आम अति उत्साह आदमी पार्टी

सफलता उत्साह दिलाती है और अति उत्साह आपकी अच्छी भली योजना को सफलता से कई योजन दूर भेज देता है|

आम आदमी पार्टी की दिल्ली विजय ऐसी ही थी कि लगा दिल्ली अब दूर नहीं| अचानक जोश खरोश में चर्चा हुई, अब देश की हर सीट पर लड़ाई लड़ी जायेगी| न संगठन, न कार्यकर्ता, न धन, न धान्य; सभी जोश से लड़ने चल पड़े|

उस समय देश भर में लोकसभा सदस्यता प्रत्याशी के फॉर्म इस तरह भरे गए जैसे आईआईटी या आईएएस के फॉर्म भरे जाते हैं| संसद सदस्य बने या न बनें, तीसरे स्थान पर रहने का पक्का ही था| मगर एक पार्टी के सबसे ज्यादा जमानत जब्त करने का रिकॉर्ड बना लिया गया|

कारण क्या रहे होंगे?

परन्तु मेरे मन में कई प्रश्न उठ रहे हैं|

१.       क्या पार्टी देश में हर जगह मौजूद थी? क्या भ्रष्ट्राचार जो आज मध्यवर्गीय मुद्दा है, क्या वो राष्ट्रव्यापी मुद्दा भी है? देश में आज भी मानसिकता है जिसमें आज भी सामंतवाद का उपनिवेश है, जहाँ सत्ता को चढ़ावा चढ़ाना धर्म है|

२.       क्या पार्टी ने दिल्ली में यह नहीं सुना कि राज्य में केजरीवाल और देश में मोदी? कारण सीधा था केजरीवाल को जनता कुछ दिन प्रशिक्षु रखना चाहती थी|

३.       क्या पार्टी कुछ महत्वपूर्ण चुनिन्दा सीटों पर चुनाव नहीं लड़ सकती थी? शायद धन और संसाधन को पचास सीटों पर केन्द्रित किया जा सकता था| उस स्तिथि में पार्टी संसद में महत्वपूर्ण स्वर बन सकती थी और शायद तीसरा सबसे बड़ा दल बन सकती थी|

४.       क्या आगे की रणनीति को ध्यान में रख कर मनीष सिसोदिया या किसी अन्य को मुख्यमंत्री नहीं बनाया जा सकता था? क्या पार्टी में एक व्यक्ति एक पद का सिद्धांत नहीं होना चाहिए?

५.       क्यों पार्टी बार बार जनता के पास जाने की बात करती है और भाजपा या कांग्रेस कार्यकर्ताओं से सलाह वोट लेती हैं? क्या पार्टी के पास जो विचारशील, विवेकशील, प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं हैं, उनकी सुनवाई या मत प्रक्रिया नहीं होनी चाहिए?

६.       क्या दिल्ली पुलिस के मामले में धरना देने के समय पार्टी यह नहीं कह रही थी कि देश के हर मुद्दे पर हमारे मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री धरना देंगे और वही भ्रष्ट बाबु राज करेंगे जिनसे हम लड़ रहे हैं?

७.       दिल्ली में हम अगर तीन दिन विधानसभा में बैठे रहते और सदन को दस दिन बिठा कर रखते तो जनता खुद देखती कि दोषी कौन हैं? सरकार बनाते समय पार्टी दस दिन जनता से पूछती रही, त्यागपत्र देते समय जनता कहाँ गयी, कार्यकर्ता कहाँ गए? दिल्ली को और दिल्ली में पार्टी कार्यकर्ताओं को क्यों नेतृत्व विहीन छोड़ दिया गया?

८.       क्या सोनी सूरी, मेधा पाटकर, और अन्य महत्वपूर्ण सामाजिक सेनानियों को चुनावों में हरवा कर पार्टी ने उनके दीर्घकालिक संघर्ष कमजोर नहीं कर दिए?

९.       आज अगर दिल्ली विधानसभा भंग होती है तो चुनाव शायद जल्दी होंगे? क्या पार्टी हर घर में जाकर हर हफ्ते बता सकती है कि उसने कब क्या क्यों कैसे किया? पार्टी के पास एक एक बात के जबाब में सोशल मीडिया पर, कार्यकर्ताओं के मोबाइल पर और मोबाइल मैसेजिंग सर्विसेस पर इन सब बातों के जबाब हैं?

आज आम आदमी पार्टी को आवश्यकता है कि उन मतदाताओं को चिन्हित करे जिन्होंने उसे दिल्ली विधान सभा या संसदीय चुनावों में मत दिया है| सभी मतदाताओं के प्रश्नों के उत्तर दिए जाने चाहिए| एक साथ, विधानसभा क्षेत्र और दिल्ली राज्य के बारे में बात होनी चाहिए| बात होनी चाहिए वर्तमान संसद सदस्यों पर पार्टी के नियंत्रण और उनके अपने क्षेत्रीय और राष्ट्रीय कार्यक्रमों की| बात होनी चाहिए, उन सभी महत्वपूर्ण प्रत्याशियों की जिनका चुनाव में खड़ा होना, अपने आप में एक कार्यक्रम था, एक मुद्दे की बात थी, एक सिंद्धांत की उपस्तिथि थी|

 

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2 विचार “आम अति उत्साह आदमी पार्टी&rdquo पर;

    • सौरभ भाई,
      जिस राजनैतिक दल या नेता का हम समर्थन करते हैं उसकी आलोचना करना हमारा अधिकार और कर्तव्य दोनों हैं|
      आपको प्रसन्नता हुई, जानकर अच्छा लगा| आपकी उचित आलोचना का मैंने सदा स्वागत किया है| परन्तु, चुनावों के समय जब निर्णय नहीं बदले जा सकते थे तब मैं अनावश्यक आलोचना नहीं कर सकता था|
      बाकि मुझे लगता है आम आदमी पार्टी, समय की मांग है; जिस प्रकार लोग १९८४ में भाजपा पर हँस रहे थे आज आम आदमी पार्टी पर हँस रहे है|
      परन्तु समय चक्र को चलना है और उचित राजनीति आगे अवश्य बढ़ेगी|

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