ति या बच्चे से मिलने का अवसर नहीं मिल रहा, यह एक शानदार अवसर था| बहुत जल्दी नहाकर तैयार थी| आज के दिन के लिए उसने नए कपड़े खरीदे थे| नई कलम, नई पुस्तक – पुस्तिकाएं, नया अनुभव|

बिना किसी  सहायता के उसने लैपटॉप चालू कर लिया था और लिंक खोलने के लिए हल्ला मचा रही थी| अचानक उठी और घर के मंदिर में सरस्वती को प्रणाम करने पहुंची| शायद उसकी माँ ने कहा था| आकर उसने लैपटॉप और पुस्तकों की समझ अनुसार पूजा की| मैं कलम के लिए याद दिला दिया| कर्मकांडों से दूर संस्कृति के यह चिन्ह संतोष देते हैं|

अभी तो नौ बजे थे| विद्यालय की ओर से सुबह दस बजे के लिए समय तय किया गया था| घड़ी धीरे धीरे चल रही थी कि बच्ची को कोई कठिनाई न हो| अगला एक पल उतना लम्बा था कि “-इन्तहा हो गई इन्तजार की” जैसा कोई फ़िल्मी गाना गाया जा सकता था| ऐसे ऐसे साठ मिनिट अभी बीतने थे|

उसके बाद लैपटॉप का चक्का घूमा| तब पढ़ाई शुरू हुई|

लगता नहीं था कि यह उसका पहला दिन है| विडिओ कॉल के सभी अनुभव उसके काम आ रहे थे| जिस उम्र में मैंने टेलिविज़न नहीं देखा था, रेडियो छूने के अनुमति नहीं थी, ट्रांजिस्टर पर भी केवल आवाज कम ज्यादा करने का काम मिलता था, वह लैपटॉप पर ऑनलाइन पढ़ने लगी थी| पर यह ऐसा वक्त था कि इसे उपलब्धि नहीं कहा जा सकता था|

अगले चालीस मिनिट उसे अपने अनदेखे सहपाठियों के साथ सह-अस्तित्व, सहयोग, सहभागिता का परिचय देना था| उनके साथ प्रतिस्पर्धा करनी थी और बहुत कुछ सीखना था|

अचानक उसने मुझसे पूछा, हाथ कैसे उठाते हैं? यह मेरे लिए नया था| पता होने के बाद भी मैंने अभी तक हाथ उठाने के बटन का प्रयोग नहीं किया था| मुझे लगा था कि वह भी साधारण तरीके से हाथ ऊपर कर देगी| मगर उसे तकनीक की अच्छी समझ थी|

हर पीढ़ी अपने कठिन समय से इसी तरह मुकाबला करती होगी|

कृपया, अपने बहुमूल्य विचार यहाँ अवश्य लिखें...

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