कुली कुचक्र

रेलवे स्टेशन पर समय बिताने के लिए मैंने बेकार खड़े कुली को पकड़ा| इधर उधर की बातें होने लगीं| वह तो सुख दुःख भी साँझा करने लगा| उसका सबसे बड़ा दुःख बहुत छोटा सा था| हमारे बैग और संदूकची में लगे पहिये| मैंने सोचा भी न था कि छोटे से दो पहिये जमीन पर नहीं उसकी छाती को रोंदते हैं और आँतों पर चलते हैं|

पहले आदमी अपने सामान को हाथ में उठाये या कंधे पर लादे हुए थक जाता था| अगर उसके पास पैसा नहीं होता तो थका हारा सामान घसीटता हुआ तेलगाड़ी बना हुआ रेलगाड़ी तक पहुँच जाता| मगर अगर उसके पास थोड़ा भी पैसा होता तो अपने बच्चों की मिठाई का ख्याल छोड़ कुली के बच्चों की पढाई का साधन बन जाता| ऐसा आदमी कटता भी बहुत था|

खाते पीते घर के बाबू लोग सबसे ज्यादा कटते| उन्हें हमेशा लगता रहता कि कुली सब लूटता है और फिर थोड़ी देर मेहनत मशक्कत के बाद कुली उसे हनुमान बाबा का अवतार लगता| भले ही पैसा देते वक़्त वो शनिचर हो जाता मगर कुली का पेट पाल देता| भीड़भाड़ वाले स्टेशन पर कुली की बहुत मांग रहती| कुली भी नखरे करते| कई बार बिना मांगे लिखित मजदूरी से दोगुना मिलता तो कई बार झगड़ा होता| पैसे वाले तो खैर अपना चाकर साथ लाते और साहब लोग की तरह दुनिया भर से बचते बचाते रेलगाड़ी तक पहुँचते| कई साहब तो इस बात का पैसा देते कि तीसरे दर्जे के लोगों से बचाकर दूसरे रास्ते से उन्हें गाड़ी तक पहुँचाया जाए या उतरा जाए| कई बार लोग लौटने वक्त का कुली जाते वक़्त पक्का कर जाते| क्या साहब, कुली पर तो फ़िल्म भी बन गई| कुली लोग तो पूरा दुबई बसा गए|

मगर जब से संदूकचियाँ गाड़ी हो गईं तो कुली कटने लगे| जिन्हें काम मांगने की जरूरत नहीं होती थी, आज काम की भीख माँगने लगे| लोग स्टेशन पर कुत्ते और भिखारी के बाद कुली को ही सबसे ज्यादा दुत्कारते हैं| दो पहिये नहीं साहब यह हमारे घर का बुझा हुआ चूल्हा है|

ऐसा नहीं कि कुली लूटते है मगर कुली की मजदूरी से काम नहीं बनता| जिन्दा रहने के लिए आपको महीने का पंद्रह हजार तो चाहिए ही| रोज का पांच सौ| दिन में कितनी गाड़ी लगती हैं एक प्लेटफार्म पर जब दस गाड़ी लगें तब कुली को पांच काम पकड़ में आते हैं| उन पांच काम में अब पांच सौ भी न बनें तो घर क्या लेकर जाएँ| लोग अपना सामान दौड़ते हुए चले जाते हैं| उनकी क्या गलती| हमारा भाग्य गलत है| पहियों ने हमारे काम की इज्जत कम कर दी|

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